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Archive for the ‘saahity’ Category

शहनाई भी होएगी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 4, 2009

रतन

फूलों की महकेगी खुशबू
पुरवाई भी होएगी
तारों की बारातें होंगी
शहनाई भी होएगी

पतझड़ बाद बसंती मौसम
का आना तय है जैसे
दर्द सहा है तो कुछ पल की
रानाई भी होएगी

कोई नहीं आया ऐसा जो
रहा सिकंदर उम्र तलक
इज्जत होगी शोहरत के संग
रुसवाई भी होएगी

तन्हा रहते गुमसुम गुमसुम
पर यह है उम्मीद हमें
कुछ पल होगा साथ तुम्हारा
परछाई भी होएगी

मैंने जाना जीवन-दुनिया
सब कुछ आनी-जानी है
सुख का समंदर भी गुजरेगा
तनहाई भी होएगी

Posted in Hindi Literature, kavita, poetry, saahity | 5 Comments »

अबकी बारिश में ये शरारत….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 10, 2009

 

सलाहू इन दिनों दिल्ली से बाहर है. किसी मुकद्दमे के सिलसिले में कोलकाता गया हुआ है. भगवान जाने किस जजमान (चाहें तो उसकी भाषा में मुवक्किल कह लें) को कात रहा है, वह भी मोटा या महीन. अच्छे दोस्त न हों तो आप जानते ही हैं दुश्मनों की कमी खलने लगती है. कल वह मिल गया जीमेल के चैटबॉक्स में. इस वर्चुअल युग में असली आधुनिक तो आप जानते ही हैं, वही है जो बीवी तक से बेडरूम के बजाय चैट रूम में मिले. ख़ैर अपन अभी इतने आधुनिक हुए नहीं हैं, हां होने की कोशिश में लगे ज़रूर हैं. काफ़ी दिनों बाद मुलाक़ात हुई थी. सो पहले हालचाल पूछा. इसके बावजूद कि उसकी चाल-चलन से मैं बख़ूबी वाक़िफ़ हूं और ऐसी चाल चलन के रहते किसी मनुष्य के हाल ठीक होने की उम्मीद करना बिलकुल वैसी ही बात है, जैसे ईवीएम और पार्टी प्रतिबद्ध चुनाव आयुक्त के होते हुए निष्पक्ष चुनाव और उसके सही नतीजों का सपना देखने की हिमाक़त दिनदहाड़े करना. चूंकि दुनिया वीरों से ख़ाली नहीं है, लिहाजा मैं भी कभी-कभी ऐसी हिमाकत कर ही डालता हूं.

सो मैंने हिमाकत कर डाली और छूटते ही पूछ लिया, ‘और बताओ क्या हाल है?’

‘हाल क्या है, बिलकुल बेहाल है.’ सलाहू का जवाब था, ‘और बताओ वहां क्या हाल है? तुम कैसे हो?’

‘यहां तो बिलकुल ठीक है’, मैंने जवाब दिया,’और मैं भी बिलकुल मस्त हूं.’

‘अच्छा’ उसने ऐसे लिखा जैसे मेरे अच्छे और मस्त होने पर उसे घोर आश्चर्य हुआ. गोया ऐसा होना नहीं चाहिए, फिर भी मैं हूं. उसका एक-एक अक्षर बता रहा था कि अगर वह भारत की ख़ानदानी लोकतांत्रिक पार्टी की आका की ओर से प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया होता तो अभी मेरे अच्छे और मस्त होने पर ऐसा टैक्स लगाता कि मेरी आने वाली सात पीढियां भरते-भरते मर जातीं और तब भी उसकी किस्तें क्रेडिट कार्ड के कर्ज की तरह कभी पूरी तरह चुक नहीं पातीं.

‘ये बताओ, वहां कुछ बरसात-वरसात हुई क्या?’उसने पूछा.

‘हां हुई न!’ मैंने जवाब दिया, ‘अभी तो कल रात ही हुई है. और वहां क्या हाल है?’

‘अरे यार यहां तो मत पूछो. बेहाल है. नामो-निशान तक नहीं है बरसात का.’

‘क्या बात करते हो यार! अभी तो मैंने आज ही टीवी में देखा है कि कोलकाता में क़रीब डेढ़ घंटे तक झमाझम बारिश हुई है!’ मैंने उसे बताया.

‘तुम मीडिया वाले भी पता नही कहां-कहां से अटकलपच्चू ख़बरें ले-लेकर आ जाते हो.’ उसने मुझे लताड़ लगाई, ‘ ऐसे समय में जबकि ज़ोरों की बारिश होनी चाहिए कम-से-कम तीन-चार दिन तक तो एकदम लगातार, तब डेढ़ घंटे अगर बारिश हो गई तो उसे कोई बारिश माना जाना चाहिए?’

अब लीजिए इन जनाब को डेढ़ घंटे की बारिश कोई बारिश ही नहीं लगती. इन्हें कम-से-कम तीन-चार दिनों की झमाझम बारिश चाहिए और वह भी लगातार. ‘भाई बारिश तो यहां भी उतनी ही हुई है. बल्कि उससे भी कम, केवल आधे घंटे की. तो भी मैं तो ख़ुश हूं कि चलो कम-से-कम हुई तो. और तुम डेढ़ घंटे की बारिश को भी बारिश नहीं मानते?’

