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Archive for the ‘सोसाइटी’ Category

युधिष्ठिर का कुत्ता – दूसरी किश्त

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 2, 2010

हरिशंकर राढ़ी

यह भी एक शाश्वत सत्य है कि अपनी जाति एवं समाज की चिन्ता करने वाला कभी भी व्यक्तिगत विकास नहीं कर पाता है। यदि अपनी जाति के स्वाभिमान की चिन्ता मैं ही करता तो आज स्वर्ग पहुँच पाने वाला इकलौता आदरणीय कुत्ता नहीं बन पाता। मैं भी किसी पुरातन समाजवादी की भांति इधर-उधर के धक्के खाकर अबतक मर चुका होता या अज्ञातनामा जिन्दगी जी रहा होता। स्वर्ग का सुख शोषित समाज का साथ देकर नहीं पाया जा सकता और न ही अपनी जाति का अपकार करने वाले के प्रतिशोध की भावना रखकर। स्वर्ग का सुख या तो ऐसे लोगों की शरण में जाकर पाया जा सकता है या फिर अपनी जाति के लोगों को स्वर्ग का सपना दिखाकर। कम से कम लोकतंत्र में तो ऐसा ही होता है।
इस तथ्य के प्रमाण में आपको मुझसे अच्छा दूसरा उदाहरण नहीं मिल सकता है। मैं उसी युधिष्ठिर का घोर समर्थक रहा जिन्होंने धर्मराज होने के बावजूद मेरी पूरी जाति के लिए सदैव के लिए नंगा कर दिया । मुझे मालूम था कि धर्मराज ने मेरी जाति को खुले यौन सम्बन्ध का श्राप दिया है क्योंकि मेरे एक भाई की वजह से उन पति -पत्नी के निजी संबंधों में विघ्न पड़ा था। बड़ा आदमी सब कुछ बर्दाश्त कर लेगा किन्तु यौन सम्बन्धों में विघ्न बर्दाश्त नहीं कर सकता । आपको स्मरण होगा कि मेरे एक भाई ने स्वभाववश उस समय उनका जूता ( और ये जूता उनके लिए रतिक्रीडा का साक्षी हुआ करता था) इधर-उधर कर दिया था। अब कोई शक्तिशाली व्यक्ति अपने प्रति किए गए अपराध का दंड केवल दोषी को तो देता नहीं, उसकी नजर में तो अपराधी की पूरी जाति ही दोषी होती है और फिर दंड पूरे समाज को मिलता है। लो भाई, श्राप मिल गया कि तुम्हारी जाति का यौन सम्बन्ध सभी लोग देखें। बिल्कुल लाइव टेलीकास्ट ! पता नहीं कुछ लोगों को खुले यौन सम्बन्धों से इतना लगाव क्यों होता है ? अवसर तलाशते रहेंगे कि कोई रतिक्रीडारत हो और हम नेत्रसुख लें। उन्हें तो अपनी भावी पीढ़ी की भी चिन्ता नहीं होती कि उनके इस आनन्द का बालमन पर क्या प्रभाव पड़ेगा !
खैर , मुझे आजे इस बात का संतोष है कि जिस प्रकार का श्राप हमें मिला था, उसी प्रकार का कार्य आज मानव जाति भी करने लग गई है। उनका खुलापन देखकर मन को शांति मिलती है। भविष्य में जब वे यौन संबन्धों में पूरी तरह हमारा अनुसरण करने लगेंगे तो हमारे श्राप का परिहार हो जाएगा। अगर विकास ऐसे ही होता रहा तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं है।
