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Archive for the ‘बा-अदब’ Category

फागुन आया रे!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 28, 2010

मेरे एक कवि मित्र ने घोषणा की है फागुन आया रे! कब आया, कहां से आया, किस रास्ते आया, किसके मार्फ़त आया और कब तक ठहरेगा… इन सवालों का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है. सीधे काम की बात पर आ गए. सबसे पहले सीधे यही बता दिया कि किसलिए आया है. एकदम दिल्ली वालों की तरह. गोया फागुन के आने की सूचना सिर्फ़ दिल्ली वालों के लिए है. बल्कि सही पूछिए तो आपके लिए आपके साथ सदैव का नारा देने वाली दिल्ली पुलिस के लिए. जो थाने में ख़ून से लथपथ आदमी की भी शक्ल देखते ही सीधा सवाल करती है, हां बोलो. तो किसी को यह पूछने की ज़रूरत नहीं कि वह किसलिए आया है. उसके इरादे उन्होंने पहले ही ज़ाहिर कर दिए हैं. और जो इरादे उन्होंने ज़ाहिर किए हैं, वह बिलकुल नेक नहीं लगते.
बहरहाल, फागुन नंगा-लुच्चा-उचक्का-लफंगा जो भी हो, पर मेरे कवि मित्र पूरे ईमानदार हैं. तो उन्होंने बताया है- गोरी को बहकाने फागुन आया रे. हालांकि एक जगह उन्होंने यह भी कहा है कि वह प्रेम रस बरसाने आया है, पर अगले ही बन्द में फिर स्पष्ट कर दिया है तन-मन को भरमाने फागुन आया रे. अब अगर ग़ौर करें तो मालूम होता है कि ये प्रेम रस बरसाने वाला फागुन पहले तो गोरी को बहकाने और फिर तन-मन को भरमाने वाला है. बीच में यह जो प्रेम रस बरसाने की बात है वह बिलकुल वैसे ही है जैसे कि डिबॉच प्रेमियों के प्रेम का पूरा सिलसिला होता है.
ये ऐसा सिलसिला होता है जिसके प्रति अब की गोरियां-सांवलियां जो भी हैं, वो पहले से ही सतर्क रहती हैं. पहले की लड़कियां इसके बीच वाले पद के ही फेर में पड़ती थीं. और फागुन इसका झांसा देकर धीरे से गा डालता था अंतिम पद. बाद में जब मामला आगे तक बढ़ जाता था तो फिर सब गुण गोबर हो जाता था. ये तो अच्छा हुआ कि अब समाज मध्यकाल के सियापे से निकल कर उत्तर आधुनिक होने लगा है. आधुनिक होने का सही मतलब चित्रकला ने बहुत पहले ही बता दिया है. वैसे ही जैसे चित्रकला क्लासिसिज़्म, नियो क्लासिसिज़्म, रोमांटिक, एकेडमिक और रिअलिज़्म के दौर से होते हुए मॉडर्निज़्म और पोस्ट मॉडर्निज़्म तक आ गई है. मॉडर्निज़्म तक आने की प्रेरणा ही इसने गुफाओं के भित्तिचित्रों से ली थी. अब समाज यही प्रयोग कर रहा है. लिव-इन रिलेशनशिप और अनमैरेड मदरहुड की प्रेरणा भी विद्वान लोगों के मुताबिक शरीरों की समसामयिक ज़रूरतों से नहीं, पौराणिक आख्यानों से मिलती है.
ख़ैर जो भी हो, पर इस प्रेरणा ने एक काम बड़ा अच्छा किया है. इसने फागुन टाइप प्रेमियों को बेदर्दी बालमा, बेईमान साजन और बेवफ़ा सनम टाइप मानद उपाधियों से बचाया है. रबड़ के सुरक्षा कवच और आपातकालीन गोलियों ने इस नव-स्वातंत्र्यवाद (आसान भाषा में कहना चाहें तो आप इसे नए तरह का स्वतंत्रतावाद कह सकते हैं) को थोड़ी और हवा दी है. एड्सविरोध के नाम पर चल रहे अभियानों ने अगर फागुनों की हौसला अफ़जाई की है बहकाने के मामले में, तो इन गोलियों के ज्ञान ने गोरियों को प्रेरणा भी दी है बहकने की. कोई भरोसा नहीं अगर नव-उत्तरआधुनिकतावादी विज्ञापनों में (वैसे विज्ञापन बनवाने, बनाने और देखने वाले किसी वाद-विवाद के बवाल में नहीं पड़ते) एक गोरी दूसरी गोरी को फागुन की ओर दिखा कर गोलियों की तरफ़ इशारा करे और इन गोलियों के बारे में न जानने पर उसकी मलामत करती मिले. …. क्या जानती है तू अगर इन्हें ही नहीं जानती. और अंत में निष्कर्ष कुछ ऐसा आए.. पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें.
गीतों-गाथाओं में दर्ज लोकजीवन के अनुभवों पर भरोसा करें तो इस पूरे मामले के लिए एकमात्र ज़िम्मेदार फागुन ही है. अनमैरेड मदरहुड से लेकर एड्स तक. यूं तो इसके नाम पर बहुत कुछ बेचा जा रहा है, पर करोड़ों की ग्रांट भी डकारी जा रही है और बताया जा रहा है कि बचाव का इकलौता जो रास्ता है वह जानकारी है. जानकारी किसकी? एड्स की या उन साधनों की जो इसे बदनाम करके बेचे जा रहे हैं? एक तरफ़ बाबा रामदेव हैं जो संयम की साधना कराने पर तुले हैं और दूसरे कई-कई रूपों में बाबा कामदेव हैं जो कंडोम की साधना कराने पर तुले हैं. संयम से चलकर यह जो हमारी संस्कृति कंडोम तक आई है, यह फागुन की ही कृपा से तो हुआ है. जब तक स्वयंसेवी संगठन और सरकार यह काम संभालने की स्थिति में नहीं थे, तब तक यह काम फागुन जी ने ही देखा. अब सरकार को यह भरोसा हो गया है कि वह ख़ुद यह काम कर सकती है, तो उसने इसे सीधे अपने हाथ में ले लिया है. फागुनजी को साल में सिर्फ़ एक महीने के लिए बुलाती है मॉनिटरिंग और सुपरविज़न के लिए. बाक़ी पूरे देश में अपने कामकाज की समीक्षा करके वह मुंबई में जाकर डेरा डाल लेते हैं.
मुंबई में रहने वाले लोग बताते हैं कि वहां बारहों महीने फागुन जी की कृपा बनी रहती है और इसीलिए वे लोग मुंबई के मुरीद हैं. शायद इसीलिए बहुत लोगों को यह भ्रम हो गया है कि फागुन जी ओरिजिनली यहीं के हैं. वैसे ही जैसे पूरे भारत में कुछ लोगों को यह भ्रम है कि वे जो हैं कि वो आर्य हैं और सारे आर्य ओरिजिनली यहीं के हैं. पता नहीं फागुन जी को मराठी बोलनी आती भी है या नहीं! ग़नीमत है कि यह बात अभी मराठा अभिमानवादियों को पता नहीं चली कि फागुन जी ओरिजिनली मुंबईकर नहीं हैं. अगर कहीं पता चल जाए तो क्या होगा? शायद इसीलिए नए ज़माने की रीति-नीति से वाकिफ़ मेरे कवि मित्र ने फागुन के साथ पुरवाई का ज़िक्र बिलकुल नहीं किया है. चाहे भले फागुन बिना पासपोर्ट-वीज़ा के पाकिस्तान से आया हो, बंग्लादेश या चीन से आया हो, या फिर अफ्रीका, म्यांमार, इथियोपिया, इंडोनेशिया से आया हो; बस उसे उत्तर भारत से आया हुआ नहीं होना चाहिए. पुरवाई का ज़िक्र होते ही यह बात तय हो जाती है कि वह उत्तर भारत से आया है और ऐसी स्थिति में दिल्ली दरबार में उस पर प्रोफेशनल टैक्स लगाया जाता है मुंबई में जूते ईनाम मिलते हैं.
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संघे शरणं गच्छामि….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 28, 2009

लोकतांत्रिक भारत में पैदा हुए राजकुमार तमाम आर्यसत्यों को समझते-समझते ख़ुद मंत्री बन गए. असल में अब ईसापूर्व वाली शताब्दी तो रही नहीं, यह ईसा बाद की 21वीं शताब्दी है और ज़िन्दगी के रंग-ढंग भी ऐसे नहीं रह गए हैं कि कोई बिना पैसे-धेले के जी ले. वैसे तो उन्हें जब भी अपना पिछ्ला जन्म याद आता तो अकसर उन्हें यह सोच कर कष्ट होता था कि वे भी क्या दिन थे. मांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी, अकसर तो बिन मांगे ही बड़े आराम से भिक्षा मिल जाती थी. जो लोग जान जाते कि यह तो राजपुत्र है, वे तो यह भी इंतज़ार नहीं करते थे कि उनके दरवाज़े तक पहुंचूं मैं. जहां जाता, अगर मेरे वहां पहुंचने या होने की सूचना मिल जाती तो राज परिवारों से जुड़े लोग बहुत लोग तो ख़ुद ही चलकर आ जाते थे भिक्षा देने नहीं, चढ़ावे चढ़ाने. कई राज परिवार तो तैयार बैठे रहते थे संन्यास दीक्षा लेने के लिए पहले से ही. एक ज़माना यह है, अब मांगो भी भीख नहीं मिलती. अब भीख सिर्फ़ तब मिलती है जब आप किसी बड़े बाप के आंख के तारे को उससे दूर कर दें. छिपा दें कहीं और फिर फ़ोन से सूचना दें कि भाई इतने रुपये का चढ़ावा इस स्थान पर इतने बजे रख जाएं. और ध्यान रखें, किसी प्रकार की समझदारी करने की कोशिश न करें यानी पुलिस-वुलिस को सूचना न दें, वरना आसपास मौजूद हमारे भदंत आपको वहीं से महापरिनिर्वाण को उपलब्ध करा देंगे. या फिर आप कोई लाइसेंस-वाइसेंस दिलाने की हैसियत में हों और उसे रोक दें. या फिर तब जब आप इनकम टैक्स विभाग से काला-सफ़ेद करने का पक्का परवाना रखते हों और दो लाख लेकर 10 लाख की रसीद दे सकें. अब जीवन की पृहा से मुक्ति के लिए संत नहीं बना जा सकता है, बल्कि तमाम संपदाएं अर्जित करने के लिए संत बना जाता है. संत बन कर वे सारी सुविधाएं हासिल की जाती हैं जो दिन-रात खटने वाले गृहस्थों को भी हासिल नहीं होती हैं.
लिहाज़ा इस जीवन में महापरिनिर्वाण पुराने वाले तरीक़े से तो नहीं मिलने वाला है, ये तो तय है. परिनिर्वाण प्राप्त करने के लिए तप का तरीक़ा दूसरा ही अपनाना होगा. तो सबसे पहले उन्होंने सरस्वती की ध्यान साधना की, देश के सबसे बड़े अगिया बैताल की छत्रछाया में. एक से बढ़कर एक चमत्कार किए उन्होंने ध्यान साधना के तहत. इसी दौरान कुछ नए देवताओं से उनका संपर्क हुआ और उन्होंने जान लिया कि जनता अब तक जिन देवताओं को पूजती आ रही है वे सब के सब बिलकुल ग़लत-सलत देवता हैं. जनता इन्हें झुट्ठे पूजती है, असली देवता तो दूसरे हैं. उन्होंने यह बात समझी और किसी ध्यान साधक की तरह बात समझ में आते ही नए मिले देवताओं की पूजा शुरू कर दी.
अब ज़ाहिर है जब आप किसी देवता को पूजिएगा तो चाहे नया हो या पुराना, वह फल तो देगा ही. बल्कि नए देवता थोड़ा ज़्यादा ही फल देते हैं. सो उन्होंने दिया भी. उन्होंने सबसे पहले तो इन्हें समझाया कि भाई देख सरस्वती की साधना से आज तक किसी को भी निर्वाण नहीं मिला है. निर्वाण मिलता है विष्णु भगवान की कृपा से और विष्णु जी मानते हैं लक्ष्मी जी को. उनकी ही सिफ़ारिश चलती है विष्णु भगवान के सामने. तो अब तू उन्हीं की साधना और साधना उस अगिया बैताल के यहां नहीं हो सकती. यह साधना तुझे करनी होगी हमारी छत्रछाया में, तो चल ये ले मंत्री पद और संभाल अपनिवेश का कारोबार.
राजकुमार ने तुरंत यह साधना शुरू की और अबकी बार इतने मन से की कि कुछ भी बक़ाया नहीं छोड़ा. अपनिवेश का काम उन्होंने इतने मन से किया कि उनके देवराज का सिंहासन डोलने लगा. ऐन वक़्त पर उनके हाथ से जान छुड़ाकर भाग गया देश, वरना उन्होंने उसे भी नहीं छोड़ा होता. ख़ैर उनके सपने अधूरे नहीं रहेंगे, इसका भरोसा उनके बाद उनके मार्ग के साधकों ने दिला दिया. इसीलिए बाद में कुछ विकल्पहीनता की त्रासदी और कुछ ईवीएम की कृपा ने जनता से उन्हें ऐज़ इट इज़ कंटीन्यू भी करवा दिया. बहरहाल, मंत्रालयी दौर में ही राजकुमार राष्ट्र अपश्रेष्ठि के ऐसे प्रिय हुए कि हवाई अड्डे पर उनके गुरुभाई इंतज़ार ही करते रहते और राजकुमार स्वयं विमान के पिछले दरवाज़े निकल अपश्रेष्ठि के कलाकक्ष में पहुंच जाते.
पर इसके बाद से बेचारे राजकुमार का मन उखड़ गया. उनकी समझ में एक तो यह बात आ गई कि राष्ट्र ऐसे चलने वाला नहीं है. राष्ट्र में अब दुख ही दुख है और दुख से उबार सकने की ताक़त रखने वाले इकलौते विहार में अब कोई दम नहीं रह गया है. यहां तक कि इसके जो देवता हैं, उन्हें उनके ही कुछ भक्तों ने अंतर्ध्यान यानी कि नज़रबन्द कर दिया है. तब? अब क्या किया जाए? यह प्रश्न उठा तो उन्होंने एक बार फिर ध्यान लगाया और पाया कि इस विहार के पीछे एक संघ है. वैसे तो विहार में प्रवेश का रास्ता ही संघ से होकर आता था, लेकिन राजकुमार को राजकुमार होने के नाते उसकी ज़रूरत शायद नहीं पड़ी थी. पर अभी उन्हें अचानक उसकी अहमियत पता चल गई और इसीलिए उन्होंने एकदम से घोषणा कर दी.
हालांकि घोषणा जो उन्होंने की, वह अंग्रेजी में की और अब क्या बताएं! यह कहते हुए मुझे बड़ी शर्म आती है कि वह मेरी समझ में बिलकुल वैसे ही ज़रा भी नहीं आई, जैसे 6 साल पहले उनके विहार का इंडिया साइनिंग और फील गुड़ वाला नारा पूरे देस की अनपढ़ जनता के समझ में नहीं आया था. ख़ैर, हमने सोचा कि अपन मित्र सलाहू किस दिन काम आएगा. सों हमने उससे पूछ लिया. उसने जो बताया और उसका जो लब्बोलुआब मेरी समझ में आया वो ये कि अब ये जो अपना विहार है इसकी स्थिति बिहार जैसी हो गई है और राजा साहब की हालत लालू और रामबिलास पासवान जैसी हो गई है. विहार के जो और भदंत हैं ऊ त बेचारे सब ऐसे हो गए हैं जैसे पंचतंत्र का वो सियार जो एक बछड़े के बाप के पीछे-पीछे लगा था.
ज़ाहिर है, अब ऐसे में ये सवाल तो उठना ही था कि फिर क्या किया जाए. कैसे मिलेगा निर्वाण. सवाल उठते ही उन्होंने तुरंत ध्यान लगाया. ध्यान में नारद मुनि आए. देवर्षि को राजकुमार ने अपनी समस्या बताई तो उन्होंने तुरंत उन्हें सूतजी से मिलवाया. भला हो सूतजी का कि उन्होंने इस घोर कलिकाल में कथाओं पर उमड़ते-घुमड़ते शंकाओं के बादलों को देखते हुए कथा सुनने का कोई उपाय नहीं बताया. उन्होंने लौकिक उपाय बताते हुए राजकुमार को संघ के शरण में जाने का उपाय सुझाया. वही बहुमूल्य उपाय कुछ दिनों पूर्व उन्होंने मृत्युलोक के वासियों को बताया है. नया उपाय जानकर लोकवासियों में धूम मचनी ही थी, सो वो मची हुई है. सभी जाप कर रहे हैं : संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि…… आप भी कर के देख लीजिए. क्या पता दुख के जिन्न से पीछे छूट जाए.

