Aharbinger's Weblog

Just another WordPress.com weblog

Archive for the ‘धर्म’ Category

काशी में एक दिन

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 1, 2010

—हरिशंकर राढ़ी
गेस्ट हाउस में नहा – धोकर लगभग ११ बजे हम काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए चल पड़े। काशी में रिक्शे अभी बहुत चलते हैं, भले ही स्वचालित वाहनों की संखया असीमित होती जा रही हो। रिक्शे की सवारी का अपना अलग आनन्द और महत्त्व है। इधर रिक्शा चला और उधर विचारों की श्रृंखला शुरू हो गई।
काशी यानी वाराणसी अर्थात बाबा विश्वनाथ की नगरी। उत्तर भारत की सांस्कृतिक राजधानी। एक ऐसा विलक्षण शहर जहाँ लोग जीने ही नहीं मरने भी आते हैं। मेरी दृष्टि में यह विश्व का ऐसा इकलौता शहर होगा जहाँ पर मरने का इतना महत्त्व है। इस शहर का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी कि भारतीय संस्कृति। कितना पीछे जाएं ? सतयुग तक का प्रमाण तो हरिश्चंद की कथाओं में ही मिल जाता है। पौराणिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो भोले नाथ की नगरी स्वयं भोलेनाथ ने ही बसाई थी। या तो वे कैलाश पर रहते या फिर काशी में । एक मित्र के मजाक को लें तो यह बाबा भोलेनाथ की शीतकालीन राजधानी थी क्योंकि शीतकाल में तो कैलाश पर रहने लायक ही नहीं होता।
बनारस एक स्थान नहीं, एक संस्कृति का नाम है- ज्ञान की संस्कृति, अध्यात्म की संस्कृति, सभ्यता की संस्कृति, संगीत की संस्कृति, मस्त मौलेपन की संस्कृति और भांग की संस्कृति। सब कुछ एक साथ। आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ करना है तो काशी आते हैं, मंडन मिश्र की काशी और उनकी पत्नी से विवश होते हैं कि परकाया प्रवेश से काम शास्त्र तक की शिक्षा लेनी पड ती है। तथागत को भी काशी आना पड ता है और अशोक महान को बौद्ध धर्म का प्रचार यहीं से शुरू करना पड ता है। सारनाथ यहीं बनता है। गोस्वामी जी अपना अजर- अमर रामचरित मानस यहीं पूरा करते हैं ।कबीर का लहरतारा, रामानन्द का योग, उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की लमही और जय शंकर प्रसाद की कामायनी, सब कुछ तो यहीं काशी में ही है।
अभी प्रसिद्ध अंगरेजी कवि वाल्काट को पढ़ रहा था , उसमें भी बनारस का संदर्भ है। बनारस तो हिन्दू परिवारों की नाम सूची में सम्मिलित रहा है। कितने लोग बनारसी दास की संज्ञा से विभूषित हुए और बनारसी दास चतुर्वेदी को तो हिन्दी साहित्य में कौन नहीं जानता ?बनारस में रहने वाले कई लोगों का तो उपनाम ही बनारसी बाबू हुआ करता था।
यही वह काशी है। साधु- सन्यासी यहां- वहां घूम रहे हैं। राँड -साँड – सन्यासी , इनसे बचे तो सेवै काशी । हमारा रिक्शा इस बीच जाम-जूम से निकलता हुआ विश्वनाथ जी पहुँच जाता है। अभी रिक्शे से ठीक से उतर भी नहीं पाया हूँ और एक एजेण्ट साथ लग जाता है। अपने आप बोले जा रहा है- बाबूजी, साढ़े ११ बज गए हैं और बारह बजे मंदिर बन्द हो जाएगा। लाइन बहुत लम्बी है। आपको बिना लाइन के दर्शन करा दूँगा। जो मर्जी दे दीजिएगा। मैं कुछ भी उत्तर नहीं देता हूँ। मुझे यह भी पता नहीं कि मंदिर कब बन्द होता है! पता नहीं यह पंडा जी सच बोल रहा है या नहीं! साथ में पत्नी और बच्चे हैं , उसे मालूम है कि ऐसी स्थिति में लोग कष्ट नहीं उठा सकते। धूप भी बहुत तेज है । मैं कुछ नहीं बोलता हूँ और वह जानता है कि मौनम स्वीकार लक्षणम्‌।अब वह आगे- आगे हो लेता है और मैं सपरिवार पीछे-पीछे। पतली गली का रास्ता लेता है और मैं समझ जाता हूँ कि यह पीछे की तरफ से ले जाएगा। इसी बीच उसका चेला आ जाता है और वह हमारी बागडोर उसके हाथ में सौंपकर शायद और किसी भक्त की तलाश में निकल जाता है और चेले से कह जाता है कि बाबूजी को ठीक से दर्शन करा देना और जो दें , ले लेना ठकठेना मत करना ।
प्रसाद की एक दूकान पर वह रुकता है । उसकी सेट दूकान होगी । वहां जूते – चप्पल उतारते हैं और हस्त प्रक्षालन करते हैं । दूकान पर मोबाइल वगैरह के लिए लॉकर भी है पर हमने अपना सारा मोबाइल कमरे पर ही छोड़ दिया था। दूकानदार प्रसाद की कई टोकरियाँ जल्दी- जल्दी बनाता है किन्तु मैं भी सतर्क हूँ। एक की कीमत सौ रुपए! मैं एक ही लेता हूँ , परिवार तो एक ही है। वे जिद करते हैं किन्तु मैं भी टस से मस नहीं होता हूँ।
हमें पिछले दरवाजे से प्रवेश मिलता है । पुलिस है सुरक्षा जांच भी है पर शायद दिखावा ही है। अन्दर वह हमें एक अन्य पंडितजी को सुपुर्द कर देता है । वे हमें मुख्य गर्भगृह के सामने बिना रोक-टोक ले जाता है। मेरा गोत्र पूछता है और पूजा करवाता है। मंत्र बुलवाता है और मेरा शुद्ध उच्चारण सुनकर कुछ सहम सा जाता है। खैर पूजा के बाद वह हमें मंदिर में प्रवेश करा देता है बिना पंक्ति के ही । पुलिस का एक सिपाही द्वार पर खड़ा है जो हमें रोकता ही नहीं । प्रवेश करने में मुझे संकोच होता है क्योंकि मैं पंक्ति में नहीं था। मैं पंडित जी की तरफ मुड कर देखता हूँ तो वह कहता है जाइए जाइए, दर्शन करिए। सिपाही हमें अन्दर की तरफ धक्का देता है और हम लोग ज्योतिर्लिग के सामने । दर्शन , प्रसाद और फिर बाहर। किसका कितना हिस्सा है यह मुझे नहीं मालूम।
फिर पंडा मंदिर का इतिहास बताता है। सवा मन सोने का कलश , मंदिर ध्वंश और ज्ञानवापी मस्जिद का वृत्तांत। मुझे मालूम है किन्तु बच्चों को नहीं । ज्यादा बोलता देखकर मैं उसे बताता हूँ कि मै रामेश्वरम तक सात ज्योतिर्लिंगों की और अन्य बहुत से तीर्थस्थलों की यात्रा कर चुका हूँ तो उसका स्वर बदल जाता है । यहां वहां पूजा करवा कर वह हमें मुक्त करता है किन्तु समुचित दक्षिणा के बाद । चलिए दर्शन तो यथासमय हो गया । शुल्क के बिना तो शायद कुछ भी संभव नहीं । बाहर निकलते ही दर्शन एजेण्ट साथ लग लेता है और पचपन रुपये देकर उससे पिंड छुड़ाता हूँ।
मैं बच्चों को बताता हूँ मंदिर के पास ही गंगा जी भी हैं और बच्चे कैसे कि जिद न पकड़ें ? रास्ता मुझे भी भूल रहा है। पिछली बार विश्वनाथ जी का दर्शन लगभग बीस साल पहले किया था। तबसे बनारस आना जाना कई बार हुआ पर दर्शन नहीं। अभी पिछले साल ही तीन बार गया। एक पुलिस वाले से गंगा का रास्ता हिन्दी में पूछता हूँ और वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक भोजपुरी में रास्ता बताता है। मैं उसे धन्यवाद देता हूँ तो वह मेरा मुँह ताकता है। अभी शायद यहां इतनी औपचारिकता नहीं पहुँची है हालांकि काशी तो सभ्यता की नगरी है।
यहां दशाश्वमेध घाट है । यह समय अच्छा नहीं है, दोपहर है । काशी की तो सुबह मशहूर है । पर गंगा की दुर्दशा देखी नहीं जा रही है । सिकुड कर पतली सी , गरीबी की मार झेलती या किसी असाध्य रोग से पीडि त । विश्वास नहीं हो रहा कि यह वही पतित पावनी गंगा है जो स्वर्ग से उतरी थी। जो पानी अमृत था वह अब प्रदूषण से काला हो गया है। कुछ नावें है जो यात्रियों को उसपार ले जाने का आमंत्रण दे रही हैं। इसी गंगा ने काशी को तीन तरफ वेष्टित किया हुआ है और यहां की गंगा को ही देखकर भगवान भोलेनाथ काशी में डेरा डाला था। यही वह दशाश्वमेध घाट है जहाँ ब्रह्मा ने दस अश्वमेध यज्ञ किया था और जिस घाट पर नहा लेने मात्र अश्वमेध यज्ञ का पुण्य मिलता है। पर हमारा विकास हो गया है और हम गंगा को इस लायक छोड़ें कि वह नहाने तो क्या देखने योग्य तो बचे ! मैं लौट तो रहा था पर पैर नहीं उठ रहे थे।