‘अब तुम्हारे जैसे बेवकूफ़ चाहें तो केवल बादल देखकर भी ख़ुश हो सकते हैं और लगातार मस्त बने रह सकते हैं.’

‘सकते क्या हैं, बने ही रहते है. देखो भाई, ख़ुश रहना भी एक कला है, बिलकुल वैसे ही जैसे जीवन जीना एक कला है. जिन्हें जीने की कला आ जाती है उन्हें काला हांडी में अकाल नहीं दिखाई देता, अकाल राहत के प्रयास दिखाई देते हैं. उन्हें उस प्रयास के बावजूद पेट की खाई भरने के लिए अपने बच्चे बेचते लोग दिखाई नहीं देते, राहतकार्यों के लिए आए बजट से न केवल अपनी, बल्कि अपने रिश्तेदारों, भाई-भतीजों, दोस्तों और इक्के-दुक्के पड़ोसियों तक की ग़रीबी को बंगाल की खाड़ी में डुबे आते लोग दिखाई देते हैं. जिन्हें वह कला आती है, उन्हें बाढ़ राहत में धांधली नहीं, राहत कोश से अफ़सरों और मंत्रियों के भरते घर दिखाई देते हैं. उन्हें ईवीएम में गड़बड़ी पर फ़ैसला कोर्ट का नहीं, चुनाव आयोग का काम दिखाई देता है. ठीक वैसे ही जिन्हें यह कला आती है, वे डेढ़ घंटे  की  बारिश की निन्दा नहीं करते, बादल देखकर भी प्रसन्न हो जाते हैं.’

‘तो रहो प्रसन्न.’ उसने खीज कर लिखा.

‘हां, वो तो मैं हूं ही.’ मैंने उसे बताया, ‘तुम्हें शायद मालूम नहीं इतनी ग़रीबी और तथाकथित बदहाली के बावजूद दुनिया में खुशी के इंडेक्स पर भारत का तीसरा नम्बर है. जीवन जीने की कला के मामले में पूरी दुनिया हम भारतीयों का लोहा मानती है. जानते हो कैसे?’

‘कैसे?’

‘ऐसे कि ऐसे केवल हमीं हैं जो नेताओं से सिर्फ़ वादे सुनकर ख़ुश हो जाते हैं. उन्हे निभाने की उम्मीद तो हमारे देश की जनता कभी ग़लती से भी नहीं करती है. ऐसे समय में जबकि पूरा देश महंगाई और बेकारी से मर रहा हो, हम धारा 377 पर बहस करने में लग जाते हैं. अगर कोई न भी लगना चाहे इस बहस में और वह महंगाई-बेकारी की बात करना चाहे तो हमारे बुद्धिजीवी उसकी ऐसी गति बनाते हैं कि बेचारा भकुआ कर ताकता रह जाता है. गोया अगर वह गे या लेस्बी नहीं है, तो उसका इस जगत में होना ही गुनाह है.’

‘हुम्म!’ बड़ी देर बाद सलाहू ने ऐसे हुम्म की जैसे  कोई मंत्री किसी योजना की 90 परसेंट रकम डकारने के बाद 10 परसेंट अपने चमचों के लिए टरका देता है.

‘अब बरसात का मामला भी समझ लो कि कुछ ऐसा ही है.’ मैंने उसे आगे बताना शुरू किया, ‘तुम्हें याद है न हमारे एक प्रधानमंत्री हुआ करते थे. वह भी खानदानी तौर पर प्रधानमंत्री बनने की व्याधि से पीड़ित थे. इसके बावजूद उन्होंने कहा था कि हम जब किसी योजना के तहत 100 रुपये की रकम जनता के लिए जारी करते हैं तो उसमें से 85 तो पहले ही ख़त्म हो जाते हैं. मुश्किल से 15 पहुंच पाते हैं जनता तक.’

‘हुम्म!’ उसने चैटबॉक्स में लिखा और मुझे उसकी मुंडी हिलती हुई दिखी.

‘अब वह स्वर्गीय हो चुके हैं, ये तो तुम जानते ही हो.’ मैंने उसे बताया और उसने फिर चैट बॉक्स में हुंकारी भरी. तो मैंने आगे बताया, ‘तुमको यह तो पता ही होगा कि बड़े लोग प्रेरणास्रोत होते हैं. असली नेता वही होता है, जो देश ही नहीं, पूरी दुनिया की जनता को अपने बताए रास्ते पर चलवा दे.’

उसने फिर हुंकारी भरी तो मैंने फिर बताया, ‘अब देखो, वह अकेले ही तो गए नहीं हैं. उनसे पहले भी तमाम लोग वहां जा चुके थे और बाद में भी बहुत लोग गए हैं. वे सारे आख़िर वहां कर क्या रहे हैं! वही कला अब उन्होंने स्वर्ग के कारिन्दों को भी सिखा दी है. लिहाजा बारिश के साथ भी अब ऐसा ही कुछ हो रहा है. इन्द्र देवता बारिश का जो कोटा तय करके रिलीज़ कर रहे हैं उसमें से 90 परसेंट तो वहीं बन्दरबांट का शिकार हो जा रहा है. वह स्वर्ग के अफ़सरों और अप्सराओं के खाते में ही चला जा रहा है. जो 10 परसेंट बच रहा है, वह जैसे-तैसे धरती तक आ रहा है.’

