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Archive for the ‘साहित्य’ Category

चिंता से चतुराई घटे

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 11, 2014

इष्ट देव सांकृत्यायन

भारत हमेशा से एक चिंतनप्रधान देश रहा है। आज भी है। चिंतन की एक उदात्त परंपरा यहाँ सहस्राब्दियों से चली आ रही है। हमारी परंपरा में ऋषि-मुनि सबसे महान माने जाते रहे हैं, इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यही रहा है कि वे घर-बार सब छोड़ कर जंगल चले जाते रहे हैं और वहाँ किसी कोने-अँतरे में बैठकर केवल चिंतन करते रहे हैं। चिंतन से उनके समक्ष न केवल ‘इस’, बल्कि ‘उस’ लोक के भी सभी गूढ़तम रहस्य खुल जाते रहे हैं, जिसे वे समय-समय पर श्रद्धालुओं के समक्ष प्रकट करते रहे हैं। अकसर उनके चिंतन से बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी निकल आता रहा है। कालांतर में चिंतन से एक और चीज़ प्रकट हुई, जिसे चिंता कहा गया।

हालांकि यह चिंतन से अलग है, यह समझने में थोड़ा समय लगा। बाद में तो यहाँ तक पता चल गया कि यह चिंतन से बिलकुल अलग है, इतना कि चिंतन जितना फ़ायदेमंद है, चिंता उतनी ही नुकसानदेह। मतलब एक पूरब है तो दूसरी पश्चिम। इनमें एक पुल्लिंग और दूसरे के स्त्रीलिंग होने से इस भ्रम में भी न पड़ें कि ये एक-दूसरे के पूरक हैं। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये कुछ-कुछ वैसा ही मामला है, जैसे किसी नामी कंपनी का प्रतिष्ठित उत्पाद कोई लोकल टाइप कारखाना मिलते-जुलते नाम से निकाल देता है। बुनियादी फ़र्क़ दोनों के बीच यह है कि एक विशिष्ट जनों द्वारा किया जाता रहा है, जबकि दूसरी सामान्य जन द्वारा। लेकिन, समय के साथ वर्ग-धर्म-जाति भेद मिटने और डुप्लीकेसी बढ़ने का नतीजा यह हुआ कि कई बार सामान्य जन भी चिंतन कर डालता है और विशिष्ट जन भी चिंता के जाल में फंस जाते हैं।

हाल में आई कौलीफेर्निया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार विशिष्ट जन के चिंता के जाल में फंसने का सबसे पहला विवरण त्रेतायुग में पाया जाता है। भगवान राम के वनगमन के बाद महाराज दशरथ ग़लती से चिंता कर बैठे और उसका नतीजा अब आप जानते ही हैं। वास्तव में चिंता के साइड इफेक्ट का पता यहीं से चलना शुरू हुआ और इसके साथ ही इस पर शोध भी शुरू हुए। शोधों का निष्कर्ष यह निकला कि चिंता बहुत ही ख़तरनाक टाइप चीज़ है। इससे फ़ायदा कुछ नहीं है, जबकि नुकसान हज़ारों। और तो और, इससे कई तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। आयुर्विज्ञान विभाग वाले अनुसंधानकर्ताओं ने इससे हो सकने वाली बीमारियों की जो सूची दी, उसमें ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ से लेकर हार्ट अटैक तक का नाम शामिल था।

आनन-फानन जनकल्याण विशेषज्ञों और साहित्य के आचार्यों को बुलाया गया और इस विषय में जागरूकता फैलाने के लिए कोई प्रभावी उपाय निकालने को कहा गया। काफ़ी सोच-विचार के बाद उन्होंने एक स्लोगन निकाला और उसे हवा में तैरा दिया। वह स्लोगन है – चिंता से चतुराई घटे। वैसे इसे फैलाया तो हर ख़ासो-आम के लिए गया, पर जैसा कि आम तौर पर होता है, आम लोगों में इसे समझ कम ही पाए। अलबत्ता वे और ज़्यादा इसके फेर में फंस गए। जबकि ख़ास लोगों ने इसे ठीक से समझा और इसके फेर में फंसने से बचे। बाद में ग़ौर किया गया कि कुछ ख़ासजन भी इससे बच नहीं पाए। आम तो अकसर और कभी-कभी ख़ास जन भी किसी छोटी-मोटी ग़लती के कारण चिंता में फंसकर अपनी चतुराई घटाते रहे।

इसलिए ज़रूरी समझा गया कि इसके उपचार का कोई उपाय निकाला जाए। काफ़ी शोध-अनुसंधान के बाद मालूम हुआ कि दवा तो इसके मामले में कुछ ख़ास काम आती नहीं, हाँ एक उपाय ज़रूर है। उपाय यह है कि यह जैसे ही हो उसे जता दिया जाए। उस ज़माने में चूंकि कामकाज बहुत तेज़ गति से नहीं चलता था, इसलिए यह इतनी बात पता चलते-चलते बहुत देर लग गई। त्रेता से द्वापर युग आ गया। द्वापर में आपने देखा ही कि किस तरह चिंता ने पितामह भीष्म को आ घेरा। अच्छी बात यह रही कि उन्होंने लगातार आयुर्विज्ञानियों के निर्देशों का पालन किया और उन्हें जब-जब चिंता ने घेरा, वह उसे जता देते रहे।

उसके बाद तो हमारे देश में चिंता के फेर में पड़ते ही उसे जता देने का रिवाज़ सा चल पड़ा। हमारे नए दौर के विशिष्ट जन तो उसके फेर में पड़ने से पहले ही उसे जता देते हैं। आजादी के बाद से लेकर अब तक हम देखते आ रहे हैं कि विशिष्ट जन अकसर बहुत गंभीर मसलों पर सामान्य से लेकर गंभीर और कभी-कभी अति गंभीर टाइप की भी चिंता जताते रहते हैं। मामला चाहे बाढ़ का हो या अकाल का, महंगाई का हो या बेकारी का, दंगे का हो या आतंकवाद का, या फिर पड़ोसी देशों द्वारा हमारे देश में घुसपैठ का ही क्यों न हो… हमारे विशिष्टजन चिंता जताने में कोई कोताही नहीं बरतते। कई बार तो चिंता द्वारा घेरे जाने से पहले ही उसे जता देते हैं। हालांकि जनता टाइप लोगों को चिंता जताना पसंद नहीं आता। कई बार वे किसी विशिष्ट जन द्वारा चिंता जताए जाते ही चिढ़ जाते हैं। कहते हैं, ये तो पहले वाले भी कर रहे थे, फिर आपकी क्या ज़रूरत थी? असल में समझ ही नहीं पाते कि चिंता जताना अपने आपमें बहुत कुछ करना है। मेरी मानें तो आप भी इस पर अमल करें। यानी कोई चिंता आपको घेरे, इससे पहले ही उसे जता दें। क्योंकि चिंता से चतुराई घटे और आप जानते ही हैं, चतुराई घटने का आज के ज़माने में क्या नतीजा हो सकता है।

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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-3 (ओरछा)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 16, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन
रानी महल के झरोखे से चतुर्भुज मंदिर का दर्शन
व्यवस्था और अव्यवस्था

कालिदास का मेघदूत हम पर मेहरबान था। पूरे रास्ते मूसलाधार बारिश का मज़ा लेते दिन के साढ़े दस बजे हम ओरछा पहुंच गए थे। पर्यटन स्थल होने के नाते यह एक व्यवस्थित कस्बा है। टैक्सी स्टैंड के पास ही बाहर से आने वाले निजी वाहनों के लिए भी अलग से व्यवस्थित पार्किंग है। सड़क के दाईं ओर मंदिरों का समूह है और बाईं ओर महलों व अन्य पुरातात्विक भवनों का। मध्यकालीन स्थापत्य कला के जैसे नमूने यहां चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं, कहीं और मिलना मुश्किल है। सबसे पहले हम रामराजा मंदिर के दर्शन के लिए ही गए। एक बड़े परिसर में मौजूद यह मंदिर का$फी बड़ा और अत्यंत व्यवस्थित है। अनुशासन इस मंदिर का भी प्रशंसनीय है। कैमरा और मोबाइल लेकर जाना यहां भी मना है। दर्शन के बाद हम बाहर निकले और बगल में ही मौजूद एक और स्थापत्य के बारे में मालूम किया तो पता चला कि यह चतुर्भुज मंदिर है। तय हुआ कि इसका भी दर्शन करते ही चलें। यह वास्तव में पुरातत्व महत्व का भव्य मंदिर है। मंदिर के चारों तर$फ सुंदर झरोखे बने हैं और दीवारों पर आले व दीपदान। छत में जैसी नक्काशी की हुई है, वह आज के हिसाब से भी बेजोड़ है। यह अलग बात है कि रखरखाव इसका बेहद कमज़ोर है। इन दोनों मंदिरों के पीछे थोड़ी दूरी पर लक्ष्मीनारायण मंदिर दिखाई देता है। आसपास कुछ और मंदिर भी हैं। हमने यहां भी दर्शन किया।