Posted in काशी विश्वनाथ, धर्म, यात्रा, society | 5 Comments »

मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 2, 2010

-हरिशंकर राढ़ी

(लेखमाला की पिछली कड़ी में मदुराई और मीनाक्षी मंदिर का जो वर्णन मैंने किया था , उसे राष्ट्रीय सहारा दैनिक ने अपने 23 जनवरी के अंक में ज्यों का त्यों सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने कॉलमब्लॉग बोलामें ‘देवदर्शन और विशेष शुल्क‘ शीर्षक से छापा है।)

मदुरै का मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर वास्तव में हिन्दू धर्म ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति का एक गौरव है। अंदर जाने पर जो अनुभूति होती है, उसकी तो बात ही अलग है; इसका बाहर का रूप ही अत्यन्त चित्ताकर्षक है और अपनी विशालता की गाथा स्वयं ही बयान कर देता है। वहीं से यह उत्कंठा जागृत हो जाती है कि कितनी जल्दी अंदर प्रवेश कर लें। यह मंदिर जितना भव्य बाहर से है , कहीं उससे ज्यादा अंदर से है।

सामान्यतया मीनाक्षी मंदिर के नाम से विख्यात इस मंदिर का पूरा नाम मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर या मीनाक्षी अम्माँ मंदिर है।यह मंदिर भगवान शिव और देवी पार्वती जो मीनाक्षी के नाम से जानी जाती हैं, को समर्पित है। हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव अत्यन्त सुन्दर रूप में देवी मीनाक्षी से विवाह की इच्छा से पृथ्वीलोक पधारे। देवी मीनाक्षी पहले ही मदुराई के राजा मलयध्वज पांड्य की तपस्या से प्रसन्न हो मदुराई में अवतार ले चुकीं थीं। कुछ बड़ी होने पर वे वहां शासन संभालने लगीं। भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने देवी मीनाक्षी से विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे वे सहर्ष मान गईं। अब इस विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। निश्चित रूप से यह पृथ्वीलोक का सबसे महत्त्वपूर्ण और गरिमामय विवाह होने वाला था जिसमें सम्मिलित होने के लिए भगवान विष्णु भी अपने लोक से चल दिए। उन्हें देवी मीनाक्षी के भाई की भूमिका निभानी थी।किन्तु, मार्ग में आशंकित इन्द्र देव ने विघ्न उपस्थित कर दिया और भगवान विष्णु यथासमय वहाँ पहुंच न सके। अंततः स्थानीय देवता (तिरुपरंकुन्द्रम से) ने विवाह में मुख्याधिपति की भूमिका निभाई और कार्यक्रम सम्पन्न हो गया। इससे सम्बन्धित वार्षिक उत्सव भी यहाँ मनाया जाता है।

