Aharbinger's Weblog

Just another WordPress.com weblog

Archive for the ‘हमारे समय में’ Category

आप क्या तय कर रहे हैं?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 30, 2010

बिहार चुनाव के नतीजों ने पूरी भारतीय राजनीति को झकझोर दिया है. जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे झूठे मुद्दों पर बन्दर की तरह नाचने वाले देसी मतदाताओं ने इन छलावों को मेटहे में बन्द कर लोकतंत्र की बहती नदी की तीव्र धारा के हवाले कर दिया है. बबुआ का जादू भी नहीं चला. स्विस बैंक के खुलासे सामने हैं और आम भारतीय उनमें रुचि ले रहा है. ग़ौर करने की ज़रूरत है, यह लगभग वैसा ही दौर है, जैसा राजीव गान्धी के दौर में हुआ था. आम आदमी का ध्यान पहली बार ख़ास लोगों के काले कारनामों की ओर गया था और जिसने झूठमूठ मुद्दा बना कर जनता को बहकाया था उसी ने मदारी के झोले से मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों का ख़तरनाक सांप निकाल दिया था. कांग्रेस को छात्र नेताओं के जरिये अपनी राजनीति चमकाने का मौक़ा मिल गया और उसने तुरंत पिछले दरवाज़े से छात्र नेताओं को हवा देकर आत्मदाहों का दौर चलवा दिया. पूरे देश में लगभग ख़त्म हो चुका जातिवाद नए सिरे से स्थापित हो गया.

यह न तो अकेले कांग्रेस की चाल थी, न वीपी सिंह की और न भाजपा की. वस्तुतः यह इन सबकी मिली-जुली चाल थी. इस बात पर व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सोचने की ज़रूरत है. हम फिर एक कठिन दौर में आ गए हैं. राजनेताओं की रोजी-रोटी छिनती दिख रही है और मीडिया व व्यावसायिक जगत के बड़े-बड़े टायकूनों के लंगोटे उतर रहे हैं. बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है. क्योंकि असली मुद्दों के प्रति आम आदमी की जागरूकता भारतीय राजनेता बर्दाश्त नहीं कर सकते. राजनीति की रहस्यमय बोतल से जल्दी ही जाति-धर्म-क्षेत्र-संप्रदाय … का कोई नया जिन्न निकलने ही वाला है. ऐसे में एक समझदार मनुष्य होने के नाते आपको पहले से ही अपनी भूमिका तय करके रखनी है. आप क्या तय कर रहे हैं?

Advertisements

Posted in खबर समाज, जातिवाद, भारतीय राजनीति, समाज, हमारे समय में, हाल-फिलहाल, casteism, corruption, culture, politics, religion, society, Uncategorized | 6 Comments »

क्यों नहीं समझते इतनी सी बात?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 20, 2009

