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Archive for the ‘व्यंग्य’ Category

चिंता से चतुराई घटे

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 11, 2014

इष्ट देव सांकृत्यायन

भारत हमेशा से एक चिंतनप्रधान देश रहा है। आज भी है। चिंतन की एक उदात्त परंपरा यहाँ सहस्राब्दियों से चली आ रही है। हमारी परंपरा में ऋषि-मुनि सबसे महान माने जाते रहे हैं, इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यही रहा है कि वे घर-बार सब छोड़ कर जंगल चले जाते रहे हैं और वहाँ किसी कोने-अँतरे में बैठकर केवल चिंतन करते रहे हैं। चिंतन से उनके समक्ष न केवल ‘इस’, बल्कि ‘उस’ लोक के भी सभी गूढ़तम रहस्य खुल जाते रहे हैं, जिसे वे समय-समय पर श्रद्धालुओं के समक्ष प्रकट करते रहे हैं। अकसर उनके चिंतन से बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी निकल आता रहा है। कालांतर में चिंतन से एक और चीज़ प्रकट हुई, जिसे चिंता कहा गया।

हालांकि यह चिंतन से अलग है, यह समझने में थोड़ा समय लगा। बाद में तो यहाँ तक पता चल गया कि यह चिंतन से बिलकुल अलग है, इतना कि चिंतन जितना फ़ायदेमंद है, चिंता उतनी ही नुकसानदेह। मतलब एक पूरब है तो दूसरी पश्चिम। इनमें एक पुल्लिंग और दूसरे के स्त्रीलिंग होने से इस भ्रम में भी न पड़ें कि ये एक-दूसरे के पूरक हैं। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये कुछ-कुछ वैसा ही मामला है, जैसे किसी नामी कंपनी का प्रतिष्ठित उत्पाद कोई लोकल टाइप कारखाना मिलते-जुलते नाम से निकाल देता है। बुनियादी फ़र्क़ दोनों के बीच यह है कि एक विशिष्ट जनों द्वारा किया जाता रहा है, जबकि दूसरी सामान्य जन द्वारा। लेकिन, समय के साथ वर्ग-धर्म-जाति भेद मिटने और डुप्लीकेसी बढ़ने का नतीजा यह हुआ कि कई बार सामान्य जन भी चिंतन कर डालता है और विशिष्ट जन भी चिंता के जाल में फंस जाते हैं।

हाल में आई कौलीफेर्निया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार विशिष्ट जन के चिंता के जाल में फंसने का सबसे पहला विवरण त्रेतायुग में पाया जाता है। भगवान राम के वनगमन के बाद महाराज दशरथ ग़लती से चिंता कर बैठे और उसका नतीजा अब आप जानते ही हैं। वास्तव में चिंता के साइड इफेक्ट का पता यहीं से चलना शुरू हुआ और इसके साथ ही इस पर शोध भी शुरू हुए। शोधों का निष्कर्ष यह निकला कि चिंता बहुत ही ख़तरनाक टाइप चीज़ है। इससे फ़ायदा कुछ नहीं है, जबकि नुकसान हज़ारों। और तो और, इससे कई तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। आयुर्विज्ञान विभाग वाले अनुसंधानकर्ताओं ने इससे हो सकने वाली बीमारियों की जो सूची दी, उसमें ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ से लेकर हार्ट अटैक तक का नाम शामिल था।

आनन-फानन जनकल्याण विशेषज्ञों और साहित्य के आचार्यों को बुलाया गया और इस विषय में जागरूकता फैलाने के लिए कोई प्रभावी उपाय निकालने को कहा गया। काफ़ी सोच-विचार के बाद उन्होंने एक स्लोगन निकाला और उसे हवा में तैरा दिया। वह स्लोगन है – चिंता से चतुराई घटे। वैसे इसे फैलाया तो हर ख़ासो-आम के लिए गया, पर जैसा कि आम तौर पर होता है, आम लोगों में इसे समझ कम ही पाए। अलबत्ता वे और ज़्यादा इसके फेर में फंस गए। जबकि ख़ास लोगों ने इसे ठीक से समझा और इसके फेर में फंसने से बचे। बाद में ग़ौर किया गया कि कुछ ख़ासजन भी इससे बच नहीं पाए। आम तो अकसर और कभी-कभी ख़ास जन भी किसी छोटी-मोटी ग़लती के कारण चिंता में फंसकर अपनी चतुराई घटाते रहे।

इसलिए ज़रूरी समझा गया कि इसके उपचार का कोई उपाय निकाला जाए। काफ़ी शोध-अनुसंधान के बाद मालूम हुआ कि दवा तो इसके मामले में कुछ ख़ास काम आती नहीं, हाँ एक उपाय ज़रूर है। उपाय यह है कि यह जैसे ही हो उसे जता दिया जाए। उस ज़माने में चूंकि कामकाज बहुत तेज़ गति से नहीं चलता था, इसलिए यह इतनी बात पता चलते-चलते बहुत देर लग गई। त्रेता से द्वापर युग आ गया। द्वापर में आपने देखा ही कि किस तरह चिंता ने पितामह भीष्म को आ घेरा। अच्छी बात यह रही कि उन्होंने लगातार आयुर्विज्ञानियों के निर्देशों का पालन किया और उन्हें जब-जब चिंता ने घेरा, वह उसे जता देते रहे।

उसके बाद तो हमारे देश में चिंता के फेर में पड़ते ही उसे जता देने का रिवाज़ सा चल पड़ा। हमारे नए दौर के विशिष्ट जन तो उसके फेर में पड़ने से पहले ही उसे जता देते हैं। आजादी के बाद से लेकर अब तक हम देखते आ रहे हैं कि विशिष्ट जन अकसर बहुत गंभीर मसलों पर सामान्य से लेकर गंभीर और कभी-कभी अति गंभीर टाइप की भी चिंता जताते रहते हैं। मामला चाहे बाढ़ का हो या अकाल का, महंगाई का हो या बेकारी का, दंगे का हो या आतंकवाद का, या फिर पड़ोसी देशों द्वारा हमारे देश में घुसपैठ का ही क्यों न हो… हमारे विशिष्टजन चिंता जताने में कोई कोताही नहीं बरतते। कई बार तो चिंता द्वारा घेरे जाने से पहले ही उसे जता देते हैं। हालांकि जनता टाइप लोगों को चिंता जताना पसंद नहीं आता। कई बार वे किसी विशिष्ट जन द्वारा चिंता जताए जाते ही चिढ़ जाते हैं। कहते हैं, ये तो पहले वाले भी कर रहे थे, फिर आपकी क्या ज़रूरत थी? असल में समझ ही नहीं पाते कि चिंता जताना अपने आपमें बहुत कुछ करना है। मेरी मानें तो आप भी इस पर अमल करें। यानी कोई चिंता आपको घेरे, इससे पहले ही उसे जता दें। क्योंकि चिंता से चतुराई घटे और आप जानते ही हैं, चतुराई घटने का आज के ज़माने में क्या नतीजा हो सकता है।

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एक साहब बयानबहादुर और एक सपोर्टबहादुर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 7, 2011

हाल ही में ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद अमेरिका ने दुनिया के सबसे शांतिप्रिय देश पाकिस्तान को धमकी दी कि ज़रूरत पड़ी तो वह पर फिर से ऐसी ही कार्रवाई कर सकता है. इसके बाद तो क्या कहने! कितना भी शांतिप्रिय हो, लेकिन कोई धमकी देगा तो कोई भी क्या करेगा. बहादुरी के मामले में पाकिस्तान का तो वैसे भी कोई जवाब नहीं रहा है. इतिहास गवाह है कि आमने-सामने की लड़ाई में वह कभी किसी से जीता नहीं है और छिपकर हमला करने का कोई मौक़ा उसने छोड़ा नहीं है. आप जानते ही हैं कि सामने आ जाए तो चूहे से आंख मिलाना वे अपनी तहजीब के ख़िलाफ़ समझते हैं और दूर निकल गए शेर पर तो पीछे से ऐसे गुर्राते हैं कि जर्मन शेफर्ड भी शर्मा जाए. तो अब जब अमेरिका उनके मिलिटरी बेस के दायरे में ही ओसामा जी की ज़िंदगी और विश्व समुदाय में उनकी इज़्ज़त की ऐसी-तैसी करके निकल गया तो वो गुर्राए हैं. यह संयोग ही है कि ओबेडिएंसी में टॉप भारत की आर्मी के प्रमुख ने भी ऐन मौक़े पर एक सही, लेकिन मार्मिक बयान दे दिया. वह भी बिना अपने हाइनेस से पूछे और इस बात का भी ज़िक्र किए बग़ैर कि ‘अगर उनकी इजाज़त हो तो’. यह जानते हुए भी कि उनकी इजाज़त के बग़ैर वे कुछ नहीं कर सकते और हाइनेस सिवा सैनिकों की बेकीमती गर्दनें कटाने के उन्हें किसी और बात की इजाज़त नहीं दे सकते. आख़िर हमें घाटी से लेकर पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति और दुनिया भर में अपनी शांतिप्रियता की यह छवि बनाए रखनी है भाई! इतनी आसान बात थोड़े ही है.

