Aharbinger's Weblog

Just another WordPress.com weblog

Archive for the ‘athato juta jigyasa’ Category

अथातो जूता जिज्ञासा-32

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 26, 2009

आप कई बार देख चुके हैं और अकसर देखते ही रहते हैं कि ख़ुद को अजेय समझने वाले कई महारथी इसी खड़ाऊं के चलते धूल चाटने के लिए विवश होते हैं. यह अलग बात है कि अकसर जब आप धूल चाटने के लिए उन्हें मजबूर करते हैं तो यह काम आप जिस उद्देश्य से करते हैं, वह कभी पूरा नहीं हो पाता है. हर बार आप यह पाते हैं कि आप छले गए. इसकी बहुत बड़ी वजह तो यह है कि आप अकसर ‘कोउ नृप होय हमें का हानी’ वाला भाव ही रखते हैं. कभी अगर थोड़ा योगदान इस कार्य में करते भी हैं तो केवल इतना ही कि अपना खड़ाऊं चला आते हैं, बस. और वह काम भी आप पूरी सतर्कता और सम्यक ज़िम्मेदारी के साथ नहीं करते हैं. आप ख़ुद तमाशेबाज खिलाड़ियों के प्रचार तंत्र से प्रभावित होते हैं और इसी झोंक में हर बार अपने खड़ाऊं का पुण्यप्रताप बर्बाद कर आते हैं. और यह तो आप अपनी ज़िम्मेदारी समझते ही नहीं हैं कि आपके आसपास के लोगों के प्रति भी आपकी कोई ज़िम्मेदारी बनती है.
अगर आपका पड़ोसी ग़लती करता है और आप उसे ग़लती करते हुए देखते हैं तो ज़्यादा न सही पर थोड़े तो आप भी उस ग़लती के ज़िम्मेदार होते ही हैं न! बिलकुल वैसे ही जैसे अत्याचार को सहना भी एक तरह का अत्याचार है, ग़लती को देखना भी तो एक तरह की ग़लती है! अगर आप अपने पड़ोसी को ग़लती करने से बचने के लिए समझाते नहीं हैं, तो इस तरह से भी एक ग़लती ही करते हैं. वैसे अगर आप पॉश लोकेलिटी वाले हैं तो वहां कोई ग़लती अनजाने में नहीं करता. वहां ग़लती करने के पहले भी उसकी पूरी गणित लगा ली जाती है. ग़लतियां वे करते हैं जिन्हें आप कम-अक्ल मानते हैं. और वे ग़लतियां इसलिए नहीं करते कि उनका विवेक आपसे कम है, वे ग़लती सिर्फ़ इसलिए करते हैं क्योंकि वे इतने सूचनासमृद्ध नहीं हैं जितने कि आप. उनके पास इसका कोई उपाय नहीं है. आपके पास उपाय तो है और आप सूचना समृद्ध भी हैं. चाहें तो दुनिया के सच को देखने के लिए अपना एक अलग नज़रिया बना सकते हैं. पर आप वह करते नहीं हैं. क्योंकि आप एक तो अपनी सुविधाएं नहीं छोड़ सकते और दूसरे वह वर्ग जो आपको सुविधाएं उपलब्ध कराता है, उसके मानसिक रूप से भी ग़ुलाम हो गए हैं.
यह जो आपकी दिमाग़ी ग़ुलामी है, इससे छूटिए. उनके प्रचार तंत्र से आक्रांत मत होइए. यह समझिए कि उनका प्रचारतंत्र उनके फ़ायदे के लिए है, आपके फ़ायदे के लिए नहीं. वह हर हवा का रुख़ वैसे ही मोड़ने की पूरी कोशिश करते हैं, जैसे उनका फ़ायदा हो सके. अगर उनका न हो तो उनके जैसे किसी का हो जाए. सांपनाथ न सही, नागनाथ आ जाएं. नागनाथ के आने में आपको ऐसा भले लगता हो कि सांपनाथ का कोई नुकसान हुआ, पर वास्तव में सांपनाथ का कोई नुकसान होता नहीं है. यह जो झैं-झैं आपको दिखती है, वह कोई असली झैं-झैं नहीं है. असल में नागनाथ और सांपनाथ के बीच भी वही होता है जो बड़े परदे पर नायक और खलनायक के बीच होता है. ज़रा ग़ौर फ़रमाइए न, सांपनाथ का ऐसा कौन सा पारिवारिक आयोजन होता है, जिसमें नागनाथ शामिल नहीं होते हैं और नागनाथ का ऐसा कौन सा काम होता है जिसमें  सांपनाथ की शिरकत न हो?
फिर? भेद किस बात का है? असल में यह भेद नहीं, भेद का नाटक है. अगर वे ऐसा न करते तो अब तक कब के आप यह समझ गए होते कि बिना पूंजी के भी चुनाव जीता जा सकता है और ज़रूरी नहीं कि बड़ी-बड़ी पार्टियों के ही माननीयों को जिताया जाए, आप अपने बीच के ही लोगों को चुनाव लड़ा-जिता कर सारे सदनों पर अपने जैसे लोगों का कब्ज़ा बनवा चुके होते. भारत की व्यवस्था से पूंजी, परिवारवाद, क्षेत्रवाद और जाति-धर्म का खेल निबटा चुके होते. लेकिन आप अभी तक ऐसा नहीं कर सके. क्यों? क्योंकि आपके दिमाग़ में यह बात इस तरह बैठा दी गई है कि जनतंत्र में जीत धनतंत्र की ही होनी है, कि आप आज अचानक चाहें भी तो उसे अपने दिमाग़ से निकाल नहीं सकते हैं. अभी जो मैं यह कह रहा हूं, शायद आपको ऐसा लग रहा हो कि इसका दिमाग़ चल गया है.
लेकिन नहीं दोस्तों, आप अचानक कलम छोड़ कर जूता निकाल लेते हैं, तब आपकी मनःस्थिति क्या सामान्य होती है? नहीं. यह आपको इसीलिए करना पड़ता है क्योंकि कलम को आपने सिर्फ़ रोजी-रोटी से जोड़ लिया है. यह आपके भीतर एक तरह का अपराधबोध भी पैदा करता है, समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी न निभा पाने की और अपराधबोध आपको एक दिन उबलने के लिए मजबूर कर देता है. यह सिर्फ़ शोषण-दमन की पीड़ा नहीं है जो जूते के रूप में उछलती है, यह स्वयं अपनी ही आत्मा के प्रति धिक्कार की भी पीड़ा है, जो दूसरों के साथ-साथ अपने पर भी उछलती है और यह अनियंत्रित उछाल कोई सही दिशा नहीं ले सकती. इसका तो उपयोग वही अपने हित में कर लेंगे जिनके ख़िलाफ़ आप इसे उछाल रहे हैं. क्योंकि उनके पास एक सुनियोजित तंत्र है, जो हारना जानता ही नहीं. वह हर हाल में जीतने के लिए प्रतिबद्ध है. साम-दाम-दंड-भेद सब कुछ करके. दो सौ वर्षों से चली आ रही भारत की आज़ादी की लड़ाई ऐसे ही केवल बीस वर्षों में हाइजैक कर ली गई. इसके पीछे कारण कुछ और नहीं, केवल ऊर्जा का अनियंत्रित प्रवाह था.
अकसर होता यह है कि आपने कुछ लिखा और अपनी ज़िम्मेदारी पूरी मान ली. अपने पाठक को शंकाएं उठाने और तर्क़ करने का तो आप कोई मौक़ा देते ही नहीं. उसे वह मौक़ा दीजिए. यह मौक़ा उसे भी दें जो आपका पाठक-दर्शक या श्रोता नहीं है. जो किसी का भी पाठक होने लायक तक नहीं है. थोड़ा निकलिए दीन-दुनिया में. मिलिए ऐसे लोगों से जिनसे मिलना आपको ज़रा निम्न कोटि का काम लगता है. अगर आप एक दिन में एक व्यक्ति से भी आमने-सामने का संपर्क करेंगे तो यह न सोचें कि वह संपर्क केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित रहेगा. याद रखें, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी.  यह रास्ता थोड़ा लंबा ज़रूर है, पर अंतहीन नहीं है. और ख़याल रखें, ज़िन्दगी का कोई शॉर्टकट नहीं होता. शॉर्टकट तो हमेशा मौत का ही होता है. अगर शॉर्टकट के फेर में पड़ेंगे तो फिर से वही जलालत झेलनी होगी. लड़ाई हाइजैक हो जाएगी. सिर्फ़ चेहरे बदल जाएंगे, व्यवस्था वही बनी रहेगी.
इसलिए कहीं भी अकेले-अकेले जूते चलाने की ग़लती न करें. अगर दुनिया के मजदूर-किसान यानी असली फोर्थग्रेडिए इकट्ठे नहीं हो सकते तो कोई बात नहीं, पर कम से कम भारत के तो सारे चिरकुट एक हो जाएं. चुनाव का समय भी वस्तुतः देश के सारे चिरकुटों की सोच की एकता प्रकट करने का एक मौक़ा होता है. यह क्यों भूलते हैं कि 19वीं सदी के आरंभ तक इस देश का आम आदमी चुनाव के बारे में जानता भी नहीं था. और तब जब उसे इसके बारे में पता भी चला तो माननीयों के चयन में उसकी भागीदारी नहीं थी. सिर्फ़ माननीय ही चुनते थे माननीयों को. लेकिन अब माननीयों को वह सिर्फ़ चुन ही नहीं रहा है, उनकी मजबूरी बन चुका है. यह काम कोई एक दिन में नहीं हुआ है. क़रीब सवा सौ साल लगे हैं इतिहास को बदलने में. यह कोई एनसीआरटी की किताब वाला इतिहास नहीं था, जिसे च्विंगम चबाते-चबाते जब चाहे बदल दिया जाए. यह असली इतिहास है. इसके बदलने में कई बार हज़ार-हज़ार साल भी लग जाते हैं.
जानकारी का अधिकार अभी तक आपके पास नहीं था, पर अब है. यह आपको मिल सके इसके लिए कितना संघर्ष करना पड़ा, यह आप जानते ही हैं. थोड़े दिन और संघर्ष के लिए तैयार रहिए, आपको इन जिन्नों को वापस उसी बोतल मे भेजने का अधिकार भी मिलने वाला है. अभी यह विकल्प भी आपके सामने आने वाला है कि जो लोग मैदान में दिख रहे हैं उनमें अगर आपको कोई पसन्द नहीं है तो आप यह भी ईवीएम में दर्ज करा आएंगे. टीएन शेषन ने अगर यह सोचा होता कि भारत की चुनाव प्रक्रिया को बदलना अकेले उनके बस की बात नहीं है तो क्या होता? क्या आज यह सोचा जा सकता था कि बिना बूथ कैप्चरिंग के भी चुनाव हो सकता है. लेकिन नहीं उन्होंने आलोचनाओं को बर्दाश्त करते हुए अपनी ख़ब्त को ज़िन्दा रखा और आज यह संभव हो गया. ऐसे ही एक दिन नागनाथ-सांपनाथ से मुक्ति भी संभव दिखेगी. वह भी शांतिपूर्वक. लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जब आप उतावली में न आएं. इस दुनिया को धीरे-धीरे बदलने की कोशिश करें. इसके पहले कि बड़े बदलाव के लिए कोई प्रभावी कदम उठाएं चेतना के अधिकतम दिये जला लें. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो आपकी कुर्बानी भी वैसे ही हाइजैक हो जाएगी जैसे मंगल पान्डे, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला ख़ां, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, शचीन्द्रनाथ सान्याल और उधम सिंह की कुर्बानी हाइजैक हो गई. या फिर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तरह आप ख़ुद ही हाइजैक कर लिए जाएंगे.

