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Archive for December, 2010

रामेश्वरम : बेहद अपने लगने लगे राम

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 31, 2010

हरिशंकर राढ़ी
कोडाईकैनाल से अपराह्नन चली हुई हमारी बस करीब साढ़े सात बजे मदुराई बस स्टैण्ड पर पहुँची तो झमाझम बारिश हो रही थी। बस से उतरे तो पता चला कि मित्र की जेब से बटुआ किसी ने मार लिया था। यह घटना हमारे लिए अप्रत्याशित थी। क्योंकि हमें विश्वास था कि दक्षिण भारत में ऐसा नहीं होता होगा। वैसे मुझे यह भी मालूम था कि मित्र महोदय बड़े लापरवाह हैं और उनकी अपनी गलती से भी बटुआ गिर सकता है। ऐसा एक बार पहले भी हुआ था, जब हम त्रिवेन्द्रम से मदुराई जा रहे थे। उस समय उनका बटुआ, जो पैंट की पिछली जेब में था और अधिकांश लोग ऐसे ही रखते हैं, गिरतेगिरते बचा था। मेरी पत्नी ने देख कर आगाह कर दिया था। बटुए में पैसा तो अधिक नहीं था किन्तु उनका परिचय पत्र, ड्राइविंग लाइसेन्स और एटीएम कार्ड था। हम सभी का परेशान होना तो स्वाभाविक था ही। तलाश प्रारम्भ हुई और अन्ततः निराशा पर समाप्त हुई। किन्तु पता नहीं क्यों मुझे बारबार ऐसा लग रहा था कि जेब किसी ने मारी नहीं है, अपितु पर्स लापरवाही से ही कहीं गिर गया होगा और मैं अकेले ही सोचता और गुनता रहा। अचानक मुझे लगा कि क्यों बस के नीचे देखा जाए। बस अभी भी वहीं खड़ी थी। उतरते समय उसमें गजब की भीड़ थी। जब मैंने बैठकर बस के नीचे देखा तो लगा कि कोई पर्स जैसी चीज है। एक दो मिनट बाद ही बस वहां से चल दी। मैंने लपक कर बटुआ उठा लिया और विजयी भाव से उनके पास आया। बटुआ तो उन्हीं का था। देखा गया तो पैसे निकाल लिए गए थे, किन्तु बाकी जरूरी कागजात उसमें मौजूद थे। सबने राहत की साँस ली, जैसे खोई हुई खुशी लौट आई।
बस स्टैण्ड से ऑटो कर के हम रेलवे स्टेशन पहुँचे और मालूम किया तो साढ़े ग्यारह बजे रात्रि की पैसेन्जर उपलब्ध थी। अभी लगभग आठ ही बज रहे थे। आराम से टिकट वगैरह लेकर आईआरसीटीसी के रेस्तरां में भोजन लिया और कुछ देर आराम करके गाडी की ओर गए। पूरी की पूरी ट्रेन जनरल ही है। ऊपर की बर्थ पर हम लोग आराम से फैल लिए हमारा अन्दाजा था कि सुबह चारपाँच बजे तक पहुँचेंगे गाडी कब चली, हमें पता ही नहीं चला। हाँ, दक्षिण की पैसेन्जर गाडियों में भी टिकट की जाँच बडी ईमानदारी से होती है, ये हमें जरूर पता लग गया। हम गहरी नींद में ही थे कि शोर हुआ, जागे तो पता चला कि हम पुण्यधाम रामेश्वरम पहुंच चुके हैं। अभी रात के ढाई ही बज रहे थे।
प्लेटफॉर्म पर स्थिर होते तीन बज चुके थे इतनी रात में वहाँ से जाना या होटल तलाशने के विषय में सोचना भी उचित नहीं था। अतः सुबह होने तक वहीं रुके रहना ही ठीक लगा। उत्तर भारत की तरह वहाँ भीडभाड का साम्राज्य तो था नहीं, अतः वहीं प्लेटफॉर्म पर ही आसन लग गया। चादरें निकाली गईं और लोग फैल गए। मुझे ऐसे मामलों में दिक्कत महसूस होती है। अनजान सी जगह पर घोडे बेच कर सोना मुझे सुहाता। इसलिए पास ही पडी कुर्सी पर बैठ गया और बोला कि आप लोग सोइए, मैं तो जागता ही रहूंगा।
