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Archive for the ‘politics’ Category

आज़ादी की दूसरी लड़ाई

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 19, 2011

-हरिशंकर राढ़ी
नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही एक आदमी ने पूछा-‘‘ भाई साहब, ये रामलीला मैदान किधर है ?’’ मन में कुछ प्रसन्नता सी हुई और उसे रास्ता बताया- ‘‘ बस इधर सामने से निकल जाइए, ये रहा रामलीला मैदान! वैसे आज तो सभी रास्ते रामलीला मैदान ही जा रहे हैं। किसी भी हुजूम को पकड़ लीजिए, रामलीला मैदान पहुँच जाएंगे। इतने दिनों बाद पहली बार तो असली रामलीला हो रही है वहाँ ! वरना रावणलीला से किसे फुरसत मिलती है यहाँ ? वैसे मैं भी वहीं चल रहा हूँ, अगर डर न लग रहा हो तो मेरे साथ चले चलिए। ’’श्रीमान जी मुस्कराए- ‘‘ डर से बचने के लिए ही तो यहाँ आया हूँ। अगर आज भी हम डर गए तो डर से फिर कभी बच नहीं पाएंगे। जहाँ देश  इतने संकट से गुजर रहा हो, वहाँ भी डरने के लिए  बचता क्या है? और डर तो नहीं रहा है एक सत्तर पार का बुजुर्ग जिसका अपना कोई रक्तसंबन्धी ही नहीं है, जो पूरे देश को अपना संबन्धी समझ बैठा है तो मैं क्यों डरूँ?’’
गेट से बाहर निकलकर कमला मार्किट वाली सड़क पर पहुँचा तो जुलूस ही जुलूस । मै भी एक अनजाने जुलूस का हिस्सा बन गया । शायद  पहली बार भीड़तंत्र अच्छा लग रहा था। हर वर्ग, हर उम्र और हर प्रकार के व्यक्ति एक साथ। नारों की आवाज के नीचे ट्रैफिक के शोर  का कोई पता ही नहीं। अगले चौराहे पर पुलिस की बैरीकेडिंग और साथ -साथ स्वयंसेवकों के पानी और खाद्य सामग्री से भरे छोटे ट्रक आगन्तुकों का स्वागत कर रहे थे। हल्की – हल्की बारिश  हो रही थी और प्रवेश  द्वार पर पानी भरा हुआ था-बेहद डबरीला । लेकिन जैसे आज किसी को अपने फैशन  की जैसे चिन्ता ही नहीं। गौरांगी आधुनिकाएं भी इस डबरीले पानी का जैसे उपहास उडा रहीं थीं । उन्हें न तो अपने प्यारे पैरों के गन्दे हो जाने की चिन्ता थी और न ही कीमती सैंडिलों के खराब हो जाने की। आज तो बिलकुल बराबर का साथ था उनका भी । अपनी सुरीली आवाज में नारे और लगा रही थीं। 
पुलिस बल तो भारी संख्या में तैनात था ही। पर यह पुलिस जैसे कुछ अलग सी लग रही थी – बिलकुल शांत  और सहयोगी। न तो कोई अपशब्द और न चेहरे पर धौंस की कोई अभिव्यक्ति । यह कहीं से नहीं लगता था कि अभी चार दिन पहले इसी पुलिस ने इसी अन्ना को बिला वजह गिरफ्तार किया होगा। वह शक्ति  तो कोई और ही रही होगी जिसने इस शक्ति को संचालित किया होगा वरना ऐसा कौन होगा इस देश में जिसे आजादी के बाद भ्रष्टाचार  ने न रुलाया होगा। रही सही कसर जनता के नारे पूरी कर रहे थे- ‘‘ये अन्दर की बात है, पुलिस हमारे साथ है। वर्दी छोड़ के आएंगे , अन्ना – अन्ना चिल्लाएंगे ।’’ सघन जाँच के बाद अन्दर जाने दिया जा रहा था। अच्छा लगा और आज किसी को कोई शिकायत  नहीं थी। आदमी खुश  हो तो क्या – क्या सह लेता है! पर अब शायद भ्रष्टाचार न सहे!
लगभग ढाई बज रहे थे और अन्ना जी मंच पर विराज रहे थे। इन्द्रदेव पता नहीं खुश थे या नाराज क्योंकि सामान्य बारिश हो रही थी । रामलीला मैदान पहले की बारिश से गीला हो चुका था पर पब्लिक को कोई फरक ही नहीं पड़ रहा था। मेरे एक मित्र कहते थे कि हिन्दुस्तान की पब्लिक को फरक बहुत देर से पड़ता है। पर एक बार जब पड़ जाता है तो वह मानती नहीं । पहले शिकार  होती है फिर शिकार करती है। यहाँ के धर्म की यह विशेषता  है। यह बचने का उपाय तबतक नहीं ढूँढ़ती जब तक पानी नाक से ऊपर नहीं आने लगता । इसकी दूसरी विशेषता  यह है कि यह भारतीय रेल के डिब्बे की तरह। पूरी तरह टिकाऊ और मजबूत लेकिन इंजन की तलाश  में है। एक बार एक इंजन लग जाए, कैसा भी, तो यह कितना भी बोझ खींच ले जाए। उनकी बात आज मुझे सही लग रही थी। उसे एक इंजन मिल गया था और अब वह इस इंजन के पीछे-पीछे कहीं तक और कोई भी वजन लेकर जाने को बेताब है।
हुजूम ही हुजूम और नारे ही नारे। मैं कोई रिपोर्ट नहीं कर रहा हूँ। यह तो सभी ने मीडिया की कृपा से प्रतिक्षण देखा ही है। मैं तो इस देश की जनता की देर आयद, दुरुस्त आयद की भावना को पढ़ने की कोशिश  कर रहा हूँ। लोग तो ऐसे भी थे जिन्हें यह नहीं मालूम कि ये जनलोकपाल क्या होता है और कानून बनाता कौन है। हाँ, इस व्यवस्था और मंहगाई से परेशान  थे और ये सोचकर आए थे कि कोई अच्छा काम हो रहा है और इसमें शरीक  होना कोई पुण्य है। भजन पर लोग नाच रहे थे और सुर मिला रहे थे – ये सुर संगीत के नहीं बल्कि समर्थन के थे। हाँ, अपना निराला हिन्दुस्तान वहाँ अपने व्यंग्यात्मक रूप में भी जिन्दा था – भीड़ में जहाँ मैं खड़ा था , वहीं किसी सज्जन का बटुआ अपने किसी हिन्दुस्तानी कलाकार भाई ने मार लिया था। 
चाहता था कि अन्ना को पास जाकर देखूँ। नजदीक जाना प्रतिबंधित था। एक गोल सा घेरा बनाया गया था। मंच के आगे मीडिया वालों का घेरा दिखा तो लगा कि प्रेस वालों के लिए कोई रास्ता तो जरूर है । सैकड़ों फोटोग्राफर और संवाददाता इधर- उधर आना- जाना मचाए हुए थे। परिचय पत्र दिखाने पर प्रेस दीर्घा में  प्रवेश मिल गया । न जाने कितने समारोहों में आना -जाना हुआ है इस आधार पर किन्तु आज जैसे पहली बार लगा कि यह परिचय पत्र सही जगह काम आया है और बहुत प्यारा है।
शाम  के लगभग चार बजे तक रामलीला मैदान आधा भर चुका था। उमड़े हुए संख्या बल को देखकर लग रहा जैसे मुझे भी आजादी की लड़ाई देखने का एक मौका मिल गया हो। अन्ना जी के पास तक पहुँच नहीं सका नहीं तो कहता कि आज सचमुच में भावनात्मक और संकलनात्मक रूप में एक सौ पचीस करोड़ माइनस पाँच सौ तैंतालीस (जो चयनित होने के बाद माननीय हो गए हैं ) तो आपके ही साथ हैं । ( फोटो भी थे पर मोबाइल धोखा दे गया और यहाँ प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ।)

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आप क्या तय कर रहे हैं?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 30, 2010

बिहार चुनाव के नतीजों ने पूरी भारतीय राजनीति को झकझोर दिया है. जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे झूठे मुद्दों पर बन्दर की तरह नाचने वाले देसी मतदाताओं ने इन छलावों को मेटहे में बन्द कर लोकतंत्र की बहती नदी की तीव्र धारा के हवाले कर दिया है. बबुआ का जादू भी नहीं चला. स्विस बैंक के खुलासे सामने हैं और आम भारतीय उनमें रुचि ले रहा है. ग़ौर करने की ज़रूरत है, यह लगभग वैसा ही दौर है, जैसा राजीव गान्धी के दौर में हुआ था. आम आदमी का ध्यान पहली बार ख़ास लोगों के काले कारनामों की ओर गया था और जिसने झूठमूठ मुद्दा बना कर जनता को बहकाया था उसी ने मदारी के झोले से मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों का ख़तरनाक सांप निकाल दिया था. कांग्रेस को छात्र नेताओं के जरिये अपनी राजनीति चमकाने का मौक़ा मिल गया और उसने तुरंत पिछले दरवाज़े से छात्र नेताओं को हवा देकर आत्मदाहों का दौर चलवा दिया. पूरे देश में लगभग ख़त्म हो चुका जातिवाद नए सिरे से स्थापित हो गया.

