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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-3 (ओरछा)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 16, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन
रानी महल के झरोखे से चतुर्भुज मंदिर का दर्शन
व्यवस्था और अव्यवस्था

कालिदास का मेघदूत हम पर मेहरबान था। पूरे रास्ते मूसलाधार बारिश का मज़ा लेते दिन के साढ़े दस बजे हम ओरछा पहुंच गए थे। पर्यटन स्थल होने के नाते यह एक व्यवस्थित कस्बा है। टैक्सी स्टैंड के पास ही बाहर से आने वाले निजी वाहनों के लिए भी अलग से व्यवस्थित पार्किंग है। सड़क के दाईं ओर मंदिरों का समूह है और बाईं ओर महलों व अन्य पुरातात्विक भवनों का। मध्यकालीन स्थापत्य कला के जैसे नमूने यहां चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं, कहीं और मिलना मुश्किल है। सबसे पहले हम रामराजा मंदिर के दर्शन के लिए ही गए। एक बड़े परिसर में मौजूद यह मंदिर का$फी बड़ा और अत्यंत व्यवस्थित है। अनुशासन इस मंदिर का भी प्रशंसनीय है। कैमरा और मोबाइल लेकर जाना यहां भी मना है। दर्शन के बाद हम बाहर निकले और बगल में ही मौजूद एक और स्थापत्य के बारे में मालूम किया तो पता चला कि यह चतुर्भुज मंदिर है। तय हुआ कि इसका भी दर्शन करते ही चलें। यह वास्तव में पुरातत्व महत्व का भव्य मंदिर है। मंदिर के चारों तर$फ सुंदर झरोखे बने हैं और दीवारों पर आले व दीपदान। छत में जैसी नक्काशी की हुई है, वह आज के हिसाब से भी बेजोड़ है। यह अलग बात है कि रखरखाव इसका बेहद कमज़ोर है। इन दोनों मंदिरों के पीछे थोड़ी दूरी पर लक्ष्मीनारायण मंदिर दिखाई देता है। आसपास कुछ और मंदिर भी हैं। हमने यहां भी दर्शन किया।

चतुर्भुज मंदिर के बाईं तरफ़ है श्री रामराजा मंदिर

नीचे उतरे तो रामराजा मंदिर के दूसरे बाजू में हरदौल जी का बैठका दिखा। वर्गाकार घेरे में बना यह बैठका इस रियासत की समृद्धि की कहानी कहता सा लगता है। आंगन के बीच में एक शिवालय भी है। सावन का महीना होने के कारण यहां स्थानीय लोगों की का$फी भीड़ थी। इस पूरे क्षेत्र में अच्छा-ख़ासा बाज़ार भी है। यह सब देखते-सुनते हमें का$फी देर बीत गई। बाहर निकले तो 12 बज चुके थे। भोजन अनिवार्य हो गया था, लिहाजा रामराजा मंदिर के सामने ही एक ढाबे में भोजन किया।

जहांगीर महल
स्थापत्य के अनूठे नमूने

मंदिरों के ठीक सामने ही सड़क पार कर राजमहल थे। भोजन के बाद हम उधर निकल पड़े। मालूम हुआ कि यहां प्रति व्यक्ति दस रुपये का टिकट लगता है। कई विदेशी सैलानी भी वहां घूम रहे थे। इस किले के भीतर दो मंदिर हैं, एक संग्रहालय और एक तोपखाना भी। पीछे कई और छोटे-बड़े निर्माण हैं। अनुमान है कि ये बैरक, अधिकारियों के आवास या कार्यालय रहे होंगे। मुख्य महलों को छोड़कर बा$की सब ढह से गए हैं। सबसे पहले हम रानी महल देखने गए। मुख्यत: मध्यकालीन स्थापत्य वाले इस महल की सज्जा में प्राचीन कलाओं का प्रभाव भी सा$फ देखा जा सकता है।

जहांगीर महल के आंगन में बना हम्माम
इस महल में वैसे तो कई जगहों से चतुर्भुज मंदिर की स्पष्टï झलक मिल सकती है, पर एक ख़्ाास झरोखा ऐसा भी है जहां से चतुर्भुज मंदिर और रामराजा मंदिर दोनों के दर्शन किए जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी जगह से रानी स्वयं दोनों मंदिरों के दर्शन करती थीं। यह अलग बात है कि अब उस झरोखे वाली जगह पर भी कूड़े का ढेर लगा हुआ है। यह राजा मधुकर शाह की महारानी का आवास था, जो भगवान राम की अनन्य भक्त थीं और यहां स्थापित भगवान राम का मंदिर उनका ही बनवाया हुआ है। महल का आंगन भी बहुत बड़ा और भव्य है। बीचोबीच एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां रानी का दरबार लगता रहा होगा। जबकि राजमंदिर का निर्माण स्वयं राजा मधुकर शाह ने अपने शासनकाल 1554 से 1591 के बीच करवाया था।