चतुर्भुज मंदिर के बाईं तरफ़ है श्री रामराजा मंदिर

नीचे उतरे तो रामराजा मंदिर के दूसरे बाजू में हरदौल जी का बैठका दिखा। वर्गाकार घेरे में बना यह बैठका इस रियासत की समृद्धि की कहानी कहता सा लगता है। आंगन के बीच में एक शिवालय भी है। सावन का महीना होने के कारण यहां स्थानीय लोगों की का$फी भीड़ थी। इस पूरे क्षेत्र में अच्छा-ख़ासा बाज़ार भी है। यह सब देखते-सुनते हमें का$फी देर बीत गई। बाहर निकले तो 12 बज चुके थे। भोजन अनिवार्य हो गया था, लिहाजा रामराजा मंदिर के सामने ही एक ढाबे में भोजन किया।

जहांगीर महल
स्थापत्य के अनूठे नमूने

मंदिरों के ठीक सामने ही सड़क पार कर राजमहल थे। भोजन के बाद हम उधर निकल पड़े। मालूम हुआ कि यहां प्रति व्यक्ति दस रुपये का टिकट लगता है। कई विदेशी सैलानी भी वहां घूम रहे थे। इस किले के भीतर दो मंदिर हैं, एक संग्रहालय और एक तोपखाना भी। पीछे कई और छोटे-बड़े निर्माण हैं। अनुमान है कि ये बैरक, अधिकारियों के आवास या कार्यालय रहे होंगे। मुख्य महलों को छोड़कर बा$की सब ढह से गए हैं। सबसे पहले हम रानी महल देखने गए। मुख्यत: मध्यकालीन स्थापत्य वाले इस महल की सज्जा में प्राचीन कलाओं का प्रभाव भी सा$फ देखा जा सकता है।

जहांगीर महल के आंगन में बना हम्माम
इस महल में वैसे तो कई जगहों से चतुर्भुज मंदिर की स्पष्टï झलक मिल सकती है, पर एक ख़्ाास झरोखा ऐसा भी है जहां से चतुर्भुज मंदिर और रामराजा मंदिर दोनों के दर्शन किए जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी जगह से रानी स्वयं दोनों मंदिरों के दर्शन करती थीं। यह अलग बात है कि अब उस झरोखे वाली जगह पर भी कूड़े का ढेर लगा हुआ है। यह राजा मधुकर शाह की महारानी का आवास था, जो भगवान राम की अनन्य भक्त थीं और यहां स्थापित भगवान राम का मंदिर उनका ही बनवाया हुआ है। महल का आंगन भी बहुत बड़ा और भव्य है। बीचोबीच एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां रानी का दरबार लगता रहा होगा। जबकि राजमंदिर का निर्माण स्वयं राजा मधुकर शाह ने अपने शासनकाल 1554 से 1591 के बीच करवाया था।

इसके पीछे जहांगीर महल है। इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में मु$गल सम्राट जहांगीर के सम्मान में राजा बीर सिंह देव ने करवाया था। वर्गाकार विन्यास में बने इस महल के चारों कोनों पर बुर्ज बने हैं। जालियों के नीचे हाथियों और पक्षियों के अलंकरण बने हैं। ऊपर छोटे-छोटे कई गुंबदों की शृंखला बनी है और बीच में कुछ बड़े गुंबद भी हैं। हिंदू और मु$गल दोनों स्थापत्य कलाओं का असर इस पर सा$फ देखा जा सकता है और यही इसकी विशिष्टïता है। भीतर के कुछ कमरों में अभी भी सुंदर चित्रकारी देखी जा सकती है। कुल 136 कक्षों वाले इस महल के बीचोबीच एक बड़े से हौजनुमा निर्माण है। इसके चारों कोनों पर चार छोटे-छोटे कुएं जैसी अष्टकोणीय आकृतियां हैं। हालांकि इनकी गहराई बहुत मामूली है। अंदाजा है कि इसका निर्माण हम्माम के तौर पर कराया गया होगा।

जहांगीर महल से पीछे दिख रही बेतवा की ख़ूबसूरत घाटी

महल की छत से पीछे देखने पर पीछे मीलों तक फैली बेतवा नदी की घाटी दिखाई देती है। दूर तक फैली इस नीरव हरियाली के बीच कई छोटे-बड़े निर्माण और कुछ निर्माणों के ध्वंसावशेष भी थे। ध्यान से देखने पर बेतवा की निर्मल जलधारा भी क्षीण सी दिखाई दे रही थी। भीतर गाइड किसी विदेशी पर्यटक जोड़े को टूटी-फूटी अंग्रेजी में बता रहा था, ‘पुराने ज़माने महल के नीचे से एक सुरंग बनी थी, जो बेतवा के पार जाकर निकलती थी।’ आगे उसने बताया कि इस महल का निर्माण 22 साल में हुआ था और जहांगीर इसमें टिके सि$र्फ एक रात थे। राढ़ी जी गाइड के ज्ञान से ज्य़ादा उसके आत्मविश्वास पर दंग हो रहे थे।

ख़ैर, सच जो हो, पर ‘ओरछा’ का शाब्दिक अर्थ तो छिपी हुई जगह ही है। इसका इतिहास भी अद्भुत है। इसकी स्थापना टीकमगढ़ के बुंदेल राजा रुद्र प्रताप सिंह ने 1501 में की थी, पर असमय कालकवलित हो जाने के कारण वे निर्माण पूरा होते नहीं देख सके। एक गाय को बचाने के प्रयास में वे शेर के पंजों के शिकार हो गए थे। बाद में राजा बीर सिंह देव ने अपने 22 वर्षों के शासन काल में यहां के अधिकतर मनोरम निर्माण कराए। उन्होंने पूरे बुंदेल क्षेत्र में 52 किले बनवाए थे। दतिया का किला भी उनका ही बनवाया हुआ है। बाद में 17वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ही ओरछा के राजा मु$गल साम्राज्य से विद्रोह किया। फिर शाहजहां ने आक्रमण करके इस पर $कब्ज़ा कर लिया, जो 1635 से 1641 तक बना रहा। बाद में ओरछा राज्य को अपनी राजधानी टीकमगढ़ में करनी पड़ी।

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो…

महलों के बहाने कुछ देर तक अतीत में जीकर हम उबरे तो सीधे बेतवा की ओर चल पड़े। मुश्किल से 10 मिनट की पैदल यात्रा के बाद हम नदी के तट पर थे। महल की छत से दिखने वाली घाटी से भी कहीं ज्य़ादा सुंदर यह नदी है। नदी की अभी शांत दिख रही जलधारा के बीच-बीच में खड़े लाल पत्थर के टीलेनुमा द्वीप अपने शौर्य की कथा कह रहे थे या बेतवा के वेग से पराजय की दास्तान सुना रहे थे, यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था। यूं मुझे नाव चलाने का कोई अनुभव नहीं है, लेकिन इस पर नाव चलाना आसान काम नहीं होगा। पानी के तल के नीचे कहां पत्थर के टीलों में फंस जाए, कहा नहीं जा सकता। मैंने मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास ‘बेतवा बहती रहीÓ का जिक्र किया तो राढ़ी जी कालिदास के मेघदूत को याद करने लगे-

तेषां दिक्षु प्रथित विदिशा लक्षणां राजधानीं


गत्वा सद्य: फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा।


तीरोपांत स्तनित सुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात्

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि।।

कालिदास का प्रवासी यक्ष अपने संदेशवाहक मित्र मेघ को रास्ते की जानकारी देते हुए कहता है- हे मित्र! जब तू इस दशार्ण देश की राजधानी विदिशा में पहुंचेगा, तो तुझे वहां विलास की सब सामग्री मिल जाएगी। जब तू वहां सुहानी और मनभावनी नाचती हुई लहरों वाली वेत्रवती के तट पर गर्जन करके उसका मीठा जल पीएगा, तब तुझे ऐसा लगेगा कि मानो तू किसी कटीली भौहों वाली कामिनी के ओठों का रस पी रहा है।

बेतवा के घाट पर

बेतवा का ही पुराना नाम है ‘वेत्रवतीÓ और संस्कृत में ‘वेत्रÓ का अर्थ बेंत है। कालिदास का यह वर्णन किसी हद तक आज भी सही लगता है। प्रदूषण का दानव अभी बेतवा पर वैसा $कब्ज़ा नहीं जमा सका है, जैसा उसने अपने किनारे महानगर बसा चुकी नदियों पर जमा लिया है। इसके सौंदर्य की प्रशंसा बाणभट्टï ने भी कादंबरी में की है। वैसे वराह पुराण में इसी वेत्रवती को वरुण की पत्नी और राक्षस वेत्रासुर की मां बताया गया है। शायद इसीलिए इसमें दैवी और दानवीय दोनों शक्तियां समाहित हैं। गंगा, यमुना, मंदाकिनी आदि पवित्र नदियों की तरह बेतवा के तट पर भी रोज़ शाम को आरती होती है। लेकिन बेतवा की आरती में हिस्सेदारी हमारी नियति में नहीं था। क्योंकि हमें झांसी से ताज एक्सप्रेस पकडऩी थी, जो तीन बजे छूट जाती थी। मौसम पहले ही ख़्ाराब था। बूंदाबांदी अभी भी जारी थी। समय ज्य़ादा लग सकता था। लिहाजा डेढ़ बजते हमने ओरछा और बेतवा के सौंदर्य के प्रति अपना मोह बटोरा और चल पड़े वापसी के लिए टैक्सी की तलाश में।

                                                                      — इति–

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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-2 (सोनागिरि)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 14, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन