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सस्ते से सस्ती दिल्ली

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 27, 2009

लीजिए जनाब! ख़ुश हो जाइए. क्या कहा? क्यों ख़ुश हों? अरे भाई ख़ुश होने के लिए भी आपको कोई कारण चाहिए? असली आदमी हमेशा ख़ुश होना चाहता है, बस इसलिए आप भी ख़ुश हो जाइए. और कोई ख़ास कारण चाहिए तो आपको बता दूं कि दिल्ली और मुंबई नाम के जो शहर इस धरती पर हैं, वे दुनिया के सबसे सस्ते शहर हैं. यह कोई भारत सरकार नहीं कह रही है, जिसकी हर बात को आप सिर्फ़ आंकड़ों की रस्साकशी मानते हैं. और न किसी भारतीय एजेंसी ने ही जिनके बारे में आप यह मानकर ही चलते हैं कि उसे सर्वे का ठेका ही मिल जाना बहुत है. एक बार उसे ठेका दें और बेहतर होगा कि सर्वे से आप जो निष्कर्ष चाहते हैं वह उसे पहले ही बता दें. फिर आप जिसे जैसा देखना या दिखाना चाहते हैं, उसे वैसा ही देखने और दिखाने का पूरा इंतज़ाम सर्वे एजेंसियां कर देंगी. अब तो लोकतंत्र के मामले में भी वे इसे सच साबित कर देने में भी सक्षम हो गई हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं रह गई है.
लेकिन नहीं साह्ब यह बात उन भारतीय एजेंसियों ने भी नहीं कही है. यह कहा है एक अतयंत प्रतिष्ठित स्विस बैंक ने. और आप तो जानते ही हैं ईमानदारी के मामले में हमारे देश ही क्या, दुनिया भर के बड़े-बड़े लोग स्विस बैंकों की ही क़समें खाते हैं. अभी हाल ही में चुनाव के दौरान अपने आडवाणी जी खा रहे थे. उनके पहले 89 के चुनाव में आपने राजा साहब को खाते हुए देखा होगा. अरे वही राजा साहब जो दरसल फ़क़ीर थे और बोफोर्स घोटाले के सारे दस्तावेज़ प्रधानमंत्री बनने के पहले तक अपनी जेब में ही लेकर घूमा करते थे. ख़ैर छोड़िए भी, अब इन सब बातों से क्या फ़ायदा? अपने ही स्तर की बात करें तो भी यह तो हम-आप जानते ही हैं कि दुनिया भर की ग़रीब जनता की ख़ून-पसीने की कमाई स्विस बैंकों में ही रखी है. तो भला सोचिए, ईमानदारी का उनसे बड़ा जीवंत प्रतीक और क्या हो सकता है! ख़बर यह है कि स्विस बैंक ने दुनिया भर के 73 बड़े शहरों का सर्वे कराया है. इसी सर्वे के आधार पर उसने दुनिया के सबसे महंगे शहरों की सूची जारी की है. यह जो सूची जारी हुई है उसमें दिल्ली और मुंबई का नाम सबसे नीचे हैं. यूं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचार-अराजकता जैसे कुछ महत्वपूर्ण मामलों की बात छोड़ दी जाए तो समूचे भारत का ही नाम अकसर किसी भी सूची में सबसे नीचे ही होता है. तो जी हम तो इतने से ही संतुष्ट हैं. इससे ऊपर जाने का अपन का कोई इरादा ही नहीं है. ओस्लो, ज्यूरिख, कोपेनहेगन इस सूची में पहले, दूसरे, तीसरे नम्बर पर हैं तो रहा करें. मॉस्क़ो, मेक्सिको सिटी और सिओल भी उप्पर हैं तो बने न रहें, हमारा क्या जाता है. अब यह अलग बात है कि उस ख़बर में यह बात कहीं नहीं बताई गई है कि ये सर्वे किया किसने है. कराया तो है ईमानदारी की मिसाल माने जाने वाले स्विस बैंक ने, पर किया किसने ये बेचारे आम आदमी को पता ही नहीं चल पाया.
ख़ैर, जिसने भी किया हो, यह बाद की बात है. इससे एक बात तो हुई है कि जो लोग अभी तक महंगाई-महंगाई चिल्ला रहे थे बार-बार और अपनी बेचारी सरकार की इस बात पर भी यक़ीन नहीं कर रहे थे कि मुद्रास्फीति दर घटी है और महंगाई भी घट गई है, अब उनकी बोलती बंद हो गई है. जो लोग इसे सरकार की ओर से आंकड़ों की बाजीगरी मान रहे थे, वे सोच नहीं पा रहे हैं कि अब क्या तर्क़ दें. वैसे तर्क़ तो उनके पास पहले भी नहीं थे.
बहरहाल, अपन चूंकि दिल्ली में रहते हैं और ये देख रहे हैं कि पांच-छह साल जो मकान दो हज़ार रुपये महीने के किराये पर उपलब्ध था, वह अब 8 हज़ार में भी मिलने वाला नहीं है. ख़रीदने पर जो फ्लैट 5 लाख में आसानी से मिल जाता था, वह अब सीधे 20 लाख का हो चुका है. लेकिन जनाब यह भी तो देखिए, कि अब मकान आपको सफ़ेदी कराके मिलेगा. तो जब घर सफ़ेदी कराके ख़रीदेंगे तो उसका दाम तो बढ़ ही जाएगा न. आलू 5 से 30 रुपये किलो हो गया, आटा 8 से 20 रुपये किलो पर पहुंच गया… तो क्य हो गया? आप यह क्यों नहीं सोचते कि देश में सिर्फ़ आलू-आटा और मकान-कपड़ा ही तो सबसे महत्वपूर्ण नहीं है. कई चीज़ें इनसे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं. मसलन लैपटॉप, टीवी, मोबाइल..
आप कहेंगे इन चीज़ों की हमें बहुत ज़रूरत नहीं होती. जी कोई बात नहीं. रोज़गार की ज़रूरत तो आपको होती है. भारत में वह सबसे महंगी चीज़ों में शुमार है. यक़ीन न हो तो किसी पढ़े-लिखे नौजवान से पूछ कर देख लें. सरकारी दफ़्तर में चपरासी बनने के लिए भी दो लाख रुपये देने को तैयार हो जाएगा. ज़नाब दिल्ली में वह सबसे सस्ती चीज़ है. अगर आपको यक़ीन न हो बमुश्किल दो साल पहले हुई सीलिंग का दौर याद कर लीजिए. बहन-बेटियों की इज़्ज़त जिसके पीछे पूरा हिन्दुस्तान मरता है और राजस्थान में जौहर तथा सती प्रथा शुरू हो गई … दिल्ली में सबसे सस्ती है. ब्लू लाइन बसों की कीर्ति तो कीर्ति आज़ाद से भी ज़्यादा है और बहुत पहले से है. नई आई मेट्रो रेल ने भी साबित कर दिया कि यहां आम आदमी की जान भी सबसे सस्ती है. फिर भी आप नहीं मानते. अरे अब का चाहते हैं माई-बाप?

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अबकी बारिश में ये शरारत….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 10, 2009

 

सलाहू इन दिनों दिल्ली से बाहर है. किसी मुकद्दमे के सिलसिले में कोलकाता गया हुआ है. भगवान जाने किस जजमान (चाहें तो उसकी भाषा में मुवक्किल कह लें) को कात रहा है, वह भी मोटा या महीन. अच्छे दोस्त न हों तो आप जानते ही हैं दुश्मनों की कमी खलने लगती है. कल वह मिल गया जीमेल के चैटबॉक्स में. इस वर्चुअल युग में असली आधुनिक तो आप जानते ही हैं, वही है जो बीवी तक से बेडरूम के बजाय चैट रूम में मिले. ख़ैर अपन अभी इतने आधुनिक हुए नहीं हैं, हां होने की कोशिश में लगे ज़रूर हैं. काफ़ी दिनों बाद मुलाक़ात हुई थी. सो पहले हालचाल पूछा. इसके बावजूद कि उसकी चाल-चलन से मैं बख़ूबी वाक़िफ़ हूं और ऐसी चाल चलन के रहते किसी मनुष्य के हाल ठीक होने की उम्मीद करना बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे ईवीएम और पार्टी प्रतिबद्ध चुनाव आयुक्त के होते हुए निष्पक्ष चुनाव और उसके सही नतीजों का सपना देखने की हिमाक़त दिनदहाड़े करना. चूंकि दुनिया वीरों से ख़ाली नहीं है, लिहाजा मैं भी कभी-कभी ऐसी हिमाकत कर ही डालता हूं.

सो मैंने हिमाकत कर डाली और छूटते ही पूछ लिया, ‘और बताओ क्या हाल है?’

‘हाल क्या है, बिलकुल बेहाल है.’ सलाहू का जवाब था, ‘और बताओ वहां क्या हाल है? तुम कैसे हो?’

‘यहां तो बिलकुल ठीक है’, मैंने जवाब दिया,’और मैं भी बिलकुल मस्त हूं.’

