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Archive for the ‘हाल-फिलहाल’ Category

आप क्या तय कर रहे हैं?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 30, 2010

बिहार चुनाव के नतीजों ने पूरी भारतीय राजनीति को झकझोर दिया है. जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे झूठे मुद्दों पर बन्दर की तरह नाचने वाले देसी मतदाताओं ने इन छलावों को मेटहे में बन्द कर लोकतंत्र की बहती नदी की तीव्र धारा के हवाले कर दिया है. बबुआ का जादू भी नहीं चला. स्विस बैंक के खुलासे सामने हैं और आम भारतीय उनमें रुचि ले रहा है. ग़ौर करने की ज़रूरत है, यह लगभग वैसा ही दौर है, जैसा राजीव गान्धी के दौर में हुआ था. आम आदमी का ध्यान पहली बार ख़ास लोगों के काले कारनामों की ओर गया था और जिसने झूठमूठ मुद्दा बना कर जनता को बहकाया था उसी ने मदारी के झोले से मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों का ख़तरनाक सांप निकाल दिया था. कांग्रेस को छात्र नेताओं के जरिये अपनी राजनीति चमकाने का मौक़ा मिल गया और उसने तुरंत पिछले दरवाज़े से छात्र नेताओं को हवा देकर आत्मदाहों का दौर चलवा दिया. पूरे देश में लगभग ख़त्म हो चुका जातिवाद नए सिरे से स्थापित हो गया.

यह न तो अकेले कांग्रेस की चाल थी, न वीपी सिंह की और न भाजपा की. वस्तुतः यह इन सबकी मिली-जुली चाल थी. इस बात पर व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सोचने की ज़रूरत है. हम फिर एक कठिन दौर में आ गए हैं. राजनेताओं की रोजी-रोटी छिनती दिख रही है और मीडिया व व्यावसायिक जगत के बड़े-बड़े टायकूनों के लंगोटे उतर रहे हैं. बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है. क्योंकि असली मुद्दों के प्रति आम आदमी की जागरूकता भारतीय राजनेता बर्दाश्त नहीं कर सकते. राजनीति की रहस्यमय बोतल से जल्दी ही जाति-धर्म-क्षेत्र-संप्रदाय … का कोई नया जिन्न निकलने ही वाला है. ऐसे में एक समझदार मनुष्य होने के नाते आपको पहले से ही अपनी भूमिका तय करके रखनी है. आप क्या तय कर रहे हैं?

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डर के बिना कुछ न करेंगे जी…!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 6, 2009

 

इलाहाबाद में आजकल पब्लिक स्कूलों में बढ़ी हुई फीस के ख़िलाफ अभिभावक सड़कों पर उतर आए हैं। वकील, पत्रकार, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी आदि सभी इस भारी फीस वृद्धि से उत्तेजित हैं। रोषपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। इसे लेकर कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने लगी तो जिलाधिकारी को स्कूल प्रबन्धकों के साथ समझौता वार्ता करनी पड़ी है। नतीजा चाहे जो रहे लेकिन इस प्रकरण ने मन में कुछ मौलिक सवाल फिर से उठा दिए हैं।जिलाधिकारी को ज्ञापन

भारतीय संविधान में ८६वें संशोधन(२००२) द्वारा प्राथमिक शिक्षा को अब मौलिक अधिकारों में सम्मिलित कर लिया गया है। मौलिक अधिकारों से सम्बन्धित अध्याय-३ में जोड़े गये अनुच्छेद २१-क में उल्लिखित है कि-

“राज्य ऐसी रीति से जैसा कि विधि बनाकर निर्धारित करे, छः वर्ष की आयु से चौदह वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करेगा।”

नागरिकों के लिए निर्धारित मौलिक कर्तव्यों की सूची, अनु.५१-क, में भी यह कर्तव्य जोड़ा गया है कि-

५१-क(ट): छः वर्ष की आयु से १४ वर्ष की आयु के बच्चों के माता पिता और प्रतिपाल्य के संरक्षक, जैसा मामला हो, उन्हें शिक्षा के अवसर प्रदान करें।”

