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मुर्दा आचरण के खिलाफ

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 19, 2008

इष्ट देव सांकृत्यायन

आज वह दिन है जब आचार्य रजनीश ने इस दुनिया से विदा ली थी. आचार्य रजनीश से मेरी कभी मुलाक़ात तो नहीं हुई, रूबरू कभी उनको देखा भी नहीं. जब तक वह थे तब तक उनके प्रति में भी वैसे ही विरोध भाव से भरा हुआ था, जैसे वे बहुत लोग हैं जिन्होंने उनको ढंग से पढा-सूना या जाना नहीं. और यह कोई आश्चर्यजनक या अनहोनी बात नहीं हुई. मैंने उन्हें जाना अचानक और वह भी कबीर के मार्फ़त.
हुआ यों कि में अपनी बड़ी बहन के घर गया हुआ था और वहाँ जीजा जी के कलेक्शन में मुझे एक किताब मिली ‘हीरा पायो गाँठ गठियायो’. यह कबीर के कुछ पदों की एक व्याख्या थी. सचमुच यह हीरा ही था, जिसे मैंने गाँठ गठिया लिया. कबीर के पदों की जैसी व्याख्या रजनीश ने की थी, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ तक कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य के बडे आलोचकों और व्याख्याकारों से भी नहीं मिल पाई थी. हालांकि तब मैंने उसे अपनी काट-छाँट के साथ पढा था. चूंकि पूरी तरह नास्तिक था, आत्मा-परमात्मा में कोई विश्वास मेरा नहीं था, इसलिए जहाँ कहीं भी वैसी कोई बात आई तो मैंने मन ही मन ‘सार-सार को गहि रही, थोथा देई उड़ाय’ वाले भाव से उसे डिलीट कर दिया.
लेकिन चूंकि रजनीश की व्याख्या में मुझे रस मिल था और उससे कम से कम कबीर के प्रति एक नई दृष्टि भी मिलती दिखी थी, इसलिए इसके बाद भी रजनीश को मैंने छोडा नहीं. जहाँ कहीं भी कबीर पर उनकी जो भी किताब मिली वह में पढ़ता रहा. उसका रस लेता रहा और कबीर के साथ ही साथ रजनीश को भी जानता रहा. हालांकि इस क्रम में कहीं न कहीं जीवन को भी में नए ढंग से नए रूप में जानता रहा. पर तब अपने पूर्वाग्रहों के कारण इस बात को स्वीकार कर पाना शायद मेरे लिए मुमकिन नहीं था.
तो इस तरह में ये कह सकता हूँ की रजनीश को मैंने जाना कबीर के जरिये. पर बाद में मैंने इस दुनिया की कई और विभूतियों को मैंने जाना रजनीश के मार्फ़त. हुआ यों कि ऐसे ही चलते फिरते मुझे एक व्याख्या मिली रैदास पर. यह भी रजनीश ने ही की थी. अब ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ जैसी उक्ति के लिए जाने जाने वाले रैदास कोई पोंगापंथी बात तो कह नहीं सकते थे. इसलिए उन्हें पढ़ने में भी कोई हर्ज मुझे नहीं लगी और वह किताब भी खरीद ली. पढी तो लगा कि रैदास तो उससे बहुत आगे हैं जहाँ तक में सोचता था. अभी जिस दलित चेतना की बात की जा रही है उसके बडे खरे बीज रैदास के यहाँ मौजूद हैं. और आचार्य रजनीश के ही शब्दों में कहें तो ये बीज दुनिया को जला देने वाले शोले नहीं, मनुष्य के भीता का अन्धकार मिटाने वाले प्रकाशपुंज के रूप में मौजूद हैं.
