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Archive for the ‘बातें अपनी सी’ Category

अशआर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 9, 2008

शेर किसका है मालूम नही. ऐसे ही गालिब-ओ-मीर पर बाते करते आज ये शेर विनय ने सुनाया. जानते वह भी नही कि किसका है. मुझे अच्छा लगा, लिहाजा  आपके लिए भी –

दिल मे रहो जिगर मे रहो नजर मे रहो

सब तुम्हारे ही लिए है चाहे जिस घर मे रहो

अब ये हाल है दर-दर भटकती फिरती है

मुसीबतो से कहा मैने मेरे घर मे रहो.

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कोर्ट पर हमला क्यों?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 23, 2007

सत्येन्द्र प्रताप
वाराणसी में हुए संकटमोचन और रेलवे स्टेशनों पर विस्फोट के बाद जोरदार आंदोलन चला. भारत में दहशतगर्दी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था जब गांव-गिराव से आई महिलाओं के एक दल ने आतंकवादियों के खिलाफ फतवा जारी किए जाने की मांग उठा दी थी. बाद में तो विरोध का अनूठा दौर चल पड़ा था। संकटमोचन मंदिर में मुस्लिमों ने हनुमानचालीसा का पाठ किया और जबर्दस्त एकता दिखाई. मुस्लिम उलेमाओं ने एक कदम आगे बढ़कर दहशतगर्दों के खिलाफ़ फतवा जारी कर दिया.

इसी क्रम में न्यायालयों में पेश किए जाने वाले संदिग्धों के विरोध का भी दौर चला और वकीलों ने इसकी शुरुआत की। लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद में वकीलों ने अलग-अलग मौकों पर आतंकवादियों की पिटाई की थी।शुरुआत वाराणसी से हुई. अधिवक्ताओं ने पिछले साल सात मार्च को आरोपियों के साथ हाथापाई की और उसकी टोपी छीनकर जला डाली। आरोपी को न्यायालय में पेश करने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी. फैजाबाद में वकीलों ने अयोध्या में अस्थायी राम मंदिर पर हमले के आरोपियों का मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया। कुछ दिन पहले लखनऊ कचहरी में जैश ए मोहम्मद से संबद्ध आतंकियों की पिटाई की थी.
राजधानी लखनऊ के अलावा काशी तथा फैजाबाद के कचहरी परिसर बम विस्फोटों से थर्रा उठे हैं। यह सीधा हमला है आतंकियों का विरोध करने वालों पर। कश्मीर के बाद यह परम्परा देश के अन्य भागों में भी फैलती जा रही है. नीति-निर्धारकों और चरमपंथियों का समर्थन करने वालों को एक बार फिर सोचा होगा कि वे देश में क्या हालात बनाना चाह रहे हैं.

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…यूं ही कभू लब खोलें हैं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 13, 2007