इसके विपरीत, चेतना का एक दिया अगर आप जलाएंगे तो वह अपने जैसे हज़ार दिये जला देगा. उन हज़ार दियों से हज़ार हज़ार दिये जल जाएंगे. फिर जो जूतम-पैजार शुरू होगी, वह चाहे किसी भी रूप में हो, उसे रोकना या हाइजैक कर पाना किसी माननीय के बस की बात नहीं होगी.  आख़िर एक न एक दिन तो नासमझी इस दुनिया से विदा होनी ही है, तो आज से ही हम इस महायज्ञ में हिस्सेदार क्यों न हो जाएं. बस अपने संपर्क में आने वाले हर शख़्स को यह समझाने की ज़रूरत है कि एक बोतल, एक कम्बल, एक सौ रुपये के लिए अगर आज तुमने अपने पास का खड़ाऊं बर्बाद कर दिया, झूठे असंभव किस्म के प्रलोभनों में अगर आज तुम फंस गए, तो उम्र भर तुम्हें इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी. जाति-धर्म-क्षेत्र-भाषा के जाल में फंसने जैसा महापाप अगर आज तुमने किया तो इसका प्रायश्चित तुम्हारी कई पीढ़ियों को करना पड़ेगा. इसलिए सिर्फ़ इस पाप से बचो. निकालो अपना-अपना खड़ाऊं और दे मारो उन माननीयों के मुंह पर जो आज तक तुम्हें भांति-भांति की निरर्थक बातों से बहकाते रहे हैं. मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखा कर जलालत की भेंट देते रहे हैं.  तो भाई, अब ताक क्या रहे हैं निकालिए और दे मारिए अपना खड़ाऊं-जूता-चप्पल-चट्टी … जो कुछ भी है…..पर ज़रा देख के .. ज़रा ध्यान से..  एक साथ .. एक तरफ़… ताकि असर हो. ऐसा कि ……

(दोस्तों अथातो जूता जिज्ञासा की तो यह इति है, पर मुझे पूरा विश्वास है कि जूता कथा अब शुरू होगी और उसे लिखेंगे आप…. अपने-अपने ………………..

अथातो जूता जिज्ञासा-31

ओम क्रांति: क्रांति: क्रांति: ओम

Posted in athato juta jigyasa, अथातो जूता जिज्ञासा, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, humour, politics, satire, society | 11 Comments »

अथातो जूता जिज्ञासा-31

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 24, 2009

तो अब बात उस खड़ाऊं की जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी थी और जिसकी पहचान अब आप भूल गए हैं, या फिर पहचान कर भी उससे अनजान बने हुए हैं. यह भी हो सकता है कि आप उसे पहचान कर भी अनजान बने हों. इसकी एक वजह तो आपका आलस्य हो सकता है और दूसरी आपमें इच्छाशक्ति की भयावह कमी भी. अपनी इसी कमज़ोरी की वजह से आप तब वाह-वाह तो कर रहे हैं जब दूसरे लोग उल्टे-सीधे जूते परम माननीयों पर फेंक रहे हैं, लेकिन ख़ुद अपने हाथों में मौजूद खड़ाऊं का उपयोग करने से बच रहे हैं. मुझे मालूम है कि आप वह जूता भी नहीं चला सकेंगे. आख़िर आप बुद्धिजीवी हैं. बुद्धिजीवी कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े करता है. असल बुद्धिजीवी तो सारा तूफ़ान चाय की एक प्याली में उठाता है और चाय के साथ ही उसे थमने के लिए मजबूर भी कर देता है.

आजकल तो चाय की प्याली की भी ज़रूरत नहीं है. आज का बुद्धिजीवी तो एक ब्लॉग बनाता है और ब्लॉगे पे बेमतलब का बखेड़ा खड़ा कर देता है. ब्लॉग पर ही वह ख़ुश हो लेता है और ब्लॉग पर ही नाराज हो लेता है. कभी इस बात पर तो कभी उस बात पर. कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों नहीं देता है. कभी इस बात पर कि कोई ऐसी गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई वैसी गाली क्यों देता है. बड़े से बड़ा बखेड़ा खड़ा करने के लिए भी उसे कहीं दूर नहीं जाना पड़ता है. वह घर बैठे अपने पीसी या लैपटॉप पर ही सब कुछ कर लेता है. आम तौर पर कमेंट के बक्से में और बहुत हुआ तो एक पोस्ट मार के. कलिए ग़नीमत है, कम से कम इसकी बात दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे सौ-पचास लोगों तक जाती तो है, पहले तो बहुत बड़े-बड़े कवि और विद्वान विचारक लोग 15 बाई 18 के कमरे में ही सोफे पर बैठ के बहुत बड़ी-बड़ी गोष्ठियां कर लेते थे. घर में बैठी उनकी बीवी को पता नहीं चलता था, लेकिन पड़ोसी को पता नहीं चलता था, लेकिन 100 कॉपी छपने वाली पत्रिका में और लेखक संघ के कार्रवाई रजिस्टर में ऐतिहासिक क्रांति की ऐसी-तैसी हो चुकी होती थी. थोड़े दिनों में ऐसे ही लोग जनकवि घोषित कर दिए जाते थे. ये महान लोग घुरहू पर कविता लिखते थे और बेचारे घुरहू को कभी पता ही नहीं चल पाता था. अगर पता चल भी गया तो वह यह तो कभी समझ ही नहीं पाता था कि उसके बारे में यह जो लिखा गया है, उसका मतलब क्या है.

असल बुद्धिजीवी तो है ही वही जो ड्राइंग रूम में बैठे-बैठे फ्रांस की रक्त क्रांति से लेकर बोल्शेविक और 1857 तक सब कुछ कर देता है और बच्चे के एडमिशन के लिए बिना किसी रसीद के 50 हज़ार का डोनेशन भी दे आता है. वह 30 रुपये किलो आलू भी ख़रीद लेता है, 60 रुपये किलो दाल भी ख़रीद लेता है, ट्रेन में एक बर्थ के लिए टीटीई को दो-तीन सौ रुपये एक्स्ट्रा भी दे देता है और मन मसोस कर ब्लैक में गैस का सिलिंडर भी ले लेता है. यह अलग बात है कि यह सब करते हुए वह झींकता भी रहता है. हर बार वह गाली देता है – व्यवस्था को, व्यवस्था के कर्णधारों को, भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने वाली आम जनता को, यहां तक कि देश को भी. वह सबको भ्रष्ट और निकम्मा बताता है. और मामूली असुविधाओं से बचने के लिए भ्रष्टाचार के सामने नतमस्तक भी हुआ रहता है. वह शोषण के ख़िलाफ़ बात भी करता है और दमन को बर्दाश्त भी करता है.

असल बुद्धिजीवी वह है जो पहले परिवारवाद के ख़िलाफ़ एकजुट होने की बात करता है और इसके ख़ात्मे के लिए साम्प्रदायिक ताक़तों के साथ ले लेता है. पहले वह तोप सौदे में घोटाले की बात करता है और उसके सबूत जेब में रखता है. इस वादे के साथ कि अभी नहीं, पहले प्रधानमंत्री बनाओ, तब दिखाउंगा. गोया सुबूत न हुआ, दुलहिन का मुंह हो गया कि घुंघटा तभी उठेगा…. और प्रधानमंत्री बन जाने के बाद सचिवालय के कब्रिस्तान से मंडल का जिन्न निकाल देता है. वह जिन्न ठहरा भारतीय जिन्न. हनुमान जी से प्रेरणा ले लेता है. लेकिन हनुमान जी तो लंका जलाए थे, वह भारत ही जलाने लगता है.