मानिए तो मैं किसी भी प्रकार युधिष्ठिर से कम धर्मपारायण नहीं हूँ। किसी भी परिस्थिति में मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और न कभी उनका विरोध किया। यहाँ तक कि उनके भाइयों ने भी समय पडने पर उनको भला -बुरा कहने में कसर नहीं रखी । उनपर आरोप भी लगाया । वैसे आरोप तो आप भी लगाते रहते हैं – धर्मराज ने ये किया ,धर्मराज ने वो किया। अमुक बात के लिए इतिहास धर्मराज को कभी क्षमा नहीं करेगा और अमुक बात का जवाब उन्हें देना ही होगा।उन्होंने द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया। सारे नारीवादी आज चीख- चीखकर इस बात का जवाब माँग रहे हैं। वैसे जवाब क्या मांग रहे हैं, अंधेरे में पत्थर मार रहे हैं। उनकी भी अपनी समस्याएं और आवश्यकताएं हैं। अगर इतना चीख लेने से कुछ नारियाँ प्रभाव में आ जाएं तो बुरा ही क्या है? किसी ने यह प्रश्न नहीं उठाया कि धर्मराज ने अपने सगे भाइयों को भी तो दाँव पर लगाया था, इसका उन्हें क्या अधिकार था ? पर इस प्रश्न से कोई स्वार्थ नहीं सधता , कोई आन्दोलन नहीं बनता ।
आज तक तो धर्मराज ने ऐसी किसी बात का जवाब नहीं दिया। क्यों दें ? स्वर्ग में बैठा हुआ एक महान इंसान धरती पर कीड़े -मकोड़ों की भांति जीने वाले प्राणी की बात का जवाब क्यों दे ? सारे लोकतंत्र और राष्ट्र संघ के दबाव के बावजूद आप पडोसी मुल्क से एक अपराधी का प्रत्यर्पण तो करा ही नहीं सकते और चाहते हैं कि धर्मराज स्वर्गे से कूदकर तुम्हारे बीच उत्तर देने आ जाएं ! अनगिनत द्रौपदियों और बंधु-बांधवों को दाँव पर जगाने वाले हजारों लोग तुम्हारे बीच में ही हैं। इन्होंने आजतक कोई जवाब दिया है क्या ? इन नारीवादियों से पूछो कि साझा सम्पत्ति की रक्षा वे कितने मन से करते हैं ? क्या वे इतना भी नहीं जानते कि साझे की खेती तो गदहा भी नहीं चरता । बिना श्रम के मिली सम्पत्ति के लुटने पर कितना दर्द होता है ? चले हैं धर्मराज पर आराप लगाने !पर, वह आदमी ही क्या जो दूसरों पर आरोप न लगाए !
धर्मराज स्वर्ग जाने के अधिकारी थे। उन्होंने कभी झूठ नहीं बोला था। आप कह सकते हैं कि झूठ तो नकुल सहदेव ने भी नहीं बोला था। और भी बहुत से लोग हैं जो झूठ नहीं बोलते । परन्तु आप इस बात पर विचार नहीं कर रहे कि वे सम्राट थे । ऐसा पहली बार हो रहा था कि एक सम्राट झूठ नहीं बोल रहा था। राजनीति में तो एक टुच्चा आदमी और एक छोटा मंत्री भी झूठ बोले बिना जीवन निर्वाह नहीं कर सकता । इस प्रकार उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया था। नकुल – सहदेव या किसी सामान्य प्रजाजन के झूठ या सच बोल देने से क्या बिगड जाता है ? आप को याद होगा कि नरो-कुंजरो वाले मामले में झूठ का एक पुट आ जाने से क्या से क्या हो गया था ? एक राजा सच बोलकर कई बारी बड़ी हानि उठा लेता है। अब एक नॉन वीआईपी सच बोलकर क्या नुकसान कर लेगा ? आचरण तो बड़े लोगों का ही देखा जाता है और पुरस्कार भी बड़े लोगों को ही मिलता है। मुझे तो लगता है कि आप पति- पत्नी के बीच लड़ाई शांत कराने वाले को शांति का नोबेल पुरस्कार दिलाना चाहते हैं ।

