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Archive for April, 2010

क्यों जाने दिया उसे?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 17, 2010

रतन

1
कोलाहल का तांडव
खंडित है नीरव
भीड़ चहुंओर
भागा-भागी का दौर
सब हैं अपने काम में मगन
फुरसत नहीं किसी को
पल भर की
सुबह हुई शाम हुई
जिंदगी रोज तमाम हुई
2
जहां थी कोलाहल की आंधी
सब कुछ पड़ा है आज मंद
खामोश दरो-दीवारें
बे-आवाज जंजीरें
न घुंघरू की छम छम
न तबले की थाप
न सारंगी की सुरीली धुनें
न हारमोनियम का तान
न कोई कद्रदान
न किसी का अलाप
न रिक्शे का आना
न ठेली का जाना
न कुत्ता, न कमीना
गली है सूना-सूना
बस आती है आवाज
सायरन की अक्सर
तो होती है कानाफूसी
घर ही घर में
न आवाज बाहर को जाती किसी की
कि आई पुलिस है
मोहल्ले में अपने
3
राम-रहीम
दो दिल हैं मगर
एक जां हैं वे बचपन से
जब से वे स्कूल गए
अब हैं अधेड़ मगर
उनकी दोस्ती है पाक, जवां
आज भी, अब भी
एक-दूसरे से मिलना होता है रोज
न मिले, एक दिन
तो लगता है ऐसे
कि गोया मिले हैं नहीं हम बरस से
4
है एक दिन यह भी
कि सूनी हैं सड़कें
लगी है शहर में
पहरेदारी कफ्र्यू की
गुजरता है दिल पर
नहीं जाने क्या-क्या
कि मिलना हो कैसे हमारा-तुम्हारा
मोहल्ला है दूर
बंटा हुआ, जातियों में
राम का अपना, रहीम का अपना
दोनों के मोहल्ले वाले
एक दूसरे के दुश्मन
मारने मरने की बात
होती है अक्सर
5
एक दिन कुछ पल के लिए
शाम को मिलती है छूट
थोड़ी देर के लिए क‌र्फ्यू में
रहीम आ जाता है मौका पाकर
बचते बचाते राम से मिलने उसके घर
राम खुश हुआ
रहीम को सामने देख
गले मिल दोनों ने दिल से
किया ईश्वर का शुक्रिया
राहत की सांस ली
कि चलो हम मिले तो सही
फिर दोनों ने कोसा उनको
जिन्होंने बिगाड़ी है शहर की तस्वीर
भरे हैं जिन्होंने
लोगों के मन में नफरत के बीज
अल्लाह-ईश्वर को बांटने वाले
वे सैयाद अपने दामन को काटकर तो देखें
उनका लहू भी लाल ही है
ठीक वैसा ही, जैसा हमारा
क्या फर्क है उनमें और मुझमें?
6
यही सोचा दोनों ने अपने अपने मन में
तभी आई शोर की बारिश
खत्म हुई शांति
वजह बना एक बलवा
और फिर मच गया हल्ला
जय श्री राम, अल्ला हो अकबर
मरने की चीख
मारने की पुकार
आह, मर गया, मार डाला का शोर
इस पर नहीं था किसी का जोर
7
तभी दरवाजे पर हुई आहट
सांसें थम गई, लगा कि दम गया
राम-रहीम थे सकते में
जाने क्या होगा अब?
तभी हुई दरवाजे पर दस्तक
किसी ने हाथ से दी थपकी
बोला, दरवाजा खोलो राम भाई
क्यों? आवाज आई अंदर से
मुझे जरूरी काम है
मैं अभी किसी से नहीं मिल सकता
आप भी जाइए, बाद में आइएगा
तभी दूसरी आवाज आई
तुम हिंदू हो या मुसलमान?
राम को समझते देर न लगी
उसने रहीम को गले लगाया
पीठ पर हाथ फेरा और
ईश्वर को याद किया, कहा,
आप जैसा मुझे जानते हैं
मैं वही हूं, और कुछ न समझें
पर दरवाजा अभी नहीं खुलेगा
तीसरी आवाज आई
हम दरवाजा तोड़ दें तो?
तुम्हारे रहीम का सिर मरोड़ दें तो?