मंदिर मुख्यतया भगवान शिव और देवी मीनाक्षी को समर्पित है किन्तु इसके विशाल अन्तर्गृह में अनेक देवी देवताओं की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर के केन्द्र में मीनाक्षी की मूर्ति है और उससे थोड़ी ही दूर भगवान गणेश जी की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है जिसे एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है।आखिर गणेशजी विघ्नहत्र्ता ही नहीं देवी पार्वती के पुत्र भी तो हैं जिन्हें यहां मुकुरनी विनायकर के नाम से पूजा जाता है।

गणेश जी के दर्शन के लिए हम गए तो वहां पर दो पंक्तियां थीं। मुझे लगा कि उनमें से एक पंक्ति पुरुषों के लिए थी और दूसरी महिलाओं के लिए। वस्तुतः एक पंक्ति में महिलाएँ अधिक थीं और पुरुष एकाध ही। चूँकि दक्षिण भारत में अभी भी तुलनात्मक रूप से नियम – कानून का पालन अधिक होता है , यह सोचकर मैं अलग लाइन में लग गया और पत्नी अलग लाइन में।हालाँकि मेरे मित्र सपत्नीक एक ही (महिलाओं वाली) लाइन में लगे । लाइन लंबी थी, आगे जाकर कुछ इस प्रकार अलग हुई कि दर्शनापरान्त हम लोगों को दो अलग- अलग और विपरीत दिशा में जाना ही पड़ा। ऐसा नहीं था कि हम दर्शन करके एक दरवाजे से बाहर निकल जाएं! मंदिर की विशालता इतनी कि कुछ कहा नहीं जा सकता। वापस भी लौटने की स्थिति नहीं थी। मंदिर में ही तैनात एक पुलिस अधिकारी से मैंने बहस की तो (ईश्वर की कृपा से उसे अंगरेजी आती थी) उसने मार्ग निर्देशन किया । वहां से मैं बाहर तो निकल गया किन्तु फिर उस विशालता में खो गया। गनीमत यह हुई कि हमारे मोबाइल जमा नहीं कराए गए थे। संपर्क हो गया और किसी प्रकार एक प्रमुख स्थल के सहारे करीब दस मिनट बाद हम मिल गए। यह भी खूब रही और हम बहुत देर तक इस गुमशुदगी के चटखारे लेते रहे।

मंदिर का वास्तु एवं विशालतासौन्दर्य ही नहीं, गणितीय आंकड़ों की दृष्टि से भी मीनाक्षी मंदिर विशाल है। मंदिर कुल 45 एकड़ क्षेत्र में फैला है और निर्मित क्षेत्रफल का आयाम 254 मी। लंबाई और 237 मी. चैड़ाई में है। मंदिर में 12 उच्च शिखर हैं और सर्वोच्च शिखर जो दक्षिण की ओर स्थित है, की उँचाई 170 फीट है। मंदिर के अन्दर अइयरम मंडपम नामक एक विशाल मंडप (Hall) है जिसे सामान्यतः सहस्र खंभा (Thousand Pillar Hall )के नाम से जाना जाता है। वास्तविकता यह है कि इस हॉल में कुल 985 खंभे है।इस हॉल का निर्माण 1569 ई0 में अरियनाथ मुदलियर ने कराया था ।इसकी विशालता देखते ही बनती है। कई बार ऐसा लगता है कि धर्म एवं संस्कृति को लेकर कुछ लोग कितना सोचते रहे होंगे और कितना कुछ करते भी रहे होंगे, अन्यथा आज इतनी विशाल संरचना, इतना विशाल सृजन नहीं होता। यह क्रम संभवतः युगों से चला आ रहा है और चलता ही रहेगा । आज की सृजनशीलता भी कहीं से रुकी हुई प्रतीत नहीं होती, हालांकि विध्वंसक शक्तियां मार्ग में कम बाधाएं नहीं डाल रही हैं। आतंक का साया हर जगह मंडरा रहा हैफिर भी सर्जक लगे हुए हैं संस्कृति एवं सभ्यता की वृद्धि करने में । दिल्ली के नवनिर्मित अक्षरधाम जैसे भव्य मंदिर ऐसी ही जिजीविषा के प्रतीक हैं। यहाँ मैं किसी साम्यवाद या आर्थिक विषमता ओर मुड़ने के मूड में नहीं हूँ , बस जो सुन्दर लगा , उसका वर्णन भर करना चाहता हूँ।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस मंडप में खम्भे ही खम्भे दृष्टिगोचर होते हैं। सभी खंभे पत्थरों को काट कर बनाए गए हैं और इनपर उत्कृष्ट नक्काशी की गई है जो मंडप की सुन्दरता में चार चाँद लगाती है।मुख्य हॉल से लगभग हर गोपुरम की ओर रास्ता जाता है। मंदिर के विशाल गलियारे में असंख्य दूकानें भी हैं जिनपर हस्तकला से लेकर अन्य सजावटी सामानों की बिक्री होती रहती है।

मंदिर का वर्तमान स्वरूप1623से 1659 के बीच आया। तमिल साहित्य के अनुसार मंदिर का अस्तित्व गत सहस्राब्दि में होना चाहिए किन्तु इसका कोई बड़ा प्रमाण नहीं मिलता। शैव दर्शन के अनुसार मंदिर सातवीं शताब्दी में अवश्य था जिसे कट्टरपंथी मुस्लिम आक्रान्ता मलिक कफूर ने सन्1310में पूर्णतः ध्वंश कर दिया ।

मंदिर के प्रांगण में एक अत्यन्त सुन्दर तालाब है जिसे स्वर्णकमल पुष्कर के नाम से जाता है। वैसे इसका वास्तविक नाम पोर्थमराईकुलम है। भक्तगण दर्शनोपरान्त प्रायः यहाँ बैठकर आत्मिक शांति का आनन्द लेते हुए हैं। मंदिर में कैमरा ले जाने पर रोक नहीं है अतः अधिकांश लोग फोटो खींचते हुए भी देखे जा सकते हैं। यद्यपि फोटोग्राफी के लिए शुल्क 25 रु निर्धारित है किन्तु इस नियम का परिपालन शायद ही होता हो। कम से कम मैंने तो ऐसा नहीं देखा। हाँ, एक बार एक कर्मचारी ने हमें जरूर मना किया था ।

