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रावण के चेहरों पर उड़ता हुआ गुलाल

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 27, 2009

आलोक नंदन

पुश्त दर पुश्त सेवा करने वाले कहारों से बीर बाबू कुछ इसी तरह पेश आते थे, “अरे मल्हरवा, सुनली हे कि तू अपन बेटी के नाम डौली रखले हे ?”
“जी मलिकार”,  हाथ जोड़े मल्हरवा का जवाब होता था। “अरे बहिन….!!! अभी उ समय न अलई हे कि अपन बेटी के नाम बिलाइती रखबे…, कुछ और रख ले …. भुखरिया, हुलकनी ……  लेकिन इ नमवा हटा दे, ज्यादा माथा पर चढ़के मूते के कोशिश मत कर”, अपने  ख़ास अंदाज़ में बीर बाबू अपने पूर्वजों के तौर-तरीक़ों को हांकते थे. उनके मुंह पर यह जुमला हमेशा होता था, “छोट जात  लतिअइले बड़ जाते बतिअइले”.
इलाके में कई तरह की हवाएं आपस में टकरा रही थीं और जहां तहां लोगों के मुंह से भभकते हुए शोले निकल रहे थे.
“अंग्रेजवन बहिन…सब चल गेलक बाकि इ सब अभी हइये हथन .”
“एक सरकार आविते थे, दूसर सरकार जाइत हे, बाकि हमनी अभी तक इनकर इहां चूत्तर घसित ही.. ”
“अभी तक जवार में चारो तरफ ललटेने जलित थे, इ लोग बिजली के तार गिरही न देलन…अब मोबाइल कनेक्शन लेके घूमित हथन…सीधे सरकार से बात करित हथन ”
“एक बार में चढ़ जायके काम हे… ”
“बाकि अपनो अदमियन सब भी तो बहिनचोदवे हे…कई बार तो समझा चुकली हे कि अब इ लोग के चूत्तर सूंघे के जरूरत न हे.”
कहरटोला के कई-कई बूढे़ मर चुके थे, जो इन भड़कते शोलों  को दबाते थे. कुछ जवान लोगों के बालों में सफ़ेदी तो आई थी, लेकिन कुछ नई हवाओं ने भी उनके दिमागों में सूराग किया था और ये नई हवा लाने वाले कहारों के नए लौंडे थे, जो कमाने-खाने के लिए पर फरफड़ाते हुए बाहर निकले थे. बाहर निकलने के बाद उन्हें तमाम तरह के कपड़े, जूते, कोट, चप्पल, बेल्ट आदि बनाने वाले कारखानों ने चूसा तो था, लेकिन नई हवाओं ने इनके दिमाग़ को फेरा भी था. इलाके में बुदबुदाहट  इन्होंने ही शुरु की थी. इनकी यही बुदबुदाहट  हवाओं में घुलती चली गई.
ये लोग ज़मीन और ज़मीन की परतों की बात करते थे. आसमान की बात करते थे. ग्रहों और नक्षत्रों की बात करते थे. पेड़ पौधों और खेत-खलिहानों की बात करते थे. बहुत सारे लोगों की लड़ाइयों की भी बात करते थे और उन लड़ाइयों से सीखने की बात करते थे. ऐसी कोई भी ग़लती नहीं करने की बात करते थे, जिसका जवाब उन्हें ख़ुद देना पड़े.
दशहरे में कहार टोली की एक काली बुढ़िया झूम के नाचती थी. उस पर माई आती थी. पूरा कहरटोली उसके सामने हाथ जोड़े रहती थी. कोई फूल देता था, कोई नारियल, कोई लड्डू, तो कोई सिंदूर. वह माई सिर्फ़ मैतू दुसाध से ही मानती थी. वह उसके सामने खस्सी को लाता था और एक बार में ही उसका गला उतार देता था. इसकी तैयारी उसे सुबह से ही करनी होती थी .  दिन भर वह अपने हंसिये को पजाता रहता था.
पिछले कुछ वर्षों से वह दशहरा के दिन नए कहारों को देखकर बुदबुदाने लगी थी, “खून पीएगा, खून पीएगा. कितना खून पीएगा धरती तो पहले ही खून से लाल है. और मेरी प्यास अभी तक नहीं बुझी, तो तेरी कैसे बुझेगी.” उसकी इस बुदबुदाहट से वहां मौजूद सभी लोगों की हड्डियों तक से पसीने छूट जाते थे, लेकिन नए कहारों के साथ आने वाले बाहर के कुछ लोग इसे नौटंकी बताते थे. इसको लेकर भ्रम और विभ्रम के नियमों पर बहस करते थे, और फिर उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखते थे. उनकी यह बहस दशहरे के पंद्रह दिन पहले से लेकर पंद्रह दिन बाद तक चलती थी. इस बार के दशहरा को ख़ून में डुबोने की बात वह महीनों पहले से करती आ रही थी. पूरे टोले में कंपकंपी छूटी हुई थी.