‘अच्छा’ उसने ऐसे लिखा जैसे मेरे अच्छे और मस्त होने पर उसे घोर आश्चर्य हुआ. गोया ऐसा होना नहीं चाहिए, फिर भी मैं हूं. उसका एक-एक अक्षर बता रहा था कि अगर वह भारत की ख़ानदानी लोकतांत्रिक पार्टी की आका की ओर से प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया होता तो अभी मेरे अच्छे और मस्त होने पर ऐसा टैक्स लगाता कि मेरी आने वाली सात पीढियां भरते-भरते मर जातीं और तब भी उसकी किस्तें क्रेडिट कार्ड के कर्ज की तरह कभी पूरी तरह चुक नहीं पातीं.

‘ये बताओ, वहां कुछ बरसात-वरसात हुई क्या?’उसने पूछा.

‘हां हुई न!’ मैंने जवाब दिया, ‘अभी तो कल रात ही हुई है. और वहां क्या हाल है?’

‘अरे यार यहां तो मत पूछो. बेहाल है. नामो-निशान तक नहीं है बरसात का.’

‘क्या बात करते हो यार! अभी तो मैंने आज ही टीवी में देखा है कि कोलकाता में क़रीब डेढ़ घंटे तक झमाझम बारिश हुई है!’ मैंने उसे बताया.

‘तुम मीडिया वाले भी पता नही कहां-कहां से अटकलपच्चू ख़बरें ले-लेकर आ जाते हो.’ उसने मुझे लताड़ लगाई, ‘ ऐसे समय में जबकि ज़ोरों की बारिश होनी चाहिए कम-से-कम तीन-चार दिन तक तो एकदम लगातार, तब डेढ़ घंटे अगर बारिश हो गई तो उसे कोई बारिश माना जाना चाहिए?’

अब लीजिए इन जनाब को डेढ़ घंटे की बारिश कोई बारिश ही नहीं लगती. इन्हें कम-से-कम तीन-चार दिनों की झमाझम बारिश चाहिए और वह भी लगातार. ‘भाई बारिश तो यहां भी उतनी ही हुई है. बल्कि उससे भी कम, केवल आधे घंटे की. तो भी मैं तो ख़ुश हूं कि चलो कम-से-कम हुई तो. और तुम डेढ़ घंटे की बारिश को भी बारिश नहीं मानते?’

‘अब तुम्हारे जैसे बेवकूफ़ चाहें तो केवल बादल देखकर भी ख़ुश हो सकते हैं और लगातार मस्त बने रह सकते हैं.’

‘सकते क्या हैं, बने ही रहते है. देखो भाई, ख़ुश रहना भी एक कला है, बिलकुल वैसे ही जैसे जीवन जीना एक कला है. जिन्हें जीने की कला आ जाती है उन्हें काला हांडी में अकाल नहीं दिखाई देता, अकाल राहत के प्रयास दिखाई देते हैं. उन्हें उस प्रयास के बावजूद पेट की खाई भरने के लिए अपने बच्चे बेचते लोग दिखाई नहीं देते, राहतकार्यों के लिए आए बजट से न केवल अपनी, बल्कि अपने रिश्तेदारों, भाई-भतीजों, दोस्तों और इक्के-दुक्के पड़ोसियों तक की ग़रीबी को बंगाल की खाड़ी में डुबे आते लोग दिखाई देते हैं. जिन्हें वह कला आती है, उन्हें बाढ़ राहत में धांधली नहीं, राहत कोश से अफ़सरों और मंत्रियों के भरते घर दिखाई देते हैं. उन्हें ईवीएम में गड़बड़ी पर फ़ैसला कोर्ट का नहीं, चुनाव आयोग का काम दिखाई देता है. ठीक वैसे ही जिन्हें यह कला आती है, वे डेढ़ घंटे  की  बारिश की निन्दा नहीं करते, बादल देखकर भी प्रसन्न हो जाते हैं.’

‘तो रहो प्रसन्न.’ उसने खीज कर लिखा.

‘हां, वो तो मैं हूं ही.’ मैंने उसे बताया, ‘तुम्हें शायद मालूम नहीं इतनी ग़रीबी और तथाकथित बदहाली के बावजूद दुनिया में खुशी के इंडेक्स पर भारत का तीसरा नम्बर है. जीवन जीने की कला के मामले में पूरी दुनिया हम भारतीयों का लोहा मानती है. जानते हो कैसे?’

‘कैसे?’

‘ऐसे कि ऐसे केवल हमीं हैं जो नेताओं से सिर्फ़ वादे सुनकर ख़ुश हो जाते हैं. उन्हे निभाने की उम्मीद तो हमारे देश की जनता कभी ग़लती से भी नहीं करती है. ऐसे समय में जबकि पूरा देश महंगाई और बेकारी से मर रहा हो, हम धारा 377 पर बहस करने में लग जाते हैं. अगर कोई न भी लगना चाहे इस बहस में और वह महंगाई-बेकारी की बात करना चाहे तो हमारे बुद्धिजीवी उसकी ऐसी गति बनाते हैं कि बेचारा भकुआ कर ताकता रह जाता है. गोया अगर वह गे या लेस्बी नहीं है, तो उसका इस जगत में होना ही गुनाह है.’

‘हुम्म!’ बड़ी देर बाद सलाहू ने ऐसे हुम्म की जैसे  कोई मंत्री किसी योजना की 90 परसेंट रकम डकारने के बाद 10 परसेंट अपने चमचों के लिए टरका देता है.

‘अब बरसात का मामला भी समझ लो कि कुछ ऐसा ही है.’ मैंने उसे आगे बताना शुरू किया, ‘तुम्हें याद है न हमारे एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे. वह भी खानदानी तौर पर प्रधानमंत्री बनने की व्याधि से पीड़ित थे. इसके बावजूद उन्होंने कहा था कि हम जब किसी योजना के तहत 100 रुपये की रकम जनता के लिए जारी करते हैं तो उसमें से 85 तो पहले ही ख़त्म हो जाते हैं. मुश्किल से 15 पहुंच पाते हैं जनता तक.’

‘हुम्म!’ उसने चैटबॉक्स में लिखा और मुझे उसकी मुंडी हिलती हुई दिखी.

‘अब वह स्वर्गीय हो चुके हैं, ये तो तुम जानते ही हो.’ मैंने उसे बताया और उसने फिर चैट बॉक्स में हुंकारी भरी. तो मैंने आगे बताया, ‘तुमको यह तो पता ही होगा कि बड़े लोग प्रेरणास्रोत होते हैं. असली नेता वही होता है, जो देश ही नहीं, पूरी दुनिया की जनता को अपने बताए रास्ते पर चलवा दे.’

उसने फिर हुंकारी भरी तो मैंने फिर बताया, ‘अब देखो, वह अकेले ही तो गए नहीं हैं. उनसे पहले भी तमाम लोग वहां जा चुके थे और बाद में भी बहुत लोग गए हैं. वे सारे आख़िर वहां कर क्या रहे हैं! वही कला अब उन्होंने स्वर्ग के कारिन्दों को भी सिखा दी है. लिहाजा बारिश के साथ भी अब ऐसा ही कुछ हो रहा है. इन्द्र देवता बारिश का जो कोटा तय करके रिलीज़ कर रहे हैं उसमें से 90 परसेंट तो वहीं बन्दरबांट का शिकार हो जा रहा है. वह स्वर्ग के अफ़सरों और अप्सराओं के खाते में ही चला जा रहा है. जो 10 परसेंट बच रहा है, वह जैसे-तैसे धरती तक आ रहा है.’

‘तो क्या अब इतने में ही हम प्रसन्न रहें.’ उसने ज़ोर का प्रतिवाद दर्ज कराया.

‘हां! रहना ही पड़ेगा बच्चू!’ मैंने उसे समझाया, ‘न रहकर सिर्फ़ अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाने के अलावा और कर भी क्या सकते हो? जब धरती पर एक लोकतांत्रिक देश में हो रही अपने ही संसाधनों की बन्दरबांट पर हम-तुम कुछ नहीं कर सके तो स्वर्ग से हो रही बन्दरबांट पर क्या कर लेंगे?’

पता नहीं सलाहू की समझ में यह बात आई या नहीं, पर उसने इसके बाद चैटबॉक्स में कुछ और नहीं लिखा. अगर आपको लगता है कि कुछ कर लेंगे तो जो भी कुछ करना मुमकिन लगता हो वही नीचे के कमेंट बॉक्स में लिख दें.

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तो क्या कहेंगे?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 18, 2009

सलाहू आज बोल ही नहीं रहा है. हमेशा बिन बुलाए बोलने वाला आदमी और बिना मांगे ही बार-बार सलाह देने वाला शख्स अगर अचानक चुप हो जाए तो शुबहा तो होगा ही. यूं तो वह बिना किसी बात के बहस पर अकसर उतारू रहा करता है. कोई मामला-फ़साद हुए बग़ैर ही आईपीसी-सीआरपीसी से लेकर भारतीय संविधान के तमाम अनुच्छेदों तक का बात-बात में हवाला देने वाला आदमी आज कुछ भी कह देने पर भी कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हो रहा है. मुझे लगा कि आख़िर मामला क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि माया मेमसाहब द्वारा बापू को नाटकबाज कह देने से उसे सदमा लग गया हो! पर नहीं, इस बारे में पूछे जाने पर उसने मुझे सिर्फ़ देखा भर. ऐसे जैसे कभी-कभी कोई बड़ी शरारत कर के आने पर मेरे

पिताजी देखा करते थे. चुपचाप.

पर मैंने ऐसी कोई शरारत तो की नहीं थी. ज़ाहिर है, इसका मतलब साफ़ तौर पर सिर्फ़ यही था कि ऐसी कोई बात नहीं थी. फिर क्या वजह है? बार-बार पूछने पर भी सलाहू चुप रहा तो बस चुप ही रहा. जब भी मैंने उससे जो भी आशंका जताई हर बात पर वह सिर्फ़ चुप ही रहा. आंखों से या चेहरे से, अपनी विभिन्न भाव-भंगिमाओं के ज़रिये उसने हर बात पर यही जताया कि ऐसी कोई बात नहीं है.

अंततः यह आशंका हुई कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह गूंगा हो गया हो. वैसे भी हमारे समाज में जिह्वा को सरस्वती का वासस्थल माना जाता है और उसने जिह्वा का दुरुपयोग बेहिसाब किया है. मुवक्किलों से लेकर मुंसिफों तक. सरकार से लेकर ग़ैर सरकारी लोगों तक किसी को नहीं छोड़ा था. मुझे लगा क्या पता शब्द जिसे ब्रह्म का रूप कहा जाता है उसने इसका साथ छोड़ दिया हो, नाराज़गी के नाते. पर आत्मा से तुरंत दूसरी बात आई. अगर ऐसा होता तब तो यह बात पहले अपने साथ होनी चाहिए थी. आख़िर शब्दों का व्यापार करते हुए ऐसा कौन सा अपराध है जो शब्दों के ज़रिये अपन ने न किया हो! पर नहीं साहब अपन के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. ऐसा मास्टर के साथ भी नहीं हुआ, जो केवल हिन्दी ही नहीं, संस्कृत और अंग्रेज़ी भाषाओं के साथ भी शब्दों से हेराफेरी करता आ रहा है, पिछले कई वर्षों से. पर ना, उसके साथ भी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

हुआ तो बेचारे सलाहू के साथ. मुझे लगा कि हो न हो, यह किसी रोग वग़ैरह का ही मामला हो. मैं बेवजह पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में फंसा हुआ हूं और हर पढ़े-लिखे आदमी की तरह बेचारे अपने सबसे भरोसेमन्द मित्र के वैज्ञानिक इलाज के बजाय उसके और अपने पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में लग गया हूं. आख़िरकार उसके बार-बार इशारों से मना करने के बावजूद मैं उसे जैसे-तैसे पकड़-धकड़ कर डॉक्टर के पास ले ही गया. लेकिन यह क्या डॉक्टर तो उससे पूछने पर तुला है और है कि बोल ही नहीं पा रहा है. आख़िरकार डॉक्टर ने आजिज आकर पता नहीं कौन सा डर्कोमर्कोग्राम एपीएमवीएनेन कराने के लिए कह दिया. तमाम और डॉक्टरी क्रियाओं की तरह मैने इसका भी नाम तो सुना नहीं था, लिहाजा डॉक्टर से पूछ लेना ही बेहतर समझा कि भाई इसका कितना पैसा लगेगा. लेकिन यह क्या, जैसे ही डॉक्टर ने बताया, ‘कुछ ख़ास नहीं, बस बीस हज़ार रुपये लगेंगे और इस टेस्ट से पता न चला तो फिर अमेरिका जाना पड़ेगा. वैसे यह भी हो सकता है कि स्वाइन फ्लू हुआ हो….’

सलाहू चुप नहीं रह सका. एकाएक चिल्ला कर बोला, ‘अरे मेरी जान के दुश्मनों मुझे कुछ नहीं हुआ है. मैं बिलकुल ठीक हूं.”

’अबे तो अब तक बोल क्यों नहीं रहा था.’

’बस ऐसे ही.’

’क्या भौजाई ने कुछ कह दिया’

’उंहूं”

’फिर’

उसने फिर सिर हिलाया. न बोलने का नाटक करते हुए.

‘तो क्या कचहरी में कोई बात हो गई’

उसने फिर न में सिर हिलाया.

