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Archive for the ‘gajal mirror stone man life’ Category

गजल

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 1, 2009

यूं कितने बेजान ये पत्थर
लेकिन अब इंसान ये पत्थर !

मोम सा गलने की कोशिश में
रहते हैं हलकान ये पत्थर।

टकरा कर शीशा न तोड़े
क्या इतने नादान ये पत्थर !

अपनी चोटों से क्यों इतना
रहते हैं अनजान ये पत्थर ?

इसके उसके जीवन के हैं
स्थायी मेहमान ये पत्थर।

(संदीप नाथ की यह गजल “दर्पण अब भी अंधा है” संग्रह से।)

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