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Archive for February, 2010

होली के बहाने न्यू मीडिया की अपार शक्ति का बखान कर गये आलोक मेहता

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 28, 2010

“न्यू मीडिया” से बौखालाये और होलियाये आलोक मेहता ने होली के बहाने इस मीडिया की जोरदार तरीके से ऐसी की तैसी करने की कोशिश की। इसके लिये तमाम तरह के तर्क और कुर्तक गढ़े, और इस न्यू मीडिया की लानत-मलानत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा, जो उनके लिए स्वाभाविक था। न्यू मीडिया के खिलाफ वह पूरी तरह से कुर्ता धोती फाड़ो वाले अंदाज में थे। उनके लिए मौका भी था और दस्तुर भी। लेकिन हुड़दंगई के मूड में आने के बाद जाने या अनजाने में उन्होंने न्यू मीडिया की अपार शक्ति का भी बखान करते चले गये। और साथ में उन्हें इस बात का मलाल भी था कि न्यू मीडिया पुरातन मीडिया के मुकाबले सेंसर की परिधि से बाहर है।

उन्हीं के शब्दों में, “ब्लॉग प्रभुओं का एक शब्द, अमेरिकी, चीनी राष्ट्रपति या ब्रिटिश प्रधानमंत्री तक, नहीं कटवा सकता है…खासकर हिंदी ब्लॉग पर उनका बस ही नहीं चल सकता…” जिस स्वतंत्रता को पाने में पुरातन मीडिया को एड़ी चोटी का बल लगाना पड़ा है (और अभी भी स्वतंत्रता के क्लाइमेक्स पर नहीं पहुंच सका है), उसे तकनीकी क्रांति की बदौलत न्यू मीडिया ने सहजता से प्राप्त कर लिया है। इसे एक उदाहरण से समझना आसान होगा। अखबार “अमृत बाजार पत्रिका” का प्रकाशन क्षेत्रीय भाषा में बंगाल से होता था। सर एस्ले एडन उन दिनों बंगाल के लेफ्टिनेंट गर्वनर थे। जोड़ घटाव करके उन्होंने बाबू क्रिस्टो दास को “हिन्दू पैट्रियोटिक” का संपादक दिया, ताकि उस अखबार को वह अपने तरीके से नचा सके। उस समय “अमृत बाजार पत्रिका” के संपादक बाबू शिशिर कुमार सरकारी महकमों में जारी धांधले बाजी और नील-खेती के नकारात्मक पक्षों पर बेबाक तरीके से अपने अखबार में लिख रहे थे। उस समय आज के न्यू मीडिया की तरह प्रिंट मीडिया कई मायनों में स्वतंत्रता का भरपूर उपभोग कर रहा था। भारत में काम करने वाले अंग्रेज संपादकों और पत्रकारों की वजह से अखबारों पर हुकुमत की पकड़ थोड़ी ढीली थी। बाबू शिशिर कुमार को अपने पक्ष में मिलाने के लिए एस्ले साहब ने सम्मान के साथ उन्हें अपने पास बुलाया बोला, “मैं, आप और क्रिस्टो दास मिलकर बंगाल का शासन चलाएंगे। मेरे निर्देश में अपना अखबार चलाने के लिए किशोर दास तैयार हो गये हैं। आपको भी यही करना होगा। जो सहायता मैं हिंदू पैट्रियोट को देता हूं वह आपको भी मिलेगा। और सरकार के खिलाफ कुछ भी प्रकाशित करने से पहले उस आलेख की प्रति आपको मेरे पास भेजनी होगी। इसके बदले सरकार बहुत बड़ी संख्या में आपका अखबार खरीदेगी और सरकारी मामलात में बाबू क्रिस्टो दास की तरह मैं आपकी राय लेता रहूंगा।”