‘तो क्या अब इतने में ही हम प्रसन्न रहें.’ उसने ज़ोर का प्रतिवाद दर्ज कराया.

‘हां! रहना ही पड़ेगा बच्चू!’ मैंने उसे समझाया, ‘न रहकर सिर्फ़ अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाने के अलावा और कर भी क्या सकते हो? जब धरती पर एक लोकतांत्रिक देश में हो रही अपने ही संसाधनों की बन्दरबांट पर हम-तुम कुछ नहीं कर सके तो स्वर्ग से हो रही बन्दरबांट पर क्या कर लेंगे?’

पता नहीं सलाहू की समझ में यह बात आई या नहीं, पर उसने इसके बाद चैटबॉक्स में कुछ और नहीं लिखा. अगर आपको लगता है कि कुछ कर लेंगे तो जो भी कुछ करना मुमकिन लगता हो वही नीचे के कमेंट बॉक्स में लिख दें.

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तो क्या कहेंगे?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 18, 2009

सलाहू आज बोल ही नहीं रहा है. हमेशा बिन बुलाए बोलने वाला आदमी और बिना मांगे ही बार-बार सलाह देने वाला शख्स अगर अचानक चुप हो जाए तो शुबहा तो होगा ही. यूं तो वह बिना किसी बात के बहस पर अकसर उतारू रहा करता है. कोई मामला-फ़साद हुए बग़ैर ही आईपीसी-सीआरपीसी से लेकर भारतीय संविधान के तमाम अनुच्छेदों तक का बात-बात में हवाला देने वाला आदमी आज कुछ भी कह देने पर भी कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हो रहा है. मुझे लगा कि आख़िर मामला क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि माया मेमसाहब द्वारा बापू को नाटकबाज कह देने से उसे सदमा लग गया हो! पर नहीं, इस बारे में पूछे जाने पर उसने मुझे सिर्फ़ देखा भर. ऐसे जैसे कभी-कभी कोई बड़ी शरारत कर के आने पर मेरे

पिताजी देखा करते थे. चुपचाप.

पर मैंने ऐसी कोई शरारत तो की नहीं थी. ज़ाहिर है, इसका मतलब साफ़ तौर पर सिर्फ़ यही था कि ऐसी कोई बात नहीं थी. फिर क्या वजह है? बार-बार पूछने पर भी सलाहू चुप रहा तो बस चुप ही रहा. जब भी मैंने उससे जो भी आशंका जताई हर बात पर वह सिर्फ़ चुप ही रहा. आंखों से या चेहरे से, अपनी विभिन्न भाव-भंगिमाओं के ज़रिये उसने हर बात पर यही जताया कि ऐसी कोई बात नहीं है.

अंततः यह आशंका हुई कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह गूंगा हो गया हो. वैसे भी हमारे समाज में जिह्वा को सरस्वती का वासस्थल माना जाता है और उसने जिह्वा का दुरुपयोग बेहिसाब किया है. मुवक्किलों से लेकर मुंसिफों तक. सरकार से लेकर ग़ैर सरकारी लोगों तक किसी को नहीं छोड़ा था. मुझे लगा क्या पता शब्द जिसे ब्रह्म का रूप कहा जाता है उसने इसका साथ छोड़ दिया हो, नाराज़गी के नाते. पर आत्मा से तुरंत दूसरी बात आई. अगर ऐसा होता तब तो यह बात पहले अपने साथ होनी चाहिए थी. आख़िर शब्दों का व्यापार करते हुए ऐसा कौन सा अपराध है जो शब्दों के ज़रिये अपन ने न किया हो! पर नहीं साहब अपन के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. ऐसा मास्टर के साथ भी नहीं हुआ, जो केवल हिन्दी ही नहीं, संस्कृत और अंग्रेज़ी भाषाओं के साथ भी शब्दों से हेराफेरी करता आ रहा है, पिछले कई वर्षों से. पर ना, उसके साथ भी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

हुआ तो बेचारे सलाहू के साथ. मुझे लगा कि हो न हो, यह किसी रोग वग़ैरह का ही मामला हो. मैं बेवजह पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में फंसा हुआ हूं और हर पढ़े-लिखे आदमी की तरह बेचारे अपने सबसे भरोसेमन्द मित्र के वैज्ञानिक इलाज के बजाय उसके और अपने पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में लग गया हूं. आख़िरकार उसके बार-बार इशारों से मना करने के बावजूद मैं उसे जैसे-तैसे पकड़-धकड़ कर डॉक्टर के पास ले ही गया. लेकिन यह क्या डॉक्टर तो उससे पूछने पर तुला है और है कि बोल ही नहीं पा रहा है. आख़िरकार डॉक्टर ने आजिज आकर पता नहीं कौन सा डर्कोमर्कोग्राम एपीएमवीएनेन कराने के लिए कह दिया. तमाम और डॉक्टरी क्रियाओं की तरह मैने इसका भी नाम तो सुना नहीं था, लिहाजा डॉक्टर से पूछ लेना ही बेहतर समझा कि भाई इसका कितना पैसा लगेगा. लेकिन यह क्या, जैसे ही डॉक्टर ने बताया, ‘कुछ ख़ास नहीं, बस बीस हज़ार रुपये लगेंगे और इस टेस्ट से पता न चला तो फिर अमेरिका जाना पड़ेगा. वैसे यह भी हो सकता है कि स्वाइन फ्लू हुआ हो….’