यह न तो अकेले कांग्रेस की चाल थी, न वीपी सिंह की और न भाजपा की. वस्तुतः यह इन सबकी मिली-जुली चाल थी. इस बात पर व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सोचने की ज़रूरत है. हम फिर एक कठिन दौर में आ गए हैं. राजनेताओं की रोजी-रोटी छिनती दिख रही है और मीडिया व व्यावसायिक जगत के बड़े-बड़े टायकूनों के लंगोटे उतर रहे हैं. बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है. क्योंकि असली मुद्दों के प्रति आम आदमी की जागरूकता भारतीय राजनेता बर्दाश्त नहीं कर सकते. राजनीति की रहस्यमय बोतल से जल्दी ही जाति-धर्म-क्षेत्र-संप्रदाय … का कोई नया जिन्न निकलने ही वाला है. ऐसे में एक समझदार मनुष्य होने के नाते आपको पहले से ही अपनी भूमिका तय करके रखनी है. आप क्या तय कर रहे हैं?

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बिहार में रिफोर्मिस्ट की कमी है

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 4, 2010

कल रात अचानक बिहार आर्ट थियेटर की दुनिया के एक मजे हुये सख्सियत से मुलाकात हो गई। बातों ही बातों में मैंने पूछा, भारंगम में बिहार आर्ट थियेटर की क्या उपस्थिति है। उन्होंने कहा, कुछ भी नहीं। एक बार हमने भारंगम में बिहार आर्ट थियेटर से एक नाटक भेजा था। जानते हैं उसका जवाब क्या आया? एनएसडी का लेटर आज भी पड़ा है। उसमें लिखा है कि आपका नाटक बेहतर है, लेकिन हम इसे अपने सम्मेलन में शामिल नहीं कर सकते हैं। अगले वर्ष इस पर विचार करेंगे। थोड़ा हिचकते हुये मैंने छेड़ा, अगले वर्ष से क्या मतलब है। उन्होंने कहा, आपको बात बुरी लगेगी लेकिन इसमें सच्चाई है। भारंगम एनएसडी का कार्यक्रम है, और इसमें उन्हीं लोगों के नाटक को सम्मिलित किया जाता है, जो लोग एनएसडी से जुड़े हुये हैं। हां, दिखावे के लिए एक-दो नाटक यहां- वहां से वे लोग ले लेते हैं। सब पैसे बटोरने का खेल है। एनएसडी का लेटर अभी भी मेरे पास पड़ा हुआ है। आप कहें तो मैं दिखाऊं।
पटना के कालिदास रंगायल में मेरे साथ दो-तीन लोग और बैठे हुये थे। उस सख्सियत की बातों में मुझे रस मिल रहा था। बात को आगे बढ़ाते हुये मैंने कहा, महाराष्ट्र में लोग टिकट खरीद कर नाटक देखने आते हैं। दिल्ली में भी कमोवेश यही स्थिति है। फिर बिहार में रंगमंच प्रोफेसनलिज्म की ओर क्यों नहीं बढ़ रहा है ? इतना सुनते ही एक लंबी सांस लेने के बाद वह बोले, आपको पता है कालिदास रंगालय में किस तरह के दर्शक आते हैं। लुंगी-गंजी पहन कर कांधे पर गमछा रखकर लोग नाटक देखने आते हैं। इतना ही नहीं वे पैर को अगली सीट पर फेंक कर बैठते हैं। और यदि उन्हें मना करो तो मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। रंगमंच सजग दर्शक की मांग करती है। आपको पता है बंगाल में लोग बड़े शौक से नाटक देखने जाते हैं। वो भी पूरे परिवार के साथ। घर में सुबह से ही जश्न का माहौल रहता है। लेकिन पटना में रंगमंच पूरी तरह से उपेक्षित है।
बातों के दौरान एक नेता जी बीच में कुद पड़े और लगे बोलने, बिहार का युवावर्ग नपुंसक है। वह सामाजिक सरोकारों से पूरी तरह से दूर हो चुका है। मैंने छूटते ही पूछा, यदि यहां का युवावर्ग सामाजिक सरोकारों से दूर हो रहा है तो दोष किसका है। उसका एजेंडा क्लियर है। यदि वह आज पढ़ाई कर रहा है तो यही सोंचकर कि कल उसे 30-40 हजार की नौकरी मिल जाएगी। और यदि उसे 30-40 हजार की नौकरी मिली हुई तो वह यही सोंच रहा है कि वह 50-60 रुपये महीने में कैसे कमाये। वह ऐसा ना सोचे तो क्या करे? नेता जी के पास इसका कोई सटीक जवाब नहीं था, लेकिन थियेटर से जुड़े सख्सियत ने कहा, मैं भले ही थियेटर से जुड़ा हुआ हूं। लेकिन मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि थियेटर की कोई भूमिका नहीं रही गई है। हिंदी रंगमंच महाराष्ट्र और बंगाल में पूरी तरह से प्रोफेशन हो गया है। वहां पर लोग टिकट खरीद कर नाटक देखने आते हैं। लेकिन भोपाल, इलाहाबाद, लखनऊ जैसे शहरों के बारे आप क्या कहेंगे, जहां पर रंगमंच से वही लोग जुड़े हुये हैं जो इसमें शिरकत करते हैं। उनकी बातों को मजबूती प्रदान करते हुये नाटक से जुड़े एक अन्य बंदे ने कहा, लोग यहां पर फ्री में थियेटर कर रहे हैं। वो भी इसलिए कि उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिल जाये। नेता जी ने एक बार फिर अपना फंडा समझाते हुये कहा, दिल्ली और मुंबई में नाटकों में सेक्स परोसा जा रहा है। रंगमंच पर लड़कियां नंगी होने के लिए तैयार हैं। उनकी बातों को क्रास करते हुये मैंने कहा, दिल्ली में अरविंद गौड़ की अस्मिता नामक संस्था बेहतरीन नाटक कर रही है। जन सरोकार से जुड़ी हुई चीजों को वे लोग बहुत ही फोर्सफूली उठा रहे हैं और उनका एक आडियेन्स भी है। वे लोग वहां की जनता को अपने साथ जोड़कर थियेटर को समृद्ध कर रहे हैं। उनके नाटकों में सेक्स नहीं होता। उसी तरह नटसम्राट जैसी संस्था भी कामेडी नाटक करके लोगों को अपने से जोड़े हुये हैं। फिर आप कैसे कह सकते हैं कि नाटकों में सेक्स परोस कर इसे प्रोफेशन लुक दिया जा रहा है। नेता जी को कोई जवाब नहीं सूझा और वे बगल झांकने लगे।
बातों के क्रम में थियेटर से जुड़े सख्सियत ने कहा, बिहार में रिफोर्मिस्ट की कमी है। आप बंगाल को देखिये। वहां राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद, केशवचंद सेन जैसे रिफार्मिस्ट हुये, जो लगातार वहां के जनमानस को आंदोलित करते रहे। बिहार में लोग जबरदस्ती के नेता बने हुये हैं। इनके पास कोई दूरगामी योजना नहीं है। आप नीतिश को लीजिये। वो कह रहे हैं गर्व से कहो हम बिहारी है। मैं आपको बताता हूं कि कुछ दिन पहले मैं मुंबई गया था, अपने एक मित्र के पास। उनके घर पर पहुंचते ही उन्होंने मुझे कहा कि आप किसी को बताइगा नहीं कि आप पटना से आ रहे हैं और आप बिहारी है। पटना से जैसे ही ट्रेन खुलती है और यूपी क्रास करती है बिहार के लोग यही कहने लगते हैं कि वे यूपी के हैं। उन्हें यह कहने में शर्म आती है कि वे बिहारी है। नीतिश कुमार की उपलब्धि सिर्फ इतनी है कि उन्होंने गुड रूल दिया है। लेकिन वो एक रिफार्मिस्ट नहीं है। डा. सच्चिदानंद सिन्हा को रिफार्मिस्ट कहा जा सकता है। उनके सलीके अलग थे। कैजुअल ड्रेस में यदि कोई उनसे मिलने आ जाता था तो वह नहीं मिलते थे। उनका अपना तरीका था। लोकनायक जय प्रकाश भी रिफार्मिस्ट थे, लेकिन वह किसी की सुनते नहीं थे। बस अपनी ही कहते थे। आपको पता है दिपांकर भटाचार्य इसी बिहार आर्ट थियेटर में छुपे रहते थे जब पुलिस उन्हें खोज रही थी। अभी दो दिन पहले वह गांधी मैदान में लैंड रिफार्म की बात कर रहे थे। मैं तो कहता हूं कि लालू प्रसाद यादव में माओ त्से तुंग बनने की पूरी संभावना थी। याद किजीये वह दौर जब उनके कहने पर गांधी मैदान लोगों से भर जाता था। लेकिन उनके पास कोई विजन नहीं था। यहां की जनता को उन्होंने आंदोलित तो कर दिया लेकिन सही तरीके से लीड नहीं कर पाये। आज बिहार को रिफार्मिस्ट की जरूरत है। यहां के तमाम लीडरान अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति में लगे हुये हैं। आप लिख लिजीये रामविलास कांग्रेस में जाएंगे। कांग्रेस के बिना इनकी राजनीति चल ही नहीं सकती।
बोलते –बोलते वो आवेश में आ गये थे, कानू सान्याल एक झोपड़ी में मर गये। देश के कई मुख्यमंत्रियों की तुलना में वह ताउम्र सक्रिया रहे। लेकिन कभी सुरक्षा नहीं लिया। आज के नेता लोग बंदूक के साये में चलते हैं। यदि वे जन नेता हैं तो उन्हें डर किस बात का है? चाहे लोग लाख कहें लेकिन कानू सान्याल से वे बड़े नेता नहीं हो सकते। माओ ठीक ही कहता था कि सत्ता बंकूक की नली से निकलती है। तभी तो आज के डेमोक्रेटिक नेताओं को बंदूक की जरूरत पड़ती है। आज केंद्र सरकार भी इस बात को मान रही है कि यदि नक्सलियों को रोका नहीं गया तो अगले 50 वर्षों में भारत में नक्सलियों को राज हो जाएगा। एक बहुत बड़े भू-भाग में नक्सलियों की समानांतर सरकार चल रही है। वे लोग अपने तरीके से स्थापित सत्ता को गंभीर चुनौती दे रहे हैं। कई जगहों पर अब तो वे बैनर के साथ विधिवत मार्च कर रहे हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिंसक आंदोलनों का एक मजबूत इतिहास रहा है। लेकिन भारत की स्वतंत्रता का सारा श्रेय गांधी जी को दिया जाता है। मामला साफ है जिसके हाथ में सत्ता है इतिहास उसी का है।

