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Archive for January, 2011

मत समझो आजादी गांधी ही लाया था….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 30, 2011


मत समझो आजादी गांधी ही लाया था….

बिस्मिल ने भी इसकी खातिर रक्त दिया था…
बंगाली बाबू का भी बलिदान ना कम है…
कितने अश्फाकों ने इसमें वक़्त दिया था…
कली- कली निर्दय माली पर गुस्साई थी,
सच कहता हूँ तब ही आजादी आई थी…
लाखों दीवानों ने गर्दन कटवाई थी
सच कहता हूँ तब ही आजादी आई थी..
(डॉ सारस्वत मोहन मनीषी की कविता का एक अंश )

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इस अर्पण में कुछ और नहीं केवल उत्सर्ग छलकता है….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 27, 2011

ठण्ड गुजरने को है पर इस साल अभी तक बाजरे की रोटी नहीं खाई.गाँव में थे तो सर्दी शुरू होते ही रोजाना बाजरे की रोटी खाने को मिलती थी, गरमागरम. संग में कभी सरसों का साग, कभी चने का साग तो कभी उड़द की दाल.रोटी के ऊपर देशी घी की मोटी सी डली और गुड.बाजरे की खिचडी और बाजरे की रोटी का गुड मिला चूरमा भी कितना लजीज होता था…!!! गाँवबदर हो शहर आए तो मक्के की रोटी भी खाने को मिली, पर वो मजा कभी नहीं आया जो गाँव में आता था…जब तक घर में गैस का चूल्हा नहीं आया था तो मिट्टी के चूल्हे पर सिकी करारी रोटी मिलती थी.चौके में चूल्हे के सामने जमीन पर बैठकर तवे से उतरती गरमागरम रोटी खाने का मजा ही अलग था. माँ बनाती जाती और हम दोनों भाई खाते जाते, कभी छोटी बहन के साथ तो कभी पिताजी के साथ. कलई से चमके हुए पीतल के थाल में, जो हमारे होश सँभालते सँभालते स्टील की थाली बन गया और जब गैस का चूल्हा आ गया तो बाकी सब तो वही रहा पर रोटी की मिठास बदल गई. जो मीठापन लकड़ी की आग में चूल्हे पर सिकी रोटी में था वो गैस में कहाँ… मुझे याद नहीं कि माँ ने भी कभी अपने चौके में तवे से उतरती गरमागरम करारी बाजरे की रोटी खाई हो…! बाजरे की क्या गेहूं की रोटी भी नहीं खाई होगी…! उन्हें अपनी सुध कहाँ… घर की साज सँभाल और पिताजी व हम भाई बहनों को तवे से उतरती रोटी खिलाने में ही शायद उनका मन तृप्त हो जाता होगा…! और अब पत्नी भी तो कमोबेश उसी रूप में है…सबको गरम रोटी खिलाने के उल्लास में खुद कहाँ गरम खा पाती है…!!! और शायद इसीलिए जयशंकर प्रसाद जी ने कामायनी में लिखा है….
“इस अर्पण में कुछ और नहीं केवल उत्सर्ग छलकता है,
मैं दे दूँ और न फिर कुछ लूँ, इतना ही सरल झलकता है।
“क्या कहती हो ठहरो नारी! संकल्प-अश्रु जल से अपने –
तुम दान कर चुकी पहले ही जीवन के सोने-से सपने।
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में,
पीयूष-स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।”

अनिल आर्य

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आजादी को भीख ना समझो कीमत दी है..

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 25, 2011

आजादी को भीख ना समझो कीमत दी है..
देकर अपना लाल लहू यह रंगत दी है..
आज तिरंगा गीले नयन निहार रहा है..
देशभक्त वीरों को पुनः पुकार रहा है…
(डाक्टर सारस्वत मोहन मनीषी की कविता से)
अनिल आर्य

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कश्मीर के हर पहरुए के सीने पे तिरंगा है…हर सीने में तिरंगा है…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 24, 2011