इसके पीछे जहांगीर महल है। इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में मु$गल सम्राट जहांगीर के सम्मान में राजा बीर सिंह देव ने करवाया था। वर्गाकार विन्यास में बने इस महल के चारों कोनों पर बुर्ज बने हैं। जालियों के नीचे हाथियों और पक्षियों के अलंकरण बने हैं। ऊपर छोटे-छोटे कई गुंबदों की शृंखला बनी है और बीच में कुछ बड़े गुंबद भी हैं। हिंदू और मु$गल दोनों स्थापत्य कलाओं का असर इस पर सा$फ देखा जा सकता है और यही इसकी विशिष्टïता है। भीतर के कुछ कमरों में अभी भी सुंदर चित्रकारी देखी जा सकती है। कुल 136 कक्षों वाले इस महल के बीचोबीच एक बड़े से हौजनुमा निर्माण है। इसके चारों कोनों पर चार छोटे-छोटे कुएं जैसी अष्टकोणीय आकृतियां हैं। हालांकि इनकी गहराई बहुत मामूली है। अंदाजा है कि इसका निर्माण हम्माम के तौर पर कराया गया होगा।

जहांगीर महल से पीछे दिख रही बेतवा की ख़ूबसूरत घाटी

महल की छत से पीछे देखने पर पीछे मीलों तक फैली बेतवा नदी की घाटी दिखाई देती है। दूर तक फैली इस नीरव हरियाली के बीच कई छोटे-बड़े निर्माण और कुछ निर्माणों के ध्वंसावशेष भी थे। ध्यान से देखने पर बेतवा की निर्मल जलधारा भी क्षीण सी दिखाई दे रही थी। भीतर गाइड किसी विदेशी पर्यटक जोड़े को टूटी-फूटी अंग्रेजी में बता रहा था, ‘पुराने ज़माने महल के नीचे से एक सुरंग बनी थी, जो बेतवा के पार जाकर निकलती थी।’ आगे उसने बताया कि इस महल का निर्माण 22 साल में हुआ था और जहांगीर इसमें टिके सि$र्फ एक रात थे। राढ़ी जी गाइड के ज्ञान से ज्य़ादा उसके आत्मविश्वास पर दंग हो रहे थे।

ख़ैर, सच जो हो, पर ‘ओरछा’ का शाब्दिक अर्थ तो छिपी हुई जगह ही है। इसका इतिहास भी अद्भुत है। इसकी स्थापना टीकमगढ़ के बुंदेल राजा रुद्र प्रताप सिंह ने 1501 में की थी, पर असमय कालकवलित हो जाने के कारण वे निर्माण पूरा होते नहीं देख सके। एक गाय को बचाने के प्रयास में वे शेर के पंजों के शिकार हो गए थे। बाद में राजा बीर सिंह देव ने अपने 22 वर्षों के शासन काल में यहां के अधिकतर मनोरम निर्माण कराए। उन्होंने पूरे बुंदेल क्षेत्र में 52 किले बनवाए थे। दतिया का किला भी उनका ही बनवाया हुआ है। बाद में 17वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ही ओरछा के राजा मु$गल साम्राज्य से विद्रोह किया। फिर शाहजहां ने आक्रमण करके इस पर $कब्ज़ा कर लिया, जो 1635 से 1641 तक बना रहा। बाद में ओरछा राज्य को अपनी राजधानी टीकमगढ़ में करनी पड़ी।