तालाब के पास घंटों बैठे रहने के बाद एक गरिमामय अनुभूति के साथ बाहर निकलने का मन बनाया ।ऐसा जरूर लग रहा था कि यह दर्शन और यह यात्रा जीवन की एक उपलब्धि है। दुख इस बात का हो रहा था कि हमारे पास इतना समय नहीं था कि मदुराई में एक दो दिन और रुकें और इस दिव्य और भव्य मंदिर के सौन्दर्य का और अवलोकर एवं विश्लेषण करें । अगले दिन हमें कोडाइकैनाल जाना था । बस आज की ही रात शेष थी यहाँ रुकने एवं समझने के लिए।निकलते वक्त भी मैं बार -बार पीछे मुड़कर उस महत्ता को देख लेता और महसूस कर लेता था । मदुराई शायद ही यादों से बाहर निकले!

Posted in धर्म, यात्रा, सोसाइटी, india, meenakshi temple, south india, travel, travelogue | 7 Comments »

देवदर्शन टैक्स इन इंडिया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 28, 2010

-हरिशंकर राढ़ी
आज की ताजा खबर यह है कि शिरडी स्थित श्री साईं भगवान के दर्शन के लिए अब शुल्क लगेगा। प्रातःकालीन आरती के लिए 500रु, मध्याह्न की आरती के लिए 300रु और सामान्य दर्शन के लिए 100रु। इसमें कुछ शर्तें भी शामिल हो सकती हैं, टर्म्स एण्ड कंडीशन्स अप्लाई वाली ट्यून! परन्तु टैक्स तो लगेगा ही लगेगा!
गत सितम्बर माह में मैं दक्षिण भारत की यात्रा पर गया था जिसका वृत्तान्त मैं ब्लॉग पर ‘पोंगापंथ अपटू कन्याकुमारी’ शीर्षक से लेखमाला के रूप में दे रहा हूँ। कुछ कड़ियाँ आई थीं और उस पर हर प्रकार की प्रतिक्रिया भी आई थी। इस वृत्तान्त में मंदिरों में धर्म के नाम पर हो रहे आर्थिक शोषण को सार्वजनिक दृष्टि में लाना मेरा प्रमुख उद्देश्य रहा। बहुत समर्थन मिला था मेरे विचार को। परन्तु कुछ लोगों ने इसे जायज ठहराने का भी प्रयास किया। उनका कहना था कि कुछ शुल्क निर्धारित कर देने से मंदिर के रखरखाव एवं कर्मचारियों के जीवन यापन में मदद मिलेगी और पंडों की लूट से छुटकारा भी मिलेगा। वैसे इनके इस तर्क से पूर्णतया असहमत भी नहीं हुआ जा सकता। पर, यह शुल्क कितना हो, यह भी महत्त्व पूर्ण है।
अब आज साईं बाबा के भक्तों पर गाज गिर ही गई।वैसे भी आजकल धर्म से बड़ा उद्योग शायद ही कोई हो। नाना प्रकार के बाबा जी इस कलयुग में प्रकट हो भक्तों का उद्धार कर रहे हैं और उनका जीवन सफल बना रहे हैं!ऐसी स्थिति में अगर दीनहीनों के श्रद्धास्थल साईं बाबा के संरक्षकों ने दर्शन शुल्क लगा दिया तो समयानुकूल ही है।
समस्या इस देश की मानसिकता को लेकर है। ईश्वर है कि नहीं, इस बहस का तो कोई अन्त हो ही नहीं सकता। परन्तु देश की अधिकांश जनता ईश्वर में विश्वास रखती है। सबके अपने -अपने ईश्वर हैं, अपने-अपने भगवान। जब एक सामान्य भारतीय हर ओर से थकहार जाता है तो ईश्वर के सहारे ही अपने जीवन की नैया छोड़ निराशा और आत्महत्या के भंवर से पार निकल जाता है। गलती चाहे खुद की हो, और कितनी बड़ी क्यों न हो, ईश्वर का दिया दंड समझ झेल जाता है और ईश्वर के बहाने अपनी जिन्दगी ( जो मनुष्य को जनसंख्या मानने वाले की नजर में कुछ नहीं है, बस एक आंकड़ा है और बड़े लोगों के लिए भीड़ बढ़ाने का माध्यम मात्र है) जी लेता है। कभी- कभी दो चार पैसे बच जाएं तो निकट के किसी देवालय में जाकर या कुम्भ नहाकर स्वयं को धन्य एवं ईश्वर का कृपापात्र समझ लेता है। चार धाम यात्रा या एक सुदूरवर्ती भक्त के लिए शिरडी साईंधाम की यात्रा सामान्यतः स्वप्न बनकर ही रह जाती है।अब ऐसे में साईंबाबा मंदिर प्रबन्धन ने क्या संदेश देना चाहा है, यह तो समझ के बाहर है।
मैंने सुना है कि शिरडी साईं बाबा मंदिर की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी है। वहां वैसे ही लाखों का चढ़ावा चढ़ जाता है। यात्राएं तो बहुत की मैंने किन्तु दुर्भाग्य से अभी तक शिरडी धाम के दर्शनों के लिए नहीं जा पाया। हाँ, भविष्य की योजनाओं में शामिल जरूर है यह यात्रा। अब अगर मैं शिरडीधाम की यात्रा सपरिवार करूँ और प्रातःकालीन आरती देखने की इच्छा न रुके तो मैं अपने परिवार (पति-पत्नी और दो बच्चों) के लिए पांच सौ प्रति व्यक्ति की दर से दो हजार का टिकट लूँ तब जाकर जन -जन की आस्था के केन्द्र साईं महराज की आरती देख सकूँ!
दोष केवल मंदिर व्यवस्थापकों का नहीं , पूरी व्यवस्था का है। देश में बढ़ते व्यवसायीकरण का है। कोई पर्व हो , त्योहार हो या व्रत हो, उद्योग और लालच हर जगह हावी है। पैसे के बल पर ही आदमी ‘महान‘ बन रहा है। धार्मिक ठेकेदारों को मालूम है कि तीर्थयात्रा अब पर्यटन में बदल चुकी है और अब सभी धामों में पैसे वाले ही लोग आते हैं और धर्म और श्रद्धा को पैसे से तौलते हैं । यह सब अब खूब बिकता है तो क्यों न बेचें ?क्या करें गरीबों की श्रद्धा का ?समस्या तो श्रद्धा को ही लेकर है। श्रद्धा गरीबी की समानुपाती होती है। सामान्य, हतभाग्य एवं दीन-दुर्बल की आस्था ही उसके लिए ईश्वर होती है। जितनी श्रद्धा ऐसे लोगों की साईं बाबा में है, उतनी ही साईं बाबा की ऐसे दीन हीन लोगों में थी। पर ‘उदारीकरण‘ के इस आर्थिक युग में बिकने वाली चीज क्यों न बेचें, भले ही वह भगवान या साईंबाबा क्यों न हों ?

