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चिंता से चतुराई घटे

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 11, 2014

इष्ट देव सांकृत्यायन

भारत हमेशा से एक चिंतनप्रधान देश रहा है। आज भी है। चिंतन की एक उदात्त परंपरा यहाँ सहस्राब्दियों से चली आ रही है। हमारी परंपरा में ऋषि-मुनि सबसे महान माने जाते रहे हैं, इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यही रहा है कि वे घर-बार सब छोड़ कर जंगल चले जाते रहे हैं और वहाँ किसी कोने-अँतरे में बैठकर केवल चिंतन करते रहे हैं। चिंतन से उनके समक्ष न केवल ‘इस’, बल्कि ‘उस’ लोक के भी सभी गूढ़तम रहस्य खुल जाते रहे हैं, जिसे वे समय-समय पर श्रद्धालुओं के समक्ष प्रकट करते रहे हैं। अकसर उनके चिंतन से बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी निकल आता रहा है। कालांतर में चिंतन से एक और चीज़ प्रकट हुई, जिसे चिंता कहा गया।

हालांकि यह चिंतन से अलग है, यह समझने में थोड़ा समय लगा। बाद में तो यहाँ तक पता चल गया कि यह चिंतन से बिलकुल अलग है, इतना कि चिंतन जितना फ़ायदेमंद है, चिंता उतनी ही नुकसानदेह। मतलब एक पूरब है तो दूसरी पश्चिम। इनमें एक पुल्लिंग और दूसरे के स्त्रीलिंग होने से इस भ्रम में भी न पड़ें कि ये एक-दूसरे के पूरक हैं। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये कुछ-कुछ वैसा ही मामला है, जैसे किसी नामी कंपनी का प्रतिष्ठित उत्पाद कोई लोकल टाइप कारखाना मिलते-जुलते नाम से निकाल देता है। बुनियादी फ़र्क़ दोनों के बीच यह है कि एक विशिष्ट जनों द्वारा किया जाता रहा है, जबकि दूसरी सामान्य जन द्वारा। लेकिन, समय के साथ वर्ग-धर्म-जाति भेद मिटने और डुप्लीकेसी बढ़ने का नतीजा यह हुआ कि कई बार सामान्य जन भी चिंतन कर डालता है और विशिष्ट जन भी चिंता के जाल में फंस जाते हैं।

हाल में आई कौलीफेर्निया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार विशिष्ट जन के चिंता के जाल में फंसने का सबसे पहला विवरण त्रेतायुग में पाया जाता है। भगवान राम के वनगमन के बाद महाराज दशरथ ग़लती से चिंता कर बैठे और उसका नतीजा अब आप जानते ही हैं। वास्तव में चिंता के साइड इफेक्ट का पता यहीं से चलना शुरू हुआ और इसके साथ ही इस पर शोध भी शुरू हुए। शोधों का निष्कर्ष यह निकला कि चिंता बहुत ही ख़तरनाक टाइप चीज़ है। इससे फ़ायदा कुछ नहीं है, जबकि नुकसान हज़ारों। और तो और, इससे कई तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। आयुर्विज्ञान विभाग वाले अनुसंधानकर्ताओं ने इससे हो सकने वाली बीमारियों की जो सूची दी, उसमें ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ से लेकर हार्ट अटैक तक का नाम शामिल था।

आनन-फानन जनकल्याण विशेषज्ञों और साहित्य के आचार्यों को बुलाया गया और इस विषय में जागरूकता फैलाने के लिए कोई प्रभावी उपाय निकालने को कहा गया। काफ़ी सोच-विचार के बाद उन्होंने एक स्लोगन निकाला और उसे हवा में तैरा दिया। वह स्लोगन है – चिंता से चतुराई घटे। वैसे इसे फैलाया तो हर ख़ासो-आम के लिए गया, पर जैसा कि आम तौर पर होता है, आम लोगों में इसे समझ कम ही पाए। अलबत्ता वे और ज़्यादा इसके फेर में फंस गए। जबकि ख़ास लोगों ने इसे ठीक से समझा और इसके फेर में फंसने से बचे। बाद में ग़ौर किया गया कि कुछ ख़ासजन भी इससे बच नहीं पाए। आम तो अकसर और कभी-कभी ख़ास जन भी किसी छोटी-मोटी ग़लती के कारण चिंता में फंसकर अपनी चतुराई घटाते रहे।

इसलिए ज़रूरी समझा गया कि इसके उपचार का कोई उपाय निकाला जाए। काफ़ी शोध-अनुसंधान के बाद मालूम हुआ कि दवा तो इसके मामले में कुछ ख़ास काम आती नहीं, हाँ एक उपाय ज़रूर है। उपाय यह है कि यह जैसे ही हो उसे जता दिया जाए। उस ज़माने में चूंकि कामकाज बहुत तेज़ गति से नहीं चलता था, इसलिए यह इतनी बात पता चलते-चलते बहुत देर लग गई। त्रेता से द्वापर युग आ गया। द्वापर में आपने देखा ही कि किस तरह चिंता ने पितामह भीष्म को आ घेरा। अच्छी बात यह रही कि उन्होंने लगातार आयुर्विज्ञानियों के निर्देशों का पालन किया और उन्हें जब-जब चिंता ने घेरा, वह उसे जता देते रहे।

उसके बाद तो हमारे देश में चिंता के फेर में पड़ते ही उसे जता देने का रिवाज़ सा चल पड़ा। हमारे नए दौर के विशिष्ट जन तो उसके फेर में पड़ने से पहले ही उसे जता देते हैं। आजादी के बाद से लेकर अब तक हम देखते आ रहे हैं कि विशिष्ट जन अकसर बहुत गंभीर मसलों पर सामान्य से लेकर गंभीर और कभी-कभी अति गंभीर टाइप की भी चिंता जताते रहते हैं। मामला चाहे बाढ़ का हो या अकाल का, महंगाई का हो या बेकारी का, दंगे का हो या आतंकवाद का, या फिर पड़ोसी देशों द्वारा हमारे देश में घुसपैठ का ही क्यों न हो… हमारे विशिष्टजन चिंता जताने में कोई कोताही नहीं बरतते। कई बार तो चिंता द्वारा घेरे जाने से पहले ही उसे जता देते हैं। हालांकि जनता टाइप लोगों को चिंता जताना पसंद नहीं आता। कई बार वे किसी विशिष्ट जन द्वारा चिंता जताए जाते ही चिढ़ जाते हैं। कहते हैं, ये तो पहले वाले भी कर रहे थे, फिर आपकी क्या ज़रूरत थी? असल में समझ ही नहीं पाते कि चिंता जताना अपने आपमें बहुत कुछ करना है। मेरी मानें तो आप भी इस पर अमल करें। यानी कोई चिंता आपको घेरे, इससे पहले ही उसे जता दें। क्योंकि चिंता से चतुराई घटे और आप जानते ही हैं, चतुराई घटने का आज के ज़माने में क्या नतीजा हो सकता है।

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रामेश्वरम में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 17, 2011

