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Archive for the ‘कविता’ Category

कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 31, 2011

कितनी बार हुई हैं
जाने ये बातें

आने-जाने वाली.
विनिमय के
व्यवहारों में कुछ
खोने-पाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

जल ज़मीन जंगल
का बटना.
हाथों में
सूरज-मंगल
का अटना.
बांधी जाए
प्यार से जिसमें
सारी दुनिया
ऐसी इक
रस्सी का बटना.

सभी दायरे
तोड़-फोड़ कर
जो सबको छाया दे-
बिन लागत की कोशिश
इक ऐसा छप्पर छाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

हर संसाधन पर
कुछ
घर हैं काबिज.
बाक़ी आबादी
केवल
संकट से आजिज.
धरती के
हर टुकड़े का सच
वे ही लूट रहे हैं
जिन्हें बनाया हाफ़िज.

है तो हक़ हर हाथ में
लेकिन केवल ठप्पे भर
लोकतंत्र की शर्तें
सबके मन भरमाने वाली.
इसीलिए, कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

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कलियां भी आने दो

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 10, 2010

रतन

कांटे हैं दामन में मेरे
कुछ कलियां भी आने दो
मुझसे ऐसी रंजिश क्यों है
रंगरलियां भी आने दो

सूखे पेड़ मुझे क्यों देते
जिनसे कोई आस नहीं
कम दो पर हरियाला पत्ता
और डलियां भी आने दो

तेरी खातिर भटका हूं मैं
अब तक संगी राहों पर
जीवन के कुछ ही पल तुम
अपनी गलियां भी आने दो

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तस्वीर मेरी देखना

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 3, 2010

रतन

एक दिन होगा बुलंद
तकदीर मेरी देखना
सारे जग में फैलेगी
तासीर मेरी देखना

किस तरह मैंने किया है
दम निकलते वक्त याद
थी जो हाथों में पड़ी
जंजीर मेरी देखना

तुम न मानो मेरा तन-मन
धन तुम्हारे नाम है
छोड़ कर हूं जा रहा
जागीर मेरी देखना

इस जहां में तो नहीं
पर उस जगह मिल जाएंगे
जो बुना है ख्वाब की
ताबीर मेरी देखना

आज मुझसे दूर हो
इक वक्त आएगा रतन
जब गुजर जाएंगे हम
तस्वीर मेरी देखना

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बिछाए बैठे हैं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 1, 2010

रतन
आएंगे वो जिस रस्ते से
पलक बिछाए बैठे हैं
मैं क्या तकता राह, शजर भी
फूल खिलाए बैठे हैं

मुद्दत हो गई मिलकर बिछड़े
माजी को करता हूं याद
दिल के ख़ाली पन्नों पर
तस्वीर लगाए बैठे हैं

मौला मेरे भगवन मेरे
दिलबर तुम दिलदार भी तुम
इक दिन मिलना होगा यह
उम्मीद लगाए बैठे हैं

बारिश आई बूंदें लाई
आया यादों का मौसम
देखो फिर बरसा सावन
हम झूला लगाए बैठे हैं

जब वो सपनों में आते हैं
आकर बहुत सताते हैं
है यह भी मंजूर हमें
क्यों दर्द चुराए बैठे हैं

मिल नहीं सकता उनसे मैं अब
पर क्यों ऐसा लगता है
कल ही अपनी बात हुई है
दिल उलझाए बैठे हैं

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हैप्पी मदर्स दे के अवसर पर !

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 9, 2010

आज के आधुनिक परिवेश में माँ की स्थिति को उकेरती मेरी पसंद की स्वरचित कविता

मैं और वो ?

मुझे एसी में
नींद आती है ,
उसके पास टेबल फेन है
जो आवाज़ करता है ।

मैं ऊंचे दाम के
जूते पहनता हूँ ,
उसके पास
बरसाती चप्पल है ।

मैं हँसता हूँ
वो रो देती है,
मैं रोता हूँ
वो फूट पड़ती है !