इधर जब से राजतंत्र का पतन होना शुरू हुआ है और प्रजा तंत्र का आविर्भाव हुआ है, कुत्तों का बोलबाला हो गया है। हमारी यह विशेषता होती है कि हम एक स्वर में अकारण हंगामा कर सकते हैं और भीड़ जमा कर सकते हैं । अगर हम भौंकने लग जाएं तो अच्छी से अच्छी बात भी दब जाती है और प्रजातंत्र में सत्ता और सफलता का यही राज है। हमारे साथ तो यह भी साख है कि हम किसी पर भौंक दें तो उसे चोर मान लिया जाता है। दूसरी बात यह है कि हमारी घ्राण शक्ति इतनी तेज है कि हम खाद्य पदार्थ की किसी भी सम्भावना का पता लगा लेते हैं और सम्भाव्य स्थल पर तत्काल जुट भी जाते हैं। हमारी सफलता में इस शक्ति का भी बहुत बड़ा हाथ है।
हम एक और चीज में आदमियों से बेहतर हैं और वह यह है कि हम देशी- विदेशी में भेदभाव नहीं करते। कुत्ता देशी हो या विदेशी ,हम उस पर बराबर ताकत से भौंकते हैं। हमारे यहाँ का तो पिल्ला भी विदेशी बुलडॉग और हाउण्ड पर भौंकने से नहीं चूकता । ये बात अलग है कि जब अपनी औकात कम देखता है तो सुरक्षित दूरी बनाकर भौंकता है। पर यहाँ के आदमियों के साथ ऐसी बात नहीं है। वे विदेशी को सदैव ही अपने से बेहतर मानते हैं । कई तो विदेशी भिखमंगों को भी हसरत की निगाह से देखते हैं और उनकी आलोचना के विषय में सोच भी नहीं सकते। उन्हें तो शासन करने तक का मौका प्रदान कर दिया ।
वैसे कई लोग अब तक यही मानते हैं कि स्वर्ग में रहने वाला कुत्ता मैं इकलौता हूँ। यह तो अपना – अपना भाग्य है। आज भी ऐसे कुत्तों की संखया मनुष्यों से ज्यादा है जो स्वर्ग में रह रहे हैं, वातानुकूलित विमानों में पूँछ निकाल कर घूम रहे हैं, इन्द्र के नन्दन कानन की हवा ले रहे हैं , देशी -विदेशी गायों का दूध पी रहे हैं और न जाने कितनी उर्वशियों , रम्भाओं और मेनकाओं की गोद में खेल रहे हैं।

