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Archive for the ‘मुल्ला नसरुद्दीन’ Category

अक़्ल और पगड़ी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 10, 2009

हाज़िरजवाबी का तो मुल्ला नसरुद्दीन से बिलकुल वैसा ही रिश्ता समझा जाता है जैसा मिठाई का शक्कर से. आप कुछ कहें और मुल्ला उसके बदले कुछ भी करें, मुल्ला के पास अपने हर एक्शन के लिए मजबूत तर्क होता था. एक दिन एक अनपढ़ आदमी उनके पास पहुंचा. उसके हाथ में एक चिट्ठी थी, जो उसे थोड़ी ही देर पहले मिली थी. उसने ग़ुजारिश की, ‘मुल्ला जी, मेहरबानी करके ये चिट्ठी मेरे लिए पढ़ दें.’
मुल्ला ने चिट्ठी पढऩे की कोशिश की, पर लिखावट कुछ ऐसी थी कि उसमें से एक शब्द भी मुल्ला पढ़ नहीं सके. लिहाज़ा पत्र वापस लौटाते हुए उन्होंने कहा, ‘भाई माफ़ करना, पर मैं इसे पढ़ नहीं सकता.’
उस आदमी ने चिट्ठी मुल्ला से वापस ले ली और बहुत ग़ुस्से में घूरते हुए बोला, ‘तुम्हें शर्म आनी चाहिए मुल्ला, ख़ास तौर से ये पगड़ी बांधने के लिए.’ दरअसल पगड़ी उन दिनों सुशिक्षित होने का सबूत मानी जाती थी.
‘ऐसी बात है! तो ये लो, अब इसे तुम्हीं पहनो और पढ़ लो अपनी चिट्ठी.’ मुल्ला ने अपनी पगड़ी उस आदमी के सिर पर रखते हुए कहा, ‘अगर पगड़ी बांधने से विद्वत्ता आ जाती हो, फिर तो अब तुम पढ़ ही सकते हो अपनी चिटठी.’

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सामाजिक रिश्ता

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 5, 2009

मुल्ला नसरुद्दीन के पास समय की बड़ी कमी थी. बेचारे अपनी बीवी को समय दे ही नहीं पाते थे. तो उन्होंने सोचा कि क्यों न उसे तलाक़ ही दे दिया जाए. लिहाजा वे शहरक़ाज़ी के दफ्तर गए और वहां तलाक़ की अर्जी डाल दी. क़ाज़ी ने नसरुद्दीन को बुलाया. मुल्ला हाज़िर हुए.

क़ाज़ी ने सवाल किया,
तो तुम्हारी बीवी का नाम क्या है मुल्ला?

अरे! ये तो मालूम ही नहीं है, मुल्ला ने जवाब दिया.

अच्छा, क़ाज़ी ने आश्चर्य जताया, तुम लोग कितने दिनों से साथ रह रहे हो? क़ाज़ी ने फिर पूछा.

मेरा ख़याल है 20 साल से कुछ ज़्यादा हो गए, मुल्ला ने कुछ सोचते हुए बताया.

ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम 20 साल से साथ रहो और नाम भी न जानो? क़ाज़ी बौखलाया.

हो सकता है हुज़ूर! बिलकुल हो सकता है. मुल्ला ने सफ़ाई पेश की, असल में हमारा उसका कोई सामाजिक रिश्ता ही नहीं है.

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मुल्ला और इंसाफ़

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 30, 2009

इधर बहुत दिनों से मुल्ला नसरुद्दीन की बड़ी याद आ रही है. मित्रों से निजी बातचीत के क्रम में उनका जिक्र भी अकसर होता रहा है. पढ़ता भी ख़ूब रहा हूं, गाहे-बगाहे जब भी मुल्ला के बारे में जो कुछ भी मिल गया. पर उधर जूते ने ऐसा परेशान कर रखा था कि मुल्ला को इयत्ता पर याद करने का मौक़ा ही नहीं मिल सका. आज एक ख़ास वजह से उनकी याद आई. एक बात आपसे पहले ही कर लूं कि मुल्ला से जुड़े इस वाक़ये को किसी अन्यथा अर्थ में न लें. कहा यह जाता है कि यह एक चुटकुला है, लिहाजा बेहतर होगा कि आप भी इसे एक चुटकुले के ही तौर पर लें. अगर किसी से इसका कोई साम्य हो जाता है तो उसे बस संयोग ही मानें.