इसके बाद बुद्धिजीवियों की दूसरी जमात कमंडल उठा लेती है और घूमने लगती है पूरा देस. चिल्ला-चिल्ला के .. राम लला हम आएंगे… आदि-आदि. अरे भाई जब आना होगा आना. लेकिन नहीं वे केवल चिल्लाते हैं और रामलला के पास तो नहीं लेकिन चीखते-चीखते एक दिन सत्ता में ज़रूर पहुंच जाते हैं. लेकिन ना, तब एक बार फिर मामला गड़्बड़ा जाता है. अब परिवारवाद के बजाय सांप्रदायिक ताक़तों का उभार रोकने की ज़रूरत महसूस होने लगती है. रोकी जाती है और समर्थन की पूरी धारा बदल जाती है. देश में प्रगतिशील विचारधारा की स्थापना की जाती है उसी परिवारवाद के एक बेज़ुबान पोषक तत्व को सत्ता का मठाधीश बनाकर. जो सिर्फ़ राजकुमार के लिए राजदंड बचाए रखने के अलावा और कुछ भी नहीं करता. कोई नए तरह का नहीं, यह बिलकुल बर्बर किस्म का सामंतवाद है मित्रों. इसे पहचानिए. नागनाथ और सांपनाथ का यह खेल बन्द करना अब अनिवार्य हो गया है. और यक़ीन मानिए, यह बन्द होगा, उसी खड़ाऊं से जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी है. बशर्ते आप उसकी पवित्रता को समझें, उसकी अनिवार्यता को महसूस करें और जानें उसकी ताक़त को. उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के बहकावे में न आएं जो आपको यह बता रहे हैं कि इससे कुछ नहीं होने वाला है. आपको ऐसा बताने के पीछे उनका बड़ा गहरा स्वार्थ है. उन्होंने सीधे-सादे अनपढ़ और गंवार लोगों को सुला रखा है दारू या मामूली लालच के नशे में. उनके परम पवित्र और अनमोल खड़ाऊं वे ख़रीद लेते हैं सौ-पचास रुपये में और आपको सुला देते हैं आलस्य और हताश के नशे में. आपकी खड़ाऊं वे बेकार कर देते हैं आपके आलसीपने की प्रवृत्ति का फ़ायदा उठाकर. वे हर वर्ग की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं. लेकिन याद रखें उनके सारे कमीनेपन की सारी ताक़त सिर्फ़ तब तक है जब तक कि आप अपने खड़ाऊं की ताक़त पहचान नहीं जाते और इसकी पवित्रता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध नहीं होते. खड़ाऊं को तो अब आप पहचान ही चुके हैं!

चरैवेति-चरैवेति…..   

अथातो जूता जिज्ञासा-30

Posted in athato juta jigyasa, अथातो जूता जिज्ञासा, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, humour, politics, satire, society | 10 Comments »

अथातो जूता जिज्ञासा-30

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 23, 2009

यक़ीन मानें आम जनता जो  जूता चला रही है, असल में वह जूता है ही नहीं. यह तो वह खड़ाऊं है जो भगवान राम ने दिया था भरत भाई को. भरत भाई ने यह खड़ाऊं अपने लिए नहीं लिया था, उन्होंने यह खड़ाऊं लिया था आम जनता के लिए. इसीलिए उनके समय में उस खड़ाऊं का इस्तेमाल उनके मंत्रियों, अफ़सरों और निजी सुरक्षाकर्मियों ने नहीं किया. यही वजह थी जो ख़ुद भरत राजधानी के बाहर कुटी बना कर रहते रहे और वहां से राजकाज चलाते रहे. जनता की व्याकुलता की वजह इस दौरान राम की अनुपस्थिति भले रही हो, पर शासन या व्यवस्था में किसी तरह की कोई कमी कतई नहीं थी. और सबसे बड़ी बात तो यह कि अधिकारों के उस खड़ाऊं में भरत के लिए कोई रस भी नहीं था. उनकी रुचि अगर थी तो उस ज़िम्मेदारी में जो राम की अनुपस्थिति के कारण उन पर आ पड़ी थी.

जबकि अब के शासकों की रुचि अपनी ओढ़ी हुई ज़िम्मेदारी में कभी ग़लती से भी दिख जाए तो यह एक असामान्य बात मानी जाती है. क्योंकि सामान्यतया उनकी कुल रुचि केवल उस अधिकार में है जो उन्होंने जनता को बहला-फुसला कर या डरा-धमका कर अपने ही जैसे अपने प्रतिद्वन्द्वियों से छीना है. नतीजा यह है कि आपके जनप्रिय नेताओं के बंगलों के बिजली-पानी-टेलीफोन जैसी सुविधाओं के बिल ही हर महीने लाखों में होते हैं. यह सब कहीं और से नहीं, आपकी ही जेब से आता है. हवाई सैर, अपनी ही नहीं बाल-बच्चों की अय्याशी का इंतज़ाम, पांचसितारा जीवनशैली के ख़र्चे … आदि सब आपकी ही जेब से निकलते हैं.  इस पर ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि यह सब आप जान चुके हैं.

क्या आज के राजनेता उतनी ही आसानी से खड़ाऊं लौटा देने वाले हैं, जितनी आसानी से भरत ने लौटा दिया था? भरत ने जिस खड़ाऊं को ख़ुद अपने सिर पर रखा, वह आज के राजनेताओं के गुर्गों के पैरों में है और उसका इस्तेमाल आम जनता यानी आपको रौंदने के लिए किया जा रहा है.   बहुत दिनों बाद इस बात को जनता ने समझ लिया है और इसीलिए अब वह इस खड़ाऊं के इस्तेमाल के लिए बेचैन हो उठी है. उसने देख लिया है कि अपने लिए छोड़ी गई खड़ाऊं का सदुपयोग जब तक वह स्वयं नहीं करेगी तब तक उसका प्रयोग उसके ही सिर पर होता रहेगा. कभी महंगाई के रूप में, तो कभी छोटी-छोटी रोज़मर्रा इस्तेमाल की चीज़ों की अनुपलब्धता और कभी भ्रष्टाचार के रूप में. इसीलिए अब  उसे जहां कहीं भी मौक़ा मिल रहा है और जैसे ही वह ज़रा सा भी साहस जुटा पा रही है, तुरंत खड़ाऊं उठा रही है और दे दनादन शुरू हो जा रही है, अपने परम प्रिय नेताओं पर.

लेकिन जैसा कि आम तौर पर होता है बेचैनी में बड़ा जोश होता है. वह आज के इस नए जनता जनार्दन में भी साफ़ तौर पर दिखाई पड़ रहा है. अपने यहां कहावत है – बहुत जोश में लोग होश खो बैठते हैं. यह सही है कि किसी व्यक्ति पर जूता फेंकना उसके प्रति प्रबल विरोध जताने का एक प्रतीकात्मक तरीक़ा है, लेकिन अगर हमें प्रतीकात्मक विरोध ही जताना है, यानी अपनी नाराज़गी ही व्यक्त करनी है तो उसके और भी बहुत तरीक़े हैं. जूता फेंकना इसका इकलौता तरीक़ा नहीं है और न जूता इसका असली रूप ही है. अभी जगह-जगह जूते फेंकने की जो यह हड़बड़ी दिखाई दे रही है, इसकी असली वजह आपको अपने असली खड़ाऊं की सही पहचान न होना है. तो आप अपना हक़ हासिल कर सकें इसके लिए सबसे पहली ज़रूरत यह है कि आप अपने खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान करें. यह जानें कि वह खड़ाऊं कौन सा है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए. सच-सच बताइए, क्या आप सचमुच जानना चाहते हैं कि वह खड़ाऊं कौन सा है, कैसा है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए? तो बने रहिए इयत्ता के साथ और अपने उस परम पवित्र खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान के लिए इंतज़ार करिए इस अथातो जूता जिज्ञासा की अगली कड़ी का.

अथातो जूता जिज्ञासा-29

Posted in athato juta jigyasa, अथातो जूता जिज्ञासा, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, humour, politics, satire, society | 8 Comments »

अथातो जूता जिज्ञासा-29

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 22, 2009

इन समानधर्माओं में सबसे पहला नाम आता है इराकी पत्रकार मुंतजिर अल ज़ैदी का, जिन्होंने ख़ुद को दुनिया सबसे ताक़तवर समझने वाले महापुरुष जॉर्ज बुश पर जूतास्त्र का इस्तेमाल किया. इसकी आवश्यकता कितने दिनों से महसूस की जा रही थी और कितने लोगों के मन में यह हसरत थी, यह बात  आप केवल इतने से ही समझ सकते हैं कि यह जूता चलते ही दुनिया भर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. भले ही कुछ लोगों ने दिखावे के तौर पर शिष्टाचारवश इसकी भर्त्सना की हो, पर अंतर्मन उनका भी प्रसन्न हुआ. बहुत लोगों ने तो साफ़ तौर पर ख़ुशी जताई. गोया करना तो वे ख़ुद यह चाहते थे, पर कर नहीं सके. या तो उन्हें मौक़ा नहीं मिला या फिर वे इतनी हिम्मत नहीं जुटा सके. सोचिए उस जूते की जिसकी क़ीमत चलते ही हज़ारों से करोड़ों में पहुंच गई.

असल में ज़ैदी ने यह बात समझ ली थी कि अब अख़बार तोप-तलवार के मुकाबले के लिए नहीं, सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए निकाले जाते हैं. उन्होंने देख लिया था कि अख़बार में बहुत दिनों तक लिख-लिख कर, टीवी पर बहुत दिनों तक चिल्ला-चिल्ला कर बहुतेरे पत्रकार तो थक गए. मर-खप गए और कुछ नहीं हुआ. वह समझ गए थे कि कलम में अब वह ताक़त नहीं रही कि इंकलाब ला सके. इंकलाब की बात करने वाली कलमें भी अब सिर्फ़ पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार बनाने में लग गई हैं. कलमें अब कलमें नहीं रहीं, वे मजदूरी का औजार हो गई हैं. इससे भी नीचे गिर कर कई कलमें तो दलाली का हथियार हो गई हैं. ऐसी कलम को बहुत दिनों तक घिस-घिस कर निब और काग़ज़ बर्बाद करने से क्या फ़ायदा. तो बेहतर है कि इसकी जगह जूता ही चलाया जाए.

यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि उनका जूता ज़ोरदार ढंग से चल गया. असल में इस जूते ने चलते ही उन तमाम मजबूरों-मजलूमों को आवाज़ दी जो सीनियर और जूनियर दोनों बुश लोगों के ज़माने में बेतरह कुचले गए. यही वजह थी जो इस जूते ने चलते ही अपनी वो क़ीमत बनाई जो हर तरह से ऐतिहासिक थी. इतिहास में कभी कोई जूता चलने के बाद उतनी क़ीमत में नहीं बिका होगा, जितनी क़ीमत में वह जूता बिका. भगवान रामचन्द्र के उस खड़ाऊं की भी कोई प्रतिमा कहीं नहीं बनाई गई, जिसने भरत जी की जगह 14 वर्षों तक अयोध्या का राजकाज संभाला.  मैंने हाल ही में कहीं पढ़ा था कि किसी जगह उस जूते की प्रतिमा स्थापित की गई है और बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर आने वाले दिनों में उसकी पूजा शुरू कर दी जाए.

