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भांति-भांति के जन्तुओं के बीच मुंबई बैठक

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 7, 2009

आलोक नंदन
मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय नेशनल पार्क में भांति-भांति के जन्तुओं के बीच रविवार को भांति-भांति के ब्लौगर जुटे। लेकिन एन.डी.एडम अपनी ड्राइंग की खास कला से वाकई में कमाल के थे। पेंसिल और अपनी पैड से वह लगातार खेलते रहे, किसी बच्चे की तरह। और देखते ही देखते वहां पर मौजूद कई ब्लौगरों की रेखा आकृति उनके पैड पर चमकने लगी। भांति भांति के ब्लौगरों के बीच अपने अपने बारे में कहने का एक दौर चला था, और इसी दौर के दौरान किसी मासूम बच्चे की तरह वह अपने बारे में बता रहे थे।
“मुझे चित्र बनाना अच्छा लगता था। एक बार अपने शहर में पृथ्वी कपूर से मिला था। वो थियेटर करते थे। मैं थियेटर के बाहर खड़ा था। एक आदमी ने उनसे मेरा परिचय यह कह कर दिया कि मैं एक चित्रकार हूं। वह काफी खुश हुये और मुझे थियेटर देखने को बोले। शाम को जब मैं अगली पंक्ति में बैठा हुआ था तो लोगों को आश्चर्य हो रहा था,” मुंबईया भाषा में वो इसे तेजी से बोलते रहे। जब वह अपना परिचय दे रहे थे तो बच्चों की तरह उनके मूंह से थूक भी निकल रहा था, जिसे घोंटते जाते थे।
“मैं पांचवी तक पढ़ा हूं, फिर चित्र बनाता रहा। मुझे चित्र बनाना अच्छा लगता था। चालिस फिल्म फेस्टिवलों में घुम चुका हूं, और लोगों की तस्वीरें बनाता रहा हूं…पांच हजार से भी अधिक तस्वीर मैं बना चुका हूं……..’’ वह बोलते रहे। रेखाचि्त्र में हिटलर का भी हाथ खूब चलता था, उसके बुरे दिनों में वह इसी से अपना खर्चा चलाने की कोशिश करता था। कभी-कभी बिना आधार के भी तुलना किया जा सकता है।
चार्ली चैपलिन की आत्मकथा और चाल्र्स डारविन की आत्मकथा को 2006 में अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने वाले सूरज प्रकाश की तस्वीर उन्होंने बहुत ही सहजता से बना दी थी। बाद में अविनाश वाचस्पति को भी उन्होंने पूरी तरह से उकेर दिया था। उनका मुंबई दौरा बहुत सारे ब्लागरों को एक साथ बिठा लिया, और आगे भी बैठने की मंशा के साथ यह बैठक चलता रहा।
विवेक रस्तोगी हाल के अंदर पंखा बंद करने में परेशान भी हुये थे कुछ देर। ब्लागरों की बातों को हाल के अंदर के पंखे की आवाजों से परेशानी हो रही थी। एन.डी.एडम ने उनको भी उकेरा था। बाद में ब्लौगरों को सही ठिकाने पर लाने के लिए बैठक के दौरान विवेक रस्तोगी इधर-उधर भागते रहे, कुशल मैनेजमेंट की भूमिका में वह शुरु से अंत तक रहे (कुशल मैंनजेमेंट तभी कुशल बनता है जब वह एक साथ कई बड़ी गलतियां करता है।) ब्लागरों के साथ लगातार कम्युनिकेशन बनाये रखा उन्होंने। चाय और नास्ते में भी कमाल हो गया था। इस कमाल में इजाफा किया था अविनाश वानचस्पति ने भूने हुये काजू परोस कर। बिस्किट का दौर तो लगातार चल ही रहा था।