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युधिष्ठिर का कुत्ता

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 24, 2010

(यह व्यंग्य ‘समकालीन अभिव्यक्ति’ के ‘वक्रोक्ति’ स्तम्भ में प्रकाशित हुआ था। यहां इसे दो किश्तों में दिया जा रहा है।)
मैं धर्मराज युधिष्ठिर का कुत्ता बोल रहा हूँ। पूरी सृष्टि और पूरे इतिहास का वही एक्सक्ल्यूसिव कुत्ता जो उनके साथ स्वर्ग गया था। अब मैं स्वर्ग में नहीं हूँ। किसी धरती जैसे ग्रह पर मैं वापस आ गया हूँ और समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि कहीं उसी भारतवर्ष में तो नहीं हूँ जहां से युगों पहले स्वर्ग गया था। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि यहाँ के बारे मे यह प्रचार है कि धरती का स्वर्ग भारतवर्ष ही है, देवभूमि है।जब बिना सत्कर्म के ही मैं धरती से स्वर्ग ले जाया जा सकता हूँ तो वहां से अकारण तो मैं नर्क में फेंका नहीं जा सकता । जो भी हो ,जब मैं अपने महाभारत काल की पारिवारिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों का मिलान यहां की आज की परिस्थितियों से करता हूँ तो लगता है कि मैं उस देश ही नहीं अपितु उसी काल में वापस लौट आया हूँ। कभी – कभी तो भ्रम होने लगता है कि मैं धर्मराज के साथ स्वर्ग गया भी था या नहीं! कहीं गहरी नींद में सो तो नहीं रहा था ?
मैं धरती का सबसे सफल कुत्ता हूँ । ऐसा कुत्ता जिसके भाग्य से बडे- बड़े लोग ईर्ष्या रखते हैं। वैसे भी ईर्ष्या रखना बड़े लोगों का प्रमुख कार्य है। यहां तक कि धर्मराज के भाई भी मुझसे जलते हैं क्योंकि वे भी वह पद न पा सके जो मुझे मिला है। अब यह बात अलग है कि यहाँ तक पहुँचने में मुझे कितना कुत्तापना करना पड़ा , यह मैं ही जानता हूँ। इतने युगों बाद मैं जाकर समझ पाया हूँ कि स्वर्ग का सुख पाने के लिए कितना झुकना पड ता है और आत्मा को कितना मारना पडता है। मुझसे तो अच्छे वे हैं जो सशरीर आने के विषय में नहीं सोचते । दरअसल बात यह है कि स्वर्ग में आने के लिए जीव को या तो अपना शारीर त्यागना पड ता है या फिर आत्मा । मेरे बारे में आपको जानकारी है ही कि मैं कैसे आया , इसलिए आप मेरे त्याग का अंदाजा लगा सकते हैं ।
मेरे प्रसंग से आप इतना तो अवश्य जान गए होंगे कि बड़े आदमी का कुत्ता होना एक आम आदमी होने से बेहतर है । पूर्व जन्म के पुण्य और बड़े सौभाग्य से कोई आत्मा किसी रईस के कुत्ते के रूप में अवतरित होती है। जिस वैभव और सुविधा में बड़े -बड़े ज्ञानी, विद्वान और महात्मा नहीं पहुँच पाते , वहां रईस का कुत्ता पहुँच जाता है। उसे अधिकार मिल जाता है कि वह किसी पर भौंक सके किसी को भी देखकर गुर्रा सके और किसी को भी काट सके। वह ऐसा कुछ भी कर सकता है जिससे कि उसका स्वामी खुश हो जाए और स्वामी का खुश होना अपने आप में एक उपलब्धि है। व्यवस्था चाहे राजतंत्र की हो या लोकतंत्र की, सुखी वही होता है जो स्वामी को खुश कर ले।
हो सकता है कि मेरे स्वर्ग जाने की उपलब्धि से मेरी जाति वाले गौरवान्वित हों। ऐसा आजकल हो रहा है। आप कितने भी पतित और शोषित समाज से हों , आपकी पूरी बिरादरी दाने -दाने को तरस रही हो, किन्तु अपनी बिरादरी का कोई इकलौता प्राणी भी सिंहासनारूढ हो जाए तो आप स्वयं को सिंहासनारूढ समझने लग जाते हैं। आपको अपनी भुखमरी भूल जाती है। किन्तु मेरी बिरादरी में भी ऐसा ही हो, जरूरी नहीं। हम लोग तो अपना सारा जीवन अपनी बिरादरी पर भौंक कर ही निकाल देते हैं।मैं अभी भी गलियों में निकलूँ तो मेरे भाई मुझपर तुरन्त ही झपट्‌टा मारेंगे।उन्हें सामाजिक चेतना से कुछ भी लेना – देना नहीं है।
हाँ, हमारे और आदमियों के बीच एक समानता जरूर है। हम दोनों ही अपने अधिकार क्षेत्र में किसी की दखलन्दाजी पसन्द नहीं करते । यदि हम एक बार किसी उच्च पद पर पहुँच जाएं तो वहाँ किसी और को पहुँचने नहीं देना चाहते । मैं स्वयं किसी कुत्ते को स्वर्ग आते देखना पसन्द नहीं करूँगा । उच्च पद की तो बात छोड़िए, हमें यह भी नहीं पसन्द कि कोई हमारी गली में आए , भले ही उसकी नीयत हमारा नुकसान करने की न हो। हम यह भी नहीं पसन्द करते कि कोई हमारे शहर में आए । हमें डर है वह हमारी राजनीति और वोट बैंक पर असर डालेगा। वैसे हम प्रचारित यही करते हैं कि वह हमारी रोटी खा जाएगा। इससे हमें पूरे शहर के कुत्तों का समर्थन मिलता है और मरियल से मरियल कुत्ता भी भौंकने के लिए आगे आ जाता है। हमारे दक्षिण के कुछ भाइयों ने ऐसा काम अभी बड़े पैमाने पर किया है जब उन्होंने उत्तर के कुत्तों को भौंक – भौंककर अपने शहर से भगा दिया । ऐसा काम आदमी भी करते हैं।
अपनी जाति पर भौंकने में हमें बड़ा मजा आता है। कोई भी अपरिचित मिल जाए, हम अपने मुँह का निवाला छोड कर उस पर भौंकने निकल पडते हैं ।मुझे लगता है कि अपनी बिरादरी पर भौंकने से हमारी अच्छी छवि बनती है। हम लोग जातिवादियों की श्रेणी में नहीं आते और धर्मनिरपेक्ष होने का लाभ सहज ही प्राप्त कर लेते हैं।लडते दूसरी बिरादरी के लोग भी हैं परन्तु अकारण ही नहीं। कोई ना कोई स्वार्थ होने पर ही सींग भिड़ाते हैं। निःस्वार्थ लड़ाई तो केवल हम लोग यानी कुत्ते ही लडते हैं। यह बात अलग है कि हमारी इस अनावश्यक लड़ाई का खामियाजा हमारे हर भाई को भुगतना पडता है। लोग कहते हैं कि अगर हम एक दूसरे पर न भौंकें तो एक दिन में हम चालीस मील तक जा सकते हैं परन्तु जा पाते हैं केवल चार मील ही! बाकी का समय कभी भौंकने , कभी दुम दबाने और कभी दाँत निपोरने में चला जाता है। सच तो यह है कि अपनी गली में आए अपरिचित कुत्ते पर भौंकने से अजीब संतोष की अनुभूति होती है और आत्मविश्वास पैदा होता है।

