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अज्ञेय को जनविरोधी कहना अधूरी समझ : नामवर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 23, 2010

हिन्दू कालेज में अज्ञेय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कालेज में अज्ञेय की जन्म शताब्दी के अवसर पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से ‘आज के प्रश्न और अज्ञेय’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस दो दिवसीय आयोजन में अनेक महविद्यालयों के अध्यापकों, शोधार्थियों और युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की. उदघाटन समारोह में सुविख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि शब्दों का वैभव अज्ञेय के पूरे कविता संसार में देखा जा सकता है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन

विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. उन्होंने कहा कि अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. प्रो. सिंह ने अज्ञेय की चर्चित कविताओं ‘नाच’ और ‘असाध्य वीणा’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय के काव्य के सभी कला रूपों का दर्शन ‘नाच’ में होता है.

अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है.कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं

 प्रथम सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने कहा कि हमारा समय मध्य वर्ग को गोदाम बनाने का युग है जहां दुनिया को विचार के बदले वस्तुओं से बदल देने पर जोर है. उन्होंने कहा कि इस सन्दर्भ में अज्ञेय का रचना कर्म महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे  विचार पर पूरा आग्रह करते हैं. वाजपेयी ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे खड़ी बोली के सबसे बड़े बौद्ध कवि हैं जो शान्ति और स्वाधीनता का संसार रचते हैं. उन्होंने कहा कि परम्परा से हमारे यहाँ साहित्य और कला चिंतन साझा रहा है लेकिन हिंदी आलोचना दुर्भाग्य से साहित्य तक सीमित रही है. इस सन्दर्भ में अज्ञेय के चिंतन को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया. वरिष्ट समालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सभ्यता ऐसे बिंदु पर पहुँच गई है जहां पूंजीवाद और प्रकृति में एक को चुनना पड़ेगा और तब हम देखेंगे कि अज्ञेय की कविता अंततः पूंजी के नहीं, प्रकृति और मनुष्यता के पक्ष में जाती है.प्रो. तिवारी ने कहा कि अज्ञेय में दार्शनिक विकलता का चरम रूप असाध्य वीणा में है,जो ध्यानात्मक होती चली गई है.अज्ञेय की कुछ बहुत छोटी-छोटी कविताओं की चर्चा करते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि बड़े संकट में छोटी चीज़ें भी अर्थवान हो जाती हैं, ये इसका उदाहरण है. इससे पहले हिन्दू कालेज के प्राचार्य प्रो. विनय कुमार श्रीवास्तव ने स्वागत किया और संयोजक डॉ. विजया सती ने संगोष्ठी की रूपरेखा रखी. सत्र का संयोजन कर रहीं डॉ. रचना सिंह ने वक्ताओं का परिचय दिया. दूसरे सत्र में विख्यात कवि और अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरे सप्तक के रचनाकार प्रो. केदारनाथ सिंह ने कहा कि मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है. उन्होंने कहा कि अज्ञेय की कविता पाठक और अपने बीच एक ओट खडा करती है और यह उनकी कविता की ख़ास तिर्यक पद्धति है. ‘भग्नदूत’ और ‘इत्यअलम’ जैसे उनके प्रारंभिक संकलनों को पुनर्पाठ के लिए जरूरी बताते हुए केदारजी ने कहा कि बड़ी कविता में वे रेहटरिक हो जाते थे वहीं छोटी कविताओं में उनकी पूरी रचनात्मक शक्ति और सामर्थ्य दिखाई पड़ती है.
मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है.
वैविध्य की दृष्टि से अज्ञेय को उन्होंने हिंदी के थोड़े से कवियों में बताया. केदारनाथ जी ने कहा कि अज्ञेय कविता के बहुत बड़े अनुवादक भी हैं. ‘आधुनिक भावबोध और अज्ञेय की कविता’ विषयक इस सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और सुपरिचित आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह ने शीतयुद्ध के दौर में हिन्दी आलोचना के सन्दर्भ में अज्ञेय के कृतित्व पर विचार करते हुए कहा कि भारतीय कविता श्रव्य परम्परा की रही है जिसे आधुनिक बनाने की कोशिश अज्ञेय ने की. प्रो.
सिंह ने कहा कि इसी दौर में लघुमानव और महामानव की बहस में साहित्य को लघु मानव अर्थात सामान्य मनुष्य की ओर मोड़ने के लिए भी अज्ञेय को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिनका मनुष्य की गरिमा में गहरा विश्वास है. उन्होंने कहा कि जिस यथार्थवाद की कसौटी पर अज्ञेय को खारिज किया जाता है वह ढीली ढाली है अतः कविता के इतिहास पर दुबारा बात की जानी चाहिए. जवाहरलाल
नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के प्रो. गोबिंद प्रसाद ने कहा कि अज्ञेय बेहद आत्मसज़गता के कवि थे, जो ताउम्र अपनी छाया को ही लांघते रहे, अपने से लड़ते रहे. उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने आधुनिकता को एक निरंतर संस्कारवान होने की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा है, जहां स्व और आत्म पर बेहद आग्रह है. प्रो. प्रसाद ने कहा कि इसका एक सिरा जहां अस्मिता और इयत्ता से जुड़ता है वहीं दूसरा आत्मदान और दाता भाव से भी. कवि और कविता की रचना प्रक्रिया पर जितनी कवितायें अज्ञेय ने लिखी हैं उतनी और किसी हिन्दी कवि ने नहीं. इस सत्र का संयोजन विभाग के अध्यापक डॉ. पल्लव ने किया.

दूसरे दिन सुबह पहले सत्र में पटना विश्वविद्यालय में आचार्य रहे आलोचक प्रो. गोपाल राय ‘शेखर एक जीवनी’ पर अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि बालक के विद्रोही बनने की प्रक्रिया में अज्ञेय ने गहरी अंतरदृष्टि और मनोवैज्ञानिकता का परिचय दिया है, वहीं प्रेम के प्रसंग में भी उनका