’तो फिर क्या बात हुई?’

अब वह एकदम चुप था. पुनर्मूषकोभव वाली स्थिति में आ गया था. न बोलने की कसम उसने लगता है फिर खा ली थी.

‘भाई क्या वजह है? बोल और बिलकुल सही-सही बता वरना ये जान लो कि अभी तुम्हारी डर्कोमर्कोग्रामी शुरू.’

डर्कोमर्कोग्रामी का नाम सुनते ही उसके होश फिर ठिकाने आ गए. आख़िरकार बेचारा बोल ही पड़ा, ‘देख भाई, ये न तो घर का मामला है और न कचहरी का. ये मामला असल में है पार्टी का. आज नहीं तो कल पार्टी में मुझे गूंगे होना ही पड़ेगा. लिहाजा उसकी प्रैक्टिस अभी से शुरू कर दी है.’

’वो क्यों भाई? भला तुझे पार्टी में गूंगा कौन बना सकता है?’ मैने पूछा, ‘मैडम का तू ख़ास भरोसेमन्द है?’

’सो तो हूं’, उसने बताया, ‘लेकिन आज ही से एक नया संकट आ गया है.’

’वह क्या’, मैंने फिर पूछा, ‘क्या तेरे बराबर भरोसा किसी और ने भी जीत लिया है?’

’नहीं भाई, ऐसी भी कोई बात नहीं है.’

‘फिर?’

’असल में आज ही एक नया फ़रमान जारी हुआ है.’

’वह क्या गूंगे होने का फ़रमान है.’

‘ना गूंगे होने का नहीं, वह गूंगे बनाने का फ़रमान है.’

’फ़रमान तो बताओ.’

‘बस यह कि अबसे कोई पार्टी और ख़ास तौर से पार्टी मालिकों के परिवार के सदस्यों के लिए सामंतवादी या कहें राजशाही सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा. अब कोई किसी को युवराज, राजा, राजमाता, महाराज … आदि-आदि नहीं कहेगा.’

’तो?’

’तुम्ही बताओ, तब अब हम क्या कहेंगे? इस तरह तो हमारी पार्टी के 99 फ़ीसदी कार्यकर्ताओं का सोचना तक बन्द हो जाएगा. बोलने की तो बात ही छोड़ मेरे यार.’

इतना कह कर वह फिर से गहन मौन में चला गया. ऋषि-मुनियों की तरह.

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पुरुख के भाग

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 19, 2009

‘हे दू नम्मर! अब का ताकते हो? जाओ. तुमको तो मालुमे है कि तुम्हरा नाम किलियर नईं हुआ. भेटिंगे में रह गया है.’
दो नंबर ने कहा कुछ नहीं. बस उस दफ्तर के चपरासी को पूरे ग़ुस्से से भरकर ताका. इस बात का पूरा प्रयास करते हुए कि कहीं उसे ऐसा न लग जाए कि वो उसे हड़काने की कोशिश कर रहे हैं, पर साथ ही इस बात का पूरा ख़याल भी रखा कि वह हड़क भी जाए. आंखों ही आंखों के इशारे से उन्होंने समझाना चाहा कि अबे घोंचू, बड़ा स्मार्ट बन रहा है अब. इसी दफ्तर में एक दिन मुझे देख कर तेरी घिग्घी बंध जाती थी. अब तू मुझे वेटिंग लिस्ट समझा रहा है और अगर कहीं उसमें मेरा नाम क्लियर हो गया होता तो आज तू दो हज़ार बार मेरे कमरे के कोने-अंतरे में पोंछा मारने आता कि कहीं से मेरी नज़र तेरे ऊपर पड़ जाए. ऐसा उन्होंने सोचा, लेकिन कहा नहीं. वैसे सच तो ये है कि यही उनकी ख़ासियत भी है. वो जो सोचते हैं कभी कहते नहीं और जो कहते हैं वो तो क्या उसके आसपास की बातें भी कभी सोचते नहीं हैं. वो वही दिखने की कोशिश करते हैं जो हैं नहीं और जो हैं उसे छिपाने में ही पूरी ऊर्जा गंवा देते हैं. ये बात बहुत दिनों तक उस दफ्तर में रहे होने के नाते उस चपरासी को भी मालूम थी. लिहाजा उसने ताड़ ली. पर उसने भी कुछ कहा नहीं. इतने लंबे समय तक सीधे सरकार के दफ़्तर में चपरासी रहने का बौद्धिक स्तर पर उसने यही तो फ़ायदा उठाया था. वो जानता था कि कभी भी कोई भी घोड़ा-गधा इस दफ़्तर में घुस सकता था. जो उसके जितनी भी क़ाबिलीयत नहीं रखता, वो पूरे देश के सारे अफ़सरों को हांकने का हक़दार हो सकता है. उसे इसी आपिस के सीनियर चपरासी रामखेलावन कका इयाद आते हैं. अकसरे कहा करते थे कि तिरिया के चरित्तर के थाह त हो सकता है कि कौनो जोगी जती पा जाए, लेकिन पुरुख के भाग के थाह कौनो नईं पा सकता.
वैसे दू नंबर से उसे बड़ी सहानुभूति है. वह देख रहा है कि दू नम्मर घर से लेकर संसार तक हर तरफ़ दुए नम्मर रह जा रहा है. एही दफ़्तर के बगल के दफ़्तर में बैठ के चला गेया, लेकिन ई दफ़्तर में नईं बैठ पाया. अब का बैठ पाएगा. अब तो इनके पीछे पूरी लाइन खड़ी है और उहो ऐसी कि बस इनही के धकियाने के फेर में है. एक-दू नईं पूरा तीन-तीन नौजवान. 50 साल से ले के 70 साल के उमिर तक का तो इनके घर ही में मौजूद है. और ई तो ऐसहूं चला-चली के बेला में है. एक बात ऊ और देख चुका है और परतिया चुका है कि जो-जो बगल वाले दफ़्तर में बैठा, ऊ ए दफ़्तर में कबे नईं आ पाया. इनके पहिले भी कुछ बड़े-बड़े लोग ओही दफ़्तर से निपट गए. एही भाग्य है. पर पता नईं कौन ज्योतिखी के ई दिखाते हैं हाथ और ऊ बार-बार बोल देता है कि तुम बन जाओगे. लेकिन का पता भाई, बनिए जाए कबो! ऐसे-ऐसे लोग भी बने हैं जो कभी उसे चाय पिलाते रहे हैं, अपने नाम की पर्ची पहुंचाने के लिए तो ई तो फिर भी…… इसके पहले कि वह दो नंबर को खिसकाता तीन नंबर वाली धड़धड़ाती नज़र आईं. आंख मुंह निपोरते हुए पूरे ग़ुस्से में. एकबारगी तो उसको लगा कि ई तो घुसिये जाएंगी. लेकिन तबे ऐन दरवाजे पर पहुंच गया, ‘जी मैडम! केन्ने जा रही हैं? आपको मालुम है न वेटिंग लिस्ट में आपका नाम अबकी पारी किलियर नईं हुआ है!’ ’हे चल हट तो. तू क्या समझता है मैं तेरी इजाज़त की मोहताज हूं? मुझे जब जाना होगा तो तेरे कहने से जाउंगी?’ एकदम से फायर हो गईं तीन नंबर, ‘अभी मेरा जाने का अपना मूड नहीं है. समझा? तेरी वेटिंग लिस्ट का इंतज़ार मैं नहीं करती.’ अच्छा हुआ कि मैडम इधर-उधर टहलते हुए दफ़्तर के अंदर उसकी नज़र बचा कर एक नज़र मारती हुई आगे बढ़ गईं. मैडम के जाते ही उसने राहत की सांस ली. लेकिन इसके पहले कि बतौर राहत ली गई सांस को बाहर निकाल पाता अपने भरपूर लंपटपन और उचक्केपने के तेवर के साथ फूंय-फांय करते चार नम्मर लौका गए. ऊ आना त चाहते हैं इस दफ़्तर में लेकिन उन्हें कौनो जल्दी नहीं है. जिस काम की इनको बहुत जल्दी हो, उसको भी ई तीन महीना के भेटिंग में डाल सकते हैं. और नाम को सार्थक करने में तो इनका कोई जवाबे नहीं है. इनका बस चले तो देश की पंचवर्षीय योजना का भी नाम बदल के तत्काल कर दें. लेकिन एह बार तो बेचारे इस लायक भी नहीं बचे कि ए दफ़्तर के एन्ने-ओन्ने भी कौनो कोने बैठें. पर ताक-झांक में बेचारे लग गए हैं.
हालांकि ताक-झांक ऊ इस बार भी कर रहे हैं, पर सबसे नज़र बचा के. ऐसे ही जैसे कोई लफंगा लड़कियों के कॉलेज की तरफ़ जाता है. वैसे ही वो नज़र बचा के बड़ी हसरत से चेंबर के अंदर झांक भी गया.
अब जब देख ही लिया तो वो मान भी कैसे जाता! सरकार के दफ्तर का चपरासी ही कैसा जो जो थोड़ा जबरई न कर दे. बोल ही पड़ा, ‘का साहब अबकी बेर त आप भेटिंगों से बाहर हो गए……….’ लेकिन इसके पहले कि उसकी बात पूरी होती चार नम्मर ने उसको अंकवार में भर लिया, ‘ह बुड़बक, अरे भेटिंग-फेटिंग के फेर में कौन पड़ता है जी? हम त तुम्है हेर रहे थे. अरे ज़रा आ जाना घर पे. मलकिन तुमको याद कर रही थीं. लाई-चना भी भेजवाई हैं बचवन के लिए.’ अब चपरासी हाथ जोड़ चुका था, ‘और मालिक गैया के लिए…हें-हें-हें..’
‘हां-हां चारा भी है. रखा है. आना ले जाना.’ चार नम्मर ई कह के अभी आगे बढ़ भी नईं पाए थे कि तब तक एक नम्मर का रेला आ गया. ई ओही एक नम्मर था जो न कभी अंदर झांकने का हिम्मत किया न बाहर खड़े होने का. लेकिन बाह रे भाग. इसे कहते हैं पुरुख के भाग. उसने मन ही मन सोचा और सलाम मारने के लिए बिलकुल अटेंसन की मुद्रा में खड़ा हो गया.

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नेता और चेतना

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 15, 2009

हमारे देश में चीज़ों के साथ मौसमों और मौसमों के साथ जुड़े कुछ धंधों का बड़ा घालमेल है. इससे भी ज़्यादा घालमेल कुछ ख़ास मौसमों के साथ जुड़ी कुछ ख़ास रस्मों का है. मसलन अब देखिए न! बसंत और ग्रीष्म के बीच आने वाला जो ये कुछ-कुछ नामालूम सा मौसम है, ये ऐसा मौसम होता है जब दिन में बेहिसाब तपिश होती है, शाम को चिपचिपाहट, रात में उमस और भोर में ठंड भी लगने लगती है. आंधी तो क़रीब-क़रीब अकसर ही आ जाती है और जब-तब बरसात भी हो जाती है. मौसम इतने रंग बदलता है इन दिनों में कि भारतीय राजनीति भी शर्मसार हो जाए. अब समझ में आया कि चुनाव कराने के लिए यही दिन अकसर क्यों चुने जाते हैं. मौसम भी अनुकूल, हालात भी अनुकूल और चरित्र भी अनुकूल. तीनों अनुकूलताएं मिल कर जैसी यूनिफॉर्मिटी का निर्माण करती हैं, नेताजी लोगों के लिए यह बहुत प्रेरक होता है.

मुश्किल ये है कि ग्लोबीकरण के इस दौर में चीज़ों का पब्लिकीकरण भी बड़ी तेज़ी से हो रहा है. इतनी तेज़ी से कि लोग ख़ुद भी निजी यानी अपने नहीं रह गए हैं. और भारतीय राजनेताओं का तो आप जानते ही हैं, स्विस बैंकों में पड़े धन को छोड़कर बाक़ी इनका कुछ भी निजी नहीं है. सों कलाएं भी इनकी निजी नहीं रह गई हैं. रंग बदलने की कला पहले तो इनसे गिरगिटों ने सीखी, फिर आम पब्लिक यानी जनसामान्य कहे जाने वाले स्त्री-पुरुषों ने भी सीख ली. तो अब वह हर चुनाव के बाद इनकी स्थिति बदल देती है.

इन्हीं दिनों में एक और चीज़ बहुत ज़्यादा होती है और वह है शादी. मुझे शादी भी चुनाव और इस मौसम के साथ इसलिए याद आ रही है, क्योंकि इस मामले में भी ऐसा ही घपला होता है अकसर. हमारे यहां पत्नी बनने के लिए तत्पर कन्या को जब वर पक्ष के लोग देखने जाते हैं तो इतनी शीलवान, गुणवान और सुसंस्कृत दिखाई देती है कि वोट मांगने आया नेता भी उसके सामने पानी भरने को विवश हो जाए. पर पत्नी बनने के तुरंत बाद ही उसके रूप में चन्द्रमुखी से सूरजमुखी और फिर ज्वालामुखी का जो परिवर्तन आता है…. शादीशुदा पाठक यह बात ख़ुद ही बेहतर जानते होंगे.

