Aharbinger's Weblog

Just another WordPress.com weblog

Archive for the ‘gajal’ Category

kaisa chandan

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 19, 2011

कैसा चन्दन होता है  

( यह गज़ल १९९४ में लिखी गई थी और आज अचानक ही कागजों में मिल गई . बिना किसी परिवर्तन, संशोधन के आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ.बीते दिनों का स्वाद लें .)

सूनेपन में कभी- कभी जब यह मन आँगन होता है।
स्मृतियों के सुर-लय पर पीड़ा का नर्तन होता है।
क्या स्पर्श पुष्प  का जानूँ, क्या आलिंगन क्या मधुयौवन
जी  करता  भौंरे  से  पूछूँ  –  कैसा  चुम्बन होता है।
लोग  पूछते  इतनी  मीठी  बंशी  कौन  बजाता है
ध्वस्त  हो  रहे खंडहरों  में  जब  भी  क्रंदन होता है।
हिमकर  के आतप से जलकर शारदीय  नीरवता में
राढ़ी  ने ज्वाला  से  पूछा  – कैसा  चंदन  होता है।
प्यार मर गया सदियों पहले, जिस दिन मानव सभ्य हुआ
अब तो  उसके  पुण्य दिवस  पर   केवल  तर्पण होता है।

Posted in anubhutiyan, gajal, love | 8 Comments »

Gazel

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 13, 2011

         गज़ल

                   -हरिशंकर   राढ़ी

बन जाए सारी  उम्र गुनहगार इस तरह ।
करना न मेरी जान कोई प्यार इस तरह।
सुनता  हूँ सकीने  पे भी लहरें मचल उठीं
दरिया के दिल पे हो गया था वार इस तरह।
महफिल में गम की आ गए यादों के परिंदे
सूना सा मेरा दिल हुआ गुलजार इस तरह।
उल्फत की जंग में न रहा जीत का जज़्बा 
हम   एक  दूसरे से  गए  हार इस तरह ।
सपने  खरीदते रहे जीवन  के मोल हम
चलता रहा इस देश में व्यापार इस तरह।
तनहा गुजारनी थी मुझे रात वो ‘राढ़ी’
मुझमें समा गया था मेरा यार इस तरह।

Posted in gajal | 8 Comments »