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Archive for the ‘लोकगीत’ Category

भाषाई आत्मा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 26, 2010

–हरिशंकर राढ़ी

भोजपुरी गानों की चर्चा हुई तो मेरी पिछली पोस्ट पर दो टिप्पणियाँ ऐसी आईं कि यह नई पोस्ट डालने के लिए मुझे विवश होना पड़ा।हालांकि इन टिप्पणियों में विरोधात्मक कुछ भी नहीं है किन्तु मुझे लगता है कि इस पर कुछ और लिखा जाना चाहिए। एक टिप्पणी में रंजना जी ने भोजपुरी गीतों में बढती फूहडता पर चिन्तित नजर आती हैं तो दूसरी टिप्पणी में सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी मनोज तिवारी मृदुल का नाम न लिए जाने को शायद मेरी भूल मानते हैं किन्तु वे स्वयं ही उस बात पर आ जाते हैं जिसकी वजह से मैंने उनका नाम नहीं लिया ।
इसमें संदेह नहीं कि मनोज तिवारी मृदुल आज भोजपुरी के एक बड़े स्टार हैं। अब बड़े स्टार हैं तो बड़ा कलाकार भी मानना ही पड़ेगा । भोजपुरी का उन्होंने काफी प्रचार-प्रसार किया है। भोजपुरी में पॉप संगीत का प्रथम प्रयोग करने वाले वे संभवतः पहले गायक हैं( बगल वाली जान मारेलीं )और बहुत लोकप्रिय भी हैं। मेरी जानकारी के अनुसार उनकी लोकप्रियता का ग्राफ शारदा सिन्हा और भरत शर्मा से कहीं ऊपर है। पर मैं यह बड़े विश्वाश से कह सकता हूँ कि उनके आज के गीतों में भोजपुरी की आत्मा नहीं बसती। एक समय था जब उनके गीतों में कभी – कभी भोजपुरी माटी की गंध का स्पर्श मिल जाता था।उस समय भी उसमें खांटी आत्मा नहीं होती थी। मुझे याद हैं उनके गीतों के कुछ बोल-हटत नइखे भसुरा ,दुअरिये पे ठाढ बा ; चलल करा ए बबुनी’…….. और कुछ पचरे। परन्तु वह खांटीपना कभी भी नहीं दिखा जो भरत शर्मा व्यास, शारदा सिन्हा और मोहम्मद खलील के गीतों में दिखता रहा है ।
दरअसल मनोज तिवारी और अन्य कई गायकों की भाषा तो भोजपुरी अवश्य है किन्तु उनके गीतों और धुनों की आत्मा भोजपुरी नहीं है। केवल भाषा का प्रयोग कर देने से भाषाजन्य वातावरण नहीं बन जाता। वास्तविक वातावरण तो परिवेश से बनता है। फिल्म ”नदिया के पार” इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। इस फिल्म की भाषा भोजपुरी आधारित मानी जा सकती है किन्तु भोजपुरी कतई नहीं । किन्तु इसकी पटकथा और परिवेश ऐसा है कि प्रायः लोग इसे भोजपुरी फिल्म मान लेते हैं । भाषा के आधार पर यह फिल्म भोजपुरी तो बिल्कुल नहीं है। भोजपुरी गीतों की अपनी भाषा ही नहीं वरन अपना परिवेश , परम्परा और मुखयतया अपनी धुनें भी हैं । सोहर, गारी , नकटा, उठाना , सहाना, कजरी (बनारसी और मिर्जापुरी), पूरबी , छपरहिया, चैता, चैती, फगुआ,झूूमर और इनके कई विकारों से मिलकर भोजपुरी संगीत का संसार बना है। फिल्मी गीतों, पंजाबी पॉप और डिस्को संगीत को भोजपुरी शब्द दे देने से बनी रचना भोजपुरी नहीं हो जाएगी। आज पंजाबी पॉप संगीत का परिणाम लोगों के सामने है। एक बड़ा तबका जो पंजाबी संस्कृति, पंजाबी साहित्य और पंजाबी लोक संगीत से वाकिफ नहीं है वह वर्तमान पंजाबी पॉप (बदन उघाडू दृश्य ) संगीत को वास्तविक पंजाबी गीत मानने लगा है और पंजाब की माटी के असली गीत कहीं गुम हो गए हैं।
लोकगीतों के साथ एक खास बात यह होती है कि वे लोकसाहित्य के एक महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं। उनमें लोकसाहित्यकार अपनी संवेदनशीलता से एक जीवंतता पैदा कर देते हैं और वे क्षेत्र विशेष की जीवन शैली के प्रतिबिम्ब बन जाते हैं । भोजपुरी गीतों मे इस बात को शिद्दत के साथ महसूस किया जा सकता है। मौसम के गीत हों या किसानी के, उनमें भोजपुरी क्षेत्र का सजीव वातावरण मिलता है। मुझे इस इलाके का एक पारंपरिक गीत याद आता है – गवना करवला ये हरि जी, अपने विदेशावां गइला हो छाय । इस गीत को बाद में भरत शर्मा ने अपनी खांटी देशी शैली में बड़ी ठसक से गाया और इसके सारे दर्द को बाहर निकाल दिया। इस गीत में गौने की परम्परा ही नहीं अपितु उस विरह का भी जिक्र है जो इस क्षेत्र में सदियों से पाया जाता रहा है। संयुक्त परिवार की परम्परा में प्रायः कोई एक पुरुष जीविकोपार्जन के लिए कलकत्ता या असम की तरफ चला जाया करता था और उसकी नवोढा विरहाग्नि में तपती रहती थी। यही कारण है कि यहां के गीतों में विरह का बोलबाला पाया जाता रहा है । और तो और यहां इसी के चलते विरहा विधा का अलग से अस्तित्व पाया जाता है। भोजपुरी भाषी इस बात को ठीक से जानते और समझते हैं ।
अपनी इन्हीं मान्यताओं के चलते मैं मनोज तिवारी को ऐसे भोजपुरी गायकों की श्रेणी में नहीं रखता जो भोजपुरी गीतों में वहां की पूरी परम्परा लिए चलते हैं । ये बात अलग है कि भोजपुरी और भाग्य ने उन्हें बहुत कुछ दिया है। इस परिप्रेक्ष्य में भरत शर्मा और शारदा सिन्हा के साथ न्याय नहीं हुआ है।
एक अच्छा गायक अच्छा गीत कार भी हो जाए, यह जरूरी नहीं । अच्छे गायक इस बात को समझते हैं। गुड्डू रंगीला और निरहू के गीत कौन लिखता है यह तो मैं नहीं जानता , पर शारदा सिन्हा के अधिकाँश गीत पारंपरिक है।भोलानाथ गहमरी और तारकेश्वर मिश्र राही के गीत भोजपुरी गंध लिए हुए चलते हैं कई बार दिल को छू जाते हैं । इनके अलावा अनेक अज्ञातनामा कवि और कलाकार भोजपुरी संगीत की उच्चकोटि की सेवा कर रहे हैं ।निरहू करण और रंगीलाकरण हो रहा है परन्तु भोजपुरी की जड़ें बहुत गहरी हैं और मुझे विश्वाश है कि फिर भोजपुरी अपनी आत्मीयता देती रहेगी।

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