आने वाली नसलें तुम पे रश्क करेंगी हमअसरों
जब उनको ये ध्यान आयेगा तुमने फिराक को देखा था
इसे आप चाहें तो नार्सिसिया की इंतहां कह सकते हैं. जैसा मैने लोगों से सुना है अगर उस भरोसा कर सकूं तो मानना होगा वास्तव में
फिराक साहब आत्ममुग्धता के बहुत हद तक शिकार थे भी. यूँ इसमें कितना सच है और कितना फ़साना, यह तो मैं नहीं जानता और इस पर कोई टिप्पणी भी नहीं करूंगा कि आत्ममुग्ध होना सही है या ग़लत, पर हाँ इस बात का मलाल मुझे जरूर है कि मैं फिराक को नहीं देख सका. हालांकि चाहता तो देख सकता था क्या? शायद हाँ, शायद नहीं…. ये अलग है कि फिराक उन थोड़े से लोगों मैं शामिल हैं जो अपने जीते जी किंवदंती बन गए,पर फिराक के बारे में मैं जान ही तब पाया जब उनका निधन हुआ। 1982 में जब फिराक साहब का निधन हुआ तब मैं छठे दर्जे में पढता था. सुबह-सुबह आकाशवाणी के प्रादेशिक समाचार में उनके निधन की खबर जानकर पिताजी बहुत दुखी हुए थे। यूँ रेडियो बहुत लोगों के मरने-जीने की बात किया करता था, पर उस पर पिताजी पर कोई फर्क पड़ते मैं नहीं देखता था. आखिर ऐसा क्या था कि वह फिराक साहब के निधन से दुखी हुए. मेरे बालमन में यह कुतूहल उठना स्वाभाविक था. पिताजी दुखी हुए इसका मतलब यह था कि फिराक साहब सिर्फ बडे नहीं, कुछ खास आदमी थे. पूछने पर पिताजी ने बातें तो तमाम बताएँ, पर मेरी समझ में कम ही आईं. लब्बो-लुआब जो मैं समझ पाया वह यह था कि फिराक गोरखपुरी एक बडे शायर थे और उर्दू व अन्ग्रेज़ी के बडे विद्वान भी थे. मूलतः वह गोरखपुर जिले की बांसगाँव तहसील के रहने वाले थे. बावजूद इसके पिताजी ने भी उन्हें देखा नहीं था. यूँ फिराक साहब का गुल-ए-नगमा पिताजी के पास था और उसके शेर वह अक्सर सुनाते रहते थे. बात-बात पर वह उससे उद्धरण देते थे और शायद इसीलिए फिराक को न जानते हुए भी उनके कई शेर मुझे तभी याद हो गए थे. इनमें एक शेर मुझे खासा पसंद था और वह है :
किसी का कौन हुआ यूँ तो उम्र भर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क सब तो धोका है मगर फिर भी.
ये अलग बात है कि तब इसके अर्थ की कोई परछाईं भी मेरी पकड़ में नहीं आने वाली थी. फिराक साहब और उनका गुल-ए-नगमा मुझे समझ में आना शुरू हुआ तब जब मैने दसवीं पर कर गया. जैसे-जैसे बड़ा होता गया फिराक साहब अपनी शायरी के जरिए मेरे भी ज्यादा अजीज होते गए. फिराक, उनकी शायरी, उनके क्रांतिकारी कारनामे और उनसे जुडे तमाम सच्चे-झूठे किस्से. खास तौर से कॉलेज के दिनों में तो हम लोगों ने फिराक के असल अशआर की जगह उनकी पैरोदियाँ ख़ूब बनाईं. पैरोडियों के बनाने में जैसा मनमानापन सभी करते हैं हमने भी किया.
पर अब सोचते हैं तो लगता है कि जिन्दगी की जैसी गहरी समझ फिराक को थी, कम रचनाकारों को ही हो सकती है. कहने को लोग कुछ भी कहें, पर यही नार्सिसिया फिराक की शायरी जान भी है. जब वह कहते हैं :
क़ैद क्या रिहाई क्या है हमीं में हर आलम
चल पडे तो सेहरा है रूक गए तो जिंदां है.

वैसे फिराक की यह नार्सिसिया ठहराव की नहीं है. यह मुक्ति, अपने से पर किसी और अस्तित्व के तलाश की और उससे जुडाव की ओर ले जाने की नार्सिसिया है. यह वह रास्ता है जो अस्तित्ववाद की ओर ले जाता है. वह शायद अस्ति की तलाश से उपजी बेचैनी ही है जो उन्हें यह कहने को मजबूर करती है:
शामें किसी को मांगती हैं आज भी ‘फिराक’
गो ज़िंदगी में यूं तो मुझे कोई कमी नहीं

अस्ति की खोज उनकी शायरी लक्ष्य है तो प्रेम शायद उसका रास्ता. ऐसा मुझे लगता है. कदम-कदम पर वह अपनी तासीर में अस्तित्ववाद की ओर बढते दिखाई देते हैं :
तुम मुखातिब भी हो करीब भी हो
तुमको देखूं कि तुमसे बात करूं
या फिर जब वह कहते हैं :
आज उन्हें मेहरबां पा कर
खुश हुए और जी में डर भी गए.

