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Archive for the ‘Hindi Literature’ Category

कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 31, 2011

कितनी बार हुई हैं
जाने ये बातें

आने-जाने वाली.
विनिमय के
व्यवहारों में कुछ
खोने-पाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

जल ज़मीन जंगल
का बटना.
हाथों में
सूरज-मंगल
का अटना.
बांधी जाए
प्यार से जिसमें
सारी दुनिया
ऐसी इक
रस्सी का बटना.

सभी दायरे
तोड़-फोड़ कर
जो सबको छाया दे-
बिन लागत की कोशिश
इक ऐसा छप्पर छाने वाली.
फिर भी कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

हर संसाधन पर
कुछ
घर हैं काबिज.
बाक़ी आबादी
केवल
संकट से आजिज.
धरती के
हर टुकड़े का सच
वे ही लूट रहे हैं
जिन्हें बनाया हाफ़िज.

है तो हक़ हर हाथ में
लेकिन केवल ठप्पे भर
लोकतंत्र की शर्तें
सबके मन भरमाने वाली.
इसीलिए, कुछ भी कभी कहीं हल नहीं हुआ.

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एक साहब बयानबहादुर और एक सपोर्टबहादुर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 8, 2011

हाल ही में ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद अमेरिका ने दुनिया के सबसे शांतिप्रिय देश पाकिस्तान को धमकी दी कि ज़रूरत पड़ी तो वह पर फिर से ऐसी ही कार्रवाई कर सकता है. इसके बाद तो क्या कहने! कितना भी शांतिप्रिय हो, लेकिन कोई धमकी देगा तो कोई भी क्या करेगा. बहादुरी के मामले में पाकिस्तान का तो वैसे भी कोई जवाब नहीं रहा है. इतिहास गवाह है कि आमने-सामने की लड़ाई में वह कभी किसी से जीता नहीं है और छिपकर हमला करने का कोई मौक़ा उसने छोड़ा नहीं है. आप जानते ही हैं कि सामने आ जाए तो चूहे से आंख मिलाना वे अपनी तहजीब के ख़िलाफ़ समझते हैं और दूर निकल गए शेर पर तो पीछे से ऐसे गुर्राते हैं कि जर्मन शेफर्ड भी शर्मा जाए. तो अब जब अमेरिका उनके मिलिटरी बेस के दायरे में ही ओसामा जी की ज़िंदगी और विश्व समुदाय में उनकी इज़्ज़त की ऐसी-तैसी करके निकल गया तो वो गुर्राए हैं. यह संयोग ही है कि ओबेडिएंसी में टॉप भारत की आर्मी के प्रमुख ने भी ऐन मौक़े पर एक सही, लेकिन मार्मिक बयान दे दिया. वह भी बिना अपने हाइनेस से पूछे और इस बात का भी ज़िक्र किए बग़ैर कि ‘अगर उनकी इजाज़त हो तो’. यह जानते हुए भी कि उनकी इजाज़त के बग़ैर वे कुछ नहीं कर सकते और हाइनेस सिवा सैनिकों की बेकीमती गर्दनें कटाने के उन्हें किसी और बात की इजाज़त नहीं दे सकते. आख़िर हमें घाटी से लेकर पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति और दुनिया भर में अपनी शांतिप्रियता की यह छवि बनाए रखनी है भाई! इतनी आसान बात थोड़े ही है. ख़ैर, हमारे बयानबहादुर तो अपना बयान दे ही चुके. अब उन्होंने अपने बयान बहादुर को काम पर लगाया है. ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद घंटों चली बैठक के कई घंटे बाद तक उनके आका लोगों की तरफ़ से कोई बयान नहीं आ पाया था. ऐसे क्रूशियल मौक़े पर जिन बयानबहादुर को वहां बयान देने के महान काम पर लगाया गया था, अब उन्हीं का नया बयान आया है. यह बयान थोड़ा अमेरिका और ज़्यादा भारत के मुतल्लिक है. उन्होंने अमेरिका की कार्रवाई को तो अहम कामयाबी बताया है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि अगर किसी दूसरे देश ने ऐसी ज़ुर्रत की तो यह उसकी बड़ी भूल होगी. क्या बताएं हमें तो अपने उनके बयानबहादुर साहब की बात सुनकर वह वाक़या याद आ गया, जब ट्रेन में सफ़र कर रहे एक सज्जन के बर्थ पर कोई दूसरे सज्जन आ कर बैठ गए. पहले ने दूसरे सज्जन को हटने के लिए कहा तो उन्होंने झापड़ मार दिया. पहले को ग़ुस्सा आ गया. उन्होंने कहा कि ठीक है, हमको मारा तो मारा, हमारी बीवी को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, उन्होंने बीवी को भी मार दिया. उसके बाद उन्होंने कहा कि बीवी को मारा तो मारा, बेटे को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, दूसरे सज्जन ने बेटे को भी मार दिया. बात जमी नहीं, उन्होंने फिर कहा, बेटे को मारा तो मारा, अब बेटी को मार के दिखाओ तो जानें. आख़िरकार दूसरे सज्जन ने बेटी को भी मारने के बाद पूछा, ‘अब बताओ.’ दूसरे सज्जन ने पूरी सज्जनता के साथ कहा, ‘जी अब कुछ नहीं, अब कोई ये कहने लायक तो नहीं रहेगा कि तुम मार खाया.’ मुझे तो लगता है कि इन बयानबहादुर साहब का इरादा भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो. क्योंकि उनके अपने ही पाले हुए ओसामा जी जैसे कई शांतिदूत अब उनके काबू से बाहर हो गए हैं. क्या पता उन्होंने जो बात कही हो, वो उन्हीं के लिए कही हो. कई बार आदमी कहता कुछ और है, लेकिन उसका असल आशय कुछ और होता है. मसलन – कमज़ोर आदमी को जब किसी से मदद मांगनी होती है तो कहता है, ‘प्लीज़ मेरी मदद करें’. बहादुर लोग इसे तहजीब के ख़िलाफ़ मानते हैं. वे यही बात इस तरह कहते हैं, ‘है कोई माई का लाल जो मेरे साथ दो क़दम चलकर दिखाए.’ क्या पता कि उनका मामला भी कुछ ऐसा ही हो. वैसे भी उनके लिए यह एक मुश्किल दौर है. वैसे वीरोचित शब्दों का प्रयोग करें तो शायद कहना पड़े कि दौर-ए-फ़ख़्र है. बिरादरी के नाम पर जो लोग हर साल इन्हें ईदी भेजा करते थे, उन्होंने अब ग़ुलाम कश्मीर के पीएम साहब को नत्थी वीजा जारी करना शुरू कर दिया है. पता नहीं इसका क्या मतलब होता है. हो न हो, उनकी समझ में आ गया हो कि अब ये दुनिया भर की नज़र में शांति के सबसे बड़े दूत हो गए हैं तो इनसे नत्थी टाइप संबंध रखना ही ज़्यादा मुनासिब है. पर भाई उनकी हिम्मत की दाद तो देनी पड़ेगी. क्या पता, इस हिम्मत के मूल में हमारे उत्तर वाले पड़ोसी का सपोर्ट हो. इस दौर में एक उन्होंने ही तो इनका साथ दिया. अरे वही जिनकी मिसाल शांति और भरोसे के मामले में दुनिया भर में दी जाती है और जिनके बनाए इलेक्ट्रॉनिक आइटम उनके कूटनीतिक वादों-संकल्पों से कई गुना ज़्यादा टिकाऊ समझे जाते हैं. बहरहाल, हमारे पश्चिम वाले पड़ोसी मुल्क और उनके बयानबहादुर को हमारे उत्तर उत्तर वाले पड़ोसी मुल्क और उनकी सपोर्ट बहादुरी पर पूरा भरोसा है. हम तो उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना अब से कोई 49 साल पहले देख चुके हैं, पर चूंकि वे हमारे और उनके यानी दोनों के साझा पड़ोसी हैं, लिहाजा उन्हें भी देखना चाहिए. हालांकि उनके लिए अभी उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना देखना बाक़ी ही है. आजकल वे दोनों जन अपनी-अपनी नमूनेबाजी की ओर बड़ी तेज़ी से बढ़ रहे हैं और ठीक ही है, दोनों एक-दूसरे की सपोर्ट और बयान या कहें सपोर्ट के बदले अपोर्ट बहादुरी के नमूने जितनी जल्दी देख लें, उतना ही बेहतर रहेगा. जबसे सपोर्टबहादुर ने बयानबहादुर को सपोर्ट करना शुरू किया है, तभी से बयानबहादुर ने सपोर्टबहादुर को अपने यहां से शांतिदूतों का एक्सपोर्ट भी शुरू कर दिया है. ठीक ही है भाई, सपोर्ट के बदले एक्सपोर्ट तो होना ही चाहिए और आप देख ही रहे हैं, सपोर्टबहादुर के कुछ प्रांतों में ओलंपिक से ठीक पहले कितनी ज़बर्दस्त पटाखेबाजी हुई थी. माना जाता है कि यह बयानबहादुर के शांतिदूतों का ही पुण्यप्रताप था. आने वाले दिनों में यह सिलसिला और बढ़ेगा, बढ़ता ही जाएगा. हमें क्या? भाई हमारे तो दोनों पड़ोसी हैं. अपने दोनों पड़ोसियों के प्रति हमारी तो शुभकामनाएं ही हैं.