लालगढ़ में माओवादियों को घेरने का क़रीब-क़रीब पूरा इंतज़ाम कर लिया गया है. मुमकिन है कि जल्दी ही उनसे निपट लिया जाए और फिलहाल वहां यह समस्या हल कर लिए गए होने की ख़बर भी आ जाए. लेकिन क्या केवल इतने से ही यह समस्या हल हो जाएगी? लालगढ़ में माओवादियों ने प्रशासन और सुरक्षाबलों को छकाने का जो तरीक़ा चुना है, वह ख़ास तौर से ग़ौर किए जाने लायक है. यह मसला मुझे इस दृष्टि से बिलकुल महत्वपूर्ण नहीं लगता कि माओवादी क्या चाहते हैं या उनकी क्या रणनीति है. लेकिन यह इस दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है कि माओवादी जो कुछ भी कर रहे हैं, उसके लिए उन्होंने यह जो रणनीति बनाई है वह सफल कैसे हो जा रही है. क्या उसका सफल होना केवल एक घटना है या फिर हमारी कमज़ोरी या फिर हमारी सामाजिक विसंगतियों का नतीजा या कि हमारी पूरी की पूरी संसदीय व्यवस्था की विफलता? या फिर इन सबका मिला-जुला परिणाम?
यह ग़ौर करने की ज़रूरत है कि माओवादी विद्रोहियों ने अपने लिए लालगढ़ में जो सुरक्षा घेरा बना रखा था उसमें सबसे आगे महिलाएं थीं और बच्चे थे. महिलाओं और बच्चों के मामले में केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं, पूरे भारत का नज़रिया एक सा है. उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक. केवल उनके प्रति संवेदनशीलता और उनकी हिफ़ाज़त के मामले में ही नहीं, उनके प्रति हैवानियत के मामले में भी. कोई आसानी से अपने परिवार की महिलाओं, बच्चों या बुजुर्गों को कहीं भिड़ने नहीं भेजता. पर माओवादियों को बचाने के लिए वे यह भी करने को तैयार हो गए तो क्यों? अब यह एक अलग बात है कि माओवादी और नक्सली एक ही बात नहीं है, पर आम तौर पर इन्हें एक ही समझा जाता है. ख़ैर समझने का क्या करिएगा! समझने का तो आलम यह है कि मार्क्सवाद और माओवाद का फ़र्क़ भी बहुत लोग नहीं जानते, पर इससे मार्क्सवाद माओवाद नहीं हो जाता और न अगली पंक्ति के सभी मार्क्सवादियों के व्यवहार में धुर माओवादी या फासीवादी हो जाने से ही ऐसा हो जाता है. बहरहाल, समाज का शोषित-वंचित तबका जब इन्हें बचाने के लिए अपने और अपने प्रियजनों के प्राणों की बाजी तक लगाने के लिए तैयार हो जाता है तो उसके मूल में किसी मार्क्सवाद, माओवाद, स्टालिनवाद या नक्सलवाद का कोई खांचा नहीं होता है. दुनिया के किसी सिद्धांत से उसका कोई मतलब नहीं होता है.
फिर भी यह देखा जाता है कि वह अपना सब कुछ इनके लिए लुटाने को तैयार हो जाता है. यह बात केवल यहीं तक सीमित नहीं है. नक्सली झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छ्त्तीसगढ़, उड़ीसा, आन्ध्र प्रदेश और अन्य राज्यों में भी फैले हैं. सरकारी और पूंजीवादी मीडियातंत्र द्वारा दुष्प्रचार के तमाम टोटके अपनाए जाने के बावजूद इन्हें वहां की आम जनता का पूरा समर्थन मिल रहा है. सिर्फ़ इन्हें ही नहीं, इनके जैसे कई दूसरे संगठनों-गिरोहों को भी जनता का पूरा समर्थन मिल रहा है. भारतीय समाज में बहुत जगहों पर डकैत भी ऐसे ही अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल साबित होते रहे हैं, बावजूद इसके कि उनका ऐसा कोई वाद-सिद्धांत नहीं होता रहा है और न वे किसी बड़े-व्यापक परिवर्तन का सपना ही दिखाते रहे हैं. और हां, इसका मतलब यह भी न निकालें कि मैं डाकुओं, नक्सलियों और माओवादियों को एक समान मान रहा हूं. बुनियादी बात बस यह है कि जनसमर्थन उन्हें भी हासिल होता रहा है. और ऐसा केवल हमारे देश में होता हो, यह भी नहीं है. दुनिया का इतिहास पलट कर देखें तो ऐसे हज़ारों उदाहरण दूसरे देशों में भी मिल जाएंगे. इस तरह देखें तो हमारे समाज में जनसमर्थन हासिल करने का मतलब किसी दर्शन या सिद्धांत के प्रति लोगों का समर्थन या उनकी आस्था हासिल करना नहीं होता है. जब बहुत सारे लोग अपनी और अपने बाल-बच्चों की जान की परवाह छोड़ कर नक्सलियों-माओवादियों का साथ दे रहे होते हैं तो उनके मन में कुछ बहुत गहरे असंतोष होते हैं, रोष होते हैं. उनकी कुछ ज़रूरतें हैं, जिनको वे किसी न किसी तरह एक नियत हद तक शायद पूरी कर देते हैं. यह ग़ौर करने की बात है कि समाज का एक ही ख़ास तबका है जिसे अधिकतर नक्सली या माओवादी संगठन अपना निशाना बनाते हैं. नेपाल से लेकर चेन्नई तक फैले जंगलों में वे इसी ख़ास तबके को लेकर बढ़ते चले गए हैं. बावजूद इसके कि दोनों की हालत अभी तक जस की तस है, ये हक़ीक़त है कि पुलिस के लिए वनवासियों या ग्रामीणों से उनके बारे में किसी तरह का सुराग पाना आसान बात नहीं है. क्यों? क्योंकि आम जनता पुलिस पर ज़रा सा भी भरोसा नहीं करती, लेकिन नक्सलियों और माओवादियों पर पूरा भरोसा करती है. यहां तक कि डाकुओं और आतंकवादियों पर भी भरोसा कर लेती है, पर पुलिस पर वह भरोसा नहीं करती.
ख़ैर भरोसे पर बात बाद में. बुनियादी बात यह है कि उस एक ख़ास तबके को ही पकड़ कर ये आगे फैलते क्यों जाते हैं? क्योंकि यह हमारे समाज का वह तबका है जो बेहद शोषित और पूरी तरह वंचित है. विकास के नए उपादानों का तो उसे कोई लाभ नहीं ही मिल सका है, उसकी रही-सही ज़मीन भी उसके पैरों तले से छीन ली जा रही है. उनके संसाधनों की इस लूट को व्यवस्था की खुली छूट है.
इसका एहसास लूटने वाले हमारे तंत्र को हो न हो, पर भुगतने वालों को तो दर्द टीसता ही है. इसी टीस की पहचान उन्हें है. इसका लाभ वे उठा रहे हैं. और यक़ीनन, वे उसका सिर्फ़ लाभ ही उठा रहे हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे हमारा पूंजीवादी तंत्र वनवासियों के भोलेपन और संसाधनों का लाभ उठा रहा है. पर वनवासियों की मजबूरी यह है कि उन्हें इस तथाकथित सभ्य व्यवस्था के पेंचो-खम पता नहीं हैं. इसलिए वे इसके कई पाटों के बीच पिस कर रह जाते हैं. जब नक्सली आते हैं और उन्हें समझाते हैं कि उनके हक़ की लड़ाई वे लड़ेंगे, तो उनका सहज ही विश्वास कर लेना बहुत ही साधारण बात है. बिलकुल ऐसे ही ग्रामीण डाकुओं की बातों पर भरोसा कर लेते थे. कहीं-कहीं आज भी कर लेते हैं और आगे भी करते रहेंगे. यही बात है जो लालगढ़ में लोगों को माओवादियों की सुरक्षा के लिए आगे खड़े हो जाने के लिए विवश कर रही है.
हालांकि, ख़ास लालगढ़ के सन्दर्भ में यह मामला कई और मसलों पर सोचने के लिए विवश करता है. पर उन सब पर फिर कभी. अभी तो सिर्फ़ इस सवाल का जवाब मैं चाहता हूं कि मान लें लालगढ़ की हालिया समस्या हल कर लेंगे. मान लेते हैं कि वहां सारे माओवादियों को मार गिराएंगे. तो भी क्या इतने से यह समस्या हल हो जाएगी? क्या इसके बाद फिर माओवादी कहीं अपने पैर पसार नहीं सकेंगे? यह क्यों भूलते हैं कि जो लोग उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले हैं उनकी तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है. अब सिर्फ़ वनवासी ही नहीं, ग्रामीण किसान भी धीरे-धीरे उसी स्थिति में पहुंच रहे हैं जिस स्थिति में पिछली कई शताब्दियों से वनवासी हैं. गांव का किसान अपने को पूरी तरह लुटा-पिटा महसूस कर रहा है. व्यवस्था उसकी सिर्फ़ और सिर्फ़ उपेक्षा ही कर रही है. पिछले 20 सालों में देश में केंद्र या किसी राज्य की भी सरकार ने किसानों के हित में कोई नीति बनाई हो, ऐसा मुझे याद नहीं आता. ग़ौर से देखें तो शहरों में एक ऐसा ही तबका है, जो शेष आबादी से कटा हुआ है. शहर की ज़िन्दगी की जो मुख्यधारा कही जाती है उसके हाशिए से भी वह बाहर है. ये सभी जो वर्ग हैं, इन्हें पहले व्यवस्था ने शिकार बनाया है इनके भीतर की मलाई निकालने के लिए और आने वाले दिनों में माओवादी या ऐसे ही दूसरे संगठन इन्हें अपना शिकार बनाएंगे. इनका उपयोग कर व्यवस्था की मलाई हासिल करने के लिए.
वह स्रोत जिससे ऐसे संगठनों को ऊर्जा मिलती है आगे बढने की वह कोई मनुष्य नहीं, बल्कि आम आदमी के भीतर मौजूद भूख है. यह भूख सिर्फ़ पेट की नहीं है, यह भूख सामान्य मानवीय भावनाओं की भी है. आत्मसम्मान और स्वाभिमान की भी है. मनुष्य के सचमुच का मनुष्य बन कर जीने की भूख है. इसके लिए कुछ ज़्यादा करने की ज़रूरत नहीं है. सिर्फ़ इतना ही तो करना है कि व्यवस्था के शीर्ष पर जो लोग मौजूद हैं, उन्हें अपनी हबस थोड़ी कम कर देनी है. क्या यह बहुत मुश्किल बात है? अगर नहीं तो फिर सिर्फ़ इतना क्यों नहीं कर देते वे? या फिर उन्हें यह बात समझ में नहीं आती कि कल इसका नतीजा क्या निकलेगा?