देखो, उन्होंने हमें किस तरह मारा है?
तुम उन्हें घर में छिपाए बैठे हो?
8
भगवान की कसम है, मेरे पास कोई नहीं
रहीम अपने घर में है
फिर दरवाजा खोलते क्यों नहीं?
मैं अभी ऐसा नहीं कर सकता
चलती रही बातों की झड़ी
बातचीत की हुई लंबी कड़ी
लेकिन राम ने वही किया
जो सोचा था
वह वहीं पर ठहरा रहा
वे चिल्लाकर कुछ समय बाद जाने लगे
अंदर दोनों मुस्कुराने लगे
गले मिले और खुशी के आंसू बहाने लगे
9
कुछ पल बीता आंसुओं के सैलाब के साथ
दोनों ने न कोई बात की
न कोई सरगोशी हुई
दिल बोझिल था
पर मन में थी खुशी
कि हमने खुदा जैसा दोस्त पाया है
बिल्कुल राम जैसा
था यही गुमान मन में
इसी के साथ कुछ पल गुजरा
शाम हुई, रात की चादर बिछने लगी
रात की ठंडक शहर को लीलने लगी
10
यह हुआ अहसास रहीम को
कि इस रात की ओट में मैं
जा सकता हूं घर को
सोचता यह भी मन था
कि यदि आज राम न होता
तो क्या होता?
मैं क्या होता?
फिर उसने कह दी घर जाने की बात
राम ने कहा, कहां?
जरा सोच, यदि वे मिल गए तो?
क्या होगा तेरा?
रहीम ने चुपचाप राम की शक्ल देखी
वह सोचने लगा मन में
मेरी वजह से तू कितनी परेशानी झेलेगा?
क्यों दुख मेरे तू लेगा?
कहा राम ने, नहीं
हम यहीं रहेंगे, भूखे, रूखे, सूखे
जब तक शहर शांत नहीं हो जाता
लोग जब तक होश में नहीं आ जाते
लेकिन वहां की भी तो सोच
जहां से मैं आया हूं?
घर के लोग क्या-क्या सोचते होंगे?
मन ही मन वे क्या बुनते होंगे?
उनके मन की हालत सोच
मेरे भाई मेरे दोस्त
11
निकला रहीम बुझे मन से
राम का भी कलेजा मुंह को आया
एक को घर की चिंता थी
दूसरे को मानवीय पक्ष सता रहा था
क्या करें, क्या न करें
तभी रहीम ने रूंधे गले से
आंख में आंसू लिए
चला थके कदमों से
बुझी उम्मीदों के साथ
राम ने भी विदा किया
अश्रुधारा के साथ रहीम को
दरवाजे को धीरे से खोल
देखा बाहर चारों ओर
फिर दी रहीम को चादर
ओढ़ ले इसे
निकल पड़ा मुंह ढंक कर वो
अपने घर की ओर
12
विदा हुआ जब दोस्त दोस्त से
चैन गया और नींद गई
रात गुजारी पलकों में
डर और खौफ के साये में
दोस्त हमारा घर पहुंचा या नहीं
क्या हुआ उसका?
13
सुबह हुई, तो डर की चादर
रात की चादर के संग विदा हो गई
सुबह चमकीली थी
उजाले में अलग आभा थी
जो खुशी भी दे रही थी लेकिन डर भी
क्यों आई है आज की सुबह ऐसी सुहानी
निराली और विकराली?
तभी आया अखबार वाला
खिड़की से दिए दो रुपये और लिया अखबार
टिक कर कुर्सी पर बैठा
फिर देखा अखबार का पहला पन्ना
यह क्या? निकला मुंह से
हठात राम का मन आहत हुआ
उसकी आंख में थी एक तस्वीर
वैसी ही दाढ़ी, वैसा ही कुर्ता-पायजामा, बिखड़े बाल
उसी चादर में लिपटा रहीम
मगर एक अलग रंग भी था
इन सबके साथ उसके पूरे शरीर पर
जो हमारे जैसा ही था सूर्ख, लाल-लाल
वह आंखों की गहराई में समा गया
अंदर तक, अंतर तक
एक बार फिर बहे आंसू
फिर उसे कोसा
क्यों गया वह?
फिर खुद को कोसा
क्यों जाने दिया?
आखिर क्यों जाने दिया उसे?