मैं, मैं हूँ
वो मेरी माँ है ।

[] राकेशसोहम

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क्यों जाने दिया उसे?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 17, 2010

रतन

1
कोलाहल का तांडव
खंडित है नीरव
भीड़ चहुंओर
भागा-भागी का दौर
सब हैं अपने काम में मगन
फुरसत नहीं किसी को
पल भर की
सुबह हुई शाम हुई
जिंदगी रोज तमाम हुई
2
जहां थी कोलाहल की आंधी
सब कुछ पड़ा है आज मंद
खामोश दरो-दीवारें
बे-आवाज जंजीरें
न घुंघरू की छम छम
न तबले की थाप
न सारंगी की सुरीली धुनें
न हारमोनियम का तान
न कोई कद्रदान
न किसी का अलाप
न रिक्शे का आना
न ठेली का जाना
न कुत्ता, न कमीना
गली है सूना-सूना
बस आती है आवाज
सायरन की अक्सर
तो होती है कानाफूसी
घर ही घर में
न आवाज बाहर को जाती किसी की
कि आई पुलिस है
मोहल्ले में अपने
3
राम-रहीम
दो दिल हैं मगर
एक जां हैं वे बचपन से
जब से वे स्कूल गए
अब हैं अधेड़ मगर
उनकी दोस्ती है पाक, जवां
आज भी, अब भी
एक-दूसरे से मिलना होता है रोज
न मिले, एक दिन
तो लगता है ऐसे
कि गोया मिले हैं नहीं हम बरस से
4
है एक दिन यह भी
कि सूनी हैं सड़कें
लगी है शहर में
पहरेदारी कफ्र्यू की
गुजरता है दिल पर
नहीं जाने क्या-क्या
कि मिलना हो कैसे हमारा-तुम्हारा
मोहल्ला है दूर
बंटा हुआ, जातियों में
राम का अपना, रहीम का अपना
दोनों के मोहल्ले वाले
एक दूसरे के दुश्मन
मारने मरने की बात
होती है अक्सर
5
एक दिन कुछ पल के लिए
शाम को मिलती है छूट
थोड़ी देर के लिए क‌र्फ्यू में
रहीम आ जाता है मौका पाकर
बचते बचाते राम से मिलने उसके घर
राम खुश हुआ
रहीम को सामने देख
गले मिल दोनों ने दिल से
किया ईश्वर का शुक्रिया
राहत की सांस ली
कि चलो हम मिले तो सही
फिर दोनों ने कोसा उनको
जिन्होंने बिगाड़ी है शहर की तस्वीर
भरे हैं जिन्होंने
लोगों के मन में नफरत के बीज
अल्लाह-ईश्वर को बांटने वाले
वे सैयाद अपने दामन को काटकर तो देखें
उनका लहू भी लाल ही है
ठीक वैसा ही, जैसा हमारा
क्या फर्क है उनमें और मुझमें?
6
यही सोचा दोनों ने अपने अपने मन में
तभी आई शोर की बारिश
खत्म हुई शांति
वजह बना एक बलवा
और फिर मच गया हल्ला
जय श्री राम, अल्ला हो अकबर
मरने की चीख
मारने की पुकार
आह, मर गया, मार डाला का शोर
इस पर नहीं था किसी का जोर
7
तभी दरवाजे पर हुई आहट
सांसें थम गई, लगा कि दम गया
राम-रहीम थे सकते में
जाने क्या होगा अब?
तभी हुई दरवाजे पर दस्तक
किसी ने हाथ से दी थपकी
बोला, दरवाजा खोलो राम भाई
क्यों? आवाज आई अंदर से
मुझे जरूरी काम है
मैं अभी किसी से नहीं मिल सकता
आप भी जाइए, बाद में आइएगा
तभी दूसरी आवाज आई
तुम हिंदू हो या मुसलमान?
राम को समझते देर न लगी
उसने रहीम को गले लगाया
पीठ पर हाथ फेरा और
ईश्वर को याद किया, कहा,
आप जैसा मुझे जानते हैं
मैं वही हूं, और कुछ न समझें
पर दरवाजा अभी नहीं खुलेगा
तीसरी आवाज आई
हम दरवाजा तोड़ दें तो?
