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Archive for the ‘corruption’ Category

Samarthan ka Sailaab

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 22, 2011



समर्थन का सैलाब 
                   -हरिशंकर राढ़ी
अनुमान था कि होगा ऐसा ही।  देशवासियों को एक इंजन मिल गया है और वे अब किसी भी ब्रेक से रुकने वाले नहीं। आज तो जैसे दिल्ली के सारे रास्ते रामलीला मैदान की ओर जाने के लिए ही हों , जैसे दिल्ली मेट्रो केवल अन्ना समर्थकों के लिए ही चल रही हो और हर व्यक्ति के पास जैसे एक ही काम हो- रामलीला मैदान पहुँचना और अन्ना के बहाने अपनी खुद की लड़ाई को लड़ना । साकेत मेट्रो स्टेशन  पर जो ट्रेन बिलकुल खाली आई थी वह एम्स जाते-जाते भर गई और सिर्फ भ्रष्टाचार  विरोधी बैनरों और नारों से। नई दिल्ली स्टेशन से बाहर निकलता हुआ हुजूम आज परसों की तुलना में कई गुना बड़ा था। सामान्य प्रवेश द्वार पर ही हजारों  की भीड़ केवल प्रवेश की प्रतीक्षा में पंक्तिबद्ध थी। किसी भी चेहरे पर कोई शिकन  नहीं, कोई शिकायत  नहीं।
ऐसा शांतिपूर्ण प्रदर्शन  मैंने तो अब तक नहीं देखा था। सच तो यह है कि प्रदर्शनों  से अपना कुछ विशेष  लेना -देना नहीं। राजनैतिक पार्टियों का प्रदर्शन  भंड़ैती से ज्यादा कुछ होता नहीं, मंहगाई  और बिजली पानी के लिए होने वाले प्रदर्शन  जमूरे के खेल से बेहतर नहीं और तथाकथित सामाजिक आन्दोलन भी रस्म अदायगी के अतिरिक्त किसी काम के नहीं। लोग अनशन  भी करते हैं पर सिर्फ और सिर्फ अपने लिए। अब स्वार्थ में डूबे एकदम से निजी काम के लिए परमार्थ वाले समर्थन कहाँ से और क्यों मिले? अगर ऐसे प्रदर्शनों  से दूर रहा जाए तो बुरा ही क्या ? आज पहली बार लगा है कि कोई निःस्वार्थ भाव से देशरक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग के लिए तत्पर है तो लोगों में चेतना जागना स्वभाविक और अपरिहार्य भी है। 
सारा कुछ पूर्णतया नियोजित और अनुशासित  है। इस तरह के आन्दोलन का परिणाम क्या होगा, यह तो अभी समय बताएगा पर ऐसे आन्दोलन होने चाहिए। जिस तरह से लोकतंत्र से  लोक गायब हो चुका है और उसका एकमात्र उपयोग मतपेटियाँ भरना रह गया है, यह किसी भी सत्ता को मदहोश  कर देने के लिए पर्याप्त है। अपनी उपस्थिति स्वयं दर्ज करानी पड़ती है और लोकतंत्र के लोक को अब जाकर महसूस हुआ है कि अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही देनी चाहिए। 
ऐसे प्रदर्शनों के अपने मनोरंजक पक्ष भी हुआ करते हैं। भारतीय मस्तिष्क  की उर्वरता को कोई जवाब तो है ही नहीं, यह आपको मानना पड़ेगा । पहले तो विरोध नहीं, और जब विरोध तो ऐसे -ऐसे तरीके कि विस्मित और स्मित हुए बिना तो आप रह ही नहीं सकते। सरकारी तंत्र के एक से एक कार्टून और एक से एक नारे! अविश्वसनीय  !! कुछ तो अश्लीलता  की सीमा तक भी पहुँचने की कोशिश  करते हुए तो कुछ जैसे दार्शनिक  गंभीरता लिए हुए। 
हर तरह की व्यवस्था के लिए लोग न जाने कहाँ से आ गये हैं। बाहर से भोजन के पैकेट निवेदन करके दिए जा रहे हैं। अंदर भी कुछ कम नहीं। अनेक निजी और संगठनों के लंगर लगातार – चावल-दाल, छोले, राजमा , पूड़ी- सब्जी ही नहीं, जूस तक का भी इंतजाम बिलकुल सेवाभाव से। 
शायद  यही अपने देश की सांस्कृतिक और सह अस्तित्व की विशेषता  है। अपने – अपने हिस्से का प्यार बाँटे बिना लोग रह नहीं पाते। जैसे कहीं से लोगों को पता चल गया हो कि कोई यज्ञ हो रहा है और अपने हिस्से की समिधा डाले बिना जीवन सफल ही नहीं होगा। है तो यह एक यज्ञ ही । परन्तु वापस  आते – आते एक प्रश्न  ने कुरेदना शुरू  ही कर दिया । अन्ना का यह आंदोलन तो सफल होगा ही, सम्भवतः राजनैतिक , प्रशासनिक और सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार का एक बड़ा भाग समाप्त भी हो जाए, किन्तु क्या हम अपने निजी जीवन में भी  भ्रष्टाचार  से मुक्त हो पाएंगे? क्या ऐसा भी दिन आएगा जब तंत्र के साथ लोक भी अपने कर्तव्य की परिभाषा  और मर्यादा समझेगा?
खैर, अभी तो अन्ना जी और उनके आन्दोलन में भाग लेने वाले असंख्य जन को सफलता की शुभकामनाएँ !
अब कुछ झलकियाँ भी जो रविवार के दिन देखी गईं-