उन दिनों बाबू शिशिर कुमार की माली हालत ठीक नहीं थी। वैसे भी इस तरह के आफर पर अच्छे-अच्छे संपादकों के लार टपकने लगते, (होली टिप्पणी- पता नहीं आलोक मेहता ऐसी स्थिति में क्या करते !) लेकिन बाबू शिशिर कुमार दूसरी मिट्टी के बने हुये थे। इस शानदार आफर के लिए एस्ले साहब को धन्यवाद देते हुये उन्होंने कहा, “जनाब इस धरती पर कम से कम एक ईमानदार पत्रकार को तो रहना ही चाहिये।” एस्ले साहब पर गुस्सा का दौरा पड़ गया और फूंफकारते हुये बोले, “आपको पता है कि आप किससे बात कर रहे हो। इस सूबे का प्रमुख होने के नाते मैं किसी भी दिन आप को जेल की हवा खिला सकता हूं।”
यह कोरी भभकी नहीं थी। इसी घटना से वर्नाकूलर प्रेस एक्ट की नींव पड़ी। एस्ले साहब लार्ड लिटन से मिले और एक ही बैठक में वर्नाकूलर प्रेस एक्ट लाने की तैयारी हो गई। इसका मुख्य उद्देश्य अमृत बाजार पत्रिका के मुंह पर ताला लगाना था। (होली टिप्पणी- लगता है न्यू मीडिया को लेकर आलोक मेहता भी एस्ले साहब की मानसिकता में जी रहे हैं, वैसे फगुहाट का रंग भी हो सकता है।) लेकिन बाबू शिशिर कुमार एस्ले साहब से चार कदम आगे थे। 1878 में इस एक्ट के लागू होने के पहले ही उन्होंने अमृत बाजार पत्रिका को अंग्रेजी भाषा में तब्दील कर दिया, और लार्ड लिटन के वर्नाकूलर प्रेस एक्ट को ठेंगा दिखाते हुये निकल गये, क्योंकि अंग्रेजी अखबार इसके जद से बाहर था।
कहने का अर्थ यह है कि जिस स्वतंत्रता के लिए बाबू शिशिर कुमार को अपने अखबार की भाषा बदलनी पड़ गई उसका मजा न्यू मीडियो को ऐसे ही मिल रहा है। अमेरिकी, चीनी राष्ट्रपति या ब्रिटिश प्रधानमंत्री जब इसके सामने विवश है तो क्या यह एस्ले साहब की मानसिकता की स्वाभाविक हार नहीं है ? एस्ले साहब तो सरकारी अधिकारी थे, उनका इस तरीके से सोचना लाजिमी था, वो भी एक गुलाम देश के बारे में, लेकिन अपार स्वतंत्रता यंत्र पर होली हुड़दंगई करना एक संपादक के हाइपोक्रेसी का ही खुलासा करता है। उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जयगान करने वाला काफिला नहीं दिखाई दे रहा है, बस चंद पोस्ट पढ़कर अपना मनमाफिक निष्कर्ष निकाल कर खुद की पीठ थपथपाने में लगे हैं। दोष उनका नहीं है तात्कालिक लाभ को दांत से पकड़ने वाले लोगों की दूरदृष्टि वैसे ही कुंद पड़ जाती है। आने वाले 20-25 सालों में जब बिजली और नेट घर-घर पहुंच जाएगा तब इस तरह के क्रिएटिव लोगों को अपने वजूद को बचाने के लिए इसी न्यू मीडिया के शरण में आना पड़ेगा।
न्यू मीडिया के प्रति विकसित होने वाली एस्लेवादी मानसिकता को यदि आप लोग रात में अगजा में नहीं डाले हैं तो सुबह उसे जरूर डाल दें। और फिर उसमें आलू पका के खाइये और होली के रंग में सराबोर हो जाइये….

