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Archive for the ‘मीडिया’ Category

मुंबई में एनीमेशन पर महामेला अगले हफ़्ते

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 14, 2009

29 और 30 मई को इसका आयोजन दिल्ली में रामदा प्लाजा होटल में किया जाएगा
एनिमेशन, वीएफएक्स (विजुअल इफेक्ट्स) और गेमिंग पर भारत का सबसे बड़ा मेला सीजीटीईएक्पो (कंप्युटर ग्राफिक्स टेक्नोलाजी) 09 का आयोजन मुंबई के पोवई स्थित रेसिडेंस होटल और कन्वेंशन सेंटर में 23 और 24 मई को होने जा रहा है। इस आयोजन के साथ ही सीजीटीईएक्पो अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा है। इस मेले में कंप्युटर ग्राफिक्स से संबंधित तकनीक और व्यवसाय के विभिन्न पहलुओं का प्रदर्शन किया जाएगा। साथ ही एनिमेशन उद्योग में कैरियर की तलाश करने वाले छात्रों को भी यहां उचित मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा।
सीजीटीईएक्पो 09 का आयोजन एनिमेशन, वीएफएक्स और गेमिंग पर भारत के सबसे बड़े कम्युनिटी पोर्टल सीजीटी तंत्रा द्वारा नाइन इंटरएक्टिव के तहत प्रबंधित विजुअल इफेक्ट्स एंड डिजिटल एशिया स्कूल आफ एनिमेशन के साथ मिलकर किया जा रहा है। इस मेले में एनिमेशन उद्योग को समग्र रूप से प्रस्तुत करने के लिए जाब फेयर,आर्ट गैलेरीज, मार्केट प्लेस, मास्टर क्लासेस, एडुकेशन फेयर, इंटरटेनमेंट और गेमिंग जोन, छात्र प्रतियोगिता, एक्सपो स्टेज प्रदर्शनी आदि का आयोजन किया जा रहा है। इस उद्योग से जुड़े व्यवसायी और पेशेवर एनिमेशन की नई तकनीक से लोगों को अवगत कराएंगे साथ ही छात्रों को सीधे उनके साथ रू-ब-रू होने का अवसर प्राप्त होगा। इस मेला का उद्देश्य नये विचारों का अदान प्रदान करते हुये सीखना, प्रेरित करना और आगे बढ़ना है।
इस मेले में भाग लेने वाली मशहूर तकनीकी इकाइयां हैं एनवीआईडीआईए, एचपी, एडाब, बिज एनिमेशन (आई), क्योस ग्रुप वी रे आदि। ये इकाइयां एनिमेशन उद्योग से संबंधित नई खोजों पर रोशनी डालेंगी। एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, और गेमिंग पर व्यापक शिक्षा मेले की मेजबानी सीजीटीएक्पो में फ्रेमबाक्स एनिमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, डीएएसए, मनिपाल, डीएसके, सुपीनफोकाम, पिकासो, एआईजीए के साथ किया जाएगा, जो विविधता से भरे हुये इस उद्योग पर दर्शकों की जिज्ञासाओं को शांत करेंगे।
बिग एनिमेशन (आई) प्राइवेट लिमिटेड अपने हाल में रिलीज एनिमेटेड टीवी श्रृंखला लिटिल कृष्णा की गहन व्याख्या प्रस्तुत करेंगी। इसके तहत लिटिल कृष्णा से संबंधित विभिन्न पहलुओं की पड़ताल की जाएगी। इस श्रृंखला का निर्माण बिग एनिमेशन और बंगलोर स्थित इस्कान द्वारा अनुमोदित इंडियन हेरिटेज फाउंडेशन ने संयुक्त रुप से किया है।
इस मेले में कंप्युटर ग्राफिक्स में कैरियर की तलाश करने वाले लोगों को स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिनिधियों से बातचीत करने का अवसर प्राप्त होगा, जो इन्हें कैरियर के संबंध में अवसरों की जानकारी प्रदान करेंगे।
गेम डेवलपर्स के लिए नासकाम आईजीडीसी सेमिनार सत्र का आजोजन कर रहा है और इस वर्ष गेमिंग जोन एक प्रमुख आकर्षण होगा। बेहतरीन कलाकारों की पहचान करने के लिए इस वर्ष से सीजीटीतंत्रा कम्युनिटी अवार्ड का आयोजन किया जा रहा है।
इस मेले में दि लार्ड आफ रिंग्स से प्रेरित 40 मिनट के स्वतंत्र फिल्म दि हंट फार गोलुम को दिखाया जाएगा।
रेसिडेंस होटल में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में बिग एनिमेशन (आई) प्राइवेट लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी आशिष कुलकर्नी ने कहा कि एनिमेशन उद्योग को पूरी तरह से व्यवसायिक बनाने की जरूरत है। इस उद्योग में रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं। लोगों को इसके तरफ आकर्षित किया जाना चाहिये।
दि बांबे आर्ट सोसाइटी के प्रेसीडेंट विजय राउत ने कहा कि कला के नजरिये से यह एनिमेशन उद्योग अभी काफी पिछड़ा हुआ है। इसका मुख्य कारण यह है कि लोग इसे अभी कला के प्रारुप के तौर पर नहीं देखते हैं। इसे अभी स्वतंत्र कला का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ है। लोगों की मानसिकता बदलने की जरूरत है। सरकार को चाहिये कि शैक्षणिक संस्थानों में इसकी विधिवत पढ़ाई शुरु करे ताकि छात्र इसकी तरफ आकर्षित हों और इसमें उन्हें एक उज्जवल भविष्य दिखाई दे।
एनविडिया के प्रोफेशनल बिजनेस सोल्युशन के प्रमुख प्रसाद फाड़के ने कहा कि एनिमेशन कला और तकनीक का संगम है। इसे दोनों नजरिये से समझा जाना चाहिये। इस अवसर पर प्राइम फोकस वल्र्ड के वाइस प्रेसीडेंड एजाज राशिद, फ्रेमबाक्स एनिमेशन के एमडी राजेश टुराकिया भी मौजूद थे।
मुंबई में सीजीटीएक्पो की सफलता का बाद 29 और 30 मई को इसका आयोजन दिल्ली में रामदा प्लाजा होटल में किया जाएगा।
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आम जनता की आस्था