वैसे भी ऐसे जूते की पूजा क्यों न की जाए, जो बहुत बेजुबानों को आवाज़ दे और बहुत लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने. मसलन देखिए न, उस जूते ने कितने और लोगों को तो प्रेरित किया जूते ही चलाने के लिए. लन्दन में चीन के प्रधानमंत्री पर जूता चला, भारत में गृहमंत्री पर जूता चला और इसके बाद यह जूता केवल पत्रकारों तक सीमित नहीं रहा. कलम छोड़कर जूते को हथियार बनाने वाले सिर्फ़ पत्रकार ही नहीं रहे. पत्रकारों के बाद पहले तो इसे उन्हीं पार्टी कार्यकर्ताओं ने अपना हथियार बनाया जो अब तक अपने-अपने नेताओं के आश्वासनों पर जीते आ रहे थे आम जनता की तरह, पर आख़िरकार महसूस कर लिया कि नेताजी के आश्वासन तो नेताजी से भी बड़े झूठ निकले. तो पहले उन्होंने जूता चलाया. फिर आम जनता, जो बेचारी बहुत दिनों से जूता चलाने का साहस बटोर रही थी, पर घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों और नाना प्रकार के दबावों के कारण वह ऐसा कर नहीं पा रही थी, उसने भी जूता उठा लिया.

जब तक पत्रकार जूता उठा रहे थे, या पार्टियों के कार्यकर्ता जूते चला रहे थे, तब तक बात और थी. लेकिन भाई अब यह जो जूता बेचारी आम जनता ने उठा लिया है, वह कोई साधारण जूता नहीं है. इस जूते के पीछे बड़े-बड़े गुन छिपे हुए हैं. इसके पीछे पूरा इतिहास है. आम जनता ने जूता उठाने के पहले जूतावादी संस्कृति का पूरा-पूरा अनुशीलन किया है. उसने जूते की बनावट, उसकी उपयोगिता और उसके धर्म को ठीक से समझा है. सही मायने में कहें तो सच तो यह है कि उसने जूता संस्कृति का सम्यक अनुशीलन किया है. तब जा कर वह इस निष्कर्ष तक पहुंची है कि भाई अब तो जूता जी को ही उठाना पड़ेगा. जनता का यह जूता वही जूता नहीं है, जो अब तक उसी पर चलता रहा है. यह जूता सत्ता के जूते से बहुत भिन्न है. और एक बात और, इस जूते के चलने का तो यह सिर्फ़ श्रीगणेश है. यह इसकी इति नहीं है. यह जूता एक न एक दिन तो चलेगा ही यह बात बहुत पहले से सुनिश्चित थी, लेकिन अब यह रुकेगा कब यह तय कर पाना अभी बहुत मुश्किल है.

आगे-आगे देखिए होता है क्या…..

अथातो जूता जिज्ञासा-28

Posted in athato juta jigyasa, अथातो जूता जिज्ञासा, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, humour, politics, satire, society | 10 Comments »

अथातो जूता जिज्ञासा-28

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 21, 2009

और अब बात आधुनिक भारत में जूता चिंतन की. निराला जी से थोड़े पहले उनके ही धातृ शहर इलाहाबाद में हुए एक अकबर इलाहाबादी साहब. अपने ज़माने के बहुत उम्दा शायरों में गिने जाते हैं वह और अगर क़रीने से देखा जाए तो बिलकुल आधुनिक सन्दर्भों में जूता चिंतन की शुरुआत ज़नाब अकबर इलाहाबादी साहब से ही होती है. यह अलग बात है कि उनके पूर्वजों को जूते चलाने का भी शौक़ रहा हो, पर जहां तक मैं जानता हूं, अकबर साहब के शौक़ सिर्फ़ जूते पहनने तक ही सीमित थे. उन्होंने कभी भी जूते चलाने में किसी तरह की हिस्सेदारी नहीं की. ख़ास कर जूते बनाने का शौक़ तो उनके पूर्वजों को भी नहीं था. इसके बावजूद पढ़े-लिखे लोगों के बीच जूते पर केन्द्रित उनका एक जुमला अत्यंत लोकप्रिय है. जब भी कोई ऐसी-वैसी बात होती है, भाई लोग उन्हें फट से कोट कर देते हैं. जूते पर केन्द्रित उनका शेर है :

बूट डासन ने बनाया मैंने एक मज़्मूं लिखा

मुल्क में मज़्मूं न फैला और जूता चल पड़ा.

ख़ुद मुझे भी यह शेर बेहद पसन्द है. पर इस शेर के साथ एक दिक्कत है. इस दिक्कत की वजह शायद यह है कि शिल्प के स्तर पर वह ज़रूर थोड़े-बहुत पश्चिमी मानसिकता से प्रभावित रहे होंगे. जहां साहित्य के उम्दा होने की बुनियादी शर्त उसके दुखांत होने को माना जाता है.  जहां यथार्थ के नाम पर हताशावादी स्वर ही प्रमुख है. यह आशा तक नहीं छोड़ी जाती कि शायद आगे के लोग ही कोई रास्ता निकाल सकें. शायद इसीलिए उन्हें शिक़ायत हुई जूते से. बिलकुल वैसे ही जैसे हार जाने के बाद एक नेताजी को शिक़ायत हुई जनता से. पहले तो विशुद्ध भारतीयता की बात करके सत्ता में आई उनकी पार्टी ने पांच साल तक सत्ता सुख ले लेने के बाद यह तय किया कि ये अंट-शंट टाइप के अनपढ़-देहाती कार्यकर्ताओं से पिंड छुड़ाया जाए और इनकी जगह स्मार्ट टाइप के इंग्लिश स्पीकिंग ब्रैंड मैनेजरों को लाया जाए. फिर उनकी ही सलाह पर उन्होंने एलेक्शन की कैम्पेनिंग की. यहां तक कि नारे भी उनके ही सुझावों के अनुसार बने. लेकिन चुनाव का रिज़ल्ट आने के बाद पता चला कि जनता तो फील गुड और इंडिया शाइनिंग का मतलब ही नहीं समझ सकी. तब बेचारे खिसिया कर कहे कि काम करने वाली सरकार इस देश की जनता को नहीं चाहिए.

शायद यही वजह है कि इस बार महंगाई चरम पर होने के बावजूद उनकी पार्टी ने चुनाव के दौरान एक बार भूल कर भी महंगाई का जिक्र नहीं किया. शायद उन्होंने तय कर लिया है कि आगे अगर सत्ता में आए भी तो महंगाई-वहंगाई जैसे फ़ालतू के मुद्दों पर कोई काम नहीं करेंगे. यह अलग बात है कि इसके पहले भी उन्होंने आम जनता के लिए क्या किया, यह गिना पाना ख़ुद उनके लिए ही मुश्किल है. हालांकि वह कौन है जिसने उनके राजकाज में गुड फील किया और किधर की इंडिया शाइन करते हुए दिखी, इसे आम भारतीय नहीं जानता.

वैसे भी आम भारतीय यह बात कैसे जान सकता है! बेचारा वह तो रहता है भारत में और इधर बात होती है इंडिया की. पूरी तरह भारत में ही रहने वाले और उसमें ही रचे-बसे आम आदमी को इंडिया कैसे दिखे? वैसे यह सच है कि भारत के ही किसी कोने में इंडिया भी है, पर यह जो इंडिया है उसमें मुश्किल से 20 परसेंट लोग ही रहते हैं. वही इसे जानते हैं और वही इसे समझते हैं. इस इंडिया में होने वाली जो चमक-दमक है, वह भारत वालों को बस दूर से  ही दिखाई देती है और भारत वाले इसे देखते भी बड़ी हसरत से हैं. उसके सुख भारत वालों के लिए किसी रहस्यलोक से कम नहीं हैं. ठीक इसी तरह इंडिया वालों के लिए भारत के दुख भी कोई रुचि लेने लायक चीज़ नहीं हैं. वे समझ ही नहीं पाते कि ये भूख और ग़रीबी कौन सी चीज़ हैं और बेकारी क्यों होती है. उनके लिए यह समझना लगभग असंभव है कि महंगाई से परेशान होने की ज़रूरत क्या है. भाई जो चीज़ एक साल पहले 10 रुपये की मिलती थी, वह सौ रुपये की हो गई, तो इसमें परेशान होने जैसी क्या बात है? निकालो जेब से 100 रुपये और ले लो. सबसे मुश्किल और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत वालों के भेजे में यह आसान सी बात घुसती ही नहीं है.

बहरहाल, कुछ ऐसी ही दिक्कत अकबर इलाहाबादी साहब के साथ भी हुई लगती है. अब सोचिए मज़्मूं कैसे चलेगा? उसके पास कोई हाथ-पैर तो होते नहीं और चलने के लिए पैर बहुत ज़रूरी हैं. तो जब मज़्मूं के पास पैर होते ही नहीं तो वह चलेगा कैसे? तो जाहिर सी बात है कि मज़्मूं चलने के लिए लिखे ही नहीं जाते. बल्कि इसे बाद के हिन्दी के आलोचकों-कवियों ने ज़्यादा अच्छी तरह समझा. वे उसे मज़्मूं मानते ही नहीं जो चल निकले. आज हिन्दी में मज़्मूं वही माना जाता है जिस पर लोकप्रियता का आरोप न लगाया जा सके. इस आरोप से किसी भी मज़्मूं को बचाने की शर्त यह है कि उसे ऐसे लिखा जाए कि वह किसी की समझ में ही न आ सके. इसके बावजूद यह ध्यान भी रखा जाता है कि कोई यह न कह सके कि भाई आपका तो मज़्मूं जो है, वो अपंग है. तो इसके लिए मज़्मूं को ये कवि-लेखक-आलोचक लोग आपस में ही एक से दूसरे की गोद में उठाते हुए इसके चल रहे होने का थोड़ा सा भ्रम बनाए रखते हैं. वैसे ही जैसे माताएं शिशुओं को अपनी गोद में उठाए हुए ख़ुद चलती रहती हैं और मंजिल पर पहुंच जाने के बाद शिशु ये दावा कर लेते हैं कि वे चले.

इसके ठीक विपरीत जूता या अकबर साहब के शब्दों में कहें तो बूट बनाया ही जाता है चलने के लिए. आप चाहें तो यूं भी कह सकते हैं कि बूट बनाया जाता है पैरों के लिए और पैर होते हैं चलने के लिए. अब जो चीज़ पैरों का रक्षा कवच बन कर चल सकती है, वह हाथों में हो तो भी चलेगी ही. क्योंकि चलन उसकी फितरत है. एक और मार्के की बात इसमें यह भी है कि यह रक्षा उसी की करती है जिसके पास होती है. मतलब यह कि जो इसे चलाता है. यह उसकी मर्जी पर निर्भर है कि वह इसे कैसे चलाए. चाहे तो पैरों से और चाहे तो हाथों से चला ले. बस इसी बात को कालांतर में अकबर साहब के कुछ समानधर्माओं ने समझ लिया और वे शुरू हो गए.