वर्णन और भाषाई कौशल अद्भुत है. उन्होंने विद्रोह, क्रान्ति और आतंक में भेद बताते हुए कहा की यदि इस उपन्यास का तीसरा भाग आ पता तो शेखर के विद्रोह का सही चित्र देखना संभव होता, उपलब्ध सामग्री में विद्रोह कर्मशीलता में परिणत नहीं हो पाया है. कथाकार और जामिया मिलिया के हिंदी आचार्य प्रो. अब्दुल बिस्मिलाह ने अज्ञेय की कहानियों पर अपने व्याख्यान में श्रोताओं का ध्यान कई नए बिन्दुओं की ओर आकृष्ट किया. उन्होंने आदम-हव्वा की प्राचीन कथा का सन्दर्भ देते हुए कहा कि सांप मनुष्य को विद्रोह के लिए उकसाने वाला जीव है और अज्ञेय की कहानियों में सांप की बार बार उपस्थिति अकारण नहीं है. प्रो. बिस्मिल्लाह ने कहा कि विभाजन और साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में लिखी गई अज्ञेय की कहानियां अब और अधिक महत्वपूर्ण और प्रसंगवान हो गई हैं. उन्होंने कहा कि अज्ञेय के साहित्य में विद्रोह वही नहीं है जो दिखाई दे रहा है अपितु भीतर भीतर पल रहा विद्रोह कम नहीं है. आलोचक और हिन्दू कालेज में सह आचार्य डॉ.
रामेश्वर राय ने कहा कि अज्ञेय के लिए व्यक्ति मनुष्य की सत्ता उसकी विचार क्षमता पर निर्भर करती है और उनके लिए विचार होने की पहली शर्त अकेले होने का सहस है.डॉ. राय ने इश्वर,विवाह और नैतिकता के सम्बन्ध में अज्ञेय के चिंतन पर चर्चा करते हुए कहा कि उनके यहाँ विद्रोह जंगल हो जाने की आकांक्षा है जिसके नियम इतने सर्जनात्मक हैं कि व्यक्ति के विकास में कोई दमन न हो. समापन समारोह में वरिष्ट आलोचक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि अज्ञेय को कविता में किसी भी वस्तु या विषय के ब्रांडधर्मी उपयोग पर
आपत्ति थी और उनके लिए कविता तथा जीवन का यथार्थ एक ही नहीं था.
उन्होंने कहा कि व्यक्ति की अद्वितीयता में अज्ञेय की आस्था अडिग है और वे इतनी दूर तक ही ‘मैं’ को समाज के लिए अर्पित करने को प्रस्तुत हैं कि उनका अस्तित्व बना रहे. प्रो. जैन ने अज्ञेय की चर्चित कविता ‘नदी के द्वीप’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय अपने चिंतन को कविता के रूप में 
बयान करते हैं.उन्होंने शताब्दी वर्ष में केवल रचनाकार के गुणगान तक सीमित रह जाने के खतरे से आगाह करते हुए कहा कि क्लिशे में जाने कि बजाय पलट पलट कर देखना होगा कि दूसरी आवाजें तो नहीं आ रहीं हैं. समापन सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी प्रयाग शुक्ल ने कहा कि अज्ञेय सोचते हुए लेखक कवि हैंजो आधुनिक बोध को लाये. उन्होंने कहा कि हिन्दी को अज्ञेय की जरूरत थी. शुक्ल ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे भाषा के सावधान प्रयोग के लिए याद किये जायेंगे. उन्होंने अज्ञेय से जुड़े अपने कई संस्मरण भी सुनाये. वरिष्ट कथाकार राजी सेठ ने इस सत्र में अज्ञेय के चिंतन पक्ष पर विस्तार से विचार करते हुए कहा कि
उनका चिंतन कर्म और काव्य कर्म वस्तुतः अलग नहीं है .लेकिन यहाँ समस्या होती है कि क्या अज्ञेय की कविता उनके चिंतन की अनुचर है?
आयोजन स्थल पर अज्ञेय साहित्य और अज्ञेय काव्य के पोस्टर की प्रदर्शनी को भरपूर सराहना मिली. आयोजन में अंग्रेजी समालोचक प्रो. हरीश त्रिवेदी, कवि अजित कुमार,युवा आलोचक वैभव सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रोताओं ने भाग लिया.
यह जानकारी डॉ. पल्लव ने एक मेल के ज़रिये दी.

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संघे शरणं गच्छामि….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 28, 2009

