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Archive for the ‘पुस्तक समीक्षा’ Category

दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 29, 2009

पुस्तक समीक्षा

दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली
संभवतः बहुत कम ही साहित्यप्रेमियों को इस बात की जानकारी होगी कि लब्धप्रतिष्ठ उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली , पिछली सदी के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित होने वाली अत्यंत लोकप्रिय पत्रिका धर्मयुग में ‘ बुनियाद अली ’ के छद्म नाम से एक स्तंभ लिखा करते थे , जिसका शीर्षक था – बेदिल दिल्ली। धर्मयुग पत्रिका के सर्वाधिक पढे जाने वाले और चर्चित स्तंभों में सम्मिलित बेदिल दिल्ली के अन्तर्गत लिखे गए उन्हीं लेखों को संकलित कर पुस्तकाकार में किताबघर प्रकाशन ने हाल में ही प्रकाशित किया है । कहने की जरूरत नहीं कि पुस्तक में संकलित सभी 52 लेख ऐतिहासिक महत्व के हैं।
इनके माध्यम से लेखक ने तत्कालीन दिल्ली की सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दशाओं का चित्रण पूरी प्रामाणिकता के साथ किया है। दिल्ली स्थित सरकारी महकमों में फैला भ्रष्टाचार हो या सामाजिक स्तर पर पसरी संवेदनहीनता, साहित्यिक गलियारों में होने वाली आपसी टाँग खिचाई हो या फिर राजनीतिक मठाधीशों की छद्म सदाचारिता , हर जगह व्याप्त विसंगति को उकेर कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए बुनियाद अली मुस्तैद नजर आते हैं।
लेखक ने पुस्तक में संकलित लेखों को विषयानुसार तीन वर्गों में विभाजित कर दिया है। ‘ये गलियाँ औ’ चैबरे’ वर्ग में संकलित लेखों में मुख्यतः तत्कालीन दिल्ली के शासन, प्रशासन, सत्ता और संसद से लेकर सड़क पर टाट बिछाकर बरसाती के नीचे रहने वाले आम आदमी के जीवन से जुड़ी सच्चाइयों की पड़ताल की गई है। मिसाल के तौर पर ‘कायदे-कानून’ लेख में वे चुटीले अंदाज में कहते हैं-‘‘सारे नियम और कायदे-कानून असल में लोगों की सुख-सुविधा के लिए बनाए जाते हैं। मगर सरकारी दतरों में जिस तरह इसका मलीदा बनाया जाता है, यह देखने, समझने और भुगतने की चीज है।’’ इसी तर्ज़ पर ‘प्रशासन कितना चुस्त’ लेख में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिए गए प्रतीकात्मक पत्र के जरिए उन्होंने (यानी बुनियाद अली ने) प्रशासनिक स्तर के कदम-कदम पर पसरी अनियमितताओं को पूरी बेबाकी से बयान किया है। इस वर्ग में संकलित अधिकांश लेख व्यंग्यात्मक शैली और हल्के-फुल्के लहज़े में ही लिखे गए हैं, लेकिन इनके साथ ही कुछ लेखों (जैसे-‘दिल्ली के जामुन’ और ‘सरकारी अस्पताल’) में तरल मानवीय संवेदनाओं को भी पूरी पारदर्शिता के साथ शब्दबद्ध किया गया है।
पुस्तक में समाविष्ट दूसरे वर्ग ‘साहित्य वाद-संवाद’ में संकलित कुल ग्यारह लेखों में साहित्यिक गोष्ठियों, लेखक संघों और अकादमियों से जुड़े नेपथ्य की वास्तविकताओं को रोचक शैली में लिखा गया है। विशेष रूप् से ‘टी-हाउस, काॅफी हाउस’ शीर्षक लेख में बुनियाद अली ने, उस दौर में वहाँ होने वाली (शीर्षस्थ साहित्यकारों की) अड्डेबाजियों और उनकी बेलौस अदाओं का आँखों देखा हाल बड़े ही दिलचस्प अंदाज में बयान किया है।
इसी क्रम में पुस्तक के तीसरे वर्ग ‘इतस्ततः’ में सम्मिलित किए गए लेखों में बुनियाद अली ने देश के सर्वोच्च पद पर आसीन अति विशिष्ट व्यक्ति के (राष्ट्र भाषा हिंदी के प्रति) अनुचित व्यवहार से लेकर अदने स्तर के सरकारी मुलाजिमों के भीतर पूरी तरह जम चुकी क़ाहिली और संवेदनहीनता को रेखांकित किया है।
प्रत्येक लेख में कहीं संस्मरण, कहीं कहानी, कभी गंभीर निबंध तो कभी रिपोर्ताज जैसी भिन्न-भिन्न विधागत शैलियों का समावेश, बुनियाद अली ने इतनी खूबसूरती से किया है कि आज भी इन्हें पढ़ने पर ज़रा-सी भी बोझिलता का अहसास नहीं होता। कहा जा सकता है कि-‘धर्मयुग’ पत्रिका के बेदिल दिल्ली स्तंभ की लोकप्रियता का एकमात्र कारण बुनियाद अली का ‘अंदाज़-ए-बयाँ’ ही था, जिसके चलते वो गंभीर से गंभीर बात भी सीधी-सरल और गुदगुदाती भाषा में कह दिया करते थे।
यद्यपि पुस्तक में संकलित सभी लेख आज से लगभग 25-30 वर्ष पहले लिखे गए थे, लेकिन उनकी रोचक भाषा शैली, कसी बुनावट, व्यंग्यात्मक लहजा और उसमें समाए आम आदमी के जीवन की दुश्वारियों का ऐसा मार्मिक चित्रण किया गया है कि जो आज भी पढ़ने पर मन में गहरा प्रभाव उत्पन्न कर देते हैं। इन लेखों से गुजरते हुए ये साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है कि इतने वर्ष बीतने के बाद भी इनकी प्रासंगिकता अब भी बरकरार है। दिल्ली की जिस संवेदनहीनता को लेकर बुनियाद अली, इन लेखों में चिंतित नजर आते हैं, उसके स्तर में कमी की जगह बढ़ोतरी ही होती जा रही है। यहाँ के गली-कूचों से लेकर राजपथ तक चप्पे-चप्पे पर, बेशुमार विसंगतियाँ आज भी मुँह बाए खड़ी नजर आ जाती हैं। कहना चाहिए कि बुनियाद अली की वह बे-दिल दिल्ली अब, माॅल्स और मल्टीप्लेक्सेस की चकाचैंध में अंधी और लाखों मोटरगाड़ियों के कोलाहल में बहरी भी हो गई है। शायद तभी उसे न तो हर तरफ छिटकी अव्यवस्थाएँ दिखती हैं और न ही सुनाई पड़ती हैं, आम आदमी की आवाज।
( नई दुनिया के 19 अप्रैल 09 अंक में प्रकाशित )

