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एक साहब बयानबहादुर और एक सपोर्टबहादुर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 7, 2011

हाल ही में ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद अमेरिका ने दुनिया के सबसे शांतिप्रिय देश पाकिस्तान को धमकी दी कि ज़रूरत पड़ी तो वह पर फिर से ऐसी ही कार्रवाई कर सकता है. इसके बाद तो क्या कहने! कितना भी शांतिप्रिय हो, लेकिन कोई धमकी देगा तो कोई भी क्या करेगा. बहादुरी के मामले में पाकिस्तान का तो वैसे भी कोई जवाब नहीं रहा है. इतिहास गवाह है कि आमने-सामने की लड़ाई में वह कभी किसी से जीता नहीं है और छिपकर हमला करने का कोई मौक़ा उसने छोड़ा नहीं है. आप जानते ही हैं कि सामने आ जाए तो चूहे से आंख मिलाना वे अपनी तहजीब के ख़िलाफ़ समझते हैं और दूर निकल गए शेर पर तो पीछे से ऐसे गुर्राते हैं कि जर्मन शेफर्ड भी शर्मा जाए. तो अब जब अमेरिका उनके मिलिटरी बेस के दायरे में ही ओसामा जी की ज़िंदगी और विश्व समुदाय में उनकी इज़्ज़त की ऐसी-तैसी करके निकल गया तो वो गुर्राए हैं. यह संयोग ही है कि ओबेडिएंसी में टॉप भारत की आर्मी के प्रमुख ने भी ऐन मौक़े पर एक सही, लेकिन मार्मिक बयान दे दिया. वह भी बिना अपने हाइनेस से पूछे और इस बात का भी ज़िक्र किए बग़ैर कि ‘अगर उनकी इजाज़त हो तो’. यह जानते हुए भी कि उनकी इजाज़त के बग़ैर वे कुछ नहीं कर सकते और हाइनेस सिवा सैनिकों की बेकीमती गर्दनें कटाने के उन्हें किसी और बात की इजाज़त नहीं दे सकते. आख़िर हमें घाटी से लेकर पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति और दुनिया भर में अपनी शांतिप्रियता की यह छवि बनाए रखनी है भाई! इतनी आसान बात थोड़े ही है.

ख़ैर, हमारे बयानबहादुर तो अपना बयान दे ही चुके. अब उन्होंने अपने बयान बहादुर को काम पर लगाया है. ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद घंटों चली बैठक के कई घंटे बाद तक उनके आका लोगों की तरफ़ से कोई बयान नहीं आ पाया था. ऐसे क्रूशियल मौक़े पर जिन बयानबहादुर को वहां बयान देने के महान काम पर लगाया गया था, अब उन्हीं का नया बयान आया है. यह बयान थोड़ा अमेरिका और ज़्यादा भारत के मुतल्लिक है. उन्होंने अमेरिका की कार्रवाई को तो अहम कामयाबी बताया है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि अगर किसी दूसरे देश ने ऐसी ज़ुर्रत की तो यह उसकी बड़ी भूल होगी.

क्या बताएं हमें तो अपने उनके बयानबहादुर साहब की बात सुनकर वह वाक़या याद आ गया, जब ट्रेन में सफ़र कर रहे एक सज्जन के बर्थ पर कोई दूसरे सज्जन आ कर बैठ गए. पहले ने दूसरे सज्जन को हटने के लिए कहा तो उन्होंने झापड़ मार दिया. पहले को ग़ुस्सा आ गया. उन्होंने कहा कि ठीक है, हमको मारा तो मारा, हमारी बीवी को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, उन्होंने बीवी को भी मार दिया. उसके बाद उन्होंने कहा कि बीवी को मारा तो मारा, बेटे को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, दूसरे सज्जन ने बेटे को भी मार दिया. बात जमी नहीं, उन्होंने फिर कहा, बेटे को मारा तो मारा, अब बेटी को मार के दिखाओ तो जानें. आख़िरकार दूसरे सज्जन ने बेटी को भी मारने के बाद पूछा, ‘अब बताओ.’ दूसरे सज्जन ने पूरी सज्जनता के साथ कहा, ‘जी अब कुछ नहीं, अब कोई ये कहने लायक तो नहीं रहेगा कि तुम मार खाया.’

मुझे तो लगता है कि इन बयानबहादुर साहब का इरादा भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो. क्योंकि उनके अपने ही पाले हुए ओसामा जी जैसे कई शांतिदूत अब उनके काबू से बाहर हो गए हैं. क्या पता उन्होंने जो बात कही हो, वो उन्हीं के लिए कही हो. कई बार आदमी कहता कुछ और है, लेकिन उसका असल आशय कुछ और होता है. मसलन – कमज़ोर आदमी को जब किसी से मदद मांगनी होती है तो कहता है, ‘प्लीज़ मेरी मदद करें’. बहादुर लोग इसे तहजीब के ख़िलाफ़ मानते हैं. वे यही बात इस तरह कहते हैं, ‘है कोई माई का लाल जो मेरे साथ दो क़दम चलकर दिखाए.’ क्या पता कि उनका मामला भी कुछ ऐसा ही हो.