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वे जो धर्मनिरपेक्ष हैं…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 6, 2009

अभी थोड़े दिनों पहले मुझे गांव जाना पड़ा. गांव यानी गोरखपुर मंडल के महराजगंज जिले में फरेन्दा कस्बे के निकट बैकुंठपुर. हमारे क्षेत्र में एक शक्तिपीठ है.. मां लेहड़ा देवी का मन्दिर. वर्षों बाद गांव गया था तो लेहड़ा भी गया. लेहड़ा वस्तुत: रेलवे स्टेशन है और जिस गांव में यह मंदिर है उसका नाम अदरौना है. अदरौना यानी आर्द्रवन में स्थित वनदुर्गा का यह मन्दिर महाभारतकालीन बताया जाता है. ऐसी मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने राजा विराट की गाएं भी चराई थीं और गायों को चराने का काम उन्होंने यहीं आर्द्रवन में किया था और उसी वक़्त द्रौपदी ने मां दुर्गा की पूजा यहीं की थी तथा उनसे पांडवों के विजय की कामना की थी. हुआ भी यही.

समय के साथ घने जंगल में मौजूद यह मंदिर गुमनामी के अंधेरे में खो गया. लेकिन फिर एक मल्लाह के मार्फ़त इसकी जानकारी पूरे क्षेत्र को हुई. मैंने जबसे होश संभाला अपने इलाके के तमाम लोगों को इस जगह पर मनौतियां मानते और पूरी होने पर दर्शन-पूजन करते देखा है. ख़ास कर नवरात्रों के दौरान और मंगलवार के दिन तो हर हफ़्ते वहां लाखों की भीड़ होती है और यह भीड़ सिर्फ़ गोरखपुर मंडल की ही नहीं होती, दूर-दूर से लोग यहां आते हैं. इस भयावह भीड़ में भी वहां जो अनुशासन दिखता है, उसे बनाए रख पाना किसी पुलिस व्यवस्था के वश की बात नहीं है. यह अनुशासन वहां मां के प्रति सिर्फ़ श्रद्धा और उनके ही भय से क़ायम है.

ख़ैर, मैं जिस दिन गया, वह मंगल नहीं, रविवार था. ग़नीमत थी. मैंने आराम से वहीं बाइक लगाई, प्रसाद ख़रीदा और दर्शन के लिए बढ़ा. इस बीच एक और घटना घटी. जब मैं प्रसाद ख़रीद रहा था, तभी मैंने देखा एक मुसलमान परिवार भी प्रसाद ख़रीद रहा था. एक मुल्ला जी थे और उनके साथ तीन स्त्रियां थीं. बुर्के में. एकबारगी लगा कि शायद ऐसे ही आए हों, पर मन नहीं माना. मैंने ग़ौर किया, उन्होंने प्रसाद, कपूर, सिन्दूर, नारियल, चुनरी, फूल…… वह सब ख़रीदा जिसकी ज़रूरत विधिवत पूजा के लिए होती है. जान-बूझ कर मैं उनके पीछे हो लिया. या कहें कि उनका पीछा करने का पाप किया. मैंने देखा कि उन्होंने पूरी श्रद्धापूर्वक दर्शन ही नहीं किया, शीश नवाया और पूजा भी की. नारियल फोड़ा और रक्षासूत्र बंधवाया. फिर वहां मौजूद अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के आगे भी हाथ जोड़े और सबके बाद भैरो बाबा के स्थान पर भी गए. आख़िरकार मुझसे रहा नहीं गया. मैंने मुल्ला जी से उनका नाम पूछ लिया और उन्होने सहज भाव से अपना नाम मोहम्मद हनीफ़ बताया. इसके आगे मैंने कुछ पूछा नहीं, क्योंकि पूछने का मतलब मुझे उनका दिल दुखाना लगा. वैसे भी उन्हें सन्देह की दृष्टि से देखने की ग़लती तो मैं कर ही चुका था.

बाद में मुझे याद आया कि यह दृश्य तो शायद मैं पहले भी कई बार देख चुका हूं. इसी जगह क़रीब 10 साल पहले मैं एक ऐसे मुसलमान से भी मिल चुका हूं, जो हर मंगलवार को मां के दर्शन करने आते थे. उन्होंने 9 मंगल की मनौती मानी थी, अपने खोये बेटे को वापस पाने के लिए. उनका बेटा 6 महीने बाद वापस आ गया था तो उन्होंने मनौती पूरी की. मुझे अब उनका नाम याद नहीं रहा, पर इतना याद है कि वह इस्लाम के प्रति भी पूरे आस्थावान थे. तब मुझे इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ. मोहर्रम के कई दिन पहले ही हमारे गांव में रात को ताशा बजने का क्रम शुरू हो जाता था और उसमें पूरे गांव के बच्चे शामिल होते थे. मैं ख़ुद भी नियमित रूप से उसमें शामिल होता था. हमारे गांव में केवल एक मुस्लिम परिवार हैं, पर ताजिये कई रखे जाते थे और यहां तक कि ख़ुद मुस्लिम परिवार का ताजिया भी एक हिन्दू के ही घर के सामने रखा जाता था. गांव के कई हिन्दू लड़के ताजिया बाबा के पाएख बनते थे. इन बातों पर मुझे कभी ताज्जुब नहीं हुआ. क्यों? क्योंकि तब शायद जनजीवन में राजनीति की बहुत गहरी पैठ नहीं हुई थी.

इसका एहसास मुझे तीसरे ही दिन हो गया, तब जब मैंने देवबन्द में जमीयत उलेमा हिन्द का फ़तवा सुना और यह जाना कि प्रकारांतर से हमारे गृहमंत्री पी. चिदम्बरम उसे सही ठहरा आए हैं. यह अलग बात है कि अब सरकारी बयान में यह कहा जा रहा है कि जिस वक़्त यह फ़तवा जारी हुआ उस वक़्त चिदम्बरम वहां मौजूद नहीं थे, पर जो बातें उन्होंने वहां कहीं वह क्या किसी अलगाववादी फ़तवे से कम थीं? अब विपक्ष ने इस बात को लेकर हमला किया और ख़ास कर मुख्तार अब्बास नक़वी ने यह मसला संसद में उठाने की बात कही तो अब सरकार बगलें झांक रही है. एक निहायत बेवकूफ़ी भरा बयान यह भी आ चुका है कि गृहमंत्री को फ़तवे की बात पता ही नहीं थी, जो उनके आयोजन में शामिल होने से एक दिन पूर्व ही जारी किया जा चुका था और देश भर के अख़बारों में इस पर ख़बरें छप चुकी थीं. क्या यह इस पूरी सरकार की ही काबिलीयत पर एक यक्षप्रश्न नहीं है? क्या हमने अपनी बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में सौंप रखी है, जिनका इस बात से कोई मतलब ही नहीं है कि देश में कहां-क्या हो रहा है? अगर हां तो क्या यह हमारे-आपके गाल पर एक झन्नाटेदार तमाचा नहीं है? आख़िर सरकार हमने चुनी है.

