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Archive for the ‘book review’ Category

दुनियादारी का चलचित्र

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 25, 2010

“तभी विचित्र हुआ. प्राय: सभी युवक एक साथ खड़े हो गए. बात की बात में सबों ने अपनी कमर के नीचे के कपड़े उतार दिए – धोती, पैंट, पाजामा, नीकर तक और एक स्वर में बोल पड़े “वोट? उत ना मिली तोहरा. इहे मिली…..”
चौंकिए नहीं, यह किसी ख़बर की पंक्ति नहीं है. अभी यह एक उपन्यास से लिया गया उद्धरण है. ग्यारह साल पहले यानी सन 1999 में आए भगवती शरण मिश्र के उपन्यास ‘अथ मुख्यमंत्री कथा’ की पृष्ठ संख्या 305 से. बेशक़ अभी कहीं ऐसा हुआ नहीं है, लेकिन अगर भारतीय राजनीति की यही दशा रही, तो जिस दिशा में वह जा रही है, उसका गंतव्य यही है. क्षुद्र स्वार्थों के दलदल से जो शख़्स ज़रा सा भी ऊपर उठ सका है, जो थोड़ा सा भी नीति-अनीति को समझने-मानने वाला है और जिसमें लेशमात्र भी आत्मसम्मान-स्वाभिमान जैसा कुछ शेष है; हर वह भारतीय नागरिक देश के हर नेता के साथ यही व्यवहार करना चाहता है. वैसे भी पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान भारतीय लोकतंत्र में नए-पुराने और सिले-फटे हर प्रकार के जूतों ने जो अभूतपूर्व भूमिका निभाई है, उसका संकेत यही है. हमारी राजनीति अगर तरक़्क़ी की प्रक्रिया में बैलट से चलकर बुलट और फिर ईवीएम में गड़बड़ी तक आ पहुंची है तो जनता भी उलटे स्वस्तिक के मुहर से लेकर जूते तक तो आ ही गई है और अगर ईश्वर की ऐसी ही कृपा बनी रही तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि जल्दी ही भगवती शरण जी का ऊपर वर्णित स्वप्न साकार भी हो जाएगा.
यह दशा केवल राजनीति की ही हो, ऐसा नहीं है. सच तो यह है कि व्यवस्था के हर अंग का हाल यही है. जिनमें से तीन अंगों के साथ तो यह उपन्यास एक साथ डील करता ही है. ये अंग हैं- उच्च शिक्षा तंत्र यानी विश्वविद्यालयीय बुद्धिजीवी, नौकरशाही और राजनीति. इस पूरी महाकथा में निजी, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक संबंधों से लेकर कामकाज की दुनिया तक एक राजनीतिज्ञ की पैंतरेबाजी जिस तरह उजागर हुई है, नौकरशाहों और बुद्धिजीवियों की आत्महीनता भी उतने ही साफ़ तौर पर उभरकर सामने आई है.