सलाहू चुप नहीं रह सका. एकाएक चिल्ला कर बोला, ‘अरे मेरी जान के दुश्मनों मुझे कुछ नहीं हुआ है. मैं बिलकुल ठीक हूं.”

’अबे तो अब तक बोल क्यों नहीं रहा था.’

’बस ऐसे ही.’

’क्या भौजाई ने कुछ कह दिया’

’उंहूं”

’फिर’

उसने फिर सिर हिलाया. न बोलने का नाटक करते हुए.

‘तो क्या कचहरी में कोई बात हो गई’

उसने फिर न में सिर हिलाया.

’तो फिर क्या बात हुई?’

अब वह एकदम चुप था. पुनर्मूषकोभव वाली स्थिति में आ गया था. न बोलने की कसम उसने लगता है फिर खा ली थी.

‘भाई क्या वजह है? बोल और बिलकुल सही-सही बता वरना ये जान लो कि अभी तुम्हारी डर्कोमर्कोग्रामी शुरू.’

डर्कोमर्कोग्रामी का नाम सुनते ही उसके होश फिर ठिकाने आ गए. आख़िरकार बेचारा बोल ही पड़ा, ‘देख भाई, ये न तो घर का मामला है और न कचहरी का. ये मामला असल में है पार्टी का. आज नहीं तो कल पार्टी में मुझे गूंगे होना ही पड़ेगा. लिहाजा उसकी प्रैक्टिस अभी से शुरू कर दी है.’

’वो क्यों भाई? भला तुझे पार्टी में गूंगा कौन बना सकता है?’ मैने पूछा, ‘मैडम का तू ख़ास भरोसेमन्द है?’

’सो तो हूं’, उसने बताया, ‘लेकिन आज ही से एक नया संकट आ गया है.’

’वह क्या’, मैंने फिर पूछा, ‘क्या तेरे बराबर भरोसा किसी और ने भी जीत लिया है?’

’नहीं भाई, ऐसी भी कोई बात नहीं है.’

‘फिर?’

’असल में आज ही एक नया फ़रमान जारी हुआ है.’

’वह क्या गूंगे होने का फ़रमान है.’

‘ना गूंगे होने का नहीं, वह गूंगे बनाने का फ़रमान है.’

’फ़रमान तो बताओ.’

‘बस यह कि अबसे कोई पार्टी और ख़ास तौर से पार्टी मालिकों के परिवार के सदस्यों के लिए सामंतवादी या कहें राजशाही सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा. अब कोई किसी को युवराज, राजा, राजमाता, महाराज … आदि-आदि नहीं कहेगा.’

’तो?’

’तुम्ही बताओ, तब अब हम क्या कहेंगे? इस तरह तो हमारी पार्टी के 99 फ़ीसदी कार्यकर्ताओं का सोचना तक बन्द हो जाएगा. बोलने की तो बात ही छोड़ मेरे यार.’

इतना कह कर वह फिर से गहन मौन में चला गया. ऋषि-मुनियों की तरह.