अभी हाल ही में एक और बात साफ़ हुई. यह कि जनवरी में मुसलमानों को बाबा रामदेव से बचने की सलाह देने वाले दारुल उलूम के मंच पर उनके आते ही योग इस्लामी हो गया. यह ज़िक्र मैं सिर्फ़ प्रसंगवश नहीं कर रहा हूं. असल में इससे ऐसे संगठनों का असल चरित्र उजागर होता है. इन्हीं बातों से यह साफ़ होता है कि राजनेताओं और धर्मध्वजावाहकों – दोनों की स्थिति एक जैसी है. देश और समुदाय इनके लिए सिर्फ़ साधन हैं. ऐसे साधन जिनके ज़रिये ये अपना महत्व बनाए रख सकते हैं. मुझे मुख़्तार अब्बास नक़वी की भावना या उनकी बात और इस मसले को लेकर उनकी गंभीरता पर क़तई कोई संदेह नहीं है, लेकिन उनकी पार्टी भी इसे लेकर वाकई गंभीर है, इस पर संदेह है. जिस बात के लिए भाजपा ने जसवंत सिंह को बाहर का रास्ता दिखा दिया, वही पुण्यकार्य वाचिक रूप में वर्षों पहली आडवाणी जी कर चुके हैं. फिर भी अभी तक वह पार्टी में बने हुए हैं, अपनी पूरी हैसियत के साथ. हालांकि उनको रिटायर करने की बात भी कई बार उठ चुकी है. फिर क्या दिक्कत है? आख़िर क्यों उन्हें बाहर नहीं किया जाता? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आख़िर क्यों आडवाणी और चिदम्बरम जैसे महानुभावों पर विश्वास किया जाता है? आख़िर क्यों ऐसे लोगों को फ़तवा जारी करने का मौक़ा दिया जाता है और ऐसे देशद्रोही तत्वों के साथ गलबहियां डाल कर बैठने और मंच साझा करने वालों को देश का महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा जाता है? क्या सौहार्द बिगाड़ने वाले ऐसे तत्वों के साथ बैठने वालों का विवादित ढांचा ढहाने वालों की तुलना में ज़रा सा भी कम है? क्या मेरे जैसे हिन्दू या मोहम्मद हनीफ़ जैसे मुसलमान अगर कल को राष्ट्र या मनुष्यता से ऊपर संप्रदाय को मानने लगें तो उसके लिए ज़िम्मेदार आख़िर कौन होगा? क्या चिदम्बरम जैसे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष इसके लिए उलेमाओं और महंतों से कुछ कम ज़िम्मेदार हैं?

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संघे शरणं गच्छामि….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 28, 2009

लोकतांत्रिक भारत में पैदा हुए राजकुमार तमाम आर्यसत्यों को समझते-समझते ख़ुद मंत्री बन गए. असल में अब ईसापूर्व वाली शताब्दी तो रही नहीं, यह ईसा बाद की 21वीं शताब्दी है और ज़िन्दगी के रंग-ढंग भी ऐसे नहीं रह गए हैं कि कोई बिना पैसे-धेले के जी ले. वैसे तो उन्हें जब भी अपना पिछ्ला जन्म याद आता तो अकसर उन्हें यह सोच कर कष्ट होता था कि वे भी क्या दिन थे. मांगने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती थी, अकसर तो बिन मांगे ही बड़े आराम से भिक्षा मिल जाती थी. जो लोग जान जाते कि यह तो राजपुत्र है, वे तो यह भी इंतज़ार नहीं करते थे कि उनके दरवाज़े तक पहुंचूं मैं. जहां जाता, अगर मेरे वहां पहुंचने या होने की सूचना मिल जाती तो राज परिवारों से जुड़े लोग बहुत लोग तो ख़ुद ही चलकर आ जाते थे भिक्षा देने नहीं, चढ़ावे चढ़ाने. कई राज परिवार तो तैयार बैठे रहते थे संन्यास दीक्षा लेने के लिए पहले से ही. एक ज़माना यह है, अब मांगो भी भीख नहीं मिलती. अब भीख सिर्फ़ तब मिलती है जब आप किसी बड़े बाप के आंख के तारे को उससे दूर कर दें. छिपा दें कहीं और फिर फ़ोन से सूचना दें कि भाई इतने रुपये का चढ़ावा इस स्थान पर इतने बजे रख जाएं. और ध्यान रखें, किसी प्रकार की समझदारी करने की कोशिश न करें यानी पुलिस-वुलिस को सूचना न दें, वरना आसपास मौजूद हमारे भदंत आपको वहीं से महापरिनिर्वाण को उपलब्ध करा देंगे. या फिर आप कोई लाइसेंस-वाइसेंस दिलाने की हैसियत में हों और उसे रोक दें. या फिर तब जब आप इनकम टैक्स विभाग से काला-सफ़ेद करने का पक्का परवाना रखते हों और दो लाख लेकर 10 लाख की रसीद दे सकें. अब जीवन की पृहा से मुक्ति के लिए संत नहीं बना जा सकता है, बल्कि तमाम संपदाएं अर्जित करने के लिए संत बना जाता है. संत बन कर वे सारी सुविधाएं हासिल की जाती हैं जो दिन-रात खटने वाले गृहस्थों को भी हासिल नहीं होती हैं.
लिहाज़ा इस जीवन में महापरिनिर्वाण पुराने वाले तरीक़े से तो नहीं मिलने वाला है, ये तो तय है. परिनिर्वाण प्राप्त करने के लिए तप का तरीक़ा दूसरा ही अपनाना होगा. तो सबसे पहले उन्होंने सरस्वती की ध्यान साधना की, देश के सबसे बड़े अगिया बैताल की छत्रछाया में. एक से बढ़कर एक चमत्कार किए उन्होंने ध्यान साधना के तहत. इसी दौरान कुछ नए देवताओं से उनका संपर्क हुआ और उन्होंने जान लिया कि जनता अब तक जिन देवताओं को पूजती आ रही है वे सब के सब बिलकुल ग़लत-सलत देवता हैं. जनता इन्हें झुट्ठे पूजती है, असली देवता तो दूसरे हैं. उन्होंने यह बात समझी और किसी ध्यान साधक की तरह बात समझ में आते ही नए मिले देवताओं की पूजा शुरू कर दी.
अब ज़ाहिर है जब आप किसी देवता को पूजिएगा तो चाहे नया हो या पुराना, वह फल तो देगा ही. बल्कि नए देवता थोड़ा ज़्यादा ही फल देते हैं. सो उन्होंने दिया भी. उन्होंने सबसे पहले तो इन्हें समझाया कि भाई देख सरस्वती की साधना से आज तक किसी को भी निर्वाण नहीं मिला है. निर्वाण मिलता है विष्णु भगवान की कृपा से और विष्णु जी मानते हैं लक्ष्मी जी को. उनकी ही सिफ़ारिश चलती है विष्णु भगवान के सामने. तो अब तू उन्हीं की साधना और साधना उस अगिया बैताल के यहां नहीं हो सकती. यह साधना तुझे करनी होगी हमारी छत्रछाया में, तो चल ये ले मंत्री पद और संभाल अपनिवेश का कारोबार.
राजकुमार ने तुरंत यह साधना शुरू की और अबकी बार इतने मन से की कि कुछ भी बक़ाया नहीं छोड़ा. अपनिवेश का काम उन्होंने इतने मन से किया कि उनके देवराज का सिंहासन डोलने लगा. ऐन वक़्त पर उनके हाथ से जान छुड़ाकर भाग गया देश, वरना उन्होंने उसे भी नहीं छोड़ा होता. ख़ैर उनके सपने अधूरे नहीं रहेंगे, इसका भरोसा उनके बाद उनके मार्ग के साधकों ने दिला दिया. इसीलिए बाद में कुछ विकल्पहीनता की त्रासदी और कुछ ईवीएम की कृपा ने जनता से उन्हें ऐज़ इट इज़ कंटीन्यू भी करवा दिया. बहरहाल, मंत्रालयी दौर में ही राजकुमार राष्ट्र अपश्रेष्ठि के ऐसे प्रिय हुए कि हवाई अड्डे पर उनके गुरुभाई इंतज़ार ही करते रहते और राजकुमार स्वयं विमान के पिछले दरवाज़े निकल अपश्रेष्ठि के कलाकक्ष में पहुंच जाते.
पर इसके बाद से बेचारे राजकुमार का मन उखड़ गया. उनकी समझ में एक तो यह बात आ गई कि राष्ट्र ऐसे चलने वाला नहीं है. राष्ट्र में अब दुख ही दुख है और दुख से उबार सकने की ताक़त रखने वाले इकलौते विहार में अब कोई दम नहीं रह गया है. यहां तक कि इसके जो देवता हैं, उन्हें उनके ही कुछ भक्तों ने अंतर्ध्यान यानी कि नज़रबन्द कर दिया है. तब? अब क्या किया जाए? यह प्रश्न उठा तो उन्होंने एक बार फिर ध्यान लगाया और पाया कि इस विहार के पीछे एक संघ है. वैसे तो विहार में प्रवेश का रास्ता ही संघ से होकर आता था, लेकिन राजकुमार को राजकुमार होने के नाते उसकी ज़रूरत शायद नहीं पड़ी थी. पर अभी उन्हें अचानक उसकी अहमियत पता चल गई और इसीलिए उन्होंने एकदम से घोषणा कर दी.
हालांकि घोषणा जो उन्होंने की, वह अंग्रेजी में की और अब क्या बताएं! यह कहते हुए मुझे बड़ी शर्म आती है कि वह मेरी समझ में बिलकुल वैसे ही ज़रा भी नहीं आई, जैसे 6 साल पहले उनके विहार का इंडिया साइनिंग और फील गुड़ वाला नारा पूरे देस की अनपढ़ जनता के समझ में नहीं आया था. ख़ैर, हमने सोचा कि अपन मित्र सलाहू किस दिन काम आएगा. सों हमने उससे पूछ लिया. उसने जो बताया और उसका जो लब्बोलुआब मेरी समझ में आया वो ये कि अब ये जो अपना विहार है इसकी स्थिति बिहार जैसी हो गई है और राजा साहब की हालत लालू और रामबिलास पासवान जैसी हो गई है. विहार के जो और भदंत हैं ऊ त बेचारे सब ऐसे हो गए हैं जैसे पंचतंत्र का वो सियार जो एक बछड़े के बाप के पीछे-पीछे लगा था.
ज़ाहिर है, अब ऐसे में ये सवाल तो उठना ही था कि फिर क्या किया जाए. कैसे मिलेगा निर्वाण. सवाल उठते ही उन्होंने तुरंत ध्यान लगाया. ध्यान में नारद मुनि आए. देवर्षि को राजकुमार ने अपनी समस्या बताई तो उन्होंने तुरंत उन्हें सूतजी से मिलवाया. भला हो सूतजी का कि उन्होंने इस घोर कलिकाल में कथाओं पर उमड़ते-घुमड़ते शंकाओं के बादलों को देखते हुए कथा सुनने का कोई उपाय नहीं बताया. उन्होंने लौकिक उपाय बताते हुए राजकुमार को संघ के शरण में जाने का उपाय सुझाया. वही बहुमूल्य उपाय कुछ दिनों पूर्व उन्होंने मृत्युलोक के वासियों को बताया है. नया उपाय जानकर लोकवासियों में धूम मचनी ही थी, सो वो मची हुई है. सभी जाप कर रहे हैं : संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि, संघे शरणं गच्छामि…… आप भी कर के देख लीजिए. क्या पता दुख के जिन्न से पीछे छूट जाए.