हरिशंकर राढ़ी
दोपहर बाद का समय हमने घूमने के लिए सुरक्षित रखा था और समयानुसार ऑटोरिक्शा  से भ्रमण शुरू  भी कर दिया। पिछले वृत्तांत में गंधमादन तक का वर्णन मैंने कर भी दिया था। गंधमादन के बाद रामेश्वरम द्वीप पर जो कुछ खास दर्शनीय  है उसमें लक्ष्मण तीर्थ और सीताकुंड प्रमुख हैं। सौन्दर्य या भव्यता की दृष्टि  से इसमें कुछ खास नहीं है। इनका पौराणिक महत्त्व अवश्य  है । कहा जाता है कि रावण का वध करने के पश्चात्  जब श्रीराम अयोध्या वापस लौट रहे थे तो उन्होंने सीता जी को रामेश्वर  ज्योतिर्लिंग के दर्शन  के लिए, सेतु को दिखाने के लिए और अपने आराध्य भगवान शिव  के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पुष्पक  विमान को इस द्वीप पर उतारा था और भगवान शिव की पूजा की थी। यहाँ पर श्रीराम,सीताजी और लक्ष्मणजी ने पूजा के लिए विशेष  कुंड बनाए और उसके जल से अभिषेक  किया । इन्हीं कुंडों का नाम रामतीर्थ, सीताकुंड और लक्ष्मण तीर्थ है । हाँ,  यहाँ सफाई  और व्यवस्था नहीं मिलती और यह देखकर दुख अवश्य  होता है।
स्थानीय दर्शनों  में हनुमान मंदिर में (जो कि बहुत प्रसिद्ध और विशाल  नहीं है) तैरते पत्थरों के दर्शन करना जरूर अच्छा लगता है। पत्थर का पानी पर तैरना एक लगभग असंभव सी घटना मानी जाती है और इसे कुछ लोग ईश्वरीय  चमत्कार मानते हैं तो कुछ गल्प के अलावा कुछ नहीं। इसे सामान्यतः वैज्ञानिक तौर पर भी नकार दिया जाता है किन्तु यह सच है कि पत्थर पानी में तैरते हैं। इसे आप अपनी आँखों से देख सकते हैं, छू सकते हैं और दिल करे तो खरीदकार ला भी सकते हैं। यह वास्तव में पत्थर ही होते हैं जो दुर्लभ श्रेणी के होते हैं।
वस्तुतः तैरते हुए पत्थर भी प्रकृति के चमत्कारों में एक हैं। इनका पानी पर तैरना पता नहीं श्रीराम के स्पर्श  की कृपा पर आधारित था या नहीं किन्तु इसे प्रकृति का स्पर्श  जरूर मिला है। भूविज्ञान के अनुसार पत्थर का तैरना कोई चमत्कार या  ईश्वरीय शक्ति  नहीं है। हर प्रकार का पत्थर तैर नहीं सकता है। दक्षिण भारत पृथ्वी के सबसे पुराने भागों में है। वर्तमान हिमालय के अस्तित्व में आने से पूर्व एशिया , योरोप और आस्ट्रेलिया तक का अंश  एक ही खंड था। जहाँ आज हिमालय है वहाँ पहले टेथीस नामक एक छिछला सागर था। इस सागर के उत्तर में अंगारा लैण्ड नामक भूखंड था और दक्षिण में गोंडवाना लैण्ड। टेक्टॉनिक प्लेटों के खिसकने से कालान्तर में टेथीस सागर की जगह हिमालय का निर्माण हो गया। भारत का दक्षिणी भाग गोंडवाना लैण्ड का प्रमुख हिस्सा है जो मुख्यतः ज्वालामुखी से निर्मित आग्नेय शैलों  से निर्मित है। चूंकि आग्नेय शैलें  प्रायः ज्वालामुखी से निकले लावा के ठण्डे हो जाने से बनती हैं, इनमें कहीं -कहीं छिद्र रह जाते हैं जिनमें हवा भर जाती है। यही हवा जब अधिक हो जाती है तो पत्थर पानी में तैरने लग जाता है और आर्किमिडीज का सिद्धान्त यहाँ पूर्णतया लागू होता है। यह बात अलग है कि आग्नेय शैलों के अन्तर्गत आने वाला पूरा पत्थर परिवार तैर नहीं सकता, इसमें भी एक विशेष कोटि होती है जिसे हम झाँवाँ पत्थर कह सकते हैं।
हमारा रामेश्वरम भ्रमण लगभग तीन घंटे में पूरा हो गया था। उसी होटल पर हम आ चुके थे। शाम  के पांच बज रहे होंगे। अब आगे क्या किया जाए? अभी कुछ और महत्त्वपूर्ण स्थल रह गए थे । उनमें से एक था –  धनुषकोडि या धनुषकोटि। इस स्थल के विशय में हमने सुन रखा था और जाने की प्रबल इच्छा भी थी। ऑटो वाले से बात की गई तो पता लगा कि इस समय जाना असंभव था। यह वहाँ से लौटने का समय है और रात्रि में वहाँ जाना न तो लाभकर है और न ही अनुमोदित ही। यहाँ भी हमें अभी कुछ खरीदारी करनी थी, शंकराचार्य  मठ में जाना था और थोड़ा समन्दर किनारे घूमना भी था। वस्तुतः अब जो सबसे ज्यादा उत्कंठा हमारे मन में शेष  थी वह थी सेतु के दर्शन करना जो किधनुषकोडि में ही मिल सकता था। सच तो यह है कि सेतु का अब कोई अस्तित्व बचा ही नहीं है और धनुषकोडि में भी इसके दर्शन नहीं हो सकते। यह तो अब सागर में समाहित हो चुका है, धनुषकोडि तो वह स्थान है जहाँ से इस सेतु का प्रारम्भ होता था।



गंध मादन पर्वत पर 



धनुषकोडि ; धनुषकोडि या धनुषकोटि पम्बन से दक्षिण-पूर्व में लगभग 8 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ पर विभीषण  का मंदिर हुआ करता था। कहा जाता है कि रावण दमन के बाद वापसी में विभीषण के कहने से श्रीराम ने इस पुल का सिरा अपनी धनुष से तोड़ दिया था। ‘कोडि’ का अर्थ तमिल भाषा  में अन्त या सिरा होता है। यह भी विश्वास है कि रामेश्वरम और काशी की यात्रा सेतु में स्नान किए बिना पूरी नहीं होती। धनुषकोडि को महोदधि (बंगाल की खाड़ी ) और रत्नाकर (हिन्द महासागर ) का मिलन स्थल भी कहा जाता है, हालाँकि आज का भूगोल इस बात को प्रमाणित नहीं करता । धनुषकोडि श्रीलंका के बीच में विश्व  की  सबसे छोटी सीमा का निर्माण भी करता है जो मात्र पचास गज की लंबाई की है। स्वामी विवेकानन्द ने भी 1893 के विश्व  धर्मसम्मेलन मे विजय पताका फहराने के बाद श्रीलंका के रास्ते इसी भूखंड पर भारत की धरती पर अपना पैर रखा था। 
धनुषकोडि अब एक ध्वन्शावशेष  बनकर रह गया है। 22 दिसम्बर 1964 की मध्यरात्रि में एक भयंकर समुद्री तूफान ने धनुषकोडि का गौरवशाली  अतीत और वैभवशाली वर्तमान को पूरी तरह निगल लिया था। इस भीषण  तूफान में लगभग 1800 जानें गईं थी और पूरा द्वीप शमशान  बनकर रह गया। यहाँ क्या कुछ नहीं था। इसका अपना एक रेलवे स्टेशन  था और एक पैसेन्जर ट्रेन (पम्बन-धनुषकोडि पैसेन्जर, ट्रेन नम्बर – 653/654) चक्कर लगाया करती थी। दैवी आपदा की उस रात भी वह पम्बन से 110 यात्रियों और 5 कर्मचारियों को लेकर चली थी। अपने लक्ष्य अर्थात धनुषकोडि रेलवे स्टेशन से कुछ कदम पहले ही तूफान ने उसे धर दबोचा और सभी 115 प्राणी आपदा की भेंट चढ़ गए। अब यह एक खंडहर मात्र रह गया है और सरकार ने इसे प्रेतनगर ( Ghost  Town ) घोषित  कर रखा है। यहाँ एक शहीद  स्मारक भी बनाया गया है। यहाँ छोटी नाव या पैदल भी पहुँचा जा सकता है । रेत पर चलने वाली जीपें और लारियाँ भी उपलब्ध हैं।

शंकराचार्य मठ :

रामनाथ मंदिर के मुख्य अर्थात पूर्वी गोपुरम के सामने जहाँ सागर में स्नान की रस्म शुरू करते हैं, वहीं शंकराचार्य का मठ भी स्थापित है। एक बार मुझे यह भ्रम हुआ कि यह आदि शंकराचार्य  द्वारा स्थापित चारो मठों में से एक होगा क्योंकि उन्होंने चार मठ चारो धाम में स्थापित किए थे और रामेश्वरम चार धामों में एक है। बाद में ध्यान आया कि उनके द्वारा स्थापित मठ चार धामों में नहीं अपितु चार दिशाओं  में थे। जहाँ उत्तर, पूरब और पश्चिम  के मठ धामों में स्थित हैं वहीं दक्षिण में स्थित शृंगेरी मठ तो कांची में है। अतः रामेश्वर  में स्थित शंकराचार्य  मठ महत्त्वपूर्ण तो है किन्तु प्रमुख चार मठों  में नहीं है। फिर भी मठ को देखने की इच्छा कम नहीं हुई थी। वहाँ पहुँचे तो अच्छी खासी भीड़ दिखी। कोई विशेष प्रयोजन मालूम हो रहा था। भाषा की समस्या तो थी ही । चाहा कि कुछ जानकारी लूँ, पर किससे लूँ? प्रश्न  का कोई समाधान नहीं दिख रहा था। सामान्य बातें या पता तक तो कोई विशेष परेशानी  नहीं थी। परन्तु यहाँ प्रश्न लेखकीय कीडे़ का था। जिज्ञासा का समाधान तो चाहिए ही था, यात्रा की समाप्ति के बाद वृत्तान्त भी तो लिखना था! ना हिन्दी ना अंगरेजी। संस्कृत में अपना  बहुत प्रवाह तो नहीं है किन्तु कामचलाऊ शक्ति जरूर है। पंडित जी से बात करूँ पर वहाँ भी असमर्थता ही थी। सोच -विचार कर ही रहा था कि एक सज्जन शारीरिक  भाषा से मुझे पढ़े – लिखे या अफसर से दिख गए। उनसे बात की तो बोले कि हिन्दी तो नहीं, अंगरेजी में वे बात कर सकते हैं। बातचीत में पता चला कि वे मदुराई के रहने वाले हैं और वहीं किसी सरकारी सेवा में हैं। नाम तो मैं उनका भूल गया, पर उनकी बातें, उनका ज्ञान और सज्जनता मुझे याद है। लम्बी बातचीत में उन्होंने जो कुछ बताया, उसमें मुझे एक बात बड़ी आश्चर्यजनक  लगी। वहाँ अश्विन  मास में एक विशिष्ट  उत्सव होता है जिसमें लोग अंगारों पर नाचते हैं और किसी का पैर नहीं जलता। उनका दावा था कि आप यह उत्सव स्वयं देख सकते हैं। हम भी वहाँआश्विन  मास में( नौरात्रों में) गए थे। परन्तु यह उत्सव पूर्णिमा के आस- पास  होता है। मुझे इस बात की सत्यता पर अभी भी पूरा विश्वास नहीं होता कि जुलूस बनाकर लोग आग पर नाचेंगे और पैर नहीं जलेंगे परन्तु किसी की धार्मिक आस्था को चुनौती देना भी कोई आसान कार्य नहीं है।