अथातो जूता जिज्ञासा-27

Posted in athato juta jigyasa, कविता, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, humour, politics, satire, society | 11 Comments »

अथातो जूता जिज्ञासा-27

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 20, 2009

अब मध्यकाल से निकल कर अगर आधुनिक काल में आएं और जूतोन्मुखी रचनाधर्मिता की बात करें तो चचा ग़ालिब का नाम सबसे पहले लेने का मन करता है. एक तो सूफ़ियाना स्वभाव (तमाम तरह के दुराग्रहों को टाटा बाय-बाय वह पहले ही कह चुके थे) और दूसरे दुनियादारी की भी बेहतर समझ (ख़रीदारी कर के नहीं सिर्फ़ गज़रते हुए देखा था उन्होंने दुनिया के बाज़ार को), सच पूछिए तो दुनिया की हक़ीक़त ऐसा ही आदमी क़ायदे से जान पाता है. जूते की इस सर्वव्यापकता और सर्व शक्तिसम्पन्नता को उन्होंने बड़े क़ायदे से समझा और साथ ही  उसे शहद में भिगोने की कला भी उन्हें आती है. ऐसा लगता है कि रैदास और तुलसी द्वारा क़ायम की गई परंपरा को उन्होंने ही ठीक से समझा और इन दोनों को वह साथ लेकर आगे बढ़े. कभी-कभी तो उनके यहां सूर भी दिखाई दे जाते हैं.

यह शायद सूर का, या कि सूफ़ी संतों का ही असर है जो वह भी ख़ुदा से दोस्ती के ही क्रम को आगे बढ़ाते हैं, यह कहते हुए – या तो मुझे मस्जिद में बैठकर पीने दे, या फिर वो जगह बता जहां पर ख़ुदा न हो. और ग़ालिब भी एक को मार कर दूसरे को छोड़ने वाले छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं हैं. वह भी अपने दूसरे पैर का जूता निकालते हैं, बिलकुल कबीर और रैदास की तरह. जब वह कहते हैं :

ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ्र

काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे.

तब उनका मतलब बिलकुल साफ़ है.

दूसरे तो दूसरे, यहां तक कि वे ख़ुद को भी नहीं छोड़ते हैं. उनकी ही एक ग़ज़ल का शेर है:

बने है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता

वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है.

उनके बाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी ख़ूब जूते उछाले. ‘क्यों सखि साजन नहि अंगरेज?’ जैसे सवाल उठा कर वह ग़ुलामी की भारतीय मानसिकता पर जूते ही तो उछालते रहे हैं. सद अफ़सोस हमें ज़रा सी भी शर्म आज तक नहीं अंग्रेज तो चले गए और कहने को लोकतंत्र भी आ गया, पर आज तक हम न तो लोकतंत्र अपना सके और अंग्रेजियत से ही मुक्त हो सके. निराला ने भी बहुत जूते चलाए और वह भी चुन-चुन कर उन लोगों पर जिन पर उस वक़्त जूते चलाने की हिम्मत करना बहुत बड़ी बात थी. ‘अबे सुन बे गुलाब’ और ‘बापू यदि तुम मुर्गी खाते होते’ उनकी इसी कोटि की रचनाएं हैं. वैसे सुनते तो यह हैं कि तुलसीदास पर भी जूते चलाते थे, पर यह काम वह कोई द्वेषवश नहीं, बल्कि श्रद्धावश करते थे. मैंने सुना कि वे सचमुच के जूते तुलसी की तस्वीर पर चलाते थे. एक-दो नहीं, सैकड़ों जूते बरसा देते थे. तब तक चलाते ही रहते थे वे जूते तुलसी पर, जब तक कि ख़ुद थक कर लस्त-पस्त नहीं हो जाते थे.

एक बार किसी आलोचक ने उन्हें यह करते देख लिया तो पूछा कि ऐसा आप क्यों करते हैं. उनका शफ्फाक जवाब था- भाई इसने कुछ छोड़ा ही नहीं हमारे लिखने के लिए. अब हम लिखें क्या?  हालांकि उन्होंने हिंदी साहित्य को ऐसा बहुत कुछ दिया जिसके लिए हिन्दी साहित्य ख़ुद को ऋणी मानता रहे, पर वे उम्र भर यही मानते रहे कि उनका अवदान तुलसी के सामने धेले का भी नहीं है. अब सोचता हूं तो मुझे लगता है कि निराला जूतेबाज चाहे जितने भी बड़े रहे हों, पर कवि वे निश्चित रूप से बहुत छोटे रहे होंगे. क्योंकि आजकल कई तो ऐसे कवि ख़ुद को तुलसी क्या वाल्मीकि से भी बड़ा रचनाकार मानते हैं, जिन्होंने अभी कुल तीन-चार दिन पहले ही लिखना शुरू किया है. मुझे लगता है कि निराला जी को ज़रूर सीख लेनी चाहिए थी भारत के ऐसे होनहार कवियों से.

थका भी हूं अभी मै नहीं….

अथातो जूता जिज्ञासा-26

Posted in athato juta jigyasa, अथातो जूता जिज्ञासा, कविता, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, hindi poetry, humour, politics, satire, society | 11 Comments »

अथातो जूता जिज्ञासा-26

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 19, 2009

यह तो आप जानते ही हैं कि भरत भाई ने भगवान राम की पनही यानी कि खड़ाऊं यहीं मांग ली थी. यह कह कर आपके नाम पर ही राजकाज चलाएंगे. भगवान राम ने उन्हें अपनी खड़ाऊं उतार के दे दी और फिर पूछा तक नहीं कि भाई भरत क्या कर रहे हो तुम मेरे खड़ाऊं का? अगर वह आज के ज़माने के लोकतांत्रिक सम्राट होते तो ज़रा सोचिए कि क्या वे कभी ऐसा कर सकते थे? नहीं न! तब तो वे ऐसा करते कि अपने जब चलते वन के लिए तभी अपने किसी भरोसेमन्द अफ़सर या पार्टी कार्यकर्ता को प्रधानमंत्री बना देते. छांट-छूंट के किसी ऐसे अफ़सर को जो ख़ुद को कभी इस लायक ही नहीं समझता कि वह देश चलाए. आख़िर तक यही कहता रहता कि भाई देखो! देश चलाने का मौक़ा मेरे हाथ लगा तो यह साहब की कृपा है.

वह निरंतर महाराज और युवराज के प्रति वफ़ादार अफ़सर की तरह सरकार और राजकाज चलाता रहता. अगर कभी विपक्ष या देशी-विदेशी मीडिया का दबाव पड़्ता तो वनवासी साहब के निर्देशानुसार कह देता कि भाई देखो! ऐसा कुछ नहीं है कि मैं कठपुतली हूं. बस तुम यह जान लो कि मैं सरकार अपने ढंग से चला रहा हूं और अपनी मर्ज़ी से भी. यह अलग बात है कि किसी भी मौक़े पर वह सम्राट और युवराज के प्रति अपनी वफ़ादारी जताने से चूकता भी नहीं. क्योंकि यह तो उसे मालूम ही होता कि खड़ाऊं उसके पैर में नहीं, सिर पर है और उसकी चाभी उसके पास नहीं बल्कि साहब के पास है. इसके बाद  जैसे ही उसे आदेश मिलता प्रधानमंत्री की कुर्सी ख़ाली करके चल देता एक किनारे. क्योंकि यह तो उसे पता ही है – साहब से सब होत है, बन्दे ते कछु नाहिं. साहब जब चाहेंगे उसे किसी संस्थान का चेयरमैन बना देंगे और उसके खाने-पीने और रुतबे का जुगाड़ बना रहेगा ऐसे ही.

पर भगवान राम चूक गए. उन्होने राजकाज एक योग्य व्यक्ति को सौंप दिया और वह भी पूरे 14 साल के लिए. नतीजा क्या हुआ? इसके बाद पूरे 14 साल तक  वह सिर्फ राजसत्ता ही नहीं, खड़ाऊं से भी वंचित रहे. नतीजा क्या हुआ कि बेचारे भूल ही गए खड़ाऊं का उपयोग तक करना. 14 साल के वनवास के बाद जब वह दुबारा अयोध्या लौटे और भरत भाई ने पूरी ईमानदारी से उन्हें उनका राजकाज लौटाया तो वह एकदम आम जनता जैसा ही व्यवहार करते नज़र आए. तो बेचारे मिलने के बाद भी झेल नहीं पाए राजदंड और आख़िरकार फिरसे उसे हनुमान जी सौंप कर चलते बने. बोल दिया कि भाई देखो, अब यह सब तुम्हीं संभालो. अपने राम तो चले.

पर हनुमान जी भला कबके खड़ाऊं पहनने और इस्तेमाल करने वाले. इस पेड़ से उस पेड़ तक, और भारत से श्रीलंका तक सीधे उछल-कूद जाने वाले को खड़ाऊं की क्या ज़रूरत? तो वे तो जितने दिन चला सके मुगदड़ से राजकाज चलाते रहे. खड़ाऊं का तो उन्होंने इस्तेमाल ही नहीं किया. उसी खड़ाऊं पर इस घोर कलिकाल में नज़र पड़ी लोकतंत्र के कुछ सम्राटों की तो उन्होंने तुरंत आन्दोलन खड़ा कर दिया. आगे की तो कहानी आप जानते ही हैं.

