Aharbinger's Weblog

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Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 23, 2011

सूरज हो मुकाबिल तो शरारा नहीं टिकता ।
दिन में कोई आकाश में तारा नहीं दिखता ॥

मुश्किल में बदल जाते हैं हर नाते और रिश्ते-
रोने को भी काँधे का सहारा नहीं दिखता ।

ईमान की कीमत न चुका पाओगे मेरे-
वरना सर-ए-बाज़ार यहाँ क्या नहीं बिकता ।

सरकारें बदल बदल के यह देख लिया है-
हालात बदल पाने का चारा नहीं दिखता ।

संसद पे जमा रक्खा है बगुलों ने यूँ कब्ज़ा-
हंसो का सियासत मे गुज़ारा नहीं दिखता ।

– विनय ओझा स्नेहिल

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5 Responses to “”

  1. हर बात सही कही.

  2. आक्रोशपूर्ण अभिव्यक्ति।

  3. अब तो आक्रोश की जरूरत पड़ने लगी है. सुन्दर अभिव्यक्ति.

  4. संसद पे जमा रक्खा है बगुलों ने यूँ कब्ज़ा-हंसो का सियासत मे गुज़ारा नहीं दिखता ..vaah kya baat khee hai.

  5. sanjay jha said

    संसद पे जमा रक्खा है बगुलों ने यूँ कब्ज़ा-हंसो का सियासत मे गुज़ारा नहीं दिखता ..KYA BAAT…KYA BAAT….KYA BAATPRANAM

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