ख़ैर, हमारे बयानबहादुर तो अपना बयान दे ही चुके. अब उन्होंने अपने बयान बहादुर को काम पर लगाया है. ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद घंटों चली बैठक के कई घंटे बाद तक उनके आका लोगों की तरफ़ से कोई बयान नहीं आ पाया था. ऐसे क्रूशियल मौक़े पर जिन बयानबहादुर को वहां बयान देने के महान काम पर लगाया गया था, अब उन्हीं का नया बयान आया है. यह बयान थोड़ा अमेरिका और ज़्यादा भारत के मुतल्लिक है. उन्होंने अमेरिका की कार्रवाई को तो अहम कामयाबी बताया है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि अगर किसी दूसरे देश ने ऐसी ज़ुर्रत की तो यह उसकी बड़ी भूल होगी.

क्या बताएं हमें तो अपने उनके बयानबहादुर साहब की बात सुनकर वह वाक़या याद आ गया, जब ट्रेन में सफ़र कर रहे एक सज्जन के बर्थ पर कोई दूसरे सज्जन आ कर बैठ गए. पहले ने दूसरे सज्जन को हटने के लिए कहा तो उन्होंने झापड़ मार दिया. पहले को ग़ुस्सा आ गया. उन्होंने कहा कि ठीक है, हमको मारा तो मारा, हमारी बीवी को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, उन्होंने बीवी को भी मार दिया. उसके बाद उन्होंने कहा कि बीवी को मारा तो मारा, बेटे को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, दूसरे सज्जन ने बेटे को भी मार दिया. बात जमी नहीं, उन्होंने फिर कहा, बेटे को मारा तो मारा, अब बेटी को मार के दिखाओ तो जानें. आख़िरकार दूसरे सज्जन ने बेटी को भी मारने के बाद पूछा, ‘अब बताओ.’ दूसरे सज्जन ने पूरी सज्जनता के साथ कहा, ‘जी अब कुछ नहीं, अब कोई ये कहने लायक तो नहीं रहेगा कि तुम मार खाया.’

मुझे तो लगता है कि इन बयानबहादुर साहब का इरादा भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो. क्योंकि उनके अपने ही पाले हुए ओसामा जी जैसे कई शांतिदूत अब उनके काबू से बाहर हो गए हैं. क्या पता उन्होंने जो बात कही हो, वो उन्हीं के लिए कही हो. कई बार आदमी कहता कुछ और है, लेकिन उसका असल आशय कुछ और होता है. मसलन – कमज़ोर आदमी को जब किसी से मदद मांगनी होती है तो कहता है, ‘प्लीज़ मेरी मदद करें’. बहादुर लोग इसे तहजीब के ख़िलाफ़ मानते हैं. वे यही बात इस तरह कहते हैं, ‘है कोई माई का लाल जो मेरे साथ दो क़दम चलकर दिखाए.’ क्या पता कि उनका मामला भी कुछ ऐसा ही हो.

वैसे भी उनके लिए यह एक मुश्किल दौर है. वैसे वीरोचित शब्दों का प्रयोग करें तो शायद कहना पड़े कि दौर-ए-फ़ख़्र है. बिरादरी के नाम पर जो लोग हर साल इन्हें ईदी भेजा करते थे, उन्होंने अब ग़ुलाम कश्मीर के पीएम साहब को नत्थी वीजा जारी करना शुरू कर दिया है. पता नहीं इसका क्या मतलब होता है. हो न हो, उनकी समझ में आ गया हो कि अब ये दुनिया भर की नज़र में शांति के सबसे बड़े दूत हो गए हैं तो इनसे नत्थी टाइप संबंध रखना ही ज़्यादा मुनासिब है. पर भाई उनकी हिम्मत की दाद तो देनी पड़ेगी. क्या पता, इस हिम्मत के मूल में हमारे उत्तर वाले पड़ोसी का सपोर्ट हो. इस दौर में एक उन्होंने ही तो इनका साथ दिया. अरे वही जिनकी मिसाल शांति और भरोसे के मामले में दुनिया भर में दी जाती है और जिनके बनाए इलेक्ट्रॉनिक आइटम उनके कूटनीतिक वादों-संकल्पों से कई गुना ज़्यादा टिकाऊ समझे जाते हैं.

बहरहाल, हमारे पश्चिम वाले पड़ोसी मुल्क और उनके बयानबहादुर को हमारे उत्तर उत्तर वाले पड़ोसी मुल्क और उनकी सपोर्ट बहादुरी पर पूरा भरोसा है. हम तो उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना अब से कोई 49 साल पहले देख चुके हैं, पर चूंकि वे हमारे और उनके यानी दोनों के साझा पड़ोसी हैं, लिहाजा उन्हें भी देखना चाहिए. हालांकि उनके लिए अभी उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना देखना बाक़ी ही है. आजकल वे दोनों जन अपनी-अपनी नमूनेबाजी की ओर बड़ी तेज़ी से बढ़ रहे हैं और ठीक ही है, दोनों एक-दूसरे की सपोर्ट और बयान या कहें सपोर्ट के बदले अपोर्ट बहादुरी के नमूने जितनी जल्दी देख लें, उतना ही बेहतर रहेगा. जबसे सपोर्टबहादुर ने बयानबहादुर को सपोर्ट करना शुरू किया है, तभी से बयानबहादुर ने सपोर्टबहादुर को अपने यहां से शांतिदूतों का एक्सपोर्ट भी शुरू कर दिया है. ठीक ही है भाई, सपोर्ट के बदले एक्सपोर्ट तो होना ही चाहिए और आप देख ही रहे हैं, सपोर्टबहादुर के कुछ प्रांतों में ओलंपिक से ठीक पहले कितनी ज़बर्दस्त पटाखेबाजी हुई थी. माना जाता है कि यह बयानबहादुर के शांतिदूतों का ही पुण्यप्रताप था. आने वाले दिनों में यह सिलसिला और बढ़ेगा, बढ़ता ही जाएगा. हमें क्या? भाई हमारे तो दोनों पड़ोसी हैं. अपने दोनों पड़ोसियों के प्रति हमारी तो शुभकामनाएं ही हैं.

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अमेरिका कहीं का!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 6, 2011

सलाहू आज बेहद नाराज़ है. बेहद यानी बेहद. उसे इस बात पर सख़्त ऐतराज है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब ने ओसामा को इज़्ज़त से दफ़नाने की बात क्यों की? बात यहीं तक सीमित नहीं है. उसकी नज़र में हद तो यह है कि उन्होंने ओसामा के नाम के साथ जी भी लगा दिया. ऐसा उन्होंने क्यों किया? यही नहीं सलाहू ने तो श्रीमान बयानबहादुर साहब के ऐतराज पर भी ऐतराज जताया है. अरे वही कि ओसामा को अमेरिका ने समुद्र में क्यों दफ़ना दिया. मैं उसे सुबह से ही समझा-समझा कर परेशान-हलकान हूं कि भाई देखो, हमारा शांति और अहिंसा के पुजारी हैं. और यह पूजा हम कोई अमेरिका की तरह झूठमूठ की नहीं करते, ख़ुद को चढ़ावा चढ़वा लेने वाली. कि बस शांति का नोबेल पुरस्कार ले लिया. गोया शांति और नोबेल दोनों पर एहसान कर दिया. हम शांति की पूजा बाक़ायदा करते हैं, पूरे रस्मो-रिवाज और कर्मकांड के साथ.

अगर किसी को यक़ीन न हो तो और अख़बारों पर भी भरोसा न हो तो सरकार बहादुर के आंकड़े उठाकर देख ले. शांति देवी के नाम पर हर साल हम कम से कम हज़ारों प्राणों का दान करते हैं. वह भी कोई भेंड़-बकरियों की बलि चढ़ाकर नहीं, विधिवत मनुष्यों के प्राणदान करते हैं. हमारे यहां सामान्य पूजा-पाठ में नरबलि भले प्रतिबंधित हो गई हो, पर कश्मीर से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति देवी के नाम पर हम हज़ारों मानवों की बलि हर साल चढ़ाते हैं. बलि की इस प्रक्रिया में हम कभी कोई भेदभाव नहीं करते हैं. पड़ोसी मुल्कों यानी पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन से ससम्मान आए शांति देवी के दूत जब जैसे और जिनकी चाहें बलि ले सकते हैं. बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष, ग़रीब-अमीर, पुलिसमैन-सैनिक, हिंदू-मुसलमान …. धर्म-वर्ग-आयु किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते. शांति देवी के दूत जब जैसे चाहें, किसी के प्राण ले सकते हैं.