Posted in राजनीति, समाज, हमारे समय में, politics, society | 11 Comments »

मज़ाक का लाइसेंस

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 24, 2009

डिस्क्लेमर : अथातो जूता जिज्ञासा की सींकड तोड़्ने के लिए आज एक बार फिर क्षमा करें. कल आपको सुबह 6 बजे जूता जिज्ञासा की 20वीं कड़ी मिल जाएगी. आज आप कृपया यह झेल लें. मेरी यह लुक्कड़ई मुख्यत: दो ब्लॉगर बन्धुओं को समर्पित है. किन्हें, यह जानने के लिए आगे बढ़ें और इसे पढ़ें……….

 

काऊ बेल्ट में एक बात बहुत बढिया हुई है पिछ्ले दो-तीन दशकों में. आप मानें या न मानें लेकिन मैं ऐसा मानता हूँ. पहले लोग नेता चुनते थे, इस उम्मीद में कि ये हमारी नेतागिरी करेगा. उस पर पूरा भरोसा करते थे, कि जब हम भटकेंगे तब ये हमको रास्ता दिखाएगा. अगर कभी ऐसा हुआ कि हम हिम्मत हारने लगे तब ये हमें हिम्मत बंधाएगा. हमको बोलेगा कि देखो भाई इतनी जल्दी घबराना नहीं चाहिए. तुम सही हो अपने मुद्दे पर, लिहाजा तुम लड़ो और हम तुम्हारे साथ हैं. अगर कोई हमें दबाने की कोशिश करेगा तो यह हमारी ओर से लड़ेगा. हमे हर जगह उभारने की ईमानदार कोशिश करेगा. सुनते हैं कि पहले जब देश को गोरे अंग्रेजों से आज़ादी मिली तब शुरू-शुरू में कुछ दिन ऐसा हुआ भी. दो-चार नेता ग़लती से ऐसे आ गए थे न, इसीलिए.

फिर धीरे-धीरे नेता लोगों ने लोगों की उम्मीदों को ठेंगा दिखाना शुरू किया. पहले लम्बे-चौड़े वादे करके नेता बनते थे फिर बेचारी पब्लिक को पता चलता था कि असली में कर तो ये अपने वादों का ठीक उलटा रहे हैं. नेताजी मुश्किल मौक़ों पर हमें हिम्मत बंधाने के बजाय हर जगह हमारी हिम्मत तोड़ने, रास्ता दिखाने के बजाय और भटकाने, उभारने के बजाय ख़ुद दबाने और हमारी लड़ाई लड़ने के बजाय हमें ही ठिकाने लगाने की साजिश में जुटे हैं.  विकास तो बेचारा कहीं हो नहीं रहा, उलटे उसका प्रचार जाने किस आधार पर किया जा रहा है और उसके नाम पर कमीशन भरपूर खाया जा रहा है. ग़रीबी नेताजी ने कही तो थी हमारी मिटाने के लिए, पर मिटाई उन्होंने सिर्फ़ अपनी और चमचों की. अलबत्ता हम और ज़्यादा ग़रीब हो गए. इससे भी बड़ी और भयंकर बात यह है हमारी उत्तरोत्तर ज़्यादा ग़रीब और उनके ज़्यादा अमीर होते जाते जाने की परम्परा लगातार जारी ही है.

अब जनता के सामने यह भेद ख़ुला कि वास्तव में यह नेता नहीं, अभिनेता हैं. अभिनय ये बहुत टॉप क्लास करते हैं, ऐसा झकास कि बड़े-बड़े अभिनेता भी न कर सकें. जो कुछ भी ये कहते हैं वह कोई असली की बात नहीं, बल्कि एक ड्रामे का डायलॉग है, बस. ई मंच पर आते हैं. पहले से स्क्रिप्ट में जो कुछ भी लिखा होता है, वह बोल देते हैं. बात ख़त्म. अगले दिन यह इस स्क्रिप्ट की सारी बात भूल कर नई स्क्रिप्ट के मुताबिक काम शुरू कर देते हैं. फिर न आज वाली जनता से उनका कोई मतलब रह जाता है और न उससे किए हुए वादों से.

असल में आधुनिक भारत में नेतागिरी की परम्परा ही अभिनेतागिरी से शुरू हुई है. कुछ लोग इस बात को शुरू में ही समझ गए और कुछ नहीं समझ सके. जो नहीं समझ सके थे, उनमें कुछ तो थोडे दिनों बाद समझ गए और कुछ ठोकर खा-खा कर भी नहीं समझ सके. जो नहीं समझ सके उनकी छोड़िए. पर जो समझ गए वो सचमुच बड़े आदमी बन गए. वे किसी बात की चिंता नहीं करते हैं. चिंता करने का सिर्फ़ अभिनय करते हैं. अभिनय भी ऐसा कि वाह क्या ज़ोरदार. एकदम हक़ीक़त टाइप लगे. बल्कि हक़ीक़त फेल हो जाए और उनका अभिनय चल निकले. हम ऐसे एक जन को जानते हैं जो बहुत चिंता करते हैं. उनकी चिंता का आलम ये है कि घुरहू की भैंस मरे तो चिंता, लफ्टन साहब का कुक्कुर मर जाए तो चिंता. भले घुरहू की भैंस लफ्टन साहब के कुक्कुर साहब द्वारा काटे जाने के कारण ही मरी हो. ऐसे कई और उदाहरण हैं. हम कहाँ तक गिनाएं. आप तो ख़ुद ही समझदार हैं. समझ जाइए. उनकी चिंता की हालत यह थी कि शहर के बाहरी इलाके में ज़रा सी हवा चली नहीं कि वे आंधी आने की आशंका से चिंतित हो उठते थे और तुरंत अखबार के दफ्तर में पहुंच जाते थे विज्ञप्ति लेकर. अगर कोई सुझा देता था कि आप प्रशासन से मांग करिए कि वह आंधी-तूफान को आने से रोकने की व्यवस्था करे, तो उनको कभी कोई संकोच नहीं होता था. वह तुरंत मांग कर देते थे. लोकल अखबारों में छपी उनकी विज्ञप्तियों के ज़रिये बना इतिहास इस बात का गवाह है कि पानी को बरसने और सूखे को आने से रोकने तक की मांग वह कई बार कर चुके थे.

