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Archive for the ‘ग़ज़ल’ Category

नई शाम

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 2, 2010

नव वर्ष की शाम में डूबे
कितने युवा जाम में डूबे ।
जो गुंडे हैं गरियाये,
मोटर-साइकिल की शान में डूबे ।
प्रेमियों ने तलाशे कोने,
यौवन की उड़ान में डूबे ।
ढलती शाम का दर्द ढो रहे,
प्रार्थना और अज़ान में डूबे ।
जो बहक गये क़दम उनके,
जवानी के उफ़ान में डूबे ।
पार्टी की छवि सुधारने को,
राजनीति और राम में डूबे
[] राकेश ‘सोहम’
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निठारीकरण हो गया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 21, 2009

कर दिया जो वही आचरण हो गया ।

लिख दिया जो वही व्याकरण हो गया ।

गोश्त इन्सान का यूं महकने लगा

जिंदगी का निठारीकरण हो गया ।

क्योंकि घर में ही थीं उसपे नज़रें बुरी

द्रौपदी के वसन का हरण हो गया ।

उस सिया को बहुत प्यार था राम से

पितु प्रतिज्ञा ही टूटी , वरण हो गया ।

‘राढ़ी ‘ वैसे तो कर्ता रहा वाक्य का

वाच्य बदला ही था, मैं करण हो गया ।

कल भगीरथ से गंगा बिलखने लगी

तेरे पुत्रों से मेरा क्षरण हो गया । ।

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