है किसी में इतना दम जो यह कर सके. उनसे देवी शांति के दूतों का एक हमला नहीं झेला गया. एक बार वे अपनी पूजा लेने क्या आ गए कि तबसे चिल्लाए जा रहे हैं – नाइन इलेवन, नाइन इलेवन. गोया हमला क्या हुआ, उनके देश की घड़ी ही वहीं आकर थम गई! उसके बाद वह एक मिनट भी आगे बढ़ी ही नहीं. एक हमें देखिए, हम इसे हमला नहीं, देवी के दूतों का कृपाप्रसाद मानते हैं. अपनी राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक राजधानियों पर हुई ऐसी कई घटनाओं को हम उनका कृपा प्रसाद मानते हैं. कश्मीर, पंजाब, असम, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश में तो आए दिन हम उन्हें चढ़ावा चढ़ाते रहते हैं, अपनी संसद तक पर हम उन्हें उनकी पसंद के अनुसार बलि पात्र चुनने का मौक़ा देते हैं. कि भाई कहीं से वे किसी तरह असंतुष्ट न रह जाएं. हम अमेरिका की तरह उन्हें रोकने के लिए पासपोर्ट-वीज़ा के नियम त्रासद नहीं बनाते कि बेचारे प्रवेश ही न कर सकें. हम तो ख़ुद उनका आवाहन करते हैं, आवाहयामि-आवाहयामि वाला मंत्र पढ़कर. कभी सद्भावना बस सेवा चलवाते हैं तो कभी समझौता एक्सप्रेस ट्रेन और इससे भी काम नहीं चलता तो पासपोर्ट-वीज़ा की फ़ालतू औपचारिकताएं निबटा कर सिर्फ़ परमिट पर आने-जाने के लिए दरवाज़े खोल देते हैं.

इसे कहते हैं शांति का असली पुजारी! इतनी बड़ी संख्या में तो भेड़-बकरियों की बलि नहीं चढ़ाते होंगे, जितने हम मानव चढ़ा देते हैं. एक वे हैं कि एक मामूली से हमले के बाद सात समुंदर पार करके अफ़गानिस्तान तक चले आए. बदला लेने. यह भी नहीं सोचा कि बदला महान पाप है. जिस तरह क्रोध से क्रोध कभी शांत नहीं हो सकता, वैसे ही हत्या से हत्या भी कभी शांत नहीं हो सकती. इतनी आसान सी बात उनकी समझ में नहीं आई. एक हमें देखिए, हम घृणा पाप से करते हैं, पापी से नहीं. जिन्हें वे पापी समझते हैं, उन्हें हम शांतिदूत मानकर अपने घर में बैठाकर चिकन टिक्का खिलाते हैं. सुप्रीम कोर्ट भले उन्हें सज़ा-ए-मौत सुना दे, पर हमारा ऐसी ग़लती कभी नहीं करते. और कोर्ट की क्या मज़ाल कि वह इसे अपनी अवमानना मान ले! अरे भाई, शांति और अहिंसा के पुजारी देश हैं हम, भला हमें ऐसा करना चाहिए? फांसी-वांसी बर्बर देशों के विधान हैं. भला किसी सभ्य देश में कभी फांसी दी जाती है! सभ्य देश तो उन्हें कहते हैं जो बिना किसी बम-बंदूक के भी गैस रिसा कर हज़ारों लोगों की जान ले लेने वालों और उनकी अगली पीढ़ियों तक को अपंग बना देने वालों को भी चोरी-छिपा उड़वा कर सात समंदर पार उनके घर पहुंचवा देते हैं. है किसी में जिगरा? लेकिन सलाहू मेरी बात मान नहीं रहा है. वह इसे श्रीमान बयानबहादुर साहब और उनकी महान पार्टी की वोटबटोरी नीति से जोड़कर देख रहा है. उसे लगता है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब का यह बयान सिर्फ़ भारत के मुसलमानों की सहानुभूति बटोरने के लिए आया है. इसका मतलब यह है कि वह भारत के हर मुसलमान को ओसामा का समर्थक मानते हैं. वरना कोई वजह नहीं है कि ओसामा के नाम के साथ जी लगाते. उसने मुझे अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली दिखाते हुए कहा, ‘और पंडित यह समझ लो कि भारत के मुसलमान की इससे बड़ी बेइज़्ज़ती कुछ और नहीं हो सकती. जितनी बेइज़्ज़ती इस्लाम की ओसामा ने की, उतनी ही बेइज़्जती ये जनाब भारतीय मुसलमान की कर रहे हैं.’

मेरी समझ में नहीं आ रहा कि वह श्रीमान बयानबहादुर साहब के बयान को हिंदू-मुसलमान से जोड़कर क्यों देख रहा है. अरे भाई, वह तो घोषित सेकुलर हैं और उनकी पार्टी भी. उनको हिंदू-मुसलमान से क्या लेना-देना! पर सलाहू है कि मान ही नहीं रहा. अमेरिका की तरह एक बार जिस बात पर अड़ गया, अब अड़ा पड़ा है उसी पर. अमेरिका कहीं का.

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फागुन आया रे!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 28, 2010

मेरे एक कवि मित्र ने घोषणा की है फागुन आया रे! कब आया, कहां से आया, किस रास्ते आया, किसके मार्फ़त आया और कब तक ठहरेगा… इन सवालों का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है. सीधे काम की बात पर आ गए. सबसे पहले सीधे यही बता दिया कि किसलिए आया है. एकदम दिल्ली वालों की तरह. गोया फागुन के आने की सूचना सिर्फ़ दिल्ली वालों के लिए है. बल्कि सही पूछिए तो आपके लिए आपके साथ सदैव का नारा देने वाली दिल्ली पुलिस के लिए. जो थाने में ख़ून से लथपथ आदमी की भी शक्ल देखते ही सीधा सवाल करती है, हां बोलो. तो किसी को यह पूछने की ज़रूरत नहीं कि वह किसलिए आया है. उसके इरादे उन्होंने पहले ही ज़ाहिर कर दिए हैं. और जो इरादे उन्होंने ज़ाहिर किए हैं, वह बिलकुल नेक नहीं लगते.
बहरहाल, फागुन नंगा-लुच्चा-उचक्का-लफंगा जो भी हो, पर मेरे कवि मित्र पूरे ईमानदार हैं. तो उन्होंने बताया है- गोरी को बहकाने फागुन आया रे. हालांकि एक जगह उन्होंने यह भी कहा है कि वह प्रेम रस बरसाने आया है, पर अगले ही बन्द में फिर स्पष्ट कर दिया है तन-मन को भरमाने फागुन आया रे. अब अगर ग़ौर करें तो मालूम होता है कि ये प्रेम रस बरसाने वाला फागुन पहले तो गोरी को बहकाने और फिर तन-मन को भरमाने वाला है. बीच में यह जो प्रेम रस बरसाने की बात है वह बिलकुल वैसे ही है जैसे कि डिबॉच प्रेमियों के प्रेम का पूरा सिलसिला होता है.
ये ऐसा सिलसिला होता है जिसके प्रति अब की गोरियां-सांवलियां जो भी हैं, वो पहले से ही सतर्क रहती हैं. पहले की लड़कियां इसके बीच वाले पद के ही फेर में पड़ती थीं. और फागुन इसका झांसा देकर धीरे से गा डालता था अंतिम पद. बाद में जब मामला आगे तक बढ़ जाता था तो फिर सब गुण गोबर हो जाता था. ये तो अच्छा हुआ कि अब समाज मध्यकाल के सियापे से निकल कर उत्तर आधुनिक होने लगा है. आधुनिक होने का सही मतलब चित्रकला ने बहुत पहले ही बता दिया है. वैसे ही जैसे चित्रकला क्लासिसिज़्म, नियो क्लासिसिज़्म, रोमांटिक, एकेडमिक और रिअलिज़्म के दौर से होते हुए मॉडर्निज़्म और पोस्ट मॉडर्निज़्म तक आ गई है. मॉडर्निज़्म तक आने की प्रेरणा ही इसने गुफाओं के भित्तिचित्रों से ली थी. अब समाज यही प्रयोग कर रहा है. लिव-इन रिलेशनशिप और अनमैरेड मदरहुड की प्रेरणा भी विद्वान लोगों के मुताबिक शरीरों की समसामयिक ज़रूरतों से नहीं, पौराणिक आख्यानों से मिलती है.
ख़ैर जो भी हो, पर इस प्रेरणा ने एक काम बड़ा अच्छा किया है. इसने फागुन टाइप प्रेमियों को बेदर्दी बालमा, बेईमान साजन और बेवफ़ा सनम टाइप मानद उपाधियों से बचाया है. रबड़ के सुरक्षा कवच और आपातकालीन गोलियों ने इस नव-स्वातंत्र्यवाद (आसान भाषा में कहना चाहें तो आप इसे नए तरह का स्वतंत्रतावाद कह सकते हैं) को थोड़ी और हवा दी है. एड्सविरोध के नाम पर चल रहे अभियानों ने अगर फागुनों की हौसला अफ़जाई की है बहकाने के मामले में, तो इन गोलियों के ज्ञान ने गोरियों को प्रेरणा भी दी है बहकने की. कोई भरोसा नहीं अगर नव-उत्तरआधुनिकतावादी विज्ञापनों में (वैसे विज्ञापन बनवाने, बनाने और देखने वाले किसी वाद-विवाद के बवाल में नहीं पड़ते) एक गोरी दूसरी गोरी को फागुन की ओर दिखा कर गोलियों की तरफ़ इशारा करे और इन गोलियों के बारे में न जानने पर उसकी मलामत करती मिले. …. क्या जानती है तू अगर इन्हें ही नहीं जानती. और अंत में निष्कर्ष कुछ ऐसा आए.. पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें.
गीतों-गाथाओं में दर्ज लोकजीवन के अनुभवों पर भरोसा करें तो इस पूरे मामले के लिए एकमात्र ज़िम्मेदार फागुन ही है. अनमैरेड मदरहुड से लेकर एड्स तक. यूं तो इसके नाम पर बहुत कुछ बेचा जा रहा है, पर करोड़ों की ग्रांट भी डकारी जा रही है और बताया जा रहा है कि बचाव का इकलौता जो रास्ता है वह जानकारी है. जानकारी किसकी? एड्स की या उन साधनों की जो इसे बदनाम करके बेचे जा रहे हैं? एक तरफ़ बाबा रामदेव हैं जो संयम की साधना कराने पर तुले हैं और दूसरे कई-कई रूपों में बाबा कामदेव हैं जो कंडोम की साधना कराने पर तुले हैं. संयम से चलकर यह जो हमारी संस्कृति कंडोम तक आई है, यह फागुन की ही कृपा से तो हुआ है. जब तक स्वयंसेवी संगठन और सरकार यह काम संभालने की स्थिति में नहीं थे, तब तक यह काम फागुन जी ने ही देखा. अब सरकार को यह भरोसा हो गया है कि वह ख़ुद यह काम कर सकती है, तो उसने इसे सीधे अपने हाथ में ले लिया है. फागुनजी को साल में सिर्फ़ एक महीने के लिए बुलाती है मॉनिटरिंग और सुपरविज़न के लिए. बाक़ी पूरे देश में अपने कामकाज की समीक्षा करके वह मुंबई में जाकर डेरा डाल लेते हैं.
मुंबई में रहने वाले लोग बताते हैं कि वहां बारहों महीने फागुन जी की कृपा बनी रहती है और इसीलिए वे लोग मुंबई के मुरीद हैं. शायद इसीलिए बहुत लोगों को यह भ्रम हो गया है कि फागुन जी ओरिजिनली यहीं के हैं. वैसे ही जैसे पूरे भारत में कुछ लोगों को यह भ्रम है कि वे जो हैं कि वो आर्य हैं और सारे आर्य ओरिजिनली यहीं के हैं. पता नहीं फागुन जी को मराठी बोलनी आती भी है या नहीं! ग़नीमत है कि यह बात अभी मराठा अभिमानवादियों को पता नहीं चली कि फागुन जी ओरिजिनली मुंबईकर नहीं हैं. अगर कहीं पता चल जाए तो क्या होगा? शायद इसीलिए नए ज़माने की रीति-नीति से वाकिफ़ मेरे कवि मित्र ने फागुन के साथ पुरवाई का ज़िक्र बिलकुल नहीं किया है. चाहे भले फागुन बिना पासपोर्ट-वीज़ा के पाकिस्तान से आया हो, बंग्लादेश या चीन से आया हो, या फिर अफ्रीका, म्यांमार, इथियोपिया, इंडोनेशिया से आया हो; बस उसे उत्तर भारत से आया हुआ नहीं होना चाहिए. पुरवाई का ज़िक्र होते ही यह बात तय हो जाती है कि वह उत्तर भारत से आया है और ऐसी स्थिति में दिल्ली दरबार में उस पर प्रोफेशनल टैक्स लगाया जाता है मुंबई में जूते ईनाम मिलते हैं.