क्या इसी का नाम आज़ादी है कि अपने ही देश में अपने ही राष्ट्रीय झंडे को फहराने पर रोक लगा दी जाए..? क्या यही गणतन्त्र है कि जन-गण-मन की भावनाओं का पूरी बेशर्मी के साथ अपमान किया जाए….? क्या इसे ही लोकतंत्र कहते हैं कि वोट की खातिर दुश्मन के मंसूबों को पूरा करने के लिए हर वक़्त अपना पाजामा खोल के रखा जाए …? लुच्चेपन की हद हो गई है. पूरी बेशर्मी, ढिठाई और वाहियात तरीके से तिरंगा फहराने पर पाबंदी लगाने में जुटे हुए हैं उमर अब्दुल्ला और उनके इस बेसुरे ‘राग गधैया’ की संगत करने में संलिप्त हैं वो तमाम ‘उल्लू के चरखे’ जिन्हें दिन में भी ‘सूरज-चांद’ ही दिखते हैं .. पर अब यह प्रश्न केवल भाजपा की तिरंगा यात्रा का नहीं, बल्कि प्रश्न है भारत के स्वाभिमान का…तिरंगे की आन बान शान का…और उसके लिए कुछ भी करने के लिए इस देश को प्यार करने वाला हर जन-गण-मन सदैव सर्वस्व न्यौछावर करने को उद्यत रहता है….हैरानी तो यह है कि श्री नगर में पाकिस्तानी झंडा तो लहराया जा सकता है, तिरंगा फहराने पर आपत्ति है…पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे तो लगाये जा सकते हैं, भारत की जय जय करने से वहां की फिजां ख़राब होने का हौव्वा दिखाया जाता है…क्या कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है या अपने ही देश में अपना ही राष्ट्र ध्वज फहराना जुर्म है…क्या यह राष्ट्र द्रोह है …क्या इससे देश की आवाम भड़क जायेगी…अरे यदि हम अपने ही देश में अपना झंडा नहीं फहरा सकते तो धिक्कार है हमें…उमर अब्दुल्ला तुम्हारी बातों और कृत्यों से तो पाकिस्तानी बू आ रही है…अगर तुम्हें और तुम्हारे so-called धर्मनिरपेक्ष दोस्तों को इसमें भाजपा की राजनीति दिखाई देती है तो क्यों ना पहले ही दिन कह दिया होता कि ‘नहीं, भाजपा वालो तुम अकेले ही ऐसा नहीं करोगे चलो हम सब चलते हैं और लाल कुआं पर सब मिलकर गणतंत्र दिवस मनाते हैं और पूरी शान से तिरंगा फहराते हैं’…भाजपा को अपनी राजनीति चमकाने का मौका ही नहीं मिलता..समूचा देश भी तुम्हारी जैजैकार कर रहा होता….पर नहीं तुम्हें ऐसा तो करना ही नहीं था…ऐसा करते तो तुम अपना खेल कैसे खेलते…दरअसल तुम्हारी सोच ही खोटी है…लगता है या तो तुम्हारी अक्ल कहीं ‘बंधक’ है…या फिर तुम परले दर्जे के धूर्त हो…अरे श्रीमान तुम प्रदेश के मुख्यमंत्री हो और कह रहे हो कि तिरंगा फहराने से शांति भंग होने का खतरा है…कैसे CM हो…जिसके वश में अपना रास्त्र धवज फहराने के लिए कानून व्यवस्था काबू में रखने की कुव्वत भी ना हो उसे इस पद पे रहने का अधिकार ही नहीं है…सच कहूं तो कश्मीर की जनता को आतंकवाद की आग में झोंकने वाले तुम्हारे जैसे जयचंदों के अलावा भला और कौन है…तुम भले ही भाजपा को रोकने की सनक या कहूं कि पागलपन में आज अपना पूरा जोर लगा दो पर तुम तिरंगे को कैसे रोकोगे…कश्मीर के हर पहरुए के सीने पे तिरंगा है…हर सीने में तिरंगा है…

अनिल आर्य

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Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 23, 2011

सूरज हो मुकाबिल तो शरारा नहीं टिकता ।
दिन में कोई आकाश में तारा नहीं दिखता ॥

मुश्किल में बदल जाते हैं हर नाते और रिश्ते-
रोने को भी काँधे का सहारा नहीं दिखता ।