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क्यों मुस्काते हो..?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 16, 2010

रतन

 जब मैं सदमे में जीता हूं
तब तुम क्यों मुस्काते हो?
मंजर है नहीं आज सुहाना
क्यों तुम गीत सुनाते हो?
पाया नसीबा हमने ऐसा
अक्सर तुम कहते मुझसे
मैं तो हूं पछताने वाला
अब तुम क्यों पछताते हो?
जब तक था मन साथ तुम्हारे
तुमने दूरी रखी कायम
अब हारा हूं थका हुआ हूं
तो क्यों कर तड़पाते हो?
तन खोया मन भूल चुका है
वो सपनों के घर-आंगन
रातों में ख्वाबों में क्यों तुम
आकर मुझे सताते हो?
मेरी अपनी राम कहानी
है मैं उस पर रोता हूं
अब क्या पाओगे मुझसे तुम
नाहक अश्क बहाते हो?
बुझी हुई तकदीर है मेरी
अब न नसीबा जागेगा
जान चुके हो रोज रोज क्यों
आकर शमां जलाते हो?

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तुम कहां गए

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 13, 2010

रतन
बतलाओ तुम कहां गए

बरसों बाद भी तेरी यादें
आती हैं नित शाम-सवेरे
जब आती है सुबह सुहानी
जब देते दस्तक अंधेरे

कोना कोना देखा करता
नजर नहीं तुम आते हो
मन में बसते हो लेकिन क्यों
अंखियों से छिप जाते हो

बतलाओ तुम कहां गए

हम जाते हैं खेत गली हर
हम जाते हैं नदी किनारे
उम्मीदें होती हैं जहां भी
जाते हैं हर चौक चौबारे

पानी में कंकड़ फेंको तो
हलचल जैसे होती है
मुझे देखकर अब यह दुनिया
पगला पगला कहती है

बतलाओ तुम कहां गए

तुम मत आना हम आएंगे
छिपकर तुमसे मिलने को
जानेंगे नहीं दुनिया वाले
मेरे इस इक सपने को

बोझिल ना कर उम्मीदों को
मन को अपने समझाओ
माना होगी मजबूरी कुछ
आ न सको तो बतलाओ

बतलाओ तुम कहां गए

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मौजूं दुनिया इतनी डरावनी क्यूं हैं?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 10, 2010