कुर्सी पर बैठाबैठा मैं खयालों में डूब गया। यही रामेश्वरम है, जहाँ आने की जाने कब की इच्छा फलीभूत हुई है। शायद प्रागैतिहासिक काल की बात होगी जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम हजारों मील की यात्रा करके यहाँ पहुँचे होंगे। कहाँ अयोध्या और कहाँ रामेश्वरम! अयोध्या का अस्तित्व तो तब बहुत ठोस था, किन्तु रामेश्वरम का तो अतापता भी नहीं रहा होगा! राम आते और रामेश्वरम बनता। सागर का एक अज्ञात किनारा ही रह जाता! अयोध्या से चलकर भटकतेभटकते, पैदल ही यहाँ पहुँचे होंगे। आज मैं भी उन्हीं की अयोध्या से ही आया हूँ। और लगा कि राम कितने अपने हैं। क्षेत्रीयता का पुट या अभिमान, जो भी कहें, मुझे महसूस होने लगा। आज कितनी सुविधाएँ हो गई हैं ! एक कदम भी पैदल नहीं चलना है और मैं राम की अयोध्या से उन्हीं के इष्ट देव भगवान शिव और उनकी स्वयं की कर्मभूमि रामेश्वरम में बैठा उन्हीं के विषय में सोच रहा हूँ। सचमुच उन्होंने उत्तर को दक्षिण से जोड़ दिया। संस्कृति को एकाकार कर दिया। उस राम की असीम कृपा ही होगी कि उनके पौरुष, आस्था और सम्मान की भूमि का स्पर्श करने उसे प्रणाम करने का अवसर प्राप्त हो पाया है। धन और सामर्थ्य में तो मैं लोगों से बहुत ही पीछे हूँ।
बैठेबैठे ही मेरा मन बहुत पीछे चला गया। कैसा समय रहा होगा राम का जब वे यहाँ आए होंगे? क्या मानसिकता रही होगी उनकी? अपने राज्य से परित्यक्त, पत्नी के वियोग में व्याकुल और स्वजनों से कितनी दूर? अपनी जाति और सामाजिक व्यवस्था से बिलकुल अलग, सर्वथा भिन्न बानरों की सेना लिए और मित्रता की डोर पकड़े उस महाशक्तिशाली मायावी दशानन रावण से टक्कर लेने यहाँ तक पहुँचे! यहाँ आकर उसी शिव का सम्बल लिया जिसका वरदहस्त पाकर ही रावण अजेय बना हुआ था। किन्तु शिव तो सदैव सत्य के साथ होता है, चाटुकारिता और उत्कोच के साथ नहीं। कितना सुन्दर संगम हुआ सत्य और शिव का यहाँ ! यही है वह रामेश्वरम और धन्य है मेरे जीवन का यह क्षण जब मैं (एक अयोध्यावासी) अपने राम के पद चिह्नों की रज लेने का अवसर प्राप्त कर पाया हूँ।
भोर की पहली किरण के साथ मैंने सबको जगाया और सामान समेट कर स्टेशन से बाहर गए। दो ऑटो किए गए और मंदिर की ओर प्रस्थान किया। यहाँ भी हमारी प्राथमिकता थी कि कोई होटल लेकर सामान पटकें, नहाएं धोएं और तब मंदिर की ओर चलें। ऑटो वाले ने खूब घुमाया और अपने स्तर पर होटल दिलाने का पूरा प्रयास किया। अब उसने इतना प्रयास क्यों किया, ये तो सभी ही जानते हैं। या तो कमरा सही नहीं, या फिर किराया बहुत ज्यादा! इधरउधर घूमने के बाद मैंने उसे नमस्ते किया और अपने तईं ही कमरे का इंतजाम करने की ठानी। बहुत जल्दी ही हमें एक होटल मंदिर के पीछे मुख्य सड़क पर ही मिल गया। हमने तुरन्त ही दो कमरे बुक कर लिए। रामेश्वरम में, मुझे ऐसा बाद में लगा, तीनचार सौ में डबल बेड के कमरे बडे आराम से मिल जाते हैं। वैसे वहाँ ठहरने के लिए सर्वोत्तम स्थान गुजरात भवन है जो मंदिर के मुख्य द्वार के बिलकुल पास है। यहाँ व्यवस्था अच्छी है और किराया मात्र दो सौ पचास रुपये।

