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शास्त्री जी और उनका ‘आवश्यक’ आनंद

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 10, 2007

पिछले दिनों भाई मसिजीवी ने अपने चिट्ठे पर एक पोस्ट किया था. शास्त्री जे सी फिलिप के चिट्ठे सारथी के बारे में उन्होने कुछ अंदेशे जताए थे. जाने क्यों उन्हें लगा कि यह मामला कुछ अतिमानवीय टाईप का हो रहा है। उसमें उन्होने शास्त्री जी के बारे में संक्षेप में पर्याप्त जानकारी दीं है और साथ ही यह सवाल भी उठाया है-
100000 से ज्‍यादा वितरित प्रतियों वाली ईपुस्‍तक के लेखक शास्‍त्रीजी पुरातत्‍व पर डाक्‍टरल शोध करते हुए हर चिटृठा पढ़ लेते हैं- इतने ट्रेफिक को मैनेज कर लेते हैं- हरेक को उत्‍तर दे देते हैं- इतने सारे टूलोंकी समीक्षा कर पाते हैं- अमरीकी विश्‍वविद्यालय के मानद कुलपति के दायित्‍व निवाह ले जाते हैं- अपने अराध्‍य के प्रति उपासना दायित्‍व पूरे कर लेते हैं- अन्‍य अनुशासनो के प्रति अपने अकादमिक दायित्‍व भी पूरे कर लेते हैं….कुछ कुछ दैवीय हो रहा है बंधु। हमारा शक है कि सारथी कोई निजी चिटृठा नहीं है।

शास्त्री जी से इसके पहले तक मेरा परिचय बस चिट्ठेबाजी तक सीमित था. चिट्ठेबाजी के दौरान शुरुआत में मुझे मुश्किलें बहुत झेलनी पडती थीं. शास्त्री जी के सारथी पर चूंकि मैंने कई बार तकनीकी लेख भी देखे हैं, लिहाजा मैंने अपनी एक समस्या के समाधान के लिए उन्हें ई चिट्ठी भी लिखी थी. शास्त्री जी ने उसका जवाब तुरंत दिया था और बाद में दूसरे संदर्भों में भी हमारी चिट्ठी-पत्री होती रही. आमने-सामने की मेल-मुलाक़ात न होने के बावजूद शास्त्री जी के प्रति मेरे मन में गहन सम्मान है. इसके तीन कारण हैं. पहला यह कि वह मुझसे वयःवरिष्ठ हैं, दूसरे विद्धान हैं और तीसरा यह कि आध्यात्मिक हैं. ऐसे व्यक्ति के लिए सीमाओं-दुराग्रहों का कोई अर्थ नहीं होता है. यह जानकारी मुझे मसिजीवी के लेख से हुई कि शास्त्री जी वस्तुतः वैज्ञानिक हैं और वह किसी यूनिवर्सिटी के मानद कुलपति भी हैं. यह भी कि पुरातत्व में रूचि रखते हैं और कई विषयों में जाने क्या-क्या कर रहे हैं. जहाँ तक शास्त्री जी की सक्रियता का सवाल है वह मेरे लिए सम्मान्य है, अविश्वसनीय नहीं. इतना सारा कार्य तो किया जा सकता है और बहुत लोग कर रहे हैं. इसके लिए केवल श्रम, संसाधन और समय के सही प्रबंधन की जरूरत होती है. यह समझ जिसकी जितनी विकसित है, वह दुनिया को उतना ज्यादा हैरान किए हुए है . हाँ कर्म सामूहिक हो सकता है, लेकिन इसके कारण वह व्यक्ति के सोच या प्रभाव से अलग नहीं हो जाता और इसका यह मतलब भी नहीं होता कि वह किसी दूसरे के श्रम या बुद्धि का शोषण कर रहे हैं. मैं नहीं समझता कि अगर किसी दूसरे व्यक्ति का लिखा हुआ लेख या कोई अन्य कार्य शास्त्री जी सारथी पर लें तो उन्हें उसकी क्रेडिटलाइन देने में कोई कष्ट होगा. उन्होने खुद मुझे एक पत्र हिंदी कविताओं पर लिखने के लिए लिखा और इस ताकीद के साथ कि वह सारथी पर आपके नाम से जाएगा. इससे ज्यादा हिंदी ब्लोगिन्ग की दुनिया में और अभी उपलब्ध ही क्या है?