शिक्षा को वास्तविक मौलिक अधिकार बनाने की राह में पहला कदम आजादी के पचपन साल बाद उठाकर हम संविधान में एक धारा बना सके हैं। इसका अनुपालन अभी कोसों दूर है। अभी हमारे समाज में शिक्षा व्यवस्था दो फाँट में बँटी हुई है। बल्कि दो ध्रुवों पर केन्द्रित हो गयी लगती है। पहला सरका्री और दूसरा प्राइवेट। इन दोनों क्षेत्रों में चल रही शिक्षण संस्थाओं पर गौर करें तो इनके बीच जो अन्तर दिखायी देता है उसकी व्याख्या बहुत कठिन जान पड़ती है।

 

सरकारी संस्थाओं में फीस कम ली जाती है। आयोग या चयन बोर्ड से या अन्य प्रकार की प्रतियोगी परीक्षा से चयनित योग्य अभ्यर्थियों को शिक्षण और प्रशासनिक नियन्त्रण  के कार्य के लिए योजित किया जाता है। सरकारी दर से मोटी तन्ख्वाह दी जाती है। सेवा सम्बन्धी अनेक सुविधाएं, छुट्टियाँ और परीक्षा आदि के कार्यों के लिए अतिरिक्त पारिश्रमिक। यह सब इसलिए कि सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी के इस काम में कोई कमी न रह जाय। शिक्षादान को बहुत बड़ा पुण्य भी माना जाता है। सरकारी वेतन पाते हुए यदि यह पुण्य कमाने का अवसर मिले तो क्या कहने? ऐसे ढाँचे में पलने वाली शिक्षा व्यवस्था तो बेहतरीन परिणाम वाली होनी चाहिए। लेकिन हम सभी जानते हैं कि वस्तविक स्थिति इसके विपरीत है। सच्चाई यह है कि जिस अध्यापक की जितनी मोटी तनख्वाह है उसके शिक्षण के घण्टे उतने ही कम हैं। गुणवत्ता की दुहाई देने वालों को पहले ही बता दूँ कि बड़े से बड़ा प्रोफेसर भी यदि कक्षा में जाएगा ही नहीं तो उसकी गुणवता क्या खाक जाएगी बच्चों के भेजे में।

 

प्राइवेट स्कूलों का नजारा बिल्कुल उल्टा है। फीस अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा। प्रबन्ध तन्त्र द्वारा अपने व्यावसायिक हितों (कम लागत अधिक प्राप्ति) की मांग के अनुसार शिक्षकों की नियुक्तियाँ की जाती हैं। गुणवत्ता की कसौटी काफी बाद में आती है। परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को सधाने के बाद सरकारी नौकरी पाने  में असफल रहे मजबूर टाइप के लोगों को औने-पौने दाम पर रख लिया जाता है। दस से बारह तक भी काम के घण्टे हो सकते हैं। सुविधा के नाम पर कोई छुट्टी नहीं, एल.डब्ल्यू.पी. की मजबूरी साथ में, शिक्षण के अतिरिक्त विद्यालय के दूसरे काम मुफ़्त में, नाच-गाना। लगभग बन्धुआ मजदूर जैसा काम।

 

इन दोनो मॉडल्स में जो अन्तर है उसके बावजूद एक अभिभावक की पसन्द का पैटर्न प्रतिलोमात्मक है। कम से कम प्राथमिक स्तर की शिक्षा का तो यही हाल है। जो सक्षम हैं वे अपने बच्चों का प्रवेश प्राइवेट कॉन्वेन्ट स्कूलों में ही कराते हैं। थोड़े कम सक्षम लोग भी गली-गली खुले हुए ‘इंगलिश मीडियम मॉन्टेसरी/ नर्सरी’ में जाना चाहेंगे। सरकारी स्कूल में जाने वाले तो वे भूखे-नंगे हैं जिन्हें दोपहर का मुफ़्त भोजन चाहिए। सरकारी वजीफा चाहिए जिससे मजदूर बाप अपनी बीड़ी सुलगा सके। मुफ़्त की किताबें चाहिए जिससे उसकी माँ चूल्हे में आग पकड़ा सके, स्कूल ड्रेस चाहिए जिससे वह अपना तन ढँक सके। नियन्त्रक अधिकारियों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक का ध्यान भी इन्हीं विषयों तक अटक कर रह जाता है। पठन-पाठन का मौलिक कार्य मीलों पीछे छूट जाता है। बहुत विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि सब जानते हैं कि सरकारी पाठशालाओं की हालत कैसी है।