सोनागिरि पहाड़ी पर मंदिरों का विहंगम दृश्य



चल पड़े सोनागिरि

मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद यह तय नहीं हो पा रहा था कि आगे क्या किया जाए। तेज सिंह इसके निकट के ही कसबे टीकमगढ़ के रहने वाले हैं। उनकी इच्छा थी कि सभी मित्र यहां से दर्शनोपरांत झांसी चलें और ओरछा होते हुए एक रात उनके घर ठहरें। जबकि राढ़ी जी एक बार और मां पीतांबरा का दर्शन करना चाहते थे। मेरा मन था कि आसपास की और जगहें भी घूमी जाएं। क्योंकि मुझे विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार दतिया कसबे में ही दो किले हैं और संग्रहालय है। इसके अलावा यहां से 15 किमी दूर जैन धर्मस्थल सोनागिरि है। 17 किमी दूर उनाव में बालाजी नाम से प्रागैतिहासिक काल का सूर्य मंदिर, करीब इतनी ही दूर गुजर्रा में अशोक का शिलालेख, 10 किमी दूर बडोनी में गुप्तकालीन स्थापत्य के कई अवशेषों के अलावा बौद्ध एवं जैन मंदिर, भंडेर मार्ग पर 5 किमी दूर बॉटैनिकल गार्डन, 4 किमी दूर पंचम कवि की तोरिया में प्राचीन भैरव मंदिर और 8 किमी दूर उडनू की तोरिया में प्राचीन हनुमान मंदिर भी हैं। दतिया कसबे में ही दो मध्यकालीन महल हैं। एक सतखंडा और दूसरा राजगढ़। इनमें राजगढ़ पैलेस में एक संग्रहालय भी है। दतिया से 70 किमी दूर स्यौंधा है। सिंध नदी पर मौजूद वाटरफॉल के अलावा यह कन्हरगढ़ फोर्ट और नंदनंदन मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। 30 किमी दूर स्थित भंडेर में सोन तलैया, लक्ष्मण मंदिर और पुराना किला दर्शनीय हैं। महाभारत में इस जगह का वर्णन भांडकपुर के नाम से है। मैं दतिया के आसपास की ये सारी जगहें देखना चाहता था। समय कम था तो भी कुछ जगहें तो देखी ही जा सकती थीं। मंदिर में ही खड़े-खड़े देर तक विचार विमर्श होता रहा और आख़्िारकार यह तय पाया गया कि आज की रात दतिया में गुजारी जाए। हम सब तुरंत मंदिर के पीछे मेन रोड पर आ गए। वहीं एक होटल में कमरे बुक कराए और फ्रेश होने चल पड़े। फ्रेश होकर निकले तो मालूम हुआ कि तेज और तोमर जी अपने किसी रिश्तेदार से मिलने कस्बे में चले गए हैं। वे लोग आ जाएं तो हम घूमने निकलें। पर वे लोग आए $करीब दो घंटे इंतज़ार के बाद। फिर का$फी देर विचार विमर्श के बाद तय हुआ कि अब हमें सोनागिरि चलना चाहिए। आख़्िारकार दो सौ रुपये में एक टैंपो तय हुआ और हम सब सोनागिरि निकल पड़े।

दतिया से सोनागिरि के बीच एक नयनिभिराम दृश्य
अलौकिक अनुभूति
क़रीब 5 किमी ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने के बाद ग्वालियर हाइवे मिल गया। हालांकि यह मार्ग भी अभी बन ही रहा था, पर फिर भी शानदार था। दृश्य पूरे रास्ते ऐसे ख़ूबसूरत कि जिधर देखने लगें उधर से आंखें किसी और तर$फ घुमाते न बनें। दूर तक पठार की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर फैली हरियाली और ऊपर धरती की ओर झुकते बादलों से भरे आसमान में अस्ताचल की ओर बढ़ते सूरज की लालिमा। किसी को भी अभिभूत कर देने के लिए यह सौंदर्य काफ़ी था। थोड़ी देर बाद सड़क छोड़कर हम फिर लिंक रोड पर आ गए थे। हरे-भरे खेतों के बीच कहीं-कहीं बड़े टीलेनुमा ऊंचे पहाड़ दिख जाते थे और वे भी हरियाली से भरे हुए। हर तरफ़ फैला हरियाली का यह साम्राज्य शायद सावन का कुसूर था।

दूर से ही सोनागिरि पहाड़ी पर मंदिरों का समूह दिखा तो हमारे सुखद आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। पहाड़ी पर रंग-बिरंगी हरियाली के बीच श्वेत मंदिरों का समूह देख ऐसा लगा, गोया हम किसी दूसरी ही दुनिया में आ गए हों। साथ के सभी लोग कह उठे कि आज यहां ठहरना वसूल हो गया। मालूम हुआ कि इस पहाड़ी पर कुल 82 मंदिर हैं और नीचे गांव में 26। इस तरह कुल मिलाकर यहां 108 मंदिरों का पूरा समूह है।


सोनागिरि में श्री नंदीश्वर द्वीप के समक्ष एन प्रकाश, तेज सिंह और अजय तोमर. पीछे खड़े हैं हरिशंकर राढ़ी

 यह जैन धर्म की दिगम्बर शाखा के लोगों के बीच अत्यंत पवित्र धर्मस्थल के रूप में मान्य है। यहां मुख्य मंदिर में भगवान चंद्रप्रभु की 11 फुट ऊंची प्रतिमा प्रतिष्ठित है। भगवान शीतलनाथ और पाश्र्वनाथ की प्रतिमाएं भी यहां प्रतिष्ठित हैं। श्रमणाचल पर्वत पर स्थित इस स्थान से ही राजा नंगानंग कुमार ने मोक्ष प्राप्त किया था। इनके अलावा नंग, अनंग, चिंतागति, पूरनचंद, अशोकसेन, श्रीदत्त तथा कई अन्य संतों को यहीं से मोक्ष की उपलब्धि हुई। $करीब 132 एकड़ क्षेत्रफल में फैली दो पहाडिय़ों वाले इस क्षेत्र को लघु सम्मेद शिखर भी कहते हैं। यहीं बीच में एक नंदीश्वर द्वीप नामक मंदिर भी है, इसमें कई जैन मुनियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इन पहाडिय़ों पर हम $करीब दो घंटे तक घूमते रहे। आते-जाते श्रद्धालुओं के बीच नीरवता तोडऩे के लिए यहां सि$र्फ मयूरों तथा कुछ अन्य पक्षियों का कलरव था। इन पहाडिय़ों पर मोर जिस स्वच्छंदता के साथ विचरण कर रहे थे, वह उनकी निर्भयता की कहानी कह रहा था। सुंदरता के साथ शांति का जैसा मेल यहां है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इहलोक में ही अलौकिक अनुभूति देते इस दिव्य वातावरण को छोड़ कर आने का मन तो नहीं था, पर हमें वापस होटल पहुंचना भी था। क्योंकि अगले दिन बिलकुल सुबह ही ओरछा के लिए निकलना था।

आप चाहें तो इसे दतिया की नाइटलाइफ कह सकते हैं

एक बार फिर दर्शन

रात में क़रीब साढ़े सात बजे हम दतिया पहुंच गए थे। लौटते समय जिस रास्ते से टैक्सी वाले हमें ले आए, वह रास्ता शहर के भीतर से होते हुए आता था। गलियों में व्यस्त यहां के जनजीवन का नज़ारा लेते हम होटल पहुंचे। कई जगह निर्माण चल रहे थे और शायद इसीलिए जि़ंदगी का$फी अस्त-व्यस्त दिखाई दे रही थी। होटल से तुरंत हम फिर पीतांबरा मंदिर निकल गए। रात की मुख्य आरती 8 बजे शुरू होती है। उसमें शामिल होने के बाद काफी देर तक मंदिर परिसर में ही घूमते रहे। इस समय भीड़ बहुत बढ़ गई थी। मंदिर से लौटते समय तय किया गया कि खाना बाहर ही खाएंगे। हालांकि बाहर भोजन बढिय़ा मिला नहीं। बहरहाल, रात दस बजे तक होटल लौट कर हम सो गए।

सुबह उठते ही मैं सबसे पहले कैमरा होटल की छत पर गया। पीछे राजगढ़ किले का दृश्य था और आगे दूर तक फैला पूरे शहर का विहंगम नज़ारा। इसे कैमरे में $कैद कर मैं नीचे उतरा और तैयारी में जुट गया। साढ़े सात बजे तक दतिया शहर छोड़ कर झांसी के रास्ते पर थे। झांसी पहुंच कर तेज सिंह ने न तो ख़ुद कुछ खाया और न हमें खाने दिया। उनका इरादा यह था कि सबसे पहले ओरछा में रामराजा के दर्शन करेंगे। इसके बाद ही कुछ खाएंगे। ख़्ौर, ओरछा के लिए झांसी बस स्टैंड से ही टैक्सी मिल गई।
जारी……….

