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Archive for the ‘संस्मरण’ Category

रामेश्वरम में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 17, 2011

हरिशंकर राढ़ी
दोपहर बाद का समय हमने घूमने के लिए सुरक्षित रखा था और समयानुसार ऑटोरिक्शा  से भ्रमण शुरू  भी कर दिया। पिछले वृत्तांत में गंधमादन तक का वर्णन मैंने कर भी दिया था। गंधमादन के बाद रामेश्वरम द्वीप पर जो कुछ खास दर्शनीय  है उसमें लक्ष्मण तीर्थ और सीताकुंड प्रमुख हैं। सौन्दर्य या भव्यता की दृष्टि  से इसमें कुछ खास नहीं है। इनका पौराणिक महत्त्व अवश्य  है । कहा जाता है कि रावण का वध करने के पश्चात्  जब श्रीराम अयोध्या वापस लौट रहे थे तो उन्होंने सीता जी को रामेश्वर  ज्योतिर्लिंग के दर्शन  के लिए, सेतु को दिखाने के लिए और अपने आराध्य भगवान शिव  के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पुष्पक  विमान को इस द्वीप पर उतारा था और भगवान शिव की पूजा की थी। यहाँ पर श्रीराम,सीताजी और लक्ष्मणजी ने पूजा के लिए विशेष  कुंड बनाए और उसके जल से अभिषेक  किया । इन्हीं कुंडों का नाम रामतीर्थ, सीताकुंड और लक्ष्मण तीर्थ है । हाँ,  यहाँ सफाई  और व्यवस्था नहीं मिलती और यह देखकर दुख अवश्य  होता है।
स्थानीय दर्शनों  में हनुमान मंदिर में (जो कि बहुत प्रसिद्ध और विशाल  नहीं है) तैरते पत्थरों के दर्शन करना जरूर अच्छा लगता है। पत्थर का पानी पर तैरना एक लगभग असंभव सी घटना मानी जाती है और इसे कुछ लोग ईश्वरीय  चमत्कार मानते हैं तो कुछ गल्प के अलावा कुछ नहीं। इसे सामान्यतः वैज्ञानिक तौर पर भी नकार दिया जाता है किन्तु यह सच है कि पत्थर पानी में तैरते हैं। इसे आप अपनी आँखों से देख सकते हैं, छू सकते हैं और दिल करे तो खरीदकार ला भी सकते हैं। यह वास्तव में पत्थर ही होते हैं जो दुर्लभ श्रेणी के होते हैं।
वस्तुतः तैरते हुए पत्थर भी प्रकृति के चमत्कारों में एक हैं। इनका पानी पर तैरना पता नहीं श्रीराम के स्पर्श  की कृपा पर आधारित था या नहीं किन्तु इसे प्रकृति का स्पर्श  जरूर मिला है। भूविज्ञान के अनुसार पत्थर का तैरना कोई चमत्कार या  ईश्वरीय शक्ति  नहीं है। हर प्रकार का पत्थर तैर नहीं सकता है। दक्षिण भारत पृथ्वी के सबसे पुराने भागों में है। वर्तमान हिमालय के अस्तित्व में आने से पूर्व एशिया , योरोप और आस्ट्रेलिया तक का अंश  एक ही खंड था। जहाँ आज हिमालय है वहाँ पहले टेथीस नामक एक छिछला सागर था। इस सागर के उत्तर में अंगारा लैण्ड नामक भूखंड था और दक्षिण में गोंडवाना लैण्ड। टेक्टॉनिक प्लेटों के खिसकने से कालान्तर में टेथीस सागर की जगह हिमालय का निर्माण हो गया। भारत का दक्षिणी भाग गोंडवाना लैण्ड का प्रमुख हिस्सा है जो मुख्यतः ज्वालामुखी से निर्मित आग्नेय शैलों  से निर्मित है। चूंकि आग्नेय शैलें  प्रायः ज्वालामुखी से निकले लावा के ठण्डे हो जाने से बनती हैं, इनमें कहीं -कहीं छिद्र रह जाते हैं जिनमें हवा भर जाती है। यही हवा जब अधिक हो जाती है तो पत्थर पानी में तैरने लग जाता है और आर्किमिडीज का सिद्धान्त यहाँ पूर्णतया लागू होता है। यह बात अलग है कि आग्नेय शैलों के अन्तर्गत आने वाला पूरा पत्थर परिवार तैर नहीं सकता, इसमें भी एक विशेष कोटि होती है जिसे हम झाँवाँ पत्थर कह सकते हैं।
हमारा रामेश्वरम भ्रमण लगभग तीन घंटे में पूरा हो गया था। उसी होटल पर हम आ चुके थे। शाम  के पांच बज रहे होंगे। अब आगे क्या किया जाए? अभी कुछ और महत्त्वपूर्ण स्थल रह गए थे । उनमें से एक था –  धनुषकोडि या धनुषकोटि। इस स्थल के विशय में हमने सुन रखा था और जाने की प्रबल इच्छा भी थी। ऑटो वाले से बात की गई तो पता लगा कि इस समय जाना असंभव था। यह वहाँ से लौटने का समय है और रात्रि में वहाँ जाना न तो लाभकर है और न ही अनुमोदित ही। यहाँ भी हमें अभी कुछ खरीदारी करनी थी, शंकराचार्य  मठ में जाना था और थोड़ा समन्दर किनारे घूमना भी था। वस्तुतः अब जो सबसे ज्यादा उत्कंठा हमारे मन में शेष  थी वह थी सेतु के दर्शन करना जो किधनुषकोडि में ही मिल सकता था। सच तो यह है कि सेतु का अब कोई अस्तित्व बचा ही नहीं है और धनुषकोडि में भी इसके दर्शन नहीं हो सकते। यह तो अब सागर में समाहित हो चुका है, धनुषकोडि तो वह स्थान है जहाँ से इस सेतु का प्रारम्भ होता था।