उसकी बुदबुदाहट हवाओं में तैरते हुए बभनटोले के आंगनों, कमरों और दलानों तक पहुंच गई  थी.  बीर बाबू के कान खड़े थे. बहुत दिनों से बाहरी हवाओं की चरमराहट उन्हें भी सुनाई दे रही थी. कुछ पैसे लेने के बाद अपनी ज़मीन उनको देकर बाहर जाके दो-दो हजार की नौकरी करने वाले बाभन के नए लौंडे भी दशहरा मनाने के लिए जुट रहे थे.
इधर विजयदशमी का नगाड़ा बजा, उधर बंदूकें कस गई. ऐलान हुआ, “हम अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे, यह ज़मीन हमारी है. हम अपनी ज़मीन लेंगे.”
उस दिन माई चिल्लाती रही,“ख़ून चाहिए, ख़ून चाहिए.” कल रात को ही कहारों की बस्ती में आने वाला एक बाहरी छोकरा उसकी ओर देखते हुए बोला, “तुम्हारी तरह हर किसी को ख़ून की प्यास हो जाएगी, तो फिर दुनिया किधर जाएगी? पकड़ो इसे और खाट में बांध दो.” कुछ नए कहारों ने उसे खाट में बांधने की कोशिश की तो कहारटोली में हो-हल्ला शुरू हो गया. बभनटोली से भी लोग दौड़ दौड़ कर आने लगे. तमाशा बढ़ता गया. माई ख़ून-ख़ून चिल्ला रही थी.
जिस समय बभनटोला से लोग भाग-भाग कर इधर आ रहे थे, उसी समय अगल-बगल से कई दस्ते गांव में घुसने के बाद घरों में घुस कर सभी महिलाओं और बच्चों को अपने क़ब्ज़े में ले रहे थे.
बभनटोले के सारे मर्द कहारटोली में फंस गए. माई को एक शिमर के पेड़ के नीचे बिठा दिया गया और पूरे टोले को लिबरेट घोषित कर दिया गया. बाभनों के बीच में बीर बाबू भी फंसे हुए थे. उनको भी पकड़कर माई के सामने खड़ा किया गया.
एक बाहरी नौजवान सामने आया और बीर बाबू से बोला, “हम ख़ून नहीं चाहते हैं, हम बस ज़मीन चाहते हैं. फ़िलहाल जिनके पास घर है, वो उनके पास ही रहेगा, बाक़ी ज़मीन स्वतंत्र हुई.  हर परिवार के पीछे तीन एकड़ मिलेगा. हमें ख़ून नहीं चाहिए.”
बीर बाबू चौंधियाए हुए थे, गुर्राते हुए बोले, “लेकिन हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे.”
“ज़मीन तो छोड़नी ही होगी”, उस नौजवान की गुर्राहट कुछ अधिक थी.
माई फिर चिल्लाई, “मुझे ख़ून चाहिए… मुझे ख़ून चाहिए.”
मैतू भीड़ को चीरता हुआ सामने आया. उसके हाथ में हंसुआ चमक रहा था. कोई दौड़कर एक खस्सी को सामने ले आया. वह तेज़ी से खस्सी की ओर लपका, लेकिन दो हथियारबंद लोगों ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया और खस्सी को उसके हाथ से छुड़ा लिया. वह ज़ोर-ज़ोर से मेमिया रहा था.
नौजवान बाबू सिंह की आंखों में झांकते हुए बोला, “हमें ख़ून नहीं चाहिए. हम पर विश्वास करो. हम वही कर रहे हैं, जो सभी लोगों के हित में है.” दो लोगों की ओर देखते हुए बोला, “इस माई को कमरे में बंद कर दो और तब तक पीटो नगाड़ा जब तक सब साथ मिल कर मदहोश न हो जाएं. ”
किसी ने जोर से नगाड़ा पीटा, फिर देखते ही देखते एक ही लय ताल में चारों ओर से नगाड़ों की आवाज़ आने लगी.  दूर-दूर से लोग नगाड़ा पीटते आ रहे थे.
सभी मैदान की ओर चलो. मैदान में रावण का दसमुंहा सिर और धड़ रखा हुआ था. कई टोलों की भीड़ दसों दिशाओं से वहां जुट रही थी. कौन बाभन था, कौन भुईयां, कौन चमार, कौन डोम, कौन कुर्मी, कौन कोयरी, कौन लाला, कौन अहिर, कौन राजपूत, कौन मिया….सब के सब एक भीड़ में दूर तक फैले हुए अजगर की तरह नज़र आ रहे थे.
नौजवान ने इशारा किया और नगाड़ों की आवाज शांत हो गई. वह एक ऊंचे टीले पर चढ़ा और अजगरी भीड़ की तरफ़ देखकर जोर से चिघाड़ा, “आज के बाद हम रावण नहीं जलाएंगे. रावण को जलाने के लिए इसे ज़िंदा करना पड़ता है. बुराई को एक बार में मार डालो, बार-बार नहीं. झूमो,  नाचो और गाओ…..”
नगाड़ों, तुतही, सारंगी, ढोल-छाल की आवाज़ों के साथ उड़ते हुए गुलाल से आसमान लाल हो गया.  ज़िंदा होने के लिए कसमसा रहे रावण के चेहरों पर भी उड़ता हुआ लाल गुलाल पड़ रहा था.
समाप्त

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