अन्ना जी मंच पर : भजन गाते कलाकार 
भ्रष्टाचार के विरुद्ध छोटों की बड़ी जंग 
इस ज़ज्बे को देखिए
भ्रष्टाचार के विरुद्ध हनुमानजी और उनकी सेना 
बिन बुलाए हम भी आए :देश हमारा भी तो है 
हम भी हैं जोश में : देश के लिए 

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आज़ादी की दूसरी लड़ाई

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 19, 2011

-हरिशंकर राढ़ी
नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही एक आदमी ने पूछा-‘‘ भाई साहब, ये रामलीला मैदान किधर है ?’’ मन में कुछ प्रसन्नता सी हुई और उसे रास्ता बताया- ‘‘ बस इधर सामने से निकल जाइए, ये रहा रामलीला मैदान! वैसे आज तो सभी रास्ते रामलीला मैदान ही जा रहे हैं। किसी भी हुजूम को पकड़ लीजिए, रामलीला मैदान पहुँच जाएंगे। इतने दिनों बाद पहली बार तो असली रामलीला हो रही है वहाँ ! वरना रावणलीला से किसे फुरसत मिलती है यहाँ ? वैसे मैं भी वहीं चल रहा हूँ, अगर डर न लग रहा हो तो मेरे साथ चले चलिए। ’’श्रीमान जी मुस्कराए- ‘‘ डर से बचने के लिए ही तो यहाँ आया हूँ। अगर आज भी हम डर गए तो डर से फिर कभी बच नहीं पाएंगे। जहाँ देश  इतने संकट से गुजर रहा हो, वहाँ भी डरने के लिए  बचता क्या है? और डर तो नहीं रहा है एक सत्तर पार का बुजुर्ग जिसका अपना कोई रक्तसंबन्धी ही नहीं है, जो पूरे देश को अपना संबन्धी समझ बैठा है तो मैं क्यों डरूँ?’’
गेट से बाहर निकलकर कमला मार्किट वाली सड़क पर पहुँचा तो जुलूस ही जुलूस । मै भी एक अनजाने जुलूस का हिस्सा बन गया । शायद  पहली बार भीड़तंत्र अच्छा लग रहा था। हर वर्ग, हर उम्र और हर प्रकार के व्यक्ति एक साथ। नारों की आवाज के नीचे ट्रैफिक के शोर  का कोई पता ही नहीं। अगले चौराहे पर पुलिस की बैरीकेडिंग और साथ -साथ स्वयंसेवकों के पानी और खाद्य सामग्री से भरे छोटे ट्रक आगन्तुकों का स्वागत कर रहे थे। हल्की – हल्की बारिश  हो रही थी और प्रवेश  द्वार पर पानी भरा हुआ था-बेहद डबरीला । लेकिन जैसे आज किसी को अपने फैशन  की जैसे चिन्ता ही नहीं। गौरांगी आधुनिकाएं भी इस डबरीले पानी का जैसे उपहास उडा रहीं थीं । उन्हें न तो अपने प्यारे पैरों के गन्दे हो जाने की चिन्ता थी और न ही कीमती सैंडिलों के खराब हो जाने की। आज तो बिलकुल बराबर का साथ था उनका भी । अपनी सुरीली आवाज में नारे और लगा रही थीं। 
पुलिस बल तो भारी संख्या में तैनात था ही। पर यह पुलिस जैसे कुछ अलग सी लग रही थी – बिलकुल शांत  और सहयोगी। न तो कोई अपशब्द और न चेहरे पर धौंस की कोई अभिव्यक्ति । यह कहीं से नहीं लगता था कि अभी चार दिन पहले इसी पुलिस ने इसी अन्ना को बिला वजह गिरफ्तार किया होगा। वह शक्ति  तो कोई और ही रही होगी जिसने इस शक्ति को संचालित किया होगा वरना ऐसा कौन होगा इस देश में जिसे आजादी के बाद भ्रष्टाचार  ने न रुलाया होगा। रही सही कसर जनता के नारे पूरी कर रहे थे- ‘‘ये अन्दर की बात है, पुलिस हमारे साथ है। वर्दी छोड़ के आएंगे , अन्ना – अन्ना चिल्लाएंगे ।’’ सघन जाँच के बाद अन्दर जाने दिया जा रहा था। अच्छा लगा और आज किसी को कोई शिकायत  नहीं थी। आदमी खुश  हो तो क्या – क्या सह लेता है! पर अब शायद भ्रष्टाचार न सहे!