असल में भारतवर्ष में चिंता, मांग और उसे मनवाने के तौर-तरीक़े से वह भरपूर वाकिफ़ थे. अगर उनकी मांग नहीं मानी जाती थी दो-तीन बार करने के बाद भी, तब वह अनशन पर बैठ जाते थे. थोड़े दिन बैठे रहते थे तो पहले तो कोई तहसीलदार साहब आ जाते थे. उनको समझा-बुझा देते थे. पब्ल्कि को लगता था कि अब हमारी समस्या हल हो जाएगी और वह चल देते थे. उनका अनशन टूट जाता था. फिर पब्लिक को उनकी पहुंच पर थोड़ा शक़ होने लगा और उनको भी लगा कि बार-बार ये तहसीलदार ही आ रहा है. इससे हमारा रोब पब्लिक पर थोड़ा कम हो रहा है. तब वह सीधे डीएम को संबोधित करके मांग करने लगे. अनशन की अवधि थोड़ी बढ़ा दी. पत्रकार भाइयों को चाय पिलाने के अलावा बोतल भी पहुंचाने लगे. अब उनकी अनशन सभाओं में डीएम आने लगे.

बेचारी जनता पर इस बात का बड़ा गम्भीर असर हुआ. आख़िरकार जनता ने उनको अपने क्षेत्र की बागडोर सौंप दी. इसके बाद वे ऐसे नदारद हुए कि अगले पांच साल तक उनको देखने की कौन कहे, आवाज तक लोगों ने नहीं सुनी. बस अख़बारों में लोग उनकी विज्ञप्तियां और कान-फरेंस की ख़बरें ही पढ़ती रही.  इस बीच जनता ने पूरा मन बना लिया कि अब जब आएंगे नेताजी तो वो मज़ा चखाएंगे कि वह भी क्या याद करेंगे. पर बाद में जब आए तो ऐसा भौकाल बनाया नेताजी ने कि बेचारी पब्लिकवे सुन्न हो गई. कुर्ते के कॉलर से लेकर पजामे का नाड़ा तक पसीने से तर-बतर था नेताजी का. दिया उन्होने ब्योरा कि पब्लिक की भलाई के लिए उन्होने क्या-क्या किया. ये मंत्री, वो संत्री, ये नेता, वो ओता, ये अफसर, वो वफसर… रोज न जाने कितने लोगों से मिलते रहे. कई-कई दिन तो खाना तक नहीं खा पाते बेचारे.

फिर क्या था! पब्लिक ने फिर से उनको मान लिया अपना नेता. भेज दिया फिर लखनऊ से भी आगे, अबकी दिल्ली के लिए. बस. बहुत दिन बाद पब्लिक की समझ में आया कि ये कोई हक़ीक़त नहीं है. नेताजी जो कुछ भी करते हैं वह सब फ़साना है, लिहाजा अब नेताजी को ही फंसाना है. नेताजी पब्लिक की किसी परेशानी से चिंतित नहीं होते हैं, बल्कि चिंतित होने का अभिनय करते हैं. जो इसको समझ लेता है उसके साथ वह थोड़ा उससे आगे बढ़कर कुछ कर देते हैं. ये समझिए कि वही काम जो गांव की नाच में लबार यानी कि जोकर करता है. मतलब मज़ाक. बस, और कुछ नहीं.

एक दिन एक संत जी बता रहे थे कि ये ज़िन्दगी क्या है. ये दुनिया क्या है. दुनिया एक मंच है और हर आदमी अभिनेता. सभी अपना-अपना रोल खेल रहे हैं और चले जा रहे हैं. हमारे गांव के घुरहू ने तब निष्कर्ष निकाला कि असल में नेता जी ने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया है. घुरहू की अक़्ल असल में संत जी के उलट थी. घुरहू मानते थे कि ज़िन्दगी सच है, लिहाजा ज़िन्दगी की घटनाएं भी सच हैं और उस सच का अभिनय है सच के साथ एक्सपेरीमेंट. असल में नेताजी यही कर रहे हैं. एक्सपेरीमेंट. पब्लिक को अब सच के साथ यह एक्सपेरीमेंट बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. इससे वह छली जाती है.

 
इसके पहले कि अपना निष्कर्ष घुरहू सबको बता पाते और यह बात दूर-दूर तक फैलती, नेताजी को पता चल गई. उन्होने तुरंत इंतज़ाम बनाया. ख़ुद बैठ गए और अपने सामने आए बहुत बडे कद्दावर नेताजी के सामने एक अभिनेता जी को उतार दिए. अभिनेता जी ने क्या कमाल किया. कद्दवर नेताजी की तो उन्होने धोती ही ढीली कर दी. पब्लिक ने सोचा था कि अभिनेता जी जैसे फिल्मों में दिखाते हैं कलाबाजी, वैसे ही दिखाएंगे असल ज़मीन पर भी. एक फैट मारेंगे और एके 47 वाले धरती पकड लेंगे. अभिनेता जी जब पर्चा भर के निकले न कचहरी से, तो लड़की लोगों ने अपनी चुनरी बिछा दी उनके स्वागत में. लेकिन देर नहीं लगी. थोड़े ही दिन में उनको पता चल गया कि संसद के सेट पर उनसे भी बड़े-बड़े सुपर स्टार जमे हुए हैं. भाग खड़े हुए मैदान से. इधर पब्लिक ने ये भी देख लिया कि सिनेमा में बहुत ख़ुद्दार दिखने वाले अभिनेता जी जो हैं, ऊ हमारे गांव के नचनिए से ज़्यादा हिम्मतवर नहीं हैं. ज़रा सा झटका लगते ही तेल बेचने चल देते हैं. तो उस बेचारी का भरोसा थोड़ा और डगमगाया. उसने कुछ जगह अभिनेता लोगों को भाव देना बन्द कर दिया.
नेताजी ने यह बात फिर समझ ली. तो लीजिए अबकी बार ऊ सीधे गांव के नाच से ही लेकर आए हैं. बहुत टॉप क्लास का लबार. अरे वही लबार जिसकी एक-एक बात पर हंसते-हंसते आप लोग लोटपोट हो जाते हैं. घंटों खाना-पीना छोड़ के टीवी से चिपटे रहते हैं. अब उसको आपकी नुमाइंदगी के लिए भेजा जा रहा है. संसद के स्टूडियो में जाके अब ऊ आपके हितों पर लड़ने का अभिनय करेगा. हे भाई देखिए, जैसे सभी नेता जी लोग करते हैं चुनावी महाभारत में उन बेचारे को भी आपसे वादे तो करने ही पड़ेंगे. ये उसकी दस्तूर है न, इसीलिए. लेकिन एक बात का ध्यान रखिएगा कि आप कहीं उस वादे को दिल से न लगा लीजिएगा. भूल के भी अगर अइसा करेंगे न, तो पछताइएगा. क्योंकि मज़ाक करना उनका पेशा है. ऊ परदे से लेके चुनावी मंच तक आपके साथ मज़ाक करेंगे. संसद, देश के संविधान, जनता यानी कि आप के हितों और लोकतंत्र के साथ तो मज़ाक यहाँ होइए रहा है, बहुत दिनों से. पर अभी तक जो यह सब होता थ न, वह सब तनी संकोच के साथ होता था. समझ लीजिए कि अब वह संकोच नहीं बचेगा. जो भी होगा खुले आम होगा. संसद और संसदीय मर्यादाओं, जनता और जनता के हितों, लोक और लोकतंत्र, देश और देश के संविधान …… और जो कुछ भी आप सोच सकते हैं, उस सबके साथ, मज़ाक का सीधा लाइसेंस अब जारी हो गया है. आगे जैसा आपको रुचे. समझ गए न ज्ञान भैया और भाई सिद्धार्थ जी बुझाएल कि ना कुछू?