कहानी की शुरुआत विश्वविद्यालय में प्राकृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. शर्मा के घर से होती है. कोशिशों के मामले में उनका जवाब नहीं है. आईएएस और पीसीएस के लिए जितनी कोशिशें वह कर सकते थे, उन्होंने सब कर के देख ली थीं. कुछ नहीं हो सका तो सबॉर्डिनेट लेवेल की परीक्षाएं देने लगे और उसमें भी जैसे-तैसे एक सप्लाई इंस्पेक़्टरी उनके हिस्से आई. दुर्भाग्य कि यह भी अंतिम तौर पर हाथ लगते-लगते रह गई. बेचारे मेडिकल परीक्षण में विफल हो गए. वरना वह सेकंड क्लास की डिग्री पर बड़े जुगाड़ से मिली विश्वविद्यालय की अस्थाई प्राध्यापकी छोड़कर सल्लाई इंस्पेक्टर बनना ही पसंद करते थे और इसकी वजह सिर्फ़ नौकरी का स्थायित्व नहीं था, बल्कि वह ऊपरी आमदनी थी जिसके चलते बहुतेरे प्रोफेसर चमचागिरी के लिए सहर्ष तैयार होते हैं. बहरहाल जब तय ही हो गया कि उन्हें सरकारी तंत्र में अगले दरवाजे से घुसने का कोई मौक़ा नहीं मिल सकता है, तो शर्मा जी ने प्रोफेसरी में मन लगाना शुरू कर दिया. इसकी शुरुआत कुछ इस तरह हुई कि उनके विभागाध्यक्ष किसी कार्यक्रम में हिस्सेदारी के लिए बाहर गए और मौक़ा मुफ़ीद देखकर उन्होंने इसी बीच अपने विभाग में एक आयोजन कर डाला. इस आयोजन में उन्होंने शहर के एक प्रभावशाली नेता जी को बुलाया और उनका यथासंभव भरपूर प्रशस्तिगान किया. इसके बाद नेताजी से उनके जो संबंध बने उसके चलते नेताजी के साथ-साथ उनके करियर का ग्राफ़ भी बड़ी तेजी से ऊपर चढ़ता चला गया.
पहले तो उनकी नियुक्ति की प्रकृति स्थायी हुई, फिर अपने कई वरिष्ठों की वरीयता को ठेंगा दिखाते हुए वे विभागाध्यक्ष भी बन गए. कापियों की जांच, सेमिनारों-गोष्ठियों में हिस्सेदारी से लेकर जो-जो तरीक़े हो सकते हैं, हर तरह से उन्होंने धन भरपूर बटोरा. इस बीच बच्चों को पूरी तरह सेटल कर दिया. शहर के पॉश इलाके में बड़ा बंग्ला बनवा लिया और जो भी सुख-सुविधाएं हो सकती हैं, सभी जुटा लीं. यह अलग बात है कि तरक्की की इस पूरी प्रक्रिया में घर में बैठे रहते हुए भी हर स्तर पर उनसे कदमताल करने वाली श्रीमती शर्मा फिर भी प्रसन्न नहीं हो सकीं. क्योंकि पैसा तो मिल गया, पर स्टेटस नहीं मिल सका. अब उनकी चाहत बस ये है कि प्राकृत के विभागाध्यक्ष जी किसी तरह कुलपति बन जाएं. संयोग ही है कि इधर नेताजी भी विधायक होते हुए मंत्री बन चुके हैं और उन्हें शिक्षा विभाग मिल चुका है और उधर कुलपति की कुर्सी भी ख़ाली होने की ओर बढ़ चुकी है. पर मुश्किल यह है कि शर्मा जी इसके लिए तैयार नहीं हैं. वजह यह कि उन्हें यह आत्मविश्वास नहीं है कि वे यह पद संभाल सकेंगे. प्रशासन वगैरह अगर किसी तरह चल भी जाए, तो उन गोष्ठियों-सेमिनारों-आयोजनों का बेचारे क्या करते जहां उन्हें कुलपति होने के नाते जाना पड़ता? आख़िर वहां बोलते क्या और कैसे, किताबों से तो उनका हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा. पर श्रीमती शर्मा ने कोई कच्ची गोटियां नहीं खेली थीं और न उनके अभिन्न बन चुके मित्र नेताजी ने ही. आख़िरकार इसका भी हल निकाल ही लिया गया.