लगभग ढाई बज रहे थे और अन्ना जी मंच पर विराज रहे थे। इन्द्रदेव पता नहीं खुश थे या नाराज क्योंकि सामान्य बारिश हो रही थी । रामलीला मैदान पहले की बारिश से गीला हो चुका था पर पब्लिक को कोई फरक ही नहीं पड़ रहा था। मेरे एक मित्र कहते थे कि हिन्दुस्तान की पब्लिक को फरक बहुत देर से पड़ता है। पर एक बार जब पड़ जाता है तो वह मानती नहीं । पहले शिकार  होती है फिर शिकार करती है। यहाँ के धर्म की यह विशेषता  है। यह बचने का उपाय तबतक नहीं ढूँढ़ती जब तक पानी नाक से ऊपर नहीं आने लगता । इसकी दूसरी विशेषता  यह है कि यह भारतीय रेल के डिब्बे की तरह। पूरी तरह टिकाऊ और मजबूत लेकिन इंजन की तलाश  में है। एक बार एक इंजन लग जाए, कैसा भी, तो यह कितना भी बोझ खींच ले जाए। उनकी बात आज मुझे सही लग रही थी। उसे एक इंजन मिल गया था और अब वह इस इंजन के पीछे-पीछे कहीं तक और कोई भी वजन लेकर जाने को बेताब है।
हुजूम ही हुजूम और नारे ही नारे। मैं कोई रिपोर्ट नहीं कर रहा हूँ। यह तो सभी ने मीडिया की कृपा से प्रतिक्षण देखा ही है। मैं तो इस देश की जनता की देर आयद, दुरुस्त आयद की भावना को पढ़ने की कोशिश  कर रहा हूँ। लोग तो ऐसे भी थे जिन्हें यह नहीं मालूम कि ये जनलोकपाल क्या होता है और कानून बनाता कौन है। हाँ, इस व्यवस्था और मंहगाई से परेशान  थे और ये सोचकर आए थे कि कोई अच्छा काम हो रहा है और इसमें शरीक  होना कोई पुण्य है। भजन पर लोग नाच रहे थे और सुर मिला रहे थे – ये सुर संगीत के नहीं बल्कि समर्थन के थे। हाँ, अपना निराला हिन्दुस्तान वहाँ अपने व्यंग्यात्मक रूप में भी जिन्दा था – भीड़ में जहाँ मैं खड़ा था , वहीं किसी सज्जन का बटुआ अपने किसी हिन्दुस्तानी कलाकार भाई ने मार लिया था। 
चाहता था कि अन्ना को पास जाकर देखूँ। नजदीक जाना प्रतिबंधित था। एक गोल सा घेरा बनाया गया था। मंच के आगे मीडिया वालों का घेरा दिखा तो लगा कि प्रेस वालों के लिए कोई रास्ता तो जरूर है । सैकड़ों फोटोग्राफर और संवाददाता इधर- उधर आना- जाना मचाए हुए थे। परिचय पत्र दिखाने पर प्रेस दीर्घा में  प्रवेश मिल गया । न जाने कितने समारोहों में आना -जाना हुआ है इस आधार पर किन्तु आज जैसे पहली बार लगा कि यह परिचय पत्र सही जगह काम आया है और बहुत प्यारा है।
शाम  के लगभग चार बजे तक रामलीला मैदान आधा भर चुका था। उमड़े हुए संख्या बल को देखकर लग रहा जैसे मुझे भी आजादी की लड़ाई देखने का एक मौका मिल गया हो। अन्ना जी के पास तक पहुँच नहीं सका नहीं तो कहता कि आज सचमुच में भावनात्मक और संकलनात्मक रूप में एक सौ पचीस करोड़ माइनस पाँच सौ तैंतालीस (जो चयनित होने के बाद माननीय हो गए हैं ) तो आपके ही साथ हैं । ( फोटो भी थे पर मोबाइल धोखा दे गया और यहाँ प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ।)

