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मीनाक्षी के बाद

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 8, 2010

मीनाक्षी के बाद
मंदिर से निकलते-निकलते अंधेरा हो चुका था । विद्युत प्रकाश में नहाया हुआ मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर प्रांगण के बाहर से और भी मनमोहक लग रहा था। फिर भी हम अब बाहर की दुनिया में वापस आ चुके थे। अर्थ-व्यवहार एवं दुकानदारी के चिर परिचित क्रियाकलाप ज्यों के त्यों चल रहे थे। एक बात बताना तब मैं भूल गया था और शायद अच्छा ही हुआ था। मंदिर के प्रवेशद्वार पर ही मदुराई की मशहूर सिल्क साड़ियों की अनेक दूकानें है। ये दूकानदार मंदिर में प्रवेश से पूर्व जूता-चप्पल रखने की सुविधा मुफ्त उपलब्ध कराते हैं। मुझे उनकी इस सहृदयता पर संदेह हुआ था और मैंने इसका कारण जानना चाहा तो बड़ी मुश्किल से बताया गया कि आप वापसी में उनकी दूकान पर साड़ियाँ देख सकते है। अब जाकर इस सुविधा का अर्थ समझ में आया और तसल्ली हुई। लौटे तो साड़ियाँ देखनी ही पड़ीं।
पर मैं यह जरूर कहना चाहूँगा कि मदुराई की सिल्क साड़ियाँ वास्तव में बहुत अच्छी होती हैं। इनमें श्रम, कलाकारी एवं गुणवत्ता का अद्भुत समन्वय होता है और दिल्ली की तुलना में इनकी कीमत भी काफी तार्किक होती है। मदुराई की याद के रूप में मैंने भी धर्मपत्नी के लिए उनकी पसन्द की साड़ी खरीदी और फिर से मदुराई की गलियों का आनन्द लेने लगे।
दक्षिण भारत , खासकर मदुराई और आसपास के इलाकों में चाय बनाने का एक अलग अंदाज है। उनके इस खास अंदाज की वजह से हमारी चाय पीने की आदत कुछ और ही बढ़ गई थी। वहां के चाय बनाने वाले दूध में चाय के सत्त को इतना ऊपर से डालते और फेंटते हैं कि देखते ही बनता है। बिल्कुल कड़क चाय बनती है और गजब का ही स्वाद आता है। ऐसी बहुत सी चाय हमने पी और चाय बनते देखने का आनन्द लिया।
रात का भोजन हमने एक दक्षिण भारतीय रेस्तराँ में लेने का निर्णय किया। तमाम दक्षिण भारतीय व्यंजनों का बड़े प्लेट में केले के गोल-गोल कटे पत्तों पर परोसा जा रहा था। वहां केले के पत्ते पर भोजन परोसने का तात्पर्य शुद्धता ही नहीं अपितु सम्मान देना भी होता है। हमारे समूह में अधिकांशतः बच्चों ने दक्षिण भारतीय व्यंजनो का जमकर आनन्द लिया।
अगले दिन हमें कोडाईकैनाल जाना था। इण्टरनेट एवं कुछ अन्य माध्यमों से मैंने कामचलाऊ जानकारी इकठ्ठा कर ली थी। दूरी ज्यादा नहीं है। लगभग एक सौ बीस किलोमीटर है और मदुराई के बस स्टैंड से तमिलनाडु राज्य परिवहन की बसें जाती रहती हैं । मित्र ने कहा कि कुछ और जानकारी ले लेते हैं और परिवार हम निकट स्थित होटल में छोड़कर जानकारी लेने निकल पड़े। इधर-उधर घूमते-घामते एक ट्रवेल एजेण्ट से हम टकरा ही गए। बड़े सम्मान से वह हमें अपने आफिस ले गया और बताया कि उसकी पर्यटक बसें सुबह आठ बजे तक कोडाईकैनाल के लिए निकलती हैं और सभी दर्शनीय स्थलों का भ्रमण कराकर सायं आठ बजे तक वापस मदुराई छोड़ देती हैं। मैं कभी भी इन व्यवसाइयों की मंशा पर भरोसा नहीं कर सका हूँ। ये कौन सी गोली दे रहे हैं और कितना झूठ बोल रहे