 

मेरा प्रश्न यह है कि इसी समाज में पला-बढ़ा वही व्यक्ति सरकारी महकमें में जाकर बेहतर परिस्थियाँ पाने के बावजूद अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन क्यों हो जाता है। नौकरी की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त होते ही हरामखोरी उसके सिर पर क्यों चढ़ जाती है? बच्चों को नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाने की जिम्मेदारी जिसके सिर पर है वह स्वयं क्यों अनैतिक हो जाता है? जिसे बच्चों में सदाचार और अनुशासन का बीज बोना है, वे स्वयं अनुशासनहीन और कदाचारी कैसे हो जाते हैं? जो व्यक्ति प्राइवेट संस्थानों में सिर झुकाए कड़ी मेहनत करने के बाद तुच्छ वेतन स्वीकार करते हुए उससे बड़ी धनराशि की रसीद तक साइन कर देते हैं वही सरकारी लाइसेन्स मिलते ही आये दिन हड़ताल और प्रदर्शन करके अधिक वेतन और सुविधाओं की मांग करते रहते हैं। ऐसा क्यों है?

 

यहाँ मैं अपवादों की बात नहीं कर रहा हूँ। लेकिन सामान्य तौर पर जो दिखता है उससे मेरा निष्कर्ष यह है कि हमारा समाज ऐसे लोगों से ही भरा पड़ा है जिनके भीतर स्वार्थ, मक्कारी और मुफ़्तखोरी की प्रवृत्ति प्रधान है। अकर्मण्यता, आलस्य और अन्धेरगर्दी की फितरत स्वाभाविक है। कदाचित्‌ मनुष्य प्रकृति से ही ऐसा है। यह हालत केवल शिक्षा विभाग की नहीं है बल्कि सर्वत्र व्याप्त है। यह भी कि कायदे का काम करने के पीछे केवल एक ही शक्ति काम करती है, वह है “भय”।

 

केवल भय ही एक ऐसा मन्त्र है जिससे मनुष्य नामक जानवर को सही रास्ते पर चलाया जा सकता है। शारीरिक प्रताड़ना का भय हो, या सामाजिक प्रतिष्ठा का भय, नौकरी जाने का भय हो या नौकरी न मिल पाने का भय, रोटी छिन जाने का भय हो या भूखों मर जाने का भय; यदि कुछ अच्छा काम होता दिख रहा है तो सिर्फ़ इसी एक भय-तत्व के कारण। जहाँ इस तत्व की उपस्थिति नहीं है वहाँ अराजकता का बोलबाला ही रहने वाला है। आज ड्ण्डे की शक्ति ही कारगर रह गयी लगती है।

 

जय हो “भय” की…!!!

(सिद्धार्थ)

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चढत चइत चित लागे न रामा……

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 20, 2008

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चढत चइत चित लागे न रामा

बाबा के भवनवा……

उपशास्त्रीय संगीत मे अधिक्रित घुसपैठिए के रूप मे प्रतिष्ठित लोकसंगीत की अत्यंत लोकप्रिय विधा के साथ मुश्किल यह है इसे साल मे सिर्फ एक महीने ही गाया-सुना जा सकता है. ऐसा नही कि बाकी समय इसकी धुन बजने से मना कर देती हो, पर इसे ठीक नही समझा जाता. यह वह वक़्त है जब फागुन जाने को तैयार है और चैत बिल्कुल द्स्तक ही दे रहा है. ऐसे समय मे कही चैता की धुन भी भोजपुरिया कान मे पड जाए तो सीधे दिल मे उतरती चली जाती है. ऐसे समय मे होरी और चैता दोनो साथ-साथ सुनने का मौका मिले तो भला कौन छोड्ना चाहेगा.