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जिन्न-आ मुझे मार

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 25, 2009

अब तो आपको विश्वास हो ही गया होगा कि जिन्न होते ही हैं और उनमें दम भी होता है। अब केवल दिखाने के लिए बहादुर मत बनिए, वैसे भी इस जिन्न का असर आप पर नहीं होने वाला। ये जिन्न बड़ा जबरदस्त है। जिन्न क्या है, समझिए जिन्ना है। ढूंढ़- ढूंढ़कर बड़े-बड़े नेताओं को मार रहा है , बिलकुल राष्ट्रीय स्तर और राष्ट्रवादी नेताओं को !मार भी क्या रहा है, न मरने दे रहा है न जीने। इस बार भी उसने बड़ा शिकार चुना है। मजे की बात तो यह है कि इस शिकार से किसी को सहानुभूति नहीं है, यहां तक कि ओझाओं और सोखाओं तक को नहीं जो कि इस के घर के ही हैं ! घर- परिवार वाले तो इसे देखना भी नहीं चाहते। इस शिकार से तो वे पहले से ही चिढ़े थे ,अब इसने एक जिन्न और लगा लिया अपने पीछे । दरअसल उन्हें शिकार से ज्यादा चिढ़ इस जिन्न से है । जिन्न इसने लगाया,चलो ठीक है, पर इस वाले जिन्न को क्यों लगाया ? और इस शिकार को क्या कहें ? इसे मालूम था कि इस जिन्न के प्रति माहौल खराब है,फिर भी इसे छेड़ा। पहले तो इसे कहते थे कि आ बैल मुझे मार , पर इसने तो कहा- आ जिन्न-आ मुझे मार !
ये जिन्न बड़ा राजनीतिज्ञ है, केवल चले बले राजनेताओं को मारता है। और मारता भी उसे है जो इसकी बड़ाई करने की कोशिश करता है।इसे धर्म निरपेक्षता से बड़ी चिढ़ है । कुछ भी कह लो पर यही मत कहो। पूरे जीवन धर्मनिरपेक्षता से ही लड़ने की कोशिश की और अब मरहूम होने पर भी उसकी रूह को दुखी कर रहे हो।इतनी मेहनत करके देश का बंटवारा करवाया और इसका श्रेय अभी तक अकेले एन्ज्वाय किया । अब तुम इसमें भी नेहरू-पटेल को शामिल करने लगे ?
साठ साल तो उस घटना के हुए होंगे , पर सठियाने आप लगे। क्या विडम्बना है आपकी भी। अभी चार पांच साल ही हुए होंगे, आपके दल के बहुत बड़े सदस्य के खिलाफ वह जिन्न उभरा था। पब्लिक को पता है, याद भी है। तब भी कुछ ऐसा ही हुआ था।उन्हें अपना सिर देकर जान बचानी पड़ी थी। अब भला जिन्न का मारा कहां तक संभले ? फिर भी आप जिन्न को छेड़ गए! वैसे वह जिन्न है तो शरीफ। यहां उसकी बुराई करो तो आपको पूछेगा भी नहीं, और बड़ाई की और गए। महोदय, आपने तो हद ही कर दी। बड़ाई को कौन कहे आप तो पूरी किताब लिख गए। छपवा भी ली और भाइयों को पढ़वा भी दी । अब होना तो यही था। घर तो आपका पहले से ही भुरभुरा हो रहा था। खंडहर जैसी दशा में आने वाला था, जिन्न और आपने छोड़ दिया- वह भी पड़ोसी का । पड़ोसी वैसे भी किसी जिन्न से कम नहीं होता, यह तो पूरा जिन्ना ही था।
खैर, इस उमर में जिन्न आपका बिगाड़ ही क्या लेगा ? किताब तो आपकी आ ही गई । हंस बिरादरी में आप शामिल हो ही गए हैं । इस उम्र में ही लेखकों को साहित्य के बडे-बड़े पुरस्कार मिलते हैं। लह- बन जाए तो साहित्य का नोबल पुरस्कार भी मिल सकता है। एक पुरस्कार ऐसा आया नहीं कि आप को फिर यही घरवाले सिर पर बिठाकर घूमेंगे। पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति की जैसी कद्र अपने देश में होती है वैसी और कहीं नहीं।
मुझे तो खुशी इस बात की हो रही है कि अभी भी इस देश में लोग किताबें पढ़ते है। अगर पढ़ते नही तो इतना बवाल कहां से होता ।परिचर्चा भी करते हैं लोग और एक्शन भी लिया जाता है। राजनैतिक दल इतने दृढ़ और नैतिक हैं कि अपनी विचारधारा के उलट जाने वाले को फौरन दंड भी देते हैं। यह बात अलग है कि यह सब पड़ोसी देश के बड़े जिन्न यानी जिन्ना की रूह के प्रभाव में होता है।

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अबकी बारिश में ये शरारत….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 10, 2009

 

सलाहू इन दिनों दिल्ली से बाहर है. किसी मुकद्दमे के सिलसिले में कोलकाता गया हुआ है. भगवान जाने किस जजमान (चाहें तो उसकी भाषा में मुवक्किल कह लें) को कात रहा है, वह भी मोटा या महीन. अच्छे दोस्त न हों तो आप जानते ही हैं दुश्मनों की कमी खलने लगती है. कल वह मिल गया जीमेल के चैटबॉक्स में. इस वर्चुअल युग में असली आधुनिक तो आप जानते ही हैं, वही है जो बीवी तक से बेडरूम के बजाय चैट रूम में मिले. ख़ैर अपन अभी इतने आधुनिक हुए नहीं हैं, हां होने की कोशिश में लगे ज़रूर हैं. काफ़ी दिनों बाद मुलाक़ात हुई थी. सो पहले हालचाल पूछा. इसके बावजूद कि उसकी चाल-चलन से मैं बख़ूबी वाक़िफ़ हूं और ऐसी चाल चलन के रहते किसी मनुष्य के हाल ठीक होने की उम्मीद करना बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे ईवीएम और पार्टी प्रतिबद्ध चुनाव आयुक्त के होते हुए निष्पक्ष चुनाव और उसके सही नतीजों का सपना देखने की हिमाक़त दिनदहाड़े करना. चूंकि दुनिया वीरों से ख़ाली नहीं है, लिहाजा मैं भी कभी-कभी ऐसी हिमाकत कर ही डालता हूं.