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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 12, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन
हम दतिया पहुंचे तो दिन के करीब सवा बज चुके थे। ट्रेन बिलकुल सही समय से थी, लेकिन भूख से हालत खराब होने लगी थी। चूंकि सुबह पांच बजे ही घर से निकले थे। चाय के अलावा और कुछ भी नहीं ले सके थे। ट्रेन में भी सिर्फ एक कप चाय ही पी। उतर कर चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो लंबे प्लैटफॉर्म वाले इस छोटे स्टेशन पर सिर्फ़ ताज एक्सप्रेस से उतरा समूह ही दिख रहा था। जहां हम उतरे उस प्लैटफॉर्म के बिलकुल बगल में ही टैंपुओं का झुंड खड़ा था। इनमें प्राय: सभी पीतांबरा पीठ की ओर ही जा रहे थे। तेज सिंह ने एक टैंपू ख़ाली देखकर उससे पूछा तो मालूम हुआ कि सि$र्फ पांच सवारियां लेकर नहीं जाएगा। पूरे 11 होंगे तब चलेगा। तय हुआ कि कोई दूसरी देखेंगे। पर जब तक दूसरी देखते वह भर कर चल चुका था। अब उस पर भी हमें इधर-उधर लटक कर ही जाना पड़ता। बाद में जितने टैंपुओं की ओर हम लपके सब फटाफट भरते और निकलते गए। क़रीब बीस मिनट इंतज़ार के बाद आख़िर एक टैंपू मिला और लगभग आधे घंटे में हम पीतांबरा पीठ पहुंच गए।
दतिया का महल
वैसे स्टेशन से पीठ की दूरी कोई ज्य़ादा नहीं, केवल तीन किलोमीटर है। यह रास्ते की हालत और कस्बे में ट्रैफिक की तरतीब का कमाल था जो आधे घंटे में यह दूरी तय करके भी हम टैंपू वाले को धन्यवाद दे रहे थे। टैंपू ने हमें मंदिर के प्रवेशद्वार पर ही छोड़ा था, लिहाजा तय पाया गया कि दर्शन कर लें, इसके बाद ही कुछ और किया जाएगा। फटाफट प्रसाद लिए, स्टैंड पर जूते जमा कराए और अंदर चल पड़े। दोपहर का वक्त होने के कारण भीड़ नहीं थी। मां का दरबार खुला था और हमें दिव्य दर्शन भी बड़ी आसानी तथा पूरे इत्मीनान के साथ हो गया। अद्भुत अनुभूति हो रही थी।
वल्गा से बगला

इस पीठ की चर्चा पहली बार मैंने $करीब डेढ़ दशक पहले सुनी थी। गोरखपुर में उन दिनों आकाशवाणी के अधीक्षण अभियंता थे डॉ. शिवमंदिर प्रधान। उनके ससुर इस मंदिर के संस्थापक स्वामी जी के शिष्य थे। डॉ. उदयभानु मिश्र और अशोक पाण्डेय ने मुझे इस पीठ और बगलामुखी माता के बारे में का$फी कुछ बताया था। हालांकि जो कुछ मैंने समझा था उससे मेरे मन में माता के प्रति आस्था कम और भय ज्य़ादा उत्पन्न हुआ था। इसकी वजह मेरी अपनी अपरिपक्वता थी। बाद में मालूम हुआ कि ‘बगला’ का अर्थ ‘बगुला’ नहीं, बल्कि यह संस्कृत शब्द ‘वल्गा’ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ ‘दुलहन’ होता है। उन्हें यह नाम उनके अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण दिया गया। पीतवसना होने के कारण इन्हें पीतांबरा भी कहा जाता है।

स्थानीय लोकविश्वास है कि दस महाविद्याओं में आठवीं मां बगलामुखी की यहां स्थापित प्रतिमा स्वयंभू है। पौराणिक कथा है कि सतयुग में आए एक भीषण तू$फान से जब समस्त जगत का विनाश होने लगा तो भगवान विष्णु ने तप करके महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया। तब सौराष्टï्र क्षेत्र (गुजरात का एक क्षेत्र) की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीत देवी के हृदय से दिव्य तेज निकला। उस तेज के चारों दिशाओं में फैलने से तू$फान का अंत हो गया। इस तरह तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं और गृहस्थों के लिए यह समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं। मंदिर में स्थापित प्रतिमा का ही सौंदर्य ऐसा अनन्य है कि जो देखे, बस देखता रह जाए।

अनुशासन हर तरफमुख्य मंदिर के भवन में ही एक लंबा बरामदा है, जहां कई साधक बैठे जप-अनुष्ठान में लगे हुए थे। सामने हरिद्रा सरोवर है। बगल में मौजूद एक और भवन के बाहरी हिस्से में ही भगवान परशुराम, हनुमान जी, कालभैरव तथा कुछ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। इस मंदिर के अंदर जाते ही सबसे पहले पुस्तकों की एक दुकान और फिर शिवालय है। यहां मैंने पहला ऐसा शिवालय देखा, जहां शिव पंचायतन में स्थापित श्रीगणेश, मां पार्वती, भगवान कार्तिकेय एवं नंदीश्वर सभी छोटे-छोटे मंदिरनुमा खांचों में प्रतिष्ठित हैं। अकेले शिवलिंग ही हैं, जो यहां भी हमेशा की तरह अनिकेत हैं। वस्तुत: यह तंत्र मार्ग का षडाम्नाय शिवालय है, जो बहुत कम ही जगहों पर है। इस भवन के पीछे एक छोटे भवन में सातवीं महाविद्या मां धूमावती का मंदिर है। यहां इनका दर्शन सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए निषिद्ध है। महाविद्या धूमावती की प्रतिमा की प्रतिष्ठा महाराज जी ने यहां भारत-चीन युद्ध के बाद कराई थी। असल में उस समय स्वामी जी के नेतृत्व में यहां राष्ट्ररक्षा अनुष्ठान यज्ञ किया गया था।



दतिया कसबे का एक विगंगम दृश्य



बाईं तरफ एक अन्य भवन में प्रतिष्ठित हनुमान जी की प्रतिमा का दर्शन दूर से तो सभी लोग कर सकते हैं, लेकिन निकट केवल वही जा सकते हैं जिन्होंने धोती धारण की हुई हो। यह नियम बगलामुखी माता के मंदिर भवन में प्रवेश के लिए भी है। पैंट, पजामा या सलवार-कुर्ता आदि पहने होने पर सि$र्फ बाहर से ही दर्शन किया जा सकता है। भवन के अंदर सि$र्फ वही लोग प्रवेश कर सकते हैं, जिन्होंने धोती या साड़ी पहनी हो। कैमरा आदि लेकर अंदर जाना सख्त मना है। मंदिर में अनुशासन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि न तो यहां कहीं गंदगी दिखती है और न हर जगह चढ़ावा चढ़ाया जा सकता है। तंत्रपीठ होने के कारण अनुशासन बहुत कड़ा है। पूजा-पाठ के नाम पर ठगी करने वालों का यहां कोई नामो-निशान भी नहीं है।
संस्कृत और संगीत की परंपरा

मुख्य मंदिर के सामने हरिद्रा सरोवर है और पीछे मंदिर कार्यालय एवं कुछ अन्य भवन। इन भवनों में ही संस्कृत ग्रंथालय है और पाठशाला भी। मालूम हुआ कि पीठ संस्थापक स्वामी जी महाराज संस्कृत भाषा-साहित्य तथा शास्त्रीय संगीत के अनन्य प्रेमी थे। हालांकि स्वामी जी की पृष्ठभूमि के बारे में यहां किसी को कोई जानकारी नहीं है। लोग केवल इतना जानते हैं कि सन 1920 में उन्होंने देवी की प्रेरणा से ही यहां इस आश्रम की स्थापना की थी। फिर उनकी देखरेख में ही यहां सारा विकास हुआ। शास्त्रीय संगीत की कई बड़ी हस्तियां स्वामी जी के ही कारण यहां आ चुकी हैं और इनमें कई उनके शिष्य भी हैं।

मां बगलामुखी के दर्शन की वर्षों से लंबित मेरी अभिलाषा आनन-फानन ही पूरी हुई। हुआ कि मंगल की शाम हरिशंकर राढ़ी से फोन पर बात हुई। उन्होंने कहा, ‘हम लोग दतिया और ओरछा जा रहे हैं। अगर आप भी चलते तो मज़ा आ जाता।’ पहले तो मुझे संशय हुआ, पर जब पता चला कि केवल दो दिन में सारी जगहें घूम कर लौटा जा सकता है और ख़र्च भी कुछ ख़ास नहीं है तो अगले दिन सबका रिज़र्वेशन मैंने ख़ुद ही करवा दिया। राढ़ी के साथ मैं, तेज सिंह, अजय तोमर और एन. प्रकाश भी।  

ज़ारी……..