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एक साहब बयानबहादुर और एक सपोर्टबहादुर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 7, 2011

हाल ही में ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद अमेरिका ने दुनिया के सबसे शांतिप्रिय देश पाकिस्तान को धमकी दी कि ज़रूरत पड़ी तो वह पर फिर से ऐसी ही कार्रवाई कर सकता है. इसके बाद तो क्या कहने! कितना भी शांतिप्रिय हो, लेकिन कोई धमकी देगा तो कोई भी क्या करेगा. बहादुरी के मामले में पाकिस्तान का तो वैसे भी कोई जवाब नहीं रहा है. इतिहास गवाह है कि आमने-सामने की लड़ाई में वह कभी किसी से जीता नहीं है और छिपकर हमला करने का कोई मौक़ा उसने छोड़ा नहीं है. आप जानते ही हैं कि सामने आ जाए तो चूहे से आंख मिलाना वे अपनी तहजीब के ख़िलाफ़ समझते हैं और दूर निकल गए शेर पर तो पीछे से ऐसे गुर्राते हैं कि जर्मन शेफर्ड भी शर्मा जाए. तो अब जब अमेरिका उनके मिलिटरी बेस के दायरे में ही ओसामा जी की ज़िंदगी और विश्व समुदाय में उनकी इज़्ज़त की ऐसी-तैसी करके निकल गया तो वो गुर्राए हैं. यह संयोग ही है कि ओबेडिएंसी में टॉप भारत की आर्मी के प्रमुख ने भी ऐन मौक़े पर एक सही, लेकिन मार्मिक बयान दे दिया. वह भी बिना अपने हाइनेस से पूछे और इस बात का भी ज़िक्र किए बग़ैर कि ‘अगर उनकी इजाज़त हो तो’. यह जानते हुए भी कि उनकी इजाज़त के बग़ैर वे कुछ नहीं कर सकते और हाइनेस सिवा सैनिकों की बेकीमती गर्दनें कटाने के उन्हें किसी और बात की इजाज़त नहीं दे सकते. आख़िर हमें घाटी से लेकर पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति और दुनिया भर में अपनी शांतिप्रियता की यह छवि बनाए रखनी है भाई! इतनी आसान बात थोड़े ही है.

