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Archive for the ‘संगोष्ठी’ Category

अज्ञेय को जनविरोधी कहना अधूरी समझ : नामवर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 23, 2010

हिन्दू कालेज में अज्ञेय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कालेज में अज्ञेय की जन्म शताब्दी के अवसर पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से ‘आज के प्रश्न और अज्ञेय’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस दो दिवसीय आयोजन में अनेक महविद्यालयों के अध्यापकों, शोधार्थियों और युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की. उदघाटन समारोह में सुविख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि शब्दों का वैभव अज्ञेय के पूरे कविता संसार में देखा जा सकता है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन

विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. उन्होंने कहा कि अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. प्रो. सिंह ने अज्ञेय की चर्चित कविताओं ‘नाच’ और ‘असाध्य वीणा’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय के काव्य के सभी कला रूपों का दर्शन ‘नाच’ में होता है.

अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है.कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं

 प्रथम सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने कहा कि हमारा समय मध्य वर्ग को गोदाम बनाने का युग है जहां दुनिया को विचार के बदले वस्तुओं से बदल देने पर जोर है. उन्होंने कहा कि इस सन्दर्भ में अज्ञेय का रचना कर्म महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे  विचार पर पूरा आग्रह करते हैं. वाजपेयी ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे खड़ी बोली के सबसे बड़े बौद्ध कवि हैं जो शान्ति और स्वाधीनता का संसार रचते हैं. उन्होंने कहा कि परम्परा से हमारे यहाँ साहित्य और कला चिंतन साझा रहा है लेकिन हिंदी आलोचना दुर्भाग्य से साहित्य तक सीमित रही है. इस सन्दर्भ में अज्ञेय के चिंतन को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया. वरिष्ट समालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सभ्यता ऐसे बिंदु पर पहुँच गई है जहां पूंजीवाद और प्रकृति में एक को चुनना पड़ेगा और तब हम देखेंगे कि अज्ञेय की कविता अंततः पूंजी के नहीं, प्रकृति और मनुष्यता के पक्ष में जाती है.प्रो. तिवारी ने कहा कि अज्ञेय में दार्शनिक विकलता का चरम रूप असाध्य वीणा में है,जो ध्यानात्मक होती चली गई है.अज्ञेय की कुछ बहुत छोटी-छोटी कविताओं की चर्चा करते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि बड़े संकट में छोटी चीज़ें भी अर्थवान हो जाती हैं, ये इसका उदाहरण है. इससे पहले हिन्दू कालेज के प्राचार्य प्रो. विनय कुमार श्रीवास्तव ने स्वागत किया और संयोजक डॉ. विजया सती ने संगोष्ठी की रूपरेखा रखी. सत्र का संयोजन कर रहीं डॉ. रचना सिंह ने वक्ताओं का परिचय दिया. दूसरे सत्र में विख्यात कवि और अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरे सप्तक के रचनाकार प्रो. केदारनाथ सिंह ने कहा कि मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है. उन्होंने कहा कि अज्ञेय की कविता पाठक और अपने बीच एक ओट खडा करती है और यह उनकी कविता की ख़ास तिर्यक पद्धति है. ‘भग्नदूत’ और ‘इत्यअलम’ जैसे उनके प्रारंभिक संकलनों को पुनर्पाठ के लिए जरूरी बताते हुए केदारजी ने कहा कि बड़ी कविता में वे रेहटरिक हो जाते थे वहीं छोटी कविताओं में उनकी पूरी रचनात्मक शक्ति और सामर्थ्य दिखाई पड़ती है.
मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है.
वैविध्य की दृष्टि से अज्ञेय को उन्होंने हिंदी के थोड़े से कवियों में बताया. केदारनाथ जी ने कहा कि अज्ञेय कविता के बहुत बड़े अनुवादक भी हैं. ‘आधुनिक भावबोध और अज्ञेय की कविता’ विषयक इस सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और सुपरिचित आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह ने शीतयुद्ध के दौर में हिन्दी आलोचना के सन्दर्भ में अज्ञेय के कृतित्व पर विचार करते हुए कहा कि भारतीय कविता श्रव्य परम्परा की रही है जिसे आधुनिक बनाने की कोशिश अज्ञेय ने की. प्रो.
सिंह ने कहा कि इसी दौर में लघुमानव और महामानव की बहस में साहित्य को लघु मानव अर्थात सामान्य मनुष्य की ओर मोड़ने के लिए भी अज्ञेय को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिनका मनुष्य की गरिमा में गहरा विश्वास है. उन्होंने कहा कि जिस यथार्थवाद की कसौटी पर अज्ञेय को खारिज किया जाता है वह ढीली ढाली है अतः कविता के इतिहास पर दुबारा बात की जानी चाहिए. जवाहरलाल
नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के प्रो. गोबिंद प्रसाद ने कहा कि अज्ञेय बेहद आत्मसज़गता के कवि थे, जो ताउम्र अपनी छाया को ही लांघते रहे, अपने से लड़ते रहे. उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने आधुनिकता को एक निरंतर संस्कारवान होने की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा है, जहां स्व और आत्म पर बेहद आग्रह है. प्रो. प्रसाद ने कहा कि इसका एक सिरा जहां अस्मिता और इयत्ता से जुड़ता है वहीं दूसरा आत्मदान और दाता भाव से भी. कवि और कविता की रचना प्रक्रिया पर जितनी कवितायें अज्ञेय ने लिखी हैं उतनी और किसी हिन्दी कवि ने नहीं. इस सत्र का संयोजन विभाग के अध्यापक डॉ. पल्लव ने किया.