लोकतांत्रिक भारत में पैदा हुए राजकुमार तमाम आर्यसत्यों को समझते-समझते ख़ुद मंत्री बन गए. असल में अब ईसापूर्व वाली शताब्दी तो रही नहीं, यह ईसा बाद की 21वीं शताब्दी है और ज़िन्दगी के रंग-ढंग भी ऐसे नहीं रह गए हैं कि कोई बिना पैसे-धेले के जी ले. वैसे तो उन्हें जब भी अपना पिछ्ला जन्म याद आता तो अकसर उन्हें यह सोच कर कष्ट होता था कि वे भी क्या दिन थे. मांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी, अकसर तो बिन मांगे ही बड़े आराम से भिक्षा मिल जाती थी. जो लोग जान जाते कि यह तो राजपुत्र है, वे तो यह भी इंतज़ार नहीं करते थे कि उनके दरवाज़े तक पहुंचूं मैं. जहां जाता, अगर मेरे वहां पहुंचने या होने की सूचना मिल जाती तो राज परिवारों से जुड़े लोग बहुत लोग तो ख़ुद ही चलकर आ जाते थे भिक्षा देने नहीं, चढ़ावे चढ़ाने. कई राज परिवार तो तैयार बैठे रहते थे संन्यास दीक्षा लेने के लिए पहले से ही. एक ज़माना यह है, अब मांगो भी भीख नहीं मिलती. अब भीख सिर्फ़ तब मिलती है जब आप किसी बड़े बाप के आंख के तारे को उससे दूर कर दें. छिपा दें कहीं और फिर फ़ोन से सूचना दें कि भाई इतने रुपये का चढ़ावा इस स्थान पर इतने बजे रख जाएं. और ध्यान रखें, किसी प्रकार की समझदारी करने की कोशिश न करें यानी पुलिस-वुलिस को सूचना न दें, वरना आसपास मौजूद हमारे भदंत आपको वहीं से महापरिनिर्वाण को उपलब्ध करा देंगे. या फिर आप कोई लाइसेंस-वाइसेंस दिलाने की हैसियत में हों और उसे रोक दें. या फिर तब जब आप इनकम टैक्स विभाग से काला-सफ़ेद करने का पक्का परवाना रखते हों और दो लाख लेकर 10 लाख की रसीद दे सकें. अब जीवन की पृहा से मुक्ति के लिए संत नहीं बना जा सकता है, बल्कि तमाम संपदाएं अर्जित करने के लिए संत बना जाता है. संत बन कर वे सारी सुविधाएं हासिल की जाती हैं जो दिन-रात खटने वाले गृहस्थों को भी हासिल नहीं होती हैं.
लिहाज़ा इस जीवन में महापरिनिर्वाण पुराने वाले तरीक़े से तो नहीं मिलने वाला है, ये तो तय है. परिनिर्वाण प्राप्त करने के लिए तप का तरीक़ा दूसरा ही अपनाना होगा. तो सबसे पहले उन्होंने सरस्वती की ध्यान साधना की, देश के सबसे बड़े अगिया बैताल की छत्रछाया में. एक से बढ़कर एक चमत्कार किए उन्होंने ध्यान साधना के तहत. इसी दौरान कुछ नए देवताओं से उनका संपर्क हुआ और उन्होंने जान लिया कि जनता अब तक जिन देवताओं को पूजती आ रही है वे सब के सब बिलकुल ग़लत-सलत देवता हैं. जनता इन्हें झुट्ठे पूजती है, असली देवता तो दूसरे हैं. उन्होंने यह बात समझी और किसी ध्यान साधक की तरह बात समझ में आते ही नए मिले देवताओं की पूजा शुरू कर दी.
अब ज़ाहिर है जब आप किसी देवता को पूजिएगा तो चाहे नया हो या पुराना, वह फल तो देगा ही. बल्कि नए देवता थोड़ा ज़्यादा ही फल देते हैं. सो उन्होंने दिया भी. उन्होंने सबसे पहले तो इन्हें समझाया कि भाई देख सरस्वती की साधना से आज तक किसी को भी निर्वाण नहीं मिला है. निर्वाण मिलता है विष्णु भगवान की कृपा से और विष्णु जी मानते हैं लक्ष्मी जी को. उनकी ही सिफ़ारिश चलती है विष्णु भगवान के सामने. तो अब तू उन्हीं की साधना और साधना उस अगिया बैताल के यहां नहीं हो सकती. यह साधना तुझे करनी होगी हमारी छत्रछाया में, तो चल ये ले मंत्री पद और संभाल अपनिवेश का कारोबार.
राजकुमार ने तुरंत यह साधना शुरू की और अबकी बार इतने मन से की कि कुछ भी बक़ाया नहीं छोड़ा. अपनिवेश का काम उन्होंने इतने मन से किया कि उनके देवराज का सिंहासन डोलने लगा. ऐन वक़्त पर उनके हाथ से जान छुड़ाकर भाग गया देश, वरना उन्होंने उसे भी नहीं छोड़ा होता. ख़ैर उनके सपने अधूरे नहीं रहेंगे, इसका भरोसा उनके बाद उनके मार्ग के साधकों ने दिला दिया. इसीलिए बाद में कुछ विकल्पहीनता की त्रासदी और कुछ ईवीएम की कृपा ने जनता से उन्हें ऐज़ इट इज़ कंटीन्यू भी करवा दिया. बहरहाल, मंत्रालयी दौर में ही राजकुमार राष्ट्र अपश्रेष्ठि के ऐसे प्रिय हुए कि हवाई अड्डे पर उनके गुरुभाई इंतज़ार ही करते रहते और राजकुमार स्वयं विमान के पिछले दरवाज़े निकल अपश्रेष्ठि के कलाकक्ष में पहुंच जाते.
पर इसके बाद से बेचारे राजकुमार का मन उखड़ गया. उनकी समझ में एक तो यह बात आ गई कि राष्ट्र ऐसे चलने वाला नहीं है. राष्ट्र में अब दुख ही दुख है और दुख से उबार सकने की ताक़त रखने वाले इकलौते विहार में अब कोई दम नहीं रह गया है. यहां तक कि इसके जो देवता हैं, उन्हें उनके ही कुछ भक्तों ने अंतर्ध्यान यानी कि नज़रबन्द कर दिया है. तब? अब क्या किया जाए? यह प्रश्न उठा तो उन्होंने एक बार फिर ध्यान लगाया और पाया कि इस विहार के पीछे एक संघ है. वैसे तो विहार में प्रवेश का रास्ता ही संघ से होकर आता था, लेकिन राजकुमार को राजकुमार होने के नाते उसकी ज़रूरत शायद नहीं पड़ी थी. पर अभी उन्हें अचानक उसकी अहमियत पता चल गई और इसीलिए उन्होंने एकदम से घोषणा कर दी.
हालांकि घोषणा जो उन्होंने की, वह अंग्रेजी में की और अब क्या बताएं! यह कहते हुए मुझे बड़ी शर्म आती है कि वह मेरी समझ में बिलकुल वैसे ही ज़रा भी नहीं आई, जैसे 6 साल पहले उनके विहार का इंडिया साइनिंग और फील गुड़ वाला नारा पूरे देस की अनपढ़ जनता के समझ में नहीं आया था. ख़ैर, हमने सोचा कि अपन मित्र सलाहू किस दिन काम आएगा. सों हमने उससे पूछ लिया. उसने जो बताया और उसका जो लब्बोलुआब मेरी समझ में आया वो ये कि अब ये जो अपना विहार है इसकी स्थिति बिहार जैसी हो गई है और राजा साहब की हालत लालू और रामबिलास पासवान जैसी हो गई है. विहार के जो और भदंत हैं ऊ त बेचारे सब ऐसे हो गए हैं जैसे पंचतंत्र का वो सियार जो एक बछड़े के बाप के पीछे-पीछे लगा था.
ज़ाहिर है, अब ऐसे में ये सवाल तो उठना ही था कि फिर क्या किया जाए. कैसे मिलेगा निर्वाण. सवाल उठते ही उन्होंने तुरंत ध्यान लगाया. ध्यान में नारद मुनि आए. देवर्षि को राजकुमार ने अपनी समस्या बताई तो उन्होंने तुरंत उन्हें सूतजी से मिलवाया. भला हो सूतजी का कि उन्होंने इस घोर कलिकाल में कथाओं पर उमड़ते-घुमड़ते शंकाओं के बादलों को देखते हुए कथा सुनने का कोई उपाय नहीं बताया. उन्होंने लौकिक उपाय बताते हुए राजकुमार को संघ के शरण में जाने का उपाय सुझाया. वही बहुमूल्य उपाय कुछ दिनों पूर्व उन्होंने मृत्युलोक के वासियों को बताया है. नया उपाय जानकर लोकवासियों में धूम मचनी ही थी, सो वो मची हुई है. सभी जाप कर रहे हैं : संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि…… आप भी कर के देख लीजिए. क्या पता दुख के जिन्न से पीछे छूट जाए.