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 28, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन
दिलली हाईकोर्ट ने जस्टिस सभरवाल के मसले को लेकर जिन चार पत्रकारों को सजा सुनाई थी, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगा दी है. हाईकोर्ट ने उन्हें यह सजा इसलिए दी थी क्योंकि उसे ऐसा लगा था कि मिड डे में छापे लेख से कोर्ट की छवि धूमिल हो रही थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस सजा के खिलाफ पत्रकारों की याचिका किस आधार पर स्वीकारी और किस कारण से हाईकोर्ट द्वारा दी गई सजा पर रोक लगाई, यह बात तो अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है लेकिन पत्रकार बिरादरी और आम जन का मानना है कि इससे भारत की न्यायिक प्रणाली में आम जनता का विश्वास बहाल होता है. आस्था और विश्वास की बहाली का उपाय सच का गला दबाना नहीं उसकी पड़ताल करना है. यह जानना है कि अगर मीडिया ने किसी पर कोई आरोप लगाया है तो ऐसा उसने क्यों किया है? आखिर इस आरोप के क्या आधार हैं उसके पास? उन आधारों पर गौर किया जाना चाहिए. उसके तर्कों को समय और अनुभव की कसौटी पर कसा जाना चाहिए. इसके बाद अगर लगे कि यह तर्क माने जाने लायक हैं, तभी माना जाना चाहिए. तमाम पत्रकारों की ओर से विरोध के बावजूद मैं यह मानता हूँ कि मीडिया के आचार संहिता लाई जानी चाहिए. लेकिन यह आचार संहिता सच का गला घोंटने वाली नहीं होनी चाहिए. यह आचार संहिता सत्ता के हितों की रक्षा के लिए नहीं, आम जनता के हितों की रक्षा करने वाली होनी चाहिए. क्योंकि लोकतंत्र में व्यवस्था का कोई भी अंग जनता के लिए है. चाहे वह विधायिका हो या कार्यपालिका या फिर न्यायपालिका या मीडिया; भारत की संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत सभी जनता के लिए हैं न कि जनता इनके लिए है. इसीलिए हमारे संविधान ने व्यवस्था के जिस किसी भी अंग या पद को जो विशेषाधिकार दिए हैं वह आम जनता के हितों की रक्षा के लिए हैं. आम जनता इनमें से किसी के हितों की रक्षा के लिए नहीं है. मीडिया को भी इस तरह के जो घोषित-अघोषित विशेषाधिकार हैं, जिनके अंतर्गत वह महीनों अपराधियों के इंटरव्यू दिखाता है, किसी सेलेब्रिटी की शादी की खबर महीनों चलाता है और भूत-प्रेत के किस्से सुना-सुना कर उबाता रहता है या सनसनी फैलता रहता है, ये अधिकार छीने जाने चाहिए.
लेकिन भाई अगर व्यवस्था के शीर्ष पर आसीन लोग भ्रष्ट हो रहे हों, और अपने स्वार्थों में इस क़दर अंधे हो गए हों कि धृतराष्ट्र को भी मात दे रहे हों तो उनके विशेषाधिकार के नाजायज पंख भी काटे जाने चाहिए. व्यवस्था अगर यह काम नहीं करेगी तो फिर यह काम जनता को करना पड़ेगा. और भारत की जनता ऐसा कुछ करने में हिचकती नहीं है. इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं.
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्याय में आम जनता की आस्था बहाल करने वाला है. इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय धन्यवाद और बधाई दोनों का पात्र है. धन्यवाद इसलिए कि उसने अपना दायित्व निभाया. न्याय की व्यवस्था को न्याय की तरह देखा. और बधाई इसलिए कि वह न्यायिक प्रणाली में जनता की आस्था बनाए रखने में सफल रहा.