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आप क्या तय कर रहे हैं?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 30, 2010

बिहार चुनाव के नतीजों ने पूरी भारतीय राजनीति को झकझोर दिया है. जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे झूठे मुद्दों पर बन्दर की तरह नाचने वाले देसी मतदाताओं ने इन छलावों को मेटहे में बन्द कर लोकतंत्र की बहती नदी की तीव्र धारा के हवाले कर दिया है. बबुआ का जादू भी नहीं चला. स्विस बैंक के खुलासे सामने हैं और आम भारतीय उनमें रुचि ले रहा है. ग़ौर करने की ज़रूरत है, यह लगभग वैसा ही दौर है, जैसा राजीव गान्धी के दौर में हुआ था. आम आदमी का ध्यान पहली बार ख़ास लोगों के काले कारनामों की ओर गया था और जिसने झूठमूठ मुद्दा बना कर जनता को बहकाया था उसी ने मदारी के झोले से मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों का ख़तरनाक सांप निकाल दिया था. कांग्रेस को छात्र नेताओं के जरिये अपनी राजनीति चमकाने का मौक़ा मिल गया और उसने तुरंत पिछले दरवाज़े से छात्र नेताओं को हवा देकर आत्मदाहों का दौर चलवा दिया. पूरे देश में लगभग ख़त्म हो चुका जातिवाद नए सिरे से स्थापित हो गया.