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो…

महलों के बहाने कुछ देर तक अतीत में जीकर हम उबरे तो सीधे बेतवा की ओर चल पड़े। मुश्किल से 10 मिनट की पैदल यात्रा के बाद हम नदी के तट पर थे। महल की छत से दिखने वाली घाटी से भी कहीं ज्य़ादा सुंदर यह नदी है। नदी की अभी शांत दिख रही जलधारा के बीच-बीच में खड़े लाल पत्थर के टीलेनुमा द्वीप अपने शौर्य की कथा कह रहे थे या बेतवा के वेग से पराजय की दास्तान सुना रहे थे, यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था। यूं मुझे नाव चलाने का कोई अनुभव नहीं है, लेकिन इस पर नाव चलाना आसान काम नहीं होगा। पानी के तल के नीचे कहां पत्थर के टीलों में फंस जाए, कहा नहीं जा सकता। मैंने मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास ‘बेतवा बहती रहीÓ का जिक्र किया तो राढ़ी जी कालिदास के मेघदूत को याद करने लगे-

तेषां दिक्षु प्रथित विदिशा लक्षणां राजधानीं


गत्वा सद्य: फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा।


तीरोपांत स्तनित सुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात्

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि।।

कालिदास का प्रवासी यक्ष अपने संदेशवाहक मित्र मेघ को रास्ते की जानकारी देते हुए कहता है- हे मित्र! जब तू इस दशार्ण देश की राजधानी विदिशा में पहुंचेगा, तो तुझे वहां विलास की सब सामग्री मिल जाएगी। जब तू वहां सुहानी और मनभावनी नाचती हुई लहरों वाली वेत्रवती के तट पर गर्जन करके उसका मीठा जल पीएगा, तब तुझे ऐसा लगेगा कि मानो तू किसी कटीली भौहों वाली कामिनी के ओठों का रस पी रहा है।

बेतवा के घाट पर

बेतवा का ही पुराना नाम है ‘वेत्रवतीÓ और संस्कृत में ‘वेत्रÓ का अर्थ बेंत है। कालिदास का यह वर्णन किसी हद तक आज भी सही लगता है। प्रदूषण का दानव अभी बेतवा पर वैसा $कब्ज़ा नहीं जमा सका है, जैसा उसने अपने किनारे महानगर बसा चुकी नदियों पर जमा लिया है। इसके सौंदर्य की प्रशंसा बाणभट्टï ने भी कादंबरी में की है। वैसे वराह पुराण में इसी वेत्रवती को वरुण की पत्नी और राक्षस वेत्रासुर की मां बताया गया है। शायद इसीलिए इसमें दैवी और दानवीय दोनों शक्तियां समाहित हैं। गंगा, यमुना, मंदाकिनी आदि पवित्र नदियों की तरह बेतवा के तट पर भी रोज़ शाम को आरती होती है। लेकिन बेतवा की आरती में हिस्सेदारी हमारी नियति में नहीं था। क्योंकि हमें झांसी से ताज एक्सप्रेस पकडऩी थी, जो तीन बजे छूट जाती थी। मौसम पहले ही ख़्ाराब था। बूंदाबांदी अभी भी जारी थी। समय ज्य़ादा लग सकता था। लिहाजा डेढ़ बजते हमने ओरछा और बेतवा के सौंदर्य के प्रति अपना मोह बटोरा और चल पड़े वापसी के लिए टैक्सी की तलाश में।

                                                                      — इति–
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मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 2, 2010

-हरिशंकर राढ़ी

(लेखमाला की पिछली कड़ी में मदुराई और मीनाक्षी मंदिर का जो वर्णन मैंने किया था , उसे राष्ट्रीय सहारा दैनिक ने अपने 23 जनवरी के अंक में ज्यों का त्यों सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने कॉलमब्लॉग बोलामें ‘देवदर्शन और विशेष शुल्क‘ शीर्षक से छापा है।)

मदुरै का मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर वास्तव में हिन्दू धर्म ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति का एक गौरव है। अंदर जाने पर जो अनुभूति होती है, उसकी तो बात ही अलग है; इसका बाहर का रूप ही अत्यन्त चित्ताकर्षक है और अपनी विशालता की गाथा स्वयं ही बयान कर देता है। वहीं से यह उत्कंठा जागृत हो जाती है कि कितनी जल्दी अंदर प्रवेश कर लें। यह मंदिर जितना भव्य बाहर से है , कहीं उससे ज्यादा अंदर से है।