चुनावों और शादियों के इसी मौसम में कुछ धंधे बड़ी ज़ोर-शोर से चटकते हैं. इनमें एक तो है टेंट का, दूसरा हलवाइयों, तीसरा बैंडबाजे और चौथा पंडितों का. इनमें से पहले, दूसरे और तीसरे धंधे को अब एक जगह समेट लिया गया है. भारत से जाकर विदेशों में की जाने वाली डिज़ाइनर शादियों में तो चौथा धंधा भी समेटने की पूरी कोशिश चल रही है. पर इसमें आस्था और विश्वास का मामला बड़ा प्रबल है. पब गोइंग सुकन्याओं और मॉम-डैड की सोच को पूरी तरह आउटडेटेड मानने वाले सुवरों को भी मैंने ज्योतिषियों के चक्कर लगाते देखा है. इसलिए नहीं कि उनकी शादी कितने दिन चलेगी, यह जानने के लिए कि उन दोनों का भाग्य आपस में जुड़ कर कैसा चलेगा. पता नहीं क्यों, इस मामले में वे भी अपने खानदानी ज्योतिषी जी की ही बात मानते हैं.

तो अब समझदार लोग डिज़ाइनर पैकेजों में ज्योतिषी और पुरोहित जी को शामिल नहीं कराते. होटल समूह ज़बर्दस्ती शामिल कर दें तो उनका ख़र्च भले उठा लें, पर पंडित जी को वे ले अपनी ही ओर से जाते हैं. इसलिए पंडित जी लोगों की किल्लत इस मौसम में बड़ी भयंकर हो जाती है. ऐसी जैसे इधर दो-तीन साल से पेट्रोल-गैस की चल रही है. यह किल्लत केवल शादियों के नाते ही नहीं होती है, असल में इसकी एक वजह चुनाव भी हैं. अब देखिए, इतने बड़े लोकतंत्र में सरकारें भी तो तरह-तरह की हैं. देश से लेकर प्रदेश और शहर और कसबे और यहां तक कि गांव की भी अपनी सरकार होती है. हर सरकार के अपने तौर-तरीक़े होते हैं और वह है चुनाव.
ज़ाहिर है, अब जो चुनाव लड़ेगा उसे अपने भविष्य की चिंता तो होगी ही और जिसे भी भविष्य की चिंता होती है, भारतीय परंपरा के मुताबिक वह कुछ और करने के बजाय ज्योतिषियों के आगे हाथ फैलाता है. तो ज्योतिषियों की व्यस्तता और बढ़ जाती है. कई बार तो बाबा लोग इतने व्यस्त होते हैं कि कुंडली या हाथ देखे बिना ही स्टोन या पूजा-पाठ बता देते हैं. समझना मुश्किल हो जाता है कि मौसम में ये धंधा है कि धंधे में ही मौसम है.

अभी हाल ही में मैंने संगीता जी के ज्योतिष से रिलेटेड ब्लॉग पर एक पोस्ट पढ़ा. उन्होंने कहा है कि ‘गत्यात्मक ज्योतिष को किसी राजनीतिक पार्टी की कुंडली पर विश्वास नहीं है.’ मेरा तो दिमाग़ यह पढ़ते ही चकरा गया. एं ये क्या मामला है भाई! क्या राजनीतिक पार्टियों की कुंडलियां भी राजनेताओं के चरित्र जैसी होती हैं? लेकिन अगला वाक्य थोड़ा दिलासा देने वाला था- ‘क्‍योंकि ग्रह का प्रभाव पड़ने के लिए जिस चेतना की आवश्‍यकता होती है, वह राजनीतिक पार्टियों में नहीं हो सकती.’ इसका मतलब यही हुआ न कि वह नहीं मानतीं कि राजनीतिक पार्टियों में चेतना होती है.

अगर वास्तव में ऐसा है, तब तो ये गड़बड़ बात है. भला बताइए, देश की सारी सियासी पार्टियां दावे यही करती हैं कि वे पूरे देश की जनता को केवल राजनीतिक ही नहीं, सामाजिक और आर्थिक रूप से भी चेतनाशील बना रही हैं. बेचारी जनता ही न मानना चाहे तो बात दीगर है, वरना दावा तो कुछ पार्टियों का यह भी है कि वे भारत की जनता को आध्यात्मिक रूप से भी चेतनाशील या जागरूक बना रही हैं. अब यह सवाल उठ सकता है कि जो ख़ुद ही चेतनाशील नहीं है वह किसी और को भला चेतनाशील तो क्या बनाएगा! ज़ाहिर है, चेतनाशील बनाने के नाम पर यह लगातार पूरे देश को अचेत करने पर तुला हुए हैं और अचेत ही किए जा रहे हैं.

लेकिन संगीता जी यहीं ठहर नहीं जातीं, वह आगे बढ़ती हैं. क्योंकि उन्हें देश के राजनीतिक भविष्य का कुछ न कुछ विश्लेषण तो करना ही है, चाहे वह हो या न हो. असल बात ये है कि अगर न करें तो राजनीतिक चेले लोग जीने ही नहीं देंगे. और राजनीतिक चेलों को तो छोड़िए, सबसे पहले तो मीडिया वाले ही जीना दुश्वार कर दें ऐसे ज्योतिषियों का, जो चुनाव पर कोई भविष्यवाणी न करें. आख़िर हमारी रोज़ी-रोटी कैसे चलेगी जी! जनता जनार्दन तो आजकल कुछ बताती नहीं है. फिर कैसे पता लगाया जाए कि सत्ता का ऊंट किस करवट बैठेगा और अगर ये पता न किया जाए तो अपने सुधी पाठकों को बताया कैसे क्या जाए?

जब उन्हें पकड़ा जाता है तब समझदार ज्योतिषी वैसे ही कुछ नए फार्मुले निकाल लेते हैं, जैसे संगीता जी ने निकाल लिए. मसलन ये कि – ‘इसलिए उनके नेताओं की कुंडली में हम देश का राजनीतिक भविष्‍य तलाश करते हैं.’ अब इसका मतलब तो यही हुआ न जी कि नेताओं के भीतर चेतना होती है? पता नहीं संगीता जी ने कुछ खोजबीन की या ऐसे ही मान ली मौसम वैज्ञानिकों की तरह नेताओं के भीतर भी चेतना या बोले तो आत्मा होती है. मुझे लगता है कि उन्होंने मौसम वैज्ञानिकों वाला ही काम किया है. वैसे भी चौतरफ़ा व्यस्तता के इस दौर में ज्योतिषियों के पास इतना टाइम कहां होता है कि वे एक-एक व्यक्ति के एक-एक सवाल पर बेमतलब ही बर्बाद करें. वरना सही बताऊं तो मैं तो पिछले कई सालों से तलाश रहा हूं. मुझे आज तक किसी राजनेता में चेतना या आत्मा जैसी कोई चीज़ दिखी तो नहीं. फिर भी क्या पता होती ही हो! क्योंकि एक बार कोई राजनेता ही बता रहे थे कि वे अभी-अभी अपनी आत्मा स्विस बैंक में डिपॉज़िट करा के आ रहे हैं. इस चुनाव में एक नेताजी ने दावा किया है कि वे उसे लाने जा रहे हैं. पता नहीं किसने उनको बता दिया है कि अब वे पीएम होने जा रहे हैं. क्या पता किसी ज्योतिषी या तांत्रिक ने ही उनको इसका आश्वासन दिया हो. मैं सोच रहा हूं कि अगर वो पीएम बन गए और स्विस बैंक में जमा आत्माएं लेने चले गए तो आगे की राजनीति का क्या होगा?

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जॉर्ज़ ओरवेल, संसद और वाराह पुराण

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 13, 2009

एक ब्लॉगर बंधु हैं अशोक पांडे जी. उन्हें सुअरों से बेइंतहां प्यार हो गया है. इधर कुछ दिनों से वह लगातार सुअरों के पीछे ही पड़े हुए हैं. हुआ यह कि पहले तो उन्होंने अफगानिस्तान में मौजूद इकलौते सुअर की व्यथा कथा कही. यह बताया कि वहां सुअर नहीं पाए जाते और इसकी एक बड़ी वजह वहां तालिबानी शासन का होना रहा है. इसके बावजूद किसी ज़माने सोवियत संघ से बतौर उपहार एक सुअर वहां आ गया था. उस बेचारे को जगह मिली चिड़ियाघर में. पर इधर जबसे अमेरिका में स्वाइन फ्लू नामक बीमारी फैली है, उसे चिड़ियाघर के उस बाड़े से भी हटा दिया गया है, जहां वह कुछ अन्य जंतुओं के साथ रहता आया था. अब उस बेचारे को बिलकुल एक किनारे कर दिया गया है, एकदम अकेले. जैसे हमारे देश में रिटायर होने के बाद ईमानदार टाइप के सरकारी अफसरों को कर दिया जाता है.
कायदे से देखा जाए तो दोनों के अलग किए जाने का कारण भी समान ही है. संक्रमण का. अगर उसके फ्लू का संक्रमण साथ वाले दूसरे जानवरों को हो गया तो इससे चिड़ियाघर की व्यवस्था में कितनी गड़बड़ी फैलेगी इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं. ठीक इसी तरह सरकारी अफसरी के दौरान भी ईमानदारी के रोग से ग्रस्त रहे व्यक्ति को अगर इस फील्ड में आए नए रंगरूटों के साथ रख दिया गया और उन्हें कहीं उसका संक्रमण हो गया तो सोचिए कि व्यवस्था बेचारी का क्या होगा? वैसे सुअर जब झुंड में था तब भी यह सहज महसूस करता रहा होगा, इसमें मुझे संदेह है. क्योंकि इसे सुअरों के साथ तो रखा नहीं गया था. वहां इसके अलावा कोई और सुअर है ही नहीं, तो बेचारे को साथ के लिए और सुअर मिले तो कैसे? इसे अपनी बिरादरी के बाहर जाकर हिरनों और बकरियों के साथ चरना पड़ता था.
अब सच तो यह है कि ईमानदार टाइप के सरकारी अफसर भी बेचारे अपने आपको ज़िंदगी भर मिसफिट ही महसूस करते रहते हैं. उन्हें लगता ही नहीं कि वे अपनी बिरादरी के बीच हैं. बल्कि उनकी स्थिति तो और भी त्रासद है. क़ायदे से वे सरकारी अफसर होते हुए सरकारी अफसरों के ही बीच होते हैं, पर न तो बाक़ी के असली सरकारी अफसर उन्हें अपने बीच का मानते हैं और न वे बाक़ी को अपनी प्रजाति का मानते हैं. हालत यह होती है कि दोनों एक दूसरे को हेय नज़रिये, कुंठा, ग्लानि, अहंकार और जाने किन-किन भावनाओं से देखते हैं. पर चूंकि सरकारी अफसरी में ईमानदार नामक प्रजाति लुप्तप्राय है, इसलिए वे संत टाइप के हो जाते हैं. अकेलेपन के भय से. दूसरी तरफ़, असली अफसर भी कुछ बोलते नहीं हैं, अभी शायद तब तक कुछ बोलेंगे भी नहीं जब तक कि समाज में थोड़ी-बहुत नैतिकता बची रह गई है.
यक़ीन मानें, सुअरों से मैं यहां सरकारी अफसरों की कोई तुलना नहीं कर रहा हूं. अगर कोई अपने जीवन से इसका कोई साम्य देखे तो उसे यथार्थवादी कहानियों की तरह केवल संयोग ही माने. असल बात यह है कि उस सुअर की बात आते ही मुझे जॉर्ज़ ओरवेल याद आए और याद आई उनकी उपन्यासिका एनिमल फार्म. यह किताब आज भी भारत के राजनीतिक हलके में चर्चा का विषय है. ‘ऑल मेंन आर एनिमीज़. ऑल एनिमल्स आर कॉमरेड्स’ से शुरू हुई पशुमुक्ति की यह संघर्ष यात्रा ‘ऑल एनिमल्स आर इक्वल, बट सम एनिमल्स आर मोर इक्वल’ में कैसे बदल जाती है, यह ग़ौर किए जाने लायक है. इसे पढ़कर मुझे पहली बार पता चला कि सुअर दुनिया का सबसे समझदार प्राणी है. अब मुझे लगता है कि वह कम से कम उन दलों से जुड़े राजनेताओं से तो बेहतर और समझदार है ही, जहां आंतरिक लोकतंत्र की सोच भी किसी कुफ्र से कम नहीं है. बहरहाल इस बारे में मैं कुछ लिखता, इसके पहले ही अशोक जी ने जॉर्ज़ ओरवेल के बारे में पूरी जानकारी दे दी.
वैसे सुअर समझदार प्राणी है, यह बात भारतीय वांग्मय से भी साबित होती है. अपने यहां हज़ारों साल पहले एक पुराण लिखा गया है- वाराह पुराण. भगवान विष्णु का एक अवतार ही बताया जाता है – वराह. वाराह का अर्थ आप जानते ही हैं, अरे वही जिसे पश्तो में ख़ांनजीर, अंग्रेजी में पिग या स्वाइन तथा हिन्दी में सुअर या शूकर कहा जाता है. अफगानिस्तान में तो यह प्रतिबन्धित प्राणी है और हमारे यहां भी आजकल इसकी कोई इज़्ज़त नहीं है. पर भाई हमारी अपनी संस्कृति के हिसाब से देखें तो यह प्राणी है तो पवित्र.
अब मैंने ख़ुद तो वाराह पुराण पढ़ा नहीं. सोचा क्या पता कि मास्टर ने ही पढ़ा हो. उससे बात की तो उसने कहा, ‘यार तुम्हें बैठे-बिठाए वाराह पुराण की याद क्यों आ गई?’
ख़ैर मैंने उसे पूरी बात बताई. पर इसके पहले कि वह मेरा गम्भीर उद्देश्य समझ पाता उसने समाधान पेश कर दिया. क़रीब-क़रीब वैसे ही जैसे नामी-गिरामी डॉक्टर लोग मरीज़ के मर्ज को जाने बग़ैर ही दवाई का पर्चा थमा देते हैं. ‘अमां यार क्यों परेशान हो तुम एक सुअर को लेकर? आंय! बुला लो उसको यहीं. अभी नई लोकसभा बनने वाली है. जैसे इतने हैं, वैसे एक और रह लेगा. वैसे भी अभी पूरे देश में इनकी ही बहार है. अपने यहां तो इन्हें तुम चुनाव भर जहां चाहो वहीं देख सकते हो. हां, जीत जाने के बाद फिर सब एक ही बाड़े में सिमट कर रह जाते हैं.’
मास्टर तो अपनी वाली हांक कर चला गया. इधर मैं परेशान हूं. उसने भी वही ग़लती कर दी जो जॉर्ज ओरवेल ने की है. इतने पवित्र जंतु को भला कहां रखने के लिए कह गया बेवकूफ़. मैं उस सुअर के प्रति सचमुच सहानुभूति से भर उठा हूं. सोचिए, भला क्या वहां रह पाएगा वह? अगर उसे पता चला कि वह किन लोगों के साथ रह रहा है? जहां सभी किसी न किसी गिरोह के ज़रख़रीद हैं, जो अपने आका के फ़रमान के मुताबिक बड़े-बड़े मसलों पर हाथ उठाते और गिराते हैं, उसके ही अनुरूप बोलते, चुप रहते या हल्ला मचाते हैं और गिरोह का मुखिया पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही ख़ानदान से चलता रहता है और उस पर तुर्रा यह कि यह दुनिया का सबसे प्राचीन और सबसे बड़ा लोकतंत्र है ……… ज़रा आप सोचिए, उस पर क्या गुज़रेगी.

