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बिछाए बैठे हैं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 1, 2010

रतन
आएंगे वो जिस रस्ते से
पलक बिछाए बैठे हैं
मैं क्या तकता राह, शजर भी
फूल खिलाए बैठे हैं

मुद्दत हो गई मिलकर बिछड़े
माजी को करता हूं याद
दिल के ख़ाली पन्नों पर
तस्वीर लगाए बैठे हैं

मौला मेरे भगवन मेरे
दिलबर तुम दिलदार भी तुम
इक दिन मिलना होगा यह
उम्मीद लगाए बैठे हैं

बारिश आई बूंदें लाई
आया यादों का मौसम
देखो फिर बरसा सावन
हम झूला लगाए बैठे हैं

जब वो सपनों में आते हैं
आकर बहुत सताते हैं
है यह भी मंजूर हमें
क्यों दर्द चुराए बैठे हैं

मिल नहीं सकता उनसे मैं अब
पर क्यों ऐसा लगता है
कल ही अपनी बात हुई है
दिल उलझाए बैठे हैं

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7 Responses to “बिछाए बैठे हैं”

  1. सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

  2. बहुत उम्दा रचना!

  3. Majaal said

    है यादों का हिसाब अलग,दिन ढलता, ये न ढल पाएँ,अँधेरे में भी देखो कैसे,साए इतराए बैठे है. अच्छी रचना

  4. बहुत सुंदर रचना।

  5. भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति…

  6. हृदय से निकलती रचना।

  7. जन्माष्टमी के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

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