सामान्यतया मीनाक्षी मंदिर के नाम से विख्यात इस मंदिर का पूरा नाम मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर या मीनाक्षी अम्माँ मंदिर है।यह मंदिर भगवान शिव और देवी पार्वती जो मीनाक्षी के नाम से जानी जाती हैं, को समर्पित है। हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव अत्यन्त सुन्दर रूप में देवी मीनाक्षी से विवाह की इच्छा से पृथ्वीलोक पधारे। देवी मीनाक्षी पहले ही मदुराई के राजा मलयध्वज पांड्य की तपस्या से प्रसन्न हो मदुराई में अवतार ले चुकीं थीं। कुछ बड़ी होने पर वे वहां शासन संभालने लगीं। भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने देवी मीनाक्षी से विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे वे सहर्ष मान गईं। अब इस विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। निश्चित रूप से यह पृथ्वीलोक का सबसे महत्त्वपूर्ण और गरिमामय विवाह होने वाला था जिसमें सम्मिलित होने के लिए भगवान विष्णु भी अपने लोक से चल दिए। उन्हें देवी मीनाक्षी के भाई की भूमिका निभानी थी।किन्तु, मार्ग में आशंकित इन्द्र देव ने विघ्न उपस्थित कर दिया और भगवान विष्णु यथासमय वहाँ पहुंच न सके। अंततः स्थानीय देवता (तिरुपरंकुन्द्रम से) ने विवाह में मुख्याधिपति की भूमिका निभाई और कार्यक्रम सम्पन्न हो गया। इससे सम्बन्धित वार्षिक उत्सव भी यहाँ मनाया जाता है।

मंदिर मुख्यतया भगवान शिव और देवी मीनाक्षी को समर्पित है किन्तु इसके विशाल अन्तर्गृह में अनेक देवी देवताओं की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर के केन्द्र में मीनाक्षी की मूर्ति है और उससे थोड़ी ही दूर भगवान गणेश जी की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है जिसे एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है।आखिर गणेशजी विघ्नहत्र्ता ही नहीं देवी पार्वती के पुत्र भी तो हैं जिन्हें यहां मुकुरनी विनायकर के नाम से पूजा जाता है।

गणेश जी के दर्शन के लिए हम गए तो वहां पर दो पंक्तियां थीं। मुझे लगा कि उनमें से एक पंक्ति पुरुषों के लिए थी और दूसरी महिलाओं के लिए। वस्तुतः एक पंक्ति में महिलाएँ अधिक थीं और पुरुष एकाध ही। चूँकि दक्षिण भारत में अभी भी तुलनात्मक रूप से नियम – कानून का पालन अधिक होता है , यह सोचकर मैं अलग लाइन में लग गया और पत्नी अलग लाइन में।हालाँकि मेरे मित्र सपत्नीक एक ही (महिलाओं वाली) लाइन में लगे । लाइन लंबी थी, आगे जाकर कुछ इस प्रकार अलग हुई कि दर्शनापरान्त हम लोगों को दो अलग- अलग और विपरीत दिशा में जाना ही पड़ा। ऐसा नहीं था कि हम दर्शन करके एक दरवाजे से बाहर निकल जाएं! मंदिर की विशालता इतनी कि कुछ कहा नहीं जा सकता। वापस भी लौटने की स्थिति नहीं थी। मंदिर में ही तैनात एक पुलिस अधिकारी से मैंने बहस की तो (ईश्वर की कृपा से उसे अंगरेजी आती थी) उसने मार्ग निर्देशन किया । वहां से मैं बाहर तो निकल गया किन्तु फिर उस विशालता में खो गया। गनीमत यह हुई कि हमारे मोबाइल जमा नहीं कराए गए थे। संपर्क हो गया और किसी प्रकार एक प्रमुख स्थल के सहारे करीब दस मिनट बाद हम मिल गए। यह भी खूब रही और हम बहुत देर तक इस गुमशुदगी के चटखारे लेते रहे।