ख़ैर, हमारे बयानबहादुर तो अपना बयान दे ही चुके. अब उन्होंने अपने बयान बहादुर को काम पर लगाया है. ओसामा जी की नृशंस हत्या के बाद घंटों चली बैठक के कई घंटे बाद तक उनके आका लोगों की तरफ़ से कोई बयान नहीं आ पाया था. ऐसे क्रूशियल मौक़े पर जिन बयानबहादुर को वहां बयान देने के महान काम पर लगाया गया था, अब उन्हीं का नया बयान आया है. यह बयान थोड़ा अमेरिका और ज़्यादा भारत के मुतल्लिक है. उन्होंने अमेरिका की कार्रवाई को तो अहम कामयाबी बताया है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि अगर किसी दूसरे देश ने ऐसी ज़ुर्रत की तो यह उसकी बड़ी भूल होगी.

क्या बताएं हमें तो अपने उनके बयानबहादुर साहब की बात सुनकर वह वाक़या याद आ गया, जब ट्रेन में सफ़र कर रहे एक सज्जन के बर्थ पर कोई दूसरे सज्जन आ कर बैठ गए. पहले ने दूसरे सज्जन को हटने के लिए कहा तो उन्होंने झापड़ मार दिया. पहले को ग़ुस्सा आ गया. उन्होंने कहा कि ठीक है, हमको मारा तो मारा, हमारी बीवी को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, उन्होंने बीवी को भी मार दिया. उसके बाद उन्होंने कहा कि बीवी को मारा तो मारा, बेटे को मार के दिखाओ तो जानें! फिर क्या था, दूसरे सज्जन ने बेटे को भी मार दिया. बात जमी नहीं, उन्होंने फिर कहा, बेटे को मारा तो मारा, अब बेटी को मार के दिखाओ तो जानें. आख़िरकार दूसरे सज्जन ने बेटी को भी मारने के बाद पूछा, ‘अब बताओ.’ दूसरे सज्जन ने पूरी सज्जनता के साथ कहा, ‘जी अब कुछ नहीं, अब कोई ये कहने लायक तो नहीं रहेगा कि तुम मार खाया.’

मुझे तो लगता है कि इन बयानबहादुर साहब का इरादा भी कुछ-कुछ ऐसा ही हो. क्योंकि उनके अपने ही पाले हुए ओसामा जी जैसे कई शांतिदूत अब उनके काबू से बाहर हो गए हैं. क्या पता उन्होंने जो बात कही हो, वो उन्हीं के लिए कही हो. कई बार आदमी कहता कुछ और है, लेकिन उसका असल आशय कुछ और होता है. मसलन – कमज़ोर आदमी को जब किसी से मदद मांगनी होती है तो कहता है, ‘प्लीज़ मेरी मदद करें’. बहादुर लोग इसे तहजीब के ख़िलाफ़ मानते हैं. वे यही बात इस तरह कहते हैं, ‘है कोई माई का लाल जो मेरे साथ दो क़दम चलकर दिखाए.’ क्या पता कि उनका मामला भी कुछ ऐसा ही हो.

वैसे भी उनके लिए यह एक मुश्किल दौर है. वैसे वीरोचित शब्दों का प्रयोग करें तो शायद कहना पड़े कि दौर-ए-फ़ख़्र है. बिरादरी के नाम पर जो लोग हर साल इन्हें ईदी भेजा करते थे, उन्होंने अब ग़ुलाम कश्मीर के पीएम साहब को नत्थी वीजा जारी करना शुरू कर दिया है. पता नहीं इसका क्या मतलब होता है. हो न हो, उनकी समझ में आ गया हो कि अब ये दुनिया भर की नज़र में शांति के सबसे बड़े दूत हो गए हैं तो इनसे नत्थी टाइप संबंध रखना ही ज़्यादा मुनासिब है. पर भाई उनकी हिम्मत की दाद तो देनी पड़ेगी. क्या पता, इस हिम्मत के मूल में हमारे उत्तर वाले पड़ोसी का सपोर्ट हो. इस दौर में एक उन्होंने ही तो इनका साथ दिया. अरे वही जिनकी मिसाल शांति और भरोसे के मामले में दुनिया भर में दी जाती है और जिनके बनाए इलेक्ट्रॉनिक आइटम उनके कूटनीतिक वादों-संकल्पों से कई गुना ज़्यादा टिकाऊ समझे जाते हैं.

बहरहाल, हमारे पश्चिम वाले पड़ोसी मुल्क और उनके बयानबहादुर को हमारे उत्तर उत्तर वाले पड़ोसी मुल्क और उनकी सपोर्ट बहादुरी पर पूरा भरोसा है. हम तो उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना अब से कोई 49 साल पहले देख चुके हैं, पर चूंकि वे हमारे और उनके यानी दोनों के साझा पड़ोसी हैं, लिहाजा उन्हें भी देखना चाहिए. हालांकि उनके लिए अभी उनकी सपोर्टबहादुरी का नमूना देखना बाक़ी ही है. आजकल वे दोनों जन अपनी-अपनी नमूनेबाजी की ओर बड़ी तेज़ी से बढ़ रहे हैं और ठीक ही है, दोनों एक-दूसरे की सपोर्ट और बयान या कहें सपोर्ट के बदले अपोर्ट बहादुरी के नमूने जितनी जल्दी देख लें, उतना ही बेहतर रहेगा. जबसे सपोर्टबहादुर ने बयानबहादुर को सपोर्ट करना शुरू किया है, तभी से बयानबहादुर ने सपोर्टबहादुर को अपने यहां से शांतिदूतों का एक्सपोर्ट भी शुरू कर दिया है. ठीक ही है भाई, सपोर्ट के बदले एक्सपोर्ट तो होना ही चाहिए और आप देख ही रहे हैं, सपोर्टबहादुर के कुछ प्रांतों में ओलंपिक से ठीक पहले कितनी ज़बर्दस्त पटाखेबाजी हुई थी. माना जाता है कि यह बयानबहादुर के शांतिदूतों का ही पुण्यप्रताप था. आने वाले दिनों में यह सिलसिला और बढ़ेगा, बढ़ता ही जाएगा. हमें क्या? भाई हमारे तो दोनों पड़ोसी हैं. अपने दोनों पड़ोसियों के प्रति हमारी तो शुभकामनाएं ही हैं.