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मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 2, 2010

-हरिशंकर राढ़ी

(लेखमाला की पिछली कड़ी में मदुराई और मीनाक्षी मंदिर का जो वर्णन मैंने किया था , उसे राष्ट्रीय सहारा दैनिक ने अपने 23 जनवरी के अंक में ज्यों का त्यों सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने कॉलमब्लॉग बोलामें ‘देवदर्शन और विशेष शुल्क‘ शीर्षक से छापा है।)

मदुरै का मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर वास्तव में हिन्दू धर्म ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति का एक गौरव है। अंदर जाने पर जो अनुभूति होती है, उसकी तो बात ही अलग है; इसका बाहर का रूप ही अत्यन्त चित्ताकर्षक है और अपनी विशालता की गाथा स्वयं ही बयान कर देता है। वहीं से यह उत्कंठा जागृत हो जाती है कि कितनी जल्दी अंदर प्रवेश कर लें। यह मंदिर जितना भव्य बाहर से है , कहीं उससे ज्यादा अंदर से है।

सामान्यतया मीनाक्षी मंदिर के नाम से विख्यात इस मंदिर का पूरा नाम मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर या मीनाक्षी अम्माँ मंदिर है।यह मंदिर भगवान शिव और देवी पार्वती जो मीनाक्षी के नाम से जानी जाती हैं, को समर्पित है। हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव अत्यन्त सुन्दर रूप में देवी मीनाक्षी से विवाह की इच्छा से पृथ्वीलोक पधारे। देवी मीनाक्षी पहले ही मदुराई के राजा मलयध्वज पांड्य की तपस्या से प्रसन्न हो मदुराई में अवतार ले चुकीं थीं। कुछ बड़ी होने पर वे वहां शासन संभालने लगीं। भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने देवी मीनाक्षी से विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे वे सहर्ष मान गईं। अब इस विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। निश्चित रूप से यह पृथ्वीलोक का सबसे महत्त्वपूर्ण और गरिमामय विवाह होने वाला था जिसमें सम्मिलित होने के लिए भगवान विष्णु भी अपने लोक से चल दिए। उन्हें देवी मीनाक्षी के भाई की भूमिका निभानी थी।किन्तु, मार्ग में आशंकित इन्द्र देव ने विघ्न उपस्थित कर दिया और भगवान विष्णु यथासमय वहाँ पहुंच न सके। अंततः स्थानीय देवता (तिरुपरंकुन्द्रम से) ने विवाह में मुख्याधिपति की भूमिका निभाई और कार्यक्रम सम्पन्न हो गया। इससे सम्बन्धित वार्षिक उत्सव भी यहाँ मनाया जाता है।