Posted in आस्था, खबर समाज, धर्म | 7 Comments »

पोंगापंथ अप टु कन्याकुमारी -4

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 29, 2009

तिरुअनन्तपुरम में अब कुछ खास नहीं बचा था इसलिए हमने सोचा कि हमें अब आगे चल देना चाहिए। दिल्ली में बैठे- बैठे हमने जो योजना बनाई थी उसके मुताबिक हम तिरुअनन्त पुरम में एक रात रुकने वाले थे। इसी योजना के अनुसार हमने 23 सितम्बर के लिए मदुराई पैसेन्जर में सीटें आरक्षित करवा ली थीं। यहां का सारा आवश्यक भ्रमण पूरा हो गया था और अब वहां केवल वे ही स्थान थे जो यूं ही समय बिताने के लिए देखे जा सकते थे, हमें काफी कुछ घूमना था इसलिए निर्णय लिया कि अगले दिन का आरक्षण निरस्त करवा कर आज ही इसी गाड़ी से मदुराई चल दें। वहां की गाड़ियों में भीड़ कम होती है और कोई खास परेशानी होने वाली नहीं थी।

स्वामी पद्मनाभ मंदिर से लौटकर सर्वप्रथम हमने आरक्षण निरस्त कराया । त्रिवेन्द्रम स्टेशन का आरक्षण कार्यालय हमें दिल्ली के सभी आरक्षण कार्यालयों से अच्छा और सुव्यवस्थ्ति लगा। स्वचालित मशीन से टोकन लीजिए और अपनी बारी की प्रतीक्षा कीजिए, लाइन में लगने की कोई आवश्यकता ही नही। एक डिस्प्ले बोर्ड पर आपका नंबर आ जाएगा और आपका काउंटर नंबर भी प्रर्दशित हो जाएगा। ऐसी व्यवस्था तो राजधानी दिल्ली में भी नहीं है जहां कि भारत सरकार का रेल मंत्रालय स्थित है। खैर, आरक्षण निरस्त करवा कर हम वापस आए । मदुरै पैसेन्जर सवा आठ बजे की थी । स्टेशन पर स्थित आई आर सी टी सी के रेस्तरां में हमने खाना खाया। यह इस दृष्टि से प्रशंसनीय है कि यहां खाद्य पदार्थ अच्छा और तार्किक दर पर मिलता है।हालांकि मुख्य उपलब्धता दक्षिण भारतीय व्यंजनो की ही होती है पर यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। अपना सामान क्लोक रूम से वापस लिया और गाड़ी के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

यहां हम एक बड़े संकट में फंसते- फंसते बचे! दरअसल हमने आरक्षण तो निरस्त ही करवा दिया था और अब हमें सामान्य दर्जे में सफर करना था , टिकट भी हमने ले ही लिया था। त्रिवेन्द्रम से मदुरै लगभग 300 किमी है और इस पैसेन्जर गाड़ी का किराया मात्र 41/- है। मेरे मित्र ने सुझाव दिया कि ट्रेन आ जाए तो हम लोग पहले सीटें ले लें और बाद में पत्नी और बच्चों को लिवा लाएं। सुझाव मुझे तो बहुत अच्छा नहीं लगा, एक साथ ही सवार हो लें तो अच्छा हो किन्तु दबे मन से सुझाव मैंने भी मान लिया। ट्रेन आई, जोरों की बारिश हो रही थी। भाषाई समस्या के कारण यह भी ज्ञात नहीं हुआ कि गाड़ी आएगी किधर से और सामान्य डिब्बे लगते किधर हैं ? गाड़ी आई तो हम दोनों एक तरफ दौड़े , उधर डिब्बे भरे हुए थे। लिहाजा हमें दूसरी ओर जाना पड़ा। सीटें खाली मिल गई तो सन्तोष हुआ। अपने साथ मैं बेटी को भी ले गया था। ऊपर की कई सीटें हमें आसानी से मिल गई थीं । बेटी और मित्र को सीटों की रक्षा का दायित्व सौंपकर मैं बाकी सदस्यों को लिवाने पहुँचा और बमुश्किल चला ही था कि गाड़ी चल पड़ी ! हमारा अनुमान था कि स्टेशन बड़ा है और ट्रेन देर तक रुकेगी । रात का वक्त और सुदूर अनजान देश ! अब क्या करें, मैं तो पिछले डिब्बे में चढ़ भी जाता किन्तु महिलाओं और बच्चों का क्या करें ? इस सारी घबराहट के बीच अब बस मोबाइल का ही सहारा थोड़ी सी ऑक्सीजन दे रहा था, भगवान का शुक्र कि मित्र बेटी को लेकर जल्दबाजी का परिचय देते हुए उतर गए थे और खिड़की से गाड़ी के अन्दर झांक रहे थे- इस आशंका से कि कहीं हम लोग पीछे के किसी कंपार्टमेन्ट में चढ़ न गए हों। इस बीच बेटी ने मुझे देख लिया और हम सभी एक दूसरे को एक साथ देखकर जैसे विश्वास करने की कोशिश कर रहे हों कि हम वास्तव में पुनः साथ हैं।