-विज्ञान भूषण

पुस्तक: बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
लेखक: द्रोणवीर कोहली
मूल्य: 400 रुपये मात्र
पृष्ठ: 296
प्रकाशक: किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली

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चार रंग जिंदगी के

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 28, 2009

पुस्तक समीक्षा

चार रंग जिंदगी के

अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सर्जनात्मक लेखन से जुडने वाली रचनाकार डाॅ अरुणा सीतेश ने बहुत कम समय में ही तत्कालीन कथा-लेखिकाओं के बीच अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर ली थी। उनके कथा- साहित्य के केंद्र में प्रायः स्त्री जीवन की गहन भावनाओं का मार्मिक चित्रण उपस्थित रहता है। कुछ समय पूर्व प्रकाशित कथा संकलन ‘ चार लंबी कहानियां ’ में सम्मिलित उनके द्वारा लिखी गई कहानियां जहां एक ओर नारी मन के अंतद्र्वंद्व को उजागर करती हैं तो साथ ही मानवीय मनोविज्ञान का विश्लेषण भी करती हैं।
समीक्ष्य संग्रह में संकलित पहली कहानी ‘डूबता हुआ सूरज’ एक असफल प्रेम की मार्मिक गाथा को बयान करती है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई यह कहानी यद्यपि चिर- परिचित कथानक पर ही आधारित है , लेकिन इसका शिल्प और मनोभावों को पूरी सशक्तता से व्यक्त करने के लिए गढे गए वाक्य विन्यास , पाठकों को बांध कर रखने में पूर्णतः सक्षम हैं।
भावुक इंसान के जीवन की मुश्किलें तब और बढ जाती हैं , जब उस पर अपने ही परिजनों और जीवन को व्यावहारिकता से देखने वालों का दबाव पडने लगता है। बुद्धिजनित तर्कों और भावजनित संवेदनाओं के दो राहे पर खडे एक ऐसे ही युवक शिशिर की दुविधाग्रस्त अंतर्दशा का सूक्ष्म विवेचन इस संग्रह की कहानी ‘ चांद भी अकेला है ’ में किया गया है। इस कहानी का अंत शिशिर के उस असाधारण निर्णय के साथ होता है , जब वह अपने सपनों और अपनी महात्वाकांक्षाओं को दफनाकर मानसिक रूप से विकलांग अपनी बहन के इलाज कराने का निश्चय कर लेता है। इसी तरह ग्रामीण परिवेश पर आधारित संग्रह की एक अन्य कहानी‘कल्लू का कल्लू’ में सवर्ण और शक्तिसम्पन्न वर्ग के द्वारा कमजोर वर्ग के उत्पीडन और इसके विरुद्ध उपजे विद्रोह को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया गया है। यह कहानी शोषण के खिलाफ होने वाली क्रांति की जमीनी हकीकत और उसकी परिणति को सहजता के साथ हमारे समक्ष उजागर करती है। दरअसल , यह कहानी इस कडवे सच को भी स्थापित करती है कि हाशिए पर रहने वाले लोग भी केंद्र में पहुंचने पर किस तरह से हाशिए पर बचे शेष लोगों को भूल जाते हैं ?
कहा जा सकता है कि समीक्ष्य संग्रह की चारो कहानियां हमारे आस-पास के जीवन से जुडी तो हैं , ही साथ ही इनके माध्यम से बनते- बिगडते पारिवारिक और सामाजिक संदर्भेंा का भी प्रभावी चित्रण किया गया है। चार अलग – अलग विषयों पर लिखी गई ये कहानियां , वास्तव में पाठक को जिंदगी के चार रंगों से रू-ब-रू कराती हैं।

विज्ञान भूषण

पुस्तक – चार लंबी कहानियां
लेखिका- डाॅ अरुणा सीतेश
प्रकाशक- अमरसत्य प्रकाशन, नई दिल्ली
मुल्य – 150 रु मात्र

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