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युवराज का संस्कार

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 11, 2009

महाराज का तो जो भी कुछ होना-जाना था, सो सब बीत-बिता गया. वह ज़माना और था. अब की तरह तब न तो नमकहराम जनता थी और न यह लोकतंत्र का टोटका ही आया था. अरे बाप राजगद्दी पर बैठा था, मां राजगद्दी पर बैठी थी, पुश्त दर पुश्त लोग राजगद्दी पर ही बैठते चले आए थे, तो वह कहां बैठते! यह भी कोई सोचने-समझने या करने लायक बात हुई? जिसका पूरा ख़ानदान राजगद्दी पर ही बैठता चला आया हो तो वह अब चटाई पर थोड़े बैठेगा! ज़ाहिर है, उसको भी बैठने के लिए राजगद्दी ही चाहिए. दूसरी किसी जगह उसकी तशरीफ़ भला टिकेगी भी कैसे? लेकिन इस नसूढ़े लोकतंत्र का क्या करें? और उससे भी ज़्यादा बड़ी मुसीबत तो है जनता. आख़िर उस जनता का क्या करें? कई बार तो महारानी का मन ये हुआ कि इस पूरी जनता को सड़क पर बिछवा के उसके सीने पर बुल्डोजर चलवा दें. जबसे लोकतंत्र नाम की चिड़िया ने इस इलाके में अपने पंख फड़फड़ाए हैं, जीना हराम हो गया. और तो और, जनता नाम की जो ये नामुराद शै है, इसका कोई ईमान-धरम भी नहीं है. आज इसके साथ तो कल उसके साथ. ज़रा सा शासन में किसी तरह की कोताही क्या हुई, इनकी भृकुटी तन जाती है. इसकी नज़र भी इतनी कोताह है कि क्या कहें! जो कुछ भी हो रहा है, हर बात के लिए ये सरकार को ही दोषी मान लेती है. स्कूलों की फीस बढ़ गई- सरकार दोषी, बिजली-पानी ग़ायब रहने लगे- सरकार दोषी, महंगाई बढ़ गई- सरकार दोषी, भ्रष्टाचार बढ़ गया- सरकार दोषी, बेकारी बढ़ गई-सरकार दोषी, यहां तक कि सीमा पार से आतंकवाद बढ़ गया- तो उसके लिए भी सरकार दोषी.
इसकी समझ में यह तो आता ही नहीं कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी थोड़े ही है, जो वह चलाए और सारी समस्याएं हल हो जाएं. और फिर सरकार कहां-कहां जाए और क्या-क्या देखे? अरे भाई महंगाई बढ़ गई है तो थोड़ा झेल लो. कोई ज़रूरी है कि जो चीज़ आज दस रुपये की है वह कल भी दस रुपये की ही बनी रहे. कहां तो एक ज़माना था कि तुम्हारे हिस्से सिर्फ़ कर्म करना था. फल पूरी तरह हमारे हाथ में था. हम दें या न दें, यह बिलकुल हमारी मर्ज़ी पर निर्भर था. फिर एक समय आया कि पूरे दिन जी तोड़ मेहनत करो तो जो कुछ भी दे दिया जाता था उसी में लोग संतुष्ट हो लेते थे. पेट भर जाए, इतने से ही इनके बाप-दादे प्रसन्न हो जाते थे.
ऐसा इस देश में सुना जाता था. वरना तो महारानी जिस देश से आई थीं, वहां तो मजदूरी देने जैसी कोई बात ही नहीं थी. मजदूर जैसा भी कुछ नहीं होता था. वहां तो सिर्फ़ ग़ुलाम होते थे. ये अलग बात है कि उनके पूर्वज कभी ग़ुलाम नहीं रहे और न कभी राजा ही रहे, पर उन्होंने सुना है. ग़ुलामों से पूरे दिन काम कराया जाता था और कोड़े लगाए जाते थे. रात में खाना सिर्फ़ इतना दिया जाता था कि वे ज़िन्दा रह सकें. क्योंकि अगर मर जाते तो अपना काम कैसे होता. और फिर वह पैसा भी नुकसान होता जो उन्हें ख़रीदने पर ख़र्च किया गया था. नया ग़ुलाम ख़रीदना पड़ता. और अगर उन्हें ज़्यादा खिला दिया जाता तो तय है कि वे आंख ही दिखाने लगते. इन दोनों अतियों से बचने का एक ही रास्ता था और वह यह कि साईं इतना दीजिए, जामे पेट भराय.
पर मामला उलट गया तब जब उसे इस पेट भराय से ज़्यादा दिया जाने लगा. इतना दिया जाने लगा कि ये खाने के बाद दुख-बिपत के लिए भी लेवें बचाय. तो अब लो भुगतो. यह ग़लती उनकी ससुराल में उनके पतिदेव के पूर्वजों ने किया था. जाने किस मजबूरी में. हालांकि उनसे पूर्व की पूर्व महारानी, यानी उनकी सासू मॉम ने, यह ग़लती सुधारने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी. पर वह पूरी तरह सुधार नहीं पाई थीं. उन दिनों निगोड़े विपक्षी बार-बार आड़े आ जाते थे. हालांकि विपक्ष के बहुत बड़े हिस्से को पालतू बनाने की प्रक्रिया भी उन्होंने शुरू कर दी थी. तो विपक्ष तो अब निपट गया, लेकिन ससुरी जनता ही बहुत बेहूदी हो गई. इतनी बेहूदी कि इसकी हिम्मत तो देखिए. यहां तक कि महारानी के लिए फ़ैसलों पर सवाल भी उठाने लगी है.
इसीलिए महारानी के हाथ में जब सत्ता की चाभी आई तो सबसे पहला काम उन्होंने यही किया कि उन सबको सत्ता से बिलकुल दूर ही कर दिया जिनकी पीठ में सात पुश्त पहले तक भी कभी रीढ़ की हड्डी पाई जाती थी. निबटा ही दिया महारानी ने उन्हें. यहां तक कि वज़ीरे-आज़म भी उन्होंने एक ग़ुलाम को बनाया और वह भी ऐसे ग़ुलाम को जो कभी यह सोच भी नहीं सकता था कि उसे कभी इस क़ाबिल भी समझा जा सकता है. वह ख़ुद ही अपने को इस क़ाबिल नहीं समझता था. पहले तो वह बहुत रोया-गिड़गिड़ाया कि महारानी यह आप क्या कर रही हैं? मुझ नाचीज़ को इतनी बेपनाह इज़्ज़त आप बख़्श रही हैं. मैं इसे ढो भी पाउंगा! अरे यह तो मेरे संभाले से भी नहीं संभलेगी.
कुछ परिजनों ने उसकी यह मुश्किल देख महारानी को सलाह भी दी कि मत करें आप ऐसा. कहीं नहीं ही संभाल पाया तो क्या होगा फिर? पर महारानी जानती थीं कि सत्ता में संभालने के लिए होता क्या है! और यह भी कि ऐसा ही आदमी तो उन्हें चाहिए जो सत्ता संभाले, पर उसमें इतना आत्मविश्वास कभी न आए कि वह सत्ता संभाल सकता है. जब कहा जाए कि कुर्सी पर बैठो तो वह हाथ जोड़ कर बैठ जाए और जब कहा जाए कि उठो तो कान पकड़ कर उठ भी जाए. ऐसा आदमी युवराज के रास्ते में कभी रोड़ा नहीं अटकाएगा. जब तक युवराज युवा होते हैं, तब तक राजगद्दी सुरक्षित रहेगी और चलती भी रहेगी. कहीं ग़लती से भी अगर किसी सचमुच के क़ाबिल आदमी को यहां लाकर बैठा दिया तो फिर तो मुसीबत हो जाएगी. वह क्या राजगद्दी सुरक्षित रखेगा हमारे युवराज के लिए? वह तो ख़ुद उस पर क़ाबिज होने की पूरी कोशिश करेगा.
आख़िरकार वज़ीरे-आज़म की कुर्सी का फ़ैसला हो गया. वहां उसे ही बैठा दिया गया जिसे महारानी ने सुपात्र समझा. और महारानी ने उसे कुर्सी पर बैठाने के बाद सबसे पहला काम यही किया कि जनता की भी रीढ़ की हड्डी का निबटारा करने का अभियान शुरू किया. इसके पहले चरण के तहत महंगाई इतनी बढ़ाई गई कि आलू भी लोगों को अनार लगने लगा. इसके बावजूद कुछ घरों में चूल्हे जलाने का पाप जारी रहा. तब चूल्हे जलाने का ईंधन अप्राप्य बना दिया गया. काम का हाल ऐसा किया गया कि लोगों की समझ में गीता का सार आ जाए. अरे काम मिल रहा है, यही क्या कम है! फल यानी मजदूरी की चाह का पाप क्यों करते हो? वैसे भी इस देश में पुरानी कहावत है – बैठे से बेगार भली. तो लो अब बेगार करो.
अब इस बात पर साली जनता बिदक जाए तो क्या किया जाए? पर हाल-हाल में महारानी को मालूम हुआ कि असल में ये जो जनता का बिदकना है उसके मूल में शिक्षा है. तुरंत महारानी ने सोच लिया कि लो अब पढ़ो नसूढ़ों. ऐसे पढ़ाउंगी कि सात जन्मो तक तुम तो क्या तुम्हारी सात पीढ़ियां भी पढ़ने का नाम तक न लें. बिना किसी साफ़ हक़्म के तालीम इतनी महंगी कर दी गई कि पहले से ही दाने-पाने की महंगाई से बेहाल जनता के लिए उसका बोझ उठाना संभव नहीं रह गया. सुनिश्चित कर दिया गया कि जनता राजनीतिक नौटंकी को सच समझती रहे. पर अब भी जनता युवराज को सीधे राजा मान लेने को तैयार नहीं थी. जाने कहां से उसके दिमाग़ में ये कीड़ कुलबुलाने लगा था कि उसका राजा उसके बीच से होना चाहिए. ऐसा जो उसके दुख-दर्द को समझे. महारानी की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ऐसा राजा वे कहां से लाएं? आख़िरकार राजनीतिक पंडितों की आपात बैठक बुलाई गई. पंडितों ने बड़ी देर तक विचार किया. बहस-मुबाहिसा भी हुआ, पर अंतत: कोई नतीजा नहीं निकला. थक-हार कर किसी ने सलाह दी कि ऐसे मामलों से निबटना तो अब केवल एक ही व्यक्ति के बूते की बात है और वह हैं राजपुरोहित. ख़ैर, शाही सवारी तुरंत तैयार करवाई गई और उसे रवाना भी कर दिया गया राजपुरोहित के राजकीय बंगले की ओर. महारानी ने स्वयं अपने सचल दूरभाष से राजपुरोहित का नंबर मिलाया:
‘हेलो’
‘जी, महारानी जी’ ‘प्रनाम पुरोहिट जी!’ ‘जी महारानी जी, आदेश करें.’
‘जी आडेश क्या पुरोहित जी मैं टो बश रिक्वेश्ट कर सकटी हूं जी आपशे.’ ‘हें-हें-हें…. ऐसा क्या है राजमाता. आप आदेश कर सकती हैं.’ ‘जी वो क्या है कि राजरठ आपके ड्वार पर पहुंचता ही होगा. यहां पहुंचिए टब बाटें होंगी.’