मंदिर का वास्तु एवं विशालतासौन्दर्य ही नहीं, गणितीय आंकड़ों की दृष्टि से भी मीनाक्षी मंदिर विशाल है। मंदिर कुल 45 एकड़ क्षेत्र में फैला है और निर्मित क्षेत्रफल का आयाम 254 मी। लंबाई और 237 मी. चैड़ाई में है। मंदिर में 12 उच्च शिखर हैं और सर्वोच्च शिखर जो दक्षिण की ओर स्थित है, की उँचाई 170 फीट है। मंदिर के अन्दर अइयरम मंडपम नामक एक विशाल मंडप (Hall) है जिसे सामान्यतः सहस्र खंभा (Thousand Pillar Hall )के नाम से जाना जाता है। वास्तविकता यह है कि इस हॉल में कुल 985 खंभे है।इस हॉल का निर्माण 1569 ई0 में अरियनाथ मुदलियर ने कराया था ।इसकी विशालता देखते ही बनती है। कई बार ऐसा लगता है कि धर्म एवं संस्कृति को लेकर कुछ लोग कितना सोचते रहे होंगे और कितना कुछ करते भी रहे होंगे, अन्यथा आज इतनी विशाल संरचना, इतना विशाल सृजन नहीं होता। यह क्रम संभवतः युगों से चला आ रहा है और चलता ही रहेगा । आज की सृजनशीलता भी कहीं से रुकी हुई प्रतीत नहीं होती, हालांकि विध्वंसक शक्तियां मार्ग में कम बाधाएं नहीं डाल रही हैं। आतंक का साया हर जगह मंडरा रहा हैफिर भी सर्जक लगे हुए हैं संस्कृति एवं सभ्यता की वृद्धि करने में । दिल्ली के नवनिर्मित अक्षरधाम जैसे भव्य मंदिर ऐसी ही जिजीविषा के प्रतीक हैं। यहाँ मैं किसी साम्यवाद या आर्थिक विषमता ओर मुड़ने के मूड में नहीं हूँ , बस जो सुन्दर लगा , उसका वर्णन भर करना चाहता हूँ।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस मंडप में खम्भे ही खम्भे दृष्टिगोचर होते हैं। सभी खंभे पत्थरों को काट कर बनाए गए हैं और इनपर उत्कृष्ट नक्काशी की गई है जो मंडप की सुन्दरता में चार चाँद लगाती है।मुख्य हॉल से लगभग हर गोपुरम की ओर रास्ता जाता है। मंदिर के विशाल गलियारे में असंख्य दूकानें भी हैं जिनपर हस्तकला से लेकर अन्य सजावटी सामानों की बिक्री होती रहती है।

मंदिर का वर्तमान स्वरूप1623से 1659 के बीच आया। तमिल साहित्य के अनुसार मंदिर का अस्तित्व गत सहस्राब्दि में होना चाहिए किन्तु इसका कोई बड़ा प्रमाण नहीं मिलता। शैव दर्शन के अनुसार मंदिर सातवीं शताब्दी में अवश्य था जिसे कट्टरपंथी मुस्लिम आक्रान्ता मलिक कफूर ने सन्1310में पूर्णतः ध्वंश कर दिया ।

मंदिर के प्रांगण में एक अत्यन्त सुन्दर तालाब है जिसे स्वर्णकमल पुष्कर के नाम से जाता है। वैसे इसका वास्तविक नाम पोर्थमराईकुलम है। भक्तगण दर्शनोपरान्त प्रायः यहाँ बैठकर आत्मिक शांति का आनन्द लेते हुए हैं। मंदिर में कैमरा ले जाने पर रोक नहीं है अतः अधिकांश लोग फोटो खींचते हुए भी देखे जा सकते हैं। यद्यपि फोटोग्राफी के लिए शुल्क 25 रु निर्धारित है किन्तु इस नियम का परिपालन शायद ही होता हो। कम से कम मैंने तो ऐसा नहीं देखा। हाँ, एक बार एक कर्मचारी ने हमें जरूर मना किया था ।

तालाब के पास घंटों बैठे रहने के बाद एक गरिमामय अनुभूति के साथ बाहर निकलने का मन बनाया ।ऐसा जरूर लग रहा था कि यह दर्शन और यह यात्रा जीवन की एक उपलब्धि है। दुख इस बात का हो रहा था कि हमारे पास इतना समय नहीं था कि मदुराई में एक दो दिन और रुकें और इस दिव्य और भव्य मंदिर के सौन्दर्य का और अवलोकर एवं विश्लेषण करें । अगले दिन हमें कोडाइकैनाल जाना था । बस आज की ही रात शेष थी यहाँ रुकने एवं समझने के लिए।निकलते वक्त भी मैं बार -बार पीछे मुड़कर उस महत्ता को देख लेता और महसूस कर लेता था । मदुराई शायद ही यादों से बाहर निकले!