हैं ये भगवान भी नहीं जान सकता ! खैर , हमें तुरन्त वापस नहीं लौटना था। कम से कम एक रात वहां रहना था। ये क्या कि पैसे भी खर्च करिए, भागकर जाइए भी और कुछ ठीक से देख भी न पाइए। गोया कबड्डी पढ़ाने गए हों! उसके नियमानुसार आने जाने और साइट सीइंग का किराया २५०/- प्रति सीट था और केवल जाने एवं कुछ स्थलों को देखकर उतर जाने का किराया १५०/-। मैंने अंदाज लगाया था कि मदुराई से कोडाईकैनाल का राज्य परिवहन की बस का किराया दूरी के हिसाब से लगभग 70रु तो होगा ही । एजेण्ट ने 80रु बताया था। इस प्रकार इसकी बस में जाने से कोई विशेष नुकसान नहीं और वह भी हमें होटल से उठाएगा। पर ये तो बाद में पता चला कि तमिलनाडु परिवहन की सामान्य बसों का किराया बेहद कम है- केवल 28 पैसे प्रति किलोमीटर और इस प्रकार मदुराई से कोडाईकैनाल का किराया 40रु प्रति व्यक्ति है।
अगली सुबह थोड़ी बहुत किचकिच के बाद बस वाले ने हमारी यात्रा शुरू करवा दी । मदुराई एक बड़ा शहर है, इसका बोध हमें बस वाले ने जगह- जगह से सवारियां उठाने के क्रम में करा दिया । मदुराई से बाहर निकलते ही राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 7 (वाराणसी से कन्याकुमारी, जो भारत का सबसे लम्बा राजमार्ग है ) पर प्रकृति की हरीतिमा ने हमारा मन मोहना शुरू कर दिया । कुछ दूर और चलकर जब बस ने मुख्य मार्ग को छोड़ कोडाईकैनाल की तरफ पतली सड़क पर मोड़ लिया तो मानो प्रकृति अपने सुन्दरतम रूप में आ गई!नारियल के हरे-भरे बाग, सरसराती हवा और हल्की- हल्की फुहार ने जैसे जीवन का वास्तविक सन्देश दे दिया । एक से एक रूप, अनूठा सौन्दर्य और खो जाने की ललक ने जैसे किसी स्वाप्न लोक में पहँुचा दिया। मन संगीतमय होने लगा और बरबस ही कुछ पंक्तियाँ उभरने लगीं । मैंने डायरी ली और उस यथार्थ सौन्दर्य को शब्द बद्ध करने लगा । आज वह पृष्ठ मेरे सामने है-
लम्बी चिकनी
सलोनी
सड़क पर भागते हम ,
दोनों तरफ फैले
नारियल के ये हरे-हरे पेड़
दोनों तरफ उठी हुई पहाड़ियाँ
आकार में जैसे
किसी सलोनी नवयुवती के
उन्नत उरोज,
बस देखते ही रह जाते हैं
हम ही नहीं
जैसे ये नारियल के पेड़ भी
निहार रहे हों
उसका यौवन
आँखें फाड़
और उस सौन्दर्य के आगे
महसूस कर रहे हों छोटा
अपने आप को।
फिर मैं तो सामान्य सा मानव
और क्या करता
महसूस करने के सिवा ?
आखिर मुझे भी तो मानव बने रहना है
और सौन्दर्य को महसूस करना
मनुष्य के अस्तित्व के लिए
आवश्यक है ,
चाहे वह सौन्दर्य प्रकृति का हो
या किसी युवती का!
खिड़की की साइड में बैठी हुई पत्नी
बहुत सुन्दर लग रही है
आज,
और मैं सोच रहा हूँ
कि काश
ये मेरी प्रेमिका होती!
कितना साम्य होता
इस प्रकृति से
क्योंकि दोनों ही
समर्पित हैं
पूरी तरह मेरे लिए
पर मैं
उनमें न जाने क्या और खोजता हूँ
और कुछ चोरी करना चाहता हूँ
केवल अपने लिए
इस प्रकृति से !

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2 Responses to “मीनाक्षी के बाद”

  1. केवल अपने लिएइस प्रकृति से ! ..bahut umda.

  2. सशक्त अभिव्यक्ति!नारी-दिवस पर मातृ-शक्ति को नमन!

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