आज मैं सोचता हूं तो लगता है कि अगर भगवान ने अपनी खड़ाऊं न दी होती और उसके इस्तेमाल के वह आदी बने रहे होते तो क्या यह दिन हमें यानी कि भारत की आम जनता को देखने पड़ते? बिलकुल नहीं. अब भगवान राम तो हुए त्रेता में और इसके बाद आया द्वापर. द्वापर में हुआ महाभारत और वह किस कारण से हुआ वह भी जानते ही हैं. ग़ौर करिएगा कि महाभारत के दौरान भी जो सबसे बड़े योद्धा जी थे, श्रीमान अर्जुन जी, वह जूतवे नहीं उठा रहे थे. युद्ध के मैदान में जाके लग सबको पहचानने कि वह रहे हमारे चाचाजी, वह मौसा जी, वह मामा जी और वह दादा जी. अब बताइए हम कैसे और किसके ऊपर जूता चलाएं. तब सारथी भगवान कृष्ण को उनके ऊपर ज्ञान का जूता चलाना पड़ा. बताना पड़ा कि देखो ये तो सब पहले से ही मरे हुए हैं. तुम कौन होते हो मारने वाले. मारने और बनाने वाला तो कोई दूसरा है. वो तो सामने आता ही नहीं है, और सब मर जाते हैं. पार्टी हाईकमान की तरह. तुमको तो सिर्फ़ जूता हाथ में उठाना ही है. बाक़ी इनका टर्म तो पहले ही बीत चुका है. तब जाके उन्होने जूता उठाया और युद्ध जीता.

लेकिन सद अफ़सोस कि वह भी अच्छे जूतेबाज नहीं थे. उनका जूता भी बहुत दिन चल नही पाया. थोड़े ही दिनों भी वह भी भाग गए हिमालय. इसलिए कलियुग में फिर चाणक्य महराज को बनाना पड़ा एक जूतेबाज चन्द्रगुप्त. चन्द्रगुप्त ने टक्कर लिया कई लोगों से उसी जूते के दम पर चला दिया अपना सिक्का. जब तक उनका जूता चला तब तक देश में थोड़ा अमन-चैन रहा. बन्द हुआ तो फिर जयचन्द जैसे लोग आ गए और विदेश से बुला-बुला के आक्रांता ले आए. चलता रहा संघर्ष. आख़िरकार जब पब्लिक और राजपरिवारों सब पर अंग्रेजों का जूता चलने लगा तो मजबूरन फिर कुछ लोगों को जूता उठाना पड़ा. तब जाके देश स्वतंत्र हुआ. इस तरह अगर देखा जाए तो पूरा इतिहास किसका है भाई? विचारों का? ना. आविष्कारों का? ना. नीति का? ना. धर्म का? ना. आपके ही क्या, दुनिया के पूरे के पूरे इतिहास पर छाया हुआ है सिर्फ़ जूता. अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर कहा जाए कि इतिहास तो जूते से लिखा गया है. यक़ीन न हो देख लीजिए, आज भी जिसके हाथ में सत्ता का जूता होता है, वह जैसे चाहता है वैसे इतिहास को मोड़ लेता है. जब चाहता है किताबें और किताबों के सारे तथ्य बदल देता है. वह जब चाहता है राम के होने से इनकार कर देता है और जब चाहे हर्षद मेहता को महान बता सकता है. वह जब तक चाहे जॉर्ज पंचम के प्रशस्ति गान का गायन पूरे देश से पूरे सम्मान के साथ करवाता रहे और अंग्रेजी को हिन्दुस्तान के राजकाज की भाषा बनाए रखे.

अथातो जूता जिज्ञासा-25

Posted in athato juta jigyasa, अथातो जूता जिज्ञासा, कविता, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, hindi poetry, humour, satire, society | 9 Comments »

अथातो जूता जिज्ञासा-25

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 18, 2009

तो साहब कविवर रहीम ने पनही ही कहा था. उन्होंने पानी नहीं कहा था. मेरा ख़याल है कि यह बात अब तक आप समझ गए होंगे. वैसे हिन्दी के हतबुद्धि और कठकरेजी आलोचकों की  तरह इतने साफ़-साफ़ तर्कों के बावजूद अगर आप न ही समझना चाहें तो भी मेरे पास आपको समझाने का एक उपाय है. और वह भी कविवर रहीम के ही शब्दों में. ग़ौर फ़रमाइए:

खीरा सिर ते काटिए, मलियत नमक मिलाय

रहिमन ओछे जनन को चहियत इहे सजाय.

ज़रा सोचिए, इतना कड़ा प्रावधान करने वाले महाकवि रहीम भला पानी की बात क्यों करेंगे? पानी रखने का नतीजा क्या होता है, इसका सबक उन्होंने इतिहास से ले लिया था. ध्यान रहे, वह सिर्फ़ फ़ौजी थे. फ़ौजी शासक नहीं थे. इसलिए पूरे निष्ठुर नहीं हो सकते थे. अगर शासक रहे होते तब तो कवि होकर भी निष्ठुर हो सकते थे. राजनीतिक कवि तो वही होता है जो जब पूरे देश के नौजवान आत्मदाह कर रहे हों, तब अपनी कुर्सी बचाने के जोड़-तोड़ में व्यस्त होता है. पर रहीम ऐसे नहीं थे. वे तो उनमें से थे जो अपना सारा कुछ लुटा कर कहते थे : देनहार कोउ और है, ताते नीचे नैन. अगर राजनीतिक होते हो बात जस्ट उलटी होती. जनता के पैसे से ऐश करते और जनता पर एहसान लादते कि देख बे! धन्य महसूस कर अपने-आपको कि हमने तेरे पैसे से ऐश किया. लेकिन नहीं साहब, वह राजनीतिक नहीं थे और इसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें भी एक समय अपने घर से ही निकाल दिया गया.

मैंने देखा तो नहीं, पर सुना है कि एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें चित्रकूट में एक भड़्भूजे के यहां मजदूरी करनी पड़ी. उन्हीं दिनों उनके किसी परिचित ने भाड़ झोंकते हुए उन्हें पहचान लिया और उसने पूछा कि अरे यह क्या? क्या से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण मसला तो यह था कि कैसे? और उसका जवाब दिया कवि रहीम ने :

चित्रकूट में फिरि रहे, रहिमन राम रमेश

जा पर बिपदा परत है, सोइ आवे एहि देश.

बहुत सारे विद्वान कहते हैं कि रहीम ने यहां चालाकी की है. उन्होने अपनी विपत्ति को राम और रमेश यानी भोलेनाथ तक कि विपत्ति से जोड़ दिया है. बिलकुल वैसे ही जैसे कि आजकल के कवि अपनी विपत्ति को आम जनता की विपत्ति बताने की कोशिश करते हैं. लेकिन मुझे लगता नहीं कि रहीम ने यहां कोई कविसुलभ चालाकी की है. भोलेनाथ के बारे में तो मुझे बिलकुल नहीं पता कि वह चित्रकूट कैसे पहुंचे, लेकिन कविवर रहीम कह रहे हैं तो ठीक ही कह रहे होंगे. मेरे जैसे पल्लवग्राही पंडितों की तुलना में पुराणों की उनकी जानकारी निश्चित रूप से बेहतर रही होगी. लिहाजा उनको चाइलेंज करने का दमखम तो मुझमें नहीं है.

रही बात राम की तो वो तो आप भी जानते हैं कि किन परिस्थितियों में वह चित्रकूट पहुंचे थे. आप जानते ही हैं कि वह सिर्फ़ इसीलिए चित्रकूट पहुंचे थे कि उन्होने पनही के बजाय पानी रखा था. उन्होंने पानी रखा था सौतेली मां की जिद और पिता के आदेश का. अगर उस वक़्त उन्होंने पानी रखने के बजाय पनही निकाल लिया होता तो आप समझ सकते हैं कि इतिहास क्या होता? उन्हें वनवासी बनकर चित्रकूट जाने के बजाय अयोध्या का राज मिला होता. पर पता नहीं क्या सोच कर उन्होंने राज नहीं लिया, वनवासी बन गए. शायद वह पानी बचाने में लग गए और पनही भी ख़र्च नहीं करना चाहा उन्होंने. हालांकि पनही भी आख़िरकार उनकी बची नहीं. आपने देखा ही, बाद में किस तरह भरत भाई उनकी पनही भी मांग ले गए. कि दीजिए इसको. अपने तो चले आए, बड़े दिलदार बन के और साथ-साथ पनहियो लिए चले आए. अरे खाली गद्दी छोड़ देने से थोड़े न गद्दी संभाली जाती है. गद्दी संभालने के लिए पनही चाहिए होती है जी. ऊ आप हमको दे के जाइए.

और भले भए कि उन्होंने दे भी दी भरत भाई को अपनी पनही. इसके बाद भरत भाई तो चले गए राजकाज चलाने पनही लेकर और बेचारे रामचन्द्र जी, लक्ष्मण जी और सीता जी तीनों जने घूमते रहे जंगल-जंगल. नंगे पैर कुस-कांटा सब बर्दाश्त करते हुए. यूपी, बिहार, एमपी और छत्तीसगढ़ की जनता की तरह. इसी बीच जंगल में ही एक विश्वसुन्दरी आईं और लक्ष्मण भाई को मीका बना गईं. इसके बाद आप जानते ही हैं, मानवाधिकारवादियों का कार्यक्रम शुरू होना ही था और उसी कार्यक्रम के तहत रावण द ग्रेट सीता जी को किड्नैप कर ले गए. ओहोहो! माफ़ करिएगा. फिर विषयांतर हो गया. हम रामकथा सुनाने थोड़े न यहां आए थे. उसके लिए तो कई ठो परमपूजनीय बापू लोग हइए हैं.

बहरहाल, हमारा अभीष्ट तो सिर्फ़ जूता शास्त्र का ऐतिहासिक अनुशीलन है और इतिहास का अनुभव यह कहता है कि पनही छोड़ कर भगवान राम ने अच्छा नहीं किया. क्योंकि पनही छोड़ने के बाद उस ज़माने से लेकर इस ज़माने तक उन्हें कहीं चैन नहीं मिला. अब देखिए न, अगर उन्होंने पनही न छोड़ी होती तो क्या किसी को यह हिम्मत होती कि उनके नाम पर राजनीति करता? लेकिन नहीं आज उनके नाम पर राजनीति हो रही है. भाई लोग सत्ता हासिल कर रहे हैं, ऊहो राम के नाम पर रावण वाला कर्म करके. और जैसे ही सत्ता में आ जा रहे हैं, तो फिर कौन राम और कैसे राम. प्रधानमंत्री की कुर्सी मिलते ही भगवान राम आया राम गया राम भी नहीं रह जाते, वह बेचारे राम हो जाते हैं. अपने राम की तरह.