Posted in बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हमारे समय में, हास्य, Hindi Literature, humour, politics, satire, society | 8 Comments »

ठेला

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 17, 2008

प्रयाग विश्वविद्यालय शहर के उत्तरी छोर पर पसरा हुआ है.यहाँ से भी उत्तर बढे तो एक गाँव मिलता है -चांदपुर सलोरी, शहर से बिल्कुल जुड़ा हुआ.पहले तो यह गाँव ही था लेकिन अब सुना है नगर-निगम इस के उस पार तक पसर गया है. अब से करीब बीस साल पहले जब मैं पहली बार प्रयाग आकर इसी गाँव में एक कमरा किराये पर लेकर रहने लगा था तो वहाँ की आबो-हवा बिल्कुल गाँव जैसी ही मिली थी .लेकिन महानगर से जुड़े होने के कारण उस समय भी वहाँ एक डिग्री कॉलेज, लड़के और लड़कियों के लिए दो अलग इंटर कॉलेज और अनेक शिशु मन्दिर खुल चुके थे. बैंक भी था और पक्के मकानों की छतों पर स्टार टीवी की छतरियाँ भी उग आई थी. सब कुछ शहर से मेल खाता हुआ. इलाहाबाद में अपना कॅरिअर सवारने आये असंख्य विद्यार्थी इस गाँव में तब भी रहते थे. किरायेदारी का धंधा यहाँ खूब फल- फूल रहा था. इसी गाँव के नुक्कड़ पर चाय -पानी, शाक-सब्जी और परचून की दुकानों की कतार से अलग एक निराला विक्रेता था- ‘कंठी-बजवा’. लंबे छरहरे बदन पर साठ से उपर की उमर बताने वाली झुर्रियां, पतली, नुकीली सफ़ेद मूछे, लाल डोरेदार आँखों के नीचे झूलती ढीली चमड़ी और गंजे सिर के किनारों पर बचे सफ़ेद बाल उसकी अपरिमित सक्रियता को रोमांचक बना देते थे. चारखाने की मैल में चिमटी उतंग लुंगी, टेरीकाट की मटमैली सफ़ेद कमीज और कंधे पर लटका काला पड़ चुका सफ़ेद गमछा जो धूप में उसके सिर पर बने चाँद को ढक लेता था. हमेशा यही बाना…
डिग्री कॉलेज के गेट से लेकर गाँव के नुक्कड़ तक उसका ठेला उसकी सुपरिचित और विशिष्ट आवाज़ के साथ कहीं भी मिल जाता था. लड़के हमेशा उसे घेरे रहते थे. कुछ खरीदारी के लिए तो कुछ सिर्फ़ उसकी बे सिर-पैर की हंसोड़ बातों का मज़ा लेने के लिए. ग्रामीण शैली के मुहावरों व लोकोक्तियों से अटी उसकी धारा प्रवाह भाषा का नाम हम कभी तय नहीं कर पाए. हाँ, बीच-बीच में एक शब्द नगीने की तरह जड़ा हुआ हमारे कान से टकरा जाता था –‘कंठी-बजवा’. तभी तो हम उसे इसी नाम से जानने लगे थे. यह या तो उसकी कहानियो का कोई नायक होगा या उसका ही कोई प्रतिनिधि ..जो हर आने -जाने वाले को मानो हाथ पकड़ कर खींच लाता था. इलाहाबाद के नामी अमरूद हों या छील -काट कर बेंचे जाने वाले कच्चे कटहल की सब्जी, कच्ची अमियाँ और नीबू हो या पके दशहरी आम और केले. बदले सामान के साथ न तो उसका स्थान बदला, न ही स्टाइल और न ही खरीदारों की जमघट ….
…उसकी उम्र भी शायद रुक गई थी .चार -चार बेटियों की शादी ,बेटों की पढ़ाई और सड़क के किनारे पक्का मकान सब कुछ उसने इसी ठेले से कर लिया .”लड़के तो जवान हो गए ,अब यह पसीना क्यों बहाते हो दादा?”, पूछने पर उसने कैफियत दी- “यही तो हमरी ‘लच्छमी’ है बाबूजी !”

Posted in हमारे समय में | 2 Comments »

बर्मा में ब्लॉगर्स पर पहरा और हमारे लिए इसका मतलब?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 4, 2007

दिलीप मंडल

बर्मा यानी म्यांमार में सरकार ने इंटरनेट कनेक्शन बंद कर दिए हैंइससे पहले वहां की सबसे बड़ी और सरकारीइंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनी बागान साइबरटेक ने इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड इतनी कम कर दी थी कि फोटोअपलोड और डाउनलोड करना नामुमकिन हो गयासाथ ही साइबर कैफे बंद करा दिए गए हैंबर्मा के ब्लॉग केबारे में ये खबर जरूर देखेंMyanmar’s blogs of bloodshed