बारिश अभी भी जोरों से हो रही थी। राहत की सांस लेने और अपनी गल्ती एवं परिस्थिति की समीक्षा करने के बाद आगे के कार्यक्रम पर विचार करना शुरू किया । पूछताछ की तो पता चला कि अगली गाड़ी सुबह पौने चार बजे है। अर्थात लगभग 6 घंटे तक प्रतीक्षा ! बस में जाने के लिए न तो बच्चे तैयार और बारिश की वजह से बाहर निकलने और बस अड्डे तक जाने की गुंजाइश । वैसे 300 किमी की बस यात्रा के लिए पूर्णतः तैयार मैं भी नहीं था। अब या तो हम प्रतीक्षा करें -यहीं रेलवे के विश्रामालय में या होटल की तलाश करें । होटल के लिए भी बाहर जाना ही होता , अतः हमने मन मारकर यहीं रुकने का निर्णय किया और अगली ट्रेन जो प्रातः पौने चार बजे की थी ,की प्रतीक्षा करने का विकल्प स्वीकार कर लिया।

विश्रामालय में ही आसन लगा। मित्र सपरिवार निद्रानिमग्न हो गए। कोशिश मैंने भी की किन्तु सफलता नहीं मिली। घंटे भर लोट-पोट , अंडस -मंडस करता रहा , फिर हार मानकर बैठ गया। वैसे भी यात्रा में मैं कम सामान और कम भोजन के फार्मूले पर चलता हूँ और सुखी महसूस करता हूँ ।बहरहाल, रात निकलती गई और गाड़ी के आने का समय हो गया। सबको जगाया और चेन्नई एगमोर एक्सप्रेस में हम सवार हो गए।तुलनात्मक रूप से इसमें भीड़ थी । चूंकि हम इन बातों को स्वीकार कर के सवार हुए थे इसलिए कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई।आगे गाड़ी खाली होती गई और हमें आराम करने की जगह भी मिलती गई।

सुबह नौ-दस बजे तक हम थोड़ा आश्वस्त हो चुके थे और स्थानीय प्रकृति,टोपोग्राफी और भौगोलिक दृश्यों का आनन्द लेने लग गए थे। जो कुछ दक्षिणी पठार के विषय में किताबों में पढा था वह देख रहा था। वहां की मिट्टी और बनस्पतियां हमारे अध्ययन की केन्द्र में थीं । साथ चल रहे यात्रियों का ढंग, भोजन एवं तौर तरीका हमारे लिए आकर्षण था। ज्यादातर यात्री साथ में इडली और चटनी लेकर आए थे और मौका पाते ही चट करने में लग जाते थे । भाग्यवश कुछ सहयात्री ऐसे थे जो थोड़ी बहुत अंगरेजी समझ ले रहे थे । उनसे ही हम कुछ-कुछ जानकारी पा जा रहे थे।

मदुरै पहुंचाने में इस गाड़ी ने लगभग सात घंटे लिया । मदुरै तमिलनाडु का एक बड़ा रेलवे जंक्शन है । यहां से उत्तर भारत, दक्षिण के कई बडे नगरों, रामेश्वरम एवं कन्या कुमारी जैसी जगहों के लिए गाड़ियां मिलती है। यह दक्षिण भारत की एक प्रकार से सांस्कृतिक राजधानी है।अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं सिल्क उद्योग के लिए यह भारत में ही नहीं अपितु विदेशों तक मे विख्यात है ।

हम यहां लगभग 11बजे दिन में पंहुचे थे और थके हुए थे। हमारी प्राथमिकता थी यथाशीघ्र होटल लेना , नहा धोकर तरोताजा होना और फिर मीनाक्षी मंदिर का दर्शन करना। स्टेशन से बाहर आए तो ऑटो और टैक्सी वालों ने हमें धरा। दक्षिण भारत के दिल्ली स्थित एक मित्र ने सुझाया था कि परिवार स्टेशन पर ही छोड़कर पहले होटल तलाश लेना फिर परिवार ले जाना। साथ वाले मित्र का भी कुछ ऐसा विचार था । पर, मैं कुछ रात की घटना से और कुछ थकान से इस विचार से सहमत नहीं हुआ। एक साथ ही चलते है। जो भी सस्ता महंगा पड़ेगा , देखा जाएगा! एक बार कमरा ढूंढ़ो, फिर परिवार लेने आओ। ना भाई ना। और यह जानते हुए भी कि ऑटो वालों का कमीशन बंधा होता है, इनके साथ जाने से कमरा कमीशन जोड़कर ही मिलता है, हमने उन्हीं के साथ जाना उचित समझा। शायद यह भी एक परिस्थिति ही होती है कि आदमी जानते हुए भी ठगे जाने को तैयार होता है!

इस बार कोई भी पोंगापंथ अभी तक सामने नहीं आया। थोड़ा बहुत पोंगा मैं ही साबित हुआ। हां, मंदिर में ले चलूंगा तो पोंगापंथ जरूर दिखाऊंगा। यात्रा अभी जारी है…………

Posted in दक्षिण भारत, धर्म, यात्रा, समाज, travelogue | 4 Comments »