दिन डूबने को आ रहा था। मठ से निकलकर हम सागर किनारे की ओर चल पडे़। हवा की शीतलता  का कोई जवाब नहीं था। सागर किनारे जो दृश्य  सामान्यतः मिलता है – लोगों की भीड़, खोमचे वालों का जमावड़ा और बेतरतीब आते-जाते लोग, यहाँ भी था। यहाँ एक बार पुनः जिस चीज ने भगाने की ठानी वह थी यहाँ की गंदगी और बदबू!  रामेश्वरम  के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है मछली पकड़ना और बेचना। अब मछलियों के पकड़ने के बाद उनकी प्रॉसेसिंग और भंडारण के कारण बदबू निकलना तो सामान्य बात है (बेट द्वारिका यात्रा में मैंने यही पाया था), किन्तु तट पर फैली गंदगी, गोबर और मल से भी कम वितृष्णा  नहीं पैदा हो रही थी। आवारा पशुओं  के झुंड के झुंड अपनी गतिविधियों में व्यस्त और मस्त थे। कुल मिलाकर सागर किनारे दिल ये पुकारे वाली बात बनी नहीं। हाँ, थोड़ा बहुत इलाका जरूर ऐसा था जहाँ बैठा जा सकता था। अंधेरा घिरने लगा था। कुछ स्थानीय लोगों ने बताया कि इस दिशा  में लंका है और थोड़ी देर बाद श्रीलंका की बिजुलबत्तियाँ दिखाई देंगी। आखिर कुल दूरी यहाँ से तीस किमी ही तो है। 

पम्बन रेलवे पुल
– यह रेलवे पुल रामेश्वरम द्वीप को भारत के मुख्य भाग से जोड़ता है . यह इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है और इसकी विशेषता यह है कि जब बड़ी जहाजों को निकलना होता है तो रेल की पटरियों को उठा दिया जाता है और निकल जाता है. पुनः पटरी को नीचे कर दिया जाता है रेलगाड़ियाँ गुजरने लगती हैं .
क्या खरीदें –  रामेश्वरम  जाएं तो सामुद्रिक जीवों से निर्मित सामान अवश्य खरीदें। शंख , घोंघे और सीप के कवच  ( sea shell )  के सामान बहुत ही सुन्दर और सस्ते मिलते हैं। इनसे आप घर को सजा सकते हैं और  रामेश्वरम  यात्रा की स्मृति के तौर पर संजो भी सकते हैं। उपहार के लिए भी ये बहुत ही उत्तम होते हैं। साथ में परिवार था, अतः सामान खरीदने का चांस बनता ही था। एकाध अपने लिए और कुछ फरमाइशकर्ताओं के लिए खरीदा। वामावर्ती शंख तो मिलती ही है, दक्षिणावर्ती शंख के तमाम रूप उपलब्ध हैं। मैं तो उनकी उत्पत्ति और प्रकृति और कारीगरों की कारीगरी पर मुग्ध होता रहा जबकि पत्नी और बेटी गृहसज्जा के सामानों की खरीदारी में व्यस्त रहीं। बेटे को गाड़ी टाइप का कोई खिलौना मिल गया था। कभी उसमें व्यस्त हो जाता तो कभी जाँच आयोग के सक्रिय सदस्य की तरह अनेक प्रश्न लेकर आ जाता और मेरी सोच का दम तब तक घोंटता रहता जबतक उसे अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिल जाता। 
 रामेश्वरम  में हमारा ठहराव एक दिन का ही था। रात हो चली थी। दोपहर वाले ढाबे पर ही हमने उत्तर भारतीय भोजन किया  और इस निर्णय के साथ सो गए कि प्रातः जल्दी उठकर कन्याकुमारी वाली बस पकड़नी है। काश  ! एक दिन और होता हमारे पास  रामेश्वरम  में ठहरने के लिए! बस मन ही मन यह प्रार्थना गूंजती रही –
                              श्रीताम्रपर्णी जलराशियोगे 
                                       निबद्ध्यम सेतुम निशि विल्व्पत्रै .
                             श्रीरामचन्द्रेण समर्चितमतम
                                        रामेश्वराख्यं सततं नमामि . 

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Samarthan ka Sailaab

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 22, 2011



समर्थन का सैलाब 
                   -हरिशंकर राढ़ी
अनुमान था कि होगा ऐसा ही।  देशवासियों को एक इंजन मिल गया है और वे अब किसी भी ब्रेक से रुकने वाले नहीं। आज तो जैसे दिल्ली के सारे रास्ते रामलीला मैदान की ओर जाने के लिए ही हों , जैसे दिल्ली मेट्रो केवल अन्ना समर्थकों के लिए ही चल रही हो और हर व्यक्ति के पास जैसे एक ही काम हो- रामलीला मैदान पहुँचना और अन्ना के बहाने अपनी खुद की लड़ाई को लड़ना । साकेत मेट्रो स्टेशन  पर जो ट्रेन बिलकुल खाली आई थी वह एम्स जाते-जाते भर गई और सिर्फ भ्रष्टाचार  विरोधी बैनरों और नारों से। नई दिल्ली स्टेशन से बाहर निकलता हुआ हुजूम आज परसों की तुलना में कई गुना बड़ा था। सामान्य प्रवेश द्वार पर ही हजारों  की भीड़ केवल प्रवेश की प्रतीक्षा में पंक्तिबद्ध थी। किसी भी चेहरे पर कोई शिकन  नहीं, कोई शिकायत  नहीं।
ऐसा शांतिपूर्ण प्रदर्शन  मैंने तो अब तक नहीं देखा था। सच तो यह है कि प्रदर्शनों  से अपना कुछ विशेष  लेना -देना नहीं। राजनैतिक पार्टियों का प्रदर्शन  भंड़ैती से ज्यादा कुछ होता नहीं, मंहगाई  और बिजली पानी के लिए होने वाले प्रदर्शन  जमूरे के खेल से बेहतर नहीं और तथाकथित सामाजिक आन्दोलन भी रस्म अदायगी के अतिरिक्त किसी काम के नहीं। लोग अनशन  भी करते हैं पर सिर्फ और सिर्फ अपने लिए। अब स्वार्थ में डूबे एकदम से निजी काम के लिए परमार्थ वाले समर्थन कहाँ से और क्यों मिले? अगर ऐसे प्रदर्शनों  से दूर रहा जाए तो बुरा ही क्या ? आज पहली बार लगा है कि कोई निःस्वार्थ भाव से देशरक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग के लिए तत्पर है तो लोगों में चेतना जागना स्वभाविक और अपरिहार्य भी है। 
सारा कुछ पूर्णतया नियोजित और अनुशासित  है। इस तरह के आन्दोलन का परिणाम क्या होगा, यह तो अभी समय बताएगा पर ऐसे आन्दोलन होने चाहिए। जिस तरह से लोकतंत्र से  लोक गायब हो चुका है और उसका एकमात्र उपयोग मतपेटियाँ भरना रह गया है, यह किसी भी सत्ता को मदहोश  कर देने के लिए पर्याप्त है। अपनी उपस्थिति स्वयं दर्ज करानी पड़ती है और लोकतंत्र के लोक को अब जाकर महसूस हुआ है कि अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही देनी चाहिए। 
ऐसे प्रदर्शनों के अपने मनोरंजक पक्ष भी हुआ करते हैं। भारतीय मस्तिष्क  की उर्वरता को कोई जवाब तो है ही नहीं, यह आपको मानना पड़ेगा । पहले तो विरोध नहीं, और जब विरोध तो ऐसे -ऐसे तरीके कि विस्मित और स्मित हुए बिना तो आप रह ही नहीं सकते। सरकारी तंत्र के एक से एक कार्टून और एक से एक नारे! अविश्वसनीय  !! कुछ तो अश्लीलता  की सीमा तक भी पहुँचने की कोशिश  करते हुए तो कुछ जैसे दार्शनिक  गंभीरता लिए हुए। 
हर तरह की व्यवस्था के लिए लोग न जाने कहाँ से आ गये हैं। बाहर से भोजन के पैकेट निवेदन करके दिए जा रहे हैं। अंदर भी कुछ कम नहीं। अनेक निजी और संगठनों के लंगर लगातार – चावल-दाल, छोले, राजमा , पूड़ी- सब्जी ही नहीं, जूस तक का भी इंतजाम बिलकुल सेवाभाव से। 
शायद  यही अपने देश की सांस्कृतिक और सह अस्तित्व की विशेषता  है। अपने – अपने हिस्से का प्यार बाँटे बिना लोग रह नहीं पाते। जैसे कहीं से लोगों को पता चल गया हो कि कोई यज्ञ हो रहा है और अपने हिस्से की समिधा डाले बिना जीवन सफल ही नहीं होगा। है तो यह एक यज्ञ ही । परन्तु वापस  आते – आते एक प्रश्न  ने कुरेदना शुरू  ही कर दिया । अन्ना का यह आंदोलन तो सफल होगा ही, सम्भवतः राजनैतिक , प्रशासनिक और सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार का एक बड़ा भाग समाप्त भी हो जाए, किन्तु क्या हम अपने निजी जीवन में भी  भ्रष्टाचार  से मुक्त हो पाएंगे? क्या ऐसा भी दिन आएगा जब तंत्र के साथ लोक भी अपने कर्तव्य की परिभाषा  और मर्यादा समझेगा?
खैर, अभी तो अन्ना जी और उनके आन्दोलन में भाग लेने वाले असंख्य जन को सफलता की शुभकामनाएँ !
अब कुछ झलकियाँ भी जो रविवार के दिन देखी गईं-