न्यू मीडिया हो गई सस्ती
छा गई सब पे मस्ती
बोलो सब भोल बम बम
लिखो खूब, नाचो छम छम
भांग-धतूरा होवा ना कम
छेड़ो ना बेसुरा सरगम
जोगिरा सरररर, जोगिरा सरररर

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फागुन आया रे!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 28, 2010

मेरे एक कवि मित्र ने घोषणा की है फागुन आया रे! कब आया, कहां से आया, किस रास्ते आया, किसके मार्फ़त आया और कब तक ठहरेगा… इन सवालों का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है. सीधे काम की बात पर आ गए. सबसे पहले सीधे यही बता दिया कि किसलिए आया है. एकदम दिल्ली वालों की तरह. गोया फागुन के आने की सूचना सिर्फ़ दिल्ली वालों के लिए है. बल्कि सही पूछिए तो आपके लिए आपके साथ सदैव का नारा देने वाली दिल्ली पुलिस के लिए. जो थाने में ख़ून से लथपथ आदमी की भी शक्ल देखते ही सीधा सवाल करती है, हां बोलो. तो किसी को यह पूछने की ज़रूरत नहीं कि वह किसलिए आया है. उसके इरादे उन्होंने पहले ही ज़ाहिर कर दिए हैं. और जो इरादे उन्होंने ज़ाहिर किए हैं, वह बिलकुल नेक नहीं लगते.
बहरहाल, फागुन नंगा-लुच्चा-उचक्का-लफंगा जो भी हो, पर मेरे कवि मित्र पूरे ईमानदार हैं. तो उन्होंने बताया है- गोरी को बहकाने फागुन आया रे. हालांकि एक जगह उन्होंने यह भी कहा है कि वह प्रेम रस बरसाने आया है, पर अगले ही बन्द में फिर स्पष्ट कर दिया है तन-मन को भरमाने फागुन आया रे. अब अगर ग़ौर करें तो मालूम होता है कि ये प्रेम रस बरसाने वाला फागुन पहले तो गोरी को बहकाने और फिर तन-मन को भरमाने वाला है. बीच में यह जो प्रेम रस बरसाने की बात है वह बिलकुल वैसे ही है जैसे कि डिबॉच प्रेमियों के प्रेम का पूरा सिलसिला होता है.
ये ऐसा सिलसिला होता है जिसके प्रति अब की गोरियां-सांवलियां जो भी हैं, वो पहले से ही सतर्क रहती हैं. पहले की लड़कियां इसके बीच वाले पद के ही फेर में पड़ती थीं. और फागुन इसका झांसा देकर धीरे से गा डालता था अंतिम पद. बाद में जब मामला आगे तक बढ़ जाता था तो फिर सब गुण गोबर हो जाता था. ये तो अच्छा हुआ कि अब समाज मध्यकाल के सियापे से निकल कर उत्तर आधुनिक होने लगा है. आधुनिक होने का सही मतलब चित्रकला ने बहुत पहले ही बता दिया है. वैसे ही जैसे चित्रकला क्लासिसिज़्म, नियो क्लासिसिज़्म, रोमांटिक, एकेडमिक और रिअलिज़्म के दौर से होते हुए मॉडर्निज़्म और पोस्ट मॉडर्निज़्म तक आ गई है. मॉडर्निज़्म तक आने की प्रेरणा ही इसने गुफाओं के भित्तिचित्रों से ली थी. अब समाज यही प्रयोग कर रहा है. लिव-इन रिलेशनशिप और अनमैरेड मदरहुड की प्रेरणा भी विद्वान लोगों के मुताबिक शरीरों की समसामयिक ज़रूरतों से नहीं, पौराणिक आख्यानों से मिलती है.