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अमेरिका कहीं का!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 6, 2011

सलाहू आज बेहद नाराज़ है. बेहद यानी बेहद. उसे इस बात पर सख़्त ऐतराज है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब ने ओसामा को इज़्ज़त से दफ़नाने की बात क्यों की? बात यहीं तक सीमित नहीं है. उसकी नज़र में हद तो यह है कि उन्होंने ओसामा के नाम के साथ जी भी लगा दिया. ऐसा उन्होंने क्यों किया? यही नहीं सलाहू ने तो श्रीमान बयानबहादुर साहब के ऐतराज पर भी ऐतराज जताया है. अरे वही कि ओसामा जी को अमेरिका ने समुद्र में क्यों दफ़ना दिया. मैं उसे सुबह से ही समझा-समझा कर परेशान-हलकान हूं कि भाई देखो, हम शांति और अहिंसा के पुजारी हैं. और यह पूजा हम कोई अमेरिका की तरह झूठमूठ की नहीं करते, ख़ुद को चढ़ावा चढ़वा लेने वाली. कि बस शांति का नोबेल पुरस्कार ले लिया. गोया शांति और नोबेल दोनों पर एहसान कर दिया. हम शांति की पूजा बाक़ायदा करते हैं, पूरे रस्मो-रिवाज और कर्मकांड के साथ. अगर किसी को यक़ीन न हो और अख़बारों पर भी भरोसा न हो तो सरकार बहादुर के आंकड़े उठाकर देख ले. शांति देवी के नाम पर हर साल हम कम से कम हज़ारों प्राणों का दान करते हैं. वह भी कोई भेंड़-बकरियों की बलि चढ़ाकर नहीं, विधिवत मनुष्यों के प्राणदान करते हैं. हमारे यहां सामान्य पूजा-पाठ में नरबलि भले प्रतिबंधित हो गई हो, पर कश्मीर से आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से पूर्वोत्तर तक पूरे भारत में शांति देवी के नाम पर हम हज़ारों मानवों की बलि हर साल चढ़ाते हैं. बलि की इस प्रक्रिया में हम कभी कोई भेदभाव नहीं करते हैं. पड़ोसी मुल्कों यानी पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन से ससम्मान आए शांति देवी के दूत जब जैसे और जिनकी चाहें बलि ले सकते हैं. बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष, ग़रीब-अमीर, पुलिसमैन-सैनिक, हिंदू-मुसलमान …. धर्म-वर्ग-आयु किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं करते. शांति देवी के दूत जब जैसे चाहें, किसी के प्राण ले सकते हैं. है किसी में इतना दम जो यह कर सके. उनसे देवी शांति के दूतों का एक हमला नहीं झेला गया. एक बार वे अपनी पूजा लेने क्या आ गए कि तबसे चिल्लाए जा रहे हैं – नाइन इलेवन, नाइन इलेवन. गोया हमला क्या हुआ, उनके देश की घड़ी ही वहीं आकर थम गई! उसके बाद वह एक मिनट भी आगे बढ़ी ही नहीं. एक हमें देखिए, हम इसे हमला नहीं, देवी के दूतों का कृपाप्रसाद मानते हैं. अपनी राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक राजधानियों पर हुई ऐसी कई घटनाओं को हम उनका कृपा प्रसाद मानते हैं. कश्मीर, पंजाब, असम, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश में तो आए दिन हम उन्हें चढ़ावा चढ़ाते रहते हैं, अपनी संसद तक पर हम उन्हें उनकी पसंद के अनुसार बलि पात्र चुनने का मौक़ा देते हैं. कि भाई कहीं से वे किसी तरह असंतुष्ट न रह जाएं. हम अमेरिका की तरह उन्हें रोकने के लिए पासपोर्ट-वीज़ा के नियम त्रासद नहीं बनाते कि बेचारे प्रवेश ही न कर सकें. हम तो ख़ुद उनका आवाहन करते हैं, आवाहयामि-आवाहयामि वाला मंत्र पढ़कर. कभी सद्भावना बस सेवा चलवाते हैं तो कभी समझौता एक्सप्रेस ट्रेन और इससे भी काम नहीं चलता तो पासपोर्ट-वीज़ा की फ़ालतू औपचारिकताएं निबटा कर सिर्फ़ परमिट पर आने-जाने के लिए दरवाज़े खोल देते हैं. इसे कहते हैं शांति का असली पुजारी! इतनी बड़ी संख्या में तो भेड़-बकरियों की बलि नहीं चढ़ाते होंगे, जितने हम मानव चढ़ा देते हैं. एक वे हैं कि एक मामूली से हमले के बाद सात समुंदर पार करके अफ़गानिस्तान तक चले आए. बदला लेने. यह भी नहीं सोचा कि बदला महान पाप है. जिस तरह क्रोध से क्रोध कभी शांत नहीं हो सकता, वैसे ही हत्या से हत्या भी कभी शांत नहीं हो सकती. इतनी आसान सी बात उनकी समझ में नहीं आई. एक हमें देखिए, हम घृणा पाप से करते हैं, पापी से नहीं. जिन्हें वे पापी समझते हैं, उन्हें हम शांतिदूत मानकर अपने घर में बैठाकर चिकन टिक्का खिलाते हैं. सुप्रीम कोर्ट भले उन्हें सज़ा-ए-मौत सुना दे, पर हमारा ऐसी ग़लती कभी नहीं करते. और कोर्ट की क्या मज़ाल कि वह इसे अपनी अवमानना मान ले! अरे भाई, शांति और अहिंसा के पुजारी देश हैं हम, भला हमें ऐसा करना चाहिए? फांसी-वांसी बर्बर देशों के विधान हैं. भला किसी सभ्य देश में कभी फांसी दी जाती है! सभ्य देश तो उन्हें कहते हैं जो बिना किसी बम-बंदूक के भी गैस रिसा कर हज़ारों लोगों की जान ले लेने वालों और उनकी अगली पीढ़ियों तक को अपंग बना देने वालों को भी चोरी-छिपा उड़वा कर सात समंदर पार उनके घर पहुंचवा देते हैं. है किसी में जिगरा? लेकिन सलाहू मेरी बात मान नहीं रहा है. वह इसे श्रीमान बयानबहादुर साहब और उनकी महान पार्टी की वोटबटोरी नीति से जोड़कर देख रहा है. उसे लगता है कि श्रीमान बयानबहादुर साहब का यह बयान सिर्फ़ भारत के मुसलमानों की सहानुभूति बटोरने के लिए आया है. इसका मतलब यह है कि वह भारत के हर मुसलमान को ओसामा का समर्थक मानते हैं. वरना कोई वजह नहीं है कि ओसामा के नाम के साथ जी लगाते. उसने मुझे अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली दिखाते हुए कहा, ‘और पंडित यह समझ लो कि भारत के मुसलमान की इससे बड़ी बेइज़्ज़ती कुछ और नहीं हो सकती. जितनी बेइज़्ज़ती इस्लाम की ओसामा ने की, उतनी ही बेइज़्जती ये जनाब भारतीय मुसलमान की कर रहे हैं.’ मेरी समझ में नहीं आ रहा कि वह श्रीमान बयानबहादुर साहब के बयान को हिंदू-मुसलमान से जोड़कर क्यों देख रहा है. अरे भाई, वह तो घोषित सेकुलर हैं और उनकी पार्टी भी. उनको हिंदू-मुसलमान से क्या लेना-देना! पर सलाहू है कि मान ही नहीं रहा. अमेरिका की तरह एक बार जिस बात पर अड़ गया, अब अड़ा पड़ा है उसी पर. अमेरिका कहीं का!