सागर के खारे जल की बात तो और होती ही है, किन्तु यहां के जल में जो सबसे बडी समस्या हमें दिख रही थी वह थी गन्दगी। पानी बिलकुल डबरीला और अनेक प्रकार के प्रवहमान एवं स्थिर पदार्थों से युक्त था।

होटल में सामान जमाने के बाद हम सागर में स्नान के लिए निकल पडे। यहाँ आने की योजना बनाते समय ही मैंने ये मालूम कर लिया था कि सर्वप्रथम यहाँ मंदिर के मुख्य गोपुरम के सम्मुख बंगाल की खाडी में और तदुपरान्त उन्हीं गीले कपडों में मंदिर में स्थित बाईस कुंडों में स्नान करने की परम्परा और प्रावधान है। सागर के खारे जल की बात तो और होती ही है, किन्तु यहां के जल में जो सबसे बडी समस्या हमें दिख रही थी वह थी गन्दगी। पानी बिलकुल डबरीला और अनेक प्रकार के प्रवहमान एवं स्थिर पदार्थों से युक्त था। हाँ, पर इतना गंदा भी नहीं था कि घिन हो जाए या इतनी दूर से चलकर आने वाले की आस्था धरी की धरी ही रह जाए और वह तथाकथित कर्मकांड से सहज ही विमुख हो जाए। अंततः हम सबने भी हिम्मत बटोरी और बचतेबचाते उस डबरीले सागर में घुस गए।
अरब सागर के उस खारे पानी में नहा कर निकले तो अगला क्रम मंदिर के अन्दर बाईस कुण्डों में नहाने का था। वहाँ से गीले कपड़े में हम मंदिर की ओर चले ही थे कि कई पंडे हाथों में बाल्टी और रस्सी पकडे हमारी तरफ लपके और हमें नहला देने का प्रस्ताव करने लगे। इतने में हम मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार पर पहुँचे। यहाँ कुछ और सेवकों ने घेरा डाला। उनका कहना था कि वे हर सदस्य को पूरी बाल्टी भर कर हर कुंड पर नहलाएंगे और सौ रुपये प्रति सदस्य लेंगे। पचास रुपये तो प्रवेश शुल्क और सरकारी फीस ही है। यह बात सच थी कि प्रवेश शुल्क पचीस रुपये प्रति व्यक्ति था और नहलाने का भी उतना ही। सत्तर रुपये में बात लगभग तय ही होने वाली थी कि मेरे मित्र महोदय को चिढ गई और वे सरकारी नियम के अन्तर्गत प्रवेश लेने चल पडे। उन्हें नियम विरुद्ध कोई भी बात जल्दी अच्छी नहीं लगती और अपने देश की व्यवस्था में वे अकसर फेल हो जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। साथ निभाने के लिए मुझे भी पीछेपीछे चलना पड़ा, हालाँकि मैं जानता था कि हमें अन्दर जाकर दिक्कत होगी।
टिकट लेकर प्रवेश किया तो पहले कुंड पर एक सेवक खडा मिल गया। कुंड का मतलब यहाँ कुएँ से है। ऐसे ही गहरेगहरे बाईस कुएँ यहाँ हैं जिनके जल से नहाने की यहाँ परम्परा है। कुल मिलाकर हम आठ सदस्य थे और आगे परेशानी शुरू होनी थी, हुई। सभी कुएँ एक जगह नहीं बल्कि दूरदूर हैं। दो चार कुंडों के बाद नहलाने वाले सेवक भारतीय व्यवस्था के अनुसार नदारद! अधिकांश बाहर से ही यजमान पटा कर ले आते हैं और उन्हें ही नहलाने में व्यस्त रहते हैं। हम तो जैसे जनरल वार्ड के मरीज हो रहे थे। मुझे मित्र पर मन ही मन गुस्सा भी रहा था। अंततः एक ग्रुप के साथ ही हम भी लग गए। उससे हमारी सुविधा शुल्क की शर्त पर सेटिंग हो गई। अगर आपको कभी जाना हो और इस धार्मिक कर्मकांड का भागी बनना हो तो आप भी किसी पंडे से मोलभाव कर ठेका छोड दें। सुखी रहेंगे।
वैसे यहाँ कुंडों में स्नान करना अच्छा लगता है।

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अज्ञेय को जनविरोधी कहना अधूरी समझ : नामवर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 23, 2010

हिन्दू कालेज में अज्ञेय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कालेज में अज्ञेय की जन्म शताब्दी के अवसर पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से ‘आज के प्रश्न और अज्ञेय’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस दो दिवसीय आयोजन में अनेक महविद्यालयों के अध्यापकों, शोधार्थियों और युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की. उदघाटन समारोह में सुविख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि शब्दों का वैभव अज्ञेय के पूरे कविता संसार में देखा जा सकता है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन

विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. उन्होंने कहा कि अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. प्रो. सिंह ने अज्ञेय की चर्चित कविताओं ‘नाच’ और ‘असाध्य वीणा’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय के काव्य के सभी कला रूपों का दर्शन ‘नाच’ में होता है.

अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है.कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं

 प्रथम सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने कहा कि हमारा समय मध्य वर्ग को गोदाम बनाने का युग है जहां दुनिया को विचार के बदले वस्तुओं से बदल देने पर जोर है. उन्होंने कहा कि इस सन्दर्भ में अज्ञेय का रचना कर्म महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे  विचार पर पूरा आग्रह करते हैं. वाजपेयी ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे खड़ी बोली के सबसे बड़े बौद्ध कवि हैं जो शान्ति और स्वाधीनता का संसार रचते हैं. उन्होंने कहा कि परम्परा से हमारे यहाँ साहित्य और कला चिंतन साझा रहा है लेकिन हिंदी आलोचना दुर्भाग्य से साहित्य तक सीमित रही है. इस सन्दर्भ में अज्ञेय के चिंतन को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया. वरिष्ट समालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सभ्यता ऐसे बिंदु पर पहुँच गई है जहां पूंजीवाद और प्रकृति में एक को चुनना पड़ेगा और तब हम देखेंगे कि अज्ञेय की कविता अंततः पूंजी के नहीं, प्रकृति और मनुष्यता के पक्ष में जाती है.प्रो. तिवारी ने कहा कि अज्ञेय में दार्शनिक विकलता का चरम रूप असाध्य वीणा में है,जो ध्यानात्मक होती चली गई है.अज्ञेय की कुछ बहुत छोटी-छोटी कविताओं की चर्चा करते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि बड़े संकट में छोटी चीज़ें भी अर्थवान हो जाती हैं, ये इसका उदाहरण है. इससे पहले हिन्दू कालेज के प्राचार्य प्रो. विनय कुमार श्रीवास्तव ने स्वागत किया और संयोजक डॉ. विजया सती ने संगोष्ठी की रूपरेखा रखी. सत्र का संयोजन कर रहीं डॉ. रचना सिंह ने वक्ताओं का परिचय दिया. दूसरे सत्र में विख्यात कवि और अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरे सप्तक के रचनाकार प्रो. केदारनाथ सिंह ने कहा कि मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है. उन्होंने कहा कि अज्ञेय की कविता पाठक और अपने बीच एक ओट खडा करती है और यह उनकी कविता की ख़ास तिर्यक पद्धति है. ‘भग्नदूत’ और ‘इत्यअलम’ जैसे उनके प्रारंभिक संकलनों को पुनर्पाठ के लिए जरूरी बताते हुए केदारजी ने कहा कि बड़ी कविता में वे रेहटरिक हो जाते थे वहीं छोटी कविताओं में उनकी पूरी रचनात्मक शक्ति और सामर्थ्य दिखाई पड़ती है.
मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है.
वैविध्य की दृष्टि से अज्ञेय को उन्होंने हिंदी के थोड़े से कवियों में बताया. केदारनाथ जी ने कहा कि अज्ञेय कविता के बहुत बड़े अनुवादक भी हैं. ‘आधुनिक भावबोध और अज्ञेय की कविता’ विषयक इस सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और सुपरिचित आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह ने शीतयुद्ध के दौर में हिन्दी आलोचना के सन्दर्भ में अज्ञेय के कृतित्व पर विचार करते हुए कहा कि भारतीय कविता श्रव्य परम्परा की रही है जिसे आधुनिक बनाने की कोशिश अज्ञेय ने की. प्रो.
सिंह ने कहा कि इसी दौर में लघुमानव और महामानव की बहस में साहित्य को लघु मानव अर्थात सामान्य मनुष्य की ओर मोड़ने के लिए भी अज्ञेय को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिनका मनुष्य की गरिमा में गहरा विश्वास है. उन्होंने कहा कि जिस यथार्थवाद की कसौटी पर अज्ञेय को खारिज किया जाता है वह ढीली ढाली है अतः कविता के इतिहास पर दुबारा बात की जानी चाहिए. जवाहरलाल
नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के प्रो. गोबिंद प्रसाद ने कहा कि अज्ञेय बेहद आत्मसज़गता के कवि थे, जो ताउम्र अपनी छाया को ही लांघते रहे, अपने से लड़ते रहे. उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने आधुनिकता को एक निरंतर संस्कारवान होने की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा है, जहां स्व और आत्म पर बेहद आग्रह है. प्रो. प्रसाद ने कहा कि इसका एक सिरा जहां अस्मिता और इयत्ता से जुड़ता है वहीं दूसरा आत्मदान और दाता भाव से भी. कवि और कविता की रचना प्रक्रिया पर जितनी कवितायें अज्ञेय ने लिखी हैं उतनी और किसी हिन्दी कवि ने नहीं. इस सत्र का संयोजन विभाग के अध्यापक डॉ. पल्लव ने किया.

दूसरे दिन सुबह पहले सत्र में पटना विश्वविद्यालय में आचार्य रहे आलोचक प्रो. गोपाल राय ‘शेखर एक जीवनी’ पर अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि बालक के विद्रोही बनने की प्रक्रिया में अज्ञेय ने गहरी अंतरदृष्टि और मनोवैज्ञानिकता का परिचय दिया है, वहीं प्रेम के प्रसंग में भी उनका

