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Archive for the ‘ग़ज़ल’ Category

मकरन्द छोड़ जाऊँगा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 14, 2011

-हरि शंकर राढ़ी

जहाँ भी जाऊँगा, मकरन्द छोड़ जाऊँगा।
हवा में प्यार की इक गन्ध छोड़ जाऊँगा।
करोगे याद मुझे दर्द में , खुशी भी
निभा के उम्र भर सम्बन्ध छोड़ जाऊँगा।
तुम्हारी जीत मेरी हार पर करे सिजदे
निसार होने का आनन्द छोड़ जाऊँगा।
मिलेंगे जिस्म मगर रूह का गुमाँ होगा
नंशे में डूबी पलक बन्द छोड़ जाऊँगा।
बगैर गुनगनाए तुम न सुकूँ पाओगे
तुम्हारे दिल पे लिखे छन्द छोड़ जाऊँगा।
जमीन आसमान कायनात छोटे कर
बड़े जिगर में किसी बन्द छोड़ जाऊँगा।
बिछड़ के भी न जुदा हो सकोगे ‘राढ़ी’ से
तुम्हारे रूप की सौगन्ध छोड़ जाऊँगा।
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Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 26, 2007

ठोकरें राहों में मेरे कम नहीं।
फिर भी देखो आँख मेरी नम नहीं।

जख्म वो क्या जख्म जिसका हो इलाज-
जख्म वो जिसका कोई मरहम नहीं।

भाप बन उड़ जाऊंगा तू ये न सोच-
मैं तो शोला हूँ कोई शबनम नहीं।

गम से क्यों कर है परीशाँ इस क़दर –
कौन सा दिल है कि जिसमें ग़म नहीं।

चंद लम्हों में सँवर जाए जो दुनिया –
ये तेरी जुल्फों का पेंचो-ख़म नहीं।

दाद के काबिल है स्नेहिल की गज़ल-
कौन सा मिसरा है जिसमें दम नहीं।

-विनय ओझा ‘ स्नेहिल’

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