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युवराज का संस्कार

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 11, 2009

महाराज का तो जो भी कुछ होना-जाना था, सो सब बीत-बिता गया. वह ज़माना और था. अब की तरह तब न तो नमकहराम जनता थी और न यह लोकतंत्र का टोटका ही आया था. अरे बाप राजगद्दी पर बैठा था, मां राजगद्दी पर बैठी थी, पुश्त दर पुश्त लोग राजगद्दी पर ही बैठते चले आए थे, तो वह कहां बैठते! यह भी कोई सोचने-समझने या करने लायक बात हुई? जिसका पूरा ख़ानदान राजगद्दी पर ही बैठता चला आया हो तो वह अब चटाई पर थोड़े बैठेगा! ज़ाहिर है, उसको भी बैठने के लिए राजगद्दी ही चाहिए. दूसरी किसी जगह उसकी तशरीफ़ भला टिकेगी भी कैसे? लेकिन इस नसूढ़े लोकतंत्र का क्या करें? और उससे भी ज़्यादा बड़ी मुसीबत तो है जनता. आख़िर उस जनता का क्या करें? कई बार तो महारानी का मन ये हुआ कि इस पूरी जनता को सड़क पर बिछवा के उसके सीने पर बुल्डोजर चलवा दें. जबसे लोकतंत्र नाम की चिड़िया ने इस इलाके में अपने पंख फड़फड़ाए हैं, जीना हराम हो गया. और तो और, जनता नाम की जो ये नामुराद शै है, इसका कोई ईमान-धरम भी नहीं है. आज इसके साथ तो कल उसके साथ. ज़रा सा शासन में किसी तरह की कोताही क्या हुई, इनकी भृकुटी तन जाती है. इसकी नज़र भी इतनी कोताह है कि क्या कहें! जो कुछ भी हो रहा है, हर बात के लिए ये सरकार को ही दोषी मान लेती है. स्कूलों की फीस बढ़ गई- सरकार दोषी, बिजली-पानी ग़ायब रहने लगे- सरकार दोषी, महंगाई बढ़ गई- सरकार दोषी, भ्रष्टाचार बढ़ गया- सरकार दोषी, बेकारी बढ़ गई-सरकार दोषी, यहां तक कि सीमा पार से आतंकवाद बढ़ गया- तो उसके लिए भी सरकार दोषी.
इसकी समझ में यह तो आता ही नहीं कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी थोड़े ही है, जो वह चलाए और सारी समस्याएं हल हो जाएं. और फिर सरकार कहां-कहां जाए और क्या-क्या देखे? अरे भाई महंगाई बढ़ गई है तो थोड़ा झेल लो. कोई ज़रूरी है कि जो चीज़ आज दस रुपये की है वह कल भी दस रुपये की ही बनी रहे. कहां तो एक ज़माना था कि तुम्हारे हिस्से सिर्फ़ कर्म करना था. फल पूरी तरह हमारे हाथ में था. हम दें या न दें, यह बिलकुल हमारी मर्ज़ी पर निर्भर था. फिर एक समय आया कि पूरे दिन जी तोड़ मेहनत करो तो जो कुछ भी दे दिया जाता था उसी में लोग संतुष्ट हो लेते थे. पेट भर जाए, इतने से ही इनके बाप-दादे प्रसन्न हो जाते थे.
ऐसा इस देश में सुना जाता था. वरना तो महारानी जिस देश से आई थीं, वहां तो मजदूरी देने जैसी कोई बात ही नहीं थी. मजदूर जैसा भी कुछ नहीं होता था. वहां तो सिर्फ़ ग़ुलाम होते थे. ये अलग बात है कि उनके पूर्वज कभी ग़ुलाम नहीं रहे और न कभी राजा ही रहे, पर उन्होंने सुना है. ग़ुलामों से पूरे दिन काम कराया जाता था और कोड़े लगाए जाते थे. रात में खाना सिर्फ़ इतना दिया जाता था कि वे ज़िन्दा रह सकें. क्योंकि अगर मर जाते तो अपना काम कैसे होता. और फिर वह पैसा भी नुकसान होता जो उन्हें ख़रीदने पर ख़र्च किया गया था. नया ग़ुलाम ख़रीदना पड़ता. और अगर उन्हें ज़्यादा खिला दिया जाता तो तय है कि वे आंख ही दिखाने लगते. इन दोनों अतियों से बचने का एक ही रास्ता था और वह यह कि साईं इतना दीजिए, जामे पेट भराय.
पर मामला उलट गया तब जब उसे इस पेट भराय से ज़्यादा दिया जाने लगा. इतना दिया जाने लगा कि ये खाने के बाद दुख-बिपत के लिए भी लेवें बचाय. तो अब लो भुगतो. यह ग़लती उनकी ससुराल में उनके पतिदेव के पूर्वजों ने किया था. जाने किस मजबूरी में. हालांकि उनसे पूर्व की पूर्व महारानी, यानी उनकी सासू मॉम ने, यह ग़लती सुधारने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी थी. पर वह पूरी तरह सुधार नहीं पाई थीं. उन दिनों निगोड़े विपक्षी बार-बार आड़े आ जाते थे. हालांकि विपक्ष के बहुत बड़े हिस्से को पालतू बनाने की प्रक्रिया भी उन्होंने शुरू कर दी थी. तो विपक्ष तो अब निपट गया, लेकिन ससुरी जनता ही बहुत बेहूदी हो गई. इतनी बेहूदी कि इसकी हिम्मत तो देखिए. यहां तक कि महारानी के लिए फ़ैसलों पर सवाल भी उठाने लगी है.