अन्ना जी मंच पर : भजन गाते कलाकार 
भ्रष्टाचार के विरुद्ध छोटों की बड़ी जंग 
इस ज़ज्बे को देखिए
भ्रष्टाचार के विरुद्ध हनुमानजी और उनकी सेना 
बिन बुलाए हम भी आए :देश हमारा भी तो है 
हम भी हैं जोश में : देश के लिए 

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आज़ादी की दूसरी लड़ाई

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 19, 2011

-हरिशंकर राढ़ी
नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही एक आदमी ने पूछा-‘‘ भाई साहब, ये रामलीला मैदान किधर है ?’’ मन में कुछ प्रसन्नता सी हुई और उसे रास्ता बताया- ‘‘ बस इधर सामने से निकल जाइए, ये रहा रामलीला मैदान! वैसे आज तो सभी रास्ते रामलीला मैदान ही जा रहे हैं। किसी भी हुजूम को पकड़ लीजिए, रामलीला मैदान पहुँच जाएंगे। इतने दिनों बाद पहली बार तो असली रामलीला हो रही है वहाँ ! वरना रावणलीला से किसे फुरसत मिलती है यहाँ ? वैसे मैं भी वहीं चल रहा हूँ, अगर डर न लग रहा हो तो मेरे साथ चले चलिए। ’’श्रीमान जी मुस्कराए- ‘‘ डर से बचने के लिए ही तो यहाँ आया हूँ। अगर आज भी हम डर गए तो डर से फिर कभी बच नहीं पाएंगे। जहाँ देश  इतने संकट से गुजर रहा हो, वहाँ भी डरने के लिए  बचता क्या है? और डर तो नहीं रहा है एक सत्तर पार का बुजुर्ग जिसका अपना कोई रक्तसंबन्धी ही नहीं है, जो पूरे देश को अपना संबन्धी समझ बैठा है तो मैं क्यों डरूँ?’’
गेट से बाहर निकलकर कमला मार्किट वाली सड़क पर पहुँचा तो जुलूस ही जुलूस । मै भी एक अनजाने जुलूस का हिस्सा बन गया । शायद  पहली बार भीड़तंत्र अच्छा लग रहा था। हर वर्ग, हर उम्र और हर प्रकार के व्यक्ति एक साथ। नारों की आवाज के नीचे ट्रैफिक के शोर  का कोई पता ही नहीं। अगले चौराहे पर पुलिस की बैरीकेडिंग और साथ -साथ स्वयंसेवकों के पानी और खाद्य सामग्री से भरे छोटे ट्रक आगन्तुकों का स्वागत कर रहे थे। हल्की – हल्की बारिश  हो रही थी और प्रवेश  द्वार पर पानी भरा हुआ था-बेहद डबरीला । लेकिन जैसे आज किसी को अपने फैशन  की जैसे चिन्ता ही नहीं। गौरांगी आधुनिकाएं भी इस डबरीले पानी का जैसे उपहास उडा रहीं थीं । उन्हें न तो अपने प्यारे पैरों के गन्दे हो जाने की चिन्ता थी और न ही कीमती सैंडिलों के खराब हो जाने की। आज तो बिलकुल बराबर का साथ था उनका भी । अपनी सुरीली आवाज में नारे और लगा रही थीं। 
पुलिस बल तो भारी संख्या में तैनात था ही। पर यह पुलिस जैसे कुछ अलग सी लग रही थी – बिलकुल शांत  और सहयोगी। न तो कोई अपशब्द और न चेहरे पर धौंस की कोई अभिव्यक्ति । यह कहीं से नहीं लगता था कि अभी चार दिन पहले इसी पुलिस ने इसी अन्ना को बिला वजह गिरफ्तार किया होगा। वह शक्ति  तो कोई और ही रही होगी जिसने इस शक्ति को संचालित किया होगा वरना ऐसा कौन होगा इस देश में जिसे आजादी के बाद भ्रष्टाचार  ने न रुलाया होगा। रही सही कसर जनता के नारे पूरी कर रहे थे- ‘‘ये अन्दर की बात है, पुलिस हमारे साथ है। वर्दी छोड़ के आएंगे , अन्ना – अन्ना चिल्लाएंगे ।’’ सघन जाँच के बाद अन्दर जाने दिया जा रहा था। अच्छा लगा और आज किसी को कोई शिकायत  नहीं थी। आदमी खुश  हो तो क्या – क्या सह लेता है! पर अब शायद भ्रष्टाचार न सहे!
लगभग ढाई बज रहे थे और अन्ना जी मंच पर विराज रहे थे। इन्द्रदेव पता नहीं खुश थे या नाराज क्योंकि सामान्य बारिश हो रही थी । रामलीला मैदान पहले की बारिश से गीला हो चुका था पर पब्लिक को कोई फरक ही नहीं पड़ रहा था। मेरे एक मित्र कहते थे कि हिन्दुस्तान की पब्लिक को फरक बहुत देर से पड़ता है। पर एक बार जब पड़ जाता है तो वह मानती नहीं । पहले शिकार  होती है फिर शिकार करती है। यहाँ के धर्म की यह विशेषता  है। यह बचने का उपाय तबतक नहीं ढूँढ़ती जब तक पानी नाक से ऊपर नहीं आने लगता । इसकी दूसरी विशेषता  यह है कि यह भारतीय रेल के डिब्बे की तरह। पूरी तरह टिकाऊ और मजबूत लेकिन इंजन की तलाश  में है। एक बार एक इंजन लग जाए, कैसा भी, तो यह कितना भी बोझ खींच ले जाए। उनकी बात आज मुझे सही लग रही थी। उसे एक इंजन मिल गया था और अब वह इस इंजन के पीछे-पीछे कहीं तक और कोई भी वजन लेकर जाने को बेताब है।
हुजूम ही हुजूम और नारे ही नारे। मैं कोई रिपोर्ट नहीं कर रहा हूँ। यह तो सभी ने मीडिया की कृपा से प्रतिक्षण देखा ही है। मैं तो इस देश की जनता की देर आयद, दुरुस्त आयद की भावना को पढ़ने की कोशिश  कर रहा हूँ। लोग तो ऐसे भी थे जिन्हें यह नहीं मालूम कि ये जनलोकपाल क्या होता है और कानून बनाता कौन है। हाँ, इस व्यवस्था और मंहगाई से परेशान  थे और ये सोचकर आए थे कि कोई अच्छा काम हो रहा है और इसमें शरीक  होना कोई पुण्य है। भजन पर लोग नाच रहे थे और सुर मिला रहे थे – ये सुर संगीत के नहीं बल्कि समर्थन के थे। हाँ, अपना निराला हिन्दुस्तान वहाँ अपने व्यंग्यात्मक रूप में भी जिन्दा था – भीड़ में जहाँ मैं खड़ा था , वहीं किसी सज्जन का बटुआ अपने किसी हिन्दुस्तानी कलाकार भाई ने मार लिया था। 
चाहता था कि अन्ना को पास जाकर देखूँ। नजदीक जाना प्रतिबंधित था। एक गोल सा घेरा बनाया गया था। मंच के आगे मीडिया वालों का घेरा दिखा तो लगा कि प्रेस वालों के लिए कोई रास्ता तो जरूर है । सैकड़ों फोटोग्राफर और संवाददाता इधर- उधर आना- जाना मचाए हुए थे। परिचय पत्र दिखाने पर प्रेस दीर्घा में  प्रवेश मिल गया । न जाने कितने समारोहों में आना -जाना हुआ है इस आधार पर किन्तु आज जैसे पहली बार लगा कि यह परिचय पत्र सही जगह काम आया है और बहुत प्यारा है।
शाम  के लगभग चार बजे तक रामलीला मैदान आधा भर चुका था। उमड़े हुए संख्या बल को देखकर लग रहा जैसे मुझे भी आजादी की लड़ाई देखने का एक मौका मिल गया हो। अन्ना जी के पास तक पहुँच नहीं सका नहीं तो कहता कि आज सचमुच में भावनात्मक और संकलनात्मक रूप में एक सौ पचीस करोड़ माइनस पाँच सौ तैंतालीस (जो चयनित होने के बाद माननीय हो गए हैं ) तो आपके ही साथ हैं । ( फोटो भी थे पर मोबाइल धोखा दे गया और यहाँ प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ।)