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वे जो धर्मनिरपेक्ष हैं…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 6, 2009

अभी थोड़े दिनों पहले मुझे गांव जाना पड़ा. गांव यानी गोरखपुर मंडल के महराजगंज जिले में फरेन्दा कस्बे के निकट बैकुंठपुर. हमारे क्षेत्र में एक शक्तिपीठ है.. मां लेहड़ा देवी का मन्दिर. वर्षों बाद गांव गया था तो लेहड़ा भी गया. लेहड़ा वस्तुत: रेलवे स्टेशन है और जिस गांव में यह मंदिर है उसका नाम अदरौना है. अदरौना यानी आर्द्रवन में स्थित वनदुर्गा का यह मन्दिर महाभारतकालीन बताया जाता है. ऐसी मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने राजा विराट की गाएं भी चराई थीं और गायों को चराने का काम उन्होंने यहीं आर्द्रवन में किया था और उसी वक़्त द्रौपदी ने मां दुर्गा की पूजा यहीं की थी तथा उनसे पांडवों के विजय की कामना की थी. हुआ भी यही.

समय के साथ घने जंगल में मौजूद यह मंदिर गुमनामी के अंधेरे में खो गया. लेकिन फिर एक मल्लाह के मार्फ़त इसकी जानकारी पूरे क्षेत्र को हुई. मैंने जबसे होश संभाला अपने इलाके के तमाम लोगों को इस जगह पर मनौतियां मानते और पूरी होने पर दर्शन-पूजन करते देखा है. ख़ास कर नवरात्रों के दौरान और मंगलवार के दिन तो हर हफ़्ते वहां लाखों की भीड़ होती है और यह भीड़ सिर्फ़ गोरखपुर मंडल की ही नहीं होती, दूर-दूर से लोग यहां आते हैं. इस भयावह भीड़ में भी वहां जो अनुशासन दिखता है, उसे बनाए रख पाना किसी पुलिस व्यवस्था के वश की बात नहीं है. यह अनुशासन वहां मां के प्रति सिर्फ़ श्रद्धा और उनके ही भय से क़ायम है.

ख़ैर, मैं जिस दिन गया, वह मंगल नहीं, रविवार था. ग़नीमत थी. मैंने आराम से वहीं बाइक लगाई, प्रसाद ख़रीदा और दर्शन के लिए बढ़ा. इस बीच एक और घटना घटी. जब मैं प्रसाद ख़रीद रहा था, तभी मैंने देखा एक मुसलमान परिवार भी प्रसाद ख़रीद रहा था. एक मुल्ला जी थे और उनके साथ तीन स्त्रियां थीं. बुर्के में. एकबारगी लगा कि शायद ऐसे ही आए हों, पर मन नहीं माना. मैंने ग़ौर किया, उन्होंने प्रसाद, कपूर, सिन्दूर, नारियल, चुनरी, फूल…… वह सब ख़रीदा जिसकी ज़रूरत विधिवत पूजा के लिए होती है. जान-बूझ कर मैं उनके पीछे हो लिया. या कहें कि उनका पीछा करने का पाप किया. मैंने देखा कि उन्होंने पूरी श्रद्धापूर्वक दर्शन ही नहीं किया, शीश नवाया और पूजा भी की. नारियल फोड़ा और रक्षासूत्र बंधवाया. फिर वहां मौजूद अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के आगे भी हाथ जोड़े और सबके बाद भैरो बाबा के स्थान पर भी गए. आख़िरकार मुझसे रहा नहीं गया. मैंने मुल्ला जी से उनका नाम पूछ लिया और उन्होने सहज भाव से अपना नाम मोहम्मद हनीफ़ बताया. इसके आगे मैंने कुछ पूछा नहीं, क्योंकि पूछने का मतलब मुझे उनका दिल दुखाना लगा. वैसे भी उन्हें सन्देह की दृष्टि से देखने की ग़लती तो मैं कर ही चुका था.

बाद में मुझे याद आया कि यह दृश्य तो शायद मैं पहले भी कई बार देख चुका हूं. इसी जगह क़रीब 10 साल पहले मैं एक ऐसे मुसलमान से भी मिल चुका हूं, जो हर मंगलवार को मां के दर्शन करने आते थे. उन्होंने 9 मंगल की मनौती मानी थी, अपने खोये बेटे को वापस पाने के लिए. उनका बेटा 6 महीने बाद वापस आ गया था तो उन्होंने मनौती पूरी की. मुझे अब उनका नाम याद नहीं रहा, पर इतना याद है कि वह इस्लाम के प्रति भी पूरे आस्थावान थे. तब मुझे इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ. मोहर्रम के कई दिन पहले ही हमारे गांव में रात को ताशा बजने का क्रम शुरू हो जाता था और उसमें पूरे गांव के बच्चे शामिल होते थे. मैं ख़ुद भी नियमित रूप से उसमें शामिल होता था. हमारे गांव में केवल एक मुस्लिम परिवार हैं, पर ताजिये कई रखे जाते थे और यहां तक कि ख़ुद मुस्लिम परिवार का ताजिया भी एक हिन्दू के ही घर के सामने रखा जाता था. गांव के कई हिन्दू लड़के ताजिया बाबा के पाएख बनते थे. इन बातों पर मुझे कभी ताज्जुब नहीं हुआ. क्यों? क्योंकि तब शायद जनजीवन में राजनीति की बहुत गहरी पैठ नहीं हुई थी.

