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ओकरे किरुआ परी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 4, 2010

— हरि शंकर राढ़ी
उस समय लगभग साढ़े बारह बज रहे थे। धूप अपने पूरे यौवन पर थी। गर्मी से बुरा हाल था लेकिन इस सांस्कृतिक नगरी में बिजली गुल थी । भूख लगी हुई थी और हम खाना खाने एक होटल में गए। उसका इनवर्टर फेल हो चुका था और जेनेरेटर था नहीं । गर्मी से बैठा नहीं जा रहा था और हम अपनी भूख लेकर वापस आ गए। चारो तरफ जेनेरेटर दनदना रहे थे। रिक्शे पर बैठे और हम कैण्ट की तरफ चल दिए और उसी के साथ मेरे विचारों की श्रृंखला भी।
पूरे यूपी में बिजली का बुरा हाल है और हम कहते हैं कि बड़ा विकास हुआ है। अब तो विकास दिखता नहीं , दिखाया जाता है। विकास के आंकड़ों से विकास सिद्ध किया जाता है।विकास हुआ कितना है यह तो भुक्तभोगी ही जानता है। मुझे याद है, मेरे गांव का विद्युतीकरण वर्ष १९८८ में हुआ था और वह भी व्यक्तिगत प्रयासों से ।उस दौरान बीस से बाइस घंटे बिजली रहा करती थी। न्यूनतम १८ घंटे तो रहती ही थी और कभी-कभी तो २४ घंटे भी मिल जाती थी । सरकार कह सकती है कि तब आबादी कम थी । तर्क ढॅँूढ लेना कोई बहुत मुश्किल कार्य नहीं होता ।आबादी बढ ी है पर बिजली की खपत व्यक्तिगत रूप में कम ,पारिवारिक रूप में ज्यादा होती है। आज यूपी में बिजली का आपूर्ति आधिकारिक तौर पर छः घंटे है और कट पिट कर यह तीन – चार घंटे बैठती है । अर्थात आपूर्ति एक तिहाई हो चुकी है जबकि आबादी तो तीन गुना नहीं बढ़ी है । कीमतें तो करीब पंद्रह गुना बढ चुकी हैं। मुझे यह भी ठीक से याद है कि तब घरेलू उपभोग की बिजली पांच सौ वाट लोड तक सत्रह रुपये प्रति माह के दर से थी।इतना विकास हुआ तो उत्पादन क्यों नहीं बढ ा ?
प्रश्न इच्छा शक्ति और जनकल्याण की भावना का है। नब्बे के दशक से क्षेत्रीय राजनीति का बोलबाला हो गया। छोटी- छोटी राजनैतिक पार्टियाँ अस्तित्व में आईं और विकास की जगह जातिवाद का पत्ता खूब चला। आजादी के चालीस साल बाद जब शिक्षा का इतना विकास हो चुका था, जातिवाद केवल शीर्षक बन कर रह चुका था , तब इस प्रकार का जाति आधारित ध्रुवीकरण एक आश्चर्य जनक घटना थी। आखिर वह कैसी शिक्षा थी जो हमें पुनः उसी जातिवादी खोह की ओर वापस लेकर चल पड़ी ?जिनकी न कोई राजनीतिक पृष्ठ भूमि थी और न आदर्श सोच और न एक बेहतर भविष्य का सपना , ऐसे लोग सत्ता में आ गए और आते गए। जब बिना किसी विकास के ही जबानी खर्च पर वोट मिलता रहे तो नाहक परेच्चान होने की क्या जरूरत ? अब अगर आपने जाति पर खुच्च होकर सरकारें बनाईं हैं तो इसी पर खुश रहिए, बिजली का क्या करेंगे ? अन्ततः खुश ही तो होना था!
खैर, कैण्ट आया और खाना खाकर आराम करने लग गए। इस बीच मैंने प्रो० बंशी धर त्रिपाठी जी को फोन कर लिया। प्रो० त्रिपाठी जी कशी विद्यापीठ मे समाज शास्त्र के प्राध्यापक थे और अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
कई वर्ष पहले समकालीन अभिव्यक्ति में प्रकाशनार्थ उनके कई लेख प्राप्त हुए थे। व्यक्तिगत रूप से मुझे उनक ेलेख बहुत पसन्द आए थे और हमने उन्हें यथासमय प्रकाशित भी किया था। इसके बाद गोस्वामी तुलसी दास की जन्मभूमि से संबंधित उनका एक शोध परक लेख साहित्य अमृत में प्रकाशित हुआ था और उस पर मैंने कुछ और तर्क देते हुए समर्थन किया था तो उन्होंने स्वयं फोन करके लम्बी बातचीत की थी। तबसे देर सबेर बातों का सिलसिला जारी था। उन्हें फोन करके जब मैंने ये बताया कि मैं वाराणसी में ही हूँ तो वे बड े प्रसन्न हुए। बोले- अवस्था मेरी ऐसी नहीं है कि मैं मिलने आ सकूँ, यदि आप आ जाएं तो बड ा ही अच्छा हो। मैंने भी हाँ भर दी । विद्वानों का आशीर्वाद मिले कहाँ ?

प्रो० त्रिपाठी जी करौंदी में रहते हैं। यह तो मुझे मालूम था पर वाराणसी के भूगोल से मैं इतना वाकिफ भी नहीं हूँ। शाम का समय तय था । परिवार को छोड़कर मैं उनसे मिलने चल पड़ा । कैण्ट से लंका और वहां से करौंदी। घर आसानी से मिल गया । बड़ा सा गेट सामान्यतया भिड़ाया हुआ था। वे बरामदे में ही बैठे थे, मैंने उन्हें पहचान लिया । फोटो कई जगह देखा था और खुद अपनी पत्रिका में भी छापा था। पर त्रिपाठी जी मुझे नहीं पहचान सके । जब मैंने परिचय दिया तो वे बड़े अचम्भित हुए और प्रसन्न भी । उनकी कल्पना थी कि मैं कोई उम्रदराज साठ से ऊपर का व्यक्ति होऊँगा क्योंकि समकालीन अभिव्यक्ति का सह संपादक हूँ और काफी दिनों से उनके सम्पर्क में हूँ।
प्रो० त्रिपाठी की विद्वता से प्रभावित हुए बिना शायद ही कोई रह पाए। वे समाज शास्त्र के प्रोफेसर रहे किन्तु मुझे कई बार भ्रम सा हुआ कि ये संस्कृत के प्रोफेसर होंगे । आपने हिन्दी, अंगरेजी और संस्कृत तीनों ही भाषाओँ में उच्च कोटि का लेखन किया है। भारत में साधुओं के जीवन पर उन्होंने गहन शोध किया है और उनकी पुस्तक साधूज ऑफ़ इंडिया पूरे विश्व में काफी सराही गई है। इसके अलावा उन्होंने अत्यन्त स्तरीय और उपयोगी ग्रन्थों का सृजन किया है। चारो धाम यात्रा का बड ा ही सजीव वर्णन उन्होंने किया हैं। गीता के पूरे सात सौ श्लोक उन्हें कण्ठस्थ हैं। सरलता तो उनकी श्लाघनीय है। विद्वता और सरलता का ऐसा संयोग विरले ही मिलता है। मुझे क्षण भर बाद ही ऐसा लगने लगा जैसे मैं इनसे कई बार मिल चुका हूँ और जैसे अपने घर में हूँ। स्वागत और स्नेह की तो बात ही मत पूछिए ! अपनी कई पुस्तकें उन्होंने मुझे उपहार स्वरूप दीं और विभिन्न विषयों पर काफी ज्ञानवर्धक बहस भी की। मुझे लगा कि जितना सम्मान इस मनीषी को मिलना चाहिए , उससे बहुत कम मिला । वस्तुतः साहित्य लेखन में आजकल इतनी भीड हो गई है और उत्पाद इतना बढ गया है कि उसमें स्तरीय साहित्य और साहित्यकार डूब सा गया है।