यह न तो अकेले कांग्रेस की चाल थी, न वीपी सिंह की और न भाजपा की. वस्तुतः यह इन सबकी मिली-जुली चाल थी. इस बात पर व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सोचने की ज़रूरत है. हम फिर एक कठिन दौर में आ गए हैं. राजनेताओं की रोजी-रोटी छिनती दिख रही है और मीडिया व व्यावसायिक जगत के बड़े-बड़े टायकूनों के लंगोटे उतर रहे हैं. बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है. क्योंकि असली मुद्दों के प्रति आम आदमी की जागरूकता भारतीय राजनेता बर्दाश्त नहीं कर सकते. राजनीति की रहस्यमय बोतल से जल्दी ही जाति-धर्म-क्षेत्र-संप्रदाय … का कोई नया जिन्न निकलने ही वाला है. ऐसे में एक समझदार मनुष्य होने के नाते आपको पहले से ही अपनी भूमिका तय करके रखनी है. आप क्या तय कर रहे हैं?

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समलैंगिकों और किन्नरों का सरकारी पदों पर आरक्षण

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 9, 2009

मैं सोच रहा हूं कि केन्द्र सरकार को एक पत्र लिखूं और कुछ सुझाव दूँ ताकि अरसों से अपनी गरिमा और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करते आ रहे लोगों (समलैंगिकों तथा किन्नरों) के आन्दोलन में सहभागिता का गौरव अर्जित कर सकूँ। इससे देश की ढेर सारी सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं जैसे दहेज, भ्रष्टाचार, महंगाई आदि को कुछ ही सालों में जड़ से खत्म किया जा सकेगा। जबकि अब तक की लगभग सभी सरकारें इन्हें खत्म करने का दावा तो करती रही हैं किंतु इन्हें असाध्य रोग मान कर एड्स की तरह औपचारिक रूप से इलाज करती रही हैं और यह सोच कर कि जनता की गरीबी तो मिटा नहीं सकते, चलो अपनी ही मिटा लें। आज़ादी के बाद से सभी सरकारों और राजनेताओं ने, चाहे वे किसी भी दल के हों, इसी तरीके से जनसेवा की है और ऐसे ही करते जाने की आशा है।अरे आप को आश्चर्य हो रहा होगा कि समलैंगिकों तथा किन्नरों के आन्दोलन और गरीबी, भ्रष्टाचार तथा महँगाई का इंससे क्या सम्बन्ध है? मै कहता हूँ यही तो हमारे शोध का विषय है। यदि समलैंगिकों तथा किन्नरों को संसद, न्यायपालिका और पुलिस विभाग में शत प्रतिशत आरक्षण दे दिया जाय तो न केवल भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल जाएगी बल्कि सदियों से उपेक्षित इस अल्पसंख्यक समुदाय के सम्वैधानिक अधिकारों की रक्षा भी होगी। साथ ही ढेर सारी समस्याओं का एक ही साथ समाधान हो जाएगा। समलैंगिकों का कोई परिवार नहीं होता। बस वह और दूसरा साथी। परिवार तो उनके साथ रहने का साहस जुटा ही नहीं पाता, इसलिए उनसे रिश्ता ही तोड़ लेता है। बच्चे पैदा होने और उनके पालन पोषण ,शिक्षा-दीक्षा, शादी व्याह के खर्चों की दूर- दूर तक कोई सम्भावना नहीं रहती है। दूर दूर तक रिश्तेदारी में भी कोई अपने बच्चे को इनके साथ रहने की अनुमति देना खतरे से खाली नहीं समझता। इस महँगाई और आर्थिक मन्दी के दौर में ईमानदार आदमी किसी तरह से रोटी-दाल और बाल बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में जीवन भर तबाह रहता है और उसके आदर्शों तथा ईमानदारी को समाज के विकसित लोग मूर्खता का पर्याय समझ कर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। ऐसे में जब इन सरकारी विभागों