वर्णन और भाषाई कौशल अद्भुत है. उन्होंने विद्रोह, क्रान्ति और आतंक में भेद बताते हुए कहा की यदि इस उपन्यास का तीसरा भाग आ पता तो शेखर के विद्रोह का सही चित्र देखना संभव होता, उपलब्ध सामग्री में विद्रोह कर्मशीलता में परिणत नहीं हो पाया है. कथाकार और जामिया मिलिया के हिंदी आचार्य प्रो. अब्दुल बिस्मिलाह ने अज्ञेय की कहानियों पर अपने व्याख्यान में श्रोताओं का ध्यान कई नए बिन्दुओं की ओर आकृष्ट किया. उन्होंने आदम-हव्वा की प्राचीन कथा का सन्दर्भ देते हुए कहा कि सांप मनुष्य को विद्रोह के लिए उकसाने वाला जीव है और अज्ञेय की कहानियों में सांप की बार बार उपस्थिति अकारण नहीं है. प्रो. बिस्मिल्लाह ने कहा कि विभाजन और साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में लिखी गई अज्ञेय की कहानियां अब और अधिक महत्वपूर्ण और प्रसंगवान हो गई हैं. उन्होंने कहा कि अज्ञेय के साहित्य में विद्रोह वही नहीं है जो दिखाई दे रहा है अपितु भीतर भीतर पल रहा विद्रोह कम नहीं है. आलोचक और हिन्दू कालेज में सह आचार्य डॉ.
रामेश्वर राय ने कहा कि अज्ञेय के लिए व्यक्ति मनुष्य की सत्ता उसकी विचार क्षमता पर निर्भर करती है और उनके लिए विचार होने की पहली शर्त अकेले होने का सहस है.डॉ. राय ने इश्वर,विवाह और नैतिकता के सम्बन्ध में अज्ञेय के चिंतन पर चर्चा करते हुए कहा कि उनके यहाँ विद्रोह जंगल हो जाने की आकांक्षा है जिसके नियम इतने सर्जनात्मक हैं कि व्यक्ति के विकास में कोई दमन न हो. समापन समारोह में वरिष्ट आलोचक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि अज्ञेय को कविता में किसी भी वस्तु या विषय के ब्रांडधर्मी उपयोग पर
आपत्ति थी और उनके लिए कविता तथा जीवन का यथार्थ एक ही नहीं था.
उन्होंने कहा कि व्यक्ति की अद्वितीयता में अज्ञेय की आस्था अडिग है और वे इतनी दूर तक ही ‘मैं’ को समाज के लिए अर्पित करने को प्रस्तुत हैं कि उनका अस्तित्व बना रहे. प्रो. जैन ने अज्ञेय की चर्चित कविता ‘नदी के द्वीप’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय अपने चिंतन को कविता के रूप में 
बयान करते हैं.उन्होंने शताब्दी वर्ष में केवल रचनाकार के गुणगान तक सीमित रह जाने के खतरे से आगाह करते हुए कहा कि क्लिशे में जाने कि बजाय पलट पलट कर देखना होगा कि दूसरी आवाजें तो नहीं आ रहीं हैं. समापन सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी प्रयाग शुक्ल ने कहा कि अज्ञेय सोचते हुए लेखक कवि हैंजो आधुनिक बोध को लाये. उन्होंने कहा कि हिन्दी को अज्ञेय की जरूरत थी. शुक्ल ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे भाषा के सावधान प्रयोग के लिए याद किये जायेंगे. उन्होंने अज्ञेय से जुड़े अपने कई संस्मरण भी सुनाये. वरिष्ट कथाकार राजी सेठ ने इस सत्र में अज्ञेय के चिंतन पक्ष पर विस्तार से विचार करते हुए कहा कि
उनका चिंतन कर्म और काव्य कर्म वस्तुतः अलग नहीं है .लेकिन यहाँ समस्या होती है कि क्या अज्ञेय की कविता उनके चिंतन की अनुचर है?
आयोजन स्थल पर अज्ञेय साहित्य और अज्ञेय काव्य के पोस्टर की प्रदर्शनी को भरपूर सराहना मिली. आयोजन में अंग्रेजी समालोचक प्रो. हरीश त्रिवेदी, कवि अजित कुमार,युवा आलोचक वैभव सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रोताओं ने भाग लिया.
यह जानकारी डॉ. पल्लव ने एक मेल के ज़रिये दी.

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यात्रा वृत्तांत भर नहीं है पूश्किन के देश में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 18, 2010

महेश दर्पण की पुस्तक ‘पूश्किन के देस में’ ने मुझे 60 साल पीछे पहुंचा दिया है। चेखव को मैंने आगरा में पढऩा शुरू किया था। कोलकता की नैशनल लायब्रेरी में भी मैं चेखव के पत्र पढ़ा करता था। इस पुस्तक में एक पूरी दुनिया है जो हमें नॉस्टेल्जिक बनाती है। यह विचार हंस के संपादक और वरिष्ठï कथाकार राजेन्द्र यादव ने सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पूश्किन के देस में पर आधारित संगोष्ठी में व्यक्त किए। इसे रशियन सेंटर और परिचय साहित्य परिषद ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था।
श्री यादव ने कहा : सन् 1990 में मैं भी रूस गया था। कुछ स्मृतियां मेरे पास भी थीं। इसे पढक़र वे और सघन हुई हैं। एक कुशल यात्रा लेखक की तरह महेश दर्पण ने बदले हुए रूस को देखते हुए भी बताया है कि अब भी रूस में बहुत कुछ बाकी है।

एक कुशल यात्रा लेखक की तरह महेश दर्पण ने बदले हुए रूस को देखते हुए भी बताया है कि अब भी रूस में बहुत कुछ बाकी है।

यह पुस्तक मेरे स्मृति कोश में बनी रहेगी। ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं, जैसे काफी पहले एक किताब प्रभाकर द्विवेदी ने लिखी थी-‘पार उतर कहं जइहों’।
प्रारंभ में कवि-कथाकार उर्मिल सत्यभूषण ने कहा : यह पुस्तक हमें रूसी समाज, साहित्य और संस्कृति से परिचित कराते हुए ऐसी सैर कराती है कि एक-एक दृश्य आंखों में बस जाता है। अब तक हम यहां रूस के जिन साहित्यकारों के बारे में चर्चा करते रहे हैं, उनके अंतरंग जगत से महेश जी ने हमें परिचित कराया है। 
महेश दर्पण को फूल भेंट करते हुए रशियन सेंटर की ओर से येलेना श्टापकिना ने अंग्रेजी में कहा कि एक भारतीय लेखक की यह किताब रूसी समाज के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करती है। इस पठनीय पुस्तक में लेखक ने कई जानकारियां ऐसी दी हैं जो बहुतेरे रूसियों को भी नहीं होंगी। 
कथन के संपादक और वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय ने कहा कि महेश दर्पण ने इस पुस्तक के माध्यम से एक नई विधा ही विकसित की है। यह एक यात्रा वृतांत भर नहीं है। इसे आप एक उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं। रचनाकारों के म्यूजियमों के साथ ही महेश दर्पण की नजर सोवियत काल के बाद के बदलाव की ओर भी गई है।