बड़े गुणग्राही और विनम्र। गोस्वामी तुलसी दास की भाषा में कहें तो उनका हृदय उस सागर के समान है जो चन्द्रमा को पूर्ण देखकर अपनी गरिमा छोड कर उसकी तरफ मिलने चल देता है।
घंटे भर बाद किसी तरह विदा लेकर कैण्ट की तरफ भागा और जाम से जूझते हुए किसी तरह पहुंच भी गया। वहाँ पत्नी और बच्चे संकटमोचन और मानस मंदिर के लिए तैयार बैठे थे। इसमें ऐसा कुछ नहीं जिसका वर्णन करना आवश्यक हो सिवा इसके कि यह वही संकटमोचन मंदिर है जहां भयंकर विस्फोट हुआ था और अब वहां सुरक्षा के नाम पर खानापूर्ति के सिवा कुछ नहीं बचा है।
अगली सुबह जल्दी ही तैयार होकर बस अड्‌डे पहुँच गए और थोड ी जद्दोजहद के बाद बस मिल भी गई और फिर चल भी पड़ी । शहर से बाहर निकलते और टिकट की औपचारिकता पूरी होते ही ड्राइवर महोदय ने भोजपुरी गानों की कैसेट ठोंक दी । आप बड े ही शौक़ीन मिजाज शख्स थे क्योंकि यह बस पूर्णतया सरकारी यानी यूपी रोडवेज की थी और ऐसी बसों में गाने की व्यवस्था आश्चर्य ही होती है।
भोजपुरी गानों का अपना अलग ही रस होता है । धीरे- धीरे माहौल बनने लगा और फिर साहब ने भरत शर्मा व्यास का कैसेट लगा दिया । भोजपुरी में गायकों की एक लम्बी परम्परा रही है। आकाश वाणी के जमाने में मोहम्मद खलील का – कवने खोंतवा में लुकइलू अहि रे बालम चिरई ( गीत शायद भोलानाथ गहमरी का है),चांद वारसी का – नरई ताल कै चीकन मटिया जहां बसै …… और बुल्लू यादव का – नैनों में पृथ्वीराज बस गए ॥ आदि गीत दिलो दिमाग पर छाए रहते। पॉप संगीत की ऐसी गंदी सेना भोजपुरी गीतों पर आक्रमण कर चुकी है कि अब भोजपुरी सुनने लायक ही नहीं बच पा रही। पूरी की पूरी सेना निरहुआ ब्रांड बनती जा रही है और एक वर्ग विशेष इसके पीछे दीवाना बनता जा रहा है।
इस पूरे संक्रमण में अभी दो कलाकार बचे हुए हैं जो भोजपुरी का सोंधापन और मर्यादा लिए हुए चल रहे हैं । इनमें एक तो हैं भोजपुरी की स्वरकोकिला शारदा सिन्हा और दूसरे हैं भरत शर्मा व्यास। तुलनात्मक रूप से इनका उत्पादन कम है , जैसा कि हर अच्छी चीज में होता है । भरत शर्मा के गीत में भोजपुरी का ठसका , लय ताल और पूरी सम्प्रेश्नियता है। ऐसी खाँटी भोजपुरी गाते हैं जो तीन चार दशक पहले की शुद्ध गंवईं होती थी। अब एक गीत आता है जिसे समझने में तो शुरुआत में मुझे भी दिक्कत होती है। गीत का मुखड़ा है- जे हमरे लागत अटैं जरी , ओकरे किरुआ परी। मेरे दोनों बच्चे इतनी खाँटी भोजपुरी नहीं समझते। एक तो वैसे भी बनारस और आजमगढ की भोजपुरी इस भोजपुरी से भिन्न है और उस पर इतनी शुद्ध ! किरुआ परी का अर्थ पत्नी जैसे तैसे बच्चों को समझाती है और सभी खूब हंसते हैं । थोड ी हँसी तो मुझे भी आती है पर मैं स्वर और बोल के दर्द में डूब जाता हूँ। जिनके समझ में भोजपुरी नहीं आती उनके लिए बोल के अर्थ बताता चलूँ। शायद कोई विरहिणी है जो दर्द से टूट चुकी है और अपना बुरा करने वालों को हृदय से श्राप देती है कि जो मेरी जड खोद रहा है उसे कीड े पडें गे। मुझे लगा कि यह दर्द की इन्तहा है और क्षरण के इस युग में इतना शुद्ध दर्द भी नहीं मिलता । कहाँ गए वे विरह के दिन और वे विरहिणियां या विरही जिनके दम पर पद्मावत या फिर मेघदूत जैसी रचनाएं हमें मिलीं। एक युग था जब पूरे भोजपुरी भाषा क्षेत्र के नायक बंगाल और आसाम में नौकरी के लिए जाया करते और नायिकाएं पूरी की पूरी रात विरह में तड पते हुए निका ल दिया करती । कहां बंगाल और कमरू कमच्छा ( कामरूप और कामाखया , असम ) का काला जादू उनके पतियों को भरमा लिया करता था। पूरा जीवन विरह शैया पर ही कट जाता था और भोजपुरी कवियों को विप्रलंभ श्रृंगार से सजाने का मौका मिला करता था। सच तो यह था कि इस क्षे त्र की नायिकाओं का जीवन प्यार की अनुभूति में ही व्यतीत हो जाता था और शायद यही प्यार आजीवन ईंधन का काम करता था । मुझे वे पंक्तियां बहुत ही सटीक लगती हैं-
विरह प्रेम की जागृति गति है और सुसुप्ति मिलन है,
मिलन प्रेम की अन्तिम गति है और विरह जीवन है।

