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परसाई जन्मोत्सव

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 31, 2009

गत दिनांक 22 अगस्त 2009 को व्यंग्यशिल्पी स्वर्गीय हरिशंकर परसाई की कर्मभूमि जबलपुर शहर उनकी याद में सरावोर रही .

विवेचना और प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वाधान में शहर के रानी दुर्गावती संग्रहालय कला वीथिका में एक आयोजन किया गया . इस अवसर पर दिल्ली से पधारे मुख्या वक्ता लेखक विष्णु नागर ने कहा – हिन्दी कहानी और उपन्यास की लेखन शैली में बदलाव के लिए जैसे प्रेमचंद को याद किया जाता है , उसी तरह व्यंग्य की दुनिया को बदलने का योगदान हरिशंकर परसाई को जाता है .

इस अवसर पर सर्वप्रथम श्री वसंत काशीकर ने परसाई की चर्चित कृति ‘संस्कारों और शाश्त्रों की लडाई’ के एक अंश का वाचन किया . तत्पश्चात डा. अरुण कुमार ने परसाई के व्यक्तित्व, लेखन शैली और रचनाओं पर प्रकाश डाला . इस कार्यक्रम की अध्यक्ष्त डा. मलय ने की और अपने वक्तव्य में परसाई के साथ बिताये पलों को याद किया .

शहर के नई दुनिया संस्करण के कार्टूनिस्ट राजेश दुबे ने परसाई जी की रचनाओं पर आधारित कार्टून्स की प्रदर्शनी लगाई . विवेचना रंग मंडल के कलाकारों द्वारा परसाई की प्रसिद्द कृति ‘इंसपेक्टर मातादीन’ का खूबसूरत मंचन खुले मैदान पर किया गया .

कुल मिलाकर एक यादगार शाम परसाई के नाम रही . बड़ी संख्या में शहर के ख्यातिलब्ध साहित्यकार उपस्थित थे . इनमे मुख्या है ज्ञानरंजन [कथाकार ], कुंदन सिंह परिहार [कथाकार ], गुरुनाम सिंह रीहल [लघुकथाकार ]।

इस आयोजन में कुछ बातें जो सामने आई वो निम्नानुसार हैं .

१ आज लेखकों की गुटबाजी चल रही है । वे आपस में एक दुसरे की तारीफ़ करते हैं और किसी तीसरे की दाख्लान्दजी पसंद नहीं करते ।
२ कुछ बड़ी पत्रिकाओं में भी यही आलम है इसलिए वे दम तोड़ रहीं है । हर अंक एक सा । नए लेखकों की भागीदारी उनमे नहीं है .
३ हम निरंतर लिखें और बस लिखें निस्वार्थ ।

इस अवसर पर अनोपचारिक चर्चा में एक प्रश्न उभर कर सामने आया – ब्लॉग्गिंग -ब्लॉग्गिंग एक साहित्यिक ऐय्याशी है ।

हलाँकि ये बात इस आयोजन का हिस्सा नहीं है लेकिन महत्वपूर्ण है । इसलिए ये बात यदि आप सबसे न बांटूं तो तकलीफ में रहूँगा . अतः इस ब्लॉग पर आने वाले तमाम पाठकों का आव्हान करता हूँ की वे अपने विचार प्रतिक्रिया स्वरुप दे –

ब्लॉग्गिंग एक साहित्यिक ऐय्याशी है !

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