तुम्हारे रहीम का सिर मरोड़ दें तो?
देखो, उन्होंने हमें किस तरह मारा है?
तुम उन्हें घर में छिपाए बैठे हो?
8
भगवान की कसम है, मेरे पास कोई नहीं
रहीम अपने घर में है
फिर दरवाजा खोलते क्यों नहीं?
मैं अभी ऐसा नहीं कर सकता
चलती रही बातों की झड़ी
बातचीत की हुई लंबी कड़ी
लेकिन राम ने वही किया
जो सोचा था
वह वहीं पर ठहरा रहा
वे चिल्लाकर कुछ समय बाद जाने लगे
अंदर दोनों मुस्कुराने लगे
गले मिले और खुशी के आंसू बहाने लगे
9
कुछ पल बीता आंसुओं के सैलाब के साथ
दोनों ने न कोई बात की
न कोई सरगोशी हुई
दिल बोझिल था
पर मन में थी खुशी
कि हमने खुदा जैसा दोस्त पाया है
बिल्कुल राम जैसा
था यही गुमान मन में
इसी के साथ कुछ पल गुजरा
शाम हुई, रात की चादर बिछने लगी
रात की ठंडक शहर को लीलने लगी
10
यह हुआ अहसास रहीम को
कि इस रात की ओट में मैं
जा सकता हूं घर को
सोचता यह भी मन था
कि यदि आज राम न होता
तो क्या होता?
मैं क्या होता?
फिर उसने कह दी घर जाने की बात
राम ने कहा, कहां?
जरा सोच, यदि वे मिल गए तो?
क्या होगा तेरा?
रहीम ने चुपचाप राम की शक्ल देखी
वह सोचने लगा मन में
मेरी वजह से तू कितनी परेशानी झेलेगा?
क्यों दुख मेरे तू लेगा?
कहा राम ने, नहीं
हम यहीं रहेंगे, भूखे, रूखे, सूखे
जब तक शहर शांत नहीं हो जाता
लोग जब तक होश में नहीं आ जाते
लेकिन वहां की भी तो सोच
जहां से मैं आया हूं?
घर के लोग क्या-क्या सोचते होंगे?
मन ही मन वे क्या बुनते होंगे?
उनके मन की हालत सोच
मेरे भाई मेरे दोस्त
11
निकला रहीम बुझे मन से
राम का भी कलेजा मुंह को आया
एक को घर की चिंता थी
दूसरे को मानवीय पक्ष सता रहा था
क्या करें, क्या न करें
तभी रहीम ने रूंधे गले से
आंख में आंसू लिए
चला थके कदमों से
बुझी उम्मीदों के साथ
राम ने भी विदा किया
अश्रुधारा के साथ रहीम को
दरवाजे को धीरे से खोल
देखा बाहर चारों ओर
फिर दी रहीम को चादर
ओढ़ ले इसे
निकल पड़ा मुंह ढंक कर वो
अपने घर की ओर
12
विदा हुआ जब दोस्त दोस्त से
चैन गया और नींद गई
रात गुजारी पलकों में
डर और खौफ के साये में
दोस्त हमारा घर पहुंचा या नहीं
क्या हुआ उसका?
13
सुबह हुई, तो डर की चादर
रात की चादर के संग विदा हो गई
सुबह चमकीली थी
उजाले में अलग आभा थी
जो खुशी भी दे रही थी लेकिन डर भी
क्यों आई है आज की सुबह ऐसी सुहानी
निराली और विकराली?
तभी आया अखबार वाला
खिड़की से दिए दो रुपये और लिया अखबार
टिक कर कुर्सी पर बैठा
फिर देखा अखबार का पहला पन्ना
यह क्या? निकला मुंह से
हठात राम का मन आहत हुआ
उसकी आंख में थी एक तस्वीर
वैसी ही दाढ़ी, वैसा ही कुर्ता-पायजामा, बिखड़े बाल
उसी चादर में लिपटा रहीम
मगर एक अलग रंग भी था
इन सबके साथ उसके पूरे शरीर पर
जो हमारे जैसा ही था सूर्ख, लाल-लाल
वह आंखों की गहराई में समा गया
अंदर तक, अंतर तक
एक बार फिर बहे आंसू
फिर उसे कोसा
क्यों गया वह?
फिर खुद को कोसा
क्यों जाने दिया?
आखिर क्यों जाने दिया उसे?