दूसरे दिन सुबह पहले सत्र में पटना विश्वविद्यालय में आचार्य रहे आलोचक प्रो. गोपाल राय ‘शेखर एक जीवनी’ पर अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि बालक के विद्रोही बनने की प्रक्रिया में अज्ञेय ने गहरी अंतरदृष्टि और मनोवैज्ञानिकता का परिचय दिया है, वहीं प्रेम के प्रसंग में भी उनका

वर्णन और भाषाई कौशल अद्भुत है. उन्होंने विद्रोह, क्रान्ति और आतंक में भेद बताते हुए कहा की यदि इस उपन्यास का तीसरा भाग आ पता तो शेखर के विद्रोह का सही चित्र देखना संभव होता, उपलब्ध सामग्री में विद्रोह कर्मशीलता में परिणत नहीं हो पाया है. कथाकार और जामिया मिलिया के हिंदी आचार्य प्रो. अब्दुल बिस्मिलाह ने अज्ञेय की कहानियों पर अपने व्याख्यान में श्रोताओं का ध्यान कई नए बिन्दुओं की ओर आकृष्ट किया. उन्होंने आदम-हव्वा की प्राचीन कथा का सन्दर्भ देते हुए कहा कि सांप मनुष्य को विद्रोह के लिए उकसाने वाला जीव है और अज्ञेय की कहानियों में सांप की बार बार उपस्थिति अकारण नहीं है. प्रो. बिस्मिल्लाह ने कहा कि विभाजन और साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में लिखी गई अज्ञेय की कहानियां अब और अधिक महत्वपूर्ण और प्रसंगवान हो गई हैं. उन्होंने कहा कि अज्ञेय के साहित्य में विद्रोह वही नहीं है जो दिखाई दे रहा है अपितु भीतर भीतर पल रहा विद्रोह कम नहीं है. आलोचक और हिन्दू कालेज में सह आचार्य डॉ.
रामेश्वर राय ने कहा कि अज्ञेय के लिए व्यक्ति मनुष्य की सत्ता उसकी विचार क्षमता पर निर्भर करती है और उनके लिए विचार होने की पहली शर्त अकेले होने का सहस है.डॉ. राय ने इश्वर,विवाह और नैतिकता के सम्बन्ध में अज्ञेय के चिंतन पर चर्चा करते हुए कहा कि उनके यहाँ विद्रोह जंगल हो जाने की आकांक्षा है जिसके नियम इतने सर्जनात्मक हैं कि व्यक्ति के विकास में कोई दमन न हो. समापन समारोह में वरिष्ट आलोचक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि अज्ञेय को कविता में किसी भी वस्तु या विषय के ब्रांडधर्मी उपयोग पर
आपत्ति थी और उनके लिए कविता तथा जीवन का यथार्थ एक ही नहीं था.
उन्होंने कहा कि व्यक्ति की अद्वितीयता में अज्ञेय की आस्था अडिग है और वे इतनी दूर तक ही ‘मैं’ को समाज के लिए अर्पित करने को प्रस्तुत हैं कि उनका अस्तित्व बना रहे. प्रो. जैन ने अज्ञेय की चर्चित कविता ‘नदी के द्वीप’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय अपने चिंतन को कविता के रूप में 
बयान करते हैं.उन्होंने शताब्दी वर्ष में केवल रचनाकार के गुणगान तक सीमित रह जाने के खतरे से आगाह करते हुए कहा कि क्लिशे में जाने कि बजाय पलट पलट कर देखना होगा कि दूसरी आवाजें तो नहीं आ रहीं हैं. समापन सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी प्रयाग शुक्ल ने कहा कि अज्ञेय सोचते हुए लेखक कवि हैंजो आधुनिक बोध को लाये. उन्होंने कहा कि हिन्दी को अज्ञेय की जरूरत थी. शुक्ल ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे भाषा के सावधान प्रयोग के लिए याद किये जायेंगे. उन्होंने अज्ञेय से जुड़े अपने कई संस्मरण भी सुनाये. वरिष्ट कथाकार राजी सेठ ने इस सत्र में अज्ञेय के चिंतन पक्ष पर विस्तार से विचार करते हुए कहा कि
उनका चिंतन कर्म और काव्य कर्म वस्तुतः अलग नहीं है .लेकिन यहाँ समस्या होती है कि क्या अज्ञेय की कविता उनके चिंतन की अनुचर है?
आयोजन स्थल पर अज्ञेय साहित्य और अज्ञेय काव्य के पोस्टर की प्रदर्शनी को भरपूर सराहना मिली. आयोजन में अंग्रेजी समालोचक प्रो. हरीश त्रिवेदी, कवि अजित कुमार,युवा आलोचक वैभव सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रोताओं ने भाग लिया.
यह जानकारी डॉ. पल्लव ने एक मेल के ज़रिये दी.
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बाज़ार की बाढ़ में फंस गया मीडिया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 11, 2009