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अज्ञेय को जनविरोधी कहना अधूरी समझ : नामवर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 23, 2010

हिन्दू कालेज में अज्ञेय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कालेज में अज्ञेय की जन्म शताब्दी के अवसर पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से ‘आज के प्रश्न और अज्ञेय’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस दो दिवसीय आयोजन में अनेक महविद्यालयों के अध्यापकों, शोधार्थियों और युवा विद्यार्थियों ने भागीदारी की. उदघाटन समारोह में सुविख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि शब्दों का वैभव अज्ञेय के पूरे कविता संसार में देखा जा सकता है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन

विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. उन्होंने कहा कि अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है. कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं यह स्वीकार किया जाना चाहिए, वहीं अज्ञेय को जन विरोधी समझ लेना भी अधूरी समझ होगी. प्रो. सिंह ने अज्ञेय की चर्चित कविताओं ‘नाच’ और ‘असाध्य वीणा’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय के काव्य के सभी कला रूपों का दर्शन ‘नाच’ में होता है.

अज्ञेय को प्रयोगवादी कवि कहा जाता है, लेकिन अज्ञेय प्रयोगवादी कवि नहीं है, वे पूरी परम्परा के प्रतीकों में जैसा इस्तेमाल करते हैं वह सचमुच विरल है.कलात्मक रचाव और काव्य विन्यास के सन्दर्भ में वे मुक्तिबोध से आगे हैं

 प्रथम सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने कहा कि हमारा समय मध्य वर्ग को गोदाम बनाने का युग है जहां दुनिया को विचार के बदले वस्तुओं से बदल देने पर जोर है. उन्होंने कहा कि इस सन्दर्भ में अज्ञेय का रचना कर्म महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे  विचार पर पूरा आग्रह करते हैं. वाजपेयी ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे खड़ी बोली के सबसे बड़े बौद्ध कवि हैं जो शान्ति और स्वाधीनता का संसार रचते हैं. उन्होंने कहा कि परम्परा से हमारे यहाँ साहित्य और कला चिंतन साझा रहा है लेकिन हिंदी आलोचना दुर्भाग्य से साहित्य तक सीमित रही है. इस सन्दर्भ में अज्ञेय के चिंतन को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया. वरिष्ट समालोचक प्रो. नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सभ्यता ऐसे बिंदु पर पहुँच गई है जहां पूंजीवाद और प्रकृति में एक को चुनना पड़ेगा और तब हम देखेंगे कि अज्ञेय की कविता अंततः पूंजी के नहीं, प्रकृति और मनुष्यता के पक्ष में जाती है.प्रो. तिवारी ने कहा कि अज्ञेय में दार्शनिक विकलता का चरम रूप असाध्य वीणा में है,जो ध्यानात्मक होती चली गई है.अज्ञेय की कुछ बहुत छोटी-छोटी कविताओं की चर्चा करते हुए प्रो. तिवारी ने कहा कि बड़े संकट में छोटी चीज़ें भी अर्थवान हो जाती हैं, ये इसका उदाहरण है. इससे पहले हिन्दू कालेज के प्राचार्य प्रो. विनय कुमार श्रीवास्तव ने स्वागत किया और संयोजक डॉ. विजया सती ने संगोष्ठी की रूपरेखा रखी. सत्र का संयोजन कर रहीं डॉ. रचना सिंह ने वक्ताओं का परिचय दिया. दूसरे सत्र में विख्यात कवि और अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरे सप्तक के रचनाकार प्रो. केदारनाथ सिंह ने कहा कि मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है. उन्होंने कहा कि अज्ञेय की कविता पाठक और अपने बीच एक ओट खडा करती है और यह उनकी कविता की ख़ास तिर्यक पद्धति है. ‘भग्नदूत’ और ‘इत्यअलम’ जैसे उनके प्रारंभिक संकलनों को पुनर्पाठ के लिए जरूरी बताते हुए केदारजी ने कहा कि बड़ी कविता में वे रेहटरिक हो जाते थे वहीं छोटी कविताओं में उनकी पूरी रचनात्मक शक्ति और सामर्थ्य दिखाई पड़ती है.
मौन अज्ञेय के साहित्य का स्थाई भाव है और उनका पूरा लेखन इसी मौन की व्याख्या है.
वैविध्य की दृष्टि से अज्ञेय को उन्होंने हिंदी के थोड़े से कवियों में बताया. केदारनाथ जी ने कहा कि अज्ञेय कविता के बहुत बड़े अनुवादक भी हैं. ‘आधुनिक भावबोध और अज्ञेय की कविता’ विषयक इस सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और सुपरिचित आलोचक प्रो. गोपेश्वर सिंह ने शीतयुद्ध के दौर में हिन्दी आलोचना के सन्दर्भ में अज्ञेय के कृतित्व पर विचार करते हुए कहा कि भारतीय कविता श्रव्य परम्परा की रही है जिसे आधुनिक बनाने की कोशिश अज्ञेय ने की. प्रो.
सिंह ने कहा कि इसी दौर में लघुमानव और महामानव की बहस में साहित्य को लघु मानव अर्थात सामान्य मनुष्य की ओर मोड़ने के लिए भी अज्ञेय को श्रेय दिया जाना चाहिए, जिनका मनुष्य की गरिमा में गहरा विश्वास है. उन्होंने कहा कि जिस यथार्थवाद की कसौटी पर अज्ञेय को खारिज किया जाता है वह ढीली ढाली है अतः कविता के इतिहास पर दुबारा बात की जानी चाहिए. जवाहरलाल
नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र के प्रो. गोबिंद प्रसाद ने कहा कि अज्ञेय बेहद आत्मसज़गता के कवि थे, जो ताउम्र अपनी छाया को ही लांघते रहे, अपने से लड़ते रहे. उन्होंने कहा कि अज्ञेय ने आधुनिकता को एक निरंतर संस्कारवान होने की प्रक्रिया से भी जोड़कर देखा है, जहां स्व और आत्म पर बेहद आग्रह है. प्रो. प्रसाद ने कहा कि इसका एक सिरा जहां अस्मिता और इयत्ता से जुड़ता है वहीं दूसरा आत्मदान और दाता भाव से भी. कवि और कविता की रचना प्रक्रिया पर जितनी कवितायें अज्ञेय ने लिखी हैं उतनी और किसी हिन्दी कवि ने नहीं. इस सत्र का संयोजन विभाग के अध्यापक डॉ. पल्लव ने किया.