तो हुआ यह कि मुल्ला एक बार कहीं जा रहे थे, तब तक सज्जन दौड़ते-दौड़ते आए और उन्हें एक चाटा मार दिया. ज़ाहिर है, मुल्ला को बुरा लगना ही चाहिए था तो लगा भी. लेकिन इसके पहले कि मुल्ला उन्हें कुछ कहते, वह मुल्ला से माफ़ी मांगने लगे. उनका कहना था कि असल में उन्होंने मुल्ला को मुल्ला समझ कर तो चाटा मारा ही नहीं. हुआ यह कि मुल्ला को आते देख दूर से वह किसी और को समझ बैठे थे और इसी धोखे में उन्होंने चाटा मार दिया. पर मुल्ला तो मुल्ला ठहरे. उनकी नाराज़गी कम नहीं हुई. उन्होंने उन सज्जन की कॉलर पकड़ी और उन्हें घसीटते हुए पहुंच गए शहरक़ाज़ी की अदालत में. क़ाज़ी को पूरा वाक़या बताया. तो क़ाज़ी ने कहा, ‘भाई मुल्ला साहब, आप बदले में इन्हें एक चाटा मारें.’
लेकिन मुल्ला इस न्याय से भी संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने कहा, ‘क़ाज़ी साहब देखिए, इन महोदय ने 20 आदमियों के बीच मेरी इंसल्ट की है. सों ये मामला इतने से निपटने वाला नहीं है.’
‘तो, आख़िर आप क्या चाहते हैं?’ क़ाज़ी ने पूछा.
‘इनकी इस हरकत से मेरी इज़्ज़त का जो नुकसान हुआ है आख़िर उसका क्या होगा?’ मुल्ला ने सवाल उठाया.
शहरक़ाज़ी समझदार थे और मुल्ला को जानते भी थे. लिहाजा मामला जल्द से जल्द रफ़ा-दफ़ा करने के इरादे से उन्होंने मुल्जिम पर एक स्वर्णमुद्रा का दंड लगाया और कहा कि वह अभी अदालत के सामने ही मुल्ला को इस रकम का भुगतान करे. बेचारा वह तुरंत भुगतान करने की हैसियत में था नहीं. सो उसने थोड़ा मौक़ा चाहा. यह कहकर कि हुज़ूर अभी मैं स्वर्णमुद्रा लेकर आपकी ख़िदमत में हाज़िर होता हूं, वह अदालत से बाहर चला गया और देर तक नहीं लौटा. जब और इंतज़ार करना मुल्ला के लिए नामुमकिन हो गया तो वह अपनी जगह से उठे. शहरक़ाज़ी की गद्दी के पास पहुंचे और उनसे मुखातिब हुए, ‘अब क़ाज़ी साहब ऐसा है कि मुझे कहीं जाना है, ज़रूरी काम से. लिहाजा मैं इससे अधिक देर तक इंतज़ार तो कर नहीं सकता. अब ऐसा करिएगा कि जब वह आए तो रकम उससे आप वसूल लीजिएगा और तब तक ये रसीद मैं आपको काटकर दिए जा रहा हूं.’ और लगा दिया एक झन्नाटेदार तमाचा. फिर चलते बने.

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तीस-पैंतीस बार

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 3, 2007

एक सज्जन रास्ते पर चले जा रहे थे. बीच में कोई जरूरत पड़ने पर उन्हें एक दुकान पर रुकना पडा. वहाँ एक और सज्जन पहले से खडे थे. उनकी दाढी काफी बढी हुई थी. देखते ही राहगीर सज्जन ने मजाक उडाने के अंदाज में पूछा, ‘क्यों भाई! आप दिन में कितनी बार दाढी बना लेते हैं?’
‘ज्यादा नहीं! यही कोई तीस-पैंतीस बार.’ दढियल सजान का जवाब था.
‘अरे वाह! आप टू अनूठे हैं.’
‘जी नहीं, में अनूठा-वनूठा नहीं. सिर्फ नाई हूँ.’ उन्होने स्पष्ट किया.