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आप क्या तय कर रहे हैं?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 30, 2010

बिहार चुनाव के नतीजों ने पूरी भारतीय राजनीति को झकझोर दिया है. जाति-धर्म-क्षेत्र जैसे झूठे मुद्दों पर बन्दर की तरह नाचने वाले देसी मतदाताओं ने इन छलावों को मेटहे में बन्द कर लोकतंत्र की बहती नदी की तीव्र धारा के हवाले कर दिया है. बबुआ का जादू भी नहीं चला. स्विस बैंक के खुलासे सामने हैं और आम भारतीय उनमें रुचि ले रहा है. ग़ौर करने की ज़रूरत है, यह लगभग वैसा ही दौर है, जैसा राजीव गान्धी के दौर में हुआ था. आम आदमी का ध्यान पहली बार ख़ास लोगों के काले कारनामों की ओर गया था और जिसने झूठमूठ मुद्दा बना कर जनता को बहकाया था उसी ने मदारी के झोले से मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों का ख़तरनाक सांप निकाल दिया था. कांग्रेस को छात्र नेताओं के जरिये अपनी राजनीति चमकाने का मौक़ा मिल गया और उसने तुरंत पिछले दरवाज़े से छात्र नेताओं को हवा देकर आत्मदाहों का दौर चलवा दिया. पूरे देश में लगभग ख़त्म हो चुका जातिवाद नए सिरे से स्थापित हो गया.

यह न तो अकेले कांग्रेस की चाल थी, न वीपी सिंह की और न भाजपा की. वस्तुतः यह इन सबकी मिली-जुली चाल थी. इस बात पर व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सोचने की ज़रूरत है. हम फिर एक कठिन दौर में आ गए हैं. राजनेताओं की रोजी-रोटी छिनती दिख रही है और मीडिया व व्यावसायिक जगत के बड़े-बड़े टायकूनों के लंगोटे उतर रहे हैं. बहुत सतर्क रहने की ज़रूरत है. क्योंकि असली मुद्दों के प्रति आम आदमी की जागरूकता भारतीय राजनेता बर्दाश्त नहीं कर सकते. राजनीति की रहस्यमय बोतल से जल्दी ही जाति-धर्म-क्षेत्र-संप्रदाय … का कोई नया जिन्न निकलने ही वाला है. ऐसे में एक समझदार मनुष्य होने के नाते आपको पहले से ही अपनी भूमिका तय करके रखनी है. आप क्या तय कर रहे हैं?

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उत्तर आधुनिक शिक्षा में मटुक वाद – दूसरी किश्त

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 27, 2010

हरिशंकर राढ़ी
माना कि प्रो० मटुकनाथ से पूर्व और उनकी उम्र से काफी अधिक या यूँ कहें कि श्मशानोंमुख असंखय प्राध्यापकों ने ऐसा या इससे भी ज्यादा पहले किया था, किन्तु वे इसे आदर्श रूप में प्रस्तुत नहीं कर पाए थे।उनके अन्दर न तो इतना साहस था और न ही क्रान्ति की कोई इच्छा।जो भी किया , चुपके से किया। छात्राओं के सौन्दर्य एवं कमनीयता का साङ्‌गोपांग अध्ययन किया, गहन शोध किया और अपनी गुरुता प्रदान कर दी । प्रत्युपकार भी किया, पर चुपके- चुपके।आज न जाने कितनी पीएचडियाँ घूम रही हैं और न जाने कितने महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज्ञान बांटकर पैसे और इज्जत बटोर रही हैं, देश की बौद्धिक सम्पदा की प्रतीक बनी बैठी हैं।ये बात अलग है कि गुरुजी ने कितना बड़ा समझौता शिक्षा जगत से किया, कितना बड़ा पत्थर सीने पर रखा , ये वही जानते हैं। पर मन का क्या करें? अब वे भी उदार भाव से पीएचडी बाँट रही हैं। प्रोफेसर साहब की असली शिष्या जो ठहरीं!
पर दाद देनी होगी अपने प्रोफेसर मटुकनाथ जी को जिन्होंने इस तरह के गुमशुदा एवं निजी संबन्धों को मान्यता प्रदान की और मटुकवाद स्थापित किया। उनको एक उच्च दार्शनिक की श्रेणी में रखना चाहिए।इस तरह का साहसिक निर्णय कोई दार्शनिक ही कर सकता है। ये बात अलग है कि ऐसे लोगों को दुनिया पागल मान लेती है। हालांकि प्रेमी, पागल और दार्शनिक में कोई मूल अन्तर नहीं होता। सुकरात को जहर दे दिया और अरस्तू की छीछालेदर में कोई कसर नहीं छोड़ी । इतने दिनों बाद ही हम उनकी बात जैसे -तैसे समझ पाए हैं।मार्क्सवाद ,लेनिनवाद को ले लीजिए, कितने दिनों बाद जाकर इसे प्रतिष्ठा मिली! अपने मटुकनाथ ने भी कोई कम प्रताडना नहीं झेली। लोगों ने चेहरे पर कालिख पोती, चरण पादुकाओं का हार भी पहनाया पर इस महात्मा के चेहरे पर शिकन नहीं आई। प्रेम पियाला पीने वाला इस दुनिया की परवाह करता ही कब है ? मीरा ने तो जहर का प्याला पी लिया था।
सर्वमान्य तथ्य तो यह है कि मनुष्य अधेड़ावस्था के बाद ही स्त्रीदेह के सौन्दर्य को आत्मसात कर पाता है, ठीक वैसे ही जैसे वास्तविक शिक्षा विद्यार्थी जीवन के बाद ही प्राप्त होती है।विद्यार्थी जीवन में तो मनुष्य परीक्षा पास करने के चक्कर में रट्टा मारता ही रह जाता है, अर्थ समझ में ही नहीं आता! अधेड ावस्था से पूर्व तो वह एक्सपेरिमेन्ट के दौर से ही गुजरता रह जाता है। गंभीरता नाम की कोई चीज होती ही नहीं, बस भागने की जल्दी पड़ी होती है।ऐसी स्थिति में एक नवयुवक किसी नवयौवना को क्या खाक समझेगा ? कमनीयता की उसे कोई समझ ही नहीं होती! जब तक वह समझदार होता है, सहधर्मिणी में खोने लायक कुछ बचा ही नहीं होता। अतः पचास पार की उम्र में ही वह एहसास कर पाता है कि किशोरावस्था पार करती छात्रा वास्तव में होती क्या है ? मटुकवाद की गहराई में जाएं तो अर्थ यह निकलता है कि ऐसी छात्रा एकदम नई मुद्रित पुस्तक का मूलपाठ होती है- बिना किसी टीका-टिप्पणी एवं अंडरलाइन की! अब उसका अर्थबोध, भावबोध एवं सौन्दर्यबोध तो कोई अनुभवी प्राध्यापक ही कर सकता है, एक समवयस्क छात्र नहीं जिसका उद्देश्य गाइडों एवं श्योर शाट गेस्सपेपर से शार्टकट रट्टा मारकर परीक्षा पास करना मात्र है।
गुरूजी इतना कुछ करके दिखा रहे हैं।लर्निंग बाइ डूइंग का कान्सेप्ट लेकर चल रहे हैं। प्रेम करने की कला छात्र उनसे निःशुल्क प्राप्त कर सकते हैं । परन्तु वे अनुशासनहीन होते जा रहे हैं। प्रोफेसर साहब के खिलाफ ही हंगामा खड़ा कर दिया। मजे की बात यह कि बिना शिकायत के ही पंचायत करने आ गए। छात्राजी की शिकायत बिना ही संज्ञान ले लिया। अपने यहाँ तो पुलिस और प्रशासन भी बिना शिकायत कार्यवाही नहीं करते। हकीकत तो यह है कि शिकायत के बाद भी कार्यवाही नहीं करते और एक ये हैं कि बिना शिकायत ही दौड़े चले आ रहे! शायद यह सोचा होगा कि उनके हिस्से की चीज गुरूजी ने मार ली, वह भी इस आउटडेटेड बुड्‌ढे ने!