गंध मादन पर्वत पर 



धनुषकोडि ; धनुषकोडि या धनुषकोटि पम्बन से दक्षिण-पूर्व में लगभग 8 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ पर विभीषण  का मंदिर हुआ करता था। कहा जाता है कि रावण दमन के बाद वापसी में विभीषण के कहने से श्रीराम ने इस पुल का सिरा अपनी धनुष से तोड़ दिया था। ‘कोडि’ का अर्थ तमिल भाषा  में अन्त या सिरा होता है। यह भी विश्वास है कि रामेश्वरम और काशी की यात्रा सेतु में स्नान किए बिना पूरी नहीं होती। धनुषकोडि को महोदधि (बंगाल की खाड़ी ) और रत्नाकर (हिन्द महासागर ) का मिलन स्थल भी कहा जाता है, हालाँकि आज का भूगोल इस बात को प्रमाणित नहीं करता । धनुषकोडि श्रीलंका के बीच में विश्व  की  सबसे छोटी सीमा का निर्माण भी करता है जो मात्र पचास गज की लंबाई की है। स्वामी विवेकानन्द ने भी 1893 के विश्व  धर्मसम्मेलन मे विजय पताका फहराने के बाद श्रीलंका के रास्ते इसी भूखंड पर भारत की धरती पर अपना पैर रखा था। 
धनुषकोडि अब एक ध्वन्शावशेष  बनकर रह गया है। 22 दिसम्बर 1964 की मध्यरात्रि में एक भयंकर समुद्री तूफान ने धनुषकोडि का गौरवशाली  अतीत और वैभवशाली वर्तमान को पूरी तरह निगल लिया था। इस भीषण  तूफान में लगभग 1800 जानें गईं थी और पूरा द्वीप शमशान  बनकर रह गया। यहाँ क्या कुछ नहीं था। इसका अपना एक रेलवे स्टेशन  था और एक पैसेन्जर ट्रेन (पम्बन-धनुषकोडि पैसेन्जर, ट्रेन नम्बर – 653/654) चक्कर लगाया करती थी। दैवी आपदा की उस रात भी वह पम्बन से 110 यात्रियों और 5 कर्मचारियों को लेकर चली थी। अपने लक्ष्य अर्थात धनुषकोडि रेलवे स्टेशन से कुछ कदम पहले ही तूफान ने उसे धर दबोचा और सभी 115 प्राणी आपदा की भेंट चढ़ गए। अब यह एक खंडहर मात्र रह गया है और सरकार ने इसे प्रेतनगर ( Ghost  Town ) घोषित  कर रखा है। यहाँ एक शहीद  स्मारक भी बनाया गया है। यहाँ छोटी नाव या पैदल भी पहुँचा जा सकता है । रेत पर चलने वाली जीपें और लारियाँ भी उपलब्ध हैं।

शंकराचार्य मठ :

