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Archive for the ‘आयोजन’ Category

वर्चस्‍वकारी तबका नहीं चाहता है कि हाशिये के लोग मुख्‍यधारा में शामिल हों

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 10, 2011

9 मई को वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में हुए इस आयोजन की रिपोर्ट अमित विश्वास ने ईमेल के ज़रिये भेजी है. बिलकुल वही रपट बिना किसी संपादन के आप तक पहुंचा रहा हूं.

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,

वर्धा में ”हाशिये का समाज” विषय पर आयोजित परिसंवाद में बतौर मुख्‍य

वक्‍ता के रूप में सुप्रसिद्ध आदिवासी साहित्‍यकार व राजस्‍थान के

आई.जी.ऑफ पुलिस पद पर कार्यरत हरिराम मीणा ने कहा कि समाज का

वर्चस्‍वकारी तबका नहीं चाहता है कि हाशिये के लोग मुख्‍यधारा में शामिल

हों।

फादर कामिल बुल्‍के अंतरराष्‍ट्रीय छात्रावास में आयोजित समारोह की

अध्‍यक्षता विवि के राइटर-इन-रेजीडेंस सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार से.रा.

यात्री ने की। इस अवसर पर विवि के राइटर-इन-रेजीडेंस कवि आलोक धन्‍वा,

स्‍त्री अध्‍ययन के विभागाध्‍यक्ष डॉ.शंभु गुप्‍त मंचस्‍थ थे। हरिराम

मीणा ने विमर्श को आगे बढाते हुए कहा कि स्‍त्री, दलित, आदिवासी, अति

पिछड़ा वर्ग, ये 85प्र‍तिशत समाज हाशिये पर हैं, इसी पर प्रजातांत्रिक

प्रणाली टिकी हुई है। दिन-रात मेहनत करने पर भी इन चार वर्गों को मूलभूत

सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। समाज की वर्चस्‍ववादी शक्तियां इनके

व्‍यक्तित्‍व विकास में रोड़े अटकाती हैं।

समाज के प्रभुवर्ग द्वारा हाशिये वर्ग का किस प्रकार से शोषण किया जा रहा

है, का जिक्र करते हुए उन्‍होंने कहा कि आदि मानव व श्रमसाध्‍य मानव को

धकेल कर हाशिये पर किया गया है। ये दलित, दमित, शोषित हैं। दलित, अछूत

वर्ग यह एक समाजशास्‍त्री अवधारणा है, समाज के स्‍तर पर इनका दमन किया

गया है। राजशक्ति के तौर पर भी इनका दमन किया गया है। अर्थशास्‍त्री

दृष्टिकोण से इनके श्रम का शोषण किया जाता रहा है। आज 85 प्रतिशत तबके के

श्रम को मान्‍यता नहीं देना एक वर्चस्‍व बनाए रखने की साजिश है। आखिर कौन

नहीं चाहेगा कि उनका विकास हो, पर विकास किसके लिए हो रहा है, यह एक बड़ा

सवाल है। बांध बनाते वक्‍त जिन्‍हें विस्‍था‍पित किया जाता है, उनके घरों

में बिजली नहीं दी जाती है अपितु बिजली शहरों में भेजी जाती है। झाबुआ

जिले में इंदिरा आवास योजना के तहत मकान बनवा कर दिया गया पर आदिवासियों

ने उन्‍हें तोड़ दिया क्‍योंकि वे यह मानकर चलते हैं कि मकान के बहाने

कहीं उनके जमीन को सरकार हड़प न लें। जंगल में ही रखकर आदिवासी संस्‍कृति

को सुरक्षित रखनेवाले लोगों से य‍ह अवश्‍य पूछा जाना चाहिए कि आपका समाज

चांद पर जाएगा और मूल समाज को जंगलों में ही छोड़ दिया जाएगा? क्‍या

उन्‍हें सिर्फ 26 जनवरी के झांकियों के लिए इस्‍तेमाल किया जाता रहेगा ?