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रामेश्वरम : जहाँ राम ने की शक्तिपूजा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 5, 2011

हरिशंकर राढ़ी
(रामेश्वरम और दक्षिण भारत की यात्रा के लगभग दो साल पूरे होने वाले हैं . तबसे कई  यात्राएं और हुई  पर यह यात्रा विवरण अधूरा ही रह गया . इसे पूरा करने का एक और प्रयास …)
बाईस कुंडों का स्नान पूरा हुआ तो लगा कि एक बड़ा कार्य हो गया है। परेशानी जितनी भी हो घूम-घूम कर नहाने में, परन्तु कुल मिलाकर यहाँ अच्छा लगता है। परेशानी तो क्या , सच पूछा जाए तो इसमें भी एक आनन्द है। अन्तर केवल दृष्टिकोण  का है। आप वहाँ घूमने गए हैं तो वहाँ की परम्पराओं का पालन कीजिए और इस प्रकार उसे समझने का प्रयास भी।

स्नानोपरांत हम वापस अपने होटल आए और वस्त्र बदले । गीले वस्त्रों में दर्शन  निषिद्ध  है। अब हम मुख्य गोपुरम से दर्शनार्थ  मंदिर में प्रवेश  कर गए। एक जगह लिखा था- स्पेशल दर्शन । हमें  लगा कि यह कोई वीआईपी व्यवस्था या लाइन होगी । ज्यादा पूछताछ नहीं क्योंकि भाषा  की समस्या तो थी ही। न तो ठीक से हिन्दी जानने वाले और न अंगरेजी ही। तमिल से हमारा कोई दूर-दूर का रिश्ता नहीं ! वैसे भी मेरा मत यह रहता है कि मंदिर में दर्शन  लाइन में लगकर ही करना चाहिए।

खैर , लाइन में लगे- लगे बिल्कुल  आगे पहूँचे तो पता चला कि हमारा प्रसाद, फूल और हरिद्वार से लाया गया गंगाजल तो यहाँ से चढ़ेगा ही नहीं।  यह सामान्य लाइन है और यहाँ से आप केवल शिवलिंग के दर्शन कर सकते हैं। दर्शन तो हमने खूब किया था क्योंकि गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग पंक्ति में दूर से ही होने लग जाता है। अब प्रश्न  यह था कि हम अपना अर्घ्य, नैवेद्य आदि किस प्रकार अर्पित करें ? इस लाइन में तो अनावष्यक ही हमारा समय खराब हो गया । फिर भी राम द्वारा स्थापित शिव  की इस नगरी में आना एक लम्बी प्रतीक्षा के बाद हुआ था और सारे कार्य पूर्ण करके ही जाना था। अतः मैंने मित्र महोदय से आग्रह किया कि हम स्पेशल दर्शन की पंक्ति में पुनः लगें , गंगाजल अर्पित करें और पूजा करवा के ही चलें । अब दुबारा आना फिर न जाने कब हो। गोस्वामी तुलसी दास जी ने रामचरित मानस में इस ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में श्रीराम के मुख से कहलाया है-
रामनाथ मंदिर गोपुरम ( चित्र गूगल से साभार )
       जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं । ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ।।

       जो  गंगाजल आनि चढ़ाइहि । सो साजुज्य  मुक्ति  नर  पाइहि ।।

मैं यहाँ इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि इस कथन में कितना सत्य है और कितना नहीं। मैं इस पर भी कोई निर्णय नहीं देना चाहता कि मैं धार्मिक हूँ,इश्वरवादी  हूँ या अनीश्वरवादी । पर हाँ , इतना तो तय है कि मैं अन्ध विश्वासी  या पोंगापंथी नहीं हूँ। यह भी सत्य है कि आस्था और विश्वाश  विज्ञान की कसौटी पर कसा नहीं जा सकता। कुछ भी न हो , आत्मिक शान्ति  के लिए कुछ चीजों को बिना तर्क ही मान लेना बुरा नहीं होता , विषेशतः जब कोई हानि न हो रही हो। अंततः हम इस बार पूरी जानकारी लेकर स्पेशलदर्शन की लाइन में लगे। वस्तुतः इस लाइन में लगने के लिए प्रति व्यक्ति पचास रुपये का टिकट लेना पड़ता है। हमलोग कुल आठ प्राणी थे और इस प्रकार चार सौ रुपये का टिकट लेकर आगे बढ़े। यहाँ कोई भीड़ नहीं थी और दर्शनार्थियों  को समूह में अन्दर लिया जाता है। उनसे सामान्य पूजा करवाई जाती है और प्रसाद वगैरह चढ़वाया जाता है।

हमारा भी क्रम आया । रामेश्वरम  ज्योतिर्लिंग मेंदर्शनार्थियों को गर्भगृह में जाने की अनुमति नहीं है। ऐसी अनुमति दक्षिण भारत के किसी भी मंदिर में नहीं है। अब पूजा तो हो गई और पुजारियों ने हमारी गंगाजल की बोतल भी ले ली,किन्तु इसके पहले यह छानबीन जरूर की कि हमने कुल कितने टिकट लिए हैं। मेरे परिवार की चार टिकटें देखकर उन्होंने हमारा गंगाजल स्वीकार कर लिया और उसे अपने पात्र में डालकर शिवलिंग पर समर्पित भी कर दिया ( यह या तो उनकी भूल थी या फिर सदाशयता ) किन्तु मेरे मित्र का गंगाजल उन्होंने स्वीकार नहीं किया । दरअसल वहाँ गंगाजल के लिए पचास रुपये का टिकट अलग से लेना पड़ता है और इस सम्बन्ध में भी जानकारी के अभाव में हमसे भूल हो गई थी । अगर आपका कोई कार्यक्रम रामेश्वर  दर्शन का बनता है तो कृपया विशेष   दर्शन  और चढ़ावे का शुल्क  अलग से जमा कराकर रसीद ले लें।
दर्शनोपरांत हमारा ध्यान मंदिर की भव्यता पर गया और हम अवलोकन करने लगे । इसके वास्तु का जितना भी वैज्ञानिक विश्लेषण कर दिया जाए, इसकी शैली एवं विशालता की जितनी भी प्रशंसा कर दी जाए, पर इसको निहारने के अलौकिक आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता है। इसके विशाल गलियारे, मजबूत स्तंभ और किसी किले जैसी दीवारें भारतीय संस्कृति के गौरव की गाथा स्वयं कहती हैं।मंदिर लगभग पंद्रह एकड़ क्षेत्र में फैला है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता  इसके गलियारे हैं जो लगभग चार हजार फीट लंबे हैं और चार हजार खंभों पर खड़े हैं । मंदिर का पूरबी गोपुरम 126फीट ऊँचा है और कुल नौ माले का बना है। पश्चिमी  गोपुरम भी अत्यन्त शानदार  है किन्तु इसकी ऊँचाई पूरबी गोपुरम से कम है।

मुझे लगा कि इस मंदिर का भव्य होना तो नितान्त आवश्यक ही है। यह वो जगह है जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने आवश्यकता पड़ने पर शक्तिपूजा की थी । अपने समय के महाशक्तिशाली राजा रावण को परास्त करने के लिए उन्हें भी अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता थी । शिव तो कल्याणकारी, अपराजेय और औघड़ हैं ही, किन्तु मुझे लगता है कि राम की शिवपूजा राजनैतिक महत्त्व भी रखती है। आखिर राक्षसराज रावण किसकी शक्ति से इतना प्रभावशाली बन पाया? किस शक्ति ने उसे अजेय बना दिया और वह लगभग विश्वविजयी बन पाया! वह शक्ति तो शिव की ही थी! अतः इसमें राम की श्रद्धा के साथ एक कुशल राजनीति भी थी कि रावण को उसी के अस्त्र, उसी की शक्ति से मारा जाए। उसके ऊपर से शिव का वरदहस्त हटाया जाए और जब शिव ही साथ नहीं तो शिव होगा कैसे? अतः राम ने अपने सद्गुणों से, अपनी श्रद्धा से और अपनी विनम्रता से सर्वप्रथम शिव की पूजा की और अपना मार्ग प्रशस्त कर विजय अभियान पर चल दिए।

यह वही स्थल है जहाँ राम ने शक्तिपूजा की ।

ऐसा कहा जाता है कि बारहवीं षताब्दी तक शिवलिंग एक झोंपड़ी में स्थापित था। पहली बार इसके लिए पक्की इमारत श्रीलंका के पराक्रम बाहु द्वारा बनवाई गई। तदनन्तर इसे रामनाथपुरम के सेतुपर्थी राजाओं ने पूरा किया। मंदिर के कुछ विमान पल्लव राजाओं के काल में निर्मित विमान से साम्य रखते हैं। गलियारों का निर्माण कार्य अट्ठारहवीं शताब्दी  तक चलता रहा है। त्रावणकोर और मैसूर के राजाओं से मंदिर को प्रभूत आर्थिक सहायता मिलती रही है।

जैसा कि हमारे यहाँ प्रायः होता है,रामेश्वरम  या रामनाथ लिंगम से सम्बन्धित कुछ अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार जब रावण का वध करके सीता सहित श्रीराम अयोध्या वापस आ रहे थे तो उन्होंने यहाँ शिव पूजा का मन बनया और उनका आभार प्रकट करना चाहा। वैसे भी वे सीताजी को अयोध्या वापसी तक अनेक महत्त्वपूर्ण स्थानों को दिखाते आए थे। गंधमादन पर्वत के पास उतरकर उन्होंने शिवपूजा की इच्छा प्रकट तो  शिव की प्रिय नगरी वाराणसी से शिवलिंग लाने का कार्य पवनपुत्र हनुमान को सौंपा गया।( एक कथा के अनुसार हनुमान जी को शिवलिंग कैलास पर्वत से लाना था।) जब तक हनुमान जी वाराणसी से शिवलिंग लेकर आते , पूजा का मुहूर्त निकला जा रहा था। अस्तु सीता जी ने रेत का शिवलिंग बना दिया और उसी की पूजा की गई। कुछ समय पश्चात  जब हनुमान जी वाराणसी से दूसरा शिवलिंग लेकर वापस आए तो समस्या हुई कि इसका क्या किया जाए। अन्ततः उस शिवलिंग की भी स्थापना कर दी गई और वह आज भी विश्वेश्वर , विश्वनाथ  , काशीलिंगम या हनुमान लिंगम के नाम से सुपूजित है और नियमानुसार इस लिंग की पूजा सर्वप्रथम होती है।
गंध मादन पर लेखक सपरिवार  (छाया : लेखक )

