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मेरा गाँव मेरा देश !

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 16, 2010

[] राकेश ‘सोहम’

पिछले दिनों बारिश शुरू हुई । बारिश का मौसम है । लेकिन मेंढकों की टर्र टर्र सुनाई नहीं दी ?

सिक्सटीज़ – सेवटीज़ में एक फिल्म रिलीज़ हुई – मेरा गाँव मेरा देश । यह एक डाकू की पृष्ठभूमि पर आधारित खूबसूरत फिल्म है । धर्मेन्द्र ने गाँव के नौजवान और विनोद्खन्ना ने डाकू जब्बर सिंह का किरदार निभाया है । इस फिल्म का वह दृश्य याद करें जब रात को डाकू जब्बर सिंह ने धर्मेन्द्र को अपने अड्डे पर रस्सी से बांधकर कैद कर रखा है । बैकग्राउंड में झींगुर और मेंढकों के टर टराने की आवाज़ दृश्य को भयानक बना रही है । जब्बर सिंह धर्मेन्द्र को मारना चाहता है लेकिन तभी उसकी सहायक खलनायिका बिजली सामने आती है और अपने तरीके से मारने की बात रखती है । डाकू जब्बर सिंह मान जाता है और खुश होकर अट्टहास लगाता है ।

बिजली हाथ में चाक़ू थामे धर्मेन्द्र पर हमला करने आती है लेकिन गबरू नौज़वान पर रीझ जाती है और मदहोश होकर थिरकने लगती है । उसके होंठों से लताजी का मखमली गीत फूट पड़ता है – ‘मार दिया जाए कि छोड़ दिया जाए बोल तेरे साथ क्या सलूक किया जाए ?’ जंगल की प्राकृतिक खामोशी में यह गाना क्या मस्त कर देता था।
आज भी जब यह गीत सुनते हैं तो गीत के पूर्व झींगुर और मेंढकों की आवाज़ वाला रात को दर्शाता साउंडट्रेक और डाकू जब्बर की आवाज़ सुनने को मिलती है ।
हालंकि मुद्दा गीत या फिल्म का नहीं है । मुद्दा कुछ और है । मैं जिस डुप्लेक्स में रहता हूँ उसके पीछे एक बड़ा सा खुला मैदान है । इसमें घासफूस, गंदा पानी और कचरा पडा रहता है । हम सब लगभग 40 परिवार इस कालोनी में रहते हैं और इस मैदान का उपयोग कचरेदान की तरह करते हैं । ऐसा करने में आसानी है क्योंकि यह हमारे मकानों के ठीक पीछे है अतः दूर कचरा फेंकने जाने की मशक्कत नहीं करनी पड़ती है । आज इस शहर में पालीथीन का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है । अतः सामान के उपयोग के बाद गैर उपयोगी पालीथीन घर के पिछवाड़े आराम से फेंक देते हैं । लगभग हर घर से प्रतिदिन दो से चार पालीथीन इस मैदान में विसर्जित कर दीं जातीं हैं ।
पिछले 11 वर्षों में यह पानी के जमाव वाला स्थान अब कचरे के मैदान में तब्दील हो गया है । जब हम इस डुप्लेक्स में शिफ्ट हुए थे तब बारिश के मौसम में पीछे फैले इस मैदान से आती शुद्ध शीतल हवा भावविभोर कर देती थी । मेंढकों और झीगुरों की आवाज़ प्रकृति से जोड़े रखती थी । रिमझिम बारिश का मज़ा दोगुना हो जाता था ।
इस बारिश ना जाने अब तक ये आवाजें सुनाई नहीं दीं !! क्या पोलीथीन ने इन प्राकृतिक जीवों को पलायन करने पर मजबूर कर दिया है ? शायद हाँ ….शायद हाँ ….यदि यही हाल रहा तो पोलिथीन से कौन बचाएगा हमें और मेरा गाँव मेरा देश । ज़रा संभालो… जागो…. चेतो…. ।
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4 Responses to “मेरा गाँव मेरा देश !”

  1. बहुत बढ़िया आलेख!जागरूकता का सन्देश देता हुआ!

  2. पॉलीथीन तो प्राकृतिक अंगों का नाश कर देगा।

  3. पालीथीन इस देश का विनाश कर देगी..

  4. Prerna said

    Apni sahuliat mai aj Jivoo ka jeena chena hai..kal prakriti hamara nirwah kaise karegi..aj kisi ko medhako ke tarr tarr ki kami nhi khalti..kal hamari yhi soch hamara vinash karegi…"""jagrukata bhara ye blog man ko bhaya….

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