द्वंद्व का यह आलम फिराक में हर तरफ है. तभी तो प्रेम का साफ-साफ जिक्र आने पर भी वह कहते हैं:
मासूम है मुहब्बत लेकिन इसी के हाथों
ऐ जान-ए-इश्क मैने तेरा बुरा भी चाहा
फिर वही फिराक यह भी कहते हैं :
हम से क्या हो सका मुहब्बत में
खैर तुमने तो बेवफाई की.

व्यवहार में फिराक जो भी रहें हों, पर यकीनन शायरी में तो वह मुझे आत्ममुग्धता के शिकार नहीं, आत्मविश्लेषण और आत्मानुसंधान के आग्रही नजर आते हैं.
लीजिए इस अलाहदा शायर की एक गजल आपके लिए भी :
अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूं ही कभू लब खोलें हैं
पहले “फिराक” को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं
दिन में हम को देखने वालो अपने अपने हैं ओकात
जाओ ना तुम इन खुश्क आंखों पर हम रातों को रो ले हैं
फितरत मेरी इश्क-ओ-मुहब्बत किस्मत मेरी तनहाई
कहने की नौबत ही ना आई हम भी कसू के हो ले हैं
बाग़ में वो ख्वाब-आवर आलम मौज-ए-सबा के इशारों पर
डाली डाली नौरस पत्ते सहस सहज जब डोले हैं
उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंधें
हाय वो आलम जुम्बिश-ए-मिज़गां जब फित्ने पर तोले हैं
इन रातों को हरीम-ए-नाज़ का इक आलम होए है नदीम
खल्वत में वो नर्म उंगलियां बंद-ए-काबा जब खोलें हैं
गम का फ़साना सुनाने वालो आख़िर-ए-शब् आराम करो
कल ये कहानी फिर छेडेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं
हम लोग अब तो पराए से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-“फिराक”
अब तो तुम्हीं को प्यार करे हैं अब तो तुम्हीं से बोले हैं.

इष्ट देव सांकृत्यायन

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जालिब की गज़लें

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 13, 2007

हबीब जालिब वाली पोस्ट पर प्रतिक्रिया करते हुए उड़न तश्तरी वाले भाई समीर जी ने अनुरोध किया है कि हो सके कुछ पूरी कविताएँ पढ़वाएं. वैसे उनकी एक कविता ‘पाकिस्तान का मतलब क्या’ पहले ही इयत्ता पर पोस्ट की जा चुकी है. यहाँ मैं जालिब साहब की कुछ गजलें दे रहा हूँ, जो मुझे. बहुत पसंद आईं.

……गली में ना आएं हम

ये और बात तेरी गली में ना आएं हम
लेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हम
मुद्दत हुई है कू-ए-बुताँ की तरफ गए
आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएं
हम शायद बाक़ैद-ए-ज़ीस्त ये साअत ना आ सके
तुम दास्ताँ-ए-शौक़ सुनो और सुनाएं हम
बेनूर हो चुकी है बहुत शहर की फजा
तारीक रास्तों में कहीँ खो ना जाएँ हम
उस के बग़ैर आज बहुत जी उदास है
‘जालिब’ चलो कहीं से उसे ढूँढ लाएं हम

इस शहर-ए-खराबी में ……
इस शहर-ए-खराबी में गम-ए-इश्क के मारे
ज़िंदा हैं यही बात बड़ी बात है प्यारे
ये हंसता हुआ लिखना ये पुरनूर सितारे
ताबिंदा-ओ-पा_इन्दा हैं ज़र्रों के सहारे
हसरत है कोई गुंचा हमें प्यार से देखे
अरमां है कोई फूल हमें दिल से पुकारे
हर सुबह मेरी सुबह पे रोती रही शबनम
हर रात मेरी रात पे हँसते रहे तारे
कुछ और भी हैं काम हमें ए गम-ए-जानां
कब तक कोई उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सँवारे