मंदिर के तीर्थ-  मंदिर के अन्दर स्थित बाइस कुंड अपने आप में तीर्थ हैं। इनका प्रभाव अलौकिक माना जाता है । समासतः इनके प्रभाव एवं नाम का उल्लेख इस प्रकार है-
1 -महालक्ष्मी तीर्थ( यहाँ कुबेर ने स्नान करके नवनिधियाँ प्राप्त कीं ),2- सावित्री तीर्थ,  3-गायत्री तीर्थ, 4- सरस्वती तीर्थ, 5- माधवतीर्थ,6- गंधमादन 7-कलाक्ष, 8-कलाय,9-नलतीर्थ, 10-नीलतीर्थ,11 – चक्रतीर्थ,12-शंखतीर्थ, 13-ब्रह्महत्या विमोचन तीर्थ ,14-सूर्यतीर्थ, 15- चन्द्रतीर्थ,16- गंग तीर्थ ,17-जमुना तीर्थ, 18- गयातीर्थ (त्चचा रोगों से मुक्ति का विश्वास ),19-साध्यामृत तीर्थ, 20- सर्वतीर्थ (इसे शंकराचार्य ने बनवाया है और इसमें स्नान से समस्त नदियों में स्नान का पुण्य मिलता है।), 21- शिवतीर्थ , 22- कोटि तीर्थ (इसे श्रीराम ने शिवाभिशेक के लिए अपने धनुष  से खोदकर बनाया था।)
यहाँ भी अन्य पर्यटन स्थलों की भांति अनेक छोटे-बड़े दर्शनीय  स्थान हैं जिनमें कुछ ऐतिहासिक और पौराणिक  महत्त्व के हैं। पूजा अर्चना और भोजन के उपरान्त हम लोगों ने इन स्थलों के भ्रमण का कार्यक्रम रखा। सहायता के लिए थ्रीव्हीलर वाले मिल गए। रामेष्वरम की सीमा में स्थित सात-आठ स्थलों को घुमालाने के लिए एक ऑटो ने डेढ़ सौ रुपये लिया। दो परिवार , दो ऑटो । इसी में गाइड की भूमिका निःशुल्क  शामिल  थी। ( मेरे मित्र ने यात्रा व्यय का पूरा लेखा-जोखा बड़ी कुषलता से बना रखा था। इस मामले में उनका कोई जवाब नहीं। सारे खर्चे एक साथ, एक परिवार सा और बाद में हिसाब का आधा-आधा। यह वृतान्त लिखने से पूर्व रामेष्वरम दर्षन की पुस्तक में वह व्यय विवरणी मिल गयी, इसलिए किराए की जानकारी पक्की समझें। मैंने सूची को अभी संभाल रखा है – यादें ताजी हो जाती हैं।) यात्रा क्रमशः  जारी ……

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मकरन्द छोड़ जाऊँगा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 14, 2011

-हरि शंकर राढ़ी

जहाँ भी जाऊँगा, मकरन्द छोड़ जाऊँगा।
हवा में प्यार की इक गन्ध छोड़ जाऊँगा।
करोगे याद मुझे दर्द में , खुशी भी
निभा के उम्र भर सम्बन्ध छोड़ जाऊँगा।
तुम्हारी जीत मेरी हार पर करे सिजदे
निसार होने का आनन्द छोड़ जाऊँगा।
मिलेंगे जिस्म मगर रूह का गुमाँ होगा
नंशे में डूबी पलक बन्द छोड़ जाऊँगा।
बगैर गुनगनाए तुम न सुकूँ पाओगे
तुम्हारे दिल पे लिखे छन्द छोड़ जाऊँगा।
जमीन आसमान कायनात छोटे कर
बड़े जिगर में किसी बन्द छोड़ जाऊँगा।
बिछड़ के भी न जुदा हो सकोगे ‘राढ़ी’ से
तुम्हारे रूप की सौगन्ध छोड़ जाऊँगा।

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कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 31, 2011

कितनी बार हुई हैं
जाने ये बातें

आने-जाने वाली.
विनिमय के
व्यवहारों में कुछ
खोने-पाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

जल ज़मीन जंगल
का बटना.
हाथों में
सूरज-मंगल
का अटना.
बांधी जाए
प्यार से जिसमें
सारी दुनिया
ऐसी इक
रस्सी का बटना.

सभी दायरे
तोड़-फोड़ कर
जो सबको छाया दे-
बिन लागत की कोशिश
इक ऐसा छप्पर छाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

हर संसाधन पर
कुछ
घर हैं काबिज.
बाक़ी आबादी
केवल
संकट से आजिज.
धरती के
हर टुकड़े का सच
वे ही लूट रहे हैं
जिन्हें बनाया हाफ़िज.

है तो हक़ हर हाथ में
लेकिन केवल ठप्पे भर
लोकतंत्र की शर्तें
सबके मन भरमाने वाली.
इसीलिए, कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

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एक साहब बयानबहादुर और एक सपोर्टबहादुर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 7, 2011

हाल ही में ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद अमेरिका ने दुनिया के सबसे शांतिप्रिय देश पाकिस्तान को धमकी दी कि ज़रूरत पड़ी तो वह पर फिर से ऐसी ही कार्रवाई कर सकता है. इसके बाद तो क्या कहने! कितना भी शांतिप्रिय हो, लेकिन कोई धमकी देगा तो कोई भी क्या करेगा. बहादुरी के मामले में पाकिस्तान का तो वैसे भी कोई जवाब नहीं रहा है. इतिहास गवाह है कि आमने-सामने की लड़ाई में वह कभी किसी से जीता नहीं है और छिपकर हमला करने का कोई मौक़ा उसने छोड़ा नहीं है. आप जानते ही हैं कि सामने आ जाए तो चूहे से आंख मिलाना वे अपनी तहजीब के ख़िलाफ़ समझते हैं और दूर निकल गए शेर पर तो पीछे से ऐसे गुर्राते हैं कि जर्मन शेफर्ड भी शर्मा जाए. तो अब जब अमेरिका उनके मिलिटरी बेस के दायरे में ही ओसामा जी की ज़िंदगी और विश्व समुदाय में उनकी इज़्ज़त की ऐसी-तैसी करके निकल गया तो वो गुर्राए हैं. यह संयोग ही है कि ओबेडिएंसी में टॉप भारत की आर्मी के प्रमुख ने भी ऐन मौक़े पर एक सही, लेकिन मार्मिक बयान दे दिया. वह भी बिना अपने हाइनेस से पूछे और इस बात का भी ज़िक्र किए बग़ैर कि ‘अगर उनकी इजाज़त हो तो’. यह जानते हुए भी कि उनकी इजाज़त के बग़ैर वे कुछ नहीं कर सकते और हाइनेस सिवा सैनिकों की बेकीमती गर्दनें कटाने के उन्हें किसी और बात की इजाज़त नहीं दे सकते. आख़िर हमें घाटी से लेकर पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति और दुनिया भर में अपनी शांतिप्रियता की यह छवि बनाए रखनी है भाई! इतनी आसान बात थोड़े ही है.

ख़ैर, हमारे बयानबहादुर तो अपना बयान दे ही चुके. अब उन्होंने अपने बयान बहादुर को काम पर लगाया है. ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद घंटों चली बैठक के कई घंटे बाद तक उनके आका लोगों की तरफ़ से कोई बयान नहीं आ पाया था. ऐसे क्रूशियल मौक़े पर जिन बयानबहादुर को वहां बयान देने के महान काम पर लगाया गया था, अब उन्हीं का नया बयान आया है. यह बयान थोड़ा अमेरिका और ज़्यादा भारत के मुतल्लिक है. उन्होंने अमेरिका की कार्रवाई को तो अहम कामयाबी बताया है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि अगर किसी दूसरे देश ने ऐसी ज़ुर्रत की तो यह उसकी बड़ी भूल होगी.

क्या बताएं हमें तो अपने उनके बयानबहादुर साहब की बात सुनकर वह वाक़या याद आ गया, जब ट्रेन में सफ़र कर रहे एक सज्जन के बर्थ पर कोई दूसरे सज्जन आ कर बैठ गए. पहले ने दूसरे सज्जन को हटने के लिए कहा तो उन्होंने झापड़ मार दिया. पहले को ग़ुस्सा आ गया. उन्होंने कहा कि ठीक है, हमको मारा तो मारा, हमारी बीवी को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, उन्होंने बीवी को भी मार दिया. उसके बाद उन्होंने कहा कि बीवी को मारा तो मारा, बेटे को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, दूसरे सज्जन ने बेटे को भी मार दिया. बात जमी नहीं, उन्होंने फिर कहा, बेटे को मारा तो मारा, अब बेटी को मार के दिखाओ तो जानें. आख़िरकार दूसरे सज्जन ने बेटी को भी मारने के बाद पूछा, ‘अब बताओ.’ दूसरे सज्जन ने पूरी सज्जनता के साथ कहा, ‘जी अब कुछ नहीं, अब कोई ये कहने लायक तो नहीं रहेगा कि तुम मार खाया.’