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सत्यमेव जयते का सच

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 23, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन
इससे ज्यादा बेशर्मी की बात और क्या हो सकती है कि ‘सत्यमेव जयते’ का उद्घोष करने और देश भर को न्याय देने का दंभ भरने वाली न्यायपालिका खुद ही अन्याय का गढ़ बन जाए. वैसे यह कोई नई बात नहीं है. हिंदी साहित्य और फिल्मों में यह बात बार-बार कही गई है. श्रीलाल शुक्ल की अमर कृति
‘राग दरबारी’ का लंगड़ और ‘अंधा कानून’ जैसी फिल्में घुमा-फिरा कर यही बात कहना चाहती रहीं हैं। न्याय की मूर्तियों को उस अपराधी साबित करने वाला कोई सबूत जंचता ही नहीं जो उनकी कृपा खरीद लेता है. न्याय खरीदा-बेचा जाता है, इसका इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि अकेले जस्टिस सब्बरवाल ही नहीं कई और जस्टिस अरबों की सम्पत्ति के मालिक हैं.
इसी सिलसिले में हाल ही में
समकालीन जनमत पर आए दिलीप मंडल के पोस्ट पर कहीं और किसी सज्जन ने यह सवाल उठाया है कि पत्रकार कौन से दूध के धुले हैं. लेकिन मित्र सवाल किसी पेशे, पेशेवर या व्यक्ति के दूध या शराब के धुले होने का नहीं है. सवाल कर्म और कुकर्म का है. पत्रकार भी ऐसे हैं जो रिश्वत लेते हैं, ब्लैकमेलिंग करते हैं और दलाली करते हैं. यह देश की व्यवस्था का दोष है कि और पेशों की तरह पत्रकारिता में भी ईमानदार और प्रतिभाशाली लोग कई बार दलालों और भ्रष्ट पत्रकारों की ही चाटुकारिता के लिए मजबूर होते हैं. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम उन्हें छोड़ने की वकालत कर रहे हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि इस पेशे में भी आम तौर पर सारी सुविधाएं अधिकतर भ्रष्ट लोगों के ही पास हैं और योग्य पत्रकार जैसे-तैसे जीवनयापन के अलावा कुछ और कर पाने की हैसियत में नहीं हैं. पत्रकार आए दिन अपने बीच के ऐसे लोगों के खिलाफ आवाज भी उठाते हैं. ये अलग बात है कि वह नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित होती है.
अगर ऐसे किसी पत्रकार या प्रकाशन के खिलाफ फैसला हुआ होता तो किसी को कोई गुरेज नहीं होती. उमा खुराना के मसले पर टीवी चैनल और सम्बंधित पत्रकार के खिलाफ हुआ फैसला इसका ज्वलंत उदाहरण है. मीडिया की बढती दुष्प्रवृत्तियों पर सबसे ज्यादा मुखर पत्रकार ही हैं. कोई भी समाजविरोधी कार्य करने या उसमें सहयोग देने वाले पत्रकारों के खिलाफ कोई भी फैसला कहीँ से भी आए, मीडिया से जुडे अधिकतर लोग उसका स्वागत करते हैं और आगे भी करते रहेंगे. लेकिन यह क्या बात हुई कि आप किसी को उसकी ईमानदारी की सजा दें और ऊपर से यह तर्क कि ‘जस्टिस इन चीजों से ऊपर होता है’. ऐसा तो राजतंत्र में भी नहीं होता साहब और यह लोकतंत्र है.