रामनाथ मंदिर के मुख्य अर्थात पूर्वी गोपुरम के सामने जहाँ सागर में स्नान की रस्म शुरू करते हैं, वहीं शंकराचार्य का मठ भी स्थापित है। एक बार मुझे यह भ्रम हुआ कि यह आदि शंकराचार्य  द्वारा स्थापित चारो मठों में से एक होगा क्योंकि उन्होंने चार मठ चारो धाम में स्थापित किए थे और रामेश्वरम चार धामों में एक है। बाद में ध्यान आया कि उनके द्वारा स्थापित मठ चार धामों में नहीं अपितु चार दिशाओं  में थे। जहाँ उत्तर, पूरब और पश्चिम  के मठ धामों में स्थित हैं वहीं दक्षिण में स्थित शृंगेरी मठ तो कांची में है। अतः रामेश्वर  में स्थित शंकराचार्य  मठ महत्त्वपूर्ण तो है किन्तु प्रमुख चार मठों  में नहीं है। फिर भी मठ को देखने की इच्छा कम नहीं हुई थी। वहाँ पहुँचे तो अच्छी खासी भीड़ दिखी। कोई विशेष प्रयोजन मालूम हो रहा था। भाषा की समस्या तो थी ही । चाहा कि कुछ जानकारी लूँ, पर किससे लूँ? प्रश्न  का कोई समाधान नहीं दिख रहा था। सामान्य बातें या पता तक तो कोई विशेष परेशानी  नहीं थी। परन्तु यहाँ प्रश्न लेखकीय कीडे़ का था। जिज्ञासा का समाधान तो चाहिए ही था, यात्रा की समाप्ति के बाद वृत्तान्त भी तो लिखना था! ना हिन्दी ना अंगरेजी। संस्कृत में अपना  बहुत प्रवाह तो नहीं है किन्तु कामचलाऊ शक्ति जरूर है। पंडित जी से बात करूँ पर वहाँ भी असमर्थता ही थी। सोच -विचार कर ही रहा था कि एक सज्जन शारीरिक  भाषा से मुझे पढ़े – लिखे या अफसर से दिख गए। उनसे बात की तो बोले कि हिन्दी तो नहीं, अंगरेजी में वे बात कर सकते हैं। बातचीत में पता चला कि वे मदुराई के रहने वाले हैं और वहीं किसी सरकारी सेवा में हैं। नाम तो मैं उनका भूल गया, पर उनकी बातें, उनका ज्ञान और सज्जनता मुझे याद है। लम्बी बातचीत में उन्होंने जो कुछ बताया, उसमें मुझे एक बात बड़ी आश्चर्यजनक  लगी। वहाँ अश्विन  मास में एक विशिष्ट  उत्सव होता है जिसमें लोग अंगारों पर नाचते हैं और किसी का पैर नहीं जलता। उनका दावा था कि आप यह उत्सव स्वयं देख सकते हैं। हम भी वहाँआश्विन  मास में( नौरात्रों में) गए थे। परन्तु यह उत्सव पूर्णिमा के आस- पास  होता है। मुझे इस बात की सत्यता पर अभी भी पूरा विश्वास नहीं होता कि जुलूस बनाकर लोग आग पर नाचेंगे और पैर नहीं जलेंगे परन्तु किसी की धार्मिक आस्था को चुनौती देना भी कोई आसान कार्य नहीं है।

दिन डूबने को आ रहा था। मठ से निकलकर हम सागर किनारे की ओर चल पडे़। हवा की शीतलता  का कोई जवाब नहीं था। सागर किनारे जो दृश्य  सामान्यतः मिलता है – लोगों की भीड़, खोमचे वालों का जमावड़ा और बेतरतीब आते-जाते लोग, यहाँ भी था। यहाँ एक बार पुनः जिस चीज ने भगाने की ठानी वह थी यहाँ की गंदगी और बदबू!  रामेश्वरम  के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है मछली पकड़ना और बेचना। अब मछलियों के पकड़ने के बाद उनकी प्रॉसेसिंग और भंडारण के कारण बदबू निकलना तो सामान्य बात है (बेट द्वारिका यात्रा में मैंने यही पाया था), किन्तु तट पर फैली गंदगी, गोबर और मल से भी कम वितृष्णा  नहीं पैदा हो रही थी। आवारा पशुओं  के झुंड के झुंड अपनी गतिविधियों में व्यस्त और मस्त थे। कुल मिलाकर सागर किनारे दिल ये पुकारे वाली बात बनी नहीं। हाँ, थोड़ा बहुत इलाका जरूर ऐसा था जहाँ बैठा जा सकता था। अंधेरा घिरने लगा था। कुछ स्थानीय लोगों ने बताया कि इस दिशा  में लंका है और थोड़ी देर बाद श्रीलंका की बिजुलबत्तियाँ दिखाई देंगी। आखिर कुल दूरी यहाँ से तीस किमी ही तो है। 