शर्मा जी को थोड़े दिनों के लिए दिल्ली भेज दिया गया और इधर उनके ड्राइंग रूम को हाथी दांतों से सजा दिया गया. ये हाथीदांत क्या हैं और आजकल किस तरह जगह-जगह दिखते रहते हैं, उच्चतम पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया में किस तरह संविधान की आत्मा को सिपुर्दे-ख़ाक कर पूरी तरह राजनीतिक दादागिरी चलाई जाती है और कैसे कई सुपात्रों की योग्यता-पात्रता को धता बताकर बौद्धिक रूप से निहायत बौने आदमी को कुलपति जैसे गरिमामय पद पर सवार कर दिया जाता है… यह सब इस उपन्यास को पढ़कर ही जाना जा सकता है.
आज की दुनियादारी का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण और विश्लेषण यह उपन्यास करता है. राजनीतिक उठापटक की कहानी भी साथ-साथ चलती है. एक राजनेता कुर्सी के लिए क्या-क्या जोड़-तोड़ करता है और कितने समझौते करता है, अपने निजी लाभ के लिए जाति-धर्म के नाम पर किस तरह समाज को बांटता है… ये सभी बातें परत-दर-परत खुलती चलती हैं. नौकरशाही की निरीहता और उसकी लोलुपता व आत्महीनता, बुद्धिजीवियों का चारित्रिक पतन और छद्म तथा राजनीतिक उठापटक-खींचतान और तिकड़मबाजी…. ये सभी चीज़ें इसमें अच्छी तरह उजागर हुई हैं. हालांकि अपात्रता के बावजूद महत्वाकांक्षा इस अन्धी दौड़ में जी-जान से शामिल लोगों की आत्मा किस तरह उन्हें धिक्कारती है, इसका निदर्शन प्रो. शर्मा के अंतर्द्वन्द्व से किया जा सकता है.
मुश्किल यह है कि उपन्यास का आकार बहुत बड़ा हो गया है, कुल 352 पृष्ठ. खलता यह है कि इसका सिर्फ़ लेखन ही किया गया लगता है, संपादन शायद नहीं हुआ है. कहीं-कहीं तो कथाक्रम के तथ्यों में भी ग़लती हो गई है. नरेशन कई जगह इतने बड़े हो गए हैं कि उबाऊ लगने लगे हैं. कहीं-कहीं कथोपकथन भी बहुत ज़्यादा खिंच गया है और उसकी कोई तार्किक वजह भी नज़र नहीं आती है. मुख्यमंत्री ने अपने फ़ायदे के लिए जातीय घृणा के बीज जिस तरह बोये हैं, उससे कथाकार की अपनी जातीय चेतना भी बहुत प्रखर हो गई लगती है. शायद इसीलिए कुछ जगहों पर ब्राह्मणवाद की वकालत हदें पार करती लगती है. भाषा भी कहीं-कहीं अधिक ही क्लिष्ट और कृत्रिम हो गई है. इन ख़ामियों के बावजूद एक बार उठा लेने के बाद यह उपन्यास छोड़ पाने का साहस पाठक को नहीं हो सकता. क्योंकि पात्रों और व्यवस्था की गति के प्रति उसकी उत्सुकता लगातार बढ़ती जाती है. कहानीपन बनाए रखना भगवतीशरण जी की बड़ी ख़ूबी है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि अगर ये ख़ामियां इस उपन्यास में न होतीं और नरेशन में व्यंग्य का पुट वह लगातार बनाए रख पाते तो यह विश्वविद्यालयी राजनीति और राजनीतिक अखाड़ेबाजी का ‘राग दरबारी’ साबित होता.