क्या ऐसा कभी आपने किसी अखबार में पढा या किसी टीवी चैनल पर सुना कि पत्रकार सत्य-असत्य या न्याय-अन्याय से ऊपर होता है? जस्टिस सब्बरवाल और यह फैसला सुनाने वाले अन्य अन्यायमूर्ति भी सिर्फ पत्रकारों और मीडिया हाउस के खिलाफ सजा सुनाने के ही नहीं आम जनता के भी दोषी हैं. असल में यह खबर पीएनएन ने दी थी. और पीएनएन इसके लिए साधुवाद का पात्र है। आप चाहें तो वहाँ यह पूरी खबर पढ़ें और विस्तृत जानकारी हासिल करें.
यह मानने की जरूरत बिल्कुल नहीं है मिड डे यापीएनएन ही सही हैं। अपनी आय से बहुत अधिक अकूत सम्पत्ति के मालिक होने के बावजूद जस्टिस सब्बरवाल के बारे में मैं यह मान सकता हूँ और चाहें तो आप भी मान लें कि वह सही हो सकते हैं. लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह जस्टिस हैं लिहाजा उनके खिलाफ कोई मामला ही न बनाया जाए और चाहे जो हो उनके कार्यों पर सवाल न उठाया जाए, यह तो लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा के खिलाफ है. इस तरह तो न्यायपालिका भी भटक जाएगी अपने मूलभूत उद्देश्य से ही.
सब्बरवाल सही हैं या गलत, यह बात सबूतों और उनके परीक्षण के आधार पर तय की जानी चाहिए. किसी के जस्टिस या पत्रकार होने के आधार पर नहीं. ऐसे समय में जबकि देश में लोकपाल और सूचना के अधिकार की बात की जा रही हो, तब अगर इस तरह की बात की होने का ही नहीं, समाजविरोधी होने जैसी बात है. इसके शमित मुखर्जी और अरुंधती राय के मामले में हम देख चुके हैं. इसलिए हमें उम्मीद है कि हाईकोर्ट ने चाहे जो किया सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर वास्तविक नजरिया अपनाएगी. लेकिन अगर तब जस्टिस सब्बरवाल गलत पाए जाते हैं तो वह सिर्फ पत्रकारों के नहीं, देश और जनता के दोषी होंगे.
इससे ज्यादा जनविरोधी और क्या हो सकता है कि कोई अपने बेटों के निजी लाभ के लिए एक शहर तबाह करने पर तुल जाए? यह ह्त्या से बड़ा अपराध होगा. अब अगर इसके बाद भी हम चुप रहे तो हम मुर्दा राष्ट्र के मुर्दा नागरिक कहे जाएंगे. लिहाजा उठें, बोलें और अन्याय के विरुद्ध जहाँ से और जैसे भी हो सके अपनी आवाज बुलंद करें.
सत्यमेव जयते-शुभमेव जयते.