पम्बन रेलवे पुल
– यह रेलवे पुल रामेश्वरम द्वीप को भारत के मुख्य भाग से जोड़ता है . यह इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है और इसकी विशेषता यह है कि जब बड़ी जहाजों को निकलना होता है तो रेल की पटरियों को उठा दिया जाता है और निकल जाता है. पुनः पटरी को नीचे कर दिया जाता है रेलगाड़ियाँ गुजरने लगती हैं .
क्या खरीदें –  रामेश्वरम  जाएं तो सामुद्रिक जीवों से निर्मित सामान अवश्य खरीदें। शंख , घोंघे और सीप के कवच  ( sea shell )  के सामान बहुत ही सुन्दर और सस्ते मिलते हैं। इनसे आप घर को सजा सकते हैं और  रामेश्वरम  यात्रा की स्मृति के तौर पर संजो भी सकते हैं। उपहार के लिए भी ये बहुत ही उत्तम होते हैं। साथ में परिवार था, अतः सामान खरीदने का चांस बनता ही था। एकाध अपने लिए और कुछ फरमाइशकर्ताओं के लिए खरीदा। वामावर्ती शंख तो मिलती ही है, दक्षिणावर्ती शंख के तमाम रूप उपलब्ध हैं। मैं तो उनकी उत्पत्ति और प्रकृति और कारीगरों की कारीगरी पर मुग्ध होता रहा जबकि पत्नी और बेटी गृहसज्जा के सामानों की खरीदारी में व्यस्त रहीं। बेटे को गाड़ी टाइप का कोई खिलौना मिल गया था। कभी उसमें व्यस्त हो जाता तो कभी जाँच आयोग के सक्रिय सदस्य की तरह अनेक प्रश्न लेकर आ जाता और मेरी सोच का दम तब तक घोंटता रहता जबतक उसे अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिल जाता। 
 रामेश्वरम  में हमारा ठहराव एक दिन का ही था। रात हो चली थी। दोपहर वाले ढाबे पर ही हमने उत्तर भारतीय भोजन किया  और इस निर्णय के साथ सो गए कि प्रातः जल्दी उठकर कन्याकुमारी वाली बस पकड़नी है। काश  ! एक दिन और होता हमारे पास  रामेश्वरम  में ठहरने के लिए! बस मन ही मन यह प्रार्थना गूंजती रही –
                              श्रीताम्रपर्णी जलराशियोगे 
                                       निबद्ध्यम सेतुम निशि विल्व्पत्रै .
                             श्रीरामचन्द्रेण समर्चितमतम
                                        रामेश्वराख्यं सततं नमामि . 
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मुर्दा आचरण के खिलाफ

