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वास्तव में यह माओवादियों की युद्ध रणनीति को न समझने का मामला

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 7, 2010

तथाकथित सभ्य समाज में माओवादियों द्वारा 75 जवानों को मौत के घाट उतारना उतना ही निंदनीय है, जितना स्टेट पावर द्वारा नक्सलियों के दमन के लिए चलाया जा रहा आपरेशन ग्रीन हंट। भावुकता से इतर हटकर यदि हम निरपेक्ष रूप से नक्सलियों और केंद्र सरकार के बीच जारी घमासान का आकलन करने की पहलकदमी करें तो शायद परत दर परत कुछ ऐसे पहलू सामने आएंगे, जिससे दोनों पक्षों को समझने में सहूलियत होगी। वैसे वर्तमान बुद्धिवादी समाज नक्सलवाद को लेकर स्पष्टरूप से दो भागों में बंटा हुआ है। एक वर्ग नक्सलवाद का धूर विरोधी है तो दूसरा वर्ग नक्सलवाद के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैये की वकालत करते हुये नजर आ रहा है। दोनों वर्ग के अपने-अपने तर्क है जबकि आम जनमानस हतप्रभ स्थिति में सारे प्रकरण को देख और सुन रहा है।
सैद्धांतिक रूप से भारत में माओवादियों का फंडा पूरी तरह से स्पष्ट है। माओ में थोड़ी बहुत दिलचस्पी रखने वाले लोगों को भी पता है कि माओ सत्ता को बंदूक से हथियाने पर जोर देता है। माओ का यह कथन- शक्ति बंदूक की नली से निकलती है- कितना प्रासांगिक है, इसे लेकर भले ही बहस हो सकती है, लेकिन इस कथन में यकीन करने वाले लोग जमीनी स्तर पर वर्तमान में स्थापित व्यवस्था को गंभीर चुनौती दे रहे हैं, इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है। भारत में जमीनी स्तर पर माओवादी गतिविधि को समझने के लिये जरूरी है माओ को समझना, उसकी क्रांति को समझना,और क्रांति लाने के उसके तौर तरीकों को समझना।
माओ युद्ध की अनिर्वायता में यकीन करता है और इसे राजनीति से जोड़ते हुये कहता है कि युद्ध राजनीति की निरंतरता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि राजनीति बिना खून खराबे वाला युद्ध है, जबकि युद्ध खून खराबे से भरी हुई राजनीति। जो लोग सरकार को माओवादियों से बातचीत करने की नसीहत देते रहते हैं वे यह नहीं जातने कि माओवाद शांति और बातचीत को भी एक स्ट्रेटेजिकल क्षण के तौर पर इस्तेमाल करने की कला में पारंगत है, हालांकि उसकी नजर हमेशा दूरगामी लक्ष्य पर टिकी रहती है, यानि बंदूक के बल पर सत्ता पर अधिकार। माओ कहता है कि युद्ध को प्रारंभ होने के पहले उसे रोकने की भरपूर कोशिश करनी चाहिये, लेकिन युद्ध शुरु होने के बाद युद्ध को फिर युद्ध से ही रोका जाना चाहिये। माओवादियों ने अभी हाल में दंतेवाड़ा में जिस तरह से 75 भारतीय जवानों को मौत के घाट उतारा है उसे इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिये। माओ का युद्ध कौशल शानदार रहा है, तभी उसने तमाम तरह के शत्रुओं से घिरे हुये चीन को एक अलग राह पर हांक ले गया। भारत में भी कमोवेश माओवादी उसी युद्ध कौशल का इस्तेमाल कर रहे हैं। माओ अपने सैनिकों से कहा करता था कि लोगों के बीच में लोगों की तरह रहो, और नजर दुश्मन पर रखो। मौका मिलते ही उसे मौत के घाट उतार दो।
दंतेवाड़ा में माओवादियों ने बड़ी कुशलता से जवानों को अपने चक्रव्यूह में फंसा लिया। पहले टारगेट करके अपने पीछे आने के लिए उकसाया और जब जवान उसके उकसावे में आकर उसके पीछे भागे हुये आये तो पहले से हजारों की संख्या में घात लगाकर बैठे माओवादियों ने बड़ी सहजता से ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर उनका सफाया कर दिया। तमाम विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यह इंटेलिजेंस फेल्योर का मामला है, जबकि वास्तव में यह माओवादियों की युद्ध रणनीति को न समझने का मामला है। माओवादियो के युद्ध कौशल को समझे बिना उनसे पार पाना नामुमकिन है। और यही तभी संभव है जब माओवादियों को साधारण अपराधी समझने की मानसिकता से आगे बढ़कर उन्हें एक संगठित सेना के तौर पर देखा जाये। केंद्र सरकार ने आपरेशन ग्रीन हंट की शुरुआत तो कर दी है, लेकिन माओवादियों की युद्ध कौशल का ठीक से मूल्यांकन करने में अक्षम है। सिर्फ संख्या के बल