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वही होगा जो …..

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 1, 2007

एक बार मैं घूमते-घूमते एक अनजाने कस्बे में पहुंच गया. छोटी सी पहाड़ी पर बसे इस कस्बे की आबो-हवा मुझे बहुत अच्छी लगी और पास ही कस्बे के बाहर एक ऊंची जगह पर एक खाली घर भी दिख गया. फिर क्या था, मैं वहीं ठहर गया. चूंकि यह जगह शहर से बाहर थी और वहां कोई खेती भी नहीं होती थी, इसलिए वहां तक पहुंचने का पूरा रास्ता कंटीली झाडि़यों से भर गया था. कुछ दिनों तक तो मेरे वहाँ होने के बारे में किसी को पता ही नहीं चला. मैं चुपचाप अल्लाह की इबादत में लगा रहा. पर आखिरकार लोगों को पता चल ही गया और फिर लोग मेरे पास पहुंचने भी लगे. पहुंचा हुआ फकीर मानने के नाते लोग तरह-तरह से मेरी खुशामद भी करते, पर मैं कुछ बोलता ही नहीं था. एक दिन हुआ यह कि कस्बे के लोगों द्वारा पाले गए सारे मुर्गे मर गए. तब गांव के तमाम लोग भागे हुए मेरे पास पहुंचे और मुझे यह हाल बताया. मैंने उन्हें कहा, ‘कोई बात नहीं। समझो कि खुदा की यही मर्जी थी.’ खैर लोग लौट गए. थोड़े दिनों बाद कस्बे में मौजूद सारी आग भी बुझ गई. उनके पास खाना पकाने तक के लिए भी आग नहीं बची. कस्बे के लोग फिर मेरे पास आए और मैंने फिर वही जवाब दिया. कुछ दिनों बाद वहां के सारे कुत्ते भी मर गए और तब भी मेरा जवाब वही रहा. इस पर लोगों को जरा गुस्सा भी आ गया. उन्होंने कहा, ‘अब जब कुत्ते नहीं रहे जंगली जानवरों और चोरों से बचाने के लिए हमारे घरों और फसलों की रखवाली कौन करेगा?’ मैंने कहा, ‘जी, मैं तो एक ही बात जानता हूं. खुदा जो चाहेगा, वही होगा.’ कुछ दिनों बाद कस्बे में लुटेरों का गिरोह आया. वे पूरे कस्बे में घूमे. लोग अपने-अपने घरों में दुबके रहे. कोई कुछ नहीं बोला. यहां तक कि कुत्ते भी नहीं बोले. लुटेरों ने निष्कर्ष निकाला, ‘कहीं न तो आग जलती दिखती है, न कहीं मुर्गे बोलते हैं और न कुत्ते ही भौंकते हैं. ऐसा लगता है कि लोग यह कस्बा छोड़कर कहीं और चले गए हैं। छोड़ो, जब लोग ही नहीं हैं तो घरों में क्या रखा होगा? वापस चलते हैं.’ लुटेरे बिना कुछ लूटपाट किए ही लौट गए और कस्बे के लोग मेरी बात का मर्म समझ गए थे.

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समझती नहीं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 16, 2007

एक दिन मेरे एक बहुत पुराने दोस्त मेरे घर आए. बचपन के साथी थे तो बड़ी देर तक बातें होती रहीं. कई यार-दोस्तो के चर्चे हुए. अब बातें तो बातें हैं, उनका क्या? जहाँ चार अच्छी बातें होती हैं, दो डरावनी बातें भी हो ही जाती हैं. तो बातें चली और यार-दोस्तो से होते हुए बीवियों तक भी आ गईं. दोस्त ने बताया कि मेरी बीवी तो यार अपने आप से ही बातें करती है.
‘ अपने आप से बातें तो मेरी बीवी भी करती है, पर वह इस बात को समझती नहीं है. उसे लगता है कि मैं सुन रहा हूँ.’ मैंने उन्हें बताया.

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