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 19, 2008

इष्ट देव सांकृत्यायन

आज वह दिन है जब आचार्य रजनीश ने इस दुनिया से विदा ली थी. आचार्य रजनीश से मेरी कभी मुलाक़ात तो नहीं हुई, रूबरू कभी उनको देखा भी नहीं. जब तक वह थे तब तक उनके प्रति में भी वैसे ही विरोध भाव से भरा हुआ था, जैसे वे बहुत लोग हैं जिन्होंने उनको ढंग से पढा-सूना या जाना नहीं. और यह कोई आश्चर्यजनक या अनहोनी बात नहीं हुई. मैंने उन्हें जाना अचानक और वह भी कबीर के मार्फ़त.
हुआ यों कि में अपनी बड़ी बहन के घर गया हुआ था और वहाँ जीजा जी के कलेक्शन में मुझे एक किताब मिली ‘हीरा पायो गाँठ गठियायो’. यह कबीर के कुछ पदों की एक व्याख्या थी. सचमुच यह हीरा ही था, जिसे मैंने गाँठ गठिया लिया. कबीर के पदों की जैसी व्याख्या रजनीश ने की थी, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ तक कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य के बडे आलोचकों और व्याख्याकारों से भी नहीं मिल पाई थी. हालांकि तब मैंने उसे अपनी काट-छाँट के साथ पढा था. चूंकि पूरी तरह नास्तिक था, आत्मा-परमात्मा में कोई विश्वास मेरा नहीं था, इसलिए जहाँ कहीं भी वैसी कोई बात आई तो मैंने मन ही मन ‘सार-सार को गहि रही, थोथा देई उड़ाय’ वाले भाव से उसे डिलीट कर दिया.
लेकिन चूंकि रजनीश की व्याख्या में मुझे रस मिल था और उससे कम से कम कबीर के प्रति एक नई दृष्टि भी मिलती दिखी थी, इसलिए इसके बाद भी रजनीश को मैंने छोडा नहीं. जहाँ कहीं भी कबीर पर उनकी जो भी किताब मिली वह में पढ़ता रहा. उसका रस लेता रहा और कबीर के साथ ही साथ रजनीश को भी जानता रहा. हालांकि इस क्रम में कहीं न कहीं जीवन को भी में नए ढंग से नए रूप में जानता रहा. पर तब अपने पूर्वाग्रहों के कारण इस बात को स्वीकार कर पाना शायद मेरे लिए मुमकिन नहीं था.
तो इस तरह में ये कह सकता हूँ की रजनीश को मैंने जाना कबीर के जरिये. पर बाद में मैंने इस दुनिया की कई और विभूतियों को मैंने जाना रजनीश के मार्फ़त. हुआ यों कि ऐसे ही चलते फिरते मुझे एक व्याख्या मिली रैदास पर. यह भी रजनीश ने ही की थी. अब ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ जैसी उक्ति के लिए जाने जाने वाले रैदास कोई पोंगापंथी बात तो कह नहीं सकते थे. इसलिए उन्हें पढ़ने में भी कोई हर्ज मुझे नहीं लगी और वह किताब भी खरीद ली. पढी तो लगा कि रैदास तो उससे बहुत आगे हैं जहाँ तक में सोचता था. अभी जिस दलित चेतना की बात की जा रही है उसके बडे खरे बीज रैदास के यहाँ मौजूद हैं. और आचार्य रजनीश के ही शब्दों में कहें तो ये बीज दुनिया को जला देने वाले शोले नहीं, मनुष्य के भीता का अन्धकार मिटाने वाले प्रकाशपुंज के रूप में मौजूद हैं.
अव्वल तो तब तक में यही नहीं जानता था कि रैदास ने कवितायेँ भी लिखी हैं. मैंने वह किताब पढ़ते हुए जाना कि रेडियो पर हजारों दफा जो भजन में सुन चुका हूँ, ‘तुम चन्दन हम पानी’ वह रैदास की रचना है. अभी फिर मैंने वह किताब पढ़नी चाही तो घर में नहीं मिली. नाम तक अब उसका याद नहीं रहा तो मैंने ओशो वर्ल्ड के स्वामी कीर्ति से कहा और उन्होने काफी मशक्कत से ढूंढ कर वह किताब मुझे भिजवाई. अब उसे में नए सिरे से पढ़ रहा हूँ. उसे फिर-फिर पढ़ते हुए फिर-फिर वही मजा आता है, जो पहली दफा पढ़ते हुए आया था.