विकास बनाम आदिवासी संस्‍कृति का रक्षण करना है तो इन्‍हें परिधि से

केंद्र में लाना होगा, उन्‍हें विश्‍वास में लेना होगा। नक्‍सलवाद/माओवाद

पर चर्चा करते हुए उन्‍होंने बताया कि आखिर बेकसूर आदिवासियों को क्‍यों

मारा जा रहा है। आदिवासियों को मारनेवाले तथाकथित सभ्‍य समाज के लोगों को

पहले यह साबित करना होगा कि ये मनुष्‍य नहीं है। शोषणकारी सत्तासीन वर्ग

उन्‍हें दैत्‍य, दानव, असुर, राक्षस करार देते हुए पहले सिद्धांत गढता है

फिर उन्‍हें आतंकवादी करार कर उन्‍हें मारने का लाइसेंस हासिल कर लेता

है।

भूमंडलीकरण पर प्रकाश डालते हुए हरिराम मीणा ने कहा कि वैश्‍वीकरण,

उदारीकरण, निजीकरण का नारा आज कौन दे रहा है \ अमेरिका लादेन को पकड़ने

के लिए एयरस्‍पेस नियम का उलंघन करता है तो कोई बात नहीं, यही कोई और देश

करेगा तो यह एक बहुत बड़ी घटना के रूप में पेश किया जाएगा। वैश्‍वीकरण के

संदर्भ में चालाक, चतुर, टेक्‍नोक्रेट जानते हैं कि कैसे आम इंसान को

उपभोक्‍ता समाज तब्‍दील किया जा सकता है। पूंजी, बाजार और विज्ञापन इसके

वाहक हैं और इसका नायक अमेरिका है। आज मल्‍टीनेशनल्‍स के आधिपत्‍य में

हाशिये और भी शोषित होते जा रहे हैं। एक जिम्‍मेदार नागरिक के रूप में

स्‍त्री, दलित, दमित, शोषित की पहचान करनी पड़ेगी। आदिवासियों, दलित,

अतिपिछड़े वर्ग को अपने अधिकारों के लिए एकजुट होना पडे़गा तभी ये सब

मुख्‍यधारा में आ सकेंगे वर्ना प्रभु वर्ग हाशिये से भी धकेलते रहेगा।

अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में से.रा.यात्री ने कहा कि हमें आखिरी पायदान के

व्‍यक्ति को पहले पायदान पर लाने की प्रयास करने की जरूरत है।

प्रस्‍ताविक वक्‍तव्‍य में डॉ.शंभु गुप्‍त ने हाशिये के समाज को

मुख्‍यधारा में लाने के लिए विविध प्रसंगों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर

डॉ.सुनील कुमार ‘सुमन’, राकेश मिश्र, अखिलेश दीक्षित, शिवप्रिय समेत कई

प्राध्‍यापकों-शोधार्थियों आदि ने भी चर्चा में भाग लेकर बहस को

विचारोत्‍तेजक बनाया।

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यात्रा वृत्तांत भर नहीं है पूश्किन के देश में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 18, 2010

महेश दर्पण की पुस्तक ‘पूश्किन के देस में’ ने मुझे 60 साल पीछे पहुंचा दिया है। चेखव को मैंने आगरा में पढऩा शुरू किया था। कोलकता की नैशनल लायब्रेरी में भी मैं चेखव के पत्र पढ़ा करता था। इस पुस्तक में एक पूरी दुनिया है जो हमें नॉस्टेल्जिक बनाती है। यह विचार हंस के संपादक और वरिष्ठï कथाकार राजेन्द्र यादव ने सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पूश्किन के देस में पर आधारित संगोष्ठी में व्यक्त किए। इसे रशियन सेंटर और परिचय साहित्य परिषद ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था।
श्री यादव ने कहा : सन् 1990 में मैं भी रूस गया था। कुछ स्मृतियां मेरे पास भी थीं। इसे पढक़र वे और सघन हुई हैं। एक कुशल यात्रा लेखक की तरह महेश दर्पण ने बदले हुए रूस को देखते हुए भी बताया है कि अब भी रूस में बहुत कुछ बाकी है।

एक कुशल यात्रा लेखक की तरह महेश दर्पण ने बदले हुए रूस को देखते हुए भी बताया है कि अब भी रूस में बहुत कुछ बाकी है।