अब इन मूर्ख शिक्षार्थियों को कौन समझाए कि आखिर वो बेचारी मिस कूली अकेली क्या करती । सारी की सारी शिक्षर्थिनियाँ तो गर्लफ्रेण्ड बन चुकी थीं , वही बेचारी अकेली बची थी। तुम्हें तो फ्लर्ट करने से ही फुरसत नहीं! वैसे भी समलैंगिकता को मान्यता मिलने के बाद तुम्हें लड़कियों मे कोई इन्टरेस्ट नहीं रह गया है। तुम्हारे भरोसे तो वह कुँआरी रह जाती ! लेस्बियनपने का लक्षण न दिखने से वैसे ही पुराने एवं संकीर्ण विचारों की लगती है। ऐसी दशा में उसे पुरानी चीजें ही तो पसन्द आतीं और उम्र में तिगुने गुरूजी पसन्द आ गये तो हैरानी किस बात की।
असमानता तो बस उम्र की ही है। इतिहास भी असमानता की स्थिति में ही बनता है।प्रो० साहब उम्र और ज्ञान में बिलकुल ही भिन्न हैं तो इतिहास बना कि नहीं? शिक्षार्थी गण , अगर आप में से कोई मिस कूली को हथिया लेता तो क्या आज शिक्षा के क्षेत्र में मटुकवाद का आविर्भाव होता ?
मानिए न मानिए, मिस कूली बहुत ही उदार, ईमानदार एवं गुरुभक्त है। समर्पण हो तो ऐसा ही हो! कहाँ एक तरफ गुरू का कत्ल करने वाले आज के शिष्य गण और कहाँ गुरु को इतना प्यार करने वाली शिष्या! गुरुऋण से मुक्ति पा लिया।अब अगर गुरु ही ऋण में पड जाए तो पड़े । बिना दहेज ही सेटेल्ड पति पा लिया, वर्तमान पगार से लेकर निकट भविष्य में मिलने वाली पेंशन का अधिकार भी सहज ही मिल गया, इस जमाने में ऐसा भाग्य सबका कहाँ ? ज्ञानियों ने कहा है कि शादी उससे मत करो जिसे तुम प्यार करते हो बल्कि उससे करो जो तुम्हें प्यार करता हो। तुम्हारा क्या, तुम तो किसी से प्यार कर सकते हो!वह तो अपने हाथ में है।

युगों से शिक्षा जगत नीरसता का रोना रो रहा है। शिक्षाविदों के हिसाब से शिक्षा व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करती है। यहां शिक्षा केवल सूचनाओं का संकलन मात्र बनकर रह गई है। करने के नाम पर कुछ रह ही नहीं गया है।सृजन का कोई स्कोप ही नहीं रहा। बड़े-बड़े शिक्षाविद भी भारतीय शिक्षा को रोचक नहीं बना पाए। शैक्षिक अनुसंधान परिषद् सिर पटकते रह गए परन्तु लर्निंग ज्वॉयफुल बन ही नहीं पाई।कम्प्यूटर , खेल, संगीत एवं कार्य शालाएं सफेद हाथी ही सिद्ध हुए।पोथी पढि -पढि जग मुआ। पर , अपने मटुकनाथ मिस कूली से मिलकर एक ही झटके में शिक्षा को रोचक एवं उद्देश्य पूर्ण बना दिया।ज्ञानयोग एवं प्रेमयोग का अनूठा संयोग शिक्षा को मृगमरीचिका से बाहर लाया।बुजुर्ग एवं युवा पीढ़ी का मिलन हो गया। जेनरेशन गैप की अवधारणा निर्मूल सिद्ध होने लगी। शिक्षक एवं शिक्षर्थिनियाँ एक दूसरे के हो गए। पुरानी वर्जनाएँ टूट गई। शिक्षा में यह एक नए युग का सूत्रपात है। माना कि कुछ लोग विरोध में भी हैं, पर विरोध किस वाद का नहीं हुआ है ? पोंगापंथी कब नहीं रहे ? पर हाँ, यदि हमें एक सम्पूर्ण विकसित देश बनना है और पाश्चात्य जगत को टक्कर देनी है तो मटुकवाद को समर्थन देना ही होगा।

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उत्तर आधुनिक शिक्षा में मटुकवाद

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 23, 2010

हरिशंकर राढ़ी
(यह व्यंग्य समकालीन अभिव्यक्ति के जनवरी -मार्च २०१० अंक में प्रकाशित हुआ था । यहाँ सुविधा की दृष्टि दो किश्तों में दिया जायेगा । )
वाद किसी भी सभ्य एवं विकसित समाज की पहचान होता है, प्रथम अनिवार्यता है। वाद से ही विवाद होता है और विवाद से ऊर्जा मिलती है। विवाद काल में मनुष्य की सुसुप्त शक्तियां एवं ओज जागृत हो जाते हैं। विवाद से सामाजिक चेतना उत्पन्न होती है। लोग चर्चा में आते हैं। जो जितना बड़ा विवादक होता है, वह उतना ही सफल होता है।
आदमी जितना ही बौद्धिक होगा, उतना ही वाद होगा। जिस समाज में जितने ही वाद होंगे , वह उतना ही विकसित एवं सुशिक्षित माना जाएगा। वस्तुतः वाद का क्षेत्र अनन्त है, स्थाई है किन्तु साथ-साथ परिवर्तनशील भी है। इसका व्याप्ति क्षेत्र एवं कार्यक्षेत्र दोनों ही असीमित है। अब तो यह पूर्णतया भौमण्डलिक भी होने लगा है। इस पर तो एक सम्पूर्ण शोध की आवश्यकता है। कमी है तो बस केवल शुरुआत की। एक बार शुरुआत हो जाए तो देखा-देखी शोध ही शोध ! बुद्धि के क्षेत्र में अपने देश का शानी वैसे भी सदियों से कोई नहीं रहा है। अब जहां इतनी बुद्धि है वहाँ वाद तो होंगे ही। सच तो यह है कि यह देश ही वाद की वजह से जीवित है। जैसे-जैसे देश की आबादी बढ़ी , वाद का परिवार भी बढ ता गया और वाद-विवाद, प्रतिवाद,संवाद एवं परिवाद भी संतान रूप में इसके परिवार में सम्मिलित होते गए।
मुझे लगता है कि वादों की श्रृंखला मनुवाद से हुई होगी और जाकर मक्खनवाद पर समाप्त मान ली गई होगी। मनु की व्यवस्था के गतिशील होने का बाद तमाम तरह के वाद आते गए। द्वैतवाद-अद्वैतवाद, शैववाद -अशैव वाद के नाम पर सिरफुटौव्वल पहले के मनीषियों का मनपसन्द टाइमपास था। मध्यकाल तक आते-आते कर्मवाद और भाग्यवाद जोर पकड ने लगे। भाग्यवाद ने जोर मारा तो विदेशियों का आक्रमण एवं शासन हुआ। हमें शासन करने से भी छुटकारा मिला।होइ कोई नृप हमहिं का हानी! जैसे तैसे उनके शासन के बाद आजाद हुए तो पुनः भाग्यवाद का ही सम्बल मिला और आज भी उसी के सहारे अपना देश चल रहा है।
हम एक तरह के स्वाद के आदती नहीं हैं, अतः हमारा इससे भी ऊबना स्वाभाविक था। विकर्षण हो गया इससे।भाग्यवाद में एकता और समरसता होती है, अत्याचार सहने की क्षमता होती है। प्रतिक्रिया का कोई स्कोप ही नहीं होता। अतः देश के नेतृत्व को बेचैनी हुई। सोई जनता को जगाना परम आवश्यक हो गया। इतना बड़ा भाग्यवाद भी क्या कि आप मतदान के लिए न निकलें! चूँकि वाद के बिना समाज का कोई अस्तित्व ही नहीं होता इसलिए पहले भाग्यवाद का स्थानापन्न लाना जरूरी था। काफी सोचविचार के बाद सम्प्रदायवाद,जातिवाद, क्षेत्रवाद एवं भाषावाद के चार विकल्प उपलब्ध कराए गए। परिणाम सामने है- आज लोकतंत्र अपने चरम उत्कर्ष पर है।
अपने यहां की वाद की विविधता का कोई जवाब तो है ही नहीं! कौन सा वाद है जो अपने यहाँ न हो! समाज के हर वर्ग के लिए यहाँ वाद की व्यवस्था की गई है क्योंकि वाद के बगैर मनुष्य मनुष्य की श्रेणी में आता ही नहीं। विविधता को एकता की कड़ी में पिरोया गया है।एक मनीषी द्वैतवाद-अद्वैतवाद के विकास में लगे तो दूसरे संभोगवाद में।पुरानी हर चीज क्लॉसिकल होती है, आप इस तथ्य को नकार नहीं सकते। अपना देश तो हर मामले में क्लॉसिकल रहा ही है, अगर आप जरा सा भी देशभक्त होंगे तो इस बात का विराध करेंगे ही नहीं।पाश्चात्य देश अब जाकर इक्कीसवीं शताब्दी में भोगवाद का नारा दे पा रहे हैं। आज वे ब्ल्यू फिल्मों एवं पोर्न साइटों के सहारे आदमी को थोडा सा शारीरिक सुख प्रदान करने का दावा कर रहे हैं। स्त्री शरीर के कुछ उल्टे-पुल्टे तरीके दिखाकर आप एडवांस बन रहे हैं।इन्हें कौन समझाए कि भोगवाद में हमारे जैसा क्लॉसिकल होना आपके बूते का नहीं ! फिल्मों की बात छोडि ए, जब आपको अ अनार भी नहीं आता था तो हमारे यहां आचार्य जी ने चौरासी आसनों का शास्त्रीय अविष्कार कर दिया था। ऐसे-ऐसे आसन कि भोग करो तो योग अपने आप ही हो जाए! कुछ में तो सर्कस की सी स्थिति बन जाए या फिर हड्डियां चटक जाएं। फिर भी आप हमें पिछड़ा समझते हैं? लानत है आप पर!