रजनीश के प्रति मेरा विरोध भाव अब तक लगभग विदा हो चुका था. क्योंकि मैंने यह जान लिया था कि उनके कहने के बारे में जो कहानियाँ हैं वे कितनी सही हो सकती हैं. इसी बीच एक और किताब मिली. गोरखवाणी. गोरख के बारे में भी में नहीं जानता था कि उन्होने कवितायेँ भी लिखीं हैं और उनकी कविताओं के भाव जो बताते हैं, उनके अनुसार वह उससे बिलकुल अलग थे जो अब उनके चेले कर रहे हैं. खास तौर से ईश्वर के अस्तित्व के सम्बंच में गोरख की जो धारणा है,
‘बसती न शून्यम, शून्यम न बसती
अगम अगोचर ऐसा
गगन सिखर महँ बालक बोलैताका नांव धरहुंगे कैसा’
और इसकी जैसी व्याख्या आचार्य रजनीश ने दी है वह किसी के भी मन को झकझोर देने के लिए काफी है. असल में यही वह बिंदु है जहाँ से मेरी अनास्था के बन्धन कमजोर पड़ने शुरू हो गए थे. यह आचार्य रजनीश को पढ़ते हुए ही मुझे लगा कि वस्तुतः अनास्था भी एक तरह का बन्धन ही है. इनकार का बन्धन.
आचार्य रजनीश, जिन्हें अब लोग ओशो के नाम से जानते हैं, दरअसल हर तरह के बन्धन के विरुद्ध थे. यहाँ तक कि आचरण और नैतिकता के बन्धन के भी विरुद्ध. लेकिन इसका यह अर्थ एकदम नहीं है कि वह पूरे समाज को उच्छ्रिन्खाल और अनैतिक हो जाने की सीख दे रहे थे. दुर्भाग्य की बात यह है कि उनके बारे में उन दिनों दुष्प्रचार यही किया जा रहा था. आश्चर्य की बात है कि हमारे समाज में ऐसा कोई महापुरुष हुआ नहीं जिसके बारे में दुष्प्रचार न किया गया हो. कबीर और तुलसी तक नहीं बचे अपने समय के बौद्धिक माफियाओं के दुष्चक्र से. यह अलग बात है कि हम मर जाने के बाद सबको पूजने लगते हैं. जिंदा विभूतियों को भूखे मारते हैं और मुर्दों के प्रति अपनी अगाध आस्था जताते हैं. शायद हमारी आस्था भी मुर्दा है और यही वजह है जो हमारा देश मुर्दों का देश हो चुका है.
आचार्य रजनीश अकेले व्यक्ति हैं जो इस मुर्दा आस्था के खिलाफ खडे हैं. सीना तान कर. उनका प्रहार कोई नैतिक मूल्यों और अच्छे आचरण पर नहीं है. वह प्रहार करते हैं नैतिकता और आचरण के मुर्देपन पर. वह बार-बार यही तो कहते हैं कि ऐसा कोई भी आचरण या मूल्य जो आपका स्वभाव नहीं बना, वह मुर्दा है. ऐसा अच्छा आचरण सिर्फ तब तक रहेगा जब तक आपके भीतर भय है. भय गया कि अच्छाई गई. इस दुनिया ज्यादातर ईमानदार लोग सिर्फ दो कारणों से ईमानदार हैं. या तो इसलिए कि उन्हें बेईमानी का मौका नहीं मिला, या फिर इसलिए कि बेईमानी की हिम्मत नहीं पडी. भा मिला और मौका मिला कि ईमानदारी गई. रजनीश हजार बार कहते हैं कि मुझे नहीं चाहिए भय और दमन की नींव पर टिकी ऎसी ईमानदारी. मुझे तो सोलहो आने ईमानदारी और सौ फीसदी भलमनसी चाहिए . वह तोता रटंत की कोरी सीख या सरकारी दमन से आने वाली नहीं है. वह आएगी सिर्फ ध्यान से.
ध्यान के मुद्दे पर फिर कभी.