इसका एहसास मुझे तीसरे ही दिन हो गया, तब जब मैंने देवबन्द में जमीयत उलेमा हिन्द का फ़तवा सुना और यह जाना कि प्रकारांतर से हमारे गृहमंत्री पी. चिदम्बरम उसे सही ठहरा आए हैं. यह अलग बात है कि अब सरकारी बयान में यह कहा जा रहा है कि जिस वक़्त यह फ़तवा जारी हुआ उस वक़्त चिदम्बरम वहां मौजूद नहीं थे, पर जो बातें उन्होंने वहां कहीं वह क्या किसी अलगाववादी फ़तवे से कम थीं? अब विपक्ष ने इस बात को लेकर हमला किया और ख़ास कर मुख्तार अब्बास नक़वी ने यह मसला संसद में उठाने की बात कही तो अब सरकार बगलें झांक रही है. एक निहायत बेवकूफ़ी भरा बयान यह भी आ चुका है कि गृहमंत्री को फ़तवे की बात पता ही नहीं थी, जो उनके आयोजन में शामिल होने से एक दिन पूर्व ही जारी किया जा चुका था और देश भर के अख़बारों में इस पर ख़बरें छप चुकी थीं. क्या यह इस पूरी सरकार की ही काबिलीयत पर एक यक्षप्रश्न नहीं है? क्या हमने अपनी बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में सौंप रखी है, जिनका इस बात से कोई मतलब ही नहीं है कि देश में कहां-क्या हो रहा है? अगर हां तो क्या यह हमारे-आपके गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा नहीं है? आख़िर सरकार हमने चुनी है.

अभी हाल ही में एक और बात साफ़ हुई. यह कि जनवरी में मुसलमानों को बाबा रामदेव से बचने की सलाह देने वाले दारुल उलूम के मंच पर उनके आते ही योग इस्लामी हो गया. यह ज़िक्र मैं सिर्फ़ प्रसंगवश नहीं कर रहा हूं. असल में इससे ऐसे संगठनों का असल चरित्र उजागर होता है. इन्हीं बातों से यह साफ़ होता है कि राजनेताओं और धर्मध्वजावाहकों – दोनों की स्थिति एक जैसी है. देश और समुदाय इनके लिए सिर्फ़ साधन हैं. ऐसे साधन जिनके ज़रिये ये अपना महत्व बनाए रख सकते हैं. मुझे मुख़्तार अब्बास नक़वी की भावना या उनकी बात और इस मसले को लेकर उनकी गंभीरता पर क़तई कोई संदेह नहीं है, लेकिन उनकी पार्टी भी इसे लेकर वाकई गंभीर है, इस पर संदेह है. जिस बात के लिए भाजपा ने जसवंत सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया, वही पुण्यकार्य वाचिक रूप में वर्षों पहली आडवाणी जी कर चुके हैं. फिर भी अभी तक वह पार्टी में बने हुए हैं, अपनी पूरी हैसियत के साथ. हालांकि उनको रिटायर करने की बात भी कई बार उठ चुकी है. फिर क्या दिक्कत है? आख़िर क्यों उन्हें बाहर नहीं किया जाता? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आख़िर क्यों आडवाणी और चिदम्बरम जैसे महानुभावों पर विश्वास किया जाता है? आख़िर क्यों ऐसे लोगों को फ़तवा जारी करने का मौक़ा दिया जाता है और ऐसे देशद्रोही तत्वों के साथ गलबहियां डाल कर बैठने और मंच साझा करने वालों को देश का महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा जाता है? क्या सौहार्द बिगाड़ने वाले ऐसे तत्वों के साथ बैठने वालों का विवादित ढांचा ढहाने वालों की तुलना में ज़रा सा भी कम है? क्या मेरे जैसे हिन्दू या मोहम्मद हनीफ़ जैसे मुसलमान अगर कल को राष्ट्र या मनुष्यता से ऊपर संप्रदाय को मानने लगें तो उसके लिए ज़िम्मेदार आख़िर कौन होगा? क्या चिदम्बरम जैसे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष इसके लिए उलेमाओं और महंतों से कुछ कम ज़िम्मेदार हैं?