यह पुस्तक मेरे स्मृति कोश में बनी रहेगी। ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं, जैसे काफी पहले एक किताब प्रभाकर द्विवेदी ने लिखी थी-‘पार उतर कहं जइहों’।
प्रारंभ में कवि-कथाकार उर्मिल सत्यभूषण ने कहा : यह पुस्तक हमें रूसी समाज, साहित्य और संस्कृति से परिचित कराते हुए ऐसी सैर कराती है कि एक-एक दृश्य आंखों में बस जाता है। अब तक हम यहां रूस के जिन साहित्यकारों के बारे में चर्चा करते रहे हैं, उनके अंतरंग जगत से महेश जी ने हमें परिचित कराया है। 
महेश दर्पण को फूल भेंट करते हुए रशियन सेंटर की ओर से येलेना श्टापकिना ने अंग्रेजी में कहा कि एक भारतीय लेखक की यह किताब रूसी समाज के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करती है। इस पठनीय पुस्तक में लेखक ने कई जानकारियां ऐसी दी हैं जो बहुतेरे रूसियों को भी नहीं होंगी। 
कथन के संपादक और वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय ने कहा कि महेश दर्पण ने इस पुस्तक के माध्यम से एक नई विधा ही विकसित की है। यह एक यात्रा वृतांत भर नहीं है। इसे आप एक उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं। रचनाकारों के म्यूजियमों के साथ ही महेश दर्पण की नजर सोवियत काल के बाद के बदलाव की ओर भी गई है।

यह एक यात्रा वृतांत भर नहीं है। इसे आप एक उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं। रचनाकारों के म्यूजियमों के साथ ही महेश दर्पण की नजर सोवियत काल के बाद के बदलाव की ओर भी गई है।

अनायास ही उस समय से इस समय की तुलना भी होती चली गई है। श्रमशील और स्नेही साहित्यकर्मी तो महेश हैं ही, उनका जिज्ञासु मन भी इस पुस्तक में सामने आया है। मुझे ही नहीं, मेरे पूरे परिवार को यह पुस्तक अच्छी लगी। 
वरिष्ठ उपन्यासकार चित्रा मुद्गल ने कहा : मैं महेश जी की कहानियों की तो प्रशंसिका तो हूं ही, यह पुस्तक मुझे विशेष रूप से पठनीय लगी। रूसी समाज को इस पुस्तक में महेश ने एक कथाकार समाजशास्त्री की तरह देखा है। यह काम इससे पहले बहुत कम हुआ है। रूसी समाज में स्त्री की स्थिति और भूमिका को उन्होंने बखूबी रेखांकित किया है। बाजार के दबाव और प्रभाव के  बीच टूटते-बिखरते रूसी समाज को लेखक ने खूब चीन्हा है। यह पुस्तक उपन्यास की तरह पढ़ी जा सकती है। बेगड़ जी की तरह महेश ने यह किताब डूबकर लिखी है। रूस के शहरों और गांवों का यहां प्रामाणिक विवरण है जो हम लोगों के लिए बेहद पठनीय बन पड़ा है। 
सर्वनाम के संस्थापक संपादक और वरिष्ठï कवि-कथाकार विष्णु चंद्र शर्मा ने कहा : महेश मूलत: परिवार की संवेदना को बचाने वाले कथाकार हैं। इस किताब में भी उनका यह रूप देखने को मिलता है। उन्होंने बदलते और बदले रूस के साथ सोवियत काल की तुलना भी की है। वह रूसी साहित्य पढ़े हुए हैं। वहां के म्यूजियम और जीवन को देखकर उन्होंने ऐसी चित्रमय भाषा में विवरण दिया है कि कोई अच्छा फिल्मकार उस पर फिल्म भी बना सकता है। अनिल जनविजय के दोनों परिवारों को आत्मीय नजर से देखा है। यह पुस्तक बताती है कि अभी बाजार के बावजूद सब कुछ नष्टï नहीं हो गया है। आजादी मिलने के बाद हिन्दी में यह अपने तरह की पहली पुस्तक है जिससे जाने हुए लोग भी बहुत कुछ जान सकते हैं।
प्रारंभ में कथाकार महेश दर्पण ने कहा : जो कुछ मुझे कहना था, वह तो मैं इस पुस्तक में ही कह चुका हूं। जैसा मैंने इस यात्रा के दौरा महसूस किया, वह वैसा का वैसा लिख दिया। अब कहना सिर्फ यह है कि रूसी समाज से उसकी तमाम खराबियों के बावजूद, हम अभी बहुत कुछ सीख सकते हैं। विशेषकर साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण के बारे में। यह सच है कि अनिल जनविजय का इस यात्रा में साथ मेरे लिए एक बड़ा संबल रहा है। दुभाषिए का इंतजाम न होता तो बहुत कुछ ऐसा छूट ही जाता जिसे मैं जानना चाहता था। 
इस संगोष्ठी में हरिपाल त्यागी, नरेन्द्र नागदेव,  प्रदीप पंत, सुरेश उनियाल, सुरेश सलिल, त्रिनेत्र जोशी, तेजेन्द्र शर्मा, मृणालिनी, लक्ष्मीशंकर वाजपेई, भगवानदास मोरवाल, हरीश जोशी, केवल गोस्वामी, रामकुमार कृषक, योगेन्द्र आहूजा, वीरेन्द्र सक्सेना, रूपसिंह चंदेल, प्रेम जनमेजय, हीरालाल नागर, चारु तिवारी,  राधेश्याम तिवारी, अशोक मिश्र, प्रताप सिंह, क्षितिज शर्मा और सत सोनी सहित अनेक रचनाकार और साहित्य रसिक मौजूद थे।
प्रस्तुति : दीप गंभीर