मंदिर मुख्यतया भगवान शिव और देवी मीनाक्षी को समर्पित है किन्तु इसके विशाल अन्तर्गृह में अनेक देवी देवताओं की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर के केन्द्र में मीनाक्षी की मूर्ति है और उससे थोड़ी ही दूर भगवान गणेश जी की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है जिसे एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है।आखिर गणेशजी विघ्नहत्र्ता ही नहीं देवी पार्वती के पुत्र भी तो हैं जिन्हें यहां मुकुरनी विनायकर के नाम से पूजा जाता है।

गणेश जी के दर्शन के लिए हम गए तो वहां पर दो पंक्तियां थीं। मुझे लगा कि उनमें से एक पंक्ति पुरुषों के लिए थी और दूसरी महिलाओं के लिए। वस्तुतः एक पंक्ति में महिलाएँ अधिक थीं और पुरुष एकाध ही। चूँकि दक्षिण भारत में अभी भी तुलनात्मक रूप से नियम – कानून का पालन अधिक होता है , यह सोचकर मैं अलग लाइन में लग गया और पत्नी अलग लाइन में।हालाँकि मेरे मित्र सपत्नीक एक ही (महिलाओं वाली) लाइन में लगे । लाइन लंबी थी, आगे जाकर कुछ इस प्रकार अलग हुई कि दर्शनापरान्त हम लोगों को दो अलग- अलग और विपरीत दिशा में जाना ही पड़ा। ऐसा नहीं था कि हम दर्शन करके एक दरवाजे से बाहर निकल जाएं! मंदिर की विशालता इतनी कि कुछ कहा नहीं जा सकता। वापस भी लौटने की स्थिति नहीं थी। मंदिर में ही तैनात एक पुलिस अधिकारी से मैंने बहस की तो (ईश्वर की कृपा से उसे अंगरेजी आती थी) उसने मार्ग निर्देशन किया । वहां से मैं बाहर तो निकल गया किन्तु फिर उस विशालता में खो गया। गनीमत यह हुई कि हमारे मोबाइल जमा नहीं कराए गए थे। संपर्क हो गया और किसी प्रकार एक प्रमुख स्थल के सहारे करीब दस मिनट बाद हम मिल गए। यह भी खूब रही और हम बहुत देर तक इस गुमशुदगी के चटखारे लेते रहे।