यह एक यात्रा वृतांत भर नहीं है। इसे आप एक उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं। रचनाकारों के म्यूजियमों के साथ ही महेश दर्पण की नजर सोवियत काल के बाद के बदलाव की ओर भी गई है।

अनायास ही उस समय से इस समय की तुलना भी होती चली गई है। श्रमशील और स्नेही साहित्यकर्मी तो महेश हैं ही, उनका जिज्ञासु मन भी इस पुस्तक में सामने आया है। मुझे ही नहीं, मेरे पूरे परिवार को यह पुस्तक अच्छी लगी। 
वरिष्ठ उपन्यासकार चित्रा मुद्गल ने कहा : मैं महेश जी की कहानियों की तो प्रशंसिका तो हूं ही, यह पुस्तक मुझे विशेष रूप से पठनीय लगी। रूसी समाज को इस पुस्तक में महेश ने एक कथाकार समाजशास्त्री की तरह देखा है। यह काम इससे पहले बहुत कम हुआ है। रूसी समाज में स्त्री की स्थिति और भूमिका को उन्होंने बखूबी रेखांकित किया है। बाजार के दबाव और प्रभाव के  बीच टूटते-बिखरते रूसी समाज को लेखक ने खूब चीन्हा है। यह पुस्तक उपन्यास की तरह पढ़ी जा सकती है। बेगड़ जी की तरह महेश ने यह किताब डूबकर लिखी है। रूस के शहरों और गांवों का यहां प्रामाणिक विवरण है जो हम लोगों के लिए बेहद पठनीय बन पड़ा है। 
सर्वनाम के संस्थापक संपादक और वरिष्ठï कवि-कथाकार विष्णु चंद्र शर्मा ने कहा : महेश मूलत: परिवार की संवेदना को बचाने वाले कथाकार हैं। इस किताब में भी उनका यह रूप देखने को मिलता है। उन्होंने बदलते और बदले रूस के साथ सोवियत काल की तुलना भी की है। वह रूसी साहित्य पढ़े हुए हैं। वहां के म्यूजियम और जीवन को देखकर उन्होंने ऐसी चित्रमय भाषा में विवरण दिया है कि कोई अच्छा फिल्मकार उस पर फिल्म भी बना सकता है। अनिल जनविजय के दोनों परिवारों को आत्मीय नजर से देखा है। यह पुस्तक बताती है कि अभी बाजार के बावजूद सब कुछ नष्टï नहीं हो गया है। आजादी मिलने के बाद हिन्दी में यह अपने तरह की पहली पुस्तक है जिससे जाने हुए लोग भी बहुत कुछ जान सकते हैं।
प्रारंभ में कथाकार महेश दर्पण ने कहा : जो कुछ मुझे कहना था, वह तो मैं इस पुस्तक में ही कह चुका हूं। जैसा मैंने इस यात्रा के दौरा महसूस किया, वह वैसा का वैसा लिख दिया। अब कहना सिर्फ यह है कि रूसी समाज से उसकी तमाम खराबियों के बावजूद, हम अभी बहुत कुछ सीख सकते हैं। विशेषकर साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण के बारे में। यह सच है कि अनिल जनविजय का इस यात्रा में साथ मेरे लिए एक बड़ा संबल रहा है। दुभाषिए का इंतजाम न होता तो बहुत कुछ ऐसा छूट ही जाता जिसे मैं जानना चाहता था। 
इस संगोष्ठी में हरिपाल त्यागी, नरेन्द्र नागदेव,  प्रदीप पंत, सुरेश उनियाल, सुरेश सलिल, त्रिनेत्र जोशी, तेजेन्द्र शर्मा, मृणालिनी, लक्ष्मीशंकर वाजपेई, भगवानदास मोरवाल, हरीश जोशी, केवल गोस्वामी, रामकुमार कृषक, योगेन्द्र आहूजा, वीरेन्द्र सक्सेना, रूपसिंह चंदेल, प्रेम जनमेजय, हीरालाल नागर, चारु तिवारी,  राधेश्याम तिवारी, अशोक मिश्र, प्रताप सिंह, क्षितिज शर्मा और सत सोनी सहित अनेक रचनाकार और साहित्य रसिक मौजूद थे।
प्रस्तुति : दीप गंभीर

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मैं उवाच

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 7, 2010

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहां दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता
-बशीर बद्र

यानी उन्हें केवल फेसबुक या ट्विटर फ्रेंड ही बनाना, सच्ची-मुच्ची का यार बनाने की कोशिश की तो गए काम से!
🙂
-इष्ट देव सांकृत्यायन