मुझे तो लगता है कि इन बयानबहादुर साहब का इरादा भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो. क्योंकि उनके अपने ही पाले हुए ओसामा जी जैसे कई शांतिदूत अब उनके काबू से बाहर हो गए हैं. क्या पता उन्होंने जो बात कही हो, वो उन्हीं के लिए कही हो. कई बार आदमी कहता कुछ और है, लेकिन उसका असल आशय कुछ और होता है. मसलन – कमज़ोर आदमी को जब किसी से मदद मांगनी होती है तो कहता है, ‘प्लीज़ मेरी मदद करें’. बहादुर लोग इसे तहजीब के ख़िलाफ़ मानते हैं. वे यही बात इस तरह कहते हैं, ‘है कोई माई का लाल जो मेरे साथ दो क़दम चलकर दिखाए.’ क्या पता कि उनका मामला भी कुछ ऐसा ही हो.

वैसे भी उनके लिए यह एक मुश्किल दौर है. वैसे वीरोचित शब्दों का प्रयोग करें तो शायद कहना पड़े कि दौर-ए-फ़ख़्र है. बिरादरी के नाम पर जो लोग हर साल इन्हें ईदी भेजा करते थे, उन्होंने अब ग़ुलाम कश्मीर के पीएम साहब को नत्थी वीजा जारी करना शुरू कर दिया है. पता नहीं इसका क्या मतलब होता है. हो न हो, उनकी समझ में आ गया हो कि अब ये दुनिया भर की नज़र में शांति के सबसे बड़े दूत हो गए हैं तो इनसे नत्थी टाइप संबंध रखना ही ज़्यादा मुनासिब है. पर भाई उनकी हिम्मत की दाद तो देनी पड़ेगी. क्या पता, इस हिम्मत के मूल में हमारे उत्तर वाले पड़ोसी का सपोर्ट हो. इस दौर में एक उन्होंने ही तो इनका साथ दिया. अरे वही जिनकी मिसाल शांति और भरोसे के मामले में दुनिया भर में दी जाती है और जिनके बनाए इलेक्ट्रॉनिक आइटम उनके कूटनीतिक वादों-संकल्पों से कई गुना ज़्यादा टिकाऊ समझे जाते हैं.

बहरहाल, हमारे पश्चिम वाले पड़ोसी मुल्क और उनके बयानबहादुर को हमारे उत्तर उत्तर वाले पड़ोसी मुल्क और उनकी सपोर्ट बहादुरी पर पूरा भरोसा है. हम तो उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना अब से कोई 49 साल पहले देख चुके हैं, पर चूंकि वे हमारे और उनके यानी दोनों के साझा पड़ोसी हैं, लिहाजा उन्हें भी देखना चाहिए. हालांकि उनके लिए अभी उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना देखना बाक़ी ही है. आजकल वे दोनों जन अपनी-अपनी नमूनेबाजी की ओर बड़ी तेज़ी से बढ़ रहे हैं और ठीक ही है, दोनों एक-दूसरे की सपोर्ट और बयान या कहें सपोर्ट के बदले अपोर्ट बहादुरी के नमूने जितनी जल्दी देख लें, उतना ही बेहतर रहेगा. जबसे सपोर्टबहादुर ने बयानबहादुर को सपोर्ट करना शुरू किया है, तभी से बयानबहादुर ने सपोर्टबहादुर को अपने यहां से शांतिदूतों का एक्सपोर्ट भी शुरू कर दिया है. ठीक ही है भाई, सपोर्ट के बदले एक्सपोर्ट तो होना ही चाहिए और आप देख ही रहे हैं, सपोर्टबहादुर के कुछ प्रांतों में ओलंपिक से ठीक पहले कितनी ज़बर्दस्त पटाखेबाजी हुई थी. माना जाता है कि यह बयानबहादुर के शांतिदूतों का ही पुण्यप्रताप था. आने वाले दिनों में यह सिलसिला और बढ़ेगा, बढ़ता ही जाएगा. हमें क्या? भाई हमारे तो दोनों पड़ोसी हैं. अपने दोनों पड़ोसियों के प्रति हमारी तो शुभकामनाएं ही हैं.

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अमेरिका कहीं का!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 6, 2011

सलाहू आज बेहद नाराज़ है. बेहद यानी बेहद. उसे इस बात पर सख़्त ऐतराज है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब ने ओसामा को इज़्ज़त से दफ़नाने की बात क्यों की? बात यहीं तक सीमित नहीं है. उसकी नज़र में हद तो यह है कि उन्होंने ओसामा के नाम के साथ जी भी लगा दिया. ऐसा उन्होंने क्यों किया? यही नहीं सलाहू ने तो श्रीमान बयानबहादुर साहब के ऐतराज पर भी ऐतराज जताया है. अरे वही कि ओसामा को अमेरिका ने समुद्र में क्यों दफ़ना दिया. मैं उसे सुबह से ही समझा-समझा कर परेशान-हलकान हूं कि भाई देखो, हमारा शांति और अहिंसा के पुजारी हैं. और यह पूजा हम कोई अमेरिका की तरह झूठमूठ की नहीं करते, ख़ुद को चढ़ावा चढ़वा लेने वाली. कि बस शांति का नोबेल पुरस्कार ले लिया. गोया शांति और नोबेल दोनों पर एहसान कर दिया. हम शांति की पूजा बाक़ायदा करते हैं, पूरे रस्मो-रिवाज और कर्मकांड के साथ.

अगर किसी को यक़ीन न हो तो और अख़बारों पर भी भरोसा न हो तो सरकार बहादुर के आंकड़े उठाकर देख ले. शांति देवी के नाम पर हर साल हम कम से कम हज़ारों प्राणों का दान करते हैं. वह भी कोई भेंड़-बकरियों की बलि चढ़ाकर नहीं, विधिवत मनुष्यों के प्राणदान करते हैं. हमारे यहां सामान्य पूजा-पाठ में नरबलि भले प्रतिबंधित हो गई हो, पर कश्मीर से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति देवी के नाम पर हम हज़ारों मानवों की बलि हर साल चढ़ाते हैं. बलि की इस प्रक्रिया में हम कभी कोई भेदभाव नहीं करते हैं. पड़ोसी मुल्कों यानी पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन से ससम्मान आए शांति देवी के दूत जब जैसे और जिनकी चाहें बलि ले सकते हैं. बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष, ग़रीब-अमीर, पुलिसमैन-सैनिक, हिंदू-मुसलमान …. धर्म-वर्ग-आयु किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते. शांति देवी के दूत जब जैसे चाहें, किसी के प्राण ले सकते हैं.

है किसी में इतना दम जो यह कर सके. उनसे देवी शांति के दूतों का एक हमला नहीं झेला गया. एक बार वे अपनी पूजा लेने क्या आ गए कि तबसे चिल्लाए जा रहे हैं – नाइन इलेवन, नाइन इलेवन. गोया हमला क्या हुआ, उनके देश की घड़ी ही वहीं आकर थम गई! उसके बाद वह एक मिनट भी आगे बढ़ी ही नहीं. एक हमें देखिए, हम इसे हमला नहीं, देवी के दूतों का कृपाप्रसाद मानते हैं. अपनी राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक राजधानियों पर हुई ऐसी कई घटनाओं को हम उनका कृपा प्रसाद मानते हैं. कश्मीर, पंजाब, असम, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश में तो आए दिन हम उन्हें चढ़ावा चढ़ाते रहते हैं, अपनी संसद तक पर हम उन्हें उनकी पसंद के अनुसार बलि पात्र चुनने का मौक़ा देते हैं. कि भाई कहीं से वे किसी तरह असंतुष्ट न रह जाएं. हम अमेरिका की तरह उन्हें रोकने के लिए पासपोर्ट-वीज़ा के नियम त्रासद नहीं बनाते कि बेचारे प्रवेश ही न कर सकें. हम तो ख़ुद उनका आवाहन करते हैं, आवाहयामि-आवाहयामि वाला मंत्र पढ़कर. कभी सद्भावना बस सेवा चलवाते हैं तो कभी समझौता एक्सप्रेस ट्रेन और इससे भी काम नहीं चलता तो पासपोर्ट-वीज़ा की फ़ालतू औपचारिकताएं निबटा कर सिर्फ़ परमिट पर आने-जाने के लिए दरवाज़े खोल देते हैं.