अव्वल तो तब तक में यही नहीं जानता था कि रैदास ने कवितायेँ भी लिखी हैं. मैंने वह किताब पढ़ते हुए जाना कि रेडियो पर हजारों दफा जो भजन में सुन चुका हूँ, ‘तुम चन्दन हम पानी’ वह रैदास की रचना है. अभी फिर मैंने वह किताब पढ़नी चाही तो घर में नहीं मिली. नाम तक अब उसका याद नहीं रहा तो मैंने ओशो वर्ल्ड के स्वामी कीर्ति से कहा और उन्होने काफी मशक्कत से ढूंढ कर वह किताब मुझे भिजवाई. अब उसे में नए सिरे से पढ़ रहा हूँ. उसे फिर-फिर पढ़ते हुए फिर-फिर वही मजा आता है, जो पहली दफा पढ़ते हुए आया था.
रजनीश के प्रति मेरा विरोध भाव अब तक लगभग विदा हो चुका था. क्योंकि मैंने यह जान लिया था कि उनके कहने के बारे में जो कहानियाँ हैं वे कितनी सही हो सकती हैं. इसी बीच एक और किताब मिली. गोरखवाणी. गोरख के बारे में भी में नहीं जानता था कि उन्होने कवितायेँ भी लिखीं हैं और उनकी कविताओं के भाव जो बताते हैं, उनके अनुसार वह उससे बिलकुल अलग थे जो अब उनके चेले कर रहे हैं. खास तौर से ईश्वर के अस्तित्व के सम्बंच में गोरख की जो धारणा है,
‘बसती न शून्यम, शून्यम न बसती
अगम अगोचर ऐसा
गगन सिखर महँ बालक बोलैताका नांव धरहुंगे कैसा’
और इसकी जैसी व्याख्या आचार्य रजनीश ने दी है वह किसी के भी मन को झकझोर देने के लिए काफी है. असल में यही वह बिंदु है जहाँ से मेरी अनास्था के बन्धन कमजोर पड़ने शुरू हो गए थे. यह आचार्य रजनीश को पढ़ते हुए ही मुझे लगा कि वस्तुतः अनास्था भी एक तरह का बन्धन ही है. इनकार का बन्धन.
आचार्य रजनीश, जिन्हें अब लोग ओशो के नाम से जानते हैं, दरअसल हर तरह के बन्धन के विरुद्ध थे. यहाँ तक कि आचरण और नैतिकता के बन्धन के भी विरुद्ध. लेकिन इसका यह अर्थ एकदम नहीं है कि वह पूरे समाज को उच्छ्रिन्खाल और अनैतिक हो जाने की सीख दे रहे थे. दुर्भाग्य की बात यह है कि उनके बारे में उन दिनों दुष्प्रचार यही किया जा रहा था. आश्चर्य की बात है कि हमारे समाज में ऐसा कोई महापुरुष हुआ नहीं जिसके बारे में दुष्प्रचार न किया गया हो. कबीर और तुलसी तक नहीं बचे अपने समय के बौद्धिक माफियाओं के दुष्चक्र से. यह अलग बात है कि हम मर जाने के बाद सबको पूजने लगते हैं. जिंदा विभूतियों को भूखे मारते हैं और मुर्दों के प्रति अपनी अगाध आस्था जताते हैं. शायद हमारी आस्था भी मुर्दा है और यही वजह है जो हमारा देश मुर्दों का देश हो चुका है.
आचार्य रजनीश अकेले व्यक्ति हैं जो इस मुर्दा आस्था के खिलाफ खडे हैं. सीना तान कर. उनका प्रहार कोई नैतिक मूल्यों और अच्छे आचरण पर नहीं है. वह प्रहार करते हैं नैतिकता और आचरण के मुर्देपन पर. वह बार-बार यही तो कहते हैं कि ऐसा कोई भी आचरण या मूल्य जो आपका स्वभाव नहीं बना, वह मुर्दा है. ऐसा अच्छा आचरण सिर्फ तब तक रहेगा जब तक आपके भीतर भय है. भय गया कि अच्छाई गई. इस दुनिया ज्यादातर ईमानदार लोग सिर्फ दो कारणों से ईमानदार हैं. या तो इसलिए कि उन्हें बेईमानी का मौका नहीं मिला, या फिर इसलिए कि बेईमानी की हिम्मत नहीं पडी. भा मिला और मौका मिला कि ईमानदारी गई. रजनीश हजार बार कहते हैं कि मुझे नहीं चाहिए भय और दमन की नींव पर टिकी ऎसी ईमानदारी. मुझे तो सोलहो आने ईमानदारी और सौ फीसदी भलमनसी चाहिए . वह तोता रटंत की कोरी सीख या सरकारी दमन से आने वाली नहीं है. वह आएगी सिर्फ ध्यान से.
ध्यान के मुद्दे पर फिर कभी.

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