इसीलिए महारानी के हाथ में जब सत्ता की चाभी आई तो सबसे पहला काम उन्होंने यही किया कि उन सबको सत्ता से बिलकुल दूर ही कर दिया जिनकी पीठ में सात पुश्त पहले तक भी कभी रीढ़ की हड्डी पाई जाती थी. निबटा ही दिया महारानी ने उन्हें. यहां तक कि वज़ीरे-आज़म भी उन्होंने एक ग़ुलाम को बनाया और वह भी ऐसे ग़ुलाम को जो कभी यह सोच भी नहीं सकता था कि उसे कभी इस क़ाबिल भी समझा जा सकता है. वह ख़ुद ही अपने को इस क़ाबिल नहीं समझता था. पहले तो वह बहुत रोया-गिड़गिड़ाया कि महारानी यह आप क्या कर रही हैं? मुझ नाचीज़ को इतनी बेपनाह इज़्ज़त आप बख़्श रही हैं. मैं इसे ढो भी पाउंगा! अरे यह तो मेरे संभाले से भी नहीं संभलेगी.
कुछ परिजनों ने उसकी यह मुश्किल देख महारानी को सलाह भी दी कि मत करें आप ऐसा. कहीं नहीं ही संभाल पाया तो क्या होगा फिर? पर महारानी जानती थीं कि सत्ता में संभालने के लिए होता क्या है! और यह भी कि ऐसा ही आदमी तो उन्हें चाहिए जो सत्ता संभाले, पर उसमें इतना आत्मविश्वास कभी न आए कि वह सत्ता संभाल सकता है. जब कहा जाए कि कुर्सी पर बैठो तो वह हाथ जोड़ कर बैठ जाए और जब कहा जाए कि उठो तो कान पकड़ कर उठ भी जाए. ऐसा आदमी युवराज के रास्ते में कभी रोड़ा नहीं अटकाएगा. जब तक युवराज युवा होते हैं, तब तक राजगद्दी सुरक्षित रहेगी और चलती भी रहेगी. कहीं ग़लती से भी अगर किसी सचमुच के क़ाबिल आदमी को यहां लाकर बैठा दिया तो फिर तो मुसीबत हो जाएगी. वह क्या राजगद्दी सुरक्षित रखेगा हमारे युवराज के लिए? वह तो ख़ुद उस पर क़ाबिज होने की पूरी कोशिश करेगा.
आख़िरकार वज़ीरे-आज़म की कुर्सी का फ़ैसला हो गया. वहां उसे ही बैठा दिया गया जिसे महारानी ने सुपात्र समझा. और महारानी ने उसे कुर्सी पर बैठाने के बाद सबसे पहला काम यही किया कि जनता की भी रीढ़ की हड्डी का निबटारा करने का अभियान शुरू किया. इसके पहले चरण के तहत महंगाई इतनी बढ़ाई गई कि आलू भी लोगों को अनार लगने लगा. इसके बावजूद कुछ घरों में चूल्हे जलाने का पाप जारी रहा. तब चूल्हे जलाने का ईंधन अप्राप्य बना दिया गया. काम का हाल ऐसा किया गया कि लोगों की समझ में गीता का सार आ जाए. अरे काम मिल रहा है, यही क्या कम है! फल यानी मजदूरी की चाह का पाप क्यों करते हो? वैसे भी इस देश में पुरानी कहावत है – बैठे से बेगार भली. तो लो अब बेगार करो.
अब इस बात पर साली जनता बिदक जाए तो क्या किया जाए? पर हाल-हाल में महारानी को मालूम हुआ कि असल में ये जो जनता का बिदकना है उसके मूल में शिक्षा है. तुरंत महारानी ने सोच लिया कि लो अब पढ़ो नसूढ़ों. ऐसे पढ़ाउंगी कि सात जन्मो तक तुम तो क्या तुम्हारी सात पीढ़ियां भी पढ़ने का नाम तक न लें. बिना किसी साफ़ हक़्म के तालीम इतनी महंगी कर दी गई कि पहले से ही दाने-पाने की महंगाई से बेहाल जनता के लिए उसका बोझ उठाना संभव नहीं रह गया. सुनिश्चित कर दिया गया कि जनता राजनीतिक नौटंकी को सच समझती रहे. पर अब भी जनता युवराज को सीधे राजा मान लेने को तैयार नहीं थी. जाने कहां से उसके दिमाग़ में ये कीड़ कुलबुलाने लगा था कि उसका राजा उसके बीच से होना चाहिए. ऐसा जो उसके दुख-दर्द को समझे. महारानी की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ऐसा राजा वे कहां से लाएं? आख़िरकार राजनीतिक पंडितों की आपात बैठक बुलाई गई. पंडितों ने बड़ी देर तक विचार किया. बहस-मुबाहिसा भी हुआ, पर अंतत: कोई नतीजा नहीं निकला. थक-हार कर किसी ने सलाह दी कि ऐसे मामलों से निबटना तो अब केवल एक ही व्यक्ति के बूते की बात है और वह हैं राजपुरोहित. ख़ैर, शाही सवारी तुरंत तैयार करवाई गई और उसे रवाना भी कर दिया गया राजपुरोहित के राजकीय बंगले की ओर. महारानी ने स्वयं अपने सचल दूरभाष से राजपुरोहित का नंबर मिलाया:
‘हेलो’
‘जी, महारानी जी’ ‘प्रनाम पुरोहिट जी!’ ‘जी महारानी जी, आदेश करें.’