मंदिर का वास्तु एवं विशालतासौन्दर्य ही नहीं, गणितीय आंकड़ों की दृष्टि से भी मीनाक्षी मंदिर विशाल है। मंदिर कुल 45 एकड़ क्षेत्र में फैला है और निर्मित क्षेत्रफल का आयाम 254 मी। लंबाई और 237 मी. चैड़ाई में है। मंदिर में 12 उच्च शिखर हैं और सर्वोच्च शिखर जो दक्षिण की ओर स्थित है, की उँचाई 170 फीट है। मंदिर के अन्दर अइयरम मंडपम नामक एक विशाल मंडप (Hall) है जिसे सामान्यतः सहस्र खंभा (Thousand Pillar Hall )के नाम से जाना जाता है। वास्तविकता यह है कि इस हॉल में कुल 985 खंभे है।इस हॉल का निर्माण 1569 ई0 में अरियनाथ मुदलियर ने कराया था ।इसकी विशालता देखते ही बनती है। कई बार ऐसा लगता है कि धर्म एवं संस्कृति को लेकर कुछ लोग कितना सोचते रहे होंगे और कितना कुछ करते भी रहे होंगे, अन्यथा आज इतनी विशाल संरचना, इतना विशाल सृजन नहीं होता। यह क्रम संभवतः युगों से चला आ रहा है और चलता ही रहेगा । आज की सृजनशीलता भी कहीं से रुकी हुई प्रतीत नहीं होती, हालांकि विध्वंसक शक्तियां मार्ग में कम बाधाएं नहीं डाल रही हैं। आतंक का साया हर जगह मंडरा रहा हैफिर भी सर्जक लगे हुए हैं संस्कृति एवं सभ्यता की वृद्धि करने में । दिल्ली के नवनिर्मित अक्षरधाम जैसे भव्य मंदिर ऐसी ही जिजीविषा के प्रतीक हैं। यहाँ मैं किसी साम्यवाद या आर्थिक विषमता ओर मुड़ने के मूड में नहीं हूँ , बस जो सुन्दर लगा , उसका वर्णन भर करना चाहता हूँ।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस मंडप में खम्भे ही खम्भे दृष्टिगोचर होते हैं। सभी खंभे पत्थरों को काट कर बनाए गए हैं और इनपर उत्कृष्ट नक्काशी की गई है जो मंडप की सुन्दरता में चार चाँद लगाती है।मुख्य हॉल से लगभग हर गोपुरम की ओर रास्ता जाता है। मंदिर के विशाल गलियारे में असंख्य दूकानें भी हैं जिनपर हस्तकला से लेकर अन्य सजावटी सामानों की बिक्री होती रहती है।

मंदिर का वर्तमान स्वरूप1623से 1659 के बीच आया। तमिल साहित्य के अनुसार मंदिर का अस्तित्व गत सहस्राब्दि में होना चाहिए किन्तु इसका कोई बड़ा प्रमाण नहीं मिलता। शैव दर्शन के अनुसार मंदिर सातवीं शताब्दी में अवश्य था जिसे कट्टरपंथी मुस्लिम आक्रान्ता मलिक कफूर ने सन्1310में पूर्णतः ध्वंश कर दिया ।

मंदिर के प्रांगण में एक अत्यन्त सुन्दर तालाब है जिसे स्वर्णकमल पुष्कर के नाम से जाता है। वैसे इसका वास्तविक नाम पोर्थमराईकुलम है। भक्तगण दर्शनोपरान्त प्रायः यहाँ बैठकर आत्मिक शांति का आनन्द लेते हुए हैं। मंदिर में कैमरा ले जाने पर रोक नहीं है अतः अधिकांश लोग फोटो खींचते हुए भी देखे जा सकते हैं। यद्यपि फोटोग्राफी के लिए शुल्क 25 रु निर्धारित है किन्तु इस नियम का परिपालन शायद ही होता हो। कम से कम मैंने तो ऐसा नहीं देखा। हाँ, एक बार एक कर्मचारी ने हमें जरूर मना किया था ।

तालाब के पास घंटों बैठे रहने के बाद एक गरिमामय अनुभूति के साथ बाहर निकलने का मन बनाया ।ऐसा जरूर लग रहा था कि यह दर्शन और यह यात्रा जीवन की एक उपलब्धि है। दुख इस बात का हो रहा था कि हमारे पास इतना समय नहीं था कि मदुराई में एक दो दिन और रुकें और इस दिव्य और भव्य मंदिर के सौन्दर्य का और अवलोकर एवं विश्लेषण करें । अगले दिन हमें कोडाइकैनाल जाना था । बस आज की ही रात शेष थी यहाँ रुकने एवं समझने के लिए।निकलते वक्त भी मैं बार -बार पीछे मुड़कर उस महत्ता को देख लेता और महसूस कर लेता था । मदुराई शायद ही यादों से बाहर निकले!

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