हमारा समाज आज बाज़ार और मीडिया के बीच उलझता जा रहा है. बाज़ार भोगवाद और मुनाफे के सिद्धांतों पर समाज को चलाना चाहता है, जबकि मीडिया सरकार की आड़ से अब बाजार की बाढ़ में फंस गया है. यह बात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के वैश्विक अध्ययन केन्द्र के संयोजक प्रो. आनन्द कुमार ने शहीद भगत सिंह कॉलेज में आयोजित एक संगोष्ठी में कही.
बाजार, मीडिया और भारतीय समाजविषयक इस संगोष्ठी में उन्होंने समाज के सजग लोगों से मीडिया और बाजार दोनों की सीमाओं को नये संदर्भ में समझने का आह्वान करते हुए कहा कि अगर ऐसा न हुआ तो लोकतंत्र के वावजूद मीडिया हमारे समाज में विदुर की जैसी नीतिसम्मत भूमिका छोड़कर मंथरा जैसी स्वार्थप्रेरित भूमिका में उलझती जाएगी. मीडिया का बाजारवादी हो जाना भारत के लोकतंत्र को मजबूत नहीं करेगा.
बीते 4 नवंबर को हुई इस संगोष्ठी में शहीद भगत सिंह कॉलेज के प्राचार्य डॉ. पी.के. खुराना ने स्पष्ट किया कि अर्थव्यवस्था में बदलाव के कारण कैसे बाज़ार मजबूत हुआ है और मानवीय मूल्य निरंतर टूटते जा रहे हैं.
भारतीय जनसंचार संस्थान में हिंदी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम निदेशक डॉ. आनन्द प्रधान ने कहा कि समाचार माध्यमों में देशी-विदेशी बड़ी पूंजी के बढ़ते दबदबे के कारण समाचारों के चयन, संग्रह और प्रस्तुति पर बाजार का दबाव बढ़ा है और प्राथमिकताएं बदल गई हैं. समाचारों के डबिंग डाउनके कारण उनमें देश और आम लोगों के दुख-दर्द के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है. समाचार माध्यमों पर अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के बढ़ते दबाव के बीच समाचार और विज्ञापन के बीच की दीवार ढह चुकी है और समाचारों की बिक्री और पैकेजिंगकी अलोकतांत्रिक प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है. उन्होंने समाचार माध्यमों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मीडिया साक्षरता का अभियान शुरू करने पर जोर देते हुए कहा कि मीडिया में संकेंद्रण और एकाधिकारवादी प्रवृत्तियां लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक संकेत हैं.
अध्यक्षीय वक्तव्य में आलोचक प्रो. तिवारी ने कहा कि बाज़ार, मीडिया और टेक्नोलॉजी उत्तर आधुनिक चिंतन के प्रमुख स्रोत हैं. इसमें समाज, इतिहास और विज्ञान का बहिष्करण किया जा चुका है. ये पद आधुनिक चिंतन के थे और इनके सरोकार ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समाज और मनुष्य से सम्बन्धित थे यानी इस चिंतन में सामाजिक और मानवीय सरोकारों का कोई विशेष अर्थ नहीं है. दूसरी बात कि इन स्रोतों (बाजार, मीडिया, टेक्नोलॉजी)ने ज्ञान को जो सबसे महत्वपूर्ण शास्त्र बनाया, वह प्रबंधन का है. ज्ञान के सामाजिक और दार्शनिक संघटकों को आर्थिक उदारवादी भूमण्डलीकरण ने बहिष्कृत कर दिया है. इस ज्ञान प्रक्रिया ने सबसे बड़ा पाठ विज्ञापन का पैदा किया है. विज्ञापन, विज्ञापित वस्तु की असलियत की जिम्मेदारी नहीं लेता. मानवीय इतिहास में पहली बार किसी पाठ का इतना शक्तिशाली रूप सामने आया है जो बिना ज़िम्मेदारी के इतना प्रभावी और इतना मुनाफ़ा देने वाला है. इस उदारीकृत भूमण्डलीकरण के ज्ञान ने मनुष्य को भूमिकाविहीन बनाकर केवल उपभोक्ता जीव में बदल दिया है. इस बुद्धि और ज्ञान शास्त्र का प्रतिरोध ही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें मानवीय संभावना बच सकती है. सभा का संचालन डॉ. विन्ध्याचल मिश्र ने किया. डॉ. मिश्र ने भी मीडिया पर बाज़ार के बढ़ते प्रभाव एवं उसके सामाजिक आयामों पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े किए.

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