‘जी आडेश क्या पुरोहित जी मैं टो बश रिक्वेश्ट कर सकटी हूं जी आपशे.’ ‘हें-हें-हें…. ऐसा क्या है राजमाता. आप आदेश कर सकती हैं.’ ‘जी वो क्या है कि राजरठ आपके ड्वार पर पहुंचता ही होगा. यहां पहुंचिए टब बाटें होंगी.’
इतना कह कर महारानी ने फ़ोन काट दिया और बेचारे राजपुरोहित कंपकंपाती ठंड में राजमाता और उनकी कुलपरंपरा के प्रति नितांत देशज शब्दों में अपनी आस्था व्यक्त करते हुए जल्दी-जल्दी जनमहल पहुंचने के लिए तैयार होने लगे. जी हां, राजमहल का यह नया नामकरण राजपुरोहित ने ही किया था. एक टोटके के तौर पर. शनिदेव के कोप से राजपरिवार को बचाने के लिए. उनका यह प्रयोग चल निकला था, लिहाजा राजपरिवार में उनकी पूछ बढ़ गई थी और उनकी हर राय क़ीमती मानी जाने लगी थी. ***************************** थोड़ी देर बाद राजपुरोहित महारानी के दरबार में थे. समस्या उन्हें बताई जा चुकी थी और यह भी कि कई सलाहें आ चुकी थीं. सभी महत्वपूर्ण विचारों पर लंबी चर्चा भी हो चुकी थी. पर इस लायक एक विचार भी नहीं पाया गया था जिस पर अमल किया जा सके और जनता को इस बात के लिए मजबूर किया जा सके कि वह युवराज को महाराज मान ले. वैसे जनता के सीने पर बुल्डोजर चलवाया जा सकता है, लेकिन फिर सवाल यह उठता है कि जब जनता ही नहीं रहेगी तो फिर युवराज राज कैसे करेंगे और किस पर करेंगे? फिर तो एक ही विकल्प बचता है कि राज करने के लिए जनता भी सात समुंदर पार से मंगाई जाए. पर उधर से जनता कैसे आएगी? वहां तो जनता की पहले से ही कमी है और दूसरे जो जनता है वह भी बेहद पेंचीदी टाइप की हो गई है. ऐसी कि उसे बात-बात पर राजकाज में मीनमेख निकालने की आदत सी हो गई है.
‘अब जनटा टो हमारे मायके से मंगाई नहीं जा सकती राजपुरोहिट जी और युवराज को अगर वहां भेजें टो शायद इन्हें किशी हेयर कटिंग शैलून में भी काम न मिले.’ राजमाता ने अपनी चिंता व्यक्त की, ‘राजा टो हम इनको यहीं का बना सकटे हैं. और वह भी मुश्किल लग रहा है अभी. टो प्लीज़ कोई रास्टा सुझाइए राजपुरोहिट जी.’
राजपुरोहित थोड़ी देर तो चिंतामग्न मुद्रा में बैठे रहे. फिर उन्होंने पंचांग निकाला. थोड़ी देर तक विचार करते रहे. इसके बाद उन्होंने युवराज की कुंडली मंगाने का अनुरोध महारानी से किया. जैसा कि ऐसे अवसर पर होना ही चाहिए, राजमाता ने इसके लिए किसी राजकर्मी को आदेश नहीं दिया. स्वयं और तुरंत निकाल कर ले आईं और बड़ी श्रद्धापूर्वक राजपुरोहित को सौंप दी. राजपुरोहित ने अपने मोटे चश्मे से कुछ देर तक बड़ी सूक्ष्मता से कुंडली का भी निरीक्षण किया. क़रीब-क़रीब वैसे ही जैसे कोई चार्टर्ड एकाउंटेंट निहारता है किसी बहीखाते को. और अचानक उसमें राहुदेव की स्थिति पर नज़र पड़ते ही उन्होंने ऐसे हुंकार भरी जैसे किसी पेंशनर की फाइल में मामूली सी गड़बड़ पाकर सरकारी बाबू भरते हैं. ‘फ़िलवक़्त यहां स्थिति राहुदेव की गड़बड़ है महारानी.’ ज़ोर से नाक सुड़कते हुए राजपुरोहित ने कहा.
‘टो इशके लिए क्या किए जाने की ज़रूरत है राजपुरोहिट’ राजमाता जानती हैं हैं कि भाग्य को भाग्य के भरोसे छोड़ देने वाले पुरोहित नहीं हैं राजपुरोहित. राजपरिवार का कुत्ता भी कह दे तो बैल का दूध भी निकाल कर दे सकते हैं वह. इसी कैन डू एप्रोच के नाते तो उन्हें यूनिवर्सिटी से उठाकर दरबार में लाया गया.
बहरहाल राजपुरोहित ने थोड़ी देर और लगाई. मोटी-मोटी पोथियों के पन्ने-दर-पन्ने देखते रहे और अंतत: एक निष्कर्ष पर पहुंचे. ‘उपाय थोड़ा कठिन है राजमाता, लेकिन करना तो होगा.’ ‘आप बटाइए. कठिन और आसान की चिंता मट करिए.’