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काशी में एक दिन

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 1, 2010

—हरिशंकर राढ़ी
गेस्ट हाउस में नहा – धोकर लगभग ११ बजे हम काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए चल पड़े। काशी में रिक्शे अभी बहुत चलते हैं, भले ही स्वचालित वाहनों की संखया असीमित होती जा रही हो। रिक्शे की सवारी का अपना अलग आनन्द और महत्त्व है। इधर रिक्शा चला और उधर विचारों की श्रृंखला शुरू हो गई।
काशी यानी वाराणसी अर्थात बाबा विश्वनाथ की नगरी। उत्तर भारत की सांस्कृतिक राजधानी। एक ऐसा विलक्षण शहर जहाँ लोग जीने ही नहीं मरने भी आते हैं। मेरी दृष्टि में यह विश्व का ऐसा इकलौता शहर होगा जहाँ पर मरने का इतना महत्त्व है। इस शहर का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी कि भारतीय संस्कृति। कितना पीछे जाएं ? सतयुग तक का प्रमाण तो हरिश्चंद की कथाओं में ही मिल जाता है। पौराणिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो भोले नाथ की नगरी स्वयं भोलेनाथ ने ही बसाई थी। या तो वे कैलाश पर रहते या फिर काशी में । एक मित्र के मजाक को लें तो यह बाबा भोलेनाथ की शीतकालीन राजधानी थी क्योंकि शीतकाल में तो कैलाश पर रहने लायक ही नहीं होता।
बनारस एक स्थान नहीं, एक संस्कृति का नाम है- ज्ञान की संस्कृति, अध्यात्म की संस्कृति, सभ्यता की संस्कृति, संगीत की संस्कृति, मस्त मौलेपन की संस्कृति और भांग की संस्कृति। सब कुछ एक साथ। आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ करना है तो काशी आते हैं, मंडन मिश्र की काशी और उनकी पत्नी से विवश होते हैं कि परकाया प्रवेश से काम शास्त्र तक की शिक्षा लेनी पड ती है। तथागत को भी काशी आना पड ता है और अशोक महान को बौद्ध धर्म का प्रचार यहीं से शुरू करना पड ता है। सारनाथ यहीं बनता है। गोस्वामी जी अपना अजर- अमर रामचरित मानस यहीं पूरा करते हैं ।कबीर का लहरतारा, रामानन्द का योग, उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की लमही और जय शंकर प्रसाद की कामायनी, सब कुछ तो यहीं काशी में ही है।
अभी प्रसिद्ध अंगरेजी कवि वाल्काट को पढ़ रहा था , उसमें भी बनारस का संदर्भ है। बनारस तो हिन्दू परिवारों की नाम सूची में सम्मिलित रहा है। कितने लोग बनारसी दास की संज्ञा से विभूषित हुए और बनारसी दास चतुर्वेदी को तो हिन्दी साहित्य में कौन नहीं जानता ?बनारस में रहने वाले कई लोगों का तो उपनाम ही बनारसी बाबू हुआ करता था।
यही वह काशी है। साधु- सन्यासी यहां- वहां घूम रहे हैं। राँड -साँड – सन्यासी , इनसे बचे तो सेवै काशी । हमारा रिक्शा इस बीच जाम-जूम से निकलता हुआ विश्वनाथ जी पहुँच जाता है। अभी रिक्शे से ठीक से उतर भी नहीं पाया हूँ और एक एजेण्ट साथ लग जाता है। अपने आप बोले जा रहा है- बाबूजी, साढ़े ११ बज गए हैं और बारह बजे मंदिर बन्द हो जाएगा। लाइन बहुत लम्बी है। आपको बिना लाइन के दर्शन करा दूँगा। जो मर्जी दे दीजिएगा। मैं कुछ भी उत्तर नहीं देता हूँ। मुझे यह भी पता नहीं कि मंदिर कब बन्द होता है! पता नहीं यह पंडा जी सच बोल रहा है या नहीं! साथ में पत्नी और बच्चे हैं , उसे मालूम है कि ऐसी स्थिति में लोग कष्ट नहीं उठा सकते। धूप भी बहुत तेज है । मैं कुछ नहीं बोलता हूँ और वह जानता है कि मौनम स्वीकार लक्षणम्‌।अब वह आगे- आगे हो लेता है और मैं सपरिवार पीछे-पीछे। पतली गली का रास्ता लेता है और मैं समझ जाता हूँ कि यह पीछे की तरफ से ले जाएगा। इसी बीच उसका चेला आ जाता है और वह हमारी बागडोर उसके हाथ में सौंपकर शायद और किसी भक्त की तलाश में निकल जाता है और चेले से कह जाता है कि बाबूजी को ठीक से दर्शन करा देना और जो दें , ले लेना ठकठेना मत करना ।
प्रसाद की एक दूकान पर वह रुकता है । उसकी सेट दूकान होगी । वहां जूते – चप्पल उतारते हैं और हस्त प्रक्षालन करते हैं । दूकान पर मोबाइल वगैरह के लिए लॉकर भी है पर हमने अपना सारा मोबाइल कमरे पर ही छोड़ दिया था। दूकानदार प्रसाद की कई टोकरियाँ जल्दी- जल्दी बनाता है किन्तु मैं भी सतर्क हूँ। एक की कीमत सौ रुपए! मैं एक ही लेता हूँ , परिवार तो एक ही है। वे जिद करते हैं किन्तु मैं भी टस से मस नहीं होता हूँ।
हमें पिछले दरवाजे से प्रवेश मिलता है । पुलिस है सुरक्षा जांच भी है पर शायद दिखावा ही है। अन्दर वह हमें एक अन्य पंडितजी को सुपुर्द कर देता है । वे हमें मुख्य गर्भगृह के सामने बिना रोक-टोक ले जाता है। मेरा गोत्र पूछता है और पूजा करवाता है। मंत्र बुलवाता है और मेरा शुद्ध उच्चारण सुनकर कुछ सहम सा जाता है। खैर पूजा के बाद वह हमें मंदिर में प्रवेश करा देता है बिना पंक्ति के ही । पुलिस का एक सिपाही द्वार पर खड़ा है जो हमें रोकता ही नहीं । प्रवेश करने में मुझे संकोच होता है क्योंकि मैं पंक्ति में नहीं था। मैं पंडित जी की तरफ मुड कर देखता हूँ तो वह कहता है जाइए जाइए, दर्शन करिए। सिपाही हमें अन्दर की तरफ धक्का देता है और हम लोग ज्योतिर्लिग के सामने । दर्शन , प्रसाद और फिर बाहर। किसका कितना हिस्सा है यह मुझे नहीं मालूम।
फिर पंडा मंदिर का इतिहास बताता है। सवा मन सोने का कलश , मंदिर ध्वंश और ज्ञानवापी मस्जिद का वृत्तांत। मुझे मालूम है किन्तु बच्चों को नहीं । ज्यादा बोलता देखकर मैं उसे बताता हूँ कि मै रामेश्वरम तक सात ज्योतिर्लिंगों की और अन्य बहुत से तीर्थस्थलों की यात्रा कर चुका हूँ तो उसका स्वर बदल जाता है । यहां वहां पूजा करवा कर वह हमें मुक्त करता है किन्तु समुचित दक्षिणा के बाद । चलिए दर्शन तो यथासमय हो गया । शुल्क के बिना तो शायद कुछ भी संभव नहीं । बाहर निकलते ही दर्शन एजेण्ट साथ लग लेता है और पचपन रुपये देकर उससे पिंड छुड़ाता हूँ।
मैं बच्चों को बताता हूँ मंदिर के पास ही गंगा जी भी हैं और बच्चे कैसे कि जिद न पकड़ें ? रास्ता मुझे भी भूल रहा है। पिछली बार विश्वनाथ जी का दर्शन लगभग बीस साल पहले किया था। तबसे बनारस आना जाना कई बार हुआ पर दर्शन नहीं। अभी पिछले साल ही तीन बार गया। एक पुलिस वाले से गंगा का रास्ता हिन्दी में पूछता हूँ और वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक भोजपुरी में रास्ता बताता है। मैं उसे धन्यवाद देता हूँ तो वह मेरा मुँह ताकता है। अभी शायद यहां इतनी औपचारिकता नहीं पहुँची है हालांकि काशी तो सभ्यता की नगरी है।
यहां दशाश्वमेध घाट है । यह समय अच्छा नहीं है, दोपहर है । काशी की तो सुबह मशहूर है । पर गंगा की दुर्दशा देखी नहीं जा रही है । सिकुड कर पतली सी , गरीबी की मार झेलती या किसी असाध्य रोग से पीडि त । विश्वास नहीं हो रहा कि यह वही पतित पावनी गंगा है जो स्वर्ग से उतरी थी। जो पानी अमृत था वह अब प्रदूषण से काला हो गया है। कुछ नावें है जो यात्रियों को उसपार ले जाने का आमंत्रण दे रही हैं। इसी गंगा ने काशी को तीन तरफ वेष्टित किया हुआ है और यहां की गंगा को ही देखकर भगवान भोलेनाथ काशी में डेरा डाला था। यही वह दशाश्वमेध घाट है जहाँ ब्रह्मा ने दस अश्वमेध यज्ञ किया था और जिस घाट पर नहा लेने मात्र अश्वमेध यज्ञ का पुण्य मिलता है। पर हमारा विकास हो गया है और हम गंगा को इस लायक छोड़ें कि वह नहाने तो क्या देखने योग्य तो बचे ! मैं लौट तो रहा था पर पैर नहीं उठ रहे थे।

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कोडाईकैनाल में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 11, 2010