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युधिष्ठिर का कुत्ता – दूसरी किश्त

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 2, 2010

हरिशंकर राढ़ी

यह भी एक शाश्वत सत्य है कि अपनी जाति एवं समाज की चिन्ता करने वाला कभी भी व्यक्तिगत विकास नहीं कर पाता है। यदि अपनी जाति के स्वाभिमान की चिन्ता मैं ही करता तो आज स्वर्ग पहुँच पाने वाला इकलौता आदरणीय कुत्ता नहीं बन पाता। मैं भी किसी पुरातन समाजवादी की भांति इधर-उधर के धक्के खाकर अबतक मर चुका होता या अज्ञातनामा जिन्दगी जी रहा होता। स्वर्ग का सुख शोषित समाज का साथ देकर नहीं पाया जा सकता और न ही अपनी जाति का अपकार करने वाले के प्रतिशोध की भावना रखकर। स्वर्ग का सुख या तो ऐसे लोगों की शरण में जाकर पाया जा सकता है या फिर अपनी जाति के लोगों को स्वर्ग का सपना दिखाकर। कम से कम लोकतंत्र में तो ऐसा ही होता है।
इस तथ्य के प्रमाण में आपको मुझसे अच्छा दूसरा उदाहरण नहीं मिल सकता है। मैं उसी युधिष्ठिर का घोर समर्थक रहा जिन्होंने धर्मराज होने के बावजूद मेरी पूरी जाति के लिए सदैव के लिए नंगा कर दिया । मुझे मालूम था कि धर्मराज ने मेरी जाति को खुले यौन सम्बन्ध का श्राप दिया है क्योंकि मेरे एक भाई की वजह से उन पति -पत्नी के निजी संबंधों में विघ्न पड़ा था। बड़ा आदमी सब कुछ बर्दाश्त कर लेगा किन्तु यौन सम्बन्धों में विघ्न बर्दाश्त नहीं कर सकता । आपको स्मरण होगा कि मेरे एक भाई ने स्वभाववश उस समय उनका जूता ( और ये जूता उनके लिए रतिक्रीडा का साक्षी हुआ करता था) इधर-उधर कर दिया था। अब कोई शक्तिशाली व्यक्ति अपने प्रति किए गए अपराध का दंड केवल दोषी को तो देता नहीं, उसकी नजर में तो अपराधी की पूरी जाति ही दोषी होती है और फिर दंड पूरे समाज को मिलता है। लो भाई, श्राप मिल गया कि तुम्हारी जाति का यौन सम्बन्ध सभी लोग देखें। बिल्कुल लाइव टेलीकास्ट ! पता नहीं कुछ लोगों को खुले यौन सम्बन्धों से इतना लगाव क्यों होता है ? अवसर तलाशते रहेंगे कि कोई रतिक्रीडारत हो और हम नेत्रसुख लें। उन्हें तो अपनी भावी पीढ़ी की भी चिन्ता नहीं होती कि उनके इस आनन्द का बालमन पर क्या प्रभाव पड़ेगा !
खैर , मुझे आजे इस बात का संतोष है कि जिस प्रकार का श्राप हमें मिला था, उसी प्रकार का कार्य आज मानव जाति भी करने लग गई है। उनका खुलापन देखकर मन को शांति मिलती है। भविष्य में जब वे यौन संबन्धों में पूरी तरह हमारा अनुसरण करने लगेंगे तो हमारे श्राप का परिहार हो जाएगा। अगर विकास ऐसे ही होता रहा तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं है।
मानिए तो मैं किसी भी प्रकार युधिष्ठिर से कम धर्मपारायण नहीं हूँ। किसी भी परिस्थिति में मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और न कभी उनका विरोध किया। यहाँ तक कि उनके भाइयों ने भी समय पडने पर उनको भला -बुरा कहने में कसर नहीं रखी । उनपर आरोप भी लगाया । वैसे आरोप तो आप भी लगाते रहते हैं – धर्मराज ने ये किया ,धर्मराज ने वो किया। अमुक बात के लिए इतिहास धर्मराज को कभी क्षमा नहीं करेगा और अमुक बात का जवाब उन्हें देना ही होगा।उन्होंने द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया। सारे नारीवादी आज चीख- चीखकर इस बात का जवाब माँग रहे हैं। वैसे जवाब क्या मांग रहे हैं, अंधेरे में पत्थर मार रहे हैं। उनकी भी अपनी समस्याएं और आवश्यकताएं हैं। अगर इतना चीख लेने से कुछ नारियाँ प्रभाव में आ जाएं तो बुरा ही क्या है? किसी ने यह प्रश्न नहीं उठाया कि धर्मराज ने अपने सगे भाइयों को भी तो दाँव पर लगाया था, इसका उन्हें क्या अधिकार था ? पर इस प्रश्न से कोई स्वार्थ नहीं सधता , कोई आन्दोलन नहीं बनता ।
आज तक तो धर्मराज ने ऐसी किसी बात का जवाब नहीं दिया। क्यों दें ? स्वर्ग में बैठा हुआ एक महान इंसान धरती पर कीड़े -मकोड़ों की भांति जीने वाले प्राणी की बात का जवाब क्यों दे ? सारे लोकतंत्र और राष्ट्र संघ के दबाव के बावजूद आप पडोसी मुल्क से एक अपराधी का प्रत्यर्पण तो करा ही नहीं सकते और चाहते हैं कि धर्मराज स्वर्गे से कूदकर तुम्हारे बीच उत्तर देने आ जाएं ! अनगिनत द्रौपदियों और बंधु-बांधवों को दाँव पर जगाने वाले हजारों लोग तुम्हारे बीच में ही हैं। इन्होंने आजतक कोई जवाब दिया है क्या ? इन नारीवादियों से पूछो कि साझा सम्पत्ति की रक्षा वे कितने मन से करते हैं ? क्या वे इतना भी नहीं जानते कि साझे की खेती तो गदहा भी नहीं चरता । बिना श्रम के मिली सम्पत्ति के लुटने पर कितना दर्द होता है ? चले हैं धर्मराज पर आराप लगाने !पर, वह आदमी ही क्या जो दूसरों पर आरोप न लगाए !
धर्मराज स्वर्ग जाने के अधिकारी थे। उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला था। आप कह सकते हैं कि झूठ तो नकुल सहदेव ने भी नहीं बोला था। और भी बहुत से लोग हैं जो झूठ नहीं बोलते । परन्तु आप इस बात पर विचार नहीं कर रहे कि वे सम्राट थे । ऐसा पहली बार हो रहा था कि एक सम्राट झूठ नहीं बोल रहा था। राजनीति में तो एक टुच्चा आदमी और एक छोटा मंत्री भी झूठ बोले बिना जीवन निर्वाह नहीं कर सकता । इस प्रकार उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया था। नकुल – सहदेव या किसी सामान्य प्रजाजन के झूठ या सच बोल देने से क्या बिगड जाता है ? आप को याद होगा कि नरो-कुंजरो वाले मामले में झूठ का एक पुट आ जाने से क्या से क्या हो गया था ? एक राजा सच बोलकर कई बारी बड़ी हानि उठा लेता है। अब एक नॉन वीआईपी सच बोलकर क्या नुकसान कर लेगा ? आचरण तो बड़े लोगों का ही देखा जाता है और पुरस्कार भी बड़े लोगों को ही मिलता है। मुझे तो लगता है कि आप पति- पत्नी के बीच लड़ाई शांत कराने वाले को शांति का नोबेल पुरस्कार दिलाना चाहते हैं ।