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समलैंगिकों और किन्नरों का सरकारी पदों पर आरक्षण

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 9, 2009

मैं सोच रहा हूं कि केन्द्र सरकार को एक पत्र लिखूं और कुछ सुझाव दूँ ताकि अरसों से अपनी गरिमा और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते आ रहे लोगों (समलैंगिकों तथा किन्नरों) के आन्दोलन में सहभागिता का गौरव अर्जित कर सकूँ। इससे देश की ढेर सारी सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं जैसे दहेज, भ्रष्टाचार, महंगाई आदि को कुछ ही सालों में जड़ से खत्म किया जा सकेगा। जबकि अब तक की लगभग सभी सरकारें इन्हें खत्म करने का दावा तो करती रही हैं किंतु इन्हें असाध्य रोग मान कर एड्स की तरह औपचारिक रूप से इलाज करती रही हैं और यह सोच कर कि जनता की गरीबी तो मिटा नहीं सकते, चलो अपनी ही मिटा लें। आज़ादी के बाद से सभी सरकारों और राजनेताओं ने, चाहे वे किसी भी दल के हों, इसी तरीके से जनसेवा की है और ऐसे ही करते जाने की आशा है।अरे आप को आश्चर्य हो रहा होगा कि समलैंगिकों तथा किन्नरों के आन्दोलन और गरीबी, भ्रष्टाचार तथा महँगाई का इंससे क्या सम्बन्ध है? मै कहता हूँ यही तो हमारे शोध का विषय है। यदि समलैंगिकों तथा किन्नरों को संसद, न्यायपालिका और पुलिस विभाग में शत प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाय तो न केवल भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी बल्कि सदियों से उपेक्षित इस अल्पसंख्यक समुदाय के सम्वैधानिक अधिकारों की रक्षा भी होगी। साथ ही ढेर सारी समस्याओं का एक ही साथ समाधान हो जाएगा। समलैंगिकों का कोई परिवार नहीं होता। बस वह और दूसरा साथी। परिवार तो उनके साथ रहने का साहस जुटा ही नहीं पाता, इसलिए उनसे रिश्ता ही तोड़ लेता है। बच्चे पैदा होने और उनके पालन पोषण ,शिक्षा-दीक्षा, शादी व्याह के खर्चों की दूर- दूर तक कोई सम्भावना नहीं रहती है। दूर दूर तक रिश्तेदारी में भी कोई अपने बच्चे को इनके साथ रहने की अनुमति देना खतरे से खाली नहीं समझता। इस महँगाई और आर्थिक मन्दी के दौर में ईमानदार आदमी किसी तरह से रोटी-दाल और बाल बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में जीवन भर तबाह रहता है और उसके आदर्शों तथा ईमानदारी को समाज के विकसित लोग मूर्खता का पर्याय समझ कर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। ऐसे में जब इन सरकारी विभागों में समलैंगिकों को आरक्षण दिया जाएगा तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा। क्योंकि उनके पास न तो असीमित परिवार होंगे और न उन पर खर्च। ऐसी स्थिति में सरकार की ओर से दिया जाने वाला वेतन बड़ी कठिनाई से खर्च हो सकेगा। जिसका परिणाम यह होगा कि पग–पग पर चौराहों पर तैनात ट्रैफिक पुलिस बस, मोटरसायकिल और ट्र्क वालों को रोक रोक कर उनसे वसूली करती नज़र नहीं आएगी। तब थानों पर तैनात पुलिस अपेक्षित धाराओं में अपेक्षित व्यक्ति के विरुद्ध अपराध को अंकित करने के लिए सौदेबाज़ी करती नज़र नहीं आएगी। न्यायालयों मे ऐसे दृश्य नहीं दिखेंगे जब कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश अपनी गर्दन नीचे कर अपनी अनभिज्ञता का दिखावा करने लगता है और पेशकार हर मुकदमे में तारीख की रिश्वत आधिकारिक रूप से लेता रहता है, जिनको कि अन्याय से लड़ने के लिए ही सरकारी पद पर आधिकारिक रूप से बिठाया गया है। तब राजनेता अपनी सात पुश्तों तक को सुखी बनाए रखने के लिए लोक कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन का घपला नहीं किया करेगा। सरकारी सेवकों और लोकसेवकों को जिनके परिवार के खर्च उनकी आय से ज्यादा हो जाया करते हैं और उन्हें असुरक्षा की भावना सताती है, परिणाम-स्वरूप उन्हें आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने का जुगाड़ करना पड़ता है और जन कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन में हेराफेरी करनी पड़ती है, उन्हें ऐसा करने को बाध्य नहीं होना पड़ेगा। तब हर महीने उन्हें कच्छप गति से चलती हुई वेतनवृद्धि और खरगोशी चाल से चलती महँगाई में तालमेल बिठाते हुए भ्रष्ट होने के लिए मज़बूर नहीं होना पड़ेगा।हर मर्ज़ का एक ही इलाज़- न रहेगा बाँस और न बाजेगी बाँसुरी। सारे सरकारी विभागों में शत-प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों का। ऐसा करने में कुछ साल लगेंगे जब सारे परिवारविहीन लोग होंगे सरकारी संस्थाओं में तब दूर-दूर तक भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं होगा। पुलिस, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका कानून के अनुसार चलने प्रारम्भ हो जाएंगे और पूरे देश में समरसता आ जाएगी, जिसे लाने का झाँसा अब तक समाजवादी और कम्युनिस्ट देते रहे हैं और तब वह सपना पूरा हो सकेगा जिसे आज़ादी के परवानों ने अपने खून से सींचा था।अभी कुछ साल पहले की बात है जब उत्तर प्रदेश में गोरखपुर की जनता ने एक शोध किया था। मेयर पद पर एक किन्नर को बिठा दिया गया था। तब यह अनुभव किया गया कि ऐसे लोग जिनका परिवार नहीं होता रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी के चक्रव्यूह में फँसे बिना समाज की सेवा करते हुए देश को विकास की दिशा में आगे ले जा सकते हैं। तभी से मैने यह सोंचना प्रारम्भ कर दिया कि अगर भारत से भ्रष्टाचार रूपी कोढ़ का उपचार करना है तो एक ही तरीका है, सभी सरकारी विभागों में शत प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों के लिए। वैसे तो यह कार्यक्रम लम्बा खिंच सकता है, लेकिन प्रयोग के तौर पर सरकारी विभागों के प्रमुखों और प्रभारी के पदों पर ऐसे अल्पसंख्यकों की नियुक्तियाँ कर शुरुआत तो की ही जा सकती है -विनय ओझा ‘स्नेहिल’