–हरिशंकर राढ़ी
हमारी बस अपनी तीव्र गति से प्रकृति का स्पर्श करती हुई कोडाईकैनाल की तरफ बढ़ी जा रही थी।पर्वतमाला हमारे साथ-साथ चल रही थी और हम उत्सुक थे कि हम इनके अन्दर प्रवेश करें। इसी पर्वतपाद प्रदेश में बस चालक ने एक रेस्तरां पर बस रोकी और उस खुले से रेस्तरां में हम भूख या स्वाद से ज्यादा उस उन्मुक्त से वातावरण का स्वाद लेने के लिए कुछ खाया पीया। यहाँ से हम पहाडियों की गोद में समाने लगे। बलखाती सर्पाकार सडक पर बस हिचकोले लेने लगी और फिर पूरी बस बच्चों की मौजमस्ती से गूँजने लगी। उनके लिए यह प्रायः नया अनुभव था, ऊपर से वे एक समूह में थे । सडक का रोमांच मेरे लिए तो कुछ खास नहीं था क्योंकि मैं जम्मू , समूचे गढवाल क्षेत्र से लेकर काठमांडू तक हिमालय की यात्रा कर चुका हूँ। हिमालय की उच्चता के सम्मुख यह यात्रा कुछ भी नहीं थी परन्तु आकर्द्गाण यहां भी कम नहीं था । सितम्बर का अन्त था, दक्षिण भारत में गर्मी यूँही कम नहीं थी पर यहां की बात ही कुछ और थी । ठण्डी-ठण्डी हवा ने जैसे द्रारीर के साथ मन आत्मा को भी शीतल कर दिया हो!
यह पर्वतीय यात्रा लगभग दो घण्टे की होती है। बस टूअरिस्ट थी, अतः तेज चलना स्वाभाविक ही था। रास्ते में मनमोहक हरियाली का साम्राज्य चहुंओर। इतने में हम एक अत्यन्त विशाल निर्झर के सामने खड़ी थी । सिल्वर कास्केड नामक इस जलप्रपात को देखते ही बनता था और यह विचार मन में बार- बार आता था कि निश्चित ही प्रकृति से बड़ा कलाकार और वास्तुकार कोई भी नहीं है। यहाँ फोटो- सोटो की रस्म निभाकर हम आगे के लिए रवाना हुए और कुछ अनावच्च्यक सी भी चीजों ( जो हमारे बस पैकेज में शामिल थीं, टूअर ऑपरेटर ऐसे कई मामूली स्थलों को जो रास्ते में पड ते हैं और जिनपर उनका कोई विशेष खर्च नहीं आता और दर्शनीय स्थलों की सूची लम्बी हो जाती है,बस ) को देखते हुए हम कोडाईकैनाल पहुँच गए।
वाकई कोडाईकैनाल एक अत्यन्त खूबसूरत जगह है और इसकी पृद्गठभूमि उस लहरदार पर्वतीय संकरे राजमार्ग ने ही तैयार कर दी थी। हम वहां की प्राकृतिक सुन्दरता बस निहारे जा रहे थे। अन्य पर्वतीय शहरों की भांति यह शहर भी कहीं सघन तो कहीं विरल बसा हुआ है। सबसे पहले हमें बस वाला रॉक पिलर ले गया। यहां दो ऊँची चट्टानें खम्भों की भांति एक साथ खड़ी हैं, ऐसा लगता है कि किसी अच्छे कारीगर ने बिल्कुल साहुल की सीध लेकर बनाया हो। अभी हम पहुंचे ही थे और एक झलक मिली ही थी कि अचानक घना कोहरा छा गया और रॉक पिलर कोहरे की चादर ओढ कर छिप से गए।एकाएक इतना घना कोहरा देखने का अपना ही रोमांच था। हमें ख़ुशी इस बात की भी थी कि हम इतने भाग्यशाली अवश्य थे कि थोडा पहले पहुंच गए अन्यथा मन में एक कसक रह ही जाती! हालांकि, रॉक पिलर में इतना कुछ दर्शनीय नहीं है, बस एक उत्कंठा वाली बात है।
यहाँ-वहाँ घूम-फिरकर हमारी बस कोडाई झील के पास एक भोजनालय के सामने आकर खड ी हो गई।उस बस का यह सेट भोजनालय रहा होगा, इनको यहां से ग्राहक लाने के नाम पर अच्छा कमीच्चन मिल जाता है। खैर , यहां हमने भोजन किया और बस वाले के अनुसार हमारे लिए उसकी सेवा समाप्त थी क्योंकि हमारी बुकिंग केवल एक साइड की थी। वैसे ये टूअर ऑपरेटर बिलकुल एक जैसे होते हैं,चाहे उत्तर भारत हो या दक्षिण! पैसे के चक्कर में किसी को भी बेवकूफ बनाने में इन्हें कोई परहेज नहीं! हमारे ऑपरेटर ने मदुराई से चलते समय ही कह दिया था कि कोडाईकैनाल में मौसम खराब है और किसी भी होटल में कमरा खाली नहीं है (जिससे कि घबराकर ये वापसी की भी बुकिंग करा लें और उसकी आठ सीटें जो खाली जाने वाली हैं , भर जाएँ। यात्री का अपना टूर भले ही सत्यानाश हो जाए, उनका क्या? और यह बात हम समझ चुके थे।)। यही नाटक यहां बस के ड्राइवर और कन्डक्टर ने किया । उनका कहना था कि यहां कोई कमरा खाली नहीं है। किसी बड़े अर्थात महंगे होटल में शायद मिल जाए तो मिल जाए! बहरहाल, हजार पन्द्रह सौ के नीचे तो कोई मतलब नहीं ! मेरे मित्र को गुस्सा कुछ ज्यादा ही आ जाता है क्योंकि गलत बात बर्दाश्त कर पाना उनके वश का नहीं ।। बड़ी जोर की फटकार उन्होंने लगाई। वे कहां गए, ये तो हम नहीं जानते परन्तु इसके बाद हम अपने दम पर होटल ढूंढने निकल दिए और जल्दी ही पास में एक होटल मिल भी गया जो हमारी व्यय सीमा के अन्दर था। हमने सामान रखा और कोडाईकैनाल झील देखने निकल पड़े ।
कोडाईकैनाल का मुखय आकर्षण यहाँ की कोडाई झील है। द्राहर के लगभग बीच में स्थित यह झील किसी सितारे के आकार की है और अत्यन्त विशाल है। इसी झील के नाम पर ही इस पर्वतीय स्थल का नाम कोडाईकैनाल पड़ा हुआ है। वैसे इस द्राहर के नामकरण के बारे में और भी बातें है।तमिल भाषा में को- डाई का अर्थ होता है ग्रीष्म और कैनाल का अर्थ होता है देखना । एक अन्य उच्चारण अन्तर के अनुसार कोडाई कैनाल का अर्थ होता है जंगल का उपहार। कोडाईकैनाल झील के विषय में बड़ी ईमानदारी से कुछ कहा जाए तो वह यह होगा कि यह झील वाकई में बहुत सुन्दर है। इसके आगे बस कविताएं ही लिखी जा सकती हैं।
इस झील में नौका विहार करने का अपना एक अलग आनन्द है । पदचालित से लेकर नाविक चालित छोटी नौकाएं किराए पर उपलब्ध हैं और इसका संचालन तमिलनाडु पर्यटन विभाग करता है। हमने मशविरा किया और नाविक चालित नौका किराए पर ली, इसलिए कि साथ में बच्चे थे । स्वयंचालित नौका में क्या शैतानी कर दें कौन जानता है? यह नौकाविहार अपने आप में एक सुखद एहसास था। लम्बी-चौड़ी झील में रंग-विरंगी नौकाएं तैर रही थीं । झील लगभग अस्सी फीट गहरी है (यह नौका चालक की सूचना के अनुसार है) और कहीं ना कहीं इससे थोडा डर भी लग रहा था।
झील के आसपास छोटी -छोटी दूकानें बहुत सुन्दर लगती हैं। तरह – तरह के अल्पाहार यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं ।यहां घुड़सवारी का शौक भी फरमाया जा सकता है। यहाँ घूमते-घामते शाम हो गई थी और हम अब वापस आ गए। कुछ देर शहर घूमकर , आवश्यक और अनावश्यक जानकारी लेकर अपने होटल आ गए। सितम्बर के महीने में सर्दी का एहसास बहुत ही सुहावना लग रहा था और हम इसका आनन्द किसी भी कीमत पर छोडना नहीं चाहते थे।
अगली सुबह हमारा कार्यक्रम कोकर्स वाक घूमने का था । कोकर्स वाक कोई एक किलोमीटर लम्बा एक पथ है जो कोडाईकैनाल के दक्षिणी छोर पर स्थित है और बस स्टैंड से लगभग आधा किमी की दूरी पर है।इस पथ का निर्माण ले० कोकर्स ने सन्‌१८७२ में किया था। यह भ्रमण पथ सेंट पीटर्स चर्च से वैन एलन हॉस्पीटल तक फैला है। यहां से पामबन नदी की घाटी से लेकर मदुराई तक का दृश्य देखा जा सकता है बच्चर्ते दिन साफ हो! इस मामले में हम लगभग भाग्यशाली थे। लगभग आधा कोकर्स वाक घूम लेने तक मौसम साफ था, घाटियों का सौन्दर्य हमने खूब देखा और फिर देखते ही देखते कोहरे की चादर ने फिर पूरे कोडाईकैनाल को अपने अन्दर समा लिया।
कोडाईकैनाल में घूमने के लिए बहुत कुछ है, मसलन- ब्रायण्ट वानस्पतिक उद्यान, बीअर शोला फॉल्स, ग्रीन व्यू वैली,डॉल्फिन्स नोज। यहां कुरिन्जी मुरुगन मंदिर अत्यन्त प्रसिद्ध है किन्तु समयाभाव में हम वहां नहीं पहुँच पाए। इसकी दूरी मंदिर से लगभग चार किमी है । यहां का मुखय आकर्षण हर बारह साल बाद खिलने वाला कुरिन्जी का फूल है। हर बारहवें वर्ष जब यह फूल खिलता है तो यहां का पर्यटन भी खिल उठता है।
कोडाईकैनाल प्राकृतिक रूप से समृद्ध है और प्राकृतिक उत्पाद भी यहां खूब बिकते है। शुद्ध शहद , मेवे, जड़ी-बूटियां, फल (जिसमें से कई उत्तर भारत में नहीं मिलते )और शक्तिवर्धक औषधियां प्रचुरता में उपलब्ध हैं। मेरा विश्वास है कि अभी भी यहां के उत्पादों में शुद्धता का प्रतिशत अधिक है। सबसे अधिक मशहूर यहां के हस्त निर्मित चॉकलेट हैं जो लगभग दो सौ से दो सौ पचास रुपये प्रति किलो की दर से मिलतें हैं। इनकी पैकिंग ये इस प्रकार कर देते हैं कि ये कई दिन तक खराब नहीं होते। ऐसे कई सामान हमने भी पैक कराया और यहां दिल्ली में काफी दिनों तक उसका प्रयोग किया।
दोपहर से हमें मदुराई के लिए निकलना था। अगली सुबह तक रामेश्वरम पहुँच जाना हमारा लक्ष्य था। एक ख़ुशी और एक दर्द लिए हम कोडाईकैनाल बस स्टैण्ड के लिए पैदल ही चल पड़े । बस पकड़ी और वापसी की राह पर! अभी कोडाईकैनाल छूटा ही था कि झमाझम बारिश होने लगी। अब यह सफर और भी सुन्दर एवं सुखद हो गया, शायद वर्णनातीत भी।
मैंने महसूस किया कि यहाँ की सुन्दरता में एक अध्यात्म है- एक प्राकृतिक अध्यात्म। आत्मा को , मन को और शारीर को एक दुर्लभ शांति मिलती है। बारिश होती रही , यात्रा चलती रही। इस बार मेरा मन छोटी- छोटी बातों का उल्लेख करने का नहीं हुआ। ऐसी बातें तो होती ही रहती हैं। अभी तो यहां से वापसी भी ठीक से नहीं हुई थी और मन दुबारा आने के विषय में सोचने लगा था। प्रकृति का ऐसा रूप देखकर प्रसिद्ध अंगरेजी कवि विलियम वर्ड्‌सवर्थ की पंक्तियां याद आने लगी थीं-
One impulse from a vernal wood
Can teach you more of man
Of moral evil and of good
Than all the sages can.