इधर जब से राजतंत्र का पतन होना शुरू हुआ है और प्रजा तंत्र का आविर्भाव हुआ है, कुत्तों का बोलबाला हो गया है। हमारी यह विशेषता होती है कि हम एक स्वर में अकारण हंगामा कर सकते हैं और भीड़ जमा कर सकते हैं । अगर हम भौंकने लग जाएं तो अच्छी से अच्छी बात भी दब जाती है और प्रजातंत्र में सत्ता और सफलता का यही राज है। हमारे साथ तो यह भी साख है कि हम किसी पर भौंक दें तो उसे चोर मान लिया जाता है। दूसरी बात यह है कि हमारी घ्राण शक्ति इतनी तेज है कि हम खाद्य पदार्थ की किसी भी सम्भावना का पता लगा लेते हैं और सम्भाव्य स्थल पर तत्काल जुट भी जाते हैं। हमारी सफलता में इस शक्ति का भी बहुत बड़ा हाथ है।
हम एक और चीज में आदमियों से बेहतर हैं और वह यह है कि हम देशी- विदेशी में भेदभाव नहीं करते। कुत्ता देशी हो या विदेशी ,हम उस पर बराबर ताकत से भौंकते हैं। हमारे यहाँ का तो पिल्ला भी विदेशी बुलडॉग और हाउण्ड पर भौंकने से नहीं चूकता । ये बात अलग है कि जब अपनी औकात कम देखता है तो सुरक्षित दूरी बनाकर भौंकता है। पर यहाँ के आदमियों के साथ ऐसी बात नहीं है। वे विदेशी को सदैव ही अपने से बेहतर मानते हैं । कई तो विदेशी भिखमंगों को भी हसरत की निगाह से देखते हैं और उनकी आलोचना के विषय में सोच भी नहीं सकते। उन्हें तो शासन करने तक का मौका प्रदान कर दिया ।
वैसे कई लोग अब तक यही मानते हैं कि स्वर्ग में रहने वाला कुत्ता मैं इकलौता हूँ। यह तो अपना – अपना भाग्य है। आज भी ऐसे कुत्तों की संखया मनुष्यों से ज्यादा है जो स्वर्ग में रह रहे हैं, वातानुकूलित विमानों में पूँछ निकाल कर घूम रहे हैं, इन्द्र के नन्दन कानन की हवा ले रहे हैं , देशी -विदेशी गायों का दूध पी रहे हैं और न जाने कितनी उर्वशियों , रम्भाओं और मेनकाओं की गोद में खेल रहे हैं।

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