में समलैंगिकों को आरक्षण दिया जाएगा तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकेगा। क्योंकि उनके पास न तो असीमित परिवार होंगे और न उन पर खर्च। ऐसी स्थिति में सरकार की ओर से दिया जाने वाला वेतन बड़ी कठिनाई से खर्च हो सकेगा। जिसका परिणाम यह होगा कि पग–पग पर चौराहों पर तैनात ट्रैफिक पुलिस बस, मोटरसायकिल और ट्र्क वालों को रोक रोक कर उनसे वसूली करती नज़र नहीं आएगी। तब थानों पर तैनात पुलिस अपेक्षित धाराओं में अपेक्षित व्यक्ति के विरुद्ध अपराध को अंकित करने के लिए सौदेबाज़ी करती नज़र नहीं आएगी। न्यायालयों मे ऐसे दृश्य नहीं दिखेंगे जब कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश अपनी गर्दन नीचे कर अपनी अनभिज्ञता का दिखावा करने लगता है और पेशकार हर मुकदमे में तारीख की रिश्वत आधिकारिक रूप से लेता रहता है, जिनको कि अन्याय से लड़ने के लिए ही सरकारी पद पर आधिकारिक रूप से बिठाया गया है। तब राजनेता अपनी सात पुश्तों तक को सुखी बनाए रखने के लिए लोक कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन का घपला नहीं किया करेगा। सरकारी सेवकों और लोकसेवकों को जिनके परिवार के खर्च उनकी आय से ज्यादा हो जाया करते हैं और उन्हें असुरक्षा की भावना सताती है, परिणाम-स्वरूप उन्हें आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने का जुगाड़ करना पड़ता है और जन कल्याणकारी योजनाओं में लगने वाले धन में हेराफेरी करनी पड़ती है, उन्हें ऐसा करने को बाध्य नहीं होना पड़ेगा। तब हर महीने उन्हें कच्छप गति से चलती हुई वेतनवृद्धि और खरगोशी चाल से चलती महँगाई में तालमेल बिठाते हुए भ्रष्ट होने के लिए मज़बूर नहीं होना पड़ेगा।हर मर्ज़ का एक ही इलाज़- न रहेगा बाँस और न बाजेगी बाँसुरी। सारे सरकारी विभागों में शत-प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों का। ऐसा करने में कुछ साल लगेंगे जब सारे परिवारविहीन लोग होंगे सरकारी संस्थाओं में तब दूर-दूर तक भ्रष्टाचार का नामोनिशान नहीं होगा। पुलिस, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका कानून के अनुसार चलने प्रारम्भ हो जाएंगे और पूरे देश में समरसता आ जाएगी, जिसे लाने का झाँसा अब तक समाजवादी और कम्युनिस्ट देते रहे हैं और तब वह सपना पूरा हो सकेगा जिसे आज़ादी के परवानों ने अपने खून से सींचा था।अभी कुछ साल पहले की बात है जब उत्तर प्रदेश में गोरखपुर की जनता ने एक शोध किया था। मेयर पद पर एक किन्नर को बिठा दिया गया था। तब यह अनुभव किया गया कि ऐसे लोग जिनका परिवार नहीं होता रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी के चक्रव्यूह में फँसे बिना समाज की सेवा करते हुए देश को विकास की दिशा में आगे ले जा सकते हैं। तभी से मैने यह सोंचना प्रारम्भ कर दिया कि अगर भारत से भ्रष्टाचार रूपी कोढ़ का उपचार करना है तो एक ही तरीका है, सभी सरकारी विभागों में शत प्रतिशत आरक्षण समलैंगिकों और किन्नरों के लिए। वैसे तो यह कार्यक्रम लम्बा खिंच सकता है, लेकिन प्रयोग के तौर पर सरकारी विभागों के प्रमुखों और प्रभारी के पदों पर ऐसे अल्पसंख्यकों की नियुक्तियाँ कर शुरुआत तो की ही जा सकती है -विनय ओझा ‘स्नेहिल’

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