मौजूं दुनिया इतनी डरावनी क्यूं हैं? सनसनाते हुये हवाई जहाज गगनचुंभी बिल्डिंगो को चीर डालते हैं, और फिर इनसानी गोश्त लपलपाती हुई लपटों में भूनते जाते हैं। फिर असलहों से लैस कई मुल्कों की फौज धरती के एक कोने पर आसमान से उतरती हैं और मौत का तांडव का शुरु कर देती है। अल्लाह हो अकबर के नारे बारुदी शोलों के भेंट चढ़ जाती हैं। फतह और शिकस्त के खेल में एक दूसरे को हलाक करते हुये सभ्य दुनिया के निर्माण की बात नब्ज के लहू को ठंडा कर जाती है, फिर सवालात दर सवालात खुद से जूझना पड़ता है।
धुंधली हो चुकी परिकथाओं को कई बार जेहन में लाने की कोशिश करता हूं, शायद जादुई किस्सागोई खौलती हुई खंजरों के घाव को तराश कर कुछ देर के लिए अलग कर दे। उन चुंबनों की कंपकंपाहट को भी समेटने की कोशिश करता हूं जो कभी जिंदगी की हरियाली में यकीन दिलाती थी। लेकिन एके -47 की तड़तड़ाहट खौलते हुये शीशे की तरह कानों के अंदर पिघलता हुआ बेचैनी के कगार पर खड़ा देता है। लाल सलाम जिंदाबाद!! माओत्से तुंग जिंदाबाद!! की गूंज की निरर्थकता शरीर को सुन्न कर देता है। लोभ में गले तक डूबी हुई काहिल सरकार की निर्मम असंवेदनशीलता मुर्दे जैसी बदूब से भरी हुई लगती है। तभी रेडियो पर पूर्ण अर्थ पसारते हुये एक अनचाहा गीत गूंज उठता है….कहां हैं, कहां है, कहां है, जिन्हें नाज है हिंद पर वे कहा हैं।
“स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, हम इसे लेकर रहेंगे”, “तूम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूगा”..ये सब तो बस नारे हैं, नारों का क्या। क्या हम वाकई में आजाद हो चुके हैं? संविधान तो आजादी की पूरी गारंटी देता है, उसकी हिफाजत के लिए एक पूरा तंत्र खड़ा है, फौज है, असलहा है….फिर हाथ में बंदूक लेकर खूनी क्रांति की बात करने वाले तथाकथित बागी क्यों? क्यों? क्यों?
नगरों और महानगरों में बिल्डिंगों की कतारें खड़ी की जा रही हैं, ऊंची, गंगनचुंभी, तमाम तरह के ऐशो आराम से मुतमइन। ये विकास की गारंटी दे रहीं है, गांवों और कस्बों से निकलने वाले लोग अपनी सारी उर्जा इन बिल्डिंगों में एक घोंसला बनाने के लिए लगा रहे हैं, शिक्षा की सार्थकता को इसी से रेखांकित किया जा रहा है। बिल्डिंगों में बने घोसले यह बताते हैं कि आप विकास के किस मंजिल पर पांव रखे हैं, फिर आने वाले नश्लों को भी उसी कतार में हांकने की जद्दोजहद से थककर चूर होते लोग…इंसान को ढालने वाला सांचा कहां है?? और इस सांचे की जरूरत है भी या नहीं??
विशाल तादाद में खड़ी कंपनियों की कतारें…ताबड़तोड़ जाब का आफर, गले में टाई होना जरूरी। संगठित सूदखोर बैंकों का विस्तार, शहर-शहर गांव-गांव को अपने लपेट में लेने की वैज्ञानिक योजना से लैस, लेकिन मानवीयता का नकाब ओढ़े। जवाबदेही की गारंटी पर सोने की तरह खरा उतरने की गहरी साजिश से भरी हुई। प्रचार तंत्रों का खौफनाक हमला, जिसने हर किसी के लिए उसकी चौहद्दी निर्धारित कर दी है…अचिन्हित, और अनदेखी चौहद्दी। व्यक्ति के वजूद का यशोगान करके उसको उसके वजूद के दायरे में कैद करने के षडयंत्र को अमली जामा पहनाते प्रचारतंत्र। मैं में विभाजित समष्टि और मैं दायरे में सिमटा हुआ तमाम तंत्रों से जूझता इनसान। क्या मैं वादी सभ्यता अपने क्लाइमेक्स पर पहुंच गई है या अभी कुछ कदम और चलना बाकी है??
सभ्यता की शुरुआत, धरती पर विचरण करता बिना कपड़ों का नंग धड़ंग आदमी। सभ्यता का क्लाइमेक्स पबों, रेस्त्राओं में बिना कपड़ों का थिरकता नंग धड़ंग आदमी। लेकिन भूख के चेहरा आज भी नहीं बदला।
आंखों के सामने अंधेरा छाने पर चारों ओर अंधकार ही दिखता है, मनिषियों ने बंद आंखों से रोशनी की तलाश की है…और गहन अंधकार में पड़े लोगों के पथ पर रोशनी बिखेरी हैं….आंखे बंद कर लेता हूं…शायद कोई रश्मि फूटे…क्या यह अंधकार से भागना है?? या फिर खुद से??
जीसस डेथ के बाद किस किंगडम की बात करता है?? ईश्वर का किंगडम!! यदि ईश्वर का किंगडम डेथ के बाद शुरु होता है तो यह किसका किंगडम है ? जीसस झूठ बोलता है। अल्लाह कियामत के दिन की बात करता है, और कियामत के दिन इनसान के कृत्यों का लेखा जोखा करने के बाद जन्नत और दोजख की बात करता है…वह भी झूठ बोलता है। हिन्दु मनिषियों ने स्वर्ग और नरक की कल्पना की है….झूठ से भरी हुई कल्पना। लेकिन इनके इरादे नेक थे, ईश्वर के राज्य के नाम से ये लोग धरती पर कल्पनातीत ईश्वरीय व्यवस्था लाने की योजना पर काम कर रहे थे।…..अब तो बंदूक गरज रहे हैं….आदर्श राज्य घायल है….क्या बंदूकों के बिना रूस में लेनिन के नेतृत्व में वोल्शेविक क्रांति संभव था?? बिल्कुल नहीं। क्या चिंदबरम की फौज दंतेवाड़ा की जंगलों में पिकनिक मनाने गई थी? बिल्कुल नहीं। वे लोग माओवादियों को टारगेट कर रहे थे। ऐसे में माओवादियों ने उन्हें खाक में मिला दिया तो एक तरह से उन्होंने युद्ध के नियम का ही पालन किया। चिदंबरम की फौज और माओवादी निर्मम और निरर्थक युद्ध में फंसते जा रहे हैं।
दिनकर की एक कविता याद आ रही है….
वह कौन रोता है वहां
इतिहास के अध्याय पर
जिसमें लिखा है नौजवानों
के लहू का मोल है,
जो आप तो लड़ता नहीं
लड़वा किशोरों को मगर
आश्वत होकर सोचता
शोणित बहा, लेकिन
गई बच लाज सारे देश की।

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वास्तव में यह माओवादियों की युद्ध रणनीति को न समझने का मामला