पर माओवाद के विस्तार पर अंकुश लगाने की परिकल्पना करना सरकार के लिए दिन में सपने देखने जैसा है। चिदंबरम साहब एक अच्छे प्रशासक हो सकते हैं लेकिन उनके एक बेहतर रणनीतिकार होने में संहेद है। माओवाद को कुचलने के लिए माओवाद की तकनीक और स्ट्रेटजी को पकड़ना जरूरी है, और चिदंबरण साहब के अभियान की असफलता का मुख्य कारण यही है। चिदंबरम साहब जिन जवानों का इस्तेमाल आपरेशन ग्रीन हंट में कर रहे हैं वे उनका प्रशिक्षण एक निश्चत पैटर्न पर हुआ है, लेकिन माओवादी युद्ध तकनीक के बारे में उनकी समझ सवालों के घेरे में है। माओवादी एक सशक्त खूनी विचारधारा से लैस हैं, जबकि भारतीय जवानों को साधारण तरीके से लड़ने का प्रशिक्षण दिया जाता है। और इसी बिंदु पर माओवादियों का पलड़ा भारी हो जाता है।
माओ युद्ध के औचित्य का मूल्यांकन न्याय और अन्याय के तराजू पर करते हुये कहता है कि इतिहास हमें बताता है कि युद्ध दो प्रकार के होते हैं –न्यायपूर्ण और न्यायपूर्ण। सभी युद्ध जो प्रगतिशील हैं न्यायपूर्ण हैं, और सभी युद्ध जो प्रगति के मार्ग में बाधा पहुंचाते हैं वे अन्यायपूर्ण हैं। इस प्रकार माओ की नजर में चिदंबरण द्वारा चलाया जा रहा आपरेशन ग्रीन हंट एक थोपा हुआ अन्यायपूर्ण युद्ध है। जमीनी स्तर पर जंगलों में लड़ने वाले माओवादी इसी भावना से संचालित हो रहे हैं, जबकि आपरेशन ग्रीन हंट के औचित्य को लेकर चिदंबरम को तमाम तरह के सफाई देने पड़ रहे हैं और बौद्धिक स्तर पर माओवादियों का एक विंग उनपर चौतरफ हमला करके उन्हें बैकफुट पर लाने की कोशिश कर रहा है।
माओ जोर देते हुये कहता है कि बंदूक से छुटकारा पाने के लिए बंदूक उठाना जरूरी है। इतना ही नहीं वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ अपने समर्थकों में वह नफरत की भावना को कूटकूट कर भरता है। भारत में माओ के कदम पर चलने वाले नक्सली के मन भी वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ नफरत कूटकूट कर भरा हुआ है, और एक तरह से यह नफरत उन्हें मजबूती ही प्रदान करता है। उन्हें इस बात का अहसास है कि वे अपने सर्वश्व की लड़ाई लड़ रहे हैं जबकि भारतीय जवान महज गणतंत्र की रक्षा से जुड़े हुये हैं।
माओ कहता है कि युद्ध में कामरेडों के लक्ष्य को को पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ बनाना चाहिये। इसके साथ ही वे लोग कार्यमंच पर वे लोग विभिन्न तरह के नाटक-नौटंकी कर सकते हैं। माओ के इस कथन को आधार बना कर यदि हम भारत में माओवादी गतिविधियों की बारीकी से पड़ताल करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वे लोग अपने लक्ष्य को लेकर पूरी तरह से स्पष्ट हैं। उनका उद्देश्य संपूर्ण भू-भाग पर अधिकार करना है और वे शनै-शनै इस लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं। विभिन्न राज्यों के सैंकड़ों जिलों में उनकी न्यायपालिका और कार्यपालिका सक्रिय हैं। माओ कहता है कि भविष्य में गलती करने से बचने के लिए विगत में की गई गलतियों से सीखों। भारत के माओवादी इस सूत्र वाक्य से सबक सीखते हुये अपना कदम आगे बढ़ा रहे हैं जबकि चिदंबरम साहब दंतेवाड़ की घटना से क्या सीख पाते हैं यह तो समय ही बताएगा। इतना तो स्पष्ट नजर आ रहा है कि अभी तक वह माओवाद को सही तरह से नहीं पकड़ पाये हैं। विगत की घटनाओं से यदि उनकी बुद्धि में इजाफा होता तो दंतेवाड़ की घटना नहीं घटती। समय रहते भारतीय जवान और उनके कमांडर माओवादियों के ट्रैप को भांप लेते। वैसे बिहार और झारंखंड के पुलिस चौकियों में तैनात अदना सा पुलिसकर्मी भी माओवादियों की रणनीति को खूब समझता है, भले ही उसने युद्ध विज्ञान के बड़े-बड़े पोथे नहीं बांचे हो।
बहरहाल दंतेवाड़ की घटना के बाद केंद्र सरकार और माओवादियों के बीच जारी जंग एक रोचक मोड़ पर आ गया है। आने वाले दिनों में न्यूटन के तीसरे नियम की तरह क्रिया के बराबर विपरित प्रतिक्रिया का दौर और तेज होने की पूरी संभावना है। माओवादी लंबा युद्ध में यकीन रखते हैं। इस बात को ध्यान में रखकर ही चिदंबरम साहब को तैयारी करने की जरूरत है।

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