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साहित्य की चोरी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 22, 2009

[] राकेश ‘सोहम’
विगत दिनों मेरे साहित्य की चोरी हो गई । आप सोच रहे होंगे, साहित्य की चोरी क्यों ? साहित्यिक चोरी क्यों नहीं ? साहित्य और सहित्यकारों के बीच साहित्यिक चोरियां देखी और सुनी जातीं हैं । एक साहित्यकार दूसरे साहित्यकार की रचना चुराकर छपवा देते हैं । मंच के कवि दूसरे कवियों की रचनाएं पढ़कर वाह-वाही लूटते हैं । आजकल साहित्यिक मंचों पर सर फुटौवल, टांग – खिंचौवल और साहित्यिक चोरियां फैशन में हैं ।

मैं अपनी इस चोरी को साहित्यिक चोरी इसलिए नहीं कह सकता क्योंकि इसमें ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था । वैसे मेरे जैसे टटपूंजिया साहित्य सेवी की रचनाएं चुराकर कोई करेगा भी क्या ? यदि छोटे साहित्यकार की रचना चोरी हो जाए तो वह ऊँचा साहित्यकार हो जाता है । ये बात अलग है की छोटे साहित्यकार अपनी श्रेष्ठ रचनाएं बड़े साहित्यकारों के नाम से छपवाकर संतोष कर लेते हैं ।

जी हाँ, मैं कह रहा था की मेरे साहित्य की चोरी हो गई । मुझे अपनें कार्यालय से फायलों को ढोनें हेतु एक ब्रीफकेस मिला था । जिसका प्रयोग हम अपने साहित्य को घर से कार्यालय और कार्यालय से घर लाने-लेजानें में करते थे । हम जो भी रचनाएं लिखते उसे पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ भेज देते । जिसे सम्पादक सखेद फ़ौरन वापस भेज देते । हम दुखी होकर उन्हें इस ब्रीफकेस के हवाले कर देते । इस प्रकार हमारा ब्रीफकेस नई-पुरानी रचनाओं से भर गया था ।

एक दिन मैं बीफ्केस लेकर, ऑफिस से घर की ओर जा रहा था कि एक सूनी गली में एक लुटेरे ने छुरा दिखाकर मेरा ब्रीफकेस छीन लिया । उसका अनुमान रहा होगा कि इसमें नोट भरे हुए हैं । छीना – झपटी के दौरान मैंने उसे समझाने की कोशिश की कि इस ब्रीफकेस में मेरी ऐसी अमूल्य-निधि है जो तुम्हारे किसी काम की नहीं है । इसे देखकर तुम सर फोड़ लोगे । लेकिन वह न माना । मेरे ब्रीफकेस को हर्षद का बैग समझकर चंपत हो गया ।

वैसे मेरे लिए मेरा साहित्य अमूल्य – निधि ही है । इस बात को वह ग़लत समझ गया । मैं परेशान ओर निराश होकर पुलिस थाने पहुँचा । रिपोर्ट लिखनी थी । पुलिस थानों की अवांछित परेशानी जो आम नागरिकों को झेलनी पड़ती है, मुझे भी झेलनी पड़ी । तब कहीं जाकर रिपोर्ट दर्ज कर्ता हमारी ओर मुखातिब हुआ ।

“बोलिए, क्या हुआ ?”, पुलिस कर्मचारी ने कलम और रजिस्टर उठाते हुए पूछा ।

“मेरे साहित्य की चोरी हो गई “, मैंने निराश मन से कहा ।

“साहित्य की चोरी हो गई ?”, पुलिस कर्मचारी ने आश्चर्य से पूछा और आगे कहा, “..फ़िर हमारे पास क्यों आए हो, सम्पादक के पास जाओ ।”

“जी, मेरा मतलब वो नहीं है । “

“फ़िर क्या मतलब है ?” वह गंभीर हो गया ।

“जिस ब्रीफकेस में मेरा साहित्य रखा था वह आज गुंडों ने रात्रि घर लौटते समय छीन लिया । “, मैनें स्पष्ट किया

“मूर्ख था “, वह बुदबुदाया ।

” जी !!” मैं चौंका ।

“कुछ नहीं ………और क्या-क्या था उसमें ?”

“एक बिना ढक्कन का पेन, कुछ सफ़ेद कागज़ कुछ अस्वीकृत रचनाओं सहित नई रचनाएं

“क्या फालतू सामन बता रहे हो ! कोई कीमती सामन था उसमें ?”

“हाँ”

“क्या ?”

“मेरा अमूल्य साहित्य । ”

“पता नहीं कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं । ” कर्मचारी पुनः बुदबुदाया और फ़िर मेरी ओर देख कर पूछाक्या कीमत रही होगी ?”

“साहित्य की ?” मैनें उतावलेपन से स्पष्ट करना चाहा ।

“नहीं, ब्रीफकेस की । “

“जी मालूम नहीं वह तो ऑफिस से मिला था “, मेरे लिए ब्रीफकेस की कीमत कुछ भी नहीं थी ।

“फ़िर क्यों परेशान हो रहेहो ?” उसने सलाह भरे लहजे में कहा , ” खैर तुम्हारा ब्रीफकेस दिलाने की पूरी कोशिश करेंगे । वैसे ऐसी चीजें मिलती नहीं । आपकी रिपोर्ट हमनें दर्ज कर ली है । लिख कर दे देता हूँ । ऑफिस से दूसरा ब्रीफकेस मिल जाएगा ।”

“नहीं, मुझे ब्रीफकेस नहीं , अपना साहित्य चाहिए । ”

“वो कहाँ से मिलेगा ? कुछ नाम-वाम है ? कोई प्रमाण है कि वे रचनाएं आपकी हैं । ” शायद वह कर्मचारी रचना, साहित्य और रचनाधर्मिता से परिचित था ।

“बदमाश, आदमी हो कि पायजामा, शर्म नहीं आती, कमीनें, चोरी होनें का सुख ….”

“ये क्या बक रहे हो ? थाने मैं गाली-गलौंच की तो अन्दर कर दूँगा, समझे । ” वह आग बबूला हो गया ।

“माफ़ करिए , ये मेरी रचनाओं के शीर्षक हैं जो उस बेग में थीं । ”

“अच्छा-अच्छा ठीक है । आपकी रिपोर्ट दर्ज कर ली है, नमस्ते । ” उस कर्मचारी नें ज़ोर से दोनों हथेलियाँ आपस में टकराई और मुझे विदा हेतु नमस्कार किया ।

मैं परेशान वापस आ गया ।

कई दिनों इंतज़ार किया । थानें जाकर पूछताछ कर्ता रहा किंतु कुछ पता न चला ।

अचानक तीन-चार माह बाद ।

हमारी रचना एक प्रतिष्ठित पत्रिका में पढ़नें को मिली । नाम मेरा नहीं था । जानकारी लेनें पर ज्ञात हुआ , नाम उस थाने के उसी कर्मचारी का था जिसने रपट लिखी थी । किंतु मैं कुछ न कर सका क्योंकि हमारे पास चोरी गई रचनाओं के सम्बन्ध में कोई प्रमाण न था ।

हाय , साहित्य की चोरी ।

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पोंगा पंथ अप टु कन्याकुमारी -3