बर्मा में फौजी तानाशाही को विभत्स चेहरा अगर दुनियाके सामने पाया तो इसका श्रेय वहां के ब्लॉगर्स को हीजाता हैवहां की खबरें, दमन की तस्वीरें बर्मा के ब्लॉगर्सके जरिए ही हम तक पहुंचींबर्मा में एक फीसदी से भीकम आबादी की इंटरनेट तक पहुंच हैफिर भी ऐसे समयमें जब संचार के बाकी माध्यम या तो सरकारी कब्जे में हैंया फिर किसी किसी तरह से उन्हें चुप करा दिया गयाहै, तब बर्मा के ब्लॉगर्स ने सूचना महामार्ग पर अपनीदमदार मौजूदगी दर्ज कराईअमेरिका में युद्ध विरोधीआंदोलन के बाद ब्लॉग का विश्व राजनीति में ये शायदसबसे बड़ा हस्तक्षेप हैब्लॉग की लोकतांत्रिक क्षमता कोइन घटनाओं ने साबित किया है

लेकिन भारतीय ब्लॉगर्स के लिए भी क्या इन घटनाओं काकोई मतलब है? आप अपने लिए इसका जो भी मतलबनिकालें उससे पहले कृपया इन तथ्यों पर विचार कर लें

जिस समय बर्मा में दमन चल रहा है, उसी दौरान भारत के पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा बर्मा का दौरा कर आएहैंभारत को बर्मा का नैचुरल गैस चाहिएइसके लिए अगर विश्व स्तर पर थूथू झेलनी पड़े तो इसकी परवाहकिसे हैफिर चीन को भी तो बर्मी नैचुरल गैस चाहिए
भारत सरकार सिर्फ बर्मा के सैनिक शासन को मान्यता देता है और उससे व्यापारिक और राजनयिक संबंधरखता है, बल्कि इन संबंधों को और मजबूत भी करना चाहता है
भारत में सुचना प्रवाह पर पहरे लगाने के कई प्रयोग हो चुके हैंइमरजेंसी उसमें सबसे बदनाम हैलेकिनइमरजेंसी के बगैर भी बोलने और अपनी बात औरों तक पहुंचाने की आजादी पर कई बार नियंत्रण लगाने कीसफल और असफल कोशिश हो चुकी है
इसके लिए एक कानून बनने ही वाला हैसरकार वैसे भी केबल एक्ट के तहत चैनल को बैन करने का अधिकारअपने हाथ में ले चुकी है और इसका इस्तेमाल करने लगी है
पसंद आने वाली किताब से लेकर पेंटिंग और फिल्मों तक को लोगों तक पहुंचने देने से रोकने में कांग्रेस औरबीजेपी दोनों किसी से कम नहीं हैलोकतंत्र दोनों के स्वभाव में नहीं है

और बात ब्लॉग की

अभी शायद भारतीय ब्लॉग की ताकत इतनी नहीं बन पाई है कि सरकार का ध्यान इस ओर जाए
ब्लॉग के कंटेट में भी गपशप ज्यादा और प्रतिरोध का स्वर कम हैहम इस मामले में बर्मा के ब्लॉगर्स से पीछे हैं
ब्लॉग पर सेंसर लगाने का कानूनी अधिकार सरकार के पास हैइसके लिए उसे कोई नया कानून नहीं बनानाहोगा
आईपी एड्रेस के जरिए ब्लॉगर तक पहुंचने का तरीका हमारी पुलिस जानती है

इसलिए ब्लॉगिंग करते समय इस गलतफहमी में रहें कि किसे परवाह हैअगर आप परवाह करने लायक लिखरहे हैं तो परवाह करने वाले मौजूद हैंऔर फिर जो लोग आजादी की कीमत नहीं जानते वो अपनी आजादी खो देनेके लिए अभिशप्त होते हैं

Posted in हमारे समय में | 5 Comments »

इस मर्ज की दवा क्या है?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 29, 2007


सत्येन्द्र प्रताप
एक अखबार केस्थानीय संपादक के बारे में खबर आई कि वे रंगरेलियां बनाते हुए देखे गए. कहा जा रहा है कि एक स्थानीय अखबार के रिपोर्टर ने खबर भी फाइल कर दी थी. हालांकि इस तरह की खबरें अखबार और चैनल की दुनिया में आम है और आए दिन आती रही हैं. लेकिन दिल्ली और बड़े महानगरों से जाकर छोटे शहरों में पत्रकारिता के गुर सिखाने वाले स्थानीय संपादकों ने ये खेल शुरु कर दिया है. राष्ट्रीय चैनलों के कुछ नामी गिरामी हस्तियों के तो अपने जूनियर और ट्रेनी लड़कियों के एबार्शन कराए जाने तक की कनफुसकी होती रहती है.
खबर की दुिनया में जब अखबार में किसी लड़के और लड़की के बारे में रंगरेिलयां मनाते हुए धरे गए, खबर लगती है तो उन्हें बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता है. लेिकन उन िविद्वानों का क्या िकया जाए जो नौकरी देने की स्थिति में रहते हैं और जब कोई लड़की उनसे नौकरी मांगने आती है तो उसके सौन्दर्य को योग्यता का मानदंड बनाया जाता है और अगर वह लड़की समझौता करने को तैयार हो जाती है तो उसे प्रोन्नति मिलने और बड़ी पत्रकार बनने में देर नहीं लगती.
एक नामी िगरामी तेज – तर्रार और युवा स्थानीय संपादक के बारे में सभी पत्रकार कहते हैं िक वह ले-आउट डिजाइन के निर्विवाद रुप से िवशेषग्य हैं. लेिकन साथ ही यह भी जोड़ा जाता है िक वह बहुत ही रंगीन िमजाज थे, पुरबिया अंदाज में कहा जाए तो, लंगोट के कच्चे थे.
महिलाओं के प्रति यौन िंहसा की खबर तमाम प्राइवेट और सरकारी सेक्टर से आती है. न्यायालय से लेकर संसद तक इस मुद्दे पर बहस भी होती है. लेिकन नतीजा कुछ भी नहीं. अगर कुंिठत व्यक्ति उच्च पदासीन है तो मामले दब जाते हैं और अगर कोई छोटा आदमी है तो उसे पुिलस भी पकड़ती है और अपमािनत भी होना पड़ता है.
अगर पत्रकारिता की बात करें तो जैसे ही हम िदल्ली मुंबई जैसे महानगरों से बाहर िनकलते हैं तो खबरों के प्रति लोगों का नजरिया बहुत ही पवित्र होता है. लोग अखबार में भी खबरें ही पढ़ना चाहते हैं जो उनके जीवन और उनके िहतों से जुड़ी हों, सनसनी फैलाने वाली सामग्री कोई भी पसंद नहीं करता। पत्रकारों के प्रति लोगों का नजिरया भी अच्छा है और अखबार के माध्यम से वे अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं. अगर रंगरेिलयां जैसी खबरें वे अपने पूज्य संपादकों या पत्रकारों के बारे में सुनते या पढ़ते हैं तो उनका नजरिया भी बदल जाता है. हालांिक महानगरों में िहक्की गजट टाइप के ही अखबार छपते हैं जिसमें फिल्मी नायक नायिकाओं के प्रसंग छपते हैं.
उच्चपदों पर बैठे यौनकुंिठत वरिष्ठ पत्रकारों की कुंठा का कोई हल नजर नहीं आता. बार बार कहा जा रहा है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है , योग्य लोगों की जरुरत है, लेकिन वहीं बड़े पदों पर शराब और शबाब के शौकीन वृद्ध रंगीलों के िकस्से बढ़ते ही जा रहे हैं.