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मीडिया का संकट

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 30, 2007

पत्रकारिता पर इधर ख़ूब लिखा जा रहा है. अविनाश भाई की सदारत वाला मोहल्ला इन दिनों मीडिया को ही लेकर हल्ले का केंद्र बन गया है. इस हल्ले की शुरुआत वैसे तो काफी पहले हो चुकी थी, पर इसे गति दीं दिलीप मंडल के एक पोस्ट ने. दिलीप ने इसमें मीडिया के अतीत का कच्चा चिटठा खोलते हुए कहना चाहा है कि आज दिखाई दे रही यह मूल्यहीनता कोई नई बात नहीं है और इसलिए युवा पत्रकारों को किसी हीनताग्रंथि का शिकार होने की जरूरत नहीं है. दूसरी बात यह कि मीडिया के इस पतितपने के पीछे कुछ मजबूरियां हैं उन्हें भी समझा जाना चाहिए. तीसरी बात यह कि मीडिया अगर इधर बिगडा है तो वह कई मायनों में बहुत कुछ सुधरा भी है और वह सुधर भी देखा जाना चाहिए. बस. मेरी समझ से उनका मंतव्य यहीं तक था. इसके बाद मोहल्ले में बहुत लोगों ने बहुत कुछ प्रतिक्रियाएँ कीं. मामला मोहल्ले से कस्बे तक पहुंच गया. आखिरकार टाउन एरिया चेयरमैन रवीश भाई को बोलना पड़ा. उनहोंने नए दौर को हिंदी पत्रकारिता का प्रश्न काल कहा और बताया कि मीडिया आज अपनी आलोचना के संदर्भ में जितनी अंतर्मुखी है उतनी कभी नहीं थी. यह बात सौ फीसदी सच है.
एक ऐसे दौर में जबकि इस लोकतंत्र के भ्रष्ट तंत्र में कोई पाया अपने गिरेबान में झांकने के लिए तैयार नहीं है, चौथा खम्बा तब भी बार-बार अपने ही आईने में खुद को बार-बार देख रहा है. आत्मनिरीक्षण कर रहा है. यह तथ्य ही काफी है यह साबित करने के लिए कि बाकी तंत्रों की तुलना में (तुलना के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले दर्ज कर लें कि तुलना से कुछ भी मुक्त नहीं है. यहाँ तक कि दार्शनिक सिद्धांतों की प्रासंगिकता आंकने के लिए भी कई समकालीन सिद्धांतों को एक तल पर रखा जाता है) यह आज भी बहुत नैतिक और मूल्यकेंद्रित है. बाहर-भीतर हजार तरह से लात-जूते खाकर और कुढ़ कर भी. चूंकि हम खुद बार-बार अपने गिरेबान में झांक रहे हैं, लिहाजा यह तय है कि हम पूरी तरह पतित कभी नहीं हो सकेंगे. और एक विरोधाभासी बात यह कि लगातार बिगड़ते हुए भी लगातार सुधरते रहेंगे. रही बात भूत-प्रेत-गड्ढे और गन्ने के खेत वाली पत्रकारिता की, तो उसके दिन अब बहुत दिन शेष नहीं हैं. आज जिस बाजार के इशारे पर मीडिया नाच रही है और जिसके लिए वह यह सब टोटके कर रही है, वह बाजार ही इसे मजबूर करेगा इस खाके से बाहर आने के लिए.