पुनश्च, मुझे यह तो कभी लगा ही नहीं कि ज्ञान की दुनिया में कभी किसी का व्यक्तिगत कुछ हो सकता है. व्यक्तिगत कोई धारणा सिर्फ तब तक है जब तक कि वह विचार के स्तर पर आपके मन में है. लेकिन जैसे ही वह कागज़ पर उतरा या वाणी को उपलब्ध हुआ, सार्वजनिक हो जाता है. क्योंकि अभिव्यक्ति और कुछ है नहीं, वह विचार को लोक को अर्पित करने की प्रक्रिया है. मन की साझेदारी है. बस, और कुछ नहीं. यह बात मैंने मसिजीवी के पिछले पोस्ट की प्रतिक्रिया में ही लिख दी थी.
बहरहाल, बहुत अच्छा हुआ कि बात वहां थमी नहीं. वरना गाली-गलौच वाले निरर्थक विवादों में उलझा हिंदी ब्लोग जगत एक अत्यंत जरूरी और सार्थक संवाद से वंचित रह जाता. शास्त्री जी ने मसिजीवी का जवाब भी दिया. पूरी विनम्रतापूर्वक:
आपने इस लेख में मेरे बारे में जो कुछ लिखा है वह मेरी दैनिक सक्रियता का सिर्फ 10% है। यह सब कैसे कर लेता हूं। क्या मेरे साथ मदद के लिये एक पूरी टीम है। अच्छे प्रश्न हैं। यदि आप अपने चिट्ठे पर 1000 शब्द का एक लेख छापने की आजादी देंगे तो मैं इस विषय पर एक मौलिक लेख भेज दूंगा। इसके द्वारा मरे नाम को और प्रचार मिलेगा, उधर आपको फोकट में एक उपयोगी लेख मिल जायगा।
बहरहाल अपने संदेहजीवी भाई मसिजीवी भी कुछ कम तो हैं नहीं. उन्होने लेख मांग भी लिया और शास्त्री जी ने वह भेज भी दिया. शास्त्री जी ने इसमें वह सारे गुर बताए हैं जिससे वह यह सब आसानी से कर पाते हैं. इस विस्तृत लेखीले जवाब में उन्होने जो कुछ भी कहा है वह सौ प्रतिशत व्यावहारिक और सही बात है. हाँ खुद को भी और व्यवस्थित कर सकूं इसके लिए उनके अगले लेख की प्रतीक्षा रहेगी. लेकिन इस संदर्भ में मेरी मुश्किल बढ़ा दी आलोक पुराणिक ने. पेशे से जो भी हों, पर वेशे से व्यंग्यकार हैं. उन्होने शास्त्री जी के पोस्ट पर प्रतिक्रिया करते हुए लिखा:
भईया मसिजीवीजी, शास्त्रीजी को नमन है, पर उनकी राह पर गमन न करें। इत्ती अनुशासित और अच्छी जिंदगी बहूत बोरिंग हो जाती है। अपना मानना है कि अच्छे सदाचारी आदर्श अनुकरणीय आचरण बहुत बोरिंग हो जाते हैं। क्या करना है बोरिंग जिंदगी का।
हद ये कि फुरसतिया भाई अनूप शुक्ल ने भी आलोक का समर्थन किया.
अच्छा है। आलोक पुराणिक भी सही कह रहे हैं।
और कहूं कि चाहकर भी मैं आलोक पुराणिक और अनूप जी से असहमत नहीं हो पा रहा हूँ। पर अफ़सोस कि शास्त्री जी ने अपनी असहमति जता दी है। वह कहते हैं:
मेरे जीवन में हर तरह के आवश्यक आनंद के लिये पर्याप्त समय है। बीबी बच्चों के भी बहुत समय दे पाता हूं। अनुशासित जीवन का मतलब हर तरह से अनुशासित जीवन है — जहां धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, एवं परमानंद की गुंजाईश है — यांत्रिक जीवन नहीं।
लेकिन शास्त्री जी! क्षमा चाहता हूँ. मैं यहाँ आपसे सहमत नहीं हो पा रहा हूँ. आनंद एक आवश्यकता है, यहाँ तक तो सच है, लेकिन जब ‘आनंद’ के पहले ‘आवश्यक’ विशेषण लगाना पडे, तब तो भाई वह आनंद नहीं रह जाता. ऐसा आनंद तो झंझट हो जाता है. बिल्कुल वैसे ही जैसे पढाई के बाद परीक्षा देना या स्वादिष्ट भोजन के बाद बरतन मांजना. अरे भाई, जब आवश्यक हो गया तब आनंद कैसा? आप तो जानते ही हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है और आविष्कार मुसीबत की जड़ हैं। (संदर्भ : एटम बम) .