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 7, 2010

तथाकथित सभ्य समाज में माओवादियों द्वारा 75 जवानों को मौत के घाट उतारना उतना ही निंदनीय है, जितना स्टेट पावर द्वारा नक्सलियों के दमन के लिए चलाया जा रहा आपरेशन ग्रीन हंट। भावुकता से इतर हटकर यदि हम निरपेक्ष रूप से नक्सलियों और केंद्र सरकार के बीच जारी घमासान का आकलन करने की पहलकदमी करें तो शायद परत दर परत कुछ ऐसे पहलू सामने आएंगे, जिससे दोनों पक्षों को समझने में सहूलियत होगी। वैसे वर्तमान बुद्धिवादी समाज नक्सलवाद को लेकर स्पष्टरूप से दो भागों में बंटा हुआ है। एक वर्ग नक्सलवाद का धूर विरोधी है तो दूसरा वर्ग नक्सलवाद के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैये की वकालत करते हुये नजर आ रहा है। दोनों वर्ग के अपने-अपने तर्क है जबकि आम जनमानस हतप्रभ स्थिति में सारे प्रकरण को देख और सुन रहा है।
सैद्धांतिक रूप से भारत में माओवादियों का फंडा पूरी तरह से स्पष्ट है। माओ में थोड़ी बहुत दिलचस्पी रखने वाले लोगों को भी पता है कि माओ सत्ता को बंदूक से हथियाने पर जोर देता है। माओ का यह कथन- शक्ति बंदूक की नली से निकलती है- कितना प्रासांगिक है, इसे लेकर भले ही बहस हो सकती है, लेकिन इस कथन में यकीन करने वाले लोग जमीनी स्तर पर वर्तमान में स्थापित व्यवस्था को गंभीर चुनौती दे रहे हैं, इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। भारत में जमीनी स्तर पर माओवादी गतिविधि को समझने के लिये जरूरी है माओ को समझना, उसकी क्रांति को समझना,और क्रांति लाने के उसके तौर तरीकों को समझना।
माओ युद्ध की अनिर्वायता में यकीन करता है और इसे राजनीति से जोड़ते हुये कहता है कि युद्ध राजनीति की निरंतरता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि राजनीति बिना खून खराबे वाला युद्ध है, जबकि युद्ध खून खराबे से भरी हुई राजनीति। जो लोग सरकार को माओवादियों से बातचीत करने की नसीहत देते रहते हैं वे यह नहीं जातने कि माओवाद शांति और बातचीत को भी एक स्ट्रेटेजिकल क्षण के तौर पर इस्तेमाल करने की कला में पारंगत है, हालांकि उसकी नजर हमेशा दूरगामी लक्ष्य पर टिकी रहती है, यानि बंदूक के बल पर सत्ता पर अधिकार। माओ कहता है कि युद्ध को प्रारंभ होने के पहले उसे रोकने की भरपूर कोशिश करनी चाहिये, लेकिन युद्ध शुरु होने के बाद युद्ध को फिर युद्ध से ही रोका जाना चाहिये। माओवादियों ने अभी हाल में दंतेवाड़ा में जिस तरह से 75 भारतीय जवानों को मौत के घाट उतारा है उसे इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिये। माओ का युद्ध कौशल शानदार रहा है, तभी उसने तमाम तरह के शत्रुओं से घिरे हुये चीन को एक अलग राह पर हांक ले गया। भारत में भी कमोवेश माओवादी उसी युद्ध कौशल का इस्तेमाल कर रहे हैं। माओ अपने सैनिकों से कहा करता था कि लोगों के बीच में लोगों की तरह रहो, और नजर दुश्मन पर रखो। मौका मिलते ही उसे मौत के घाट उतार दो।
दंतेवाड़ा में माओवादियों ने बड़ी कुशलता से जवानों को अपने चक्रव्यूह में फंसा लिया। पहले टारगेट करके अपने पीछे आने के लिए उकसाया और जब जवान उसके उकसावे में आकर उसके पीछे भागे हुये आये तो पहले से हजारों की संख्या में घात लगाकर बैठे माओवादियों ने बड़ी सहजता से ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर उनका सफाया कर दिया। तमाम विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यह इंटेलिजेंस फेल्योर का मामला है, जबकि वास्तव में यह माओवादियों की युद्ध रणनीति को न समझने का मामला है। माओवादियो के युद्ध कौशल को समझे बिना उनसे पार पाना नामुमकिन है। और यही तभी संभव है जब माओवादियों को साधारण अपराधी समझने की मानसिकता से आगे बढ़कर उन्हें एक संगठित सेना के तौर पर देखा जाये। केंद्र सरकार ने आपरेशन ग्रीन हंट की शुरुआत तो कर दी है, लेकिन माओवादियों की युद्ध कौशल का ठीक से मूल्यांकन करने में अक्षम है। सिर्फ संख्या के बल पर माओवाद के विस्तार पर अंकुश लगाने की परिकल्पना