ईमान की कीमत न चुका पाओगे मेरे-
वरना सर-ए-बाज़ार यहाँ क्या नहीं बिकता ।

सरकारें बदल बदल के यह देख लिया है-
हालात बदल पाने का चारा नहीं दिखता ।

संसद पे जमा रक्खा है बगुलों ने यूँ कब्ज़ा-
हंसो का सियासत मे गुज़ारा नहीं दिखता ।

– विनय ओझा स्नेहिल

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अपनी पवित्र गायों से द्रोह

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 22, 2011


अपनी पवित्र गायों से द्रोह

यह जानकर शायद आपको झटका लगेगा कि हमने अपनी देसी गायों को गली-गली आवारा घूमने के लिए छोड़ दिया है, क्योंकि वे दूध कम देती हैं और इसलिए उनका आर्थिक मोल कम है, लेकिन आज ब्राजील हमारी इन्हीं गायों की नस्लों का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। ब्राजील भारतीय प्रजाति की गायों का निर्यात करता है, जबकि भारत घरेलू दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए अमरीका और यूरोपीय प्रजाति की गायें आयात करता है। वास्तव में, तीन महत्वपूर्ण भारतीय प्रजाति गिर, कंकरेज और ओंगोल की गायें जर्सी गाय से भी ज्यादा दूध देती हैं, यहां तक कि भारतीय प्रजाति की एक गाय तो होलेस्टेन फ्राइजियन जैसी विदेशी प्रजाति की गाय से भी ज्यादा दूध देती है। जबकि भारत अपने यहां दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए होलेस्टेन फ्राइजियन का आयात करता है।

अब जाकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के गर्व – गिर प्रजाति की गाय – को स्वीकार करने का निश्चय किया है। उन्होंने हाल ही में मुझे बताया कि उन्होंने उच्च प्रजाति की शुद्ध गिर नस्ल की गाय को ब्राजील से आयात करने का निश्चय किया है। उन्होंने यह भी कहा कि आयात की गई गिर गाय को भविष्य में “क्रॉस ब्रीडिंग प्रोग्राम” में इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि राज्य में दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा मिल सके। मैंने उन्हें बताया कि हाल ही में ब्राजील में दुग्ध उत्पादन प्रतियोगिता हुई थी, जिसमें भारतीय प्रजाति की गिर गाय ने एक दिन में 48 लीटर दूध दिया। तीन दिन तक चली इस प्रतियोगिता में दूसरा स्थान भी भारतीय नस्ल की गिर गाय को ही प्राप्त हुआ। इस गाय ने 45 लीटर दूध दिया। तीसरा स्थान आंध्र प्रदेश के ओंगोल नस्ल की गाय (जिसे ब्राजील में नेरोल कहा जाता है) को मिला। उसने भी एक दिन में 45 लीटर दूध दिया।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत विकास की गलत नीति अपनाकर चल रहा है। यदि हमें अपने यहां गायों की नस्लों का विकास करना है, तो हमें कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, अपने यहां जो उच्च उत्पादकता वाली गायें हैं, उनसे क्रॉस ब्रिडिंग कराने का बड़ा वैज्ञानिक महत्व है।

आयातित प्रजातियों के प्रति आकष्ाüण भारतीय डेयरी उद्योग के लिए घातक सिद्ध हुआ है। हमारे योजनाकारों व नीति निर्माताओं ने देसी नस्लों को पूरी तरह आजमाए बिना ही विदेशी नस्लों को आगे बढ़ाया है। भारतीय नस्ल की गायें स्थानीय माहौल में अच्छी तरह ढली हुई हैं, वे भीषण गर्मी झेलने में सक्षम हैं, उन्हें कम पानी चाहिए, वे दूर तक चल सकती हैं, वे स्थानीय घासों के भरोसे रह सकती हैं, वे अनेक संक्रामक रोगों का मुकाबला कर सकती हैं। अगर उन्हें सही खुराक और सही परिवेश मिले, तो वे उच्च दुग्ध उत्पादक भी बन सकती हैं।