ज़रा सोचिए, अगर उन्होंने अपनी पनही भरत भाई को न दी होती और उसे गाहे-बगाहे चलाने के प्रेक्टिस बनाए रहे होते तो आज उनकी और उनके ग़ैर राजनीतिक भक्तों की यह दुर्दशा होती क्या? नहीं न! कविवर रहीम ने इस बात को महसूस किया था. और यक़ीन मानिए, अगर चित्रकूट की दशा देखिएगा तो आपको उनकी बात पर यक़ीन हो जाएगा कि ‘जाको बिपदा धरत है, सोइ  बसत यहि देस‘. गांव तो क्या, कस्बे तक की स्थिति यह है कि न पीने का पानी, न बिजली, न सड़क, न ढंग के स्कूल, न रोज़गार के साधन….. अजी हुज़ूर आम तौर पर लोग बस जिए जा रहे हैं ज़िन्दगी, मौत के इंतज़ार में. जाहिर है, यहां वही आएगा और वही रहेगा……….

अथातो जूता जिज्ञासा-24

Posted in athato juta jigyasa, अथातो जूता जिज्ञासा, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, hindi poetry, humour, politics, satire, society | 9 Comments »

अथातो जूता जिज्ञासा-24

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 16, 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-23

जूता चिंतन का यह क्रम संत रैदास पर आकर ठहर गया हो, ऐसा भी नहीं है. इतना ज़रूर है कि उनके बाद उनके ही जैसे जूते चलाने का रिवाज शुरू हो गया. आई मीन शहद में भिगो-भिगो कर जूते चलाने का. जूते सूर ने भी चलाए, लेकिन ज़रा धीरे-धीरे. शहद में भिगो-भिगो कर. हल्के-हल्के. जब वह कह रहे थे ‘निर्गुन को को माई-बाप’, तब असल में वह जूते ही चला रहे थे, लेकिन शहद में भिगो के, ज़रा हंस-हंस के. ताकि पता न चले. वही मरलस त बकिर पनहिया लाल रहे. वह साफ़ तौर पर यह जूते उन लोगों पर चला रहे थे जो उस ज़माने में एकेश्वरवाद और निर्गुन ब्रह्म को एक कट्टर पंथ के तौर पर स्थापित करने पर तुले हुए थे. अपने समय की सत्ता की शह उन्हें बड़े ज़ोरदार तरीक़े से मिली हुई थी. वह देख रहे थे कि इस तरह वे सामासिकता में यक़ीन करने वाली भारत की बहुलतावादी आस्था पर जूते चला रहे थे. जहां सभी अपने-अपने ढंग से अपने-अपने भगवान बनाने और उसमें विश्वास करने को स्वतंत्र हों, ऐसी खुली मानसिकता वाली संस्कृति का तालिबानीकरण वह बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे और इसीलिए उन्होंने कृष्ण के उस बालस्वरूप को अपने इष्ट के रूप में स्थापित किया जो सभी तरह के छल-छ्दम और कर्मकांड से दूर था. उन्होंने ऐसा भगवान चुना जिसे सिर्फ़ पूजा ही नहीं जा सकता था, उससे निर्द्वन्द्व दोस्ती की जा सकती थी और वह भी बड़ों की तरह गुणा-भाग वाली स्वार्थपरक दोस्ती नहीं, बच्चों की तरह निर्विकार भाव वाली दोस्ती.

उनसे ही थोड़ा आगे चलकर सेनापति कवि रहीम ने भी जूते पर बड़ा ज़ोरदार चिंतन किया. आप जानते ही हैं जूते का एक पर्याय पनही है. पिछले दिनों भाई अरविन्द मिश्र जी ने हुक्म भी किया था कि अब आप पनही पर प्रकाश डालें. तो साहब पनही पर प्रकाश डालने के लिए रहीम का उद्धरण लेना बहुत ज़रूरी है. हालांकि पनही चिंतन सम्बन्धी उनके दोहे को बाद में हिन्दी के आलोचकों और उनके कुछ प्रतिस्पर्धियों ने थोड़ा भ्रष्ट कर दिया, उसमें मिलावट करके. ग़ौर फ़रमाएं, कविवर रहीम कहते हैं:

रहिमन पनही राखिए, बिन पनही सब सून

पनही गए न ऊबरे, क्या प्राइमरी क्या दून.

बाद में लोगों ने इसमें पनही की जगह पानी कर दिया और जाने कहां से मोती-मानस-चून उठा लाए. अब सोचिए एक ऐसा कवि जो सेनापति रहा हो, वह पानी की बात क्यों करेगा. ख़ास तौर से तब जबकि रहीम के ज़माने में पानी को प्रदूषित करके यह बताने वाले भी नहीं थे कि देखिए जी यह पानी तो प्रदूषित है. पानी बेचने वाली कम्पनियां तो तब पैदा ही नहीं हुई थीं, फिर भला पानी प्रदूषित करने की ज़रूरत तब क्या थी. और जब पानी प्रदूषित करने की ज़रूरत नहीं थी, तब भला पानी राखने की बात करने की क्या ज़रूरत थी? रहीम के ज़माने में तो विज्ञापन कंपनियां भी नहीं थीं कि यह सोचा जाए कि वे उनके लिए काम करते रहे होंगे और इसी क्रम में उन कंपनियों को यह पता रहा हो कि भाई आगे बोतल में बन्द करके पानी बेचने वाली कुछ कंपनियां आएंगी और उन्हें पानी बेचने के लिए स्लोगन  की ज़रूरत पड़ेगी. चलो आज बना के या रहीम से ख़रीद के रख लेते हैं और भविष्य में जब ज़रूरत पड़ेगी तो काम आएगा.

इसके बजाय इस बात की संभावना ज़्यादा है कि उन्होंने पानी के बजाय पनही रखने की बात कही हो और क्या पता कि यह बात उन्होंने अपने जहांपनाह अकबर साहब से ही यह बात कही हो. आख़िर वह एक सिपहसालार थे. सिपहसालार का बुनियादी काम जूते चलाना ही होता है. आप जानते ही हैं कि अब तक इस देश पर जिन लोगों ने भी राज किया है, सबने जूते के ही दम पर राज किया है. और हिन्दुस्तान ही क्यों, पृथ्वी नामक इस ग्रह के किसी भी कोने पर अगर किसी ने कभी राज किया है तो जूते के ही दम पर. यह अकारण नहीं है कि अब लोकतंत्र में पब्लिक जूते उठा रही है. असल में बेचारी पब्लिक ने देख लिया है कि उसके नाम पर राज तो वे लोग कर रहे हैं जिन्हें जेलों में होना चाहिए, पर बदनाम वह हो रही है. तो बदनामी से बचने के लिए ज़रूरी हो गया है कि वह राजकाज सचमुच ख़ुद संभाले और राजकाज उसके हाथ में आए इसके लिए अनिवार्य है कि वह जूते उठाए. क्योंकि सिस्टम तो जितने भी बनाए जाएंगे, उनमें ऐसे छेद भी अनिवार्य रूप से बना दिए जाएंगे जिनसे सुपात्र सत्ता से बाहर हो जाएं और शूपात्र सत्ता के भीतर समा जाएं.

माफ़ करिएगा, भावुकता में ज़रा विषयांतर हो गया. और भाई मेरा इरादा किसी पर जूते चलाने या जूते चलाए जाने का समर्थन करना नहीं, बल्कि जूता शास्त्र का ऐतिहासिक अनुशीलन है. बावजूद इसके कि मैं इतिहास का इ भी नहीं जानता. लेकिन क्या करिएगा, इतिहास बेचारे के साथ तो बरोब्बर यही हुआ है. अब देखिए न! अभी हाल-फ़िलहाल का ताज़ा उदाहरण लीजिए, आधुनिक इतिहास का ही. इससे वे सारे लोग बाहर हो गए जिन्होने इसे बनाया- चन्द्रशेखर आज़ाद,  बटुकेश्वर दत्त, भगत सिंह, ऊधम सिंह, अशफ़ाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्र नाथ सान्याल, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, मंगल पांडे …. आदि-आदि. ये सब बेचारे आदि-आदि में चले गए. इंतज़ाम ऐसा भी बना दिया गया है आगे आने वाली पीढ़ियां अगर ढूंढ-ढूंढ कर जानना चाहें भी कि भारत की आज़ादी की लड़ाई किन लोगों ने लड़ी, तो वे उतनी कसरत करके भी सच्चाई न जान पाएं जितनी कसरत करके इन दीवानों ने अंगरेजों से आज़ादी हासिल कर ली.

और इतना ही क्यों सरकार जिसकी भी आती है, वह अपने ढंग से इतिहास बना देता है. गोया इतिहास न हुआ डीएम या एसएसपी की कुर्सी हो गई. जब जिस पार्टी की सरकार बने वह अपने पसन्द वाले आईएएस के कान पकड़े और कहे कि चल बे बैठ तू. और पिछली सरकार द्वारा वहां बैठाए गए घोंचू का कान पकड़ कर कहे कि बहुत दिन कर ली तूने डीएमगिरी, अब चल चिलांटू संस्थान का कार्यकारी निदेशक बन के बैठ. ज़्यादा ग़ुस्सा आ गया तो वेटिंग में भी डाल दिया. जिसके जैसे जी में आता है वह वैसहीं इतिहास लिखने लगता है. कब इतिहास में क्या लिखा जाएगा, यह सरकार तय करती है और सरकारे के कुछ पालतू इतिहासकार. नतीजा? साफ़ है. वे होनहार पुत्र जिन्होंने अपने पिताओं को जेल में सड़ने के लिए डाल दिया, आज उनके ही नाम पर इंडिया गेट के आसपास की कई सड़कें हैं. शायद यह बताने के लिए कि सत्ता का रास्ता ऐसा ही होता है. भारत माता के होनहार सपूतों, इनके चरित्र को अपनाओ और सत्ता में आओ. अपने देश, अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा और अपनी मेधा पर थूको और सत्ता हासिल करो. अपने गौरवशाली इतिहास पर जितनी हो सके ज़्यादती करो और सत्ता में आओ. जब आधुनिक इतिहास के साथ ही इतना कुछ हुआ है तो भला मध्यकालीन और प्राचीन इतिहास के साथ तो जितने भी सितम हुए हों, कम ही कहे जाएंगे. ख़ास तौर से भारत के प्राचीन इतिहास को तो नष्ट करने में इसके मध्यकालीन शासकों ने कोई कसर ही नहीं छोड़ी और जो बचा भी था उसे बाद में आए भारत को आधुनिकता का पाठ पढाने वाले शासकों ने भ्रष्ट कर दिया.