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मीनाक्षी के बाद

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 8, 2010

मीनाक्षी के बाद
मंदिर से निकलते-निकलते अंधेरा हो चुका था । विद्युत प्रकाश में नहाया हुआ मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर प्रांगण के बाहर से और भी मनमोहक लग रहा था। फिर भी हम अब बाहर की दुनिया में वापस आ चुके थे। अर्थ-व्यवहार एवं दुकानदारी के चिर परिचित क्रियाकलाप ज्यों के त्यों चल रहे थे। एक बात बताना तब मैं भूल गया था और शायद अच्छा ही हुआ था। मंदिर के प्रवेशद्वार पर ही मदुराई की मशहूर सिल्क साड़ियों की अनेक दूकानें है। ये दूकानदार मंदिर में प्रवेश से पूर्व जूता-चप्पल रखने की सुविधा मुफ्त उपलब्ध कराते हैं। मुझे उनकी इस सहृदयता पर संदेह हुआ था और मैंने इसका कारण जानना चाहा तो बड़ी मुश्किल से बताया गया कि आप वापसी में उनकी दूकान पर साड़ियाँ देख सकते है। अब जाकर इस सुविधा का अर्थ समझ में आया और तसल्ली हुई। लौटे तो साड़ियाँ देखनी ही पड़ीं।
पर मैं यह जरूर कहना चाहूँगा कि मदुराई की सिल्क साड़ियाँ वास्तव में बहुत अच्छी होती हैं। इनमें श्रम, कलाकारी एवं गुणवत्ता का अद्भुत समन्वय होता है और दिल्ली की तुलना में इनकी कीमत भी काफी तार्किक होती है। मदुराई की याद के रूप में मैंने भी धर्मपत्नी के लिए उनकी पसन्द की साड़ी खरीदी और फिर से मदुराई की गलियों का आनन्द लेने लगे।
दक्षिण भारत , खासकर मदुराई और आसपास के इलाकों में चाय बनाने का एक अलग अंदाज है। उनके इस खास अंदाज की वजह से हमारी चाय पीने की आदत कुछ और ही बढ़ गई थी। वहां के चाय बनाने वाले दूध में चाय के सत्त को इतना ऊपर से डालते और फेंटते हैं कि देखते ही बनता है। बिल्कुल कड़क चाय बनती है और गजब का ही स्वाद आता है। ऐसी बहुत सी चाय हमने पी और चाय बनते देखने का आनन्द लिया।
रात का भोजन हमने एक दक्षिण भारतीय रेस्तराँ में लेने का निर्णय किया। तमाम दक्षिण भारतीय व्यंजनों का बड़े प्लेट में केले के गोल-गोल कटे पत्तों पर परोसा जा रहा था। वहां केले के पत्ते पर भोजन परोसने का तात्पर्य शुद्धता ही नहीं अपितु सम्मान देना भी होता है। हमारे समूह में अधिकांशतः बच्चों ने दक्षिण भारतीय व्यंजनो का जमकर आनन्द लिया।
अगले दिन हमें कोडाईकैनाल जाना था। इण्टरनेट एवं कुछ अन्य माध्यमों से मैंने कामचलाऊ जानकारी इकठ्ठा कर ली थी। दूरी ज्यादा नहीं है। लगभग एक सौ बीस किलोमीटर है और मदुराई के बस स्टैंड से तमिलनाडु राज्य परिवहन की बसें जाती रहती हैं । मित्र ने कहा कि कुछ और जानकारी ले लेते हैं और परिवार हम निकट स्थित होटल में छोड़कर जानकारी लेने निकल पड़े। इधर-उधर घूमते-घामते एक ट्रवेल एजेण्ट से हम टकरा ही गए। बड़े सम्मान से वह हमें अपने आफिस ले गया और बताया कि उसकी पर्यटक बसें सुबह आठ बजे तक कोडाईकैनाल के लिए निकलती हैं और सभी दर्शनीय स्थलों का भ्रमण कराकर सायं आठ बजे तक वापस मदुराई छोड़ देती हैं। मैं कभी भी इन व्यवसाइयों की मंशा पर भरोसा नहीं कर सका हूँ। ये कौन सी गोली दे रहे हैं और कितना झूठ बोल रहे हैं ये भगवान भी नहीं जान सकता ! खैर , हमें तुरन्त वापस नहीं लौटना था। कम से कम एक रात वहां रहना था। ये क्या कि पैसे भी खर्च करिए, भागकर जाइए भी और कुछ ठीक से देख भी न पाइए। गोया कबड्डी पढ़ाने गए हों! उसके नियमानुसार आने जाने और साइट सीइंग का किराया २५०/- प्रति सीट था और केवल जाने एवं कुछ स्थलों को देखकर उतर जाने का किराया १५०/-। मैंने अंदाज लगाया था कि मदुराई से कोडाईकैनाल का राज्य परिवहन की बस का किराया दूरी के हिसाब से लगभग 70रु तो होगा ही । एजेण्ट ने 80रु बताया था। इस प्रकार इसकी बस में जाने से कोई विशेष नुकसान नहीं और वह भी हमें होटल से उठाएगा। पर ये तो बाद में पता चला कि तमिलनाडु परिवहन की सामान्य बसों का किराया बेहद कम है- केवल 28 पैसे प्रति किलोमीटर और इस प्रकार मदुराई से कोडाईकैनाल का किराया 40रु प्रति व्यक्ति है।
अगली सुबह थोड़ी बहुत किचकिच के बाद बस वाले ने हमारी यात्रा शुरू करवा दी । मदुराई एक बड़ा शहर है, इसका बोध हमें बस वाले ने जगह- जगह से सवारियां उठाने के क्रम में करा दिया । मदुराई से बाहर निकलते ही राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 7 (वाराणसी से कन्याकुमारी, जो भारत का सबसे लम्बा राजमार्ग है ) पर प्रकृति की हरीतिमा ने हमारा मन मोहना शुरू कर दिया । कुछ दूर और चलकर जब बस ने मुख्य मार्ग को छोड़ कोडाईकैनाल की तरफ पतली सड़क पर मोड़ लिया तो मानो प्रकृति अपने सुन्दरतम रूप में आ गई!नारियल के हरे-भरे बाग, सरसराती हवा और हल्की- हल्की फुहार ने जैसे जीवन का वास्तविक सन्देश दे दिया । एक से एक रूप, अनूठा सौन्दर्य और खो जाने की ललक ने जैसे किसी स्वाप्न लोक में पहँुचा दिया। मन संगीतमय होने लगा और बरबस ही कुछ पंक्तियाँ उभरने लगीं । मैंने डायरी ली और उस यथार्थ सौन्दर्य को शब्द बद्ध करने लगा । आज वह पृष्ठ मेरे सामने है-
लम्बी चिकनी
सलोनी
सड़क पर भागते हम ,
दोनों तरफ फैले
नारियल के ये हरे-हरे पेड़
दोनों तरफ उठी हुई पहाड़ियाँ
आकार में जैसे
किसी सलोनी नवयुवती के
उन्नत उरोज,
बस देखते ही रह जाते हैं
हम ही नहीं
जैसे ये नारियल के पेड़ भी
निहार रहे हों
उसका यौवन
आँखें फाड़
और उस सौन्दर्य के आगे
महसूस कर रहे हों छोटा
अपने आप को।
फिर मैं तो सामान्य सा मानव
और क्या करता
महसूस करने के सिवा ?
आखिर मुझे भी तो मानव बने रहना है
और सौन्दर्य को महसूस करना
मनुष्य के अस्तित्व के लिए
आवश्यक है ,
चाहे वह सौन्दर्य प्रकृति का हो
या किसी युवती का!
खिड़की की साइड में बैठी हुई पत्नी
बहुत सुन्दर लग रही है
आज,
और मैं सोच रहा हूँ
कि काश
ये मेरी प्रेमिका होती!
कितना साम्य होता
इस प्रकृति से
क्योंकि दोनों ही
समर्पित हैं
पूरी तरह मेरे लिए
पर मैं
उनमें न जाने क्या और खोजता हूँ
और कुछ चोरी करना चाहता हूँ
केवल अपने लिए
इस प्रकृति से !