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सस्ते से सस्ती दिल्ली

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 27, 2009

लीजिए जनाब! ख़ुश हो जाइए. क्या कहा? क्यों ख़ुश हों? अरे भाई ख़ुश होने के लिए भी आपको कोई कारण चाहिए? असली आदमी हमेशा ख़ुश होना चाहता है, बस इसलिए आप भी ख़ुश हो जाइए. और कोई ख़ास कारण चाहिए तो आपको बता दूं कि दिल्ली और मुंबई नाम के जो शहर इस धरती पर हैं, वे दुनिया के सबसे सस्ते शहर हैं. यह कोई भारत सरकार नहीं कह रही है, जिसकी हर बात को आप सिर्फ़ आंकड़ों की रस्साकशी मानते हैं. और न किसी भारतीय एजेंसी ने ही जिनके बारे में आप यह मानकर ही चलते हैं कि उसे सर्वे का ठेका ही मिल जाना बहुत है. एक बार उसे ठेका दें और बेहतर होगा कि सर्वे से आप जो निष्कर्ष चाहते हैं वह उसे पहले ही बता दें. फिर आप जिसे जैसा देखना या दिखाना चाहते हैं, उसे वैसा ही देखने और दिखाने का पूरा इंतज़ाम सर्वे एजेंसियां कर देंगी. अब तो लोकतंत्र के मामले में भी वे इसे सच साबित कर देने में भी सक्षम हो गई हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं रह गई है.
लेकिन नहीं साह्ब यह बात उन भारतीय एजेंसियों ने भी नहीं कही है. यह कहा है एक अतयंत प्रतिष्ठित स्विस बैंक ने. और आप तो जानते ही हैं ईमानदारी के मामले में हमारे देश ही क्या, दुनिया भर के बड़े-बड़े लोग स्विस बैंकों की ही क़समें खाते हैं. अभी हाल ही में चुनाव के दौरान अपने आडवाणी जी खा रहे थे. उनके पहले 89 के चुनाव में आपने राजा साहब को खाते हुए देखा होगा. अरे वही राजा साहब जो दरसल फ़क़ीर थे और बोफोर्स घोटाले के सारे दस्तावेज़ प्रधानमंत्री बनने के पहले तक अपनी जेब में ही लेकर घूमा करते थे. ख़ैर छोड़िए भी, अब इन सब बातों से क्या फ़ायदा? अपने ही स्तर की बात करें तो भी यह तो हम-आप जानते ही हैं कि दुनिया भर की ग़रीब जनता की ख़ून-पसीने की कमाई स्विस बैंकों में ही रखी है. तो भला सोचिए, ईमानदारी का उनसे बड़ा जीवंत प्रतीक और क्या हो सकता है! ख़बर यह है कि स्विस बैंक ने दुनिया भर के 73 बड़े शहरों का सर्वे कराया है. इसी सर्वे के आधार पर उसने दुनिया के सबसे महंगे शहरों की सूची जारी की है. यह जो सूची जारी हुई है उसमें दिल्ली और मुंबई का नाम सबसे नीचे हैं. यूं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचार-अराजकता जैसे कुछ महत्वपूर्ण मामलों की बात छोड़ दी जाए तो समूचे भारत का ही नाम अकसर किसी भी सूची में सबसे नीचे ही होता है. तो जी हम तो इतने से ही संतुष्ट हैं. इससे ऊपर जाने का अपन का कोई इरादा ही नहीं है. ओस्लो, ज्यूरिख, कोपेनहेगन इस सूची में पहले, दूसरे, तीसरे नम्बर पर हैं तो रहा करें. मॉस्क़ो, मेक्सिको सिटी और सिओल भी उप्पर हैं तो बने न रहें, हमारा क्या जाता है. अब यह अलग बात है कि उस ख़बर में यह बात कहीं नहीं बताई गई है कि ये सर्वे किया किसने है. कराया तो है ईमानदारी की मिसाल माने जाने वाले स्विस बैंक ने, पर किया किसने ये बेचारे आम आदमी को पता ही नहीं चल पाया.
ख़ैर, जिसने भी किया हो, यह बाद की बात है. इससे एक बात तो हुई है कि जो लोग अभी तक महंगाई-महंगाई चिल्ला रहे थे बार-बार और अपनी बेचारी सरकार की इस बात पर भी यक़ीन नहीं कर रहे थे कि मुद्रास्फीति दर घटी है और महंगाई भी घट गई है, अब उनकी बोलती बंद हो गई है. जो लोग इसे सरकार की ओर से आंकड़ों की बाजीगरी मान रहे थे, वे सोच नहीं पा रहे हैं कि अब क्या तर्क़ दें. वैसे तर्क़ तो उनके पास पहले भी नहीं थे.
बहरहाल, अपन चूंकि दिल्ली में रहते हैं और ये देख रहे हैं कि पांच-छह साल जो मकान दो हज़ार रुपये महीने के किराये पर उपलब्ध था, वह अब 8 हज़ार में भी मिलने वाला नहीं है. ख़रीदने पर जो फ्लैट 5 लाख में आसानी से मिल जाता था, वह अब सीधे 20 लाख का हो चुका है. लेकिन जनाब यह भी तो देखिए, कि अब मकान आपको सफ़ेदी कराके मिलेगा. तो जब घर सफ़ेदी कराके ख़रीदेंगे तो उसका दाम तो बढ़ ही जाएगा न. आलू 5 से 30 रुपये किलो हो गया, आटा 8 से 20 रुपये किलो पर पहुंच गया… तो क्य हो गया? आप यह क्यों नहीं सोचते कि देश में सिर्फ़ आलू-आटा और मकान-कपड़ा ही तो सबसे महत्वपूर्ण नहीं है. कई चीज़ें इनसे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं. मसलन लैपटॉप, टीवी, मोबाइल..
आप कहेंगे इन चीज़ों की हमें बहुत ज़रूरत नहीं होती. जी कोई बात नहीं. रोज़गार की ज़रूरत तो आपको होती है. भारत में वह सबसे महंगी चीज़ों में शुमार है. यक़ीन न हो तो किसी पढ़े-लिखे नौजवान से पूछ कर देख लें. सरकारी दफ़्तर में चपरासी बनने के लिए भी दो लाख रुपये देने को तैयार हो जाएगा. ज़नाब दिल्ली में वह सबसे सस्ती चीज़ है. अगर आपको यक़ीन न हो बमुश्किल दो साल पहले हुई सीलिंग का दौर याद कर लीजिए. बहन-बेटियों की इज़्ज़त जिसके पीछे पूरा हिन्दुस्तान मरता है और राजस्थान में जौहर तथा सती प्रथा शुरू हो गई … दिल्ली में सबसे सस्ती है. ब्लू लाइन बसों की कीर्ति तो कीर्ति आज़ाद से भी ज़्यादा है और बहुत पहले से है. नई आई मेट्रो रेल ने भी साबित कर दिया कि यहां आम आदमी की जान भी सबसे सस्ती है. फिर भी आप नहीं मानते. अरे अब का चाहते हैं माई-बाप?

