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अहसास

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 13, 2010

रतन
क्या यही अहसास है?
आप थे जब तक साथ मेरे
एक संबल था और बल था
और था मां का भी आंचल आपसे
हमने पाई तमाम खुशियां
साथ इस अहसास के
कि पापा हैं साथ हमारे
एक इस अहसास से
दमदार हो जाते थे हम
सारी मुश्किल पल में आसान
होती थीं यह जानकर
कि हैं पापा साथ मेरे
क्या यही अहसास है?
तुम नहीं हो तो मुझे भी
घर की चिंता है नहीं
ख्वाब जितने गांव के थे
वे सभी गुम हो गए
खो गया हूं नितांत अपने आप में
फिर भी जाने बात क्या है आप में
भूलकर भी याद अक्सर आते हो
जब कभी मैं मुश्किलों में
खुद को पाता हूं घिरा
याद करके तुमको हल मिल जाता है
रूह को भी शांति मिल जाती है
मैं तुम्हारे साथ खुद को पाता हूं
क्या यही अहसास है?
दूर होकर आपसे है कुछ कमाया
खूब शोहरत पाई है
काश, आप भी इसे महसूस करते
दोगुनी होती खुशी
आपको अहसास होता और मुझे भी
पर आप हो क्षितिज के उस पार
मैं इस पार अधर में भी
मिलना होगा बाद मुद्दत
एक दिन और एक पल
शायद हो भी नहीं
फिर भी
है यही उम्मीद जाने क्यों मुझे
क्या यही अहसास है?

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6 Responses to “अहसास”

  1. भावुक कर दिया आपकी रचना ने…बहुत भावपूर्ण!

  2. निश्छल भाव प्रभाव छोड़ जाते हैं पाठक पर । सो छोड़ गये ।

  3. निश्चित ही एक मधुर अहसास

  4. Amit Kumar said

    सुन्दर प्रस्तुति….बधाई !!______________सामुदायिक ब्लॉग "ताका-झांकी" (http://tak-jhank.blogspot.com)पर आपका स्वागत है. आप भी इस पर लिख सकते हैं.

  5. बहुत भावुक कर दिया आपने।

  6. भावपूर्ण अभिव्यक्ति…

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