सो मैंने हिमाकत कर डाली और छूटते ही पूछ लिया, ‘और बताओ क्या हाल है?’

‘हाल क्या है, बिलकुल बेहाल है.’ सलाहू का जवाब था, ‘और बताओ वहां क्या हाल है? तुम कैसे हो?’

‘यहां तो बिलकुल ठीक है’, मैंने जवाब दिया,’और मैं भी बिलकुल मस्त हूं.’

‘अच्छा’ उसने ऐसे लिखा जैसे मेरे अच्छे और मस्त होने पर उसे घोर आश्चर्य हुआ. गोया ऐसा होना नहीं चाहिए, फिर भी मैं हूं. उसका एक-एक अक्षर बता रहा था कि अगर वह भारत की ख़ानदानी लोकतांत्रिक पार्टी की आका की ओर से प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया होता तो अभी मेरे अच्छे और मस्त होने पर ऐसा टैक्स लगाता कि मेरी आने वाली सात पीढियां भरते-भरते मर जातीं और तब भी उसकी किस्तें क्रेडिट कार्ड के कर्ज की तरह कभी पूरी तरह चुक नहीं पातीं.

‘ये बताओ, वहां कुछ बरसात-वरसात हुई क्या?’उसने पूछा.

‘हां हुई न!’ मैंने जवाब दिया, ‘अभी तो कल रात ही हुई है. और वहां क्या हाल है?’

‘अरे यार यहां तो मत पूछो. बेहाल है. नामो-निशान तक नहीं है बरसात का.’

‘क्या बात करते हो यार! अभी तो मैंने आज ही टीवी में देखा है कि कोलकाता में क़रीब डेढ़ घंटे तक झमाझम बारिश हुई है!’ मैंने उसे बताया.

‘तुम मीडिया वाले भी पता नही कहां-कहां से अटकलपच्चू ख़बरें ले-लेकर आ जाते हो.’ उसने मुझे लताड़ लगाई, ‘ ऐसे समय में जबकि ज़ोरों की बारिश होनी चाहिए कम-से-कम तीन-चार दिन तक तो एकदम लगातार, तब डेढ़ घंटे अगर बारिश हो गई तो उसे कोई बारिश माना जाना चाहिए?’

अब लीजिए इन जनाब को डेढ़ घंटे की बारिश कोई बारिश ही नहीं लगती. इन्हें कम-से-कम तीन-चार दिनों की झमाझम बारिश चाहिए और वह भी लगातार. ‘भाई बारिश तो यहां भी उतनी ही हुई है. बल्कि उससे भी कम, केवल आधे घंटे की. तो भी मैं तो ख़ुश हूं कि चलो कम-से-कम हुई तो. और तुम डेढ़ घंटे की बारिश को भी बारिश नहीं मानते?’

‘अब तुम्हारे जैसे बेवकूफ़ चाहें तो केवल बादल देखकर भी ख़ुश हो सकते हैं और लगातार मस्त बने रह सकते हैं.’

‘सकते क्या हैं, बने ही रहते है. देखो भाई, ख़ुश रहना भी एक कला है, बिलकुल वैसे ही जैसे जीवन जीना एक कला है. जिन्हें जीने की कला आ जाती है उन्हें काला हांडी में अकाल नहीं दिखाई देता, अकाल राहत के प्रयास दिखाई देते हैं. उन्हें उस प्रयास के बावजूद पेट की खाई भरने के लिए अपने बच्चे बेचते लोग दिखाई नहीं देते, राहतकार्यों के लिए आए बजट से न केवल अपनी, बल्कि अपने रिश्तेदारों, भाई-भतीजों, दोस्तों और इक्के-दुक्के पड़ोसियों तक की ग़रीबी को बंगाल की खाड़ी में डुबे आते लोग दिखाई देते हैं. जिन्हें वह कला आती है, उन्हें बाढ़ राहत में धांधली नहीं, राहत कोश से अफ़सरों और मंत्रियों के भरते घर दिखाई देते हैं. उन्हें ईवीएम में गड़बड़ी पर फ़ैसला कोर्ट का नहीं, चुनाव आयोग का काम दिखाई देता है. ठीक वैसे ही जिन्हें यह कला आती है, वे डेढ़ घंटे  की  बारिश की निन्दा नहीं करते, बादल देखकर भी प्रसन्न हो जाते हैं.’

‘तो रहो प्रसन्न.’ उसने खीज कर लिखा.

‘हां, वो तो मैं हूं ही.’ मैंने उसे बताया, ‘तुम्हें शायद मालूम नहीं इतनी ग़रीबी और तथाकथित बदहाली के बावजूद दुनिया में खुशी के इंडेक्स पर भारत का तीसरा नम्बर है. जीवन जीने की कला के मामले में पूरी दुनिया हम भारतीयों का लोहा मानती है. जानते हो कैसे?’

‘कैसे?’

‘ऐसे कि ऐसे केवल हमीं हैं जो नेताओं से सिर्फ़ वादे सुनकर ख़ुश हो जाते हैं. उन्हे निभाने की उम्मीद तो हमारे देश की जनता कभी ग़लती से भी नहीं करती है. ऐसे समय में जबकि पूरा देश महंगाई और बेकारी से मर रहा हो, हम धारा 377 पर बहस करने में लग जाते हैं. अगर कोई न भी लगना चाहे इस बहस में और वह महंगाई-बेकारी की बात करना चाहे तो हमारे बुद्धिजीवी उसकी ऐसी गति बनाते हैं कि बेचारा भकुआ कर ताकता रह जाता है. गोया अगर वह गे या लेस्बी नहीं है, तो उसका इस जगत में होना ही गुनाह है.’

‘हुम्म!’ बड़ी देर बाद सलाहू ने ऐसे हुम्म की जैसे  कोई मंत्री किसी योजना की 90 परसेंट रकम डकारने के बाद 10 परसेंट अपने चमचों के लिए टरका देता है.

‘अब बरसात का मामला भी समझ लो कि कुछ ऐसा ही है.’ मैंने उसे आगे बताना शुरू किया, ‘तुम्हें याद है न हमारे एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे. वह भी खानदानी तौर पर प्रधानमंत्री बनने की व्याधि से पीड़ित थे. इसके बावजूद उन्होंने कहा था कि हम जब किसी योजना के तहत 100 रुपये की रकम जनता के लिए जारी करते हैं तो उसमें से 85 तो पहले ही ख़त्म हो जाते हैं. मुश्किल से 15 पहुंच पाते हैं जनता तक.’

‘हुम्म!’ उसने चैटबॉक्स में लिखा और मुझे उसकी मुंडी हिलती हुई दिखी.

‘अब वह स्वर्गीय हो चुके हैं, ये तो तुम जानते ही हो.’ मैंने उसे बताया और उसने फिर चैट बॉक्स में हुंकारी भरी. तो मैंने आगे बताया, ‘तुमको यह तो पता ही होगा कि बड़े लोग प्रेरणास्रोत होते हैं. असली नेता वही होता है, जो देश ही नहीं, पूरी दुनिया की जनता को अपने बताए रास्ते पर चलवा दे.’

उसने फिर हुंकारी भरी तो मैंने फिर बताया, ‘अब देखो, वह अकेले ही तो गए नहीं हैं. उनसे पहले भी तमाम लोग वहां जा चुके थे और बाद में भी बहुत लोग गए हैं. वे सारे आख़िर वहां कर क्या रहे हैं! वही कला अब उन्होंने स्वर्ग के कारिन्दों को भी सिखा दी है. लिहाजा बारिश के साथ भी अब ऐसा ही कुछ हो रहा है. इन्द्र देवता बारिश का जो कोटा तय करके रिलीज़ कर रहे हैं उसमें से 90 परसेंट तो वहीं बन्दरबांट का शिकार हो जा रहा है. वह स्वर्ग के अफ़सरों और अप्सराओं के खाते में ही चला जा रहा है. जो 10 परसेंट बच रहा है, वह जैसे-तैसे धरती तक आ रहा है.’

‘तो क्या अब इतने में ही हम प्रसन्न रहें.’ उसने ज़ोर का प्रतिवाद दर्ज कराया.

‘हां! रहना ही पड़ेगा बच्चू!’ मैंने उसे समझाया, ‘न रहकर सिर्फ़ अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाने के अलावा और कर भी क्या सकते हो? जब धरती पर एक लोकतांत्रिक देश में हो रही अपने ही संसाधनों की बन्दरबांट पर हम-तुम कुछ नहीं कर सके तो स्वर्ग से हो रही बन्दरबांट पर क्या कर लेंगे?’