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अबकी बारिश में ये शरारत….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 10, 2009

 

सलाहू इन दिनों दिल्ली से बाहर है. किसी मुकद्दमे के सिलसिले में कोलकाता गया हुआ है. भगवान जाने किस जजमान (चाहें तो उसकी भाषा में मुवक्किल कह लें) को कात रहा है, वह भी मोटा या महीन. अच्छे दोस्त न हों तो आप जानते ही हैं दुश्मनों की कमी खलने लगती है. कल वह मिल गया जीमेल के चैटबॉक्स में. इस वर्चुअल युग में असली आधुनिक तो आप जानते ही हैं, वही है जो बीवी तक से बेडरूम के बजाय चैट रूम में मिले. ख़ैर अपन अभी इतने आधुनिक हुए नहीं हैं, हां होने की कोशिश में लगे ज़रूर हैं. काफ़ी दिनों बाद मुलाक़ात हुई थी. सो पहले हालचाल पूछा. इसके बावजूद कि उसकी चाल-चलन से मैं बख़ूबी वाक़िफ़ हूं और ऐसी चाल चलन के रहते किसी मनुष्य के हाल ठीक होने की उम्मीद करना बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे ईवीएम और पार्टी प्रतिबद्ध चुनाव आयुक्त के होते हुए निष्पक्ष चुनाव और उसके सही नतीजों का सपना देखने की हिमाक़त दिनदहाड़े करना. चूंकि दुनिया वीरों से ख़ाली नहीं है, लिहाजा मैं भी कभी-कभी ऐसी हिमाकत कर ही डालता हूं.

सो मैंने हिमाकत कर डाली और छूटते ही पूछ लिया, ‘और बताओ क्या हाल है?’

‘हाल क्या है, बिलकुल बेहाल है.’ सलाहू का जवाब था, ‘और बताओ वहां क्या हाल है? तुम कैसे हो?’

‘यहां तो बिलकुल ठीक है’, मैंने जवाब दिया,’और मैं भी बिलकुल मस्त हूं.’

‘अच्छा’ उसने ऐसे लिखा जैसे मेरे अच्छे और मस्त होने पर उसे घोर आश्चर्य हुआ. गोया ऐसा होना नहीं चाहिए, फिर भी मैं हूं. उसका एक-एक अक्षर बता रहा था कि अगर वह भारत की ख़ानदानी लोकतांत्रिक पार्टी की आका की ओर से प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया होता तो अभी मेरे अच्छे और मस्त होने पर ऐसा टैक्स लगाता कि मेरी आने वाली सात पीढियां भरते-भरते मर जातीं और तब भी उसकी किस्तें क्रेडिट कार्ड के कर्ज की तरह कभी पूरी तरह चुक नहीं पातीं.

‘ये बताओ, वहां कुछ बरसात-वरसात हुई क्या?’उसने पूछा.

‘हां हुई न!’ मैंने जवाब दिया, ‘अभी तो कल रात ही हुई है. और वहां क्या हाल है?’

‘अरे यार यहां तो मत पूछो. बेहाल है. नामो-निशान तक नहीं है बरसात का.’

‘क्या बात करते हो यार! अभी तो मैंने आज ही टीवी में देखा है कि कोलकाता में क़रीब डेढ़ घंटे तक झमाझम बारिश हुई है!’ मैंने उसे बताया.

‘तुम मीडिया वाले भी पता नही कहां-कहां से अटकलपच्चू ख़बरें ले-लेकर आ जाते हो.’ उसने मुझे लताड़ लगाई, ‘ ऐसे समय में जबकि ज़ोरों की बारिश होनी चाहिए कम-से-कम तीन-चार दिन तक तो एकदम लगातार, तब डेढ़ घंटे अगर बारिश हो गई तो उसे कोई बारिश माना जाना चाहिए?’

अब लीजिए इन जनाब को डेढ़ घंटे की बारिश कोई बारिश ही नहीं लगती. इन्हें कम-से-कम तीन-चार दिनों की झमाझम बारिश चाहिए और वह भी लगातार. ‘भाई बारिश तो यहां भी उतनी ही हुई है. बल्कि उससे भी कम, केवल आधे घंटे की. तो भी मैं तो ख़ुश हूं कि चलो कम-से-कम हुई तो. और तुम डेढ़ घंटे की बारिश को भी बारिश नहीं मानते?’

‘अब तुम्हारे जैसे बेवकूफ़ चाहें तो केवल बादल देखकर भी ख़ुश हो सकते हैं और लगातार मस्त बने रह सकते हैं.’

‘सकते क्या हैं, बने ही रहते है. देखो भाई, ख़ुश रहना भी एक कला है, बिलकुल वैसे ही जैसे जीवन जीना एक कला है. जिन्हें जीने की कला आ जाती है उन्हें काला हांडी में अकाल नहीं दिखाई देता, अकाल राहत के प्रयास दिखाई देते हैं. उन्हें उस प्रयास के बावजूद पेट की खाई भरने के लिए अपने बच्चे बेचते लोग दिखाई नहीं देते, राहतकार्यों के लिए आए बजट से न केवल अपनी, बल्कि अपने रिश्तेदारों, भाई-भतीजों, दोस्तों और इक्के-दुक्के पड़ोसियों तक की ग़रीबी को बंगाल की खाड़ी में डुबे आते लोग दिखाई देते हैं. जिन्हें वह कला आती है, उन्हें बाढ़ राहत में धांधली नहीं, राहत कोश से अफ़सरों और मंत्रियों के भरते घर दिखाई देते हैं. उन्हें ईवीएम में गड़बड़ी पर फ़ैसला कोर्ट का नहीं, चुनाव आयोग का काम दिखाई देता है. ठीक वैसे ही जिन्हें यह कला आती है, वे डेढ़ घंटे  की  बारिश की निन्दा नहीं करते, बादल देखकर भी प्रसन्न हो जाते हैं.’

‘तो रहो प्रसन्न.’ उसने खीज कर लिखा.

‘हां, वो तो मैं हूं ही.’ मैंने उसे बताया, ‘तुम्हें शायद मालूम नहीं इतनी ग़रीबी और तथाकथित बदहाली के बावजूद दुनिया में खुशी के इंडेक्स पर भारत का तीसरा नम्बर है. जीवन जीने की कला के मामले में पूरी दुनिया हम भारतीयों का लोहा मानती है. जानते हो कैसे?’

‘कैसे?’