केवल ज्यादा दुग्ध उत्पादन की बात हम क्यों करें, हमारी गायों के दूध में ओमेगा-6 फैटी एसिड्स होता है, जिसकी कैंसर नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विडंबना देखिए, ओमेगा-6 के लिए एक बड़ा उद्योग विकसित हो गया है, जो इसे कैप्सूल की शक्ल में बेच रहा है, जबकि यह तत्व हमारी गायों के दूध में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। गौर कीजिएगा, आयातित नस्ल की गायों के दूध में ओमेगा-6 का नामोनिशान नहीं है। न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने पाया है कि पश्चिमी नस्ल की गायों के दूध में “बेटा केसो मॉर्फिन” नामक मिश्रण होता है, जिसकी वजह से अल्जाइमर (स्मृतिलोप) और पार्किसन जैसे रोग होते हैं।

इतना ही नहीं, भारतीय नस्ल की गायों का गोबर भी आयातित गायों के गोबर की तुलना में श्रेष्ठ है। भारतीय गायों का गोबर अर्घ-कठोर होता है, जबकि आयातित गायों का गोबर अर्घ-तरल। इसके अलावा देसी गायों का गोबर ऎसा पंचागभ्य तैयार करने के अनुकूल है, जो रासायनिक खादों का बेहतर विकल्प है। कई शोध बताते हैं कि गो मूत्र भी औषधीय प्रयोग में आता है। गो-मूत्र और एंटीबायोटिक के एक औषधीय मिश्रण का अमरीका में पेटेंट कराया गया है। गो-मूत्र में मौजूद कारगर तत्वों के लिए और कैंसर रोधी कारक के रूप में भी गो-मूत्र का पेटेंट हुआ है।

एक ऎसा देश, जो अपने प्राकृतिक संसाधनों पर भी शायद ही गर्व करता है, वहां यह उम्मीद करने का सवाल ही नहीं उठता कि पवित्र गायों का वैज्ञानिक व तकनीकी रूप से विकास किया जाता। जब हमने अपने पशुधन के मोल को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जब हमने अपने पशुधन की क्षमता बढ़ाने के तमाम प्रयासों को धता बता दिया, तब हमारे देसी पशुधन को विदेशी धरती पर शानदार पहचान मिल रही है!

पिछली सदी के मध्य में ब्राजील ने भारतीय पशुधन का आयात किया था। ब्राजील गई भारतीय गायों में गुजरात की गिर और कंकरेज नस्ल और आंध्र प्रदेश की ओंगोल नस्ल की गाय शामिल थी। इन गायों को मांस के लिए ब्राजील ले जाया गया था, लेकिन जब ये गायें ब्राजील पहंुचीं, तो वहां लोगों को अहसास हुआ कि इन गायों मे कुछ खास बात है और वे दुग्ध उत्पादन का बेहतर स्रोत हो सकती हैं। भारतीय गायों को अपने यहां के मौसम के अनुरूप पाकर ब्राजील जैसे देशों ने उनकी नस्लों का विकास किया और भारतीय गायों को अपने यहां प्रजनन परियोजनाओं में आदर्श माना। भारतीय पशुपालकों और भारतीय पशु वैज्ञानिकों ने अगर देसी गायों की उपेक्षा नहीं की होती, तो हमारी गायों का इतिहास कुछ और होता। तब हमारी पवित्र गायों की सचमुच पूजा हो रही होती। हमारी गायें सड़कों पर लाचार खुले में घूमती न दिखतीं।

अगर भारत ने विदेशी जहरीली नस्लों के साथ क्रॉस ब्रिडिंग की बजाय अपनी ही गायों के विकास पर ध्यान दिया होता, तो हमारी गायें न केवल आर्थिक रूप से व्यावहारिक साबित होतीं, बल्कि हमारे यहां खेती और फसलों की स्थिति भी व्यावहारिक और लाभदायक होती। मरूभूमि के अत्यंत कठिन माहौल में रहने मे सक्षम राजस्थान में पाई जाने वाली थारपारकर जैसी नस्ल की शक्तिशाली गायें उपेक्षित न होतीं। आज दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए आयातित नस्लों पर विश्वास करने से ज्यादा विनाशकारी और कुछ नहीं हो सकता।

(देविन्दर शर्मा
कृषि व खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ
राजस्थान पत्रिका से साभार)

अनिल आर्य

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लाल चौक पर तिरंगा…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 18, 2011


श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा लहराने से उमर की आपत्ति बेमानी है. घाटी का माहौल ख़राब होने का हौव्वा खड़ा कर वो अपनी नालायकी और नाकारापन ही दर्शा रहे हैं. क्यों नहीं वो खुद आगे आकर कहें कि आओ मैं भी सबके संग लाल चौक पर तिरंगा लहराऊंगा…!!!
अनिल आर्य