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 18, 2009

दिये में तेल डालने का शुल्क देकर हम आगे निकले ही थे कि एक दूसरे कार्यकर्ता ने हमें रोका । उसके पास रसीदों की गड्डी थी । उसकी आज्ञानुसार हमें प्रति व्यक्ति पांच रुपये का टिकट लेना था । सामने एक बोर्ड पर क्षेत्रीय भाषा में पता नहीं क्या – क्या लिखा था जिसे वह हमें बार- बार दिखा रहा था । उसमें हम जो पढ़ सकते थे वह था अंगरेजी में लिखा हुआ – एंट्री-५/-। हमें लगा कि शायद यह मंदिर का प्रवेश शुल्क होगा । जब हमने टिकट ले लिया तो उसने इशारा किया कि हमें ऊपर जाना है । हालांकि हमारी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी , फिर भी जाना ही पड़ा । हमने सोचा कि शायद कोई दर्शन होगा । बहरहाल , सीढ़ियाँ चढ़कर प्रथमतल पर गए तो वहां एक हाल सा था जिसमें कुछ चित्र लगे हुए थे। प्रकाश की कोई व्यवस्था नहीं थी, सीलन भरी पड़ी थी और एक तरफ चमगादड़ों का विशाल साम्राज्य था – कुछ उल्टे लटके थे तो कुछ हमारे जाने से विक्षोभित हो गए थे और अपना गुस्सा प्रकट कर रहे थे। अब इसके ऊपर जाना हमने उचित नहीं समझा और नीचे आ गए। इस दरवाजे को पार कर हम आगे निकले और दर्शन की पंक्ति में लग गए। यहां हमें मालूम हुआ कि जिस प्रथम माले से हम वापस आए थे, उसके ऊपर छः माले और हैं तथा सातवें माले से पूरा शहर दिखता है और वे पांच रुपये इसी के एवज मे लिए जाते हैं। वस्तुतः मंदिर का गोपुरम सात मंजिल का है और मंदिर प्रशासन ने अपने व्यवसाय प्रबंधन कुशलता का परिचय देते हुए नगरदर्शन की यह सुविधा उपलब्ध करवाई है।
खैर, नगरदर्शन से वंचित होने का हमें कोई क्षोभ नहीं हुआ।हम सभी पंक्तिबद्ध थे।शाम के साढ़े चार बजे होंगे। अचानक कुछ लोग समूह में आए और पंक्ति को उपेक्षित कर आगे बढ़ गए। मैंने सोचा था कि कम से कम ऐसी जगह पर तो लोग स्वानुशासन में रहेंगे परन्तु शायद यह भी अपने देश की विविधता में एकता है ! चाहे उत्तर हो या दक्षिण, नियम तोड़ने में हम बराबर के हिस्सेदार है। पांच बजे के करीब दर्शन शुरू हुए होंगे । अब लाइन का नाम करीब-करीब मिट गया था। ढंग की -धक्का मुक्की थी। अन्दर न तो पुलिस की कोई व्यवस्था थी और न स्वयंसेवकों का कोई अता-पता !गनीमत यह थी कि चोरी -जेबतराशी जैसी महामारी वहाँ नही के बराबर है। वैसे भी हमारे पर्स हमारे हाथों में ही थे। भीड़ में दम घुट सा रहा था। बस, केवल दर्शन करके हम बाहर निकलने के प्रयास में लग गए और किसी तरह जल्दी ही सफल भी हो गए। कोई पूजा या प्रसाद के चक्कर में हम थे भी नहीं! हां, मंदिर बड़ा ही भव्य है और उसके स्थापत्य और विशालता को जितना देख और समझ सकता था, उतना प्रयास करता रहा।
स्वामी पद्मनाभ का यह मंदिर भी दक्षिण भारतीय शैली के स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है। अत्यन्त विशाल यह मंदिर हिन्दू धर्म के वैभव का प्रतीक है और एक समृद्ध समाज का परिचायक है।दूर से ही इसका विशाल गोपुरम दर्शकों और श्रद्धालुओं को खींच लेता है।
समूचा मंदिर विशाल पत्थरों को तराश कर बनाया गया है।यह मंदिर पद्मनाभस्वामी क्षेत्रम् और अनन्तपुरी के नाम से विख्यात है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्वाभिमुख है और इसका गोपुरम सात मालों का है जिसकी उंचाई 100 फीट है। गोपुरम के सम्मुख एक विशाल सरोवर पद्मतीर्थम है जो मंदिर की सुंदरता में अभिवृद्धि करता है । यह बात अलग है कि इसकी साफ सफाई पर कोई ध्यान देने वाला मुझे नहीं लगा।
मन्दिर का गलियारा भी बहुत बड़ा है और 365 खंभो को बड़ी बारीकी से तराश कर लगाया गया है। गर्भगृह एक विशाल चबूतरे पर है जो एकमात्र पत्थर को काटकर बनाया गया है और इसे ओट्टकल मंडपम के नाम से जाना जाता है। इसके बारे में भी बहुत सी किंवदंतियां हैं। जैसा कि मंदिर के नाम से ही स्पष्ट है, मंदिर स्वामी पद्मनाभ को समर्पित है जो भगवान विष्णु का ही एक रूप है। विग्रह की मुख्य विशेषता यह है कि यह शयन मुद्रा में है। कहा जाता है कि यह विग्रह कुल 12008 शालिग्राम को जोड़कर बनाया गया है जो नेपाल स्थित गंडकी नदी से लाए गये थे। इसके अतिरिक्त यहां श्री नरसिंह, श्री हनुमान, श्री कृष्ण ,श्री अइयप्पा और श्री गरुण की मूर्तियां भी स्थापित हैं। वस्तुतः यह 108 देवदर्शन में एक प्रमुख स्थल है।
मंदिर की संपूर्णता का आनन्द तो बस देखकर ही लिया जा सकता है । अगर पूरी जानकारी प्राप्त कर लेख लिखा जाए तो कई पृष्ठों में जाएगा। हां, मैं आपका ध्यान दर्शन के समय पर जरूर दिलाना चाहूंगा, जरा इस विचित्रता को गौर फरमाएं । देव दर्शन की यह समयबद्धता कम से कम मुझे तो बिलकुल नहीं सुहाई। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि ईश्वर को हम अपने नियमों में न बांधे और उसे तो श्रद्धालुओं के लिए मुक्त कर दें!
यह रही स्वामी पद्मनाभ के दर्शन की समय सारणी-
पूर्वाह्न -3:30 – 4:45
6:30 -7:00
8:30 -10:00
10:30-11:00
11:45-12:00
अपराह्न
5:00-6:15
6:45-7:20

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पोंगापंथ अप टु कन्याकुमारी -2

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 11, 2009

मैंने अपनी यह यात्रा हज़रत निज़ामुद्दीन से चलने वाली हज़रत निज़ामुद्दीन – त्रिवेन्द्रम राजधानी एक्सप्रेस (ट्रेन नं.2432) से शुरू की थी. इस गाडी को त्रिवेन्द्रम पहुंचने में पूरे सैंतालीस घंटे लगते हैं और यह कोंकण रेलवे के रोमांचक और मनमोहक प्राकृतिक दृष्यों से होकर गुजरती है. केरल प्राकृतिक रूप से बहुत ही समृद्ध है और केरल में प्रवेश करते ही मन आनन्दित हो गया. यात्रा लंबी अवश्य थी किंतु अच्छी थी –अनदेखी जगहें देखने की उत्कंठा थी अतः महसूस नहीं हुआ. मेरे साथ मेरे एक मित्र का परिवार था. पति- पत्नी और दो बच्चे उनके भी. बच्चे समवयस्क ,उन्होंने अपना ग्रुप बना लिया.
त्रिवेन्द्रम अर्थात तिरुअनंतपुरम केरल की राजधानी है. यहां कुछ स्थान बहुत ही रमणीय और दर्शनीय है. मैंने जो जानकारी इकट्ठा की थी, उसके अनुसार त्रिवेन्द्रम में दो जगहें हमें प्राथमिकता के तौर पर देखनी थीं.प्रथम वरीयता पर था स्वामी पद्मनाथ मंदिर और दूसरे पर कोवलम बीच. अधिकांश मन्दिरों के साथ दिक्कत उनकी समयबद्धता से है . दक्षिण भारत के मंदिर एक निश्चित समय पर और निश्चित समयावधि के लिए खुलते हैं. गोया सरकारी दफ्तर हों और भगवान के भी पब्लिक मीटिंग आवर्स हों . भगवान पद्मनाथ का यह विख्यात मंदिर भी मध्याह्न 12 बजे बंद हो जाता है. इसके बाद सायं चार बजे प्रवेश प्रारम्भ होता है और दर्शन पांच बजे से हो सकता है . हम त्रिवेन्द्रम सवा नौ बजे पहुंच गए थे और रेलवे के विशेष प्रतीक्षालय (यहां एक एसी प्रतीक्षालय है जिसमें प्रति यात्री प्रति घंटा दस रुपये शुल्क लिया जाता है) में नहा-धोकर ,तरोताज़ा होकर 11 बजे तक तैयार हो गए थे. वहां घूमने –देखने लायक इतना कुछ नही है ,इस लिए हमारी योजना उसी रात मदुरै निकल जाने की थी. सामान हमने क्लॉक रूम में जमा करा दिया था. मंदिर के विषय में मालूम था ,इस लिये पहले हम कोवलम बीच घूमने चले गए.
कोवलम बीच रेलवे स्टेशन से लगभग 13 किमी की दूरी पर है . हमने स्टेशन से ही प्रीपेड आटो ले लिया था. मजे की बात है कि वहां प्रीपेड के नाम पर केवल पर्ची कटती है,भुगतान गंतव्य पर पहुंचने के बाद ड्राइवर कोइ ही करना होता है. भुगतान की रकम पर्ची पर लिखी होती है और पर्ची का शुल्क एक रूपया मात्र होता है.
कोवलम बीच वास्तव में एक सुन्दर अनुभव है. अरब सागर की उत्ताल तरंगें नारियल के झुरमुट से सुशोभित तट की ओर भागती चली आती हैं , बस सबकुच भूल कर उसकी विशालताऔर अनंतता को देखते रहने को जी चाहता है.
बहरहाल , लगभग चार बजे हम स्वामी पद्मनाथ मंदिर पहुंच गए. मंदिर निःसन्देह बहुत विशाल और भव्य है. इसका गोपुरम दूर से ही मन को मोह लेता है. हम द्वार की तरफ बढे ही थे कि हमें सामान क्लॉक रूम में जमा कराने का इशारा मिला (भाषाई समस्या वहां प्रायः झेलनी पडती है ) और हम समीप स्थित क्लॉक रूम तक पहुंच गए. जैसा कि मैने पहले ही बताया कि मंदिर के लिए ड्रेसकोड निर्धारित है ,उसका पालन करना ही था. हालांकि हम स्थिति ठीक से समझ नही पाये थे. क्लॉक रूम के बाहर सामान जमा की दर भी लिखी हुई है.चलिए , अब आप सारे कपडे उतार दीजिए,बस एक मात्र अंतः वस्त्र को छोडकर. मोबाइल वगैरह तो जमा होता ही है .अब आपको वे एकलुंगी नुमा धोती दे देंगे, उसे लपेट लीजिए, अगर लपेटने में कठिनाई है तो वे मदद भी कर देंगे ! हाँ, इस धोती का किराया है रु.15/- . धोती बाद में लौटा दीजिएगा, पर किराया अभी जमा करा दीजिए. महिला के लिए शुद्ध भारतीय वेश-भूषा अर्थात साडी ही अनुमन्य है.महिला ने साडी नहीं कुछ और पहना है तो 15/ मे लुंगी नुमा धोती उपलब्ध है.उसे बस ऊपर से लपेट लीजिए, अन्दर का सब कुछ चल जाएगा !यह व्यवस्था बच्चों पर भी लागू है . इस धार्मिक सुविधा केन्द्र पर सात धोती (बच्चों के लिए लगभग हाफ लुंगी/धोती ) लेने और पैंट-कमीज़ मोबाइल देने के रुपये 208/ लगे. हाँ, हमारे पर्स नहीं जमा हुए, उन्हें हम ले जा रहे थे अन्दर. हर श्रद्धालु के हाथ में अब केवल पर्स था ,जैसे वह पर्स न हो, पूजा का फूल हो ! यह भी एक दृश्य था ,जिसे शायद महसूस कर रहा था.
अन्दर प्रवेश करते ही एक ‘सेवक ‘ दौडा. बडी लगन से उसने छोटे –छोटे चार दिये तेल के (क्योंकि चार सदस्य क परिवार था) पकडाए. यहां का कोई नियम मानकर हमने दिये ले लिए, बगल के एक बडे जलते दिये में उसे उडेला और उसके भी बीस रुपए हो गये . यह बात बाद में समझ पाया कि यह सब केवल दूर से आने वाले दर्शनार्थियों के लिए है, स्थानीय तो सब जानते है .ऐसी एक दो घट्नाएं और हुई6 जिनका जिक्र अच्छा नहीं होगा. मंदिर के अन्दर हम पंक्तिबद्ध थे. लोग हाथों में पर्स पकडे चले आ रहे थे. पता नहीं किसका कितना ध्यान स्वामी पद्मनाथ पर था , कितना पर्स की संभाल पर!
आगे जारी……..