पता नहीं सलाहू की समझ में यह बात आई या नहीं, पर उसने इसके बाद चैटबॉक्स में कुछ और नहीं लिखा. अगर आपको लगता है कि कुछ कर लेंगे तो जो भी कुछ करना मुमकिन लगता हो वही नीचे के कमेंट बॉक्स में लिख दें.

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क्यों न रोएँ ?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 13, 2009

शीर्षक पढ़ते ही आपने मुझे निराशावादी मान लिया होगा। किसी तरह कलेजा मजबूत करके मैं कह सकता हूँ कि मैं निराशावादी नहीं ,आशावादी हूँ। पर मेरे या आपके ऐसा कह देने से इस प्रश्न का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। सच तो यह है कि आशावाद के झूठे सहारे हम अपने जीवन का एक बडा हिस्सा निकाल लेते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पर आंसू भी कम बलवान नहीं होते और कई बार हम अपने आंसुओं को दबाने के असफल प्रयास में भी रो पड़ते हैं। चलिए, माना हमें रोना नहीं चाहिए, लेकिन क्या इतना कह देने से रोने की स्थितियां उलट जाएंगी ?क्या हर भोले-भाले और निर्दोष चेहरे पर असली हँसी आ जाएगी ?
कहाँ से शुरू करें ?अभी कल की बात है, बाजार गया था। किराने की एक बड़ी सी दूकान पर एक मजदूर ने दाल का भाव पूछा। चैरासी रुपये किलो! बेचारे का चेहरा उतर गया। “पाव कितने की हुई ?”इक्कीस रुपये। डरता हुआ सा वह धीरे से वापस चला गया। मैं सोचने को विवश हो गया कि आज वह परिवार क्या खाएगा? कई दिनों बाद सौ रुपये की दिहाड़ी लगाने वाला मजदूरकिस कलेजे से अपनी ”आय” का एक चैथाई एक वक्त की दाल पर खर्च कर देगा ? अब दाल रोटी से नीचे क्या है! शायद नमक रोटी ! धीरे-धीरे नमक पर भी गाज गिरने लगी है । खुला नमक प्रतिबन्धित हो गया है। हानिकारक होता है ! घेंघा की बीमारी हो जाती है। हमें आपके स्वास्थ्य की चिन्ता है। आपको आयोडीन नमक खाना ही होगा, वरना आपके बच्चे मन्दबुद्धि पैदा होंगे। आयोडीन नमक पैकेट बन्द मिलता है । यह बात अलग है कि इस नमक पर बेचारे को दिहाड़ी का दस प्रतिशत खर्च करना पड़ता है। अब बेचारा नमक भी कहां से लाए? प्रेम चोपड़ा का एक डायलाग याद आता है- नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या ?
विडम्बना तो यह है कि हमें उसके इस जीवन से भी जलन है। लाखों का टैक्स चोरी करने वाला “सभ्य ” नागरिक भी परेशान है, उसे मजदूर का “सुख चैन” देखा नहीं जाता- हमसे तो अच्छा मजदूर ही है,कल की चिन्ता नहीं। दाल रोटी खाकर चैन से सोता तो है! चलो भाई , नहीं खाएगा दाल रोटी।
सरकार बहुत सक्रिय है। उसने नरेगा( रोजगार गारंटी अधिनियम) बना दिया है। अब सारा हिन्दुस्तान सुखी होगा, सबको रोजगार जो मिल गया! फिर भी लोगों को लग रहा है कि महंगाई बढ़ रही है जबकि इसका कोई प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है।सारे सूचकांक नीचे गिरे पड़े हैं। रेपो रेट भी घट गया है। मुद्रास्फीति गिरकर कहां गई, पता ही नहीं लग रहा! अभी जून के आखिरी सप्ताह में महंगाई दर शून्य से भी नीचे चली गई थी और आप कह रहे हैं कि महंगाई बढ़ रही है ?पब्लिक झूठ बोलती है। उसे सब कुछ फ्री चाहिए। हमारा थर्मामीटर नहीं बता रहा कि आपको बुखार है तो कैसे मान लें ? आपका शरीर तप रहा हो तो आप जानें। आप रो नहीं रहे, आप नखरे कर रहे हैं। आप निराशावादी लगते हैं।
बड़े लोग हमेशा से कल्याण में लगे हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा, आयोडीन से आप की सेहत सुधारी ,आपके लिए इन्होंने और भी कल्याणकारी काम किया। आपको याद न हो,ये बात अलग है । आपको भूलता भी तो बहुत जल्दी है! जहां आयोडीन खिलाकर आपको घेंघा से मुक्ति दिलाई और आपका बुद्धिवर्धन किया, वहीं कॅन्डोम की बिक्री बढ़ाकर आपको एड्स से बचाकर नया जीवन दिया। एड्स अच्छा आया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कॅन्डोम अपने देश में आया ।बच्चा बच्चा एड्स के बारे में जान गया है।खुल के जियो, खुल के बात करो , खुल के यूज करो।रब जाने कब जरूरत पड़ जाए। उपलब्धता की गारंटी बढ़ा दी गई है। हर सार्वजनिक शौचालय पर जोश स्पॉट है। हमेशा जोश में रहो!
ददुआ को मारने में भले ही बावन घंटे लग जाएं, रणवीर सिंह (देहरादून इंकाउंटर मामले का शिकार ) को मार गिराने में बावन मिनट भी नहीं लगते!इसमें हमारा प्रषासन बड़ा तेज है।अब गाजियाबाद के उस परिवार के आँसू देखकर भी हमें नहीं रोना चाहिए।ऐसी छोटी मोटी घटनाएं तो होती ही रहती हैं। ये मैं नहीं कह रहा हूं ,एक बड़े नेता ने कहा था।
इसी से एक बात और याद आई। हमारे राज्य हमारी निजी सम्पत्ति हैं।बिना हमारे वीजा के आप यहां कैसे आ गए ? वह भी घूमने फिरने नहीं, नौकरी करने ?
जैसे तैसे जी भी रहे थे,पर ये टीवी न्यूज चैनल वाले जीने नहीं देते । डराते रहते हैं। पता नहीं कहां कहां से खबर जुटाते रहते हैं। जिसे घी समझ के खा लेते थे और बलवान होने का भ्रम पालकर खुश हो लेते थे, उसे इन्होंने यूरिया और सर्फ का अवलेह सिद्ध कर दिया, दूध को पेण्ट का उत्पाद साबित कर दिया। हमने भी अच्छा धंधा अपना लिया है। मैं आपको नकली घी दूध बेच दूं , आप मुझे नकली दवाई बेच देना। हिसाब बराबर! पर वो बेचारा गरीब क्या बेचेगा ? हाँ, याद आया, उसके पास गुरदा है। वो अपना गुरदा बेच देगा। दो चार दिन के लिए ये वाली दाल और पैकेट वाला नमक तो मिल ही जाएगा !रोएगा तो कौन सी नई बात ? और वह है किस लिए ?
अभी तो और भी समस्याएं हैं।हमें यौन शिक्षा लागू करनी है। बिजली पानी मिले न मिले , गे कल्चर वालों को सुविधाएं उपलब्ध करवानी है। अमेरिका की बराबरी करनी है हमें। एम जे की मौत पर मरने वालों को ढांढस बधाना है। वे भी तो बेचारे रो रो के लार बार हुए जा रहे हैं। आपको तो बस महंगाई और व्यवस्था की पड़ी है!
मैंने बहुत सोचा कि न रोऊँ इन हालात पर। पर मन यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि हालात रोने के नहीं हैं ।सोचता हूँ काश! हम इन मुद्दों पर एक बूंद आंसू बहा सकते!

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Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 1, 2009