दूसरे दिन सुबह पहले सत्र में पटना विश्वविद्यालय में आचार्य रहे आलोचक प्रो. गोपाल राय ‘शेखर एक जीवनी’ पर अपने सारगर्भित व्याख्यान में कहा कि बालक के विद्रोही बनने की प्रक्रिया में अज्ञेय ने गहरी अंतरदृष्टि और मनोवैज्ञानिकता का परिचय दिया है, वहीं प्रेम के प्रसंग में भी उनका

वर्णन और भाषाई कौशल अद्भुत है. उन्होंने विद्रोह, क्रान्ति और आतंक में भेद बताते हुए कहा की यदि इस उपन्यास का तीसरा भाग आ पता तो शेखर के विद्रोह का सही चित्र देखना संभव होता, उपलब्ध सामग्री में विद्रोह कर्मशीलता में परिणत नहीं हो पाया है. कथाकार और जामिया मिलिया के हिंदी आचार्य प्रो. अब्दुल बिस्मिलाह ने अज्ञेय की कहानियों पर अपने व्याख्यान में श्रोताओं का ध्यान कई नए बिन्दुओं की ओर आकृष्ट किया. उन्होंने आदम-हव्वा की प्राचीन कथा का सन्दर्भ देते हुए कहा कि सांप मनुष्य को विद्रोह के लिए उकसाने वाला जीव है और अज्ञेय की कहानियों में सांप की बार बार उपस्थिति अकारण नहीं है. प्रो. बिस्मिल्लाह ने कहा कि विभाजन और साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में लिखी गई अज्ञेय की कहानियां अब और अधिक महत्वपूर्ण और प्रसंगवान हो गई हैं. उन्होंने कहा कि अज्ञेय के साहित्य में विद्रोह वही नहीं है जो दिखाई दे रहा है अपितु भीतर भीतर पल रहा विद्रोह कम नहीं है. आलोचक और हिन्दू कालेज में सह आचार्य डॉ.
रामेश्वर राय ने कहा कि अज्ञेय के लिए व्यक्ति मनुष्य की सत्ता उसकी विचार क्षमता पर निर्भर करती है और उनके लिए विचार होने की पहली शर्त अकेले होने का सहस है.डॉ. राय ने इश्वर,विवाह और नैतिकता के सम्बन्ध में अज्ञेय के चिंतन पर चर्चा करते हुए कहा कि उनके यहाँ विद्रोह जंगल हो जाने की आकांक्षा है जिसके नियम इतने सर्जनात्मक हैं कि व्यक्ति के विकास में कोई दमन न हो. समापन समारोह में वरिष्ट आलोचक एवं दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि अज्ञेय को कविता में किसी भी वस्तु या विषय के ब्रांडधर्मी उपयोग पर
आपत्ति थी और उनके लिए कविता तथा जीवन का यथार्थ एक ही नहीं था.
उन्होंने कहा कि व्यक्ति की अद्वितीयता में अज्ञेय की आस्था अडिग है और वे इतनी दूर तक ही ‘मैं’ को समाज के लिए अर्पित करने को प्रस्तुत हैं कि उनका अस्तित्व बना रहे. प्रो. जैन ने अज्ञेय की चर्चित कविता ‘नदी के द्वीप’ को उधृत करते हुए कहा कि अज्ञेय अपने चिंतन को कविता के रूप में 
बयान करते हैं.उन्होंने शताब्दी वर्ष में केवल रचनाकार के गुणगान तक सीमित रह जाने के खतरे से आगाह करते हुए कहा कि क्लिशे में जाने कि बजाय पलट पलट कर देखना होगा कि दूसरी आवाजें तो नहीं आ रहीं हैं. समापन सत्र में ही कवि-संस्कृतिकर्मी प्रयाग शुक्ल ने कहा कि अज्ञेय सोचते हुए लेखक कवि हैंजो आधुनिक बोध को लाये. उन्होंने कहा कि हिन्दी को अज्ञेय की जरूरत थी. शुक्ल ने अज्ञेय की कई महत्वपूर्ण कविताओं का पाठ करते हुए कहा कि वे भाषा के सावधान प्रयोग के लिए याद किये जायेंगे. उन्होंने अज्ञेय से जुड़े अपने कई संस्मरण भी सुनाये. वरिष्ट कथाकार राजी सेठ ने इस सत्र में अज्ञेय के चिंतन पक्ष पर विस्तार से विचार करते हुए कहा कि
उनका चिंतन कर्म और काव्य कर्म वस्तुतः अलग नहीं है .लेकिन यहाँ समस्या होती है कि क्या अज्ञेय की कविता उनके चिंतन की अनुचर है?
आयोजन स्थल पर अज्ञेय साहित्य और अज्ञेय काव्य के पोस्टर की प्रदर्शनी को भरपूर सराहना मिली. आयोजन में अंग्रेजी समालोचक प्रो. हरीश त्रिवेदी, कवि अजित कुमार,युवा आलोचक वैभव सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रोताओं ने भाग लिया.
यह जानकारी डॉ. पल्लव ने एक मेल के ज़रिये दी.