‘है क्या कि युवराज की कुंडली में अबल हैं राहु और लोकतंत्र की कुंडली में प्रबल हैं राहु. तो अब युवराज की कुंडली में अबल राहु को सबल तो करना ही पड़ेगा.’ ’वह कैसे होगा?’ ’देखिए राजमाता, राहु वैसे तो तमोगुणी माने जाते हैं, लेकिन उनकी प्रसन्नता के लिए सरस्वती की पूजा ज़रूरी बताई गई है और सरस्वती की प्रसन्नता के लिए शास्त्रों में विधान है संस्कारों का. पुराने ज़माने में हमारे यहां केवल 16 संस्कार होते थे. उनमें से भी अब तो कुछ संस्कार होते ही नहीं हैं संस्कारों की तरह. कुछ आवेश में निबटा दिए जाते हैं. उनमें कुछ ऐसे भी हैं जो अब आउटडेटेड हो गए हैं. और कुछ ऐसी भी बातें हैं जिन्हें अब संस्कारों में जोड़ लिया जाना चाहिए, पर अभी जोड़ी नहीं गई हैं.’ ‘हमारे लिए क्या आडेश है?’ राजमाता उनका लंबा-चौड़ा भाषण झेलने के लिए तैयार नहीं थीं.
‘जी!’ राजपुरोहित तुरंत मुद्दे पर आ गए, ‘बस युवराज का एक संस्कार कराना होगा.’ ‘कौन सा संस्कार?’ ‘राजनीतीकरण संस्कार.’
‘वह कैसे होगा?’ किसी भी मां तरह राजमाता ने भी अपनी चिंतामिश्रित जिज्ञासा ज़ाहिर की.
‘जैसे सभी संस्कार होते हैं, वैसे ही यह भी होगा. हर संस्कार के कुछ रीति-रिवाज हैं, कुछ रस्में हैं. इसकी भी हैं. और टोटके भी करने होंगे.’ उन्होंने कहा और फिर राजमाता की ज़रा आश्वस्तिजनक मुद्रा में देखते हुए उन्होंने कहा, ‘इसके रीति-रिवाज थोड़े कड़े हैं. पर उसका भी इंतज़ाम हो जाएगा. आप चिंता न करें.’
‘क्या रीटि-रिवाज हैं इशके?’ ‘वो क्या है कि संस्कार वैसे होते हैं सरस्वती की ही प्रसन्नता के लिए, लेकिन ये मामला लोकतंत्र और उसमें भी राजनीति का है न, तो उसमें ऐसा काम करना पड़ेगा जिससे राहु भी प्रसन्न हों. इसके लिए राजकुमार को जनता जनार्दन यानी दरिद्र नारायण के बीच जाना पड़ेगा.’ ‘ये डरिड्रनारैन क्या चीज़ होटा है?’ ‘राजमाता हमारे देश में जो दरिद्र लोग यानी पूअर पीपल हैं न, उन्हें भी हम भगवान का रूप मानते हैं. इसीलिए हम उन्हें दरिद्रनारायण कहते हैं. और लोकतंत्र में तो राजपाट का सुख ही उनकी सेवा से ही मिलता है. लिहाज़ा उनकी सेवा में युवराज को एक बार प्रस्तुत होना होगा. युवराज को यह जताना होगा कि वह भी उनके ही जैसे हैं और उनके दुख-दर्द को समझते हैं.’ ‘ओह! लेकिन कहीं शचमुच बनना टो नहीं होगा युवराज़ को उनके जैशा.’ ‘नहीं-नहीं. बनने की क्या ज़रूरत है. हमारी संस्कृति की तो सबसे बड़ी विशिष्टता ही यही है कि हम कथनी और करनी को कभी एक करके नहीं देखते. भला सोचिए आपके आदिपूर्वज बार-बार आग्रह करते रहे सच बोलने का, पर अगर ग़लती से भी उन्होंने कभी सच बोला होता तो क्या होता?’ राजपुरोहित ने उदाहरण देकर समझाया, ‘ये तो सिर्फ़ नाटक है. दस-बीस दिन चलेगा. फिर सब सामान्य. राजा तो राजा ही रहेगा.’ ‘टो इश्में युवराज को क्या-क्या करना होगा?’
‘युवराज को कुछ ग़रीबों के बीच जाना होगा. उनसे मिलना-जुलना होगा. कुछ उनके जैसा खाना होगा. उनके जैसे कुछ मेहनत के काम करने होंगे. बस यही और क्या?’ ‘उनके जैसे काम .. मतलब?’ शायद राजमाता समझ नहीं सकीं.
‘अरे जैसे कुदाल चलाना या बोझ ढोना .. बस यही तो, और क्या!’ ‘क्या बाट आप करते हैं राजपुरोहिट? युवराज यह सब कैसे कर सकेंगे?’
‘हो जाएगा राजमाता सब हो जाएगा. उनको कोई बहुत देर तक थोड़े यह सब करना होगा.’ यह दरबार के विशेष सलाहकार थे, जो कई बार राजपुरोहित की मुश्किलें भी हल किया करते थे, ‘सिर्फ़ एक बार कुदाल चलानी होगी और इतने में सारे अख़बार और टीवी वाले फोटो खींच लेंगे. फिर एक बार मिट्टी उठानी होगी और फिर सभी मीडिया वाले फोटो खींच लेंगे और छाप देंगे. दिखा देंगे. बन जाएगा अपना काम.’ ‘ओह!’ राजमाता अब विशेष सलाहकार से ही मुखातिब थीं, ‘टो डेख लिजिएगा. शब हम आप के ही भरोशे शोड़ रए हें.’
‘आप निश्चिंत रहें राजमाता!’ कहने के साथ ही विशेष सलाहकार ने पुरोहित की बनाई सामग्रीसूची वज़ीरे-आज़म को थमा दी थी. इसमें पूजा-पाठ की तमाम चीज़ों के अलावा चांदी की कुदाल एक अदद, सोने की गद्दीदार खांची एक अदद, ख़ास तरह का कैनवस शू एक जोड़ी .. आदि चीज़ें भी शामिल थीं.
उधर राजमाता अपने मायके फ़ोन भी मिला चुकी थीं. असल में साबुनों का वह ख़ास ब्रैंड वहीं मिलता है जिससे शरीर के मैल और कीटाणुओं के साथ-साथ मन के विषाणु भी धुल जाते हैं.

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