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मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 2, 2010

-हरिशंकर राढ़ी

(लेखमाला की पिछली कड़ी में मदुराई और मीनाक्षी मंदिर का जो वर्णन मैंने किया था , उसे राष्ट्रीय सहारा दैनिक ने अपने 23 जनवरी के अंक में ज्यों का त्यों सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने कॉलमब्लॉग बोलामें ‘देवदर्शन और विशेष शुल्क‘ शीर्षक से छापा है।)

मदुरै का मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर वास्तव में हिन्दू धर्म ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति का एक गौरव है। अंदर जाने पर जो अनुभूति होती है, उसकी तो बात ही अलग है; इसका बाहर का रूप ही अत्यन्त चित्ताकर्षक है और अपनी विशालता की गाथा स्वयं ही बयान कर देता है। वहीं से यह उत्कंठा जागृत हो जाती है कि कितनी जल्दी अंदर प्रवेश कर लें। यह मंदिर जितना भव्य बाहर से है , कहीं उससे ज्यादा अंदर से है।

सामान्यतया मीनाक्षी मंदिर के नाम से विख्यात इस मंदिर का पूरा नाम मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर या मीनाक्षी अम्माँ मंदिर है।यह मंदिर भगवान शिव और देवी पार्वती जो मीनाक्षी के नाम से जानी जाती हैं, को समर्पित है। हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव अत्यन्त सुन्दर रूप में देवी मीनाक्षी से विवाह की इच्छा से पृथ्वीलोक पधारे। देवी मीनाक्षी पहले ही मदुराई के राजा मलयध्वज पांड्य की तपस्या से प्रसन्न हो मदुराई में अवतार ले चुकीं थीं। कुछ बड़ी होने पर वे वहां शासन संभालने लगीं। भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने देवी मीनाक्षी से विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे वे सहर्ष मान गईं। अब इस विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। निश्चित रूप से यह पृथ्वीलोक का सबसे महत्त्वपूर्ण और गरिमामय विवाह होने वाला था जिसमें सम्मिलित होने के लिए भगवान विष्णु भी अपने लोक से चल दिए। उन्हें देवी मीनाक्षी के भाई की भूमिका निभानी थी।किन्तु, मार्ग में आशंकित इन्द्र देव ने विघ्न उपस्थित कर दिया और भगवान विष्णु यथासमय वहाँ पहुंच न सके। अंततः स्थानीय देवता (तिरुपरंकुन्द्रम से) ने विवाह में मुख्याधिपति की भूमिका निभाई और कार्यक्रम सम्पन्न हो गया। इससे सम्बन्धित वार्षिक उत्सव भी यहाँ मनाया जाता है।

मंदिर मुख्यतया भगवान शिव और देवी मीनाक्षी को समर्पित है किन्तु इसके विशाल अन्तर्गृह में अनेक देवी देवताओं की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर के केन्द्र में मीनाक्षी की मूर्ति है और उससे थोड़ी ही दूर भगवान गणेश जी की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है जिसे एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है।आखिर गणेशजी विघ्नहत्र्ता ही नहीं देवी पार्वती के पुत्र भी तो हैं जिन्हें यहां मुकुरनी विनायकर के नाम से पूजा जाता है।

गणेश जी के दर्शन के लिए हम गए तो वहां पर दो पंक्तियां थीं। मुझे लगा कि उनमें से एक पंक्ति पुरुषों के लिए थी और दूसरी महिलाओं के लिए। वस्तुतः एक पंक्ति में महिलाएँ अधिक थीं और पुरुष एकाध ही। चूँकि दक्षिण भारत में अभी भी तुलनात्मक रूप से नियम – कानून का पालन अधिक होता है , यह सोचकर मैं अलग लाइन में लग गया और पत्नी अलग लाइन में।हालाँकि मेरे मित्र सपत्नीक एक ही (महिलाओं वाली) लाइन में लगे । लाइन लंबी थी, आगे जाकर कुछ इस प्रकार अलग हुई कि दर्शनापरान्त हम लोगों को दो अलग- अलग और विपरीत दिशा में जाना ही पड़ा। ऐसा नहीं था कि हम दर्शन करके एक दरवाजे से बाहर निकल जाएं! मंदिर की विशालता इतनी कि कुछ कहा नहीं जा सकता। वापस भी लौटने की स्थिति नहीं थी। मंदिर में ही तैनात एक पुलिस अधिकारी से मैंने बहस की तो (ईश्वर की कृपा से उसे अंगरेजी आती थी) उसने मार्ग निर्देशन किया । वहां से मैं बाहर तो निकल गया किन्तु फिर उस विशालता में खो गया। गनीमत यह हुई कि हमारे मोबाइल जमा नहीं कराए गए थे। संपर्क हो गया और किसी प्रकार एक प्रमुख स्थल के सहारे करीब दस मिनट बाद हम मिल गए। यह भी खूब रही और हम बहुत देर तक इस गुमशुदगी के चटखारे लेते रहे।

मंदिर का वास्तु एवं विशालतासौन्दर्य ही नहीं, गणितीय आंकड़ों की दृष्टि से भी मीनाक्षी मंदिर विशाल है। मंदिर कुल 45 एकड़ क्षेत्र में फैला है और निर्मित क्षेत्रफल का आयाम 254 मी। लंबाई और 237 मी. चैड़ाई में है। मंदिर में 12 उच्च शिखर हैं और सर्वोच्च शिखर जो दक्षिण की ओर स्थित है, की उँचाई 170 फीट है। मंदिर के अन्दर अइयरम मंडपम नामक एक विशाल मंडप (Hall) है जिसे सामान्यतः सहस्र खंभा (Thousand Pillar Hall )के नाम से जाना जाता है। वास्तविकता यह है कि इस हॉल में कुल 985 खंभे है।इस हॉल का निर्माण 1569 ई0 में अरियनाथ मुदलियर ने कराया था ।इसकी विशालता देखते ही बनती है। कई बार ऐसा लगता है कि धर्म एवं संस्कृति को लेकर कुछ लोग कितना सोचते रहे होंगे और कितना कुछ करते भी रहे होंगे, अन्यथा आज इतनी विशाल संरचना, इतना विशाल सृजन नहीं होता। यह क्रम संभवतः युगों से चला आ रहा है और चलता ही रहेगा । आज की सृजनशीलता भी कहीं से रुकी हुई प्रतीत नहीं होती, हालांकि विध्वंसक शक्तियां मार्ग में कम बाधाएं नहीं डाल रही हैं। आतंक का साया हर जगह मंडरा रहा हैफिर भी सर्जक लगे हुए हैं संस्कृति एवं सभ्यता की वृद्धि करने में । दिल्ली के नवनिर्मित अक्षरधाम जैसे भव्य मंदिर ऐसी ही जिजीविषा के प्रतीक हैं। यहाँ मैं किसी साम्यवाद या आर्थिक विषमता ओर मुड़ने के मूड में नहीं हूँ , बस जो सुन्दर लगा , उसका वर्णन भर करना चाहता हूँ।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस मंडप में खम्भे ही खम्भे दृष्टिगोचर होते हैं। सभी खंभे पत्थरों को काट कर बनाए गए हैं और इनपर उत्कृष्ट नक्काशी की गई है जो मंडप की सुन्दरता में चार चाँद लगाती है।मुख्य हॉल से लगभग हर गोपुरम की ओर रास्ता जाता है। मंदिर के विशाल गलियारे में असंख्य दूकानें भी हैं जिनपर हस्तकला से लेकर अन्य सजावटी सामानों की बिक्री होती रहती है।

मंदिर का वर्तमान स्वरूप1623से 1659 के बीच आया। तमिल साहित्य के अनुसार मंदिर का अस्तित्व गत सहस्राब्दि में होना चाहिए किन्तु इसका कोई बड़ा प्रमाण नहीं मिलता। शैव दर्शन के अनुसार मंदिर सातवीं शताब्दी में अवश्य था जिसे कट्टरपंथी मुस्लिम आक्रान्ता मलिक कफूर ने सन्1310में पूर्णतः ध्वंश कर दिया ।

मंदिर के प्रांगण में एक अत्यन्त सुन्दर तालाब है जिसे स्वर्णकमल पुष्कर के नाम से जाता है। वैसे इसका वास्तविक नाम पोर्थमराईकुलम है। भक्तगण दर्शनोपरान्त प्रायः यहाँ बैठकर आत्मिक शांति का आनन्द लेते हुए हैं। मंदिर में कैमरा ले जाने पर रोक नहीं है अतः अधिकांश लोग फोटो खींचते हुए भी देखे जा सकते हैं। यद्यपि फोटोग्राफी के लिए शुल्क 25 रु निर्धारित है किन्तु इस नियम का परिपालन शायद ही होता हो। कम से कम मैंने तो ऐसा नहीं देखा। हाँ, एक बार एक कर्मचारी ने हमें जरूर मना किया था ।

तालाब के पास घंटों बैठे रहने के बाद एक गरिमामय अनुभूति के साथ बाहर निकलने का मन बनाया ।ऐसा जरूर लग रहा था कि यह दर्शन और यह यात्रा जीवन की एक उपलब्धि है। दुख इस बात का हो रहा था कि हमारे पास इतना समय नहीं था कि मदुराई में एक दो दिन और रुकें और इस दिव्य और भव्य मंदिर के सौन्दर्य का और अवलोकर एवं विश्लेषण करें । अगले दिन हमें कोडाइकैनाल जाना था । बस आज की ही रात शेष थी यहाँ रुकने एवं समझने के लिए।निकलते वक्त भी मैं बार -बार पीछे मुड़कर उस महत्ता को देख लेता और महसूस कर लेता था । मदुराई शायद ही यादों से बाहर निकले!