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यात्रा वृत्तांत भर नहीं है पूश्किन के देश में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 18, 2010

महेश दर्पण की पुस्तक ‘पूश्किन के देस में’ ने मुझे 60 साल पीछे पहुंचा दिया है। चेखव को मैंने आगरा में पढऩा शुरू किया था। कोलकता की नैशनल लायब्रेरी में भी मैं चेखव के पत्र पढ़ा करता था। इस पुस्तक में एक पूरी दुनिया है जो हमें नॉस्टेल्जिक बनाती है। यह विचार हंस के संपादक और वरिष्ठï कथाकार राजेन्द्र यादव ने सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पूश्किन के देस में पर आधारित संगोष्ठी में व्यक्त किए। इसे रशियन सेंटर और परिचय साहित्य परिषद ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था।
श्री यादव ने कहा : सन् 1990 में मैं भी रूस गया था। कुछ स्मृतियां मेरे पास भी थीं। इसे पढक़र वे और सघन हुई हैं। एक कुशल यात्रा लेखक की तरह महेश दर्पण ने बदले हुए रूस को देखते हुए भी बताया है कि अब भी रूस में बहुत कुछ बाकी है।

एक कुशल यात्रा लेखक की तरह महेश दर्पण ने बदले हुए रूस को देखते हुए भी बताया है कि अब भी रूस में बहुत कुछ बाकी है।

यह पुस्तक मेरे स्मृति कोश में बनी रहेगी। ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं, जैसे काफी पहले एक किताब प्रभाकर द्विवेदी ने लिखी थी-‘पार उतर कहं जइहों’।
प्रारंभ में कवि-कथाकार उर्मिल सत्यभूषण ने कहा : यह पुस्तक हमें रूसी समाज, साहित्य और संस्कृति से परिचित कराते हुए ऐसी सैर कराती है कि एक-एक दृश्य आंखों में बस जाता है। अब तक हम यहां रूस के जिन साहित्यकारों के बारे में चर्चा करते रहे हैं, उनके अंतरंग जगत से महेश जी ने हमें परिचित कराया है। 
महेश दर्पण को फूल भेंट करते हुए रशियन सेंटर की ओर से येलेना श्टापकिना ने अंग्रेजी में कहा कि एक भारतीय लेखक की यह किताब रूसी समाज के बारे में गंभीरतापूर्वक विचार करती है। इस पठनीय पुस्तक में लेखक ने कई जानकारियां ऐसी दी हैं जो बहुतेरे रूसियों को भी नहीं होंगी। 
कथन के संपादक और वरिष्ठ कथाकार रमेश उपाध्याय ने कहा कि महेश दर्पण ने इस पुस्तक के माध्यम से एक नई विधा ही विकसित की है। यह एक यात्रा वृतांत भर नहीं है। इसे आप एक उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं। रचनाकारों के म्यूजियमों के साथ ही महेश दर्पण की नजर सोवियत काल के बाद के बदलाव की ओर भी गई है।

यह एक यात्रा वृतांत भर नहीं है। इसे आप एक उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं। रचनाकारों के म्यूजियमों के साथ ही महेश दर्पण की नजर सोवियत काल के बाद के बदलाव की ओर भी गई है।