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भारत के दिल की भाषा है हिंदी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 25, 2009

भारतीय दूतावास में आयोजन, चीनी मूल के सात हिंदी विद्वान सम्मानित
हिन्दी पखवाड़े के तहत आयोजनों का क्रम केवल देश के भीतर ही नहीं, बाहर भी चल रहा है. भारत से बाहर हिंदी की अलख जगाने के इसी क्रम में चीन में पेकिंग स्थित भारतीय दूतावास के सांस्कृतिक केंद्र के तत्वावधान में एक आयोजन किया गया. इस आयोजन में चीन के सात वरिष्ठ हिंदी विद्वानों को सम्मानित किया गया.
चीन से यह सूचना पेकिंग विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़ में प्रोफेसर डॉ. देवेंद्र शुक्ल ने दी. सम्मानित किए गए विद्वानों में प्रो. लियोऊ आनवू, प्रो. यिन होंयुवान, प्रो. चिन तिंग हान, प्रो. च्यांग चिंगख्वेइ, प्रो. वांग चिंनफङ, प्रो. छङ श्वेपिन, प्रो. चाओ युह्वा शामिल हैं. इसके अलावा इस अवसर पर हिंदी निबंध प्रतियोगिता भी आयोजित की गई.
इस प्रतियोगिता में चाइना रेडियो की थांग य्वानक्वेइ को प्रथम, पेकिंग विश्वविद्यालय के ली मिन (विवेक) को दूसरा, कुमारी रोशनी को तीसरा तथा चन्द्रिमा और ह्वा लीयू को सांत्वना पुरस्कार प्राप्त हुए. जबकि इसी आयोजन भारतीय मूल वर्ग में हेमा कृपलानी को प्रथम, हेमा मिश्रा को द्वितीय और आरुणि मिश्रा को सांत्वना पुरस्कार मिला.
आयोजन के मुख्य अतिथि एवं भारतीय दूतावास के मिशन के उप प्रमुख जयदीप मजूमदार ने कहा कि हिंदी भारत की केवल राजभाषा या राष्ट्र भाषा ही नहीं है, यह भारत के ह्वदय की भाषा है. यह सांस्कृतिक समन्वय और मानसिक आजादी की भाषा है. अन्तरराष्ट्रीय जगत में हिन्दी के लोक प्रियता बढ़ रही है. विशेष रूप से चीन में हिन्दी के अध्ययन और अध्यापन की विशिष्ट परंपरा है. हिन्दी दिवस पर चीनी विद्वानों का यह सम्मान चीन और भारत के प्राचीन सम्बंधों के सुदृढीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. चीन के हिन्दी प्रेमियों की आज इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति हिन्दी की लोकप्रियता और आप के हिन्दी एवं भारत प्रेम का प्रमाण है.
पेकिंग विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अतिथि प्रोफेसर डॉ देवेन्द्र शुक्ल ने कहा कि आज हिन्दी का राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय संदर्भ दोनों बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. आज हिन्दी विश्व भाषा का रूप धारण कर रही है. भारतीय दूतावास का यह आयोजन हिन्दी के लिए एक शुभसंकेत. हिन्दी भारत और विश्व की संस्कृति के संवाद का मंच बने. तभी हम विश्व हिन्दी का विश्व मन रच सकेंगे.
चायना रेडियो इंटरनेशनल के सलाहकार एवं वरिष्ठ हिन्दी पत्रकार प्रो. वांग चिनफ़ङ ने कहा कि हिन्दी हमें विश्वबंधुत्व और प्रेम का संदेश देती है. हिन्दी उस सुगंध की तरह है जो विश्व के सामान्य जन को संबोधित है. चीन के लोगों को उस में प्रेम और आत्मीयता का अनुभव होता है.
हिन्दी दिवस कार्यक्रम का कुशल संयोजन एवं संचालन सांस्कृतिक सचिव चिन्मय नायक ने किया उन्होंने कहा कि यह हिन्दी दिवस केवल एक कार्यक्रम मात्र नहीं है, बल्कि यह हिन्दी के मंच पर चीन और भारत के मिलन का सौहार्द-प्रतीक भी है.

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