वैसे इसके पहले आप खुद ही कह चुके हैं :
पिछले 20 साल से मैं समय-नियंत्रण के बारे में बहुत जागरूक हूं। घर में आज भी टीवी नहीं है। आवश्यक सारी जानकारी एवं खबर अखबार, पुस्तकों एवं जाल से लेता हूं। मित्रों के साथ राजनीति, क्रिकेट, परनिन्दा में समय नहीं बर्बाद करता। हर तरह के अनावश्यक गतिविधि, कार्यक्रम, आदि से दूर रहता हूं।
हे ऋषिकल्प मनीषी ऐसा जीवन जीना किसी सामान्य मनुष्य के बस की बात नहीं है. आप बताइए जब आप यह सब कुछ भी नहीं करते तो आनंद प्राप्त करने का जीवन में और क्या माध्यम बचता है. आप की इस बात पर मुझे एक लतीफा याद आ रहा है. एक सज्जन को जीने की बड़ी चाह थी. गए डाक्टर के पास. डाक्टर को उन्होने अपनी इच्छा बताई और उपाय पूछा. डाक्टर ने कहा – देखिए सिगरेट-शराब छोड़ दीजिए. लफंदरबाजी छोड़ दीजिए. लड़कियों का पीछा करना छोड़ दीजिए. मटरगश्ती छोड़ दीजिए. उन सज्जन ने बीच में ही डाक्टर को रोक कर बोला बस-बस-बस डाक्टर साहब. जब यह सब छोड़ ही देना है तो यह सौ साल जीने का ख़याल भी रख कर मैं क्या करूंगा? मैं यह ख़्याल ही छोड़ दे रहा हूँ. आदरणीय शास्त्री जी! क्षमा चाहता हूँ पर मुझे कहना पड़ रहा है कि आज की तारीख में अगर मुझसे भी कोई यह बात कहे तो मैं भी ‘सौ साल जीने का ख़याल’ ही छोड़ना पसंद करूंगा. अगर आपके पास कोई ऐसा रसायन हो जिससे यह सब न करते हुये भी आनंद प्राप्त किया जा सके (और वह आवश्यक वाला न हो) तो कृपया हमें बताएं. हम उसे जरूर जानना चाहते हैं. और याद रखें, अभी वह सफलता के गुणों वाला आपका पोस्ट भी पूरा नहीं हुआ है. हम युवाओं के लिए उसे जानना कितना जरूरी है यह तो आप जानते ही हैं. तो उस संदर्भ में भी हम पर अपनी कृपा बनाए रखिएगा. और हाँ लेखन के संदर्भ में मेरा मनाना आज भी वही है जो कल तक था. मतलब यह कि रचना आपकी सिर्फ तब तक है जब तक कि वह विचार के स्तर पर है. इसके जरा सा आगे बढ़ते यानी उसके कृति बनते ही वह आपकी नहीं रह जाती. फिर उसे आप लोक को अर्पित कर चुके होते हैं. तो एक मुमुक्षु की भांति शास्त्री जी से फिर मेरा विनम्र अनुरोध है कि वह इन रहस्यों का (खास तौर से आवश्यक आनंद वाले), लोकार्पण करें. और हाँ, इस रचनात्मक संदेह के लिए भाई मसिजीवी और इसे गति देने के लिए जी मेरा धन्यवाद स्वीकारें. इस संदेह में रचनाधर्मिता की तलाश के लिए भाई आलोक पुराणिक और फुरसतिया सुकुल जी के अलावा और जो भी सज्जन-देवी शामिल हो रहे हैं या होंगे, उन सबको मेरी ओर से शुकराने की पेशगी बतौर बयाना हाजिर है. अभी रख लें. जमा-खर्च का हिसाब-किताब बाद में होता रहेगा.
इष्ट देव सांकृत्यायन

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