ख़ैर जो भी हो, पर इस प्रेरणा ने एक काम बड़ा अच्छा किया है. इसने फागुन टाइप प्रेमियों को बेदर्दी बालमा, बेईमान साजन और बेवफ़ा सनम टाइप मानद उपाधियों से बचाया है. रबड़ के सुरक्षा कवच और आपातकालीन गोलियों ने इस नव-स्वातंत्र्यवाद (आसान भाषा में कहना चाहें तो आप इसे नए तरह का स्वतंत्रतावाद कह सकते हैं) को थोड़ी और हवा दी है. एड्सविरोध के नाम पर चल रहे अभियानों ने अगर फागुनों की हौसला अफ़जाई की है बहकाने के मामले में, तो इन गोलियों के ज्ञान ने गोरियों को प्रेरणा भी दी है बहकने की. कोई भरोसा नहीं अगर नव-उत्तरआधुनिकतावादी विज्ञापनों में (वैसे विज्ञापन बनवाने, बनाने और देखने वाले किसी वाद-विवाद के बवाल में नहीं पड़ते) एक गोरी दूसरी गोरी को फागुन की ओर दिखा कर गोलियों की तरफ़ इशारा करे और इन गोलियों के बारे में न जानने पर उसकी मलामत करती मिले. …. क्या जानती है तू अगर इन्हें ही नहीं जानती. और अंत में निष्कर्ष कुछ ऐसा आए.. पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें.
गीतों-गाथाओं में दर्ज लोकजीवन के अनुभवों पर भरोसा करें तो इस पूरे मामले के लिए एकमात्र ज़िम्मेदार फागुन ही है. अनमैरेड मदरहुड से लेकर एड्स तक. यूं तो इसके नाम पर बहुत कुछ बेचा जा रहा है, पर करोड़ों की ग्रांट भी डकारी जा रही है और बताया जा रहा है कि बचाव का इकलौता जो रास्ता है वह जानकारी है. जानकारी किसकी? एड्स की या उन साधनों की जो इसे बदनाम करके बेचे जा रहे हैं? एक तरफ़ बाबा रामदेव हैं जो संयम की साधना कराने पर तुले हैं और दूसरे कई-कई रूपों में बाबा कामदेव हैं जो कंडोम की साधना कराने पर तुले हैं. संयम से चलकर यह जो हमारी संस्कृति कंडोम तक आई है, यह फागुन की ही कृपा से तो हुआ है. जब तक स्वयंसेवी संगठन और सरकार यह काम संभालने की स्थिति में नहीं थे, तब तक यह काम फागुन जी ने ही देखा. अब सरकार को यह भरोसा हो गया है कि वह ख़ुद यह काम कर सकती है, तो उसने इसे सीधे अपने हाथ में ले लिया है. फागुनजी को साल में सिर्फ़ एक महीने के लिए बुलाती है मॉनिटरिंग और सुपरविज़न के लिए. बाक़ी पूरे देश में अपने कामकाज की समीक्षा करके वह मुंबई में जाकर डेरा डाल लेते हैं.
मुंबई में रहने वाले लोग बताते हैं कि वहां बारहों महीने फागुन जी की कृपा बनी रहती है और इसीलिए वे लोग मुंबई के मुरीद हैं. शायद इसीलिए बहुत लोगों को यह भ्रम हो गया है कि फागुन जी ओरिजिनली यहीं के हैं. वैसे ही जैसे पूरे भारत में कुछ लोगों को यह भ्रम है कि वे जो हैं कि वो आर्य हैं और सारे आर्य ओरिजिनली यहीं के हैं. पता नहीं फागुन जी को मराठी बोलनी आती भी है या नहीं! ग़नीमत है कि यह बात अभी मराठा अभिमानवादियों को पता नहीं चली कि फागुन जी ओरिजिनली मुंबईकर नहीं हैं. अगर कहीं पता चल जाए तो क्या होगा? शायद इसीलिए नए ज़माने की रीति-नीति से वाकिफ़ मेरे कवि मित्र ने फागुन के साथ पुरवाई का ज़िक्र बिलकुल नहीं किया है. चाहे भले फागुन बिना पासपोर्ट-वीज़ा के पाकिस्तान से आया हो, बंग्लादेश या चीन से आया हो, या फिर अफ्रीका, म्यांमार, इथियोपिया, इंडोनेशिया से आया हो; बस उसे उत्तर भारत से आया हुआ नहीं होना चाहिए. पुरवाई का ज़िक्र होते ही यह बात तय हो जाती है कि वह उत्तर भारत से आया है और ऐसी स्थिति में दिल्ली दरबार में उस पर प्रोफेशनल टैक्स लगाया जाता है मुंबई में जूते ईनाम मिलते हैं.