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‘सच का सामना’ का सच

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 14, 2009

कुछ दिनों से टेलीविजन पर एक धारावाहिक दिखाया जा रहा है, जिसका नाम है ‘सच का सामना’। जिस प्रकार भारतीय संविधान में राजनेताओं के योग्यता की कोई लक्षमण रेखा नहीं निर्धारित की गई है उसी प्रकार टी.वी. चैनलों पर दिखाए जाने वाले धारावाहिकों के स्तर की कोई सीमा नहीं होती, वे किसी भी स्तर के हो सकते हैं, उसी स्तर का यह भी धारावाहिक है। किंतु जैसा कि बाजार में बिकाऊँ होने की शर्त विवादित होना है, न कि उच्च स्तरीय होना, उसी तरह यह भी धारावाहिक विवाद का केन्द्रविन्दु बनाया गया, जिसकी गूँज संसद तक पहुँची और जिसको सभी टी.वी. चैनलों ने तेज़ी से लपका।संसद में बहस छिड़ गई कि इस पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।क्यों कि सच का सामना करने से सबसे ज्यादा अगर कोई घबराता है तो राजनेता । जिस दिन सरकार बदलती है उसी दिन विपक्ष को एक साथ ढेरों सच का सामना करने की आशंका सताती है। सत्ता पक्ष के पिटारे से कई ऐसे जाँच के विषय निकलते हैं, जिससे न केवल सत्ता का संतुलन बनाने में सहायता मिलती है बल्कि वे समर्थन जुटाने के भी काम आते हैं । यह आशंका जताई गई कि यदि किसी दिन राजीव खंडेलवाल ने मंत्री या सत्ता पक्ष के राजनेता को सच का सामना करने के लिए तलब कर लिया तो हाथ पाँव फूल जाएंगे । प्रश्न कुछ इस तरह के हो सकते हैं, जैसे कि – स्विस बैंक में किसका पैसा जमा है, और किन लोगों का खाता है?वे किस उद्योग से सम्बन्ध रखते हैं या किसी समर्पित जनसेवी के हैं ? उनके नाम आपको पता हैं किंतु आप बताना नहीं चाह्ते हैं आदि आदि— उसके बाद पोलीग्राफ टेस्ट के लिए झूठ पकड़ने वाली मशीन के पास लाया जाएगा और मशीन बताएगी कि नेता जी सच बोल रहे हैं या झूठ। किंतु जैसा कि कैबिनेट में एक वकील साहब हैं, जो ऐसे अवसरों पर सलाहकार की भूमिका निभाते हैं या यूँ कहें कि हर सरकार में ऐसे लोगों की आवश्यकता का अनुभव की जा रही है जो सम्विधान की अपने सुविधानुसार व्याख्या कर सकें, उनका दिमाग बहुत तेज़ी से काम करता है। उन्होंने कहा कि डरने की कोई बात नहीं है, स्थिति नियंत्रण में है। टी.वी. चैनलों के पास न्यायालय की शक्ति थोड़े ही है, जो गिरफ्तारी वारंट निकालेंगे और आरोप का सामना करने जाना पड़ेगा। वैसे भी राजनेता के गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावज़ूद उसे न्यायालय में आरोप का सामना करने के लिए प्रस्तुत करना कठिन कार्य होता है तो राजीव खंडेलवाल किस खेत की मूली हैं। वैसे तो हमारे निजी सूत्रो ने इस कार्यक्रम के बारे में कुछ शर्तें तय कर रखी हैं । जैसे कि इस कार्यक्रम में किसी सत्ता पक्ष के राज नेता को सच का सामना करने के लिए नहीं बुलाया जाएगा । यदि गलती से उसे टी वी चैनल पर बुला ही लिया गया है तो उसे एकांत में समझा दिया जायेगा कि सच का सामना न करना दोनों के हित में है। यदि इस पर भी वह नहीं समझता है और लोकतंत्र का सजग प्रहरी होने का दम्भ रखता है, तो उसे कार्यक्रम दिखाने के पहले एक स्पष्टीकरण या माफीनामा दिखाना होगा कि इस घटना का दूर-दूर तक सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्टीकरण देना होगा कि झूठ पकड़ने वाली मशीन नेताओं पर काम नही करती है, इस लिए यह निर्णायक नहीं है। जो नेता कहेगा वही सच माना जाएगा न कि मशीन। क्योंकि मशीन में गड़बड़ी की सम्भावना भी हो सकती है, यह और बात है कि डी.डी.ए. के फ्लैटों के आबंटन के समय कम्प्यूटरीकृत लॉटरी और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें निष्पक्षता पूर्वक सन्देह से परे कार्य करती हैं ।
अगली शर्त यह है कि इस कार्यक्रम में सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों को नहीं पूँछा जा सकता,क्योंकि जबसे हमें स्वतंत्रता मिली है तब से यह भी स्वतंत्रता मिली है कि किसी राजनेता से सार्वजनिक महत्व के प्रश्न का उत्तर देना या न देना उसके निर्भर है । क्योंकि इससे उसके चरित्र पर आक्षेप आ सकता है और मानहानि का भी मुकद्मा दायर कर सकता है क्यों कि वह न्याय का आर्थिक भार उठाने मे भी सक्षम है। किंतु अन्य लोगों से चरित्र पर आक्षेप लगाने वाले प्रश्न भी पूंछे जा सकते हैं। जैसे राजीव खंडेलवाल किसी राजनेता से यह प्रश्न नहीं पूँछ सकते कि आप ने अब तक कोई घपला किया है या नहीं ?सच बोल रहे हैं कि झूठ इसका निर्णय पोलीग्राफ टेस्ट करेगा । जैसे कि यह पूँछा जा सकता है कि “शादी से पहले आप ने किसी स्त्री या पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं या नहीं?” “शादी के बाद किसी स्त्री या पुरुष से शारीरिक सम्पर्क बनाया है या नहीं?” “यदि बनाया भी है तो उंगली पर गिना जा सकता है या नहीं?” यदि हाँ बोलेंगे तो पूरा परिवार सुन और देख रहा है, प्रतिष्ठा और पत्नी दोनों खोने की आशंका है और वह सच बोल रहा है या झूठ इसका निर्णय झूठ पकड़ने वाली मशीन करेगी, जिसे अंतिम माना जाएगा। जैसे “‘गे राइट्स’ के बारे में आप का क्या ख्याल है?” “क्या आप ने पुरुष होते हुए किसी पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं?” “इस आर्थिक मन्दी के दौर में जबकि हर व्यक्ति महंगाई से त्राहि त्राहि कर रहा है,सोंच कर बताइए यदि आपके विवाह के पूर्व धारा 377 समाप्त कर दी जाती, तो क्या आप स्त्री से विवाह करके बाल बच्चों के फिजूल के खर्चीली झंझट के चक्रव्यूह में फँसना पसन्द करते या किसी ‘गे’ से विवाह कर सभी खर्चों पर पूर्ण विराम लगा देते?” इस प्रश्न पर आपको दो लाइफलाइन दी जाएगी, जिससे आप अपने शुभ चिंतकों से विचार-विमर्श कर सकते हैं। किंतु घोर परम्परावादी माता पिता से फोन पर विचार मत माँगिएगा वर्ना आपकी शारीरिक सुरक्षा और पैतृक सम्पत्ति को खतरा भी उत्पन्न हो सकता है ।
राजीव खंडेलवाल को समझा दिया गया है कि प्रश्न किस स्तर के होने चाहिए। उनसे यह भी कह दिया गया है यदि समझ न आये तो उदाहरण के रूप में सलमान खान के धारावाहिक ‘दस का दम’ से कुछ प्रश्न लिए जा सकते हैं, जैसे कि-“कितने प्रतिशत भारतीयों को घर वाली से बाहर वाली ज्यादा आकर्षित करती है?” “कितने प्रतिशत भारतीय विवाहित होने के बावज़ूद घर के बाहर अपनी प्यास बुझाते हैं?” “कितने प्रतिशत भारतीय ऑफिस जाने से पहले अपनी पत्नी को पार्टिंग किस देते हैं?” “कितने प्रतिशत भारतीय अपने पत्नी की पसंद का धारावाहिक देखते हैं?” आदि आदि…………….