इतना कह कर महारानी ने फ़ोन काट दिया और बेचारे राजपुरोहित कंपकंपाती ठंड में राजमाता और उनकी कुलपरंपरा के प्रति नितांत देशज शब्दों में अपनी आस्था व्यक्त करते हुए जल्दी-जल्दी जनमहल पहुंचने के लिए तैयार होने लगे. जी हां, राजमहल का यह नया नामकरण राजपुरोहित ने ही किया था. एक टोटके के तौर पर. शनिदेव के कोप से राजपरिवार को बचाने के लिए. उनका यह प्रयोग चल निकला था, लिहाजा राजपरिवार में उनकी पूछ बढ़ गई थी और उनकी हर राय क़ीमती मानी जाने लगी थी. ***************************** थोड़ी देर बाद राजपुरोहित महारानी के दरबार में थे. समस्या उन्हें बताई जा चुकी थी और यह भी कि कई सलाहें आ चुकी थीं. सभी महत्वपूर्ण विचारों पर लंबी चर्चा भी हो चुकी थी. पर इस लायक एक विचार भी नहीं पाया गया था जिस पर अमल किया जा सके और जनता को इस बात के लिए मजबूर किया जा सके कि वह युवराज को महाराज मान ले. वैसे जनता के सीने पर बुल्डोजर चलवाया जा सकता है, लेकिन फिर सवाल यह उठता है कि जब जनता ही नहीं रहेगी तो फिर युवराज राज कैसे करेंगे और किस पर करेंगे? फिर तो एक ही विकल्प बचता है कि राज करने के लिए जनता भी सात समुंदर पार से मंगाई जाए. पर उधर से जनता कैसे आएगी? वहां तो जनता की पहले से ही कमी है और दूसरे जो जनता है वह भी बेहद पेंचीदी टाइप की हो गई है. ऐसी कि उसे बात-बात पर राजकाज में मीनमेख निकालने की आदत सी हो गई है.
‘अब जनटा टो हमारे मायके से मंगाई नहीं जा सकती राजपुरोहिट जी और युवराज को अगर वहां भेजें टो शायद इन्हें किशी हेयर कटिंग शैलून में भी काम न मिले.’ राजमाता ने अपनी चिंता व्यक्त की, ‘राजा टो हम इनको यहीं का बना सकटे हैं. और वह भी मुश्किल लग रहा है अभी. टो प्लीज़ कोई रास्टा सुझाइए राजपुरोहिट जी.’
राजपुरोहित थोड़ी देर तो चिंतामग्न मुद्रा में बैठे रहे. फिर उन्होंने पंचांग निकाला. थोड़ी देर तक विचार करते रहे. इसके बाद उन्होंने युवराज की कुंडली मंगाने का अनुरोध महारानी से किया. जैसा कि ऐसे अवसर पर होना ही चाहिए, राजमाता ने इसके लिए किसी राजकर्मी को आदेश नहीं दिया. स्वयं और तुरंत निकाल कर ले आईं और बड़ी श्रद्धापूर्वक राजपुरोहित को सौंप दी. राजपुरोहित ने अपने मोटे चश्मे से कुछ देर तक बड़ी सूक्ष्मता से कुंडली का भी निरीक्षण किया. क़रीब-क़रीब वैसे ही जैसे कोई चार्टर्ड एकाउंटेंट निहारता है किसी बहीखाते को. और अचानक उसमें राहुदेव की स्थिति पर नज़र पड़ते ही उन्होंने ऐसे हुंकार भरी जैसे किसी पेंशनर की फाइल में मामूली सी गड़बड़ पाकर सरकारी बाबू भरते हैं. ‘फ़िलवक़्त यहां स्थिति राहुदेव की गड़बड़ है महारानी.’ ज़ोर से नाक सुड़कते हुए राजपुरोहित ने कहा.
‘टो इशके लिए क्या किए जाने की ज़रूरत है राजपुरोहिट’ राजमाता जानती हैं हैं कि भाग्य को भाग्य के भरोसे छोड़ देने वाले पुरोहित नहीं हैं राजपुरोहित. राजपरिवार का कुत्ता भी कह दे तो बैल का दूध भी निकाल कर दे सकते हैं वह. इसी कैन डू एप्रोच के नाते तो उन्हें यूनिवर्सिटी से उठाकर दरबार में लाया गया.
बहरहाल राजपुरोहित ने थोड़ी देर और लगाई. मोटी-मोटी पोथियों के पन्ने-दर-पन्ने देखते रहे और अंतत: एक निष्कर्ष पर पहुंचे. ‘उपाय थोड़ा कठिन है राजमाता, लेकिन करना तो होगा.’ ‘आप बटाइए. कठिन और आसान की चिंता मट करिए.’
‘है क्या कि युवराज की कुंडली में अबल हैं राहु और लोकतंत्र की कुंडली में प्रबल हैं राहु. तो अब युवराज की कुंडली में अबल राहु को सबल तो करना ही पड़ेगा.’ ’वह कैसे होगा?’ ’देखिए राजमाता, राहु वैसे तो तमोगुणी माने जाते हैं, लेकिन उनकी प्रसन्नता के लिए सरस्वती की पूजा ज़रूरी बताई गई है और सरस्वती की प्रसन्नता के लिए शास्त्रों में विधान है संस्कारों का. पुराने ज़माने में हमारे यहां केवल 16 संस्कार होते थे. उनमें से भी अब तो कुछ संस्कार होते ही नहीं हैं संस्कारों की तरह. कुछ आवेश में निबटा दिए जाते हैं. उनमें कुछ ऐसे भी हैं जो अब आउटडेटेड हो गए हैं. और कुछ ऐसी भी बातें हैं जिन्हें अब संस्कारों में जोड़ लिया जाना चाहिए, पर अभी जोड़ी नहीं गई हैं.’ ‘हमारे लिए क्या आडेश है?’ राजमाता उनका लंबा-चौड़ा भाषण झेलने के लिए तैयार नहीं थीं.
‘जी!’ राजपुरोहित तुरंत मुद्दे पर आ गए, ‘बस युवराज का एक संस्कार कराना होगा.’ ‘कौन सा संस्कार?’ ‘राजनीतीकरण संस्कार.’
‘वह कैसे होगा?’ किसी भी मां तरह राजमाता ने भी अपनी चिंतामिश्रित जिज्ञासा ज़ाहिर की.
‘जैसे सभी संस्कार होते हैं, वैसे ही यह भी होगा. हर संस्कार के कुछ रीति-रिवाज हैं, कुछ रस्में हैं. इसकी भी हैं. और टोटके भी करने होंगे.’ उन्होंने कहा और फिर राजमाता की ज़रा आश्वस्तिजनक मुद्रा में देखते हुए उन्होंने कहा, ‘इसके रीति-रिवाज थोड़े कड़े हैं. पर उसका भी इंतज़ाम हो जाएगा. आप चिंता न करें.’
‘क्या रीटि-रिवाज हैं इशके?’ ‘वो क्या है कि संस्कार वैसे होते हैं सरस्वती की ही प्रसन्नता के लिए, लेकिन ये मामला लोकतंत्र और उसमें भी राजनीति का है न, तो उसमें ऐसा काम करना पड़ेगा जिससे राहु भी प्रसन्न हों. इसके लिए राजकुमार को जनता जनार्दन यानी दरिद्र नारायण के बीच जाना पड़ेगा.’ ‘ये डरिड्रनारैन क्या चीज़ होटा है?’ ‘राजमाता हमारे देश में जो दरिद्र लोग यानी पूअर पीपल हैं न, उन्हें भी हम भगवान का रूप मानते हैं. इसीलिए हम उन्हें दरिद्रनारायण कहते हैं. और लोकतंत्र में तो राजपाट का सुख ही उनकी सेवा से ही मिलता है. लिहाज़ा उनकी सेवा में युवराज को एक बार प्रस्तुत होना होगा. युवराज को यह जताना होगा कि वह भी उनके ही जैसे हैं और उनके दुख-दर्द को समझते हैं.’ ‘ओह! लेकिन कहीं शचमुच बनना टो नहीं होगा युवराज़ को उनके जैशा.’ ‘नहीं-नहीं. बनने की क्या ज़रूरत है. हमारी संस्कृति की तो सबसे बड़ी विशिष्टता ही यही है कि हम कथनी और करनी को कभी एक करके नहीं देखते. भला सोचिए आपके आदिपूर्वज बार-बार आग्रह करते रहे सच बोलने का, पर अगर ग़लती से भी उन्होंने कभी सच बोला होता तो क्या होता?’ राजपुरोहित ने उदाहरण देकर समझाया, ‘ये तो सिर्फ़ नाटक है. दस-बीस दिन चलेगा. फिर सब सामान्य. राजा तो राजा ही रहेगा.’ ‘टो इश्में युवराज को क्या-क्या करना होगा?’
‘युवराज को कुछ ग़रीबों के बीच जाना होगा. उनसे मिलना-जुलना होगा. कुछ उनके जैसा खाना होगा. उनके जैसे कुछ मेहनत के काम करने होंगे. बस यही और क्या?’ ‘उनके जैसे काम .. मतलब?’ शायद राजमाता समझ नहीं सकीं.
‘अरे जैसे कुदाल चलाना या बोझ ढोना .. बस यही तो, और क्या!’ ‘क्या बाट आप करते हैं राजपुरोहिट? युवराज यह सब कैसे कर सकेंगे?’
‘हो जाएगा राजमाता सब हो जाएगा. उनको कोई बहुत देर तक थोड़े यह सब करना होगा.’ यह दरबार के विशेष सलाहकार थे, जो कई बार राजपुरोहित की मुश्किलें भी हल किया करते थे, ‘सिर्फ़ एक बार कुदाल चलानी होगी और इतने में सारे अख़बार और टीवी वाले फोटो खींच लेंगे. फिर एक बार मिट्टी उठानी होगी और फिर सभी मीडिया वाले फोटो खींच लेंगे और छाप देंगे. दिखा देंगे. बन जाएगा अपना काम.’ ‘ओह!’ राजमाता अब विशेष सलाहकार से ही मुखातिब थीं, ‘टो डेख लिजिएगा. शब हम आप के ही भरोशे शोड़ रए हें.’
‘आप निश्चिंत रहें राजमाता!’ कहने के साथ ही विशेष सलाहकार ने पुरोहित की बनाई सामग्रीसूची वज़ीरे-आज़म को थमा दी थी. इसमें पूजा-पाठ की तमाम चीज़ों के अलावा चांदी की कुदाल एक अदद, सोने की गद्दीदार खांची एक अदद, ख़ास तरह का कैनवस शू एक जोड़ी .. आदि चीज़ें भी शामिल थीं.
उधर राजमाता अपने मायके फ़ोन भी मिला चुकी थीं. असल में साबुनों का वह ख़ास ब्रैंड वहीं मिलता है जिससे शरीर के मैल और कीटाणुओं के साथ-साथ मन के विषाणु भी धुल जाते हैं.

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यात्रा बनाम परिक्रमा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 7, 2009

पों……… की ध्वनि के साथ जैसे ही ट्रेन ने एंट्री मारी प्लैटफॉर्म पर मौजूद अनारक्षित श्रेणी से लेकर वातानुकूलित शयनयान प्रथम श्रेणी तक के सभी यात्री अपने-अपने सरो-सामान समेटते हुए एक साथ लपके. ऐसे जैसे राहत सामग्री से भरे ट्रक की ओर किसी आपदापीड़ित इलाके के ग्रामीण दौड़ते हैं. जो लोग बार-बार एलीट क्लास की आभिजात्यता पर ऐसे-तैसे कमेंट करते रहते हैं, उन्हें अगर यह मंज़र दिखा दिया जाता तो निश्चित रूप से उनकी बोलती हमेशा के लिए वैसे ही बन्द हो जाती जैसे कभी-कभी टीवी चैनलों वाले रियलिटी शो के काबिल जजों की डांट से बाल प्रतिभागियों की हो जाती है. सोच और स्पिरिट की ऐसी सामूहिक समानता और धक्का-मुक्की सहने की ऐसी भयावह क्षमता चुनाव के दिनों में मलिन बस्तियों के दौरे करने वाले राजनेताओं में भी नहीं देखी जाती.