…….हर्फ़-ए-सदाकत लिखना
और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाकत लिखना
रह गया काम हमारा ही बगावत लिखना
लाख कहते रहें ज़ुल्मत को ना ज़ुल्मत लिखना
हमने सीखा ही नहीं प्यारे बाइजाज़त लिखना
ना सिले की ना सिताइश की तमन्ना हमको
हक में लोगों के हमारी तो है आदत लिखना
हमने जो भूल के भी शाह का कसीदा ना लिखा
शायद आया इसी खूबी की बदौलत लिखना
उस से बढ कर मेरी तहसीन भला क्या होगी
पढ़ के नाखुश हैं मेरा साहब-ए-सर्वत लिखना
दहर के गम से हुआ रब्त तो हम भूल गए
सर्व कामत की जवानी को क़यामत लिखना
कुछ भी कहते हैं कहें शाह के मसाहिब
‘जालिब’ रंग रखना यही अपना इसी सूरत लिखना

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पाकिस्तान का मतलब क्या?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 12, 2007

रोटी, कपड़ा और दवा
घर रहने को छोटा सा
मुफ़्त मुझे तालीम दिला
में भी मुसलमान हूँ वल्लाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह …

अमरीका से मांग ना भीख
मतकर लोगों की तजहीक
रोक ना जम्हूरी तहरीक
छोड़ ना आज़ादी की राह
पाकिस्तान का मतलब है क्या
ला इलाह इल्लल्लाह…

खेत वदेरों से ले लो
मिलें लुटेरों से ले लो
मुल्क अंधेरों से ले लो
रहे ना कोई आलीजाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह…

सरहद, सिंध, बलूचिस्तान
तीनों हैं पंजाब कि जान
और बंगाल है सब कि आन
आई ना उन के लब पर आह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह…

बात यही है बुनियादी
घसिब कि हो बर्बादी
हक कहते हैं हक आगाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह …

हबीब जालिब

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अशआर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 18, 2007

झूठे सिक्कों में भी उठा देते हैं अक्सर सच्चा माल
शक्लें देख के सौदा करना काम है इन बाजारों का.

******** ******** ********
एक जरा सी बात थी जिसका चर्चा पहुँचा गली-गली
हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का.
******** ******** ********
दर्द का कहना चीख उठो दिल का तकाजा वजा निभाओ
सब कुछ सहना चुप-चुप रहना काम है इज्ज़तदारों का.
इब्न-ए-इंशा

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अशआर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 17, 2007

कुदरत को नामंज़ूर थी सख्ती ज़बान में.
इसीलिये हड्डी न अता की ज़बान में.
-अज्ञात
चमक शीशे के टुकड़े भी चुरा लाते हैं हीरे की ,
मुहब्बत की नज़र जल्दी में पहचानी नहीं जाती.
जिधर वो मुस्कराकर के निगाहें फेर लेते हैं –
क़यामत तक फिर उस दिल की परेशानी नहीं जाती.
-अज्ञात
यूं ज़िन्दगी में मेरे कोई कमी नहीं-
फिर भी ये शामें कुछ माँग रही हैं तुमसे.
फिराक गोरखपुरी
ये जल्वागहे खास है कुछ आम नहीं है.
कमजोर निगाहों का यहाँ काम नहीं है.
तुम सामने खुद आए ये इनायत है तुम्हारी,
अब मेरी नज़र पर कोई इलज़ाम नहीं है.

-अज्ञात

बारिश हुई तो फूलों के दिल चाक़ हो गए.

मौसम के हाथों भीग कर शफ्फाक हो गए.

बस्ती के जो भे आबगज़ीदा थे सब के सब-

दरिया ने रुख़ बदला तो तैराक हो गए.

– परवीन शाकिर

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अशआर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 31, 2007

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहॉ
जिंदगी ग़र कुछ रही तो नौजवानी फिर कहॉ.
इस्माइल मेरठी

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गीतों से

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 31, 2007

हम नए हैं
नए थे भी
नए आगे भी रहेंगे

यह हमारा गीत होना
सुनो समयातीत होना है
बन सदाशिव
जहर से अमृत बिलोना है
कल दहे थे
दह रहे हैं
कंठ आगे भी दहेंगे

हम नए हैं
नए थे भी
नए आगे भी रहेंगे
कुमार रवीन्द्र

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अशआर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 30, 2007

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह
ये हकीकत देख लेकिन खौफ के मारे न देख.

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है.
दुष्यंत कुमार

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