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क्यों मुस्काते हो..?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 16, 2010

रतन

 जब मैं सदमे में जीता हूं
तब तुम क्यों मुस्काते हो?
मंजर है नहीं आज सुहाना
क्यों तुम गीत सुनाते हो?
पाया नसीबा हमने ऐसा
अक्सर तुम कहते मुझसे
मैं तो हूं पछताने वाला
अब तुम क्यों पछताते हो?
जब तक था मन साथ तुम्हारे
तुमने दूरी रखी कायम
अब हारा हूं थका हुआ हूं
तो क्यों कर तड़पाते हो?
तन खोया मन भूल चुका है
वो सपनों के घर-आंगन
रातों में ख्वाबों में क्यों तुम
आकर मुझे सताते हो?
मेरी अपनी राम कहानी
है मैं उस पर रोता हूं
अब क्या पाओगे मुझसे तुम
नाहक अश्क बहाते हो?
बुझी हुई तकदीर है मेरी
अब न नसीबा जागेगा
जान चुके हो रोज रोज क्यों
आकर शमां जलाते हो?

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तुम कहां गए

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 13, 2010

रतन
बतलाओ तुम कहां गए

बरसों बाद भी तेरी यादें
आती हैं नित शाम-सवेरे
जब आती है सुबह सुहानी
जब देते दस्तक अंधेरे

कोना कोना देखा करता
नजर नहीं तुम आते हो
मन में बसते हो लेकिन क्यों
अंखियों से छिप जाते हो

बतलाओ तुम कहां गए

हम जाते हैं खेत गली हर
हम जाते हैं नदी किनारे
उम्मीदें होती हैं जहां भी
जाते हैं हर चौक चौबारे

पानी में कंकड़ फेंको तो
हलचल जैसे होती है
मुझे देखकर अब यह दुनिया
पगला पगला कहती है

बतलाओ तुम कहां गए

तुम मत आना हम आएंगे
छिपकर तुमसे मिलने को
जानेंगे नहीं दुनिया वाले
मेरे इस इक सपने को

बोझिल ना कर उम्मीदों को
मन को अपने समझाओ
माना होगी मजबूरी कुछ
आ न सको तो बतलाओ

बतलाओ तुम कहां गए

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जिंदगी पा गया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 24, 2010

रतन

तुझे पाके मैं हर खुशी पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

बहारों के सपने भी आने लगे
खिजां दूर पलकों से जाने लगे
तू है साथ हर सादगी पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

हुए साथ भंवरे भी गाने लगे
थे वीराने जो मुस्कुराने लगे
था सूना जो दिल आशिकी पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

हुए साथ तुम आई रानाइयां
अब बजने लगीं देखो शहनाइयां
जो तुम आए तो रोशनी पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

जमीं आसमां देखो मिलने लगे
मोहब्बत के जब फूल खिलने लगे
था मुरझाया गुलशन कली पा गया
ज्यों सौ साल की जिंदगी पा गया

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अहसास

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 13, 2010

रतन
क्या यही अहसास है?
आप थे जब तक साथ मेरे
एक संबल था और बल था
और था मां का भी आंचल आपसे
हमने पाई तमाम खुशियां
साथ इस अहसास के
कि पापा हैं साथ हमारे
एक इस अहसास से
दमदार हो जाते थे हम
सारी मुश्किल पल में आसान
होती थीं यह जानकर
कि हैं पापा साथ मेरे
क्या यही अहसास है?
तुम नहीं हो तो मुझे भी
घर की चिंता है नहीं
ख्वाब जितने गांव के थे
वे सभी गुम हो गए
खो गया हूं नितांत अपने आप में
फिर भी जाने बात क्या है आप में
भूलकर भी याद अक्सर आते हो
जब कभी मैं मुश्किलों में
खुद को पाता हूं घिरा
याद करके तुमको हल मिल जाता है
रूह को भी शांति मिल जाती है
मैं तुम्हारे साथ खुद को पाता हूं
क्या यही अहसास है?
दूर होकर आपसे है कुछ कमाया
खूब शोहरत पाई है
काश, आप भी इसे महसूस करते
दोगुनी होती खुशी
आपको अहसास होता और मुझे भी
पर आप हो क्षितिज के उस पार
मैं इस पार अधर में भी
मिलना होगा बाद मुद्दत
एक दिन और एक पल
शायद हो भी नहीं
फिर भी
है यही उम्मीद जाने क्यों मुझे
क्या यही अहसास है?

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