इसी धक्का-मुक्की में जैसे-तैसे मैंने भी एएस-3 नामक कोच को लक्षित कर लिया और दोनों कन्धों पर दो एयरबैग तथा बाएं हाथ में भारी-भरकम सूटकेस उठाए अपनी ताक़त भर तेज़ रफ्तार से दौड़ा. वैसे मेरी बेहतरार्ध भी कुछ कम नहीं हैं. सौंदर्य प्रसाधनों से ठुंसे अपने निजी बैग के अलावा एक स्ट्रॉली भी वह खींचती हुई बहुत तेज़ कदमों से चल पड़ी थीं. उनके आगे-पीछे बालवृंद भी पानी का महाजग और टिफ़िनादि लिए दौड़े आ रहे थे. बहरहाल जैसे-तैसे मैं उस कोच तक पहुंचने में कामयाब हो ही गया. अब संघर्ष डिब्बे में घुस कर अपनी शायिकाएं तलाशने और उन पर क़ब्ज़ा जमाने के लिए करना था. थोड़ी देर और धक्का-मुक्की चली और आख़िरकार डिब्बे के अंदर की जंग भी अपन ने जीत ही ली.

पर यह क्या? अपनी पांच में से दो शायिकाओं पर पहले से ही संवैधानिक दर्ज़ा प्राप्त अवैध क़ब्ज़ा देख अपने प्राण तो सूख गए. ख़ैर, सामान वहां छोड़ अब मैं अपनी आत्मा और आत्मजों की खोज में वैसे ही आतुरभाव से निकल पड़ा जैसे सीताजी की खोज में वानरसेना निकली थी. ईश्वर की असीम अनुकंपा से कोच के गेट पर पहुंचते ही मेरे ‘रेड’ तो उछलते-कूदते क़रीब पहुंचते दिख गए और उनसे क़रीब बीस मीटर दूर उनकी मातृशक्ति भी तेज़ दौड़ने के कारण उन्हें डांट लगाती, चीखती-चिल्लाती दिखीं. प्लैटफॉर्म रूपी मैदान में अब वैसी धक्का-मुक्की दिखाई नहीं दे रही थी. अलबत्ता मुझे झांकते देखते ही श्रीमती जी बिफर पड़ीं, ‘अरे आ क्यों नहीं जाते जी, देखते क्या हैं? इसे खींचते हुए मुझसे चला नहीं जा रहा है.’उन्होंने स्ट्रॉली की ओर इशारा किया, ‘आहं आहां….’

ख़ैर, मैंने बच्चों को सहेज कर उन्हें अपना डिब्बा दिखाते हुए श्रीमती जी की ओर दौड़ लगाई. उन्हें इस कदर हांफते देख मन तो हुआ कि उन्हें भी लाद लूं, पर शादी के 12 साल बाद इतनी ताक़त किस बेचारे में बचती है. लिहाजा केवल स्ट्रॉली उठाई और कंधे पर लादे अपने डिब्बे की ओर बढ़ा. भीतर पहुंचते ही अपनी बर्थ पर क़ब्जा देख श्रीमती जी ने मुझे ऐसे घूरा गोया मैंने उन कुंभकर्णों को ख़ुद बुलाकर लिटाया हो. बच्चे यूं तो साइडबर्थ पर बैठ गए थे, पर वे भी इस उम्मीद में थे कि पापा इन कुंभकर्णों से वैसे ही भिड़ जाएंगे और इन्हें भगा देंगे. वैसे मैं कुछ कम बहादुर हूं भी नहीं. अगर वे मनुष्य योनि के प्राणी होते तो उन्हें लताड़ कर भगाते मुझे देर नहीं लगती. यहां तो ख़ाकी वर्दीधारी प्राणी थे. वह भी कोई ऐसे-तैसे नहीं, कन्धे पर तीन-तीन सितारेधारी. उनके सिर गर्दन से जुड़े हुए होते भी जिस निस्पृह भाव से बर्थ पर लुढ़के पड़े थे, वह देख कर उनकी वस्तुस्थिति का अंदाज़ा भी आसानी से लगाया जा सकता था.

आख़िरकार मैंने ख़ुद कुछ कहने के बजाय टीटी को बुलाना उचित समझा. बुलाने के क़रीब आधे घंटे बाद अवतरित हुए टीटी महोदय ने हमारे इलाके में पहुंचने के बाद पहले तो हमारे और अन्य यात्रियों के टिकट चेक किए. अपने चार्ट से मिलाया. आइडेंटिटी प्रूफ देखे. इसके बाद हमारी मूलभूत समस्या का बिना कोई समाधान किए चलने लगे. मजबूरन मुझे उन्हें टोकना पड़ा, ‘सर आपने हमारी प्रॉब्लम तो सॉल्व की नहीं.’ उन्होंने पलटकर मुझे ऐसे घूरा जैसे मैं बिना टिकट लिए एसी कंपार्टमेंट में घुस आया होऊं. फिर भी जवाब शांतिपूर्वक दिया, ‘अब आप तो देख ही रहे हैं कि ये लोग किस हाल में हैं!’

‘अरे तो पुलिस बुलाइए न! भई मेरा कन्फर्म रिज़र्वेशन है और साथ में पूरा परिवार है. आख़िर बच्चे इतनी दूर कैसे जाएंगे इस तरह?’ मैंने उन्हें समझाना चाहा.

‘तो वो आप ख़ुद ही बुला लीजिए न! पुलिस वालों का पुलिस क्या कर लेगी?’ उनका यह जवाब यह बताने के लिए काफ़ी था कि क़ानून की समझ उन्हें मुझसे बेहतर है, ‘थोड़ी देर धीरज रखिए. हो सकता है इन लोगों को होश आए और ये लोग ख़ुद ही उठकर चले जाएं.’

मैं बेचारा क्या करता? पूरे परिवार समेत अपने हिस्से की एकमात्र साइडबर्थ पर सिकुड़ गया. ‘ये भी कोई तरीक़ा है? एक तो छ: घंटे लेट ट्रेन आएगी और ऊपर से कन्फर्म बर्थ पर क़ब्ज़ा किसी और का.’ श्रीमती जी मेरे बैठते ही ऐसे बिफरीं, गोया ट्रेन के लेट आने और इस क़ब्ज़े के लिए भी ज़िम्मेदार मैं ही हूं.

‘और तो और, ये रेल वाले इकट्ठे नहीं बता सकते कि ट्रेन छ: घंटे लेट है.’ ये सामने की अपर बर्थ के मालिक थे, ‘रात को 11 बजे जब मैंने रेलवे इन्क्वायरी को फ़ोन किया तो मालूम हुआ कि ट्रेन ऑन टाइम है. स्टेशन पहुंचने के बाद मालूम हुआ कि आधे घंटे लेट है. लेट के वे एक घंटे बीतने के बाद मालूम हुआ कि जी अब दो घंटे लेट है. फिर तीन घंटे बाद मालूम हुआ कि पांच घंटे लेट है और आख़िरकार यह कि छ: घंटे लेट है.’ वे पूरा वृत्तांत ऐसे बता रहे थे, वे अकेले ही समय से यहां आए थे. बाक़ी लोग सीधे आकर बैठ गए हैं. रेल की इस लेट-लतीफी को लेकर उनका ग़ुस्सा आठवें आसमान पर था.

बहरहाल, ट्रेन ने एक ज़ोर का झटका धीरे से दिया और हौले से रेंग चली तो लोगों की जान में जान आई. इस बीच मैं श्रीमती जी तथा आसपास के अन्य सज्जनों एवं देवियों के व्यवस्था विरोधी प्रवचन सुनता बैठा रहा. लगभग चार घंटे बाद ट्रेन जब ग्वालियर पहुंचने वाली थी तो वही टीटी महोदय तेज़ी से भागते हुए आए और उन दोनों महानुभावों को झकझोर कर जगाते हुए बोले, ‘अरे चौधरी साहब, डेढा जी जल्दी उठिए. आगे साले विजिलेंस वाले हैं. ये बर्थ छोड़ दीजिए. चलिए कहीं और आपका इंतज़ाम कर देते हैं.’ वे दोनों वर्दीधारी सज्जन हड़बड़ा कर उठ बैठे और टीटी साहब हमारी ओर मुख़ातिब होते हुए बोले, ‘हां भाई! बैठ लीजिए आप अपनी बर्थ पर.’ इसके पहले कि इस एहसान के लिए मैं उन्हें शुक्रिया भी बोल पाता वर्दीधारियों समेत टीटी साहब अंतर्ध्यान हो चुके थे और मैं भगवान कार्तिकेय को मन ही मन धन्यवाद कहते हुए अपनी बर्थ पर काबिज हो गया.

बर्थ पर जमते ही श्रीमती शुरू हो गईं, ‘हज़ार बार मैंने समझाया कि चलो हमारे मायके हो आएं, पर तुम्हें तो हर साल नई जगह घूमने की पड़ी रहती है. मेरे घर के लोगों से मिलने में तो तुम्हें जाने क्यों कष्ट होने लगता है! बस एक बहाना मिल गया है कि नई जगह जाएंगे, नई जानकारी होगी. अब लो भुगतो नई जानकारी. ऐसे नई जानकारी कर-कर के बहुत लोग दौड़ते रहे कार्तिकेय भगवान की तरह उम्र भर और जिन्होंने माता-पिता की परिक्रमा की वे प्रथम पूज्य हो गए. कम से ये बवाल तो न झेलना होता. अभी आगे जाने क्या-क्या झेलना है.’

भला इस बात का विरोध अब मैं कैसे कर सकता था. मुझे प्रोफेसर करन याद आए. क्लासकोर्सीय हिन्दी साहित्य में गाइडों के रूप में तमाम महत्वपूर्ण योगदान कर चुके होने के बाद जब उनका पहला कविता संग्रह छप कर आया तो उसके विमोचन समारोह में उन्होंने कहा था, ‘मैं आज तक दिल्ली नहीं गया. इसके बावजूद यह मेरी चौदहवीं किताब आज छप कर आपके सामने है.’ यह मैं जानता था कि दिल्ली तो क्या वह गोरखपुर से लखनऊ आना भी बिलकुल पसंद नहीं करते थे. न केवल घूमना-फिरना, बल्कि क्लासकोर्स के अलावा कुछ और पढ़ने को भी वे समय की फिजूलखर्ची मानते थे. यूं कई-कई किताबें लिखकर अपने को बड़ा साहित्यकार कहने वाले प्रोफेसर यूनिवर्सिटी में बहुत थे, पर उनमें से किसी की भी किताब शहर की दुकानों पर न तो उपलब्ध थी और न किसी ने पढ़ी थी. जबकि प्रो. करन की लिखी गाइड शहर की ऐसी कोई दुकान नहीं थी, जहां न मिलती रही हो. सच तो यह है कि उन्होंने हिन्दी साहित्य भी निराला के आगे नहीं पढ़ा था, पर पिछले 20 सालों में कम से कम 50 छात्र-छात्राओं को पीएचडी दिला चुके थे. अब तो उस संग्रह की कुछ कविताएं कुछ यूनिवर्सिटियों के कोर्स में भी हैं.

और यह सब दिल्ली गए बिना होना उनके लिए गौरव की बात तो है ही, हमारे लिए सीख लेने लायक भी है. आख़िर क्या ज़रूरत है दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए इतनी धक्का-मुक्की सहने की. प्रोफेसर साहब आज मुझे वास्तव में बड़े समझदार लग रहे थे. उन्होंने सिर्फ़ एक काम किया था अपने ज़माने के हेड साहब की जमकर सेवा की थी. इसके एवज में उन्होंने एमए टॉप कराया गया था और पीएचडी की डिग्री थमा दी गई थी. पीएचडी के साथ-साथ हेड साहब ने अपने बेटी के लिए उन्हें आरक्षित कर लिया था और दहेज में उन्हें लेक्चररशिप दे दी गई थी. अब मुझे लग रहा था कि यह उपलब्धियां इसीलिए उनकी हो सकीं क्योंकि उन्होंने कई जगहों की यात्रा के बजाय परिक्रमा में आस्था बनाए रखी. पैर पसारने के साथ जैसे-जैसे नींद का झोंके ने दस्तक देनी शुरू की मुझे चन्द्रशेखर की पदयात्रा, आडवाणी की रथयात्रा और उमा भारती की राम-रोटी यात्रा भी याद आने लगी थी. मैं देख रहा था कि चन्द्रशेखर तो ख़ैर, प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मौक़ा पा भी गए, पर बाक़ी लोग तो बेचारे वेटिंग में ही रह गए. जबकि समझदार लोग परिक्रमा के दम पर एमपी हुए बग़ैर पीएम का पूरा टेन्योर निबटा गए. मुझे ख़ुद अपनी बेवकूफ़ी पर तरस आने लगा. मन तो यह हुआ कि लौट चलें अबसे और चल कर श्रीमती जी के माता-पिता की ही परिक्रमा कर आएं. कम से कम कुछ दिन घर में शांति तो बनी रहेगी. पर फिर सोचा अब जब बर्थ पर क़ब्ज़ा मिल ही गया है, तो क्यों जाऊं बीच में छोड़ कर? अब पलनी पहुंचकर कार्तिकेय महराज की परिक्रमा करके ही लौटेंगे.

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