वाद परम्परा मनुवाद से शुरू होकर मक्खनवाद पर ठहर सी गई थी। निराशावादियों को लगा कि देश सो गया है, देश की नाक की किसी को चिन्ता ही नहीं। शिक्षा का पतन हो गया होगा और शोध बन्द हो गए होंगे। अध्ययन के नए तरीके और अध्ययन में नए वाद कि लिए बुद्धिजीवी आगे आ ही नहीं रहा होगा। इससे पहले कि लोग अन्तिम रूप से निराश हों, देश की शिक्षा पद्धति में एक अभूतपूर्व वाद पैदा ही हो गया और वह था मटुकवाद।
परम्परा यह है कि किसी भी वाद का नामकरण उसके प्रवर्तक के नाम पर ही आधारित होता है जैसे कि मार्क्सवाद, माओवाद , नक्सलवाद या फिर मनुवाद।इस हिसाब से नव आविष्कृत वाद का नाम भी इसके आविष्कारक प्रो० मटुकनाथ के नाम पर न होना उस महात्मा के साथ घोर अन्याय होगा।
इन प्रोफेसर साहब का आविर्भाव देश की एक अनन्य उपजाऊ धरती पर हुआ। वह हिस्सा ज्ञान के क्षेत्र में तबसे अग्रगण्य था जब शताब्दियाँ भी शुरू नहीं हुई थीं।जब दुनिया का नक्शा भी नहीं बना था तो वहां विश्व विद्यालय था।कई यात्री तो ज्ञान की लालच में उत्तर से पैदल-पैदल ही पहाड़ पार करके आ गए थे और हैरत की बात यह कि बिना लुटे-पिटे ही वापस भी चले गए थे। अब, जब शिक्षा बिलकुल नीरस और उद्देश्यहीन हो गई तो एक बार फिर वही धरती आगे आई और एक रोचक एवं अत्यन्त उपयोगी वाद का प्रादुर्भाव हुआ।
मटुकवाद शिक्षा के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व क्रान्ति है। पहली बार ऐसा कुछ हुआ कि किसी प्राध्यापक ने अपने बलबूते कुछ कर दिखाया और एक अत्यन्त व्यावहारिक ज्ञान को पाठ्‌यक्रम की विषय वस्तु बनाया । हकीकत तो यह है कि इसके पहले महाविद्यालय और विश्व विद्यालय स्तर तक अनुपयोगी और अव्यावहारिक सिद्धान्त पढाये जाते रहे हैं। अरस्तु -आइंस्टाइन से लेकर लेनिन- लोहिया के सिद्धान्तों का इन्ट्रावेनस इंजेक्शन ही ठोंका जाता रहा है अब तक जवानी से पीडि त बेचारे छात्र-छात्राओं को! किसी ने इनकी प्राकृतिक आवश्यकताओं को समझने की कोशिश ही नहीं की, जैसे कि खाने-पीने और पढ ने-लिखने के अलावा इनकी और कोई काम ही नहीं हो!

इससे पहले कि मटुकवाद की महत्ता पर कुछ प्रकाश डाला जाए,इसकी परिभाषा समझ लेना जरूरी है।जब कोई अध्यापक या प्राध्यापक किशोरावस्था पार करती अपनी ही किसी लावण्यमयी शिष्या को प्यार का ऐसा पाठ पढ़ा दे कि वह उस अध्यापक या प्राध्यापक पर ही मर मिटे या विवाह बंधन में बंधने को अड जाए तो इसे मटुकवाद कहते हैं।स्मरण रहे कि यहां छात्रा एवं प्राध्यापक की उम्र में कम से कम बीस वर्ष का अन्तर होना आवश्यक है।यदि किसी छात्रा का आकर्षण – समर्पण किसी युवा या अविवाहित प्राध्यापक के प्रति है तो इसे मटुकवाद नहीं माना जाएगा। इसे चिरातनकाल से ही स्वाभाविकवाद माना जाता रहा है।पूर्ण मटुकवाद तभी होता है जब प्राध्यापक विवाहित हो और उसके अपनी संतान छात्रा के समवयस्क हों।
इस परिभाषा पर विद्वान एकमत नहीं होंगे, यह मैं समझता हूँ । जो एकमत हो जाए वह विद्वान हो ही नहीं सकता। इस परिभाषा में बहुत सारी खोट ढूंढी जांएगी और अपवादों का हवाला दिया जाएगा। इसीलिए यहाँ परिभाषा को उद्धरण चिह्‌न के अन्दर नहीं रखा गया है। केवल लक्षण ही बताया गया है।ऐसा नहीं है कि मटुकवाद सर्वथा नई धारणा या घटना है। ऐसा भी नहीं है कि प्राध्यापकगण इससे पूर्व अपनी शिष्या के नागपाश में नहीं बंधे या शारीरिक संवाद से अनभिज्ञ रहे,परन्तु वे वाद का पेटेन्ट अपने नाम से नहीं करा सके।ठीक उसी प्रकार जैसे कि हल्दी,चंदन एवं नीम का ओषधीय प्रयोग अपने देश में सदियों से होता रहा किन्तु पेटेन्ट तो अमेरिका ने ले लिया!
(शेष अगली किश्त में )

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भाषाई आत्मा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 26, 2010