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पोंगापंथ अप टु कन्याकुमारी -4

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 29, 2009

तिरुअनन्तपुरम में अब कुछ खास नहीं बचा था इसलिए हमने सोचा कि हमें अब आगे चल देना चाहिए। दिल्ली में बैठे- बैठे हमने जो योजना बनाई थी उसके मुताबिक हम तिरुअनन्त पुरम में एक रात रुकने वाले थे। इसी योजना के अनुसार हमने 23 सितम्बर के लिए मदुराई पैसेन्जर में सीटें आरक्षित करवा ली थीं। यहां का सारा आवश्यक भ्रमण पूरा हो गया था और अब वहां केवल वे ही स्थान थे जो यूं ही समय बिताने के लिए देखे जा सकते थे, हमें काफी कुछ घूमना था इसलिए निर्णय लिया कि अगले दिन का आरक्षण निरस्त करवा कर आज ही इसी गाड़ी से मदुराई चल दें। वहां की गाड़ियों में भीड़ कम होती है और कोई खास परेशानी होने वाली नहीं थी।

स्वामी पद्मनाभ मंदिर से लौटकर सर्वप्रथम हमने आरक्षण निरस्त कराया । त्रिवेन्द्रम स्टेशन का आरक्षण कार्यालय हमें दिल्ली के सभी आरक्षण कार्यालयों से अच्छा और सुव्यवस्थ्ति लगा। स्वचालित मशीन से टोकन लीजिए और अपनी बारी की प्रतीक्षा कीजिए, लाइन में लगने की कोई आवश्यकता ही नही। एक डिस्प्ले बोर्ड पर आपका नंबर आ जाएगा और आपका काउंटर नंबर भी प्रर्दशित हो जाएगा। ऐसी व्यवस्था तो राजधानी दिल्ली में भी नहीं है जहां कि भारत सरकार का रेल मंत्रालय स्थित है। खैर, आरक्षण निरस्त करवा कर हम वापस आए । मदुरै पैसेन्जर सवा आठ बजे की थी । स्टेशन पर स्थित आई आर सी टी सी के रेस्तरां में हमने खाना खाया। यह इस दृष्टि से प्रशंसनीय है कि यहां खाद्य पदार्थ अच्छा और तार्किक दर पर मिलता है।हालांकि मुख्य उपलब्धता दक्षिण भारतीय व्यंजनो की ही होती है पर यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। अपना सामान क्लोक रूम से वापस लिया और गाड़ी के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

यहां हम एक बड़े संकट में फंसते- फंसते बचे! दरअसल हमने आरक्षण तो निरस्त ही करवा दिया था और अब हमें सामान्य दर्जे में सफर करना था , टिकट भी हमने ले ही लिया था। त्रिवेन्द्रम से मदुरै लगभग 300 किमी है और इस पैसेन्जर गाड़ी का किराया मात्र 41/- है। मेरे मित्र ने सुझाव दिया कि ट्रेन आ जाए तो हम लोग पहले सीटें ले लें और बाद में पत्नी और बच्चों को लिवा लाएं। सुझाव मुझे तो बहुत अच्छा नहीं लगा, एक साथ ही सवार हो लें तो अच्छा हो किन्तु दबे मन से सुझाव मैंने भी मान लिया। ट्रेन आई, जोरों की बारिश हो रही थी। भाषाई समस्या के कारण यह भी ज्ञात नहीं हुआ कि गाड़ी आएगी किधर से और सामान्य डिब्बे लगते किधर हैं ? गाड़ी आई तो हम दोनों एक तरफ दौड़े , उधर डिब्बे भरे हुए थे। लिहाजा हमें दूसरी ओर जाना पड़ा। सीटें खाली मिल गई तो सन्तोष हुआ। अपने साथ मैं बेटी को भी ले गया था। ऊपर की कई सीटें हमें आसानी से मिल गई थीं । बेटी और मित्र को सीटों की रक्षा का दायित्व सौंपकर मैं बाकी सदस्यों को लिवाने पहुँचा और बमुश्किल चला ही था कि गाड़ी चल पड़ी ! हमारा अनुमान था कि स्टेशन बड़ा है और ट्रेन देर तक रुकेगी । रात का वक्त और सुदूर अनजान देश ! अब क्या करें, मैं तो पिछले डिब्बे में चढ़ भी जाता किन्तु महिलाओं और बच्चों का क्या करें ? इस सारी घबराहट के बीच अब बस मोबाइल का ही सहारा थोड़ी सी ऑक्सीजन दे रहा था, भगवान का शुक्र कि मित्र बेटी को लेकर जल्दबाजी का परिचय देते हुए उतर गए थे और खिड़की से गाड़ी के अन्दर झांक रहे थे- इस आशंका से कि कहीं हम लोग पीछे के किसी कंपार्टमेन्ट में चढ़ न गए हों। इस बीच बेटी ने मुझे देख लिया और हम सभी एक दूसरे को एक साथ देखकर जैसे विश्वास करने की कोशिश कर रहे हों कि हम वास्तव में पुनः साथ हैं।

बारिश अभी भी जोरों से हो रही थी। राहत की सांस लेने और अपनी गल्ती एवं परिस्थिति की समीक्षा करने के बाद आगे के कार्यक्रम पर विचार करना शुरू किया । पूछताछ की तो पता चला कि अगली गाड़ी सुबह पौने चार बजे है। अर्थात लगभग 6 घंटे तक प्रतीक्षा ! बस में जाने के लिए न तो बच्चे तैयार और बारिश की वजह से बाहर निकलने और बस अड्डे तक जाने की गुंजाइश । वैसे 300 किमी की बस यात्रा के लिए पूर्णतः तैयार मैं भी नहीं था। अब या तो हम प्रतीक्षा करें -यहीं रेलवे के विश्रामालय में या होटल की तलाश करें । होटल के लिए भी बाहर जाना ही होता , अतः हमने मन मारकर यहीं रुकने का निर्णय किया और अगली ट्रेन जो प्रातः पौने चार बजे की थी ,की प्रतीक्षा करने का विकल्प स्वीकार कर लिया।

विश्रामालय में ही आसन लगा। मित्र सपरिवार निद्रानिमग्न हो गए। कोशिश मैंने भी की किन्तु सफलता नहीं मिली। घंटे भर लोट-पोट , अंडस -मंडस करता रहा , फिर हार मानकर बैठ गया। वैसे भी यात्रा में मैं कम सामान और कम भोजन के फार्मूले पर चलता हूँ और सुखी महसूस करता हूँ ।बहरहाल, रात निकलती गई और गाड़ी के आने का समय हो गया। सबको जगाया और चेन्नई एगमोर एक्सप्रेस में हम सवार हो गए।तुलनात्मक रूप से इसमें भीड़ थी । चूंकि हम इन बातों को स्वीकार कर के सवार हुए थे इसलिए कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई।आगे गाड़ी खाली होती गई और हमें आराम करने की जगह भी मिलती गई।

सुबह नौ-दस बजे तक हम थोड़ा आश्वस्त हो चुके थे और स्थानीय प्रकृति,टोपोग्राफी और भौगोलिक दृश्यों का आनन्द लेने लग गए थे। जो कुछ दक्षिणी पठार के विषय में किताबों में पढा था वह देख रहा था। वहां की मिट्टी और बनस्पतियां हमारे अध्ययन की केन्द्र में थीं । साथ चल रहे यात्रियों का ढंग, भोजन एवं तौर तरीका हमारे लिए आकर्षण था। ज्यादातर यात्री साथ में इडली और चटनी लेकर आए थे और मौका पाते ही चट करने में लग जाते थे । भाग्यवश कुछ सहयात्री ऐसे थे जो थोड़ी बहुत अंगरेजी समझ ले रहे थे । उनसे ही हम कुछ-कुछ जानकारी पा जा रहे थे।