——— गतांक से जारी —- समापन किश्त

एक अन्य महत्त्वपूर्ण विभाग जिसका निजीकरण किया गया , वह था पुलिस विभाग। सरकार ने देखा कि तनख्वाह बढ़ाने के बाद भी अपराधों में कमी नहीं आई है तो निजीकरण का मन बन ही गया। पुलिस की कमाई बढ़ाने के लिए न जाने कितने नियम बनाए गए, कितन प्रशिक्षण दिया गया, परन्तु परिणाम ढाक के वही तीन पात! अन्ततः निजीकरण हो ही गया। एक झटका तो लगा पुलिस को, लेकिन संभल गई। सरकार तनख्वाह ही तो नहीं देगी! पहले ही कौन सा खर्च चल जाता था? हाँ,यही न कि आयकर रिटर्न भरना आसान हो जाता था। असली साधन तो कानून था, वह तो अभी भी हाथ में दे ही रखा है। निजीकरण के बाद विभाग में व्यापक परिवर्तन हुए। चहुँओर शान्ति छा गई ।अब उपभोक्ता वाद के मज़े आने लगे! police ने अनेक प्रकार के शुल्क निर्धारित कर दिए, यथा-सुरक्षा शुल्क, पिटाई शुल्क , षिष्टाचार शुल्क आदि। सुरक्षा शुल्क वह शुल्क था जो सम्मानित नागरिक चोर-डाकुओं से सुरक्षित रहने के लिए जमा कराते। यह अनिवार्य शुल्क था। सम्मान शुल्क जमा कराने वाला नागरिक पुलिस की गाली अकारण प्राप्त करने से बच सकता था। विशेष सम्मान शुल्क दाता नागरिक पुलिस वालो से सम्मान भी पाता और पुलिस उत्सवों में भी बुलाया जाता। अनादर शुल्क ,पिटाई शुल्क ,गाली शुल्क , जमा कराके कोई नागरिक अपने इच्छित व्यक्ति का अनादर या पिटाई इत्यादि करा सकता था। इसके अलग- अलग ग्रेड थे।ये शुल्क सुरक्षा एवं सम्मान शुल्क से अधिक थे। यदि कोई सम्मान या षिष्टाचार शुल्क दाता का अपमान कराना चाहता तो उसे ऊँची धन rashi जमा करानी पड़ती। ऐसी स्थिति में वांछित व्यक्ति को सूचित किया जाता। सूचना में पुलिस इस बात का उल्लेख करती कि उक्त व्यक्ति पर कितनी धनराषि लगाई गई है। सम्मानित व्यक्ति उससे अधिक शुल्क जमा कराकर इस प्रकार के दंड से बच सकता था। प्रयोग सफल रहा।न कहीं चोर ,न कहीं डाकू।न दंगे न फसाद!एक – एक कर हर विभाग का निजीकरण कर दिया गया।आमदनी कम हो गई तो विष्वबैंक से कर्ज लेकर सांसदों- विधायकों का खर्च चलाया गया। pradesh सरकारों का निजीकरण किया गया।आज वह ऐतिहासिक दिन भी आ गया कि केन्द्रीय सरकार का भी निजीकरण विज्ञापित हो गया है। निविदाएँ भरी जाएंगी, बोली लगेगी, निजीकरण होगा पर घसीटा दास ,कुछ अन्य लोगों सहित मेरी भी ishwar से यही प्रार्थना है कि बोली किसी नेता के नाम न छूटे!

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Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 29, 2009

…….गतांक से आगे
दूसरा महत्त्वपूर्ण निजीकरण शिक्षा का हुआ। सरकारी स्कूलों में कथित रूप से घोर भ्रष्टाचार फैला हुआ था। यद्यपि परिणाम प्रतिशत फेल विद्यार्थियों का ही अधिक होता ,फिर भी कुछ तो उत्तीर्ण हो ही जाते।यही उत्तीर्ण छात्र आगे चलकर बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि करते और देश की प्रतिष्ठा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गिरती। न ढंग के कपड़े,न कापी न किताब,न तरीका। आखिर कब तक ढोए सरकार! सारे स्कूल ’पब्लिक स्कूल ’ हो गए।शिक्षा का स्तरोन्नयन हो गया।हाँ,अपवाद स्वरूप् कुछ राजकीय विद्यालय बचे रह गए थे। वस्तुतः इन स्कूलों का परीक्षा परिणाम अन्य विद्यालयों की तुलना में बहुत ऊँचा रह गया था। फलतः शिक्षकों एवं अभिभावकों ने आंदोलन कर दिया। बापू की समाधि पर धरना दे दिया। सरकार को झुकना पड़ा। समझदारी से काम लेना पड़ेगा। उन विद्यालयों के निजीकरण का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। उन दिनों सरकार के पास ठंडा बस्ता नामक एक अज्ञात एवं अतिगोपनीय उपकरण हुआ करता था। यह ठंडा बस्ता अलादीन के जादुई चिराग से भी चमत्कारी था। जब भी कोई राष्ट्रीय महत्त्व का मामला होता और सरकार उसे लटकाना चाहती तो उसे ठंडे बस्ते में डाल देती। वह उसी में पड़ा रहता। जब पुनः आवश्यकता होती या आम चुनाव आते, सरकार ठंडे बस्ते का मुँह खोलती और उस मामले को बाहर निकाल लेती। आवश्यकता पूर्ति होने पर मामला पुनः ठंडे बस्ते में। आवश्यक यह था कि किसी प्रकार ऐसे विद्यालयों का परिणाम भी शून्य के स्तर तक लाया जाए।अस्तु, तमाम योग्य एवं अनुभवी अध्यापकों को वर्ष पर्यन्त दूसरे विभागों मे उपनियुक्त का दिया गया।अधिकाँश को मच्छरों की विभिन्न प्रजातियों की गणना में लगा दिया जिससे मच्छरजन्य बीमारियों से मुक्ति मिल सके। कुछ को टाइम- बेटाइम होने वाले चुनावों में लगा दिया गया। अब विद्यालय में वही अध्यापक बचे जो अध्यापक बने नहीं ,बनाए गए थे। यद्यपि इस प्रक्रिया में तीन वर्ष लगे ,परन्तु ऐसी स्थिति अवश्य आ गई कि इन विद्यालयों का निजीकरण निर्विरोध किया जा सके। निजी उर्फ पब्लिक स्कूलों ने शिक्षा को पहली बार आर्थिक आयाम प्रदान किया। राष्ट्रीय शिक्षा अधिनियम 1660 के नियमों ,उपनियमों एवं विनियमों में संशोधन किया । नई धाराएं ,उपधाराएं जोड़ी गई। प्रवेश नियम तार्किक एवं संगत बनाए गए।कुछ उल्लेखनीय नियम निम्नवत हैं-
प्रवेश 1- प्रवेश उसी छात्र या छात्रा को दिया जाएगा जिनके अभिभावकों के पास वैध पासपोर्ट एवं वीजा होगा। यह नितान्त आवश्यक है कि छात्र- छात्रा अपने अभिभावकों के साथ प्रत्येक महाद्वीप के कम से कम एक देश की यात्रा कर चुके हों।
2- छात्र-छात्रा के माता-पिता आयकर जमा करते हों और उसका विवरण देने को तैयार हों।
3-छात्र-छात्रा माता पिता की इकलौती संतान हो।यदि किसी अभिभावक के एक से अधिक सन्तान हो तो उसे दोगुना शुल्क जमा कराना होगा।
4- छात्र/छात्रा के दादा-दादी अनिवार्य रूप से छात्र/छात्रा के साथ न रहते हों ।
5-छात्र/छात्रा को अनिवार्य रूप से अंगरेजी में पेशाब करना आता हो। हिन्दी माध्यम में पेशाब करना अयोग्यता होगी।
परीक्षा – 1-प्रत्येक विद्यार्थी की प्रतिदिन परीक्षा ली जाएगी।
2- हर परिस्थिति में परीक्षा में सम्मिलित होना अनिवार्य होगा।दैनिक परीक्षा में पूर्णतः या आंशिक रूप से अनुपस्थित होने वाले छात्र/ छात्रा वर्तमान कक्षा से तीन कक्षा पीछे कर दिए जाएंगे।
3- परीक्षा शुल्क प्रश्न पत्र में मुद्रित प्रश्नों की संख्या के अनुसार अग्रिम लिया जाएगा।ऐसे विद्यार्थी जिनका शुल्क जमा नहीं होगा,उनके प्रश्नोत्तर अवैध माने जाएंगे और अंक निर्धारण परीक्षक के विवेकानुसार किया जाएगा। ऐसी दशा में एक गणित अध्यापक दो दूनी चार मानने को बाध्य नहीं होगा। सम्पूर्ण जिम्मेवारी अभिभावक की होगी।
ऐसे न जाने कितने नियम थे। अनुशासन एवं कार्यव्यवहार के नियम तो सर्वथा आदर्श थे। प्रवेश के समय ही अभिभावक से हजारों रुपये के स्टाम्प पेपर पर अनुबन्ध एवं घोषणापत्र भरवाए जाते थे। कोई भी अभिभावक अपनी संतान से विद्यालय कार्यावधि मे किसी भी परिस्थिति में मिल नही सकता था। माह में एक बार वह विद्यालय में आ सकता था। विद्यालय के प्रवेश द्वार पर दरवाजे में छोटे-छोटे छेद बनाए गए थे जिसमें से वह पांच सेकेण्ड तक अपने पुत्र या पुत्री को झांक सकता था।विद्यालय में दूरबीन सुविधा भी थी जिसका उपयोग एक हजार रुपये जमा कर एक मिनट तक संतान दर्शनाथ किया जा सकता था। एक बार प्रवेश मिल जाने पर छात्र/छात्रा को बारहवीं तक उसी स्कूल में पढ़ना पड़ता था। किसी भी परिस्थिति में उसे निकाल कर दूसरे स्कूल में नहीं पढ़ाया जा सकता था।यदि शिक्षा के दौरान ही छात्र की मृत्यु हो जाए तो उसे विद्यालय के श्मशान में सम्मान के साथ दफना दिया जाता।वहाँ हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध थीं-चिकित्सालय,बुक शॉप ,पेन्सिल शॉप , यूनिफार्म शॉप , कैफे, रेस्टोरेण्ट आदि -आदि।
………. आगे जारी …….

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