-विनय कुमार ओझा ‘स्नेहिल’

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सस्ते से सस्ती दिल्ली

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 27, 2009

लीजिए जनाब! ख़ुश हो जाइए. क्या कहा? क्यों ख़ुश हों? अरे भाई ख़ुश होने के लिए भी आपको कोई कारण चाहिए? असली आदमी हमेशा ख़ुश होना चाहता है, बस इसलिए आप भी ख़ुश हो जाइए. और कोई ख़ास कारण चाहिए तो आपको बता दूं कि दिल्ली और मुंबई नाम के जो शहर इस धरती पर हैं, वे दुनिया के सबसे सस्ते शहर हैं. यह कोई भारत सरकार नहीं कह रही है, जिसकी हर बात को आप सिर्फ़ आंकड़ों की रस्साकशी मानते हैं. और न किसी भारतीय एजेंसी ने ही जिनके बारे में आप यह मानकर ही चलते हैं कि उसे सर्वे का ठेका ही मिल जाना बहुत है. एक बार उसे ठेका दें और बेहतर होगा कि सर्वे से आप जो निष्कर्ष चाहते हैं वह उसे पहले ही बता दें. फिर आप जिसे जैसा देखना या दिखाना चाहते हैं, उसे वैसा ही देखने और दिखाने का पूरा इंतज़ाम सर्वे एजेंसियां कर देंगी. अब तो लोकतंत्र के मामले में भी वे इसे सच साबित कर देने में भी सक्षम हो गई हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं रह गई है.
लेकिन नहीं साह्ब यह बात उन भारतीय एजेंसियों ने भी नहीं कही है. यह कहा है एक अतयंत प्रतिष्ठित स्विस बैंक ने. और आप तो जानते ही हैं ईमानदारी के मामले में हमारे देश ही क्या, दुनिया भर के बड़े-बड़े लोग स्विस बैंकों की ही क़समें खाते हैं. अभी हाल ही में चुनाव के दौरान अपने आडवाणी जी खा रहे थे. उनके पहले 89 के चुनाव में आपने राजा साहब को खाते हुए देखा होगा. अरे वही राजा साहब जो दरसल फ़क़ीर थे और बोफोर्स घोटाले के सारे दस्तावेज़ प्रधानमंत्री बनने के पहले तक अपनी जेब में ही लेकर घूमा करते थे. ख़ैर छोड़िए भी, अब इन सब बातों से क्या फ़ायदा? अपने ही स्तर की बात करें तो भी यह तो हम-आप जानते ही हैं कि दुनिया भर की ग़रीब जनता की ख़ून-पसीने की कमाई स्विस बैंकों में ही रखी है. तो भला सोचिए, ईमानदारी का उनसे बड़ा जीवंत प्रतीक और क्या हो सकता है! ख़बर यह है कि स्विस बैंक ने दुनिया भर के 73 बड़े शहरों का सर्वे कराया है. इसी सर्वे के आधार पर उसने दुनिया के सबसे महंगे शहरों की सूची जारी की है. यह जो सूची जारी हुई है उसमें दिल्ली और मुंबई का नाम सबसे नीचे हैं. यूं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचार-अराजकता जैसे कुछ महत्वपूर्ण मामलों की बात छोड़ दी जाए तो समूचे भारत का ही नाम अकसर किसी भी सूची में सबसे नीचे ही होता है. तो जी हम तो इतने से ही संतुष्ट हैं. इससे ऊपर जाने का अपन का कोई इरादा ही नहीं है. ओस्लो, ज्यूरिख, कोपेनहेगन इस सूची में पहले, दूसरे, तीसरे नम्बर पर हैं तो रहा करें. मॉस्क़ो, मेक्सिको सिटी और सिओल भी उप्पर हैं तो बने न रहें, हमारा क्या जाता है. अब यह अलग बात है कि उस ख़बर में यह बात कहीं नहीं बताई गई है कि ये सर्वे किया किसने है. कराया तो है ईमानदारी की मिसाल माने जाने वाले स्विस बैंक ने, पर किया किसने ये बेचारे आम आदमी को पता ही नहीं चल पाया.
ख़ैर, जिसने भी किया हो, यह बाद की बात है. इससे एक बात तो हुई है कि जो लोग अभी तक महंगाई-महंगाई चिल्ला रहे थे बार-बार और अपनी बेचारी सरकार की इस बात पर भी यक़ीन नहीं कर रहे थे कि मुद्रास्फीति दर घटी है और महंगाई भी घट गई है, अब उनकी बोलती बंद हो गई है. जो लोग इसे सरकार की ओर से आंकड़ों की बाजीगरी मान रहे थे, वे सोच नहीं पा रहे हैं कि अब क्या तर्क़ दें. वैसे तर्क़ तो उनके पास पहले भी नहीं थे.
बहरहाल, अपन चूंकि दिल्ली में रहते हैं और ये देख रहे हैं कि पांच-छह साल जो मकान दो हज़ार रुपये महीने के किराये पर उपलब्ध था, वह अब 8 हज़ार में भी मिलने वाला नहीं है. ख़रीदने पर जो फ्लैट 5 लाख में आसानी से मिल जाता था, वह अब सीधे 20 लाख का हो चुका है. लेकिन जनाब यह भी तो देखिए, कि अब मकान आपको सफ़ेदी कराके मिलेगा. तो जब घर सफ़ेदी कराके ख़रीदेंगे तो उसका दाम तो बढ़ ही जाएगा न. आलू 5 से 30 रुपये किलो हो गया, आटा 8 से 20 रुपये किलो पर पहुंच गया… तो क्य हो गया? आप यह क्यों नहीं सोचते कि देश में सिर्फ़ आलू-आटा और मकान-कपड़ा ही तो सबसे महत्वपूर्ण नहीं है. कई चीज़ें इनसे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं. मसलन लैपटॉप, टीवी, मोबाइल..
आप कहेंगे इन चीज़ों की हमें बहुत ज़रूरत नहीं होती. जी कोई बात नहीं. रोज़गार की ज़रूरत तो आपको होती है. भारत में वह सबसे महंगी चीज़ों में शुमार है. यक़ीन न हो तो किसी पढ़े-लिखे नौजवान से पूछ कर देख लें. सरकारी दफ़्तर में चपरासी बनने के लिए भी दो लाख रुपये देने को तैयार हो जाएगा. ज़नाब दिल्ली में वह सबसे सस्ती चीज़ है. अगर आपको यक़ीन न हो बमुश्किल दो साल पहले हुई सीलिंग का दौर याद कर लीजिए. बहन-बेटियों की इज़्ज़त जिसके पीछे पूरा हिन्दुस्तान मरता है और राजस्थान में जौहर तथा सती प्रथा शुरू हो गई … दिल्ली में सबसे सस्ती है. ब्लू लाइन बसों की कीर्ति तो कीर्ति आज़ाद से भी ज़्यादा है और बहुत पहले से है. नई आई मेट्रो रेल ने भी साबित कर दिया कि यहां आम आदमी की जान भी सबसे सस्ती है. फिर भी आप नहीं मानते. अरे अब का चाहते हैं माई-बाप?

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