पोंगा पंथ अप टु कन्याकुमारी -3

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 18, 2009

दिये में तेल डालने का शुल्क देकर हम आगे निकले ही थे कि एक दूसरे कार्यकर्ता ने हमें रोका । उसके पास रसीदों की गड्डी थी । उसकी आज्ञानुसार हमें प्रति व्यक्ति पांच रुपये का टिकट लेना था । सामने एक बोर्ड पर क्षेत्रीय भाषा में पता नहीं क्या – क्या लिखा था जिसे वह हमें बार- बार दिखा रहा था । उसमें हम जो पढ़ सकते थे वह था अंगरेजी में लिखा हुआ – एंट्री-५/-। हमें लगा कि शायद यह मंदिर का प्रवेश शुल्क होगा । जब हमने टिकट ले लिया तो उसने इशारा किया कि हमें ऊपर जाना है । हालांकि हमारी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी , फिर भी जाना ही पड़ा । हमने सोचा कि शायद कोई दर्शन होगा । बहरहाल , सीढ़ियाँ चढ़कर प्रथमतल पर गए तो वहां एक हाल सा था जिसमें कुछ चित्र लगे हुए थे। प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं थी, सीलन भरी पड़ी थी और एक तरफ चमगादड़ों का विशाल साम्राज्य था – कुछ उल्टे लटके थे तो कुछ हमारे जाने से विक्षोभित हो गए थे और अपना गुस्सा प्रकट कर रहे थे। अब इसके ऊपर जाना हमने उचित नहीं समझा और नीचे आ गए। इस दरवाजे को पार कर हम आगे निकले और दर्शन की पंक्ति में लग गए। यहां हमें मालूम हुआ कि जिस प्रथम माले से हम वापस आए थे, उसके ऊपर छः माले और हैं तथा सातवें माले से पूरा शहर दिखता है और वे पांच रुपये इसी के एवज मे लिए जाते हैं। वस्तुतः मंदिर का गोपुरम सात मंजिल का है और मंदिर प्रशासन ने अपने व्यवसाय प्रबंधन कुशलता का परिचय देते हुए नगरदर्शन की यह सुविधा उपलब्ध करवाई है।
खैर, नगरदर्शन से वंचित होने का हमें कोई क्षोभ नहीं हुआ।हम सभी पंक्तिबद्ध थे।शाम के साढ़े चार बजे होंगे। अचानक कुछ लोग समूह में आए और पंक्ति को उपेक्षित कर आगे बढ़ गए। मैंने सोचा था कि कम से कम ऐसी जगह पर तो लोग स्वानुशासन में रहेंगे परन्तु शायद यह भी अपने देश की विविधता में एकता है ! चाहे उत्तर हो या दक्षिण, नियम तोड़ने में हम बराबर के हिस्सेदार है। पांच बजे के करीब दर्शन शुरू हुए होंगे । अब लाइन का नाम करीब-करीब मिट गया था। ढंग की -धक्का मुक्की थी। अन्दर न तो पुलिस की कोई व्यवस्था थी और न स्वयंसेवकों का कोई अता-पता !गनीमत यह थी कि चोरी -जेबतराशी जैसी महामारी वहाँ नही के बराबर है। वैसे भी हमारे पर्स हमारे हाथों में ही थे। भीड़ में दम घुट सा रहा था। बस, केवल दर्शन करके हम बाहर निकलने के प्रयास में लग गए और किसी तरह जल्दी ही सफल भी हो गए। कोई पूजा या प्रसाद के चक्कर में हम थे भी नहीं! हां, मंदिर बड़ा ही भव्य है और उसके स्थापत्य और विशालता को जितना देख और समझ सकता था, उतना प्रयास करता रहा।
स्वामी पद्मनाभ का यह मंदिर भी दक्षिण भारतीय शैली के स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है। अत्यन्त विशाल यह मंदिर हिन्दू धर्म के वैभव का प्रतीक है और एक समृद्ध समाज का परिचायक है।दूर से ही इसका विशाल गोपुरम दर्शकों और श्रद्धालुओं को खींच लेता है।
समूचा मंदिर विशाल पत्थरों को तराश कर बनाया गया है।यह मंदिर पद्मनाभस्वामी क्षेत्रम् और अनन्तपुरी के नाम से विख्यात है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्वाभिमुख है और इसका गोपुरम सात मालों का है जिसकी उंचाई 100 फीट है। गोपुरम के सम्मुख एक विशाल सरोवर पद्मतीर्थम है जो मंदिर की सुंदरता में अभिवृद्धि करता है । यह बात अलग है कि इसकी साफ सफाई पर कोई ध्यान देने वाला मुझे नहीं लगा।
मन्दिर का गलियारा भी बहुत बड़ा है और 365 खंभो को बड़ी बारीकी से तराश कर लगाया गया है। गर्भगृह एक विशाल चबूतरे पर है जो एकमात्र पत्थर को काटकर बनाया गया है और इसे ओट्टकल मंडपम के नाम से जाना जाता है। इसके बारे में भी बहुत सी किंवदंतियां हैं। जैसा कि मंदिर के नाम से ही स्पष्ट है, मंदिर स्वामी पद्मनाभ को समर्पित है जो भगवान विष्णु का ही एक रूप है। विग्रह की मुख्य विशेषता यह है कि यह शयन मुद्रा में है। कहा जाता है कि यह विग्रह कुल 12008 शालिग्राम को जोड़कर बनाया गया है जो नेपाल स्थित गंडकी नदी से लाए गये थे। इसके अतिरिक्त यहां श्री नरसिंह, श्री हनुमान, श्री कृष्ण ,श्री अइयप्पा और श्री गरुण की मूर्तियां भी स्थापित हैं। वस्तुतः यह 108 देवदर्शन में एक प्रमुख स्थल है।
मंदिर की संपूर्णता का आनन्द तो बस देखकर ही लिया जा सकता है । अगर पूरी जानकारी प्राप्त कर लेख लिखा जाए तो कई पृष्ठों में जाएगा। हां, मैं आपका ध्यान दर्शन के समय पर जरूर दिलाना चाहूंगा, जरा इस विचित्रता को गौर फरमाएं । देव दर्शन की यह समयबद्धता कम से कम मुझे तो बिलकुल नहीं सुहाई। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि ईश्वर को हम अपने नियमों में न बांधे और उसे तो श्रद्धालुओं के लिए मुक्त कर दें!
यह रही स्वामी पद्मनाभ के दर्शन की समय सारणी-
पूर्वाह्न -3:30 – 4:45
6:30 -7:00
8:30 -10:00
10:30-11:00
11:45-12:00
अपराह्न
5:00-6:15
6:45-7:20

Posted in धर्म, यात्रा, व्यंग्य, समाज, Hindi Literature, kerala, padnabh temple, south india, travelogue | 11 Comments »