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नहीं बनना नेता…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 18, 2011

इस साल गणतंत्र दिवस पर वीरता पुरस्कार से सम्मानित होने वाले बच्चों ने बड़े होकर नेता बनने से साफ इनकार कर दिया….इन बच्चों से पूछा गया था कि बड़े होकर क्या बनना चाहोगे..? उन्होंने डाक्टर बनना चाहा, इंजिनियर बनना चाहा,वकील बनना चाहा, पत्रकार बनना चाहा पर नेता नहीं…जय हो..!!!
अनिल आर्य

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मज़हब बदलने से पुरखे नहीं बदलते….सो अपने पुरखों की जय बोलने में गुरेज़ कैसा….!!!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 15, 2011


मज़हब बदलने से पुरखे नहीं बदलते….सो अपने पुरखों की जय बोलने में गुरेज़ कैसा….!!!
दरअसल, मेरे एक मुस्लिम मित्र हैं. बीते सप्ताह यह बात उन्होंने मुझे कही. सन्दर्भ था सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मसले के जाने का.मुझे उनकी बात में दम लगा. कहीं भी किसी कोण से क्या आपको लगता है कि वो गलत कह रहे हैं ?क्या आपको लगता है कि यह साम्प्रदायिक कथन है?कम से कम न तो उन मुस्लिम मित्र को लगा न ही मुझे. उनका मानना है कि भारत में इस्लाम कुछ सौ साल पहले ही आया. उससे पहले यहाँ ना तो कोई इस्लाम को जानता था और ना ही मस्जिद नाम के किसी पूजा स्थल के बारे में.मुगलों के आने और खासतौर पर औरंगजेब द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन के बाद ही यहाँ मुसलमानों की आबादी इस कदर बढी है. लेकिन इससे उनके पुरखे तो नहीं बदले. सवाल यह है कि इस देश में अब रहने वाले मुसलमानों के पुरखे कौन थे ? क्या राम और कृष्ण उनके भी पूर्वज नहीं हैं..? क्या राम और कृष्ण जितने हिन्दुओं के हैं उतने ही उनके भी नहीं हैं …आखिर राम और कृष्ण हैं तो हम सब हिन्दुस्तानियों के पुरखे ही सो पुरखों की जय बोलने में दिक्कत कैसी? भले ही आज हमारे पूजा-पाठ के तौर तरीके बदल गए हों…धर्म ग्रन्थ बदले हों…आस्था और विश्वास बदला हो..कर्मकांड बदला हो पर पुरखे तो नहीं बदले जा सकते इसलिए राम और कृष्ण की जय बोलने से किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए…मैं उन मुस्लिम मित्र की बात से सौ फीसदी सहमत हूँ…पर क्या सच में ऐसा है..नहीं और न ही ऐसी कोई संभावना दिखती है…काश ऐसा हो जाये तो अयोध्या,मथुरा,काशी का झगडा ही नहीं रहेगा…
अनिल आर्य

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वो यादें…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 14, 2011


बीती शाम ही छोटे भाई के साथ जमीन पर बैठकर एक ही थाली में आलू के झोल के साथ रोटी खा रहा था….भाई कहने लगा-“भैया याद आया कैसे गाँव में चूल्हे के सामने बैठकर आलू के झोल के साथ रोटी खाते थे..!!! माँ रोटी बनाती जाती और हम पहली गस्सी (रोटी का पहला ग्रास) के लिए झगड़ते थे कि पहले मैं लूँगा कि पहले मैं लूँगा. जब छोटी बहन भी संग बैठने लगी तो पहली गस्सी कौन उसे पहले खिलायेगा इस पर झगडा होता था.” सच बहुत याद आए वो दिन पर अब कहाँ वो सब..!!! भाई अपने घर, बहन अपने घर और मैं अपने घर. अपने- अपने डब्बों में बंद, सिमटे हुए और माँ- पिता जी कभी इस घर तो कभी उस घर, जब जहां उनका जी चाहे. शायद परिवार यूं ही बढ़ते हैं और संसार यूं ही चलता है…बिना थके, बिना रुके, अनवरत…..

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