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…कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 18, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन

तारीख 9 दिसम्बर 2007
दिन रविवार होने और अरसे बाद रविवार को रविवारी फुर्सत मिलने के कारण में पूरी तफरीह के मूड में था. करीब शाम को आए विनय और देर तक लुक्कड़ई होती रही. बाद में हम उनके ही घर चले गए और वहीं टीवी आन किया. रात साढ़े नौ बजे. मैंने टीवी खोला तो था डीडी भारती का कार्यक्रम ‘सृजन’ देखने के लिए, पर पहले सामने कोई न्यूज चैनल आ गया. इसके पहले की चैनल सरकाता, नीचे चल रहे एक प्रोमो पर ध्यान गया- “हिन्दी के वरिष्ठ कवि त्रिलोचन का निधन”। सहसा विश्वास नहीं हुआ. इसके बावजूद कि त्रिलोचन इधर काफी समय से बीमार पड़े थे मन ने कहा कि यह शायद किसी और त्रिलोचन की बात है. हालांकि वह किसी और त्रिलोचन की बात नहीं थी. यह तय हो गया ख़बरों के हर चैनल पर यही खबरपट्टी चलते देख कर.
यह अलग बात है कि शास्त्री जी के बारे में इससे ज्यादा खबर किसी चैनल पर नहीं थी, पर उस दिन में लगातार इसी सर्च के फेर में फिर ‘सृजन’ नहीं देख सका। इस प्रलय के बाद फिर सृजन भला क्या देखते! हिन्दी में आचार्य कोटि के वह अन्तिम कवि थे। एक ऐसे कवि जिसमें आचय्त्व कूट-कूट कर भरा था, पर उसका बोध उन्हें छू तक नहीं सका था. बडे रचनाकारों से क्षमा चाहता हूँ, पर अपने समय में में उन्हें हिन्दी का सबसे बडा रचनाकार मानता हूँ. सिर्फ इसलिए नहीं कि उनकी रचनाएं बहुत उम्दा हैं, बल्कि इसलिए कि अपने निजी स्वभाव में भी वह बहुत बडे ‘मनुष्य’ थे. गालिब ने जो कहा है, ‘हर आदमी को मयस्सर नहीं इन्सां होना’, संयोग से यह त्रिलोचन को मयस्सर था. त्रिलोचन वह वटवृक्ष नहीं थे जिसके नीचे दूब भी नहीं बढ़ पाती. वह ऐसे पीपल थे जिसके नीचे दूब और भडभाड़ से लेकर हाथी तक को छाया मिलती है और सबका सहज विकास भी होता है. त्रिलोचन की सहजता उतनी ही सच्ची थी जितना कि उनका होना. वह साहित्य के दंतहीन शावकों से भी बडे प्यार और सम्मान से मिलते थे और उनके इस मिलने में गिरोह्बंदी की शिकारवृत्ति नहीं होती थी.
पहली बार उनसे मेरी मुलाकात सन 1991 में हुई थी। तब में पहली ही बार दिल्ली आया था। उसी बीच श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार समारोह का आयोजन था. पुरस्कार उस साल उदय प्रकाश को दिया जाना था ‘तिरिछ’ कहानी संग्रह के लिए. उसी समारोह में शिरकत के लिए त्रिलोचन जी को ले आना था. डा. अरविंद त्रिपाठी पुरस्कार समिति के सचिव थे. उनके साथ ही में भी गया था. डा. अरविंद ने ही त्रिलोचन जी से मेरा परिचय कराया. यह जान कर कि में भी सानेट लिखता हूँ उन्होने कहा कि तब तो आप पहले अपने सानेट सुनाइए. खैर गीत-सानेट सुनते-सुनाते चाय-पानी पीकर हम लोग उनके घर से चले. करीब डेढ़ घंटे के उस सफर में वह दूसरे बडे रचनाकारों की तरह गंभीरता की चादर ओढे अलगथलग होकर चुप नहीं बैठ गए -. पूरे रास्ते बातचीत होती रही. वह सबकी सुनते और अपनी कहते रहे. सबसे अच्छी बात यह रही कि पूरे रास्ते साहित्य जगत की राजनीति की कोई बात नहीं हुई. बातें शब्दों पर हीन, हिन्दी और विश्व साहित्य पर हुईं, कविता की प्रवृत्ति और प्रयोगों पर हुईं … और जाने किन-किन मुद्दों पर हुईं.
इसी बातचीत में मुहे पहली बार मालूम हुआ कि ‘विकृति’ शब्द का अर्थ ‘खराबी’ या ‘गंदगी’ जैसा कुछ नहीं होता। यह अर्थ उसमें शब्द के लाक्षणिक प्रयोग के नाते जुड़ गया है और रूढ़ हो जाने के कारण बहुधा मान्य हो गया है. इस शब्द का मूल अर्थ तो ‘विशिष्ट कृति’ है. लाक्षणिक प्रयोगों के ही चलते ऐसे ही जाने और कितने शब्दों के अर्थ रूढ़ होकर नष्ट हो गए हैं. ऐसे ही और बीसियों शब्दों के अर्थ उन्होने हमें बताए. इसी बातचीत में उपसर्ग-प्रत्यय से तोड़ कर शब्दों के मूल रूप और अर्थ ढूँढने की कला मैंने सीख ली, जो अब तक मेरे काम आ रही है.
अब तक में शास्त्री जी को केवल एक कवि के रूप में जानता था। लेकिन इसी बातचीत में मैंने जाना की वही त्रिलोचन जो कहते हैं –
चाय की प्यालियाँ कभी मत दो
हर्ष की तालियाँ कभी मत दो
चाह की राह से आए अगर
दर्द को गालियाँ कभी मत दो

बडे भाषाविद भी हैं. उन्होने कई कोशों का सम्पादन भी किया है. शब्दों की छिर्फाद करने की उनकी कला मुझे ही नहीं बडे-बडों को भी वाकई हैरत में डाल देती थी.
बहरहाल हम आयोजन स्थल पहुंचे और उस गहमागहमी में वह अविस्मरनीय सफर इतिहास का हिस्सा बन गया। शास्त्री जी मंचस्थ हो गए और में श्रोताओं की भीड़ में गुम. लेकिन आयोजन के बाद उन्होने मुझे खुद बुलाया और फिर टैक्सी आने तक करीब दस मिनट हमारी बातें हुईं. उन्होने फिर मिलने के लिए भी कहा और चलते-चलते यह भी कहा, ‘आपकी कविताओं में जो ताप है वह आज के रचनाकारों में दुर्लभ है. इसे बनाए रखिए. एक बात और… रस, छंद, अलंकार कविता के लिए जरूरी हैं, लेकिन अगर इन्हें जिद बनाइएगा तो ये विकास में बाधक बनेंगे.’
यह मेरे लिए एक और सूत्र था। भाषा और भाव के प्रति इस खुलेपन का साफ असर त्रिलोचन की कविताओं पर ही नहीं, उनके व्यक्तित्व पर भी भरपूर था. एक तरफ तो वह कहते हैं – तुलसी बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी और दूसरी तरफ यह भी कहते हैं
चार दिन के लिए ही आया था
कंठ खुलते ही गान गाया था
लोग नाम कीट्स का लेते हैं
कैसे बन कर सुगंध छाया था