मदुरै पहुंचाने में इस गाड़ी ने लगभग सात घंटे लिया । मदुरै तमिलनाडु का एक बड़ा रेलवे जंक्शन है । यहां से उत्तर भारत, दक्षिण के कई बडे नगरों, रामेश्वरम एवं कन्या कुमारी जैसी जगहों के लिए गाड़ियां मिलती है। यह दक्षिण भारत की एक प्रकार से सांस्कृतिक राजधानी है।अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं सिल्क उद्योग के लिए यह भारत में ही नहीं अपितु विदेशों तक मे विख्यात है ।

हम यहां लगभग 11बजे दिन में पंहुचे थे और थके हुए थे। हमारी प्राथमिकता थी यथाशीघ्र होटल लेना , नहा धोकर तरोताजा होना और फिर मीनाक्षी मंदिर का दर्शन करना। स्टेशन से बाहर आए तो ऑटो और टैक्सी वालों ने हमें धरा। दक्षिण भारत के दिल्ली स्थित एक मित्र ने सुझाया था कि परिवार स्टेशन पर ही छोड़कर पहले होटल तलाश लेना फिर परिवार ले जाना। साथ वाले मित्र का भी कुछ ऐसा विचार था । पर, मैं कुछ रात की घटना से और कुछ थकान से इस विचार से सहमत नहीं हुआ। एक साथ ही चलते है। जो भी सस्ता महंगा पड़ेगा , देखा जाएगा! एक बार कमरा ढूंढ़ो, फिर परिवार लेने आओ। ना भाई ना। और यह जानते हुए भी कि ऑटो वालों का कमीशन बंधा होता है, इनके साथ जाने से कमरा कमीशन जोड़कर ही मिलता है, हमने उन्हीं के साथ जाना उचित समझा। शायद यह भी एक परिस्थिति ही होती है कि आदमी जानते हुए भी ठगे जाने को तैयार होता है!

इस बार कोई भी पोंगापंथ अभी तक सामने नहीं आया। थोड़ा बहुत पोंगा मैं ही साबित हुआ। हां, मंदिर में ले चलूंगा तो पोंगापंथ जरूर दिखाऊंगा। यात्रा अभी जारी है…………

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पोंगा पंथ अप टु कन्याकुमारी -3

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 18, 2009

दिये में तेल डालने का शुल्क देकर हम आगे निकले ही थे कि एक दूसरे कार्यकर्ता ने हमें रोका । उसके पास रसीदों की गड्डी थी । उसकी आज्ञानुसार हमें प्रति व्यक्ति पांच रुपये का टिकट लेना था । सामने एक बोर्ड पर क्षेत्रीय भाषा में पता नहीं क्या – क्या लिखा था जिसे वह हमें बार- बार दिखा रहा था । उसमें हम जो पढ़ सकते थे वह था अंगरेजी में लिखा हुआ – एंट्री-५/-। हमें लगा कि शायद यह मंदिर का प्रवेश शुल्क होगा । जब हमने टिकट ले लिया तो उसने इशारा किया कि हमें ऊपर जाना है । हालांकि हमारी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी , फिर भी जाना ही पड़ा । हमने सोचा कि शायद कोई दर्शन होगा । बहरहाल , सीढ़ियाँ चढ़कर प्रथमतल पर गए तो वहां एक हाल सा था जिसमें कुछ चित्र लगे हुए थे। प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं थी, सीलन भरी पड़ी थी और एक तरफ चमगादड़ों का विशाल साम्राज्य था – कुछ उल्टे लटके थे तो कुछ हमारे जाने से विक्षोभित हो गए थे और अपना गुस्सा प्रकट कर रहे थे। अब इसके ऊपर जाना हमने उचित नहीं समझा और नीचे आ गए। इस दरवाजे को पार कर हम आगे निकले और दर्शन की पंक्ति में लग गए। यहां हमें मालूम हुआ कि जिस प्रथम माले से हम वापस आए थे, उसके ऊपर छः माले और हैं तथा सातवें माले से पूरा शहर दिखता है और वे पांच रुपये इसी के एवज मे लिए जाते हैं। वस्तुतः मंदिर का गोपुरम सात मंजिल का है और मंदिर प्रशासन ने अपने व्यवसाय प्रबंधन कुशलता का परिचय देते हुए नगरदर्शन की यह सुविधा उपलब्ध करवाई है।
खैर, नगरदर्शन से वंचित होने का हमें कोई क्षोभ नहीं हुआ।हम सभी पंक्तिबद्ध थे।शाम के साढ़े चार बजे होंगे। अचानक कुछ लोग समूह में आए और पंक्ति को उपेक्षित कर आगे बढ़ गए। मैंने सोचा था कि कम से कम ऐसी जगह पर तो लोग स्वानुशासन में रहेंगे परन्तु शायद यह भी अपने देश की विविधता में एकता है ! चाहे उत्तर हो या दक्षिण, नियम तोड़ने में हम बराबर के हिस्सेदार है। पांच बजे के करीब दर्शन शुरू हुए होंगे । अब लाइन का नाम करीब-करीब मिट गया था। ढंग की -धक्का मुक्की थी। अन्दर न तो पुलिस की कोई व्यवस्था थी और न स्वयंसेवकों का कोई अता-पता !गनीमत यह थी कि चोरी -जेबतराशी जैसी महामारी वहाँ नही के बराबर है। वैसे भी हमारे पर्स हमारे हाथों में ही थे। भीड़ में दम घुट सा रहा था। बस, केवल दर्शन करके हम बाहर निकलने के प्रयास में लग गए और किसी तरह जल्दी ही सफल भी हो गए। कोई पूजा या प्रसाद के चक्कर में हम थे भी नहीं! हां, मंदिर बड़ा ही भव्य है और उसके स्थापत्य और विशालता को जितना देख और समझ सकता था, उतना प्रयास करता रहा।
स्वामी पद्मनाभ का यह मंदिर भी दक्षिण भारतीय शैली के स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है। अत्यन्त विशाल यह मंदिर हिन्दू धर्म के वैभव का प्रतीक है और एक समृद्ध समाज का परिचायक है।दूर से ही इसका विशाल गोपुरम दर्शकों और श्रद्धालुओं को खींच लेता है।
समूचा मंदिर विशाल पत्थरों को तराश कर बनाया गया है।यह मंदिर पद्मनाभस्वामी क्षेत्रम् और अनन्तपुरी के नाम से विख्यात है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्वाभिमुख है और इसका गोपुरम सात मालों का है जिसकी उंचाई 100 फीट है। गोपुरम के सम्मुख एक विशाल सरोवर पद्मतीर्थम है जो मंदिर की सुंदरता में अभिवृद्धि करता है । यह बात अलग है कि इसकी साफ सफाई पर कोई ध्यान देने वाला मुझे नहीं लगा।
मन्दिर का गलियारा भी बहुत बड़ा है और 365 खंभो को बड़ी बारीकी से तराश कर लगाया गया है। गर्भगृह एक विशाल चबूतरे पर है जो एकमात्र पत्थर को काटकर बनाया गया है और इसे ओट्टकल मंडपम के नाम से जाना जाता है। इसके बारे में भी बहुत सी किंवदंतियां हैं। जैसा कि मंदिर के नाम से ही स्पष्ट है, मंदिर स्वामी पद्मनाभ को समर्पित है जो भगवान विष्णु का ही एक रूप है। विग्रह की मुख्य विशेषता यह है कि यह शयन मुद्रा में है। कहा जाता है कि यह विग्रह कुल 12008 शालिग्राम को जोड़कर बनाया गया है जो नेपाल स्थित गंडकी नदी से लाए गये थे। इसके अतिरिक्त यहां श्री नरसिंह, श्री हनुमान, श्री कृष्ण ,श्री अइयप्पा और श्री गरुण की मूर्तियां भी स्थापित हैं। वस्तुतः यह 108 देवदर्शन में एक प्रमुख स्थल है।
मंदिर की संपूर्णता का आनन्द तो बस देखकर ही लिया जा सकता है । अगर पूरी जानकारी प्राप्त कर लेख लिखा जाए तो कई पृष्ठों में जाएगा। हां, मैं आपका ध्यान दर्शन के समय पर जरूर दिलाना चाहूंगा, जरा इस विचित्रता को गौर फरमाएं । देव दर्शन की यह समयबद्धता कम से कम मुझे तो बिलकुल नहीं सुहाई। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि ईश्वर को हम अपने नियमों में न बांधे और उसे तो श्रद्धालुओं के लिए मुक्त कर दें!
यह रही स्वामी पद्मनाभ के दर्शन की समय सारणी-
पूर्वाह्न -3:30 – 4:45
6:30 -7:00
8:30 -10:00
10:30-11:00
11:45-12:00
अपराह्न
5:00-6:15
6:45-7:20

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