पोंगापंथ अप टु कन्याकुमारी -2

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 11, 2009

मैंने अपनी यह यात्रा हज़रत निज़ामुद्दीन से चलने वाली हज़रत निज़ामुद्दीन – त्रिवेन्द्रम राजधानी एक्सप्रेस (ट्रेन नं.2432) से शुरू की थी. इस गाडी को त्रिवेन्द्रम पहुंचने में पूरे सैंतालीस घंटे लगते हैं और यह कोंकण रेलवे के रोमांचक और मनमोहक प्राकृतिक दृष्यों से होकर गुजरती है. केरल प्राकृतिक रूप से बहुत ही समृद्ध है और केरल में प्रवेश करते ही मन आनन्दित हो गया. यात्रा लंबी अवश्य थी किंतु अच्छी थी –अनदेखी जगहें देखने की उत्कंठा थी अतः महसूस नहीं हुआ. मेरे साथ मेरे एक मित्र का परिवार था. पति- पत्नी और दो बच्चे उनके भी. बच्चे समवयस्क ,उन्होंने अपना ग्रुप बना लिया.
त्रिवेन्द्रम अर्थात तिरुअनंतपुरम केरल की राजधानी है. यहां कुछ स्थान बहुत ही रमणीय और दर्शनीय है. मैंने जो जानकारी इकट्ठा की थी, उसके अनुसार त्रिवेन्द्रम में दो जगहें हमें प्राथमिकता के तौर पर देखनी थीं.प्रथम वरीयता पर था स्वामी पद्मनाथ मंदिर और दूसरे पर कोवलम बीच. अधिकांश मन्दिरों के साथ दिक्कत उनकी समयबद्धता से है . दक्षिण भारत के मंदिर एक निश्चित समय पर और निश्चित समयावधि के लिए खुलते हैं. गोया सरकारी दफ्तर हों और भगवान के भी पब्लिक मीटिंग आवर्स हों . भगवान पद्मनाथ का यह विख्यात मंदिर भी मध्याह्न 12 बजे बंद हो जाता है. इसके बाद सायं चार बजे प्रवेश प्रारम्भ होता है और दर्शन पांच बजे से हो सकता है . हम त्रिवेन्द्रम सवा नौ बजे पहुंच गए थे और रेलवे के विशेष प्रतीक्षालय (यहां एक एसी प्रतीक्षालय है जिसमें प्रति यात्री प्रति घंटा दस रुपये शुल्क लिया जाता है) में नहा-धोकर ,तरोताज़ा होकर 11 बजे तक तैयार हो गए थे. वहां घूमने –देखने लायक इतना कुछ नही है ,इस लिए हमारी योजना उसी रात मदुरै निकल जाने की थी. सामान हमने क्लॉक रूम में जमा करा दिया था. मंदिर के विषय में मालूम था ,इस लिये पहले हम कोवलम बीच घूमने चले गए.
कोवलम बीच रेलवे स्टेशन से लगभग 13 किमी की दूरी पर है . हमने स्टेशन से ही प्रीपेड आटो ले लिया था. मजे की बात है कि वहां प्रीपेड के नाम पर केवल पर्ची कटती है,भुगतान गंतव्य पर पहुंचने के बाद ड्राइवर कोइ ही करना होता है. भुगतान की रकम पर्ची पर लिखी होती है और पर्ची का शुल्क एक रूपया मात्र होता है.
कोवलम बीच वास्तव में एक सुन्दर अनुभव है. अरब सागर की उत्ताल तरंगें नारियल के झुरमुट से सुशोभित तट की ओर भागती चली आती हैं , बस सबकुच भूल कर उसकी विशालताऔर अनंतता को देखते रहने को जी चाहता है.
बहरहाल , लगभग चार बजे हम स्वामी पद्मनाथ मंदिर पहुंच गए. मंदिर निःसन्देह बहुत विशाल और भव्य है. इसका गोपुरम दूर से ही मन को मोह लेता है. हम द्वार की तरफ बढे ही थे कि हमें सामान क्लॉक रूम में जमा कराने का इशारा मिला (भाषाई समस्या वहां प्रायः झेलनी पडती है ) और हम समीप स्थित क्लॉक रूम तक पहुंच गए. जैसा कि मैने पहले ही बताया कि मंदिर के लिए ड्रेसकोड निर्धारित है ,उसका पालन करना ही था. हालांकि हम स्थिति ठीक से समझ नही पाये थे. क्लॉक रूम के बाहर सामान जमा की दर भी लिखी हुई है.चलिए , अब आप सारे कपडे उतार दीजिए,बस एक मात्र अंतः वस्त्र को छोडकर. मोबाइल वगैरह तो जमा होता ही है .अब आपको वे एकलुंगी नुमा धोती दे देंगे, उसे लपेट लीजिए, अगर लपेटने में कठिनाई है तो वे मदद भी कर देंगे ! हाँ, इस धोती का किराया है रु.15/- . धोती बाद में लौटा दीजिएगा, पर किराया अभी जमा करा दीजिए. महिला के लिए शुद्ध भारतीय वेश-भूषा अर्थात साडी ही अनुमन्य है.महिला ने साडी नहीं कुछ और पहना है तो 15/ मे लुंगी नुमा धोती उपलब्ध है.उसे बस ऊपर से लपेट लीजिए, अन्दर का सब कुछ चल जाएगा !यह व्यवस्था बच्चों पर भी लागू है . इस धार्मिक सुविधा केन्द्र पर सात धोती (बच्चों के लिए लगभग हाफ लुंगी/धोती ) लेने और पैंट-कमीज़ मोबाइल देने के रुपये 208/ लगे. हाँ, हमारे पर्स नहीं जमा हुए, उन्हें हम ले जा रहे थे अन्दर. हर श्रद्धालु के हाथ में अब केवल पर्स था ,जैसे वह पर्स न हो, पूजा का फूल हो ! यह भी एक दृश्य था ,जिसे शायद महसूस कर रहा था.
अन्दर प्रवेश करते ही एक ‘सेवक ‘ दौडा. बडी लगन से उसने छोटे –छोटे चार दिये तेल के (क्योंकि चार सदस्य क परिवार था) पकडाए. यहां का कोई नियम मानकर हमने दिये ले लिए, बगल के एक बडे जलते दिये में उसे उडेला और उसके भी बीस रुपए हो गये . यह बात बाद में समझ पाया कि यह सब केवल दूर से आने वाले दर्शनार्थियों के लिए है, स्थानीय तो सब जानते है .ऐसी एक दो घट्नाएं और हुई6 जिनका जिक्र अच्छा नहीं होगा. मंदिर के अन्दर हम पंक्तिबद्ध थे. लोग हाथों में पर्स पकडे चले आ रहे थे. पता नहीं किसका कितना ध्यान स्वामी पद्मनाथ पर था , कितना पर्स की संभाल पर!
आगे जारी……..

Posted in धर्म, यात्रा वृत्तांत, व्यंग्य, culture, Hindi Literature, kerala, satire, society, travelogue | 11 Comments »