–हरिशंकर राढ़ी

भोजपुरी गानों की चर्चा हुई तो मेरी पिछली पोस्ट पर दो टिप्पणियाँ ऐसी आईं कि यह नई पोस्ट डालने के लिए मुझे विवश होना पड़ा।हालांकि इन टिप्पणियों में विरोधात्मक कुछ भी नहीं है किन्तु मुझे लगता है कि इस पर कुछ और लिखा जाना चाहिए। एक टिप्पणी में रंजना जी ने भोजपुरी गीतों में बढती फूहडता पर चिन्तित नजर आती हैं तो दूसरी टिप्पणी में सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी मनोज तिवारी मृदुल का नाम न लिए जाने को शायद मेरी भूल मानते हैं किन्तु वे स्वयं ही उस बात पर आ जाते हैं जिसकी वजह से मैंने उनका नाम नहीं लिया ।
इसमें संदेह नहीं कि मनोज तिवारी मृदुल आज भोजपुरी के एक बड़े स्टार हैं। अब बड़े स्टार हैं तो बड़ा कलाकार भी मानना ही पड़ेगा । भोजपुरी का उन्होंने काफी प्रचार-प्रसार किया है। भोजपुरी में पॉप संगीत का प्रथम प्रयोग करने वाले वे संभवतः पहले गायक हैं( बगल वाली जान मारेलीं )और बहुत लोकप्रिय भी हैं। मेरी जानकारी के अनुसार उनकी लोकप्रियता का ग्राफ शारदा सिन्हा और भरत शर्मा से कहीं ऊपर है। पर मैं यह बड़े विश्वाश से कह सकता हूँ कि उनके आज के गीतों में भोजपुरी की आत्मा नहीं बसती। एक समय था जब उनके गीतों में कभी – कभी भोजपुरी माटी की गंध का स्पर्श मिल जाता था।उस समय भी उसमें खांटी आत्मा नहीं होती थी। मुझे याद हैं उनके गीतों के कुछ बोल-हटत नइखे भसुरा ,दुअरिये पे ठाढ बा ; चलल करा ए बबुनी’…….. और कुछ पचरे। परन्तु वह खांटीपना कभी भी नहीं दिखा जो भरत शर्मा व्यास, शारदा सिन्हा और मोहम्मद खलील के गीतों में दिखता रहा है ।
दरअसल मनोज तिवारी और अन्य कई गायकों की भाषा तो भोजपुरी अवश्य है किन्तु उनके गीतों और धुनों की आत्मा भोजपुरी नहीं है। केवल भाषा का प्रयोग कर देने से भाषाजन्य वातावरण नहीं बन जाता। वास्तविक वातावरण तो परिवेश से बनता है। फिल्म ”नदिया के पार” इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। इस फिल्म की भाषा भोजपुरी आधारित मानी जा सकती है किन्तु भोजपुरी कतई नहीं । किन्तु इसकी पटकथा और परिवेश ऐसा है कि प्रायः लोग इसे भोजपुरी फिल्म मान लेते हैं । भाषा के आधार पर यह फिल्म भोजपुरी तो बिल्कुल नहीं है। भोजपुरी गीतों की अपनी भाषा ही नहीं वरन अपना परिवेश , परम्परा और मुखयतया अपनी धुनें भी हैं । सोहर, गारी , नकटा, उठाना , सहाना, कजरी (बनारसी और मिर्जापुरी), पूरबी , छपरहिया, चैता, चैती, फगुआ,झूूमर और इनके कई विकारों से मिलकर भोजपुरी संगीत का संसार बना है। फिल्मी गीतों, पंजाबी पॉप और डिस्को संगीत को भोजपुरी शब्द दे देने से बनी रचना भोजपुरी नहीं हो जाएगी। आज पंजाबी पॉप संगीत का परिणाम लोगों के सामने है। एक बड़ा तबका जो पंजाबी संस्कृति, पंजाबी साहित्य और पंजाबी लोक संगीत से वाकिफ नहीं है वह वर्तमान पंजाबी पॉप (बदन उघाडू दृश्य ) संगीत को वास्तविक पंजाबी गीत मानने लगा है और पंजाब की माटी के असली गीत कहीं गुम हो गए हैं।
लोकगीतों के साथ एक खास बात यह होती है कि वे लोकसाहित्य के एक महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं। उनमें लोकसाहित्यकार अपनी संवेदनशीलता से एक जीवंतता पैदा कर देते हैं और वे क्षेत्र विशेष की जीवन शैली के प्रतिबिम्ब बन जाते हैं । भोजपुरी गीतों मे इस बात को शिद्दत के साथ महसूस किया जा सकता है। मौसम के गीत हों या किसानी के, उनमें भोजपुरी क्षेत्र का सजीव वातावरण मिलता है। मुझे इस इलाके का एक पारंपरिक गीत याद आता है – गवना करवला ये हरि जी, अपने विदेशावां गइला हो छाय । इस गीत को बाद में भरत शर्मा ने अपनी खांटी देशी शैली में बड़ी ठसक से गाया और इसके सारे दर्द को बाहर निकाल दिया। इस गीत में गौने की परम्परा ही नहीं अपितु उस विरह का भी जिक्र है जो इस क्षेत्र में सदियों से पाया जाता रहा है। संयुक्त परिवार की परम्परा में प्रायः कोई एक पुरुष जीविकोपार्जन के लिए कलकत्ता या असम की तरफ चला जाया करता था और उसकी नवोढा विरहाग्नि में तपती रहती थी। यही कारण है कि यहां के गीतों में विरह का बोलबाला पाया जाता रहा है । और तो और यहां इसी के चलते विरहा विधा का अलग से अस्तित्व पाया जाता है। भोजपुरी भाषी इस बात को ठीक से जानते और समझते हैं ।
अपनी इन्हीं मान्यताओं के चलते मैं मनोज तिवारी को ऐसे भोजपुरी गायकों की श्रेणी में नहीं रखता जो भोजपुरी गीतों में वहां की पूरी परम्परा लिए चलते हैं । ये बात अलग है कि भोजपुरी और भाग्य ने उन्हें बहुत कुछ दिया है। इस परिप्रेक्ष्य में भरत शर्मा और शारदा सिन्हा के साथ न्याय नहीं हुआ है।
एक अच्छा गायक अच्छा गीत कार भी हो जाए, यह जरूरी नहीं । अच्छे गायक इस बात को समझते हैं। गुड्डू रंगीला और निरहू के गीत कौन लिखता है यह तो मैं नहीं जानता , पर शारदा सिन्हा के अधिकाँश गीत पारंपरिक है।भोलानाथ गहमरी और तारकेश्वर मिश्र राही के गीत भोजपुरी गंध लिए हुए चलते हैं कई बार दिल को छू जाते हैं । इनके अलावा अनेक अज्ञातनामा कवि और कलाकार भोजपुरी संगीत की उच्चकोटि की सेवा कर रहे हैं ।निरहू करण और रंगीलाकरण हो रहा है परन्तु भोजपुरी की जड़ें बहुत गहरी हैं और मुझे विश्वाश है कि फिर भोजपुरी अपनी आत्मीयता देती रहेगी।

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ओकरे किरुआ परी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 4, 2010

— हरि शंकर राढ़ी
उस समय लगभग साढ़े बारह बज रहे थे। धूप अपने पूरे यौवन पर थी। गर्मी से बुरा हाल था लेकिन इस सांस्कृतिक नगरी में बिजली गुल थी । भूख लगी हुई थी और हम खाना खाने एक होटल में गए। उसका इनवर्टर फेल हो चुका था और जेनेरेटर था नहीं । गर्मी से बैठा नहीं जा रहा था और हम अपनी भूख लेकर वापस आ गए। चारो तरफ जेनेरेटर दनदना रहे थे। रिक्शे पर बैठे और हम कैण्ट की तरफ चल दिए और उसी के साथ मेरे विचारों की श्रृंखला भी।
पूरे यूपी में बिजली का बुरा हाल है और हम कहते हैं कि बड़ा विकास हुआ है। अब तो विकास दिखता नहीं , दिखाया जाता है। विकास के आंकड़ों से विकास सिद्ध किया जाता है।विकास हुआ कितना है यह तो भुक्तभोगी ही जानता है। मुझे याद है, मेरे गांव का विद्युतीकरण वर्ष १९८८ में हुआ था और वह भी व्यक्तिगत प्रयासों से ।उस दौरान बीस से बाइस घंटे बिजली रहा करती थी। न्यूनतम १८ घंटे तो रहती ही थी और कभी-कभी तो २४ घंटे भी मिल जाती थी । सरकार कह सकती है कि तब आबादी कम थी । तर्क ढॅँूढ लेना कोई बहुत मुश्किल कार्य नहीं होता ।आबादी बढ ी है पर बिजली की खपत व्यक्तिगत रूप में कम ,पारिवारिक रूप में ज्यादा होती है। आज यूपी में बिजली का आपूर्ति आधिकारिक तौर पर छः घंटे है और कट पिट कर यह तीन – चार घंटे बैठती है । अर्थात आपूर्ति एक तिहाई हो चुकी है जबकि आबादी तो तीन गुना नहीं बढ़ी है । कीमतें तो करीब पंद्रह गुना बढ चुकी हैं। मुझे यह भी ठीक से याद है कि तब घरेलू उपभोग की बिजली पांच सौ वाट लोड तक सत्रह रुपये प्रति माह के दर से थी।इतना विकास हुआ तो उत्पादन क्यों नहीं बढ ा ?
प्रश्न इच्छा शक्ति और जनकल्याण की भावना का है। नब्बे के दशक से क्षेत्रीय राजनीति का