Posted in हमारे समय में | Leave a Comment »

वो नही चाहते कि कोई इसे पढ़े, इसलिए आपका धर्म है कि इसे गाएं, गुनगुनाएं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 28, 2007

-दिलीप मंडल

याद
है आपको वो कविता। झांसी की रानी। देश के अमूमन हर राज्य की स्कूली किताबों में सुभद्रा कुमारी चौहान की ये कविता पढ़ाई जाती है। लेकिन राजस्थान बीजेपी को इसकी कुछ पंक्तियां अश्लील लगती है। इसलिए कविता तो छपती है लेकिन आपत्तिजनक लाइनें उसमें से हटा दी जाती हैं। पहले ये देखिए कि वो लाइनें कौन सी हैं, जिन्हें बीजेपी आपकी स्मृति से हटाना चाहती है।


अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

विजय मिली पर अंग्रेज़ों की, फिर सेना घिर आई थी
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी

पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय घिरी अब रानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीरगति पानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

http://www.prayogshala.com/poems/subhadra-khoob-ladi-murdani-woh-to

पूरी कविता लिंक पर क्लिक करके पढ़ें, अपने बच्चों को पढ़ाएँ, क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी दोनों जगह सिंधिया परिवार का जो रूतबा है, उसे देखते हुए आश्चचर्य नहीं होना चाहिए कि एक नया इतिहास लिखा जाए, जिसमें सिंधिया खानदान को अंग्रेजों से लड़ने वाला देशभक्त साबित कर दिया जाए।

वैसे अंग्रेजो के शासन में देशभक्त और अंग्रेजभक्त की पहचान करने का एक आसान सा फॉर्मूला है। दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में आपको जिस राजपरिवार और रियासत का भवन या हाउस दिख जाए, उसे अंग्रेज बहादुर का वफादार समझ लीजिए। अब बनाइए लिस्ट- सिंधिया हाउस, कपूरथला हाउस, मंडी हाउस, बीकानेर हाउस, पौड़ी गढ़वाल हाउस (बीजेपी सांसद दिवंगत मानवेंद्र शाह के पुरखो की रियासत), धौलपुर हाउस, जोधपुर हाउस, त्रावणकोर हाउस, नाभा हाउस, पटियाला (अमरिंदर सिह के पुरखों की रियासत)हाउस, बड़ौदा हाउस, कोटा हाउस, जामनगर हाउस, दरभंगा हाउस … गिनते चले जाइए, गिनाते चले जाइए। क्या आपको किसी शहर में झांसी हाउस, आरा हाउस, बिठूर हाउस दिखा है?

दोस्तों वतन पर मरने वालों का निशां बाकी है, या वतन से गद्दारी करने वालो का? वतनपरस्तों का नाम बचा रहे इसलिए सस्वर गाइए-

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

Posted in हमारे समय में | 5 Comments »

ये क्या क्रिकेट-क्रिकेट लगा रखा है?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 28, 2007


सत्येन्द्र प्रताप
पहले टेस्ट मैच बहुत ही झेलाऊ था, फिर पचास ओवर का मैच शुरु हुआ, वह भी झेलाऊ साबित हुआ तो २०-२० आ गया. क्या खेल है भाई! भारत पाकिस्तान का मैच जोहान्सबर्ग में और सन्नाटा दिल्ली की सड़कों पर. मुझे तो इस बत की खुशी हुई कि आफिस से निकला तो खाली बस मिल गई, सड़क पर सन्नाटा पसरा था. मोहल्ले में पहुंचा तो पटाखों के कागज से सड़कें पट गईं थीं और लोग पटाखे पर पटाखे दागे जा रहे थे.
अरे भाई कोई मुझे भी तो बताए कि आखिर इस खेल में क्या मजा है? कहने को तो इस खेल में २२ खिलाडी होते हैं, लेकिन खेलते दो ही हैं. उसमें भी एक लड़का जो गेंद फेकता है वह कुछ मेहनत करता है, दूसरा पटरा नुमा एक उपकरण लेकर खड़ा रहता है. फील्ड में ग्यारह खिलाडी बल्लेबाजी कर रहे खिलाडी का मुंह ताकते रहते हैं कि कुछ तो रोजगार दो.
खेल का टाइम भी क्या खाक कम किया गया है? हाकी और फुटबाल एक से डेढ़ घंटे में निपट जाता है और उसपर भी जो खेलता है उसका एंड़ी का पसीना माथे पर आ जाता है. यहां तो भाई लोग मौज करते हैं. हां, धूप मेंखड़े होकर पसीना जरुर बहाते हैं. वैसे अगर जाड़े का वक्त हुआ तो धूप में खड़े होना भी मजेदार अनुभव हो जाता है. बस खड़े रहो और लोगों का मुंह निहारते रहो. हालांकि रिकी पॉन्टिंग जैसे खिलाडी जब खड़े-खड़े बोर हो जाते हैं तो वहीं अपनी जगह पर कूदने लगते हैं.
खिलाडी भी अजीब-अजीब होते हैं. पहले वाल्श और एंब्रोज थे, दोनों मिलाकर बारह ओवर फेंक देते थे और रोजगार देते थे विकेट कीपर को. बैटिंग करने वाला बंदा तो अपना मुंह-हाथ-पैर बचाने में ही लगा रहता था. राबिन भाई को कैसे भुलाया जा सकता था, अगर कभी गलती से पचास रन बना दिया मुंह से झाग फेंक देते थे. लगता था कि बेचारे ने मेहनत की है. पाकिस्तान के एक भाई साहब थे इंजमाम, क्या कहने! उन्हें तो दौड़ने में भी आलस आता था. ज्यादातर वे आधी पिच तक पहुंचते और उन्हें मुआ अंपायर उंगली कर देता था. वो भी समझ नहीं पाते कि आखिर क्या दुश्मनी है उनसे.
अब तो विज्ञापन कंपनियों की बांछें खिल गई हैं. क्योंकि तीन घंटे के क्रिकेट का बुखार भारत के युवकों पर चढ़ गया है. विश्वकप में भारत पाकिस्तान की दुर्दशा से तो उनका दिवाला निकल गया था. अब आर्थिक अखबारों में सर्वे पर सर्वे आ रहा है कि बड़ा मजा है इस क्रिकेट में. कंपनियों की भी बल्ले-बल्ले है.
हालांकि अगर क्रिकेट को २०-२० की जगह पर दो खिलाडियों का मैच कर दिया जाए तो मजा दुगुना हो जाए. अगर सामने लांग आन और लांगआफ पर गेंद जाए तो गेंदवाज उसे पकड़ कर लाए और अगर लेग आन लेग आफ और पीछे की ओर गेंद जाए तो बल्लेबाज उसे पकड़ कर लाए. ये मैच पांच ओवर में ही निपट जाएगा और खिलाडी खेलते हुए भी लगेंगे. दस-बीस हजार का टिकट लगाकर क्रिकेट के दीवानों को फील्ड के बाहरी हिस्से पर फील्डिंग के लिए भी लगाया जा सकता है. साथ ही नियमों में भी बदलाव की जरुरत है. पीछे गेंद जाने पर बालर को रन मिले और आगे की ओर गेंद जाने पर बैट्समैन को … वगैरा वगैरा. अगर इस तरह का क्रिकेट होने लगे तो सही बताएं गुरु मुझे भी देखने में मजा आ जाए.
Labels: खेल