यह किन बातों का नतीजा हैं, इस पर फिर कभी. लेकिन एक बात हम भूल रहे हैं और वह है पत्रकारों पर बढ़ते खतरों की. दुनिया भर की बातों में खोए हम खुद को भूल चुके हैं. हम गड्ढे में गिरे प्रिंस की बात तो करते हैं लेकिन अपने कर्तव्य निर्वहन के दौरान सीआरपीएफ की लाठियों से लहूलुहान हुए निखिल और संजीव टोनी की बात नहीं करते. इन्हें केवल इसलिए लिटा-लिटा कर मारा गया कि इन्होने जबरिया मुफ़्त की शराब पी कर सड़क पर ग़दर काटते सीआरपीएफ जवानों की तसवीरें खींचने की कोशिश की. पंजाब के जालंधर शहर की इस घटना में फोटोग्राफर संजीव टोनी का कैमरा भी तोड़ दिया गया और मोटरसाइकिल भी चौपट कर दी गयी. वहाँ खडी पंजाब पुलिस और उनका एक एसपी तमाशबीन बने रहे.
इन प्रेसकर्मियों को बचाने सिर्फ आम जनता आयी और जाहिर है ऐसा उसने सिर्फ इसीलिए किया कि हम कहीं न कहीं उसके विश्वासों की रक्षा करते हैं. उसके हितों से जुडे हैं. इस अच्छी कोशिश का खमियाजा जालंधर के दो आम नौजवानों को भुगतना पड़ा. एक व्यक्ति की तो आँखें ही निकाल ली गईं. सीआरपीएफ के जांबाज जवानों ने इस महान काम को युवकों का अपहरण करके उन्हें एक थाने में ले जाकर अंजाम दिया. यानी पुलिस लगातार मूक दर्शक बनी रही और सीआरपीएफ अपनी ड्यूटी (?) बजाती रही.
मुझे हैरत हुई यह देखकर कि हमारी दिल्ली की मीडिया (केवल टीवी चैनल ही नहीं अखबारों तक) ने इस घटना को कोई खास तवज्जो नहीं दीं. अरे भाई कभी-कभी तो टीआरपी और सर्कुलेशन के प्रेत प्रभाव से मुक्त हो जाओ. और फिर यह मसला तो आम जनता से भी जुड़ा है. सवाल यह है कि अगर हम खुद अपने प्रति ही जिम्मेदार साबित न हो सके तो किसी और के प्रति हमारी जिम्मेदारी का मतलब ही क्या बचेगा? क्या आप यह उम्मीद करते हैं कि यह जिम्मेदारी कोई और निभाएगा? बताइए कौन से खंभे से उम्मीद है आपको?
यह घटना यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि पत्रकारिता आज भी तलवार की धर पर नंगे पैर चलने जैसा ही पेशा है. इस नट्गीरी का जो मेहनताना मिलता है वह भी किसी से छिपा नहीं है. यह तो आप सब जानते ही होंगे कि पूरे देश में पत्रकारों की स्थिति (आर्थिक मामलों में) दिल्ली – मुम्बई के टीवी चैनलों के सीनियर प्रोड्यूसरों जैसी नहीं है. यह आपके गर्व से फूल कर कुप्पा हो जाने वाली बात नहीं है. अपनी दुनिया की जमीनी सच्चाई से अगर आज आप वाकिफ न भी हों तो कल हो जाएंगे. इसलिए अब यह सोचना जरूरी हो गया है कि इन हालत में सच्ची कैसे जिंदा रहेगी? परिवार-अख़बार-सरकार-बाजार के चौतरफा दबावों के बीच पिस्ता एक पत्रकार सच कहने की जोखिम कितने दिन मोल ले सकेगा? क्या यह सोचना हमारा कर्तव्य नहीं है और क्या यह भी आत्मनिरीक्षण का एक सार्थक प्रयास नहीं होगा?
इष्ट देव सांकृत्यायन

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