करना सरकार के लिए दिन में सपने देखने जैसा है। चिदंबरम साहब एक अच्छे प्रशासक हो सकते हैं लेकिन उनके एक बेहतर रणनीतिकार होने में संहेद है। माओवाद को कुचलने के लिए माओवाद की तकनीक और स्ट्रेटजी को पकड़ना जरूरी है, और चिदंबरण साहब के अभियान की असफलता का मुख्य कारण यही है। चिदंबरम साहब जिन जवानों का इस्तेमाल आपरेशन ग्रीन हंट में कर रहे हैं वे उनका प्रशिक्षण एक निश्चत पैटर्न पर हुआ है, लेकिन माओवादी युद्ध तकनीक के बारे में उनकी समझ सवालों के घेरे में है। माओवादी एक सशक्त खूनी विचारधारा से लैस हैं, जबकि भारतीय जवानों को साधारण तरीके से लड़ने का प्रशिक्षण दिया जाता है। और इसी बिंदु पर माओवादियों का पलड़ा भारी हो जाता है।
माओ युद्ध के औचित्य का मूल्यांकन न्याय और अन्याय के तराजू पर करते हुये कहता है कि इतिहास हमें बताता है कि युद्ध दो प्रकार के होते हैं –न्यायपूर्ण और न्यायपूर्ण। सभी युद्ध जो प्रगतिशील हैं न्यायपूर्ण हैं, और सभी युद्ध जो प्रगति के मार्ग में बाधा पहुंचाते हैं वे अन्यायपूर्ण हैं। इस प्रकार माओ की नजर में चिदंबरण द्वारा चलाया जा रहा आपरेशन ग्रीन हंट एक थोपा हुआ अन्यायपूर्ण युद्ध है। जमीनी स्तर पर जंगलों में लड़ने वाले माओवादी इसी भावना से संचालित हो रहे हैं, जबकि आपरेशन ग्रीन हंट के औचित्य को लेकर चिदंबरम को तमाम तरह के सफाई देने पड़ रहे हैं और बौद्धिक स्तर पर माओवादियों का एक विंग उनपर चौतरफ हमला करके उन्हें बैकफुट पर लाने की कोशिश कर रहा है।
माओ जोर देते हुये कहता है कि बंदूक से छुटकारा पाने के लिए बंदूक उठाना जरूरी है। इतना ही नहीं वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ अपने समर्थकों में वह नफरत की भावना को कूटकूट कर भरता है। भारत में माओ के कदम पर चलने वाले नक्सली के मन भी वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ नफरत कूटकूट कर भरा हुआ है, और एक तरह से यह नफरत उन्हें मजबूती ही प्रदान करता है। उन्हें इस बात का अहसास है कि वे अपने सर्वश्व की लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि भारतीय जवान महज गणतंत्र की रक्षा से जुड़े हुये हैं।
माओ कहता है कि युद्ध में कामरेडों के लक्ष्य को को पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ बनाना चाहिये। इसके साथ ही वे लोग कार्यमंच पर वे लोग विभिन्न तरह के नाटक-नौटंकी कर सकते हैं। माओ के इस कथन को आधार बना कर यदि हम भारत में माओवादी गतिविधियों की बारीकी से पड़ताल करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वे लोग अपने लक्ष्य को लेकर पूरी तरह से स्पष्ट हैं। उनका उद्देश्य संपूर्ण भू-भाग पर अधिकार करना है और वे शनै-शनै इस लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। विभिन्न राज्यों के सैंकड़ों जिलों में उनकी न्यायपालिका और कार्यपालिका सक्रिय हैं। माओ कहता है कि भविष्य में गलती करने से बचने के लिए विगत में की गई गलतियों से सीखों। भारत के माओवादी इस सूत्र वाक्य से सबक सीखते हुये अपना कदम आगे बढ़ा रहे हैं जबकि चिदंबरम साहब दंतेवाड़ की घटना से क्या सीख पाते हैं यह तो समय ही बताएगा। इतना तो स्पष्ट नजर आ रहा है कि अभी तक वह माओवाद को सही तरह से नहीं पकड़ पाये हैं। विगत की घटनाओं से यदि उनकी बुद्धि में इजाफा होता तो दंतेवाड़ की घटना नहीं घटती। समय रहते भारतीय जवान और उनके कमांडर माओवादियों के ट्रैप को भांप लेते। वैसे बिहार और झारंखंड के पुलिस चौकियों में तैनात अदना सा पुलिसकर्मी भी माओवादियों की रणनीति को खूब समझता है, भले ही उसने युद्ध विज्ञान के बड़े-बड़े पोथे नहीं बांचे हो।
बहरहाल दंतेवाड़ की घटना के बाद केंद्र सरकार और माओवादियों के बीच जारी जंग एक रोचक मोड़ पर आ गया है। आने वाले दिनों में न्यूटन के तीसरे नियम की तरह क्रिया के बराबर विपरित प्रतिक्रिया का दौर और तेज होने की पूरी संभावना है। माओवादी लंबा युद्ध में यकीन रखते हैं। इस बात को ध्यान में रखकर ही चिदंबरम साहब को तैयारी करने की जरूरत है।