हाल के अंदर जैन आचार्यों की तस्वीरें टंगी हुई थी, कतार में। बैठक के दौरान दो बार ब्लागरों को इन तस्वीरों से इधर उधर होना पड़ा। वातावरण आश्रम वाला था, पहाड़ों में जीव जंतु घूम रहे थे। संजय गांधी नेशनल पार्क से जैन मंदिर की दूरी करीब करीब ढेड़ किलोमीटर थी। इस सड़क से गुजरने के दौरान पहाड़ों में निकल आई जड़ों के बीच लड़कों की विभिन्न टोलियों का आपस में क्रिकेट खेलना एक लुभावना दृश्य बना रहा था।
वाद और संवाद के दौर लगातार चलते रहे, लोग एक दूसरे को कहते और सुनते रहे। राज सिंह छक्कों की तलाश में घूम रहे थे, एक गीत पर थिरकाने के लिए। लुंगी, लोटा और सलाम नाम से एक फिल्म भी बना रहे हैं…उसी फिल्म में इस गाने की इस्तेमाल भी करने जा रहे हैं….गाने की बोल को उन्होंने कुछ इस अंदाज में सुनाया….मार मार ..आगे से मार- पीछे से मार….ऊपर से मार- नीचे से मार….लोगों को इक्कठा करने में वह भी अपने तरीके से जुटे हुये थे। उन्होंने कहा कि नेट की हिंदी को हिंदी माना ही नहीं जाता है, चाहे आप कुछ भी रच ले। वैसे राज सिंह के प्रस्ताव पर कई ब्लागर छक्का बनकर इस गाने पर डांस करने के लिए भी तैयार थे…मेकअप गेटअप भी बदलने के लिए तैयार थे। राज सिंह 26 साल बाद सूरज प्रकाश से मिल रहे थे, दोनों को सुखद आश्चर्य हो रहा था। कुछ ब्लौगर बीच में भी आये, और अंत तक आते रहे। कुछ नये रंगरुट भी
बैठक की धमक अच्छी रही, कुछ नये और कुछ पुराने ब्लागर भी आये। नये ब्लागरों को अच्छा लग रहा था यह बताते हुये कि वह कैसे ब्लागिंग में आये और पुराने ब्लागर यह बताते हुये गर्व महसूस कर रहे थे कि कई लोगों को ब्लागिंग में उन्होंने डाला है। बेशक बैठक उम्दा रही। अब आगे क्या हो सकता है, इसको मथने की जरूरत है। ब्लागिंग दिमागी अय्याशी है जैसे शब्द भी उछले और यह भी महसूस किया गया कि इसने अच्छे-अच्छे मठाधीशों की नींद हिला दी है। ब्लागिंग से जुड़े लोग हर चीज को खंगाल रहे हैं, और हर तरीके से। सारी अय्य़ाशियां इसमें मौजूद है, लेकिन इससे आगे क्या है। यह भी कहा गया कि यह खाये पीये और अघाय लोगों की चीज है। पत्नी के फटकार वाले शब्दे ब्लोगेरिया भी सुनने को मिले इसमें। निसंदेह ब्लागिंग व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का एक शसक्त माध्यम बन कर उभरा है, लेकिन अब यह सामूहिकता की ओर भाग रहा है व्यवहारिक रूप से। मजे की बात है कि बैठकों का दौर विभिन्न शहरों में विभिन्न तरीके से चल रहा है। क्या यह ब्लाग जगत के यूनाइटेड एजेंडे की ओर बढ़ता हुआ कदम है…या फिर मानसिक अय्याशी का ही एक हिस्सा। आने वाले दिनों में ऐसे बैठकों में ऐसे सवालों पर चर्चा हो तो शायद सार्थकता की ओर बढ़ता हुआ एक कदम होगा, सोशल मोबलाइजेशन तो यह है ही। आत्म अभिव्यक्ति ही सामूहिक अभिव्यक्ति की ओर ले जाती है। और यही तो कामन विल होता है। समाज के हर तत्व का अंश उसमें होता है। ब्लाग समृद्ध हो रहा है, हर दिन और हर पल। चौंकाने वाली चीजें यहां आ रही हैं, और भरपूर मात्रा में आ रही है और चौतरफ आ रही है। लोग मुखर हैं, और हर नजरिये से मुखर हैं। चार्ली चैपलिन को इस बैठक में लिया जा सकता था, या फिर चाल्र्स डारविन को सूरज प्रकाश की अनुदित आत्मकथाओं के बहाने। बौद्धिक स्तर पर बैठक समृद्धि की ओर बढ़ती, और ब्लाग भी, और ब्लाग लेखन भी।

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