कुछ ऐसा ही आज हुआ. मौका था बनारस घराने की प्रसिद्ध शास्त्रीय गयिका पद्मभूषण गिरिजा देवी के सम्मान का. दिल्ली के इंडिया हैबिटैट सेंटर मे सखा क्रिएशंस की ओर से आज उन्हे द ग्रेट मास्ट्रोज़ एवार्ड भेट किया गया. एवार्ड दिया पंडित बिरजू महराज ने और इसी मौके पर अपना गायन प्रस्तुत किया अप्पा यानी गिरिजा देवी की शिष्या मालिनी अवस्थी ने.

‘उडत अबीर गुलाल’ शीर्षक इस आयोजन का श्रीगणेश उन्होने किया एक ठुमरी से. “नदिया धीरे-धीरे बहो …” पहली ही प्रस्तुति से समा ऐसा बन्धा कि नदिया ने धीरे-धीरे बहना शुरू कर दिया. सुरो की सरिता जब एक बार बह चली तो फिर उसने रुकने का नाम भी नही लिया. उपस्थिर श्रोता समुदाय उसके साथ-साथ बहता रहा, तब तक जब तक कि सुरो की सागर त्रिवेणी मे वह विलीन नही हो गई.

इस ठुमरी के बाद कार्यक्रम की धारा तुरंत मौसम के अनुकूल होरी की ओर मुडी- “रे रसिया तेरे कारन ब्रिज मे भई बदनाम….” एक और होरी “बरजोरी करो न मोसे होरी मे ….” भी उन्होने सुनाया. और फिर वह चैता जिसका जिक्र पहले ही हो चुका है. और समापन हुआ क्रिष्ण भक़्ति के रस मे पगे एक ब्रज गीत ” ब्रिज के बिरही लोग बिचारे ….” से. मालिनी के साथ तानपूरे पर संगत कर रही थी उनकी ही गुरुभगिनी पियाली. जबकि तबले पर उनका साथ दिया अख्तर हसन और हारमोनियम पर ज़मील अहमद ने. जाहिर है, कार्यक्रम की सफलता मे इनका योगदान भी कुछ कम उल्लेख्य नही है, पर क्या कर सकते है, शब्दकारो की सीमा यही है कि इनके बारे मे इससे ज्यादा कुछ कहा नही जा सकता.