‘ऐसे कि ऐसे केवल हमीं हैं जो नेताओं से सिर्फ़ वादे सुनकर ख़ुश हो जाते हैं. उन्हे निभाने की उम्मीद तो हमारे देश की जनता कभी ग़लती से भी नहीं करती है. ऐसे समय में जबकि पूरा देश महंगाई और बेकारी से मर रहा हो, हम धारा 377 पर बहस करने में लग जाते हैं. अगर कोई न भी लगना चाहे इस बहस में और वह महंगाई-बेकारी की बात करना चाहे तो हमारे बुद्धिजीवी उसकी ऐसी गति बनाते हैं कि बेचारा भकुआ कर ताकता रह जाता है. गोया अगर वह गे या लेस्बी नहीं है, तो उसका इस जगत में होना ही गुनाह है.’

‘हुम्म!’ बड़ी देर बाद सलाहू ने ऐसे हुम्म की जैसे  कोई मंत्री किसी योजना की 90 परसेंट रकम डकारने के बाद 10 परसेंट अपने चमचों के लिए टरका देता है.

‘अब बरसात का मामला भी समझ लो कि कुछ ऐसा ही है.’ मैंने उसे आगे बताना शुरू किया, ‘तुम्हें याद है न हमारे एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे. वह भी खानदानी तौर पर प्रधानमंत्री बनने की व्याधि से पीड़ित थे. इसके बावजूद उन्होंने कहा था कि हम जब किसी योजना के तहत 100 रुपये की रकम जनता के लिए जारी करते हैं तो उसमें से 85 तो पहले ही ख़त्म हो जाते हैं. मुश्किल से 15 पहुंच पाते हैं जनता तक.’

‘हुम्म!’ उसने चैटबॉक्स में लिखा और मुझे उसकी मुंडी हिलती हुई दिखी.

‘अब वह स्वर्गीय हो चुके हैं, ये तो तुम जानते ही हो.’ मैंने उसे बताया और उसने फिर चैट बॉक्स में हुंकारी भरी. तो मैंने आगे बताया, ‘तुमको यह तो पता ही होगा कि बड़े लोग प्रेरणास्रोत होते हैं. असली नेता वही होता है, जो देश ही नहीं, पूरी दुनिया की जनता को अपने बताए रास्ते पर चलवा दे.’

उसने फिर हुंकारी भरी तो मैंने फिर बताया, ‘अब देखो, वह अकेले ही तो गए नहीं हैं. उनसे पहले भी तमाम लोग वहां जा चुके थे और बाद में भी बहुत लोग गए हैं. वे सारे आख़िर वहां कर क्या रहे हैं! वही कला अब उन्होंने स्वर्ग के कारिन्दों को भी सिखा दी है. लिहाजा बारिश के साथ भी अब ऐसा ही कुछ हो रहा है. इन्द्र देवता बारिश का जो कोटा तय करके रिलीज़ कर रहे हैं उसमें से 90 परसेंट तो वहीं बन्दरबांट का शिकार हो जा रहा है. वह स्वर्ग के अफ़सरों और अप्सराओं के खाते में ही चला जा रहा है. जो 10 परसेंट बच रहा है, वह जैसे-तैसे धरती तक आ रहा है.’

‘तो क्या अब इतने में ही हम प्रसन्न रहें.’ उसने ज़ोर का प्रतिवाद दर्ज कराया.

‘हां! रहना ही पड़ेगा बच्चू!’ मैंने उसे समझाया, ‘न रहकर सिर्फ़ अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाने के अलावा और कर भी क्या सकते हो? जब धरती पर एक लोकतांत्रिक देश में हो रही अपने ही संसाधनों की बन्दरबांट पर हम-तुम कुछ नहीं कर सके तो स्वर्ग से हो रही बन्दरबांट पर क्या कर लेंगे?’

पता नहीं सलाहू की समझ में यह बात आई या नहीं, पर उसने इसके बाद चैटबॉक्स में कुछ और नहीं लिखा. अगर आपको लगता है कि कुछ कर लेंगे तो जो भी कुछ करना मुमकिन लगता हो वही नीचे के कमेंट बॉक्स में लिख दें.

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तो क्या कहेंगे?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 18, 2009

सलाहू आज बोल ही नहीं रहा है. हमेशा बिन बुलाए बोलने वाला आदमी और बिना मांगे ही बार-बार सलाह देने वाला शख्स अगर अचानक चुप हो जाए तो शुबहा तो होगा ही. यूं तो वह बिना किसी बात के बहस पर अकसर उतारू रहा करता है. कोई मामला-फ़साद हुए बग़ैर ही आईपीसी-सीआरपीसी से लेकर भारतीय संविधान के तमाम अनुच्छेदों तक का बात-बात में हवाला देने वाला आदमी आज कुछ भी कह देने पर भी कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हो रहा है. मुझे लगा कि आख़िर मामला क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि माया मेमसाहब द्वारा बापू को नाटकबाज कह देने से उसे सदमा लग गया हो! पर नहीं, इस बारे में पूछे जाने पर उसने मुझे सिर्फ़ देखा भर. ऐसे जैसे कभी-कभी कोई बड़ी शरारत कर के आने पर मेरे

पिताजी देखा करते थे. चुपचाप.

पर मैंने ऐसी कोई शरारत तो की नहीं थी. ज़ाहिर है, इसका मतलब साफ़ तौर पर सिर्फ़ यही था कि ऐसी कोई बात नहीं थी. फिर क्या वजह है? बार-बार पूछने पर भी सलाहू चुप रहा तो बस चुप ही रहा. जब भी मैंने उससे जो भी आशंका जताई हर बात पर वह सिर्फ़ चुप ही रहा. आंखों से या चेहरे से, अपनी विभिन्न भाव-भंगिमाओं के ज़रिये उसने हर बात पर यही जताया कि ऐसी कोई बात नहीं है.