यह सब बेचारे इतिहसवे के साथ क्यों होता है? जाहिर है, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उसके पास जूता नहीं है. अगर बेचारे इतिहास के पास जूता होता और वह उस जूते का इस्तेमाल कर पाता तो क्या ऐसा होता? शायद कभी नहीं. यह जो ऐतिहासिक अनुशीलन की हिम्मत मैं जुटा पाया हूं, उसके मूल में भी बात दरअसल यही है. मैं जानता हूं, इतिहास मेरा कुछ बिगाड नहीं पाएगा, लिहाजा ऐतिहासिक अनुशीलन कर रहा हूं.

इतिहास की इस विवशता को कविवर रहीम ने बड़ी शिद्दत से महसूस किया. आख़िर उनके पिता बैरम ख़ान के साथ जो कुछ हुआ था, उसे वह कैसे भूल सकते थे. और अगर वह भूल भी जाते तो भी पानी से भला एक सेनापति का क्या काम? लेकिन पनही से उसका सम्बन्ध बड़े निकट का है. आप जानते ही हैं, अंगरेज बहादुर के ज़माने में सूरज अस्त नहीं होता था. क्यों? क्या इसकी वजह भी आपको मालूम है? नहीं न! अपने भाई आलोक नन्दन के मुताबिक इसकी एक ही वजह है और वह है जूता. अंग्रेजी फ़ौज के जूते इतने मजबूत होते थे कि उन्हें कहीं भी किसी भी तरह से आने-जाने में किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होती थी. उनके प्रतिद्वन्द्वी राजाओं के सिपाहियों के पास जूते बड़े कमज़ोर किस्म के थे. लिहाजा वे उन्हें पहन कर बहुत दूर तक न तो दौड़ लगा सकते थे और न मार ही कर सकते थे. नतीजा यह हुआ कि बाक़ी लोग हारते गए और अंग्रेज बहादुर जीतता गया. अब आप ही बताइए, ये अलग बात है कि हम आज तक अंग्रेज बहादुर को बहादुर कहते आ रहे हैं, लेकिन वास्तव में बहादुर भला कौन है? अंग्रेज या कि जूता? वैसे विचारणीय यह प्रश्न भी है कि भाषा विज्ञान की दृष्टि से निहायत अवैज्ञानिक होने के बावजूद अगर आज तक अंग्रेजी हमारे सिर चढ़ी हुई है तो इसमें बहादुरी किसकी है, इस भाषा की या कि उन जूतों की जो इसकी तरफ़दारी में हमारी ही देसी सरकारों की ओर से हम पर चलाए जाते रहे हैं? हिन्दी अपनी सारी वैज्ञानिकता और पूरे देश में प्रचलित होने के बावजूद अगर आज तक सरकारी कामकाज की भाषा नहीं बन सकी और कारपोरेट जगत में तो घुसने ही नहीं पाई, तो इसकी वजह क्या है?  बतौर भाषा इसकी कोई कमज़ोरी या कि इसकी जूताविहीनता?

चरैवेति-चरैवेति…..

Posted in athato juta jigyasa, अथातो जूता जिज्ञासा, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, hindi poetry, humour, politics, satire, society | 13 Comments »

अथातो जूता जिज्ञासा-23

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 2, 2009

(भाई लोगों ने बड़ी राहत महसूस की होगी कि चलो अब जूता नहीं पड़ेगा. लेकिन नहीं साहब, जूता अभी थका नहीं है. अभी उसकी यात्रा पूरी भी नहीं हुई है. सच तो यह है कि जूता चिंतन जब अपने शवाब की ओर बढ़ ही रहा था, तभी मुझे यानी जूता चिंतक को वक़्त के कुछ जूते बर्दाश्त करने पड़ गए. बस इसीलिए जूता चिंतन को लिपिबद्ध करने की प्रक्रिया ज़रा थम सी गई थी. पर अब मैं फिर मैदान में हाजिर हूं और तब तक हाजिर ही रहूंगा जब तक कि फिर कोई जूता नहीं पड़्ता या चिंतन की प्रक्रिया अपनी चरम परिणति तक नहीं पहुंच जाती.)

अथातो जूता जिज्ञासा-22

जूते बनाने वाला हमेशा सबसे ख़राब जूते ही पहनता है, यह कहावत जितनी पश्चिम में सही है उससे कहीं ज़्यादा सही यह हमारे भारतीय परिप्रेक्ष्य में है. ग़ौर करे तो आप पाएंगे कि हमारे भारत महान में तो बहुत दिनों तक जूते बनाने वाले के लिए जूते पहनना ग़ुनाह जैसी बात रही है. यहां जूते पहनने की अनुमति सिर्फ़ उन्हें ही रही है जो जूते चलाना जानते थे. बिलकुल वैसे ही जैसे फ्रांस की वह रानी साहिबा – मैरी अंतोनिएत. पर अब जूते बनाने वाले भी यहां जूते पहनने लगे हैं और यक़ीन मानिए उन्हें भी यह नसीब तभी हुआ है जब उन्होने जूते बनाने के अलावा जूते चलाने भी सीख लिए हैं.

जूते बनाते-बनाते चलाने लग जाने की प्रक्रिया की शुरुआत सच पूछिए तो संत कवि रैदास से शुरू होती है. अव्वल तो क़रीब पांच सौ साल पहले दी हुई उनकी एक कहावत भारतीय लोकमानस आज भी नहीं भूला है – मन चंगा तो कठौती में गंगा. हालंकि रैदास ने जब यह बात कही थी तब उन्होंने कोई कहावत कहने के लिए यह बात नहीं कही थी. असल में तो उन्होंने जूता ही चलाया था, पर ज़रा भिगो कर. या यूं कहें कि शहद में डुबो कर. जैसा कि भाई आलोक, भाटिया जी और इर्दगिर्द मेरे लिए कह चुके हैं. यह जूता उन्होने चलाया था उन कर्मकांडियों और चमत्कारप्रेमियों के मुखारविन्द पर जो धर्म के नाम पर सिर्फ़ कर्मकांडों की लकीर पीटते जाने के अभ्यस्त हो चुके थे. लकीर पीटने के वे इस हद तक अभ्यस्त हो चुके थे कि जिन रीति-रिवाजों के अनुपालन में वे अपना और अपने प्रति विश्वास रखने वालों का अच्छा-ख़ासा समय बरबाद करते थे, उनका निहितार्थ जानने की कभी कोशिश भी नहीं करते थे. बल्कि सच तो यह है कि अगर कोई दूसरा जानने की कोशिश भी करता तो शायद उसे उनका कोपभाजन भी बनना पड़्ता. क्या पता वे कौन सा कैसा शाप दे देते. क्योंकि उनके मूल मे जाने और निहितार्थों की तलाश करने से उनका अपना धन्धा जो चौपट होता था.

न हल चले न चले कुदाली

बैठे भोजन दें मुरारी

वाली उक्ति तो बस तभी तक सम्भव हो सकती थी, जब तक कि कोई इन बातों के निहितार्थ की तलाश न करता. निहितार्थ तलाशने की कोशिश हुई नहीं कि गए काम से. पर रैदास ने इनके निहितार्थ तलाशने की कोशिश की. वैसे जूते उनके पहले भी लोगों ने कर्मकांड पर चलाए. गोरख से लेकर कबीर तक, उनके भी पहले चार्वाक और बुद्ध भी … जूते ही तो चलाते रहे.  पर उन्हें जूते बनाने का अनुभव नहीं था. बस इसीलिए उनके जूते बहुत दिनों तक चल नहीं सके.  वे थोड़े दिनों के नारे बन कर रह गए. कबित्त तो बने पर कहावत नहीं बन सके. रैदास की बात लोक की बात बन गई तो इसकी वजह शायद यही थी कि उन्होने चलाना बाद में, बनाना पहले सीखा था.

इसीलिए जब उन्होंने चलाना शुरू किया तो ताबड़्तोड़ चलाया और बड़े-बड़े जूतेबाजों को भी फिर हिम्मत नहीं हुई कि रैदास के सामने पड़ते. क्योंकि वह वही कह रहे थे जो बार-बार योगी कहते आए थे. उत्तमा सहजावस्था, मध्यमा ध्यान धारणा, अधमा तीर्थयात्रा च मूर्तिपूजा धमाधमा.  और अपने यह कहने में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आजकल हो रही शर्मनिरपेक्षता का भी कोई ख़याल नहीं किया.  साफ़ कहा-

कृस्न करीम राम हरि राघव, जब लगि एक न पेखा.

बेद कितेब कुरान पुरानन, सहज एक नहिं देखा.

जोइ-जोइ पूजिय सोइ-सोइ कांची, सहज भाव सति होई.

कहि रैदास मैं ताहि को पूजूं, जाके ठांव नांव नहिं होई.

उनके समय में भारत मिशनरियों के सेवा भाव और पुण्य प्रयासों से आक्रांत नहीं था. टीवी चैनलों के ज़रिये अरबों का कारोबार करने वाले परमपूज्य बाबाओं और राम के माध्यम से संसद पर कब्ज़ा करने की एकटक ताक में लगे भक्तों का भी तब कोई अता-पता नहीं था और शर्मनिरपेक्ष लोग तो तब होते ही नहीं थे, वरना यक़ीन मानिए इन्हें भी उन्होंने छोड़ा नहीं होता. बाद में जब गोसाईं बाबा डंके की चोट पर ऐलान कर रहे थे –

धूत कहो अवधूत कहो रजपूत कहो जोलहा कहो कोऊ

काहू की बेटी से बेटा न ब्याहब काहू की जात बिगारब न सोऊ

मांग के  खइहौं मसीत में सोइहौं, लेबै को एक न देबै को दोऊ.

तब उनकी हिम्मत का अधिकांश उसी धारा से आ रहा था, जिसकी शुरुआत रैदास ने की थी.

(चरैवेति-चरैवेति)

Posted in athato juta jigyasa, अथातो जूता जिज्ञासा, कविता, बा-अदब, मज़ाक, राजनीति, व्यंग्य, समाज, साहित्य, हास्य, Hindi Literature, hindi poetry, humour, politics, satire, society | 15 Comments »