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चाहिए कुछ भी नहीं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 27, 2010

चाहिए कुछ भी नहीं तुमसे मुझे
न सांसों की सरगम
न आने की आहट
न धुंध खयालों का
न अहसास रहगुजर सा
शहनाई भी नहीं
रानाई भी नहीं
परछाई भी नहीं
तनहाई भी नहीं
रुसवाई भी नहीं
तुम सोचते होगे यह
क्या चाहिए है मुझको
बस साथ इस तरह से
मिलता रहे तुम्हारा
जब जी में आए देखूं
जब जी करे भुलाऊं
तुम राह में न आओ
मैं तुमको गुनगुनाऊं
देना है अगर साथ मेरा
इस तरह तुम्हें
तब ही तो मैं कुछ कर सकूंगा
अपने लिए, तेरे लिए, जग के लिए
चाहिए कुछ भी नहीं तुमसे मुझे

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फाल्गुन आया रे !

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 19, 2010

गोरी को बहकाने
फाल्गुन आया रे ।
रंगों के गुब्बारे
फूट रहे तन आँगन,
हाथ रचे मेंहदी के
याद आते साजन ॥
प्रेम-रस बरसाने
फाल्गुन आया रे ।
यौवन की पिचकारी
चंचल सा मन,
नयनों से रंग कलश
छलकाता तन ॥
तन-मन को भरमाने
फाल्गुन आया रे ।
[] राकेश ‘सोहम’

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मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 2, 2010

-हरिशंकर राढ़ी

(लेखमाला की पिछली कड़ी में मदुराई और मीनाक्षी मंदिर का जो वर्णन मैंने किया था , उसे राष्ट्रीय सहारा दैनिक ने अपने 23 जनवरी के अंक में ज्यों का त्यों सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने कॉलमब्लॉग बोलामें ‘देवदर्शन और विशेष शुल्क‘ शीर्षक से छापा है।)

मदुरै का मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर वास्तव में हिन्दू धर्म ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति का एक गौरव है। अंदर जाने पर जो अनुभूति होती है, उसकी तो बात ही अलग है; इसका बाहर का रूप ही अत्यन्त चित्ताकर्षक है और अपनी विशालता की गाथा स्वयं ही बयान कर देता है। वहीं से यह उत्कंठा जागृत हो जाती है कि कितनी जल्दी अंदर प्रवेश कर लें। यह मंदिर जितना भव्य बाहर से है , कहीं उससे ज्यादा अंदर से है।

सामान्यतया मीनाक्षी मंदिर के नाम से विख्यात इस मंदिर का पूरा नाम मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर या मीनाक्षी अम्माँ मंदिर है।यह मंदिर भगवान शिव और देवी पार्वती जो मीनाक्षी के नाम से जानी जाती हैं, को समर्पित है। हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव अत्यन्त सुन्दर रूप में देवी मीनाक्षी से विवाह की इच्छा से पृथ्वीलोक पधारे। देवी मीनाक्षी पहले ही मदुराई के राजा मलयध्वज पांड्य की तपस्या से प्रसन्न हो मदुराई में अवतार ले चुकीं थीं। कुछ बड़ी होने पर वे वहां शासन संभालने लगीं। भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने देवी मीनाक्षी से विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे वे सहर्ष मान गईं। अब इस विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। निश्चित रूप से यह पृथ्वीलोक का सबसे महत्त्वपूर्ण और गरिमामय विवाह होने वाला था जिसमें सम्मिलित होने के लिए भगवान विष्णु भी अपने लोक से चल दिए। उन्हें देवी मीनाक्षी के भाई की भूमिका निभानी थी।किन्तु, मार्ग में आशंकित इन्द्र देव ने विघ्न उपस्थित कर दिया और भगवान विष्णु यथासमय वहाँ पहुंच न सके। अंततः स्थानीय देवता (तिरुपरंकुन्द्रम से) ने विवाह में मुख्याधिपति की भूमिका निभाई और कार्यक्रम सम्पन्न हो गया। इससे सम्बन्धित वार्षिक उत्सव भी यहाँ मनाया जाता है।