अंततः यह आशंका हुई कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह गूंगा हो गया हो. वैसे भी हमारे समाज में जिह्वा को सरस्वती का वासस्थल माना जाता है और उसने जिह्वा का दुरुपयोग बेहिसाब किया है. मुवक्किलों से लेकर मुंसिफों तक. सरकार से लेकर ग़ैर सरकारी लोगों तक किसी को नहीं छोड़ा था. मुझे लगा क्या पता शब्द जिसे ब्रह्म का रूप कहा जाता है उसने इसका साथ छोड़ दिया हो, नाराज़गी के नाते. पर आत्मा से तुरंत दूसरी बात आई. अगर ऐसा होता तब तो यह बात पहले अपने साथ होनी चाहिए थी. आख़िर शब्दों का व्यापार करते हुए ऐसा कौन सा अपराध है जो शब्दों के ज़रिये अपन ने न किया हो! पर नहीं साहब अपन के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. ऐसा मास्टर के साथ भी नहीं हुआ, जो केवल हिन्दी ही नहीं, संस्कृत और अंग्रेज़ी भाषाओं के साथ भी शब्दों से हेराफेरी करता आ रहा है, पिछले कई वर्षों से. पर ना, उसके साथ भी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

हुआ तो बेचारे सलाहू के साथ. मुझे लगा कि हो न हो, यह किसी रोग वग़ैरह का ही मामला हो. मैं बेवजह पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में फंसा हुआ हूं और हर पढ़े-लिखे आदमी की तरह बेचारे अपने सबसे भरोसेमन्द मित्र के वैज्ञानिक इलाज के बजाय उसके और अपने पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में लग गया हूं. आख़िरकार उसके बार-बार इशारों से मना करने के बावजूद मैं उसे जैसे-तैसे पकड़-धकड़ कर डॉक्टर के पास ले ही गया. लेकिन यह क्या डॉक्टर तो उससे पूछने पर तुला है और है कि बोल ही नहीं पा रहा है. आख़िरकार डॉक्टर ने आजिज आकर पता नहीं कौन सा डर्कोमर्कोग्राम एपीएमवीएनेन कराने के लिए कह दिया. तमाम और डॉक्टरी क्रियाओं की तरह मैने इसका भी नाम तो सुना नहीं था, लिहाजा डॉक्टर से पूछ लेना ही बेहतर समझा कि भाई इसका कितना पैसा लगेगा. लेकिन यह क्या, जैसे ही डॉक्टर ने बताया, ‘कुछ ख़ास नहीं, बस बीस हज़ार रुपये लगेंगे और इस टेस्ट से पता न चला तो फिर अमेरिका जाना पड़ेगा. वैसे यह भी हो सकता है कि स्वाइन फ्लू हुआ हो….’

सलाहू चुप नहीं रह सका. एकाएक चिल्ला कर बोला, ‘अरे मेरी जान के दुश्मनों मुझे कुछ नहीं हुआ है. मैं बिलकुल ठीक हूं.”

’अबे तो अब तक बोल क्यों नहीं रहा था.’

’बस ऐसे ही.’

’क्या भौजाई ने कुछ कह दिया’

’उंहूं”

’फिर’

उसने फिर सिर हिलाया. न बोलने का नाटक करते हुए.

‘तो क्या कचहरी में कोई बात हो गई’

उसने फिर न में सिर हिलाया.

’तो फिर क्या बात हुई?’

अब वह एकदम चुप था. पुनर्मूषकोभव वाली स्थिति में आ गया था. न बोलने की कसम उसने लगता है फिर खा ली थी.

‘भाई क्या वजह है? बोल और बिलकुल सही-सही बता वरना ये जान लो कि अभी तुम्हारी डर्कोमर्कोग्रामी शुरू.’

डर्कोमर्कोग्रामी का नाम सुनते ही उसके होश फिर ठिकाने आ गए. आख़िरकार बेचारा बोल ही पड़ा, ‘देख भाई, ये न तो घर का मामला है और न कचहरी का. ये मामला असल में है पार्टी का. आज नहीं तो कल पार्टी में मुझे गूंगे होना ही पड़ेगा. लिहाजा उसकी प्रैक्टिस अभी से शुरू कर दी है.’

’वो क्यों भाई? भला तुझे पार्टी में गूंगा कौन बना सकता है?’ मैने पूछा, ‘मैडम का तू ख़ास भरोसेमन्द है?’

’सो तो हूं’, उसने बताया, ‘लेकिन आज ही से एक नया संकट आ गया है.’

’वह क्या’, मैंने फिर पूछा, ‘क्या तेरे बराबर भरोसा किसी और ने भी जीत लिया है?’

’नहीं भाई, ऐसी भी कोई बात नहीं है.’

‘फिर?’

’असल में आज ही एक नया फ़रमान जारी हुआ है.’

’वह क्या गूंगे होने का फ़रमान है.’

‘ना गूंगे होने का नहीं, वह गूंगे बनाने का फ़रमान है.’

’फ़रमान तो बताओ.’

‘बस यह कि अबसे कोई पार्टी और ख़ास तौर से पार्टी मालिकों के परिवार के सदस्यों के लिए सामंतवादी या कहें राजशाही सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा. अब कोई किसी को युवराज, राजा, राजमाता, महाराज … आदि-आदि नहीं कहेगा.’

’तो?’

’तुम्ही बताओ, तब अब हम क्या कहेंगे? इस तरह तो हमारी पार्टी के 99 फ़ीसदी कार्यकर्ताओं का सोचना तक बन्द हो जाएगा. बोलने की तो बात ही छोड़ मेरे यार.’

इतना कह कर वह फिर से गहन मौन में चला गया. ऋषि-मुनियों की तरह.

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जॉर्ज़ ओरवेल, संसद और वाराह पुराण