वैसे भी उनके लिए यह एक मुश्किल दौर है. वैसे वीरोचित शब्दों का प्रयोग करें तो शायद कहना पड़े कि दौर-ए-फ़ख़्र है. बिरादरी के नाम पर जो लोग हर साल इन्हें ईदी भेजा करते थे, उन्होंने अब ग़ुलाम कश्मीर के पीएम साहब को नत्थी वीजा जारी करना शुरू कर दिया है. पता नहीं इसका क्या मतलब होता है. हो न हो, उनकी समझ में आ गया हो कि अब ये दुनिया भर की नज़र में शांति के सबसे बड़े दूत हो गए हैं तो इनसे नत्थी टाइप संबंध रखना ही ज़्यादा मुनासिब है. पर भाई उनकी हिम्मत की दाद तो देनी पड़ेगी. क्या पता, इस हिम्मत के मूल में हमारे उत्तर वाले पड़ोसी का सपोर्ट हो. इस दौर में एक उन्होंने ही तो इनका साथ दिया. अरे वही जिनकी मिसाल शांति और भरोसे के मामले में दुनिया भर में दी जाती है और जिनके बनाए इलेक्ट्रॉनिक आइटम उनके कूटनीतिक वादों-संकल्पों से कई गुना ज़्यादा टिकाऊ समझे जाते हैं.

बहरहाल, हमारे पश्चिम वाले पड़ोसी मुल्क और उनके बयानबहादुर को हमारे उत्तर उत्तर वाले पड़ोसी मुल्क और उनकी सपोर्ट बहादुरी पर पूरा भरोसा है. हम तो उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना अब से कोई 49 साल पहले देख चुके हैं, पर चूंकि वे हमारे और उनके यानी दोनों के साझा पड़ोसी हैं, लिहाजा उन्हें भी देखना चाहिए. हालांकि उनके लिए अभी उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना देखना बाक़ी ही है. आजकल वे दोनों जन अपनी-अपनी नमूनेबाजी की ओर बड़ी तेज़ी से बढ़ रहे हैं और ठीक ही है, दोनों एक-दूसरे की सपोर्ट और बयान या कहें सपोर्ट के बदले अपोर्ट बहादुरी के नमूने जितनी जल्दी देख लें, उतना ही बेहतर रहेगा. जबसे सपोर्टबहादुर ने बयानबहादुर को सपोर्ट करना शुरू किया है, तभी से बयानबहादुर ने सपोर्टबहादुर को अपने यहां से शांतिदूतों का एक्सपोर्ट भी शुरू कर दिया है. ठीक ही है भाई, सपोर्ट के बदले एक्सपोर्ट तो होना ही चाहिए और आप देख ही रहे हैं, सपोर्टबहादुर के कुछ प्रांतों में ओलंपिक से ठीक पहले कितनी ज़बर्दस्त पटाखेबाजी हुई थी. माना जाता है कि यह बयानबहादुर के शांतिदूतों का ही पुण्यप्रताप था. आने वाले दिनों में यह सिलसिला और बढ़ेगा, बढ़ता ही जाएगा. हमें क्या? भाई हमारे तो दोनों पड़ोसी हैं. अपने दोनों पड़ोसियों के प्रति हमारी तो शुभकामनाएं ही हैं.

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6 Responses to “एक साहब बयानबहादुर और एक सपोर्टबहादुर”

  1. इससे अधिक धुलाई भला और क्या हो सकती है।

  2. बहुत रोचक और व्यंग के विष बुझे तीरों सी सजी पोस्ट…आपके लेखन की जितनी प्रशंशा की जाए कम है…क्या लपेट लपेट के मारा है…वाह…शानदार धुलाईनीरज

  3. इन शांतिदूतों की सेवा करने का पुण्यलाभ केवल अमेरिका अर्जित करे तो यह घोर अन्याय है हमारे साथ। यह सेवाधर्म भारत को भी निभाना चाहिए। शुभस्य शीघ्रम्‌।

  4. भारत तो इन शांतिदूतों की सेवा कर ही रहा है सिद्धार्थ भाई! फांसी की सज़ा पाए महान शांतिदूतों को जेलों में बैठाकर और उन्हें चिकन टिक्का खिला-खिला कर हम सेवा ही तो कर रहे हैं उनकी. हर साल लाखों की संख्या में नरबलि हम उन्हें दे रहे हैं, वह भी तो सेवा ही है!

  5. satyendra said

    आप भी बयान बहादुर के प्रचार में जुट गए हैं। लगता है कि उनका रिकॉर्ड उत्तर प्रदेश में बरकरार रहेगा कि वे जिस राज्य के प्रभारी बनते हैं, वहां कांग्रेस सत्ता में आ जाती है…

  6. और जिसमें राज्य के मुख्यमंत्री होते हैं, वहां?

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