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ध्यान का इतिहास है जरूरी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 21, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन
तिथि : 19 सितंबर 2007, बुधवार
मुकाम : दिल्ली में लोदी रोड स्थित श्री सत्य साईँ सेंटर का ऑडिटोरियम
लंबे समय बाद स्वामी वेद भारती का साथ था. दशमेश एजुकेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट ने यह आयोजन किया था और इसके कर्णधार थे राय साहब. राय साहब यानी वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय. जब मैं पहुँचा तब तक ‘ध्यान का वैश्विक प्रभाव’ विषय पर केंद्रित इस व्याख्यान की औपचारिक शुरुआत हो चुकी थी. राय साहब बता रहे थे स्वामी वेद भारती के बारे में. निश्चित रुप से मेरे जैसे लोगों के लिए इसमें कोई रूचिकर बात नहीं थी, जो पहले से ही स्वामी जी के बारे में काफी कुछ जानते थे. लेकिन उन तमाम लोगों के लिए यह दिलचस्प था जो पहले से ज्यादा कुछ नहीं जानते थे.
स्वामी जी से मेरा परिचय ‘योग इंटरनेशनल’ पत्रिका के मार्फ़त हुआ था. अमेरिका से छपने वाली इस पत्रिका में स्वामी जी की योजनाओं के बारे में जानकारी दी गई थी और उनका भारत का पूरा पता भी उसमें था. बाद में दिल्ली से छपने वाली लाइफ पोजिटिव में भी मैंने स्वामी जी पर एक पूरा लेख पढा और फिर मेरे माना में उनका एक इंटरव्यू करने की इच्छा हुई. ऋषिकेश स्थित उनके आश्रम से टेलीफोन पर सम्पर्क किया तो भोला शंकर से बात हुई. उन्होने एक महीने बाद स्वामी जी के भारत आने और तभी मुलाक़ात करा पाने की बात कही. खैर, मैंने उस वक़्त इसे हरी इच्छा मान कर भविष्य में कभी के लिए मुल्तवी कर दिया था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. एक महीना बीतते ही भोला ने फिर मुझसे स्वयम सम्पर्क किया और मुफीद समय पूछा. आखिरकार समय तय हुआ और मैं ऋषिकेश पहुँचा. पूरे दिन विभिन्न गतिविधियों में व्यस्तता और आश्रम की कार्यप्रणाली के अवलोकन के बाद रात 12 बजे स्वामी जी के साथ मेरी बैठक शुरू हुई.
हमारी चर्चा अध्यात्म कम दुनिया भर में योग और उसकी दुर्दशा पर अधिक केंद्रित रही. रात दो बजे तक हमारी चर्चा चलती रही और इस दौरान ध्यान की तमाम विधियों, नए दौर में इसकी प्रासंगिकता, इसे लेकर चल रहे सर्कसों के अलावा स्वामी जी के व्यक्तिगत जीवन से जुडे कई सवाल भी मैंने किए और उन्होने बिना हिचके मेरे सवालों के जवाब दिए. मुझे सुखद आश्चर्य हो रहा था कि स्वामी जी पूरे दिन की व्यस्तता के बावजूद इस वक़्त भी पूरी त्वरा के साथ बातचीत में लगे थे.
क्षमा करें, मैं फ्लैश बैक में चला गया. हालांकि हमें अभी की बात करनी थी. तो अभी 2005 के बाद 2007 में स्वामी जी में मैं वही त्वरा और वही शांति देख रहा था. राय साहब के बाद थोड़ी देर के लिए बीच में शेष नारायण सिंह आए और फिर स्वामी जी सीधे मुखातिब थे अपने श्रोताओं से. शुरुआत ध्यान से. यह ध्यान तो नहीं, हाँ ध्यान की छोटी सी झलक भर थी. पर जिसने भी मनोयोग से इसमें हिस्सा लिया होगा उसका संकल्पबद्ध होना मैं तय मानता हूँ. क्षमा करें, इसका आनंद लगभग वैसा ही है जैसे गूंगे के लिए गुड़ का स्वाद. मैं यह अनुभूति कैसे बांटू आपसे? हालांकि इस बीच भी कुछ लोगों के मोबाइल फोन बजे और तब कुछ लोगों के मन में तालिबानी ख़्याल भी आए. पर क्या करिएगा? हमारे देश में एक ही चीज की तो सबसे ज्यादा कमी है और वो है सिविक सेन्स. चूंकि यह चीज यहाँ कहीं नहीं पाई जाती, लिहाजा यहाँ भी इसकी उम्मीद व्यर्थ ही थी.
विषय पर आते हुए स्वामी जी ने शुरुआत ही संस्कृति और राष्ट्रवाद के फर्क से की. उन्होने कहा, ‘जब भी भारतीय संस्कृति की बात की जाती है उसे आम तौर पर राष्ट्रवाद से जोड़ दिया जाता है. लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं. मैं काई संस्कृतियों में रहा हूँ और मुझे सबसे प्यार है. तमाम देशों में गया हूँ. मुझे वहाँ के लोगों से, उनके धर्मग्रंथों से प्यार है. मैं नहीं मानता कि धर्म बदलवा कर किसी व्यक्ति को परम सत्ता के दर्शन कराए जा सकते हैं या उसे आध्यात्मिक बनाया जा सकता है. भगवान ने स्वयं कहा है कि जो जिस मार्ग से मेरे पास आता है, मैं उसी मार्ग से उसे भक्ति और सत्य की ओर बढाता हूँ.