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 13, 2009

एक ब्लॉगर बंधु हैं अशोक पांडे जी. उन्हें सुअरों से बेइंतहां प्यार हो गया है. इधर कुछ दिनों से वह लगातार सुअरों के पीछे ही पड़े हुए हैं. हुआ यह कि पहले तो उन्होंने अफगानिस्तान में मौजूद इकलौते सुअर की व्यथा कथा कही. यह बताया कि वहां सुअर नहीं पाए जाते और इसकी एक बड़ी वजह वहां तालिबानी शासन का होना रहा है. इसके बावजूद किसी ज़माने सोवियत संघ से बतौर उपहार एक सुअर वहां आ गया था. उस बेचारे को जगह मिली चिड़ियाघर में. पर इधर जबसे अमेरिका में स्वाइन फ्लू नामक बीमारी फैली है, उसे चिड़ियाघर के उस बाड़े से भी हटा दिया गया है, जहां वह कुछ अन्य जंतुओं के साथ रहता आया था. अब उस बेचारे को बिलकुल एक किनारे कर दिया गया है, एकदम अकेले. जैसे हमारे देश में रिटायर होने के बाद ईमानदार टाइप के सरकारी अफसरों को कर दिया जाता है.
कायदे से देखा जाए तो दोनों के अलग किए जाने का कारण भी समान ही है. संक्रमण का. अगर उसके फ्लू का संक्रमण साथ वाले दूसरे जानवरों को हो गया तो इससे चिड़ियाघर की व्यवस्था में कितनी गड़बड़ी फैलेगी इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं. ठीक इसी तरह सरकारी अफसरी के दौरान भी ईमानदारी के रोग से ग्रस्त रहे व्यक्ति को अगर इस फील्ड में आए नए रंगरूटों के साथ रख दिया गया और उन्हें कहीं उसका संक्रमण हो गया तो सोचिए कि व्यवस्था बेचारी का क्या होगा? वैसे सुअर जब झुंड में था तब भी यह सहज महसूस करता रहा होगा, इसमें मुझे संदेह है. क्योंकि इसे सुअरों के साथ तो रखा नहीं गया था. वहां इसके अलावा कोई और सुअर है ही नहीं, तो बेचारे को साथ के लिए और सुअर मिले तो कैसे? इसे अपनी बिरादरी के बाहर जाकर हिरनों और बकरियों के साथ चरना पड़ता था.
अब सच तो यह है कि ईमानदार टाइप के सरकारी अफसर भी बेचारे अपने आपको ज़िंदगी भर मिसफिट ही महसूस करते रहते हैं. उन्हें लगता ही नहीं कि वे अपनी बिरादरी के बीच हैं. बल्कि उनकी स्थिति तो और भी त्रासद है. क़ायदे से वे सरकारी अफसर होते हुए सरकारी अफसरों के ही बीच होते हैं, पर न तो बाक़ी के असली सरकारी अफसर उन्हें अपने बीच का मानते हैं और न वे बाक़ी को अपनी प्रजाति का मानते हैं. हालत यह होती है कि दोनों एक दूसरे को हेय नज़रिये, कुंठा, ग्लानि, अहंकार और जाने किन-किन भावनाओं से देखते हैं. पर चूंकि सरकारी अफसरी में ईमानदार नामक प्रजाति लुप्तप्राय है, इसलिए वे संत टाइप के हो जाते हैं. अकेलेपन के भय से. दूसरी तरफ़, असली अफसर भी कुछ बोलते नहीं हैं, अभी शायद तब तक कुछ बोलेंगे भी नहीं जब तक कि समाज में थोड़ी-बहुत नैतिकता बची रह गई है.
यक़ीन मानें, सुअरों से मैं यहां सरकारी अफसरों की कोई तुलना नहीं कर रहा हूं. अगर कोई अपने जीवन से इसका कोई साम्य देखे तो उसे यथार्थवादी कहानियों की तरह केवल संयोग ही माने. असल बात यह है कि उस सुअर की बात आते ही मुझे जॉर्ज़ ओरवेल याद आए और याद आई उनकी उपन्यासिका एनिमल फार्म. यह किताब आज भी भारत के राजनीतिक हलके में चर्चा का विषय है. ‘ऑल मेंन आर एनिमीज़. ऑल एनिमल्स आर कॉमरेड्स’ से शुरू हुई पशुमुक्ति की यह संघर्ष यात्रा ‘ऑल एनिमल्स आर इक्वल, बट सम एनिमल्स आर मोर इक्वल’ में कैसे बदल जाती है, यह ग़ौर किए जाने लायक है. इसे पढ़कर मुझे पहली बार पता चला कि सुअर दुनिया का सबसे समझदार प्राणी है. अब मुझे लगता है कि वह कम से कम उन दलों से जुड़े राजनेताओं से तो बेहतर और समझदार है ही, जहां आंतरिक लोकतंत्र की सोच भी किसी कुफ्र से कम नहीं है. बहरहाल इस बारे में मैं कुछ लिखता, इसके पहले ही अशोक जी ने जॉर्ज़ ओरवेल के बारे में पूरी जानकारी दे दी.
वैसे सुअर समझदार प्राणी है, यह बात भारतीय वांग्मय से भी साबित होती है. अपने यहां हज़ारों साल पहले एक पुराण लिखा गया है- वाराह पुराण. भगवान विष्णु का एक अवतार ही बताया जाता है – वराह. वाराह का अर्थ आप जानते ही हैं, अरे वही जिसे पश्तो में ख़ांनजीर, अंग्रेजी में पिग या स्वाइन तथा हिन्दी में सुअर या शूकर कहा जाता है. अफगानिस्तान में तो यह प्रतिबन्धित प्राणी है और हमारे यहां भी आजकल इसकी कोई इज़्ज़त नहीं है. पर भाई हमारी अपनी संस्कृति के हिसाब से देखें तो यह प्राणी है तो पवित्र.
अब मैंने ख़ुद तो वाराह पुराण पढ़ा नहीं. सोचा क्या पता कि मास्टर ने ही पढ़ा हो. उससे बात की तो उसने कहा, ‘यार तुम्हें बैठे-बिठाए वाराह पुराण की याद क्यों आ गई?’
ख़ैर मैंने उसे पूरी बात बताई. पर इसके पहले कि वह मेरा गम्भीर उद्देश्य समझ पाता उसने समाधान पेश कर दिया. क़रीब-क़रीब वैसे ही जैसे नामी-गिरामी डॉक्टर लोग मरीज़ के मर्ज को जाने बग़ैर ही दवाई का पर्चा थमा देते हैं. ‘अमां यार क्यों परेशान हो तुम एक सुअर को लेकर? आंय! बुला लो उसको यहीं. अभी नई लोकसभा बनने वाली है. जैसे इतने हैं, वैसे एक और रह लेगा. वैसे भी अभी पूरे देश में इनकी ही बहार है. अपने यहां तो इन्हें तुम चुनाव भर जहां चाहो वहीं देख सकते हो. हां, जीत जाने के बाद फिर सब एक ही बाड़े में सिमट कर रह जाते हैं.’
मास्टर तो अपनी वाली हांक कर चला गया. इधर मैं परेशान हूं. उसने भी वही ग़लती कर दी जो जॉर्ज ओरवेल ने की है. इतने पवित्र जंतु को भला कहां रखने के लिए कह गया बेवकूफ़. मैं उस सुअर के प्रति सचमुच सहानुभूति से भर उठा हूं. सोचिए, भला क्या वहां रह पाएगा वह? अगर उसे पता चला कि वह किन लोगों के साथ रह रहा है? जहां सभी किसी न किसी गिरोह के ज़रख़रीद हैं, जो अपने आका के फ़रमान के मुताबिक बड़े-बड़े मसलों पर हाथ उठाते और गिराते हैं, उसके ही अनुरूप बोलते, चुप रहते या हल्ला मचाते हैं और गिरोह का मुखिया पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही ख़ानदान से चलता रहता है और उस पर तुर्रा यह कि यह दुनिया का सबसे प्राचीन और सबसे बड़ा लोकतंत्र है ……… ज़रा आप सोचिए, उस पर क्या गुज़रेगी.

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