अनायास ही उस समय से इस समय की तुलना भी होती चली गई है। श्रमशील और स्नेही साहित्यकर्मी तो महेश हैं ही, उनका जिज्ञासु मन भी इस पुस्तक में सामने आया है। मुझे ही नहीं, मेरे पूरे परिवार को यह पुस्तक अच्छी लगी। 
वरिष्ठ उपन्यासकार चित्रा मुद्गल ने कहा : मैं महेश जी की कहानियों की तो प्रशंसिका तो हूं ही, यह पुस्तक मुझे विशेष रूप से पठनीय लगी। रूसी समाज को इस पुस्तक में महेश ने एक कथाकार समाजशास्त्री की तरह देखा है। यह काम इससे पहले बहुत कम हुआ है। रूसी समाज में स्त्री की स्थिति और भूमिका को उन्होंने बखूबी रेखांकित किया है। बाजार के दबाव और प्रभाव के  बीच टूटते-बिखरते रूसी समाज को लेखक ने खूब चीन्हा है। यह पुस्तक उपन्यास की तरह पढ़ी जा सकती है। बेगड़ जी की तरह महेश ने यह किताब डूबकर लिखी है। रूस के शहरों और गांवों का यहां प्रामाणिक विवरण है जो हम लोगों के लिए बेहद पठनीय बन पड़ा है। 
सर्वनाम के संस्थापक संपादक और वरिष्ठï कवि-कथाकार विष्णु चंद्र शर्मा ने कहा : महेश मूलत: परिवार की संवेदना को बचाने वाले कथाकार हैं। इस किताब में भी उनका यह रूप देखने को मिलता है। उन्होंने बदलते और बदले रूस के साथ सोवियत काल की तुलना भी की है। वह रूसी साहित्य पढ़े हुए हैं। वहां के म्यूजियम और जीवन को देखकर उन्होंने ऐसी चित्रमय भाषा में विवरण दिया है कि कोई अच्छा फिल्मकार उस पर फिल्म भी बना सकता है। अनिल जनविजय के दोनों परिवारों को आत्मीय नजर से देखा है। यह पुस्तक बताती है कि अभी बाजार के बावजूद सब कुछ नष्टï नहीं हो गया है। आजादी मिलने के बाद हिन्दी में यह अपने तरह की पहली पुस्तक है जिससे जाने हुए लोग भी बहुत कुछ जान सकते हैं।
प्रारंभ में कथाकार महेश दर्पण ने कहा : जो कुछ मुझे कहना था, वह तो मैं इस पुस्तक में ही कह चुका हूं। जैसा मैंने इस यात्रा के दौरा महसूस किया, वह वैसा का वैसा लिख दिया। अब कहना सिर्फ यह है कि रूसी समाज से उसकी तमाम खराबियों के बावजूद, हम अभी बहुत कुछ सीख सकते हैं। विशेषकर साहित्य, कला और संस्कृति के संरक्षण के बारे में। यह सच है कि अनिल जनविजय का इस यात्रा में साथ मेरे लिए एक बड़ा संबल रहा है। दुभाषिए का इंतजाम न होता तो बहुत कुछ ऐसा छूट ही जाता जिसे मैं जानना चाहता था। 
इस संगोष्ठी में हरिपाल त्यागी, नरेन्द्र नागदेव,  प्रदीप पंत, सुरेश उनियाल, सुरेश सलिल, त्रिनेत्र जोशी, तेजेन्द्र शर्मा, मृणालिनी, लक्ष्मीशंकर वाजपेई, भगवानदास मोरवाल, हरीश जोशी, केवल गोस्वामी, रामकुमार कृषक, योगेन्द्र आहूजा, वीरेन्द्र सक्सेना, रूपसिंह चंदेल, प्रेम जनमेजय, हीरालाल नागर, चारु तिवारी,  राधेश्याम तिवारी, अशोक मिश्र, प्रताप सिंह, क्षितिज शर्मा और सत सोनी सहित अनेक रचनाकार और साहित्य रसिक मौजूद थे।
प्रस्तुति : दीप गंभीर

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कलियां भी आने दो

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 10, 2010

रतन

कांटे हैं दामन में मेरे
कुछ कलियां भी आने दो
मुझसे ऐसी रंजिश क्यों है
रंगरलियां भी आने दो

सूखे पेड़ मुझे क्यों देते
जिनसे कोई आस नहीं
कम दो पर हरियाला पत्ता
और डलियां भी आने दो

तेरी खातिर भटका हूं मैं
अब तक संगी राहों पर
जीवन के कुछ ही पल तुम
अपनी गलियां भी आने दो

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तस्वीर मेरी देखना

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 3, 2010

रतन

एक दिन होगा बुलंद
तकदीर मेरी देखना
सारे जग में फैलेगी
तासीर मेरी देखना

किस तरह मैंने किया है
दम निकलते वक्त याद
थी जो हाथों में पड़ी
जंजीर मेरी देखना

तुम न मानो मेरा तन-मन
धन तुम्हारे नाम है
छोड़ कर हूं जा रहा
जागीर मेरी देखना

इस जहां में तो नहीं
पर उस जगह मिल जाएंगे
जो बुना है ख्वाब की
ताबीर मेरी देखना

आज मुझसे दूर हो
इक वक्त आएगा रतन
जब गुजर जाएंगे हम
तस्वीर मेरी देखना

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बिछाए बैठे हैं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 1, 2010

रतन
आएंगे वो जिस रस्ते से
पलक बिछाए बैठे हैं
मैं क्या तकता राह, शजर भी
फूल खिलाए बैठे हैं

मुद्दत हो गई मिलकर बिछड़े
माजी को करता हूं याद
दिल के ख़ाली पन्नों पर
तस्वीर लगाए बैठे हैं

मौला मेरे भगवन मेरे
दिलबर तुम दिलदार भी तुम
इक दिन मिलना होगा यह
उम्मीद लगाए बैठे हैं

बारिश आई बूंदें लाई
आया यादों का मौसम
देखो फिर बरसा सावन
हम झूला लगाए बैठे हैं

जब वो सपनों में आते हैं
आकर बहुत सताते हैं
है यह भी मंजूर हमें
क्यों दर्द चुराए बैठे हैं

मिल नहीं सकता उनसे मैं अब
पर क्यों ऐसा लगता है
कल ही अपनी बात हुई है
दिल उलझाए बैठे हैं

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बेरुखी को छोडि़ए

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 29, 2010

रतन

प्यार है गर दिल में तो फिर
बेरुखी को छोडि़ए
आदमी हैं हम सभी इस
दुश्मनी को छोडि़ए

गैर का रोशन मकां हो
आज ऐसा काम कर
जो जला दे आशियां
उस रोशनी को छोडि़ए

हैं मुसाफिर हम सभी
कुछ पल के मिलजुल कर रहें
दर्द हो जिससे किसी को
उस खुशी को छोडि़ए

प्यार बांटो जिंदगी भर
गम को रखो दूर-दूर
फिक्र आ जाए कभी तो
जिंदगी को छोडि़ए

गुल मोहब्बत के जहां पर
खिलते हों अकसर रतन
ना खिलें गुल जो वहां तो
उस जमीं को छोडि़ए

जानते हैं हम कि दुनिया
चार दिन की है यहां
नफरतों और दहशतों की
उस लड़ी को छोडि़ए

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