Posted in खेल, हमारे समय में | 1 Comment »

वे हमारे साथ सदैव रहना चाहते है!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 27, 2007

-दिलीप मंडल

उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस इलाके में लड़कियों के साथ छेड़खानी की। उन्होंने लड़कियो के साथ जबर्दस्ती की कोशिश की। लेकिन वो हमारी आपकी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस में भर्ती होंगे। सरकार उनके साथ है। इसलिए आप चाहें या न चाहें, वो हमारी सुरक्षा करेंगे। वो हमारे लिए हमारे साथ सदैव रहना चाहते हैं।

डीयू की लड़कियां कितनी गैरवाजिब मांग उठा रही हैं। वो चाहती है कि छेड़खानी करने वाले लफंगे जिस बैच में शामिल हों, उस बैच को नौकरी पर न रखा जाए। वो चाहती है कि दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल उनकी मांग मान लें। जिस एनएसयूआई को डीयू ने खूबसूरत पोस्टर और संगठन का जलवा देखकर हाल ही मे जिताया है और जिसके नेताओं ने सोनिया गाधी के साथ तस्वीरे खिचाई थी, वो खामोशी साधे हुए है। डीयू स्टूडेंट यूनियन की प्रेसिडेट लड़की, दिल्ली की मुख्यमंत्री महिला, देश चलाने वाली एक महिला – और सभी कांग्रेसी, जिसका हाथ आम आदमी के साथ है, लेकिन डीयू की लड़कियों की एक मामूली सी और बिल्कुल सही मांग के समर्थन में कोई नही आ रहा है।

आप किस ओर खड़ें है?

Posted in हमारे समय में | 1 Comment »

हीनभावना कर रही है हिंदी की दुर्दशा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 6, 2007

सत्येन्द्र प्रताप
आजकल अखबारनवीसों की ये सोच बन गई है कि सभी लोग अंग्रेजी ही जानते हैं, हिंदी के हर शब्द कठिन होते हैं और वे आम लोगों की समझ से परे है. दिल्ली के हिंदी पत्रकारों में ये भावना सिर चढ़कर बोल रही है. हिंदी लिखने में वे हिंदी और अन्ग्रेज़ी की खिचड़ी तैयार करते हैं और हिंदी पाठकों को परोस देते हैं. नगर निगम को एम सी डी, झुग्गी झोपड़ी को जे जे घोटाले को स्कैम , और जाने क्या क्या.
यह सही है कि देश के ढाई िजलों में ही खड़ी बाली प्रचलित थी और वह भी दिल्ली के आसपास के इलाकों में. उससे आगे बढने पर कौरवी, ब्रज,अवधी, भोजपुरी, मैथिली सहित कोस कोस पर बानी और पानी बदलता रहता है.
लम्बी कोशिश के बाद भारतेंदु बाबू, मुंशी प्रेमचंद,आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद जैसे गैर हिंदी भाषियों ने हिंदी को नया आयाम दिया और उम्मीद थी कि पूरा देश उसे स्वीकार कर लेगा. जब भाषाविद् कहते थे कि हिंदी के पास शब्द नहीं है, कोई निबंध नहीं है , उन दिनों आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने क्लिष्ट निबंध लिखे, जयशंकर प्रसाद ने उद्देश्यपरक कविताएं लिखीं, निराला ने राम की शक्ति पूजा जैसी कविता लिखी, आज अखबार के संपादक शिवप्रसाद गुप्त के नेत्रित्व में काम करने वाली टीम ने नये शब्द ढूंढे, प्रेसीडेंट के लिए राष्ट्रपति शब्द का प्रयोग उनमे से एक है. अगर हिंदी के पत्रकार , उर्दू सहित अन्य देशी भाषाओं का प्रयोग कर हिंदी को आसान बनाने की कोशिश करते तो बात कुछ समझ में आने वाली थी, लेकिन अंग्रेजी का प्रयोग कर हिंदी को आसान बनाने का तरीका कहीं से गले नहीं उतरता. एक बात जरूर है कि स्वतंत्रता के बाद भी शासकों की भाषा रही अंग्रेजी को आम भारतीयों में जो सीखने की ललक है, उसे जरूर भुनाया जा रहा है. डेढ़ सौ साल की लंबी कोशिश के बाद हिंदी, एक संपन्न भाषा के रूप में िबकसित हो सकी है लेिकन अब इसी की कमाई खाने वाले हिंदी के पत्रकार इसे नष्ट करने की कोिशश में लगे हैं। आने वाले दिनों में अखबार का पंजीकरण करने वाली संस्था, किसी अखबार का हिंदी भाषा में पंजीकरण भी नहीं करेगी.
हिंदी भाषा के पत्रकारों के लिए राष्ट्रपति शब्द वेरी टिपिकल एन्ड हार्ड है, इसके प्लेस पर वन्स अगेन प्रेसीडेंट लिखना स्टार्ट कर दें, हिंदी के रीडर्स को सुविधा होगी.

Posted in हमारे समय में | 7 Comments »