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बिहार में रिफोर्मिस्ट की कमी है

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 4, 2010

कल रात अचानक बिहार आर्ट थियेटर की दुनिया के एक मजे हुये सख्सियत से मुलाकात हो गई। बातों ही बातों में मैंने पूछा, भारंगम में बिहार आर्ट थियेटर की क्या उपस्थिति है। उन्होंने कहा, कुछ भी नहीं। एक बार हमने भारंगम में बिहार आर्ट थियेटर से एक नाटक भेजा था। जानते हैं उसका जवाब क्या आया? एनएसडी का लेटर आज भी पड़ा है। उसमें लिखा है कि आपका नाटक बेहतर है, लेकिन हम इसे अपने सम्मेलन में शामिल नहीं कर सकते हैं। अगले वर्ष इस पर विचार करेंगे। थोड़ा हिचकते हुये मैंने छेड़ा, अगले वर्ष से क्या मतलब है। उन्होंने कहा, आपको बात बुरी लगेगी लेकिन इसमें सच्चाई है। भारंगम एनएसडी का कार्यक्रम है, और इसमें उन्हीं लोगों के नाटक को सम्मिलित किया जाता है, जो लोग एनएसडी से जुड़े हुये हैं। हां, दिखावे के लिए एक-दो नाटक यहां- वहां से वे लोग ले लेते हैं। सब पैसे बटोरने का खेल है। एनएसडी का लेटर अभी भी मेरे पास पड़ा हुआ है। आप कहें तो मैं दिखाऊं।
पटना के कालिदास रंगायल में मेरे साथ दो-तीन लोग और बैठे हुये थे। उस सख्सियत की बातों में मुझे रस मिल रहा था। बात को आगे बढ़ाते हुये मैंने कहा, महाराष्ट्र में लोग टिकट खरीद कर नाटक देखने आते हैं। दिल्ली में भी कमोवेश यही स्थिति है। फिर बिहार में रंगमंच प्रोफेसनलिज्म की ओर क्यों नहीं बढ़ रहा है ? इतना सुनते ही एक लंबी सांस लेने के बाद वह बोले, आपको पता है कालिदास रंगालय में किस तरह के दर्शक आते हैं। लुंगी-गंजी पहन कर कांधे पर गमछा रखकर लोग नाटक देखने आते हैं। इतना ही नहीं वे पैर को अगली सीट पर फेंक कर बैठते हैं। और यदि उन्हें मना करो तो मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। रंगमंच सजग दर्शक की मांग करती है। आपको पता है बंगाल में लोग बड़े शौक से नाटक देखने जाते हैं। वो भी पूरे परिवार के साथ। घर में सुबह से ही जश्न का माहौल रहता है। लेकिन पटना में रंगमंच पूरी तरह से उपेक्षित है।
बातों के दौरान एक नेता जी बीच में कुद पड़े और लगे बोलने, बिहार का युवावर्ग नपुंसक है। वह सामाजिक सरोकारों से पूरी तरह से दूर हो चुका है। मैंने छूटते ही पूछा, यदि यहां का युवावर्ग सामाजिक सरोकारों से दूर हो रहा है तो दोष किसका है। उसका एजेंडा क्लियर है। यदि वह आज पढ़ाई कर रहा है तो यही सोंचकर कि कल उसे 30-40 हजार की नौकरी मिल जाएगी। और यदि उसे 30-40 हजार की नौकरी मिली हुई तो वह यही सोंच रहा है कि वह 50-60 रुपये महीने में कैसे कमाये। वह ऐसा ना सोचे तो क्या करे? नेता जी के पास इसका कोई सटीक जवाब नहीं था, लेकिन थियेटर से जुड़े सख्सियत ने कहा, मैं भले ही थियेटर से जुड़ा हुआ हूं। लेकिन मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि थियेटर की कोई भूमिका नहीं रही गई है। हिंदी रंगमंच महाराष्ट्र और बंगाल में पूरी तरह से प्रोफेशन हो गया है। वहां पर लोग टिकट खरीद कर नाटक देखने आते हैं। लेकिन भोपाल, इलाहाबाद, लखनऊ जैसे शहरों के बारे आप क्या कहेंगे, जहां पर रंगमंच से वही लोग जुड़े हुये हैं जो इसमें शिरकत करते हैं। उनकी बातों को मजबूती प्रदान करते हुये नाटक से जुड़े एक अन्य बंदे ने कहा, लोग यहां पर फ्री में थियेटर कर रहे हैं। वो भी इसलिए कि उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिल जाये। नेता जी ने एक बार फिर अपना फंडा समझाते हुये कहा, दिल्ली और मुंबई में नाटकों में सेक्स परोसा जा रहा है। रंगमंच पर लड़कियां नंगी होने के लिए तैयार हैं। उनकी बातों को क्रास करते हुये मैंने कहा, दिल्ली में अरविंद गौड़ की अस्मिता नामक संस्था बेहतरीन नाटक कर रही है। जन सरोकार से जुड़ी हुई चीजों को वे लोग बहुत ही फोर्सफूली उठा रहे हैं और उनका एक आडियेन्स भी है। वे लोग वहां की जनता को अपने साथ जोड़कर थियेटर को समृद्ध कर रहे हैं। उनके नाटकों में सेक्स नहीं होता। उसी तरह नटसम्राट जैसी संस्था भी कामेडी नाटक करके लोगों को अपने से जोड़े हुये हैं। फिर आप कैसे कह सकते हैं कि नाटकों में सेक्स परोस कर इसे प्रोफेशन लुक दिया जा रहा है। नेता जी को कोई जवाब नहीं सूझा और वे बगल झांकने लगे।