मात्र 26 वर्ष की उम्र में काल कवलित हो गए अंग्रेजी के विद्रोही कवि जान कीट्स की रचनाधर्मिता के वह कायल थे। यह बात मैंने उनसे बाद की मुलाकातों में जानी। दिल्ली के उस एक माह के प्रवास के दौरान शास्त्री जी से मेरी कई मुलाकातें हुईं। उन मुलाकातों में मैंने केवल उनके व्यक्तित्व के बड़प्पन को ही महसूस नहीं किया; हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत कई भाषाओं के हजारों शब्दों के नए-नए अर्थ भी जाने और यह भी जाना कि सुबरन को यह कवी किस बेताबी और शिद्दत के साथ ढूँढता फिरता रहा है.
बाद में में वापस गोरखपुर आ गया. फिर उनसे सम्पर्क बनाए नहीं रख सका. लम्बे अरसे बाद एक और मौका आया. वह विश्वविद्यालय के एक आयोजन में गोरखपुर आए हुए थे. मालूम हुआ तो में इंटरव्यू करने पहुंचा. मुझे उम्मीद नहीं थी कि अब उनको मेरा नाम याद होगा, पर मिलने के बाद यह मेरा भ्रम साबित हुआ. विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस पहुंच कर मैंने सन्देश भेजा और उनसे मिलने की अनुमति चाही तो उन्होने तुरंत बुलाया. मिलते ही बोले, ‘अरे तुम्हारे शरीर पर अब तक मांस नहीं चढ़ा!’ उनके साथ ही बैठे केदार नाथ सिंह, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी और उदय भान मिश्र हंस पड़े और में अवाक था. साहित्य संसार पर इंटरव्यू तो हुआ, लेकिन इस बीच मैंने एक बात यह भी गौर की कि उनका मन कुछ बुझा-बुझा सा है.
…..चलना तो देखो इसका –
उठा हुआ सिर, चौडी छाती, लम्बी बाँहें,
सधे कदम, तेजी, वे टेढी-मेढ़ी राहें
मानो डर से सिकुड़ रही हैं ….

न ये वही त्रिलोचन नहीं थे. कारण पूछने पर शास्त्री जी तो नहीं बोले, पर केदार जी ने संकेत दिया, ‘असल में गाँव में इनके हिस्से की जो थोड़ी-बहुत जमीन थी, उसकी बंदर्बांत हो चुकी है.’ में समझ सकता था कि अपने हक़ से निराला की तरह ‘बाहर कर दिया गया’ यह रचनाधर्मी सांसारिक विफलता से नहीं, बल्कि इसके मूल में व्याप्त छल और व्यवस्था के भ्रष्टाचार से ज्यादा आहत है. शायद ऎसी ही वजहों से उन्होने कहा होगा –
अमर जब हम नहीं हैं तो हमारा प्यार क्या होगा?
लेकिन इसकी अगली ही पंक्ति
सुमन का सुगंच से बढ़कर भला उपहार क्या होगा
यह स्पष्ट कर देती है कि नश्वरता के इस बोध के बावजूद प्यार के प्रति उनके भीतर एक अलग ही तरह की आश्वस्ति है. आखिर हिन्दी के शीर्षस्थ रचनाकारों में प्रतिष्ठित होने के बाद भी अपनी मातृभाषा अवधी में ‘अमोला’ जैसा प्रबंधकाव्य उन्होने ऐसे ही थोडे दिया होगा. शायद यही वजह है जो नश्वरता का उनका बोध बाद में और गहरा होता गया-
आदमी जी रहा है मरने को
सबसे ऊपर यही सच्चाई है

नश्वरता के इस बोध के बावजूद उन्हें यह बोध भी है कि अभी अपनी पारी वह पूरी खेल नहीं पाए हैं. अभी ऐसे बहुत सारे काम बचे हैं जो उन्हें ही करने हैं. तभी तो वह कहते हैं –
कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहाँ वह संभल के आई है

और इसीलिए मुझे अब भी यह विश्वास नहीं हो रहा है कि शास्त्री जी नहीं रहे. आखिर सिर्फ उनसे ही हो सकने वाले बहुत सारे काम जो अभी बाक़ी पड़े हैं, उन्हें कौन पूरा करेगा?

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