इसे कहते हैं शांति का असली पुजारी! इतनी बड़ी संख्या में तो भेड़-बकरियों की बलि नहीं चढ़ाते होंगे, जितने हम मानव चढ़ा देते हैं. एक वे हैं कि एक मामूली से हमले के बाद सात समुंदर पार करके अफ़गानिस्तान तक चले आए. बदला लेने. यह भी नहीं सोचा कि बदला महान पाप है. जिस तरह क्रोध से क्रोध कभी शांत नहीं हो सकता, वैसे ही हत्या से हत्या भी कभी शांत नहीं हो सकती. इतनी आसान सी बात उनकी समझ में नहीं आई. एक हमें देखिए, हम घृणा पाप से करते हैं, पापी से नहीं. जिन्हें वे पापी समझते हैं, उन्हें हम शांतिदूत मानकर अपने घर में बैठाकर चिकन टिक्का खिलाते हैं. सुप्रीम कोर्ट भले उन्हें सज़ा-ए-मौत सुना दे, पर हमारा ऐसी ग़लती कभी नहीं करते. और कोर्ट की क्या मज़ाल कि वह इसे अपनी अवमानना मान ले! अरे भाई, शांति और अहिंसा के पुजारी देश हैं हम, भला हमें ऐसा करना चाहिए? फांसी-वांसी बर्बर देशों के विधान हैं. भला किसी सभ्य देश में कभी फांसी दी जाती है! सभ्य देश तो उन्हें कहते हैं जो बिना किसी बम-बंदूक के भी गैस रिसा कर हज़ारों लोगों की जान ले लेने वालों और उनकी अगली पीढ़ियों तक को अपंग बना देने वालों को भी चोरी-छिपा उड़वा कर सात समंदर पार उनके घर पहुंचवा देते हैं. है किसी में जिगरा? लेकिन सलाहू मेरी बात मान नहीं रहा है. वह इसे श्रीमान बयानबहादुर साहब और उनकी महान पार्टी की वोटबटोरी नीति से जोड़कर देख रहा है. उसे लगता है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब का यह बयान सिर्फ़ भारत के मुसलमानों की सहानुभूति बटोरने के लिए आया है. इसका मतलब यह है कि वह भारत के हर मुसलमान को ओसामा का समर्थक मानते हैं. वरना कोई वजह नहीं है कि ओसामा के नाम के साथ जी लगाते. उसने मुझे अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली दिखाते हुए कहा, ‘और पंडित यह समझ लो कि भारत के मुसलमान की इससे बड़ी बेइज़्ज़ती कुछ और नहीं हो सकती. जितनी बेइज़्ज़ती इस्लाम की ओसामा ने की, उतनी ही बेइज़्जती ये जनाब भारतीय मुसलमान की कर रहे हैं.’

मेरी समझ में नहीं आ रहा कि वह श्रीमान बयानबहादुर साहब के बयान को हिंदू-मुसलमान से जोड़कर क्यों देख रहा है. अरे भाई, वह तो घोषित सेकुलर हैं और उनकी पार्टी भी. उनको हिंदू-मुसलमान से क्या लेना-देना! पर सलाहू है कि मान ही नहीं रहा. अमेरिका की तरह एक बार जिस बात पर अड़ गया, अब अड़ा पड़ा है उसी पर. अमेरिका कहीं का.

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यात्रा वृत्तांत भर नहीं है पूश्किन के देश में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 18, 2010

महेश दर्पण की पुस्तक ‘पूश्किन के देस में’ ने मुझे 60 साल पीछे पहुंचा दिया है। चेखव को मैंने आगरा में पढऩा शुरू किया था। कोलकता की नैशनल लायब्रेरी में भी मैं चेखव के पत्र पढ़ा करता था। इस पुस्तक में एक पूरी दुनिया है जो हमें नॉस्टेल्जिक बनाती है। यह विचार हंस के संपादक और वरिष्ठï कथाकार राजेन्द्र यादव ने सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पूश्किन के देस में पर आधारित संगोष्ठी में व्यक्त किए। इसे रशियन सेंटर और परिचय साहित्य परिषद ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था।
श्री यादव ने कहा : सन् 1990 में मैं भी रूस गया था। कुछ स्मृतियां मेरे पास भी थीं। इसे पढक़र वे और सघन हुई हैं। एक कुशल यात्रा लेखक की तरह महेश दर्पण ने बदले हुए रूस को देखते हुए भी बताया है कि अब भी रूस में बहुत कुछ बाकी है।

एक कुशल यात्रा लेखक की तरह महेश दर्पण ने बदले हुए रूस को देखते हुए भी बताया है कि अब भी रूस में बहुत कुछ बाकी है।

यह पुस्तक मेरे स्मृति कोश में बनी रहेगी। ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं, जैसे काफी पहले एक किताब प्रभाकर द्विवेदी ने लिखी थी-‘पार उतर कहं जइहों’।
प्रारंभ में कवि-कथाकार उर्मिल सत्यभूषण ने कहा : यह पुस्तक हमें रूसी समाज, साहित्य और संस्कृति से परिचित कराते हुए ऐसी सैर कराती है कि एक-एक दृश्य आंखों में बस जाता है। अब तक हम यहां रूस के जिन साहित्यकारों के बारे में चर्चा करते रहे हैं, उनके अंतरंग जगत से महेश जी ने हमें परिचित कराया है। 
महेश दर्पण को फूल भेंट करते हुए रशियन सेंटर की ओर से येलेना श्टापकिना ने अंग्रेजी में कहा कि एक भारतीय लेखक की यह किताब रूसी समाज के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करती है। इस पठनीय पुस्तक में लेखक ने कई जानकारियां ऐसी दी हैं जो बहुतेरे रूसियों को भी नहीं होंगी। 
कथन के संपादक और वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय ने कहा कि महेश दर्पण ने इस पुस्तक के माध्यम से एक नई विधा ही विकसित की है। यह एक यात्रा वृतांत भर नहीं है। इसे आप एक उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं। रचनाकारों के म्यूजियमों के साथ ही महेश दर्पण की नजर सोवियत काल के बाद के बदलाव की ओर भी गई है।

यह एक यात्रा वृतांत भर नहीं है। इसे आप एक उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं। रचनाकारों के म्यूजियमों के साथ ही महेश दर्पण की नजर सोवियत काल के बाद के बदलाव की ओर भी गई है।

अनायास ही उस समय से इस समय की तुलना भी होती चली गई है। श्रमशील और स्नेही साहित्यकर्मी तो महेश हैं ही, उनका जिज्ञासु मन भी इस पुस्तक में सामने आया है। मुझे ही नहीं, मेरे पूरे परिवार को यह पुस्तक अच्छी लगी। 
वरिष्ठ उपन्यासकार चित्रा मुद्गल ने कहा : मैं महेश जी की कहानियों की तो प्रशंसिका तो हूं ही, यह पुस्तक मुझे विशेष रूप से पठनीय लगी। रूसी समाज को इस पुस्तक में महेश ने एक कथाकार समाजशास्त्री की तरह देखा है। यह काम इससे पहले बहुत कम हुआ है। रूसी समाज में स्त्री की स्थिति और भूमिका को उन्होंने बखूबी रेखांकित किया है। बाजार के दबाव और प्रभाव के  बीच टूटते-बिखरते रूसी समाज को लेखक ने खूब चीन्हा है। यह पुस्तक उपन्यास की तरह पढ़ी जा सकती है। बेगड़ जी की तरह महेश ने यह किताब डूबकर लिखी है। रूस के शहरों और गांवों का यहां प्रामाणिक विवरण है जो हम लोगों के लिए बेहद पठनीय बन पड़ा है। 
सर्वनाम के संस्थापक संपादक और वरिष्ठï कवि-कथाकार विष्णु चंद्र शर्मा ने कहा : महेश मूलत: परिवार की संवेदना को बचाने वाले कथाकार हैं। इस किताब में भी उनका यह रूप देखने को मिलता है। उन्होंने बदलते और बदले रूस के साथ सोवियत काल की तुलना भी की है। वह रूसी साहित्य पढ़े हुए हैं। वहां के म्यूजियम और जीवन को देखकर उन्होंने ऐसी चित्रमय भाषा में विवरण दिया है कि कोई अच्छा फिल्मकार उस पर फिल्म भी बना सकता है। अनिल जनविजय के दोनों परिवारों को आत्मीय नजर से देखा है। यह पुस्तक बताती है कि अभी बाजार के बावजूद सब कुछ नष्टï नहीं हो गया है। आजादी मिलने के बाद हिन्दी में यह अपने तरह की पहली पुस्तक है जिससे जाने हुए लोग भी बहुत कुछ जान सकते हैं।
प्रारंभ में कथाकार महेश दर्पण ने कहा : जो कुछ मुझे कहना था, वह तो मैं इस पुस्तक में ही कह चुका हूं। जैसा मैंने इस यात्रा के दौरा महसूस किया, वह वैसा का वैसा लिख दिया। अब कहना सिर्फ यह है कि रूसी समाज से उसकी तमाम खराबियों के बावजूद, हम अभी बहुत कुछ सीख सकते हैं। विशेषकर साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण के बारे में। यह सच है कि अनिल जनविजय का इस यात्रा में साथ मेरे लिए एक बड़ा संबल रहा है। दुभाषिए का इंतजाम न होता तो बहुत कुछ ऐसा छूट ही जाता जिसे मैं जानना चाहता था। 
इस संगोष्ठी में हरिपाल त्यागी, नरेन्द्र नागदेव,  प्रदीप पंत, सुरेश उनियाल, सुरेश सलिल, त्रिनेत्र जोशी, तेजेन्द्र शर्मा, मृणालिनी, लक्ष्मीशंकर वाजपेई, भगवानदास मोरवाल, हरीश जोशी, केवल गोस्वामी, रामकुमार कृषक, योगेन्द्र आहूजा, वीरेन्द्र सक्सेना, रूपसिंह चंदेल, प्रेम जनमेजय, हीरालाल नागर, चारु तिवारी,  राधेश्याम तिवारी, अशोक मिश्र, प्रताप सिंह, क्षितिज शर्मा और सत सोनी सहित अनेक रचनाकार और साहित्य रसिक मौजूद थे।
प्रस्तुति : दीप गंभीर

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