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चेहरा-विहीन कवि नहीं हैं दिविक रमेश : केदार

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 8, 2009


कविता संग्रह ‘गेहूं घर आया है’ का दिल्ली में लोकार्पण
‘आधुनिक हिंदी कविता में दिविक रमेश का एक पृथक चेहरा है. यह चेहरा-विहीन कवि नहीं है बल्कि भीड़ में भी पहचाना जाने वाला कवि है. यह संकलन परिपक्व कवि का परिपक्व संकलन है और इसमें कम से कम 15-20 ऐसी कविताएँ हैं जिनसे हिंदी कविता समृद्ध होती है. इनकी कविताओं का हरियाणवी रंग एकदम अपना और विशिष्ट है. शमशेर और त्रिलोचन पर लिखी कविताएं विलक्षण हैं. दिविक रमेश मेरे आत्मीय और पसन्द के कवि हैं.’ ये उद्गार प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने किताबघर प्रकाशन से सद्य: प्रकाशित कवि दिविक रमेश के कविता-संग्रह गेहूँ घर आया है के लोकार्पण के अवसर पर कहे। विशिष्ट अतिथि केदारनाथ सिंह ने इस संग्रह को रेखांकित करने और याद करने योग्य माना. कविताओं की भाषा को महत्वपूर्ण मानते हुए उन्होंने कहा कि दिविक ने कितने ही ऐसे शब्द हिंदी को दिए हैं जो हिंदी में पहली बार प्रयोग हुए हैं. उन्होंने अपनी बहुत ही प्रिय कविताओं में से ‘पंख’ और ‘पुण्य के काम आए’ का पाठ भी किया.
इस संग्रह का लोकर्पण प्रोफेसर नामवर सिंह, प्रोफेसर केदारनाथ सिंह और प्रोफेसर निर्मला जैन ने समवेत रूप से किया. कार्यक्रम की मुख्य अतिथि निर्मला जैन को यह संग्रह विविधता से भरपूर लगा और स्थानीयता के सहज पुट के कारण विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण भी लगा. उन्होंने माना कि इस महत्वपूर्ण कवि की ओर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उतना नहीं दिया गया. स्वयं मैं नहीं दे पाई थी. उन्होंने ध्यान दिलाया कि केवल ‘गेहूँ घर आया है’ ही में नहीं, बल्कि जगह-जगह इनकी कविताओं में ‘दाने’ आए हैं. दिविक रमेश के पास एक सार्थक और सकारात्मक दृश्टि है साथ ही वे सहज मानुश से जुड़े हैं. ऐसा नहीं लगता कि इस संग्रह में उनकी आरंभिक कविताएँ भी हैं. सभी कविताएँ एक प्रौढ़ कवि की सक्षम कविताएं हैं. एक ऊँचा स्तर है. न यहाँ तिकड़म है और न ही कोई पेच. दिविक रमेश किसी बिन्दू पर ठहरे नहीं बल्कि निरन्तर परिपक्वता की ओर बढ़ते चले गए हैं.

कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रोफेसर नामवर सिंह ने कहा कि वे किसी बात को दोहराना नहीं चाहते और उन्हें कवि केदारनाथ सिंह के विचार सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगे. उन्होंने यह भी कहा कि वे केदारनाथ सिंह के मत पर हस्ताक्षर करते हैं. उनके अनुसार एक कवि की दूसरे कवि को जो प्रशसा मिली है उससे बड़ी बात और क्या हो सकती है. संग्रह की ‘तीसरा हाथ’ कविता का पाठ करने के बाद उन्होंने कहा कि दिविक की ऐसी कविताएँ उसकी और हिन्दी कविता की ताकत है और यही दिविक रमेष है. ऐसी कविता दिविक रमेष ही लिख सकते थे और दूसरा कोई नहीं. इनकी शैली अनूठी है. उन्होंने माना कि इस संग्रह की ओर अवश्य ध्यान जाएगा. कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रेम जनमेजय ने आरंभ में दिविक रमेश को उनके जन्मदिन की पूर्व-संध्या पर सबकी ओर से बधाई दी. उन्होंने कहा कि दिविक उन्हें इसलिए पसंद हैं कि उनमें विसंगतियों को इंगित करने और उन पर सार्थक प्रहार करने की ताकत है. उनकी कविताओं में घर-पड़ोस के चित्र, गाँव की गंध है तो शहर की विसंगतियां भी हैं. दिविक की सोच व्यापक है. अपने आलेख पाठ में दिनेश मिश्र ने कहा कि जिन राहों से दिविक गुजरे हैं वो अटपटी हैं. कवि कहीं भी उपदेशक के मुद्रा में नहीं दिखाई देता है. प्रोफेसर गोपेश्वर ने इन कविताओं को बहुत ही प्रभावषाली मानते हुए कहा कि ये कविताएं खुलती हुई और संबोधित करती हुई हैं. अकेलेपन या एकान्त की नहीं हैं.
दिविक रमेश ने काव्य-भाषा में एक नई परंपरा डाली है. उसे रेखांकित किया जाना चाहिए. उन्हें ये कविताएँ बहुत ही अलग और अनूठी लगीं. उन्होंने इस बात का अफसोस जाहिर किया कि इस समर्थ एवं महत्वपूर्ण कवि की ओर इसलिए भी अपेक्षित ध्यान नहीं गया क्योंकि साहित्य जगत के उठाने-गिराने वाले मान्य आलोचकों ने इनकी ओर ध्यान नहीं दिया था. सार्वजनिक जीवन की ये कविताएँ निष्चित रूप से अपना प्रभाव छोड़ती हैं. उन्होंने अपनी अत्यंत प्रिय कविताओं में से एक ‘पंख से लिखा खत’ का पाठ भी किया.
प्रताप सहगल के अनुसार दिविक कभी पिछलग्गू कवि नहीं रहा और उनके काव्य ने निरंतर ‘ग्रो’ किया है. ये कविताएँ बहुत ही सशक्त हैं. प्रणव कुमार बंदोपाध्याय ने संग्रह की तारीफ करते हुए बताया कि वे इन कविताओं को कम से कम 15 बार पढ़ चुके हैं. उनके अनुसार इन कविताओं में समय के संक्रमण का विस्तार मिलता है. संग्रह को उन्होंने हिन्दी कविता की उपलब्धि माना. यह आयोजन भारतीय सांस्कृति संबंध परिषद और व्यंग्ययात्रा के संयुक्त तत्वावधान में आजाद भवन के हॉल में सम्पन्न हुआ. इस अवसर पर अनेक सुप्रसिद्ध साहित्यकार और गणमान्य पाठक उपस्थित थे. प्रारंभ में भारतीय सांस्कृति संबंध परिषद के अजय गुप्ता ने सबका स्वागत किया.

(व्यंग्य-यात्रा के संपादक प्रेम जनमेजय से मिली सूचनानुसार)

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