बातों के क्रम में थियेटर से जुड़े सख्सियत ने कहा, बिहार में रिफोर्मिस्ट की कमी है। आप बंगाल को देखिये। वहां राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद, केशवचंद सेन जैसे रिफार्मिस्ट हुये, जो लगातार वहां के जनमानस को आंदोलित करते रहे। बिहार में लोग जबरदस्ती के नेता बने हुये हैं। इनके पास कोई दूरगामी योजना नहीं है। आप नीतिश को लीजिये। वो कह रहे हैं गर्व से कहो हम बिहारी है। मैं आपको बताता हूं कि कुछ दिन पहले मैं मुंबई गया था, अपने एक मित्र के पास। उनके घर पर पहुंचते ही उन्होंने मुझे कहा कि आप किसी को बताइगा नहीं कि आप पटना से आ रहे हैं और आप बिहारी है। पटना से जैसे ही ट्रेन खुलती है और यूपी क्रास करती है बिहार के लोग यही कहने लगते हैं कि वे यूपी के हैं। उन्हें यह कहने में शर्म आती है कि वे बिहारी है। नीतिश कुमार की उपलब्धि सिर्फ इतनी है कि उन्होंने गुड रूल दिया है। लेकिन वो एक रिफार्मिस्ट नहीं है। डा. सच्चिदानंद सिन्हा को रिफार्मिस्ट कहा जा सकता है। उनके सलीके अलग थे। कैजुअल ड्रेस में यदि कोई उनसे मिलने आ जाता था तो वह नहीं मिलते थे। उनका अपना तरीका था। लोकनायक जय प्रकाश भी रिफार्मिस्ट थे, लेकिन वह किसी की सुनते नहीं थे। बस अपनी ही कहते थे। आपको पता है दिपांकर भटाचार्य इसी बिहार आर्ट थियेटर में छुपे रहते थे जब पुलिस उन्हें खोज रही थी। अभी दो दिन पहले वह गांधी मैदान में लैंड रिफार्म की बात कर रहे थे। मैं तो कहता हूं कि लालू प्रसाद यादव में माओ त्से तुंग बनने की पूरी संभावना थी। याद किजीये वह दौर जब उनके कहने पर गांधी मैदान लोगों से भर जाता था। लेकिन उनके पास कोई विजन नहीं था। यहां की जनता को उन्होंने आंदोलित तो कर दिया लेकिन सही तरीके से लीड नहीं कर पाये। आज बिहार को रिफार्मिस्ट की जरूरत है। यहां के तमाम लीडरान अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति में लगे हुये हैं। आप लिख लिजीये रामविलास कांग्रेस में जाएंगे। कांग्रेस के बिना इनकी राजनीति चल ही नहीं सकती।
बोलते –बोलते वो आवेश में आ गये थे, कानू सान्याल एक झोपड़ी में मर गये। देश के कई मुख्यमंत्रियों की तुलना में वह ताउम्र सक्रिया रहे। लेकिन कभी सुरक्षा नहीं लिया। आज के नेता लोग बंदूक के साये में चलते हैं। यदि वे जन नेता हैं तो उन्हें डर किस बात का है? चाहे लोग लाख कहें लेकिन कानू सान्याल से वे बड़े नेता नहीं हो सकते। माओ ठीक ही कहता था कि सत्ता बंकूक की नली से निकलती है। तभी तो आज के डेमोक्रेटिक नेताओं को बंदूक की जरूरत पड़ती है। आज केंद्र सरकार भी इस बात को मान रही है कि यदि नक्सलियों को रोका नहीं गया तो अगले 50 वर्षों में भारत में नक्सलियों को राज हो जाएगा। एक बहुत बड़े भू-भाग में नक्सलियों की समानांतर सरकार चल रही है। वे लोग अपने तरीके से स्थापित सत्ता को गंभीर चुनौती दे रहे हैं। कई जगहों पर अब तो वे बैनर के साथ विधिवत मार्च कर रहे हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिंसक आंदोलनों का एक मजबूत इतिहास रहा है। लेकिन भारत की स्वतंत्रता का सारा श्रेय गांधी जी को दिया जाता है। मामला साफ है जिसके हाथ में सत्ता है इतिहास उसी का है।

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