उपन्यास : अथ मुख्यमंत्री कथा
लेखक : भगवतीशरण मिश्र
प्रकाशक : राजपाल एंड संज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली मूल्य : 250 रुपये

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अँधेरा मिटेगा एक न एक दिन

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 6, 2009

विज्ञान भूषण

कहते हैं कि अँधेरा कितना भी गहरा और भयावह क्यों न हो उसे भी एक न एक दिन मिटना ही होता है। रोशनी की एक किरण चारो ओर बिखरे असीमित तमस को चीरकर जीवन ऊर्जा का संचार कर देती है। प्रकृति का यह नियम हम सबके जीवन पर भी अक्षरश: लागू होता है। इसे हमारे समाज की विडंबना ही कहना चाहिए कि वैज्ञानिक और आर्थिक स्तर पर विकास के उच्चतम सोपानों पर पहँुचने के बाद भी हमारी सोच, आज भी पुरुषवादी मानसिकता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाई है। सार्वजनिक स्थलों और मीडिया में हम भले ही नारी स”ाक्तिकरण  के बड़े-बड़े दावे क्यों न कर लें लेकिन इस बात से इनकार नही किया जा सकता है कि घर के भीतर और बाहर  स्त्री नाम के जीव को अपना अस्तित्व और अपनी पहचान बनाए रखने के लिए हर क्षण जूझना पड़ता है। शारीरिक और उससे बहुत ज्यादा मानसिक स्तर पर होने वाले इस संघर्ष की पीड़ा को कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है।
कथाक्रम जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका से जुड़ी रचनाकार रजनी गुप्त का तीसरा उपन्यास ‘एक न एक दिन’ हाल में ही किताबघर प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास के माध्यम से लेखिका ने नारी मन में घटित होने वाली उस टूटन-फूटन को बहुत शिद्दत से महसूस किया है, जो अक्सर हमारे आसपास होती रहती है लेकिन पौरुष के दंभ में उसका रंच मात्र भी एहसास नही होता है। उपन्यास की दो प्रमुख स्त्री पात्र कृति और अनन्या हैं , जो अलग अलग परिस्थितियों के चलते अपने दांपत्य जीवन से विमुख हो जाती हैं। जहाँ एक तरफ कृति को उसके पति चौहान साहब ने तानाशाही प्रवृत्ति के चलते छोड़ दिया वहीं दूसरी तरफ अपने काम में मशगूल रहने वाले और पिता बनने में अक्षम राजीव, अनन्या से अपना रिश्ता तोड़ लेते हैं। अपने पति से अलग होने के बाद भी दोनों स्त्री पात्र अपनी अलग पहचान बनाने में सफल भी हो जाती हैं। लेकिन बार-बार स्वयं में एक अपूर्णता का एहसास दिलाने वाले उनके जज्बात और पुरुष को प्राप्त करने की उनकी तड़प आ”चर्यचकित करती है। कृति की यह परावलंबी सोच , ‘कितनों के मुँह से चौहान साहब की लंपटता के किस्से सुनती रही फिर भी मन में एक ही खयाल मंडराता रहा-  काश! कि वह एक बार सिर्फ और सिर्फ एक बार फिर से उस पर पूर्ववत भरोसा कर पाते। देखिए चौहान साहब मैने सबका साथ खारिज कर दिया, यही तो चाहते थे न आप?’
पढ़कर पाठकों के मन में प्रश्नो की ढेरों काँटेदार झाडियाँ उगने लगती हैं। जिस पुरुष ने स्त्री के वजूद को हमेशा अपने पैरों तले कुचलना चाहा उसी के प्रति यह मोह यह आसक्ति आखिर क्यों है ? जो तुम्हारे अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं कर रहा है उसके आगे गिड़गिड़ाना  कहाँ तक उचित है ? मगर समीक्ष्य पुस्तक में इन प्रश्नों के कोई सार्थक जवाब नजर नहीं आए हैं। संभवत: रचनाकार की ऐसी ही मन:स्थिति को समझते हुए चेखव ने कहीं लिखा है कि -‘ लेखक का मुख्य कार्य  सवाल को सही ढंग से समाज के सम्मुख रखना होता है , उसका समाधान तलाशना नहीं।’
आरंभ से लेकर अंत तक पूरी रचना में एक उम्मीद पाठक को जरूर बाँधे रखती है कि एक न एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा। और यही वो चैतन्य तत्व है जो पाठक को पूरा उपन्यास पढने के लिए प्रेरित करता है । इस उपन्यास के माघ्यम से लेखिका ने स्त्रीविमर्श से जुड़े सदियों पुराने घावों को पहले पूरी सावधानी के साथ उधाड़ा फिर वर्तमान परिवेश के अनुसार विचारों और तर्कों का मरहम लगाकर उस घाव पर फिर से टांका लगा दिया, इस उम्मीद के साथ कि पुरुषप्रधान इस समाज को स्त्री के वजूद का एहसास भी जरूर होगा –  एक न एक दिन।                     

पुस्तक     एक न एक दिन (उपन्यास)
लेखिका    रजनी गुप्त
प्रकाशक   किताबघर प्रकाशन , नई दिल्ली
मूल्य       425 रु मात्र

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