यह एक संयोग ही है कि ध्यान के दर्शन पर तो बहुत कार्य हुआ लेकिन उसके इतिहास पर कोई काम नहीं हुआ. हालांकि इस पर कार्य बहुत जरूरी है. मैं चाहता हूँ कि इस पर कार्य हो. अगर इस कार्य किया जाए तो शायद पता चले कि दुनिया भर में जहाँ कहीं भी ध्यान है हर जगह उसका व्याकरण एक ही है. सबमें श्वांस पर ही अवधान लाने के लिए कहा जाता है.’
उनहोंने चीन, कम्बोडिया, थाईलैंड, नोर्वे, इंडोनेशिया आदि कई देशों की संस्कृतियों, वहाँ के संतों-भाषाओं-ध्यान परम्पराओं का जिक्र करते हुए कहा, ‘एशिया की कम से कम 50 लिपियाँ ब्राह्मी से निकली हैं. चीन में जब बौद्ध धर्म पहुँचा और वहाँ मंत्रों के लिखने की बात आई तो पता चला कि चीनी लिपि में तो किसी दूसरी भाषा के वर्ण लिखे ही नहीं जा सकते. तब वहाँ ब्राह्मी से जुडी एक दूसरी लिपि का आविष्कार बौद्ध योगियों ने किया. यह लिपि है सिद्धम, जिसका प्रयोग आज भी वहाँ मंत्रों को लिखने के लिए किया जाता है.’
यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले मैंने स्वामी जी को जितना जाना था, आज उससे थोडा ज्यादा जाना. राहुल और रजनीश के बाद जिन लोगों ने मुझे प्रभावित किया उनमें स्वामी वेद भारती एक हैं. केवल भाषा और विचारधारा ज्ञान नहीं दुनिया भर की विभिन्न संस्कृतियों के सम्मान के लिए भी. राहुल नास्तिक थे और रजनीश का अपना धर्म था. स्वामी वेद भारती ने अपना कोई धर्म नहीं चलाया. वह सनातन धर्म की मर्यादाओं से बंधे हैं. फिर भी दुनिया के सभी धर्मों, सभी संस्कृतियों और सभी दर्शन धाराओं के प्रति उनके मन में पूरा सम्मान है. वरना तो इस तल पर ज्यादातर धर्माधिकारी जूता कंपनियों के एजेंटों से अलग नहीं हैं. राहुल-रजनीश और वेद में एक साम्य और है और वह है चरैवेति-चरैवेति. स्वामी जी कहते हैं कि कर्ण कवच-कुंडल पहन कर पैदा हुए थे और में पैरों में चक्कर पहन कर पैदा हुआ हूँ. बहरहाल इन बातों की चर्चा फिर कभी.
मुझे बेहद प्रभावित किया स्वामी जी की इस बात ने – ‘सेकुलरिज्म की बात आज की जा रही है. भारत में कम से कम चार शताब्दियों से दरगाहों पर हिंदू और मुसलमान दोनों सम्प्रदायों के लोग जा रहे हैं और चादर चढ़ा रहे हैं. मन्नतें मान रहे हैं. सीरिया में मुस्लिम महिलाएं कोप्टिक चर्च में जाकर आशीर्वाद लेती हैं. तबसे जब सेकुलरिज्म शब्द का आविष्कार नहीं हुआ था.
दुनिया का कोई भी धर्म हो, ध्यान का एक ही व्याकरण है। क्या बात है भाई? जरूर कोई इंटरनेशनल कोंफ्रेंन्स हुई होगी और उसमें ये एग्रीमेंट हुई होगी. (बीच में हंसने लगते हैं). यह बात जाने कितने हजार सालों से चली आ रही है.’ देश-विदेश में भारतीयता के हाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘भारतीयों ने योग का मतलब चमत्कार समझ लिया है और योगी का मतलब ज्योतिषी. जबकि ऐसा है नहीं. योग सिद्धियों को नहीं कहते हैं. घुटने तक को नाक को ले आने या 5 मिनट तक सांस रोके रखने को भी योग नहीं कहते. योग धर्म बदलने के लिए भी आपको नहीं कहता. वह आपको आपके अपने धर्म में रहते हुए शांति की साधना का मार्ग देता है. योग का मतलब है कि कोई तनाव और क्रोध से भरा हुआ आपके पास आए, लेकिन जाए तो मुस्कराता हुआ, बिल्कुल शान्त भाव से लौटे.’ समारोह का समापन फिर से ध्यान और एमएस सिद्धू के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ. बाद में मेरी मुलाक़ात केएन गोविंदाचार्य, राय साहब, राजेश कटियार, अवधेश कुमार और संजय तिवारी से भी हुई. आख़िर में चाय पानी पिए और चले आए. और क्या?

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