मंदिर मुख्यतया भगवान शिव और देवी मीनाक्षी को समर्पित है किन्तु इसके विशाल अन्तर्गृह में अनेक देवी देवताओं की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर के केन्द्र में मीनाक्षी की मूर्ति है और उससे थोड़ी ही दूर भगवान गणेश जी की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है जिसे एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है।आखिर गणेशजी विघ्नहत्र्ता ही नहीं देवी पार्वती के पुत्र भी तो हैं जिन्हें यहां मुकुरनी विनायकर के नाम से पूजा जाता है।

गणेश जी के दर्शन के लिए हम गए तो वहां पर दो पंक्तियां थीं। मुझे लगा कि उनमें से एक पंक्ति पुरुषों के लिए थी और दूसरी महिलाओं के लिए। वस्तुतः एक पंक्ति में महिलाएँ अधिक थीं और पुरुष एकाध ही। चूँकि दक्षिण भारत में अभी भी तुलनात्मक रूप से नियम – कानून का पालन अधिक होता है , यह सोचकर मैं अलग लाइन में लग गया और पत्नी अलग लाइन में।हालाँकि मेरे मित्र सपत्नीक एक ही (महिलाओं वाली) लाइन में लगे । लाइन लंबी थी, आगे जाकर कुछ इस प्रकार अलग हुई कि दर्शनापरान्त हम लोगों को दो अलग- अलग और विपरीत दिशा में जाना ही पड़ा। ऐसा नहीं था कि हम दर्शन करके एक दरवाजे से बाहर निकल जाएं! मंदिर की विशालता इतनी कि कुछ कहा नहीं जा सकता। वापस भी लौटने की स्थिति नहीं थी। मंदिर में ही तैनात एक पुलिस अधिकारी से मैंने बहस की तो (ईश्वर की कृपा से उसे अंगरेजी आती थी) उसने मार्ग निर्देशन किया । वहां से मैं बाहर तो निकल गया किन्तु फिर उस विशालता में खो गया। गनीमत यह हुई कि हमारे मोबाइल जमा नहीं कराए गए थे। संपर्क हो गया और किसी प्रकार एक प्रमुख स्थल के सहारे करीब दस मिनट बाद हम मिल गए। यह भी खूब रही और हम बहुत देर तक इस गुमशुदगी के चटखारे लेते रहे।

मंदिर का वास्तु एवं विशालतासौन्दर्य ही नहीं, गणितीय आंकड़ों की दृष्टि से भी मीनाक्षी मंदिर विशाल है। मंदिर कुल 45 एकड़ क्षेत्र में फैला है और निर्मित क्षेत्रफल का आयाम 254 मी। लंबाई और 237 मी. चैड़ाई में है। मंदिर में 12 उच्च शिखर हैं और सर्वोच्च शिखर जो दक्षिण की ओर स्थित है, की उँचाई 170 फीट है। मंदिर के अन्दर अइयरम मंडपम नामक एक विशाल मंडप (Hall) है जिसे सामान्यतः सहस्र खंभा (Thousand Pillar Hall )के नाम से जाना जाता है। वास्तविकता यह है कि इस हॉल में कुल 985 खंभे है।इस हॉल का निर्माण 1569 ई0 में अरियनाथ मुदलियर ने कराया था ।इसकी विशालता देखते ही बनती है। कई बार ऐसा लगता है कि धर्म एवं संस्कृति को लेकर कुछ लोग कितना सोचते रहे होंगे और कितना कुछ करते भी रहे होंगे, अन्यथा आज इतनी विशाल संरचना, इतना विशाल सृजन नहीं होता। यह क्रम संभवतः युगों से चला आ रहा है और चलता ही रहेगा । आज की सृजनशीलता भी कहीं से रुकी हुई प्रतीत नहीं होती, हालांकि विध्वंसक शक्तियां मार्ग में कम बाधाएं नहीं डाल रही हैं। आतंक का साया हर जगह मंडरा रहा हैफिर भी सर्जक लगे हुए हैं संस्कृति एवं सभ्यता की वृद्धि करने में । दिल्ली के नवनिर्मित अक्षरधाम जैसे भव्य मंदिर ऐसी ही जिजीविषा के प्रतीक हैं। यहाँ मैं किसी साम्यवाद या आर्थिक विषमता ओर मुड़ने के मूड में नहीं हूँ , बस जो सुन्दर लगा , उसका वर्णन भर करना चाहता हूँ।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस मंडप में खम्भे ही खम्भे दृष्टिगोचर होते हैं। सभी खंभे पत्थरों को काट कर बनाए गए हैं और इनपर उत्कृष्ट नक्काशी की गई है जो मंडप की सुन्दरता में चार चाँद लगाती है।मुख्य हॉल से लगभग हर गोपुरम की ओर रास्ता जाता है। मंदिर के विशाल गलियारे में असंख्य दूकानें भी हैं जिनपर हस्तकला से लेकर अन्य सजावटी सामानों की बिक्री होती रहती है।

मंदिर का वर्तमान स्वरूप1623से 1659 के बीच आया। तमिल साहित्य के अनुसार मंदिर का अस्तित्व गत सहस्राब्दि में होना चाहिए किन्तु इसका कोई बड़ा प्रमाण नहीं मिलता। शैव दर्शन के अनुसार मंदिर सातवीं शताब्दी में अवश्य था जिसे कट्टरपंथी मुस्लिम आक्रान्ता मलिक कफूर ने सन्1310में पूर्णतः ध्वंश कर दिया ।

मंदिर के प्रांगण में एक अत्यन्त सुन्दर तालाब है जिसे स्वर्णकमल पुष्कर के नाम से जाता है। वैसे इसका वास्तविक नाम पोर्थमराईकुलम है। भक्तगण दर्शनोपरान्त प्रायः यहाँ बैठकर आत्मिक शांति का आनन्द लेते हुए हैं। मंदिर में कैमरा ले जाने पर रोक नहीं है अतः अधिकांश लोग फोटो खींचते हुए भी देखे जा सकते हैं। यद्यपि फोटोग्राफी के लिए शुल्क 25 रु निर्धारित है किन्तु इस नियम का परिपालन शायद ही होता हो। कम से कम मैंने तो ऐसा नहीं देखा। हाँ, एक बार एक कर्मचारी ने हमें जरूर मना किया था ।

तालाब के पास घंटों बैठे रहने के बाद एक गरिमामय अनुभूति के साथ बाहर निकलने का मन बनाया ।ऐसा जरूर लग रहा था कि यह दर्शन और यह यात्रा जीवन की एक उपलब्धि है। दुख इस बात का हो रहा था कि हमारे पास इतना समय नहीं था कि मदुराई में एक दो दिन और रुकें और इस दिव्य और भव्य मंदिर के सौन्दर्य का और अवलोकर एवं विश्लेषण करें । अगले दिन हमें कोडाइकैनाल जाना था । बस आज की ही रात शेष थी यहाँ रुकने एवं समझने के लिए।निकलते वक्त भी मैं बार -बार पीछे मुड़कर उस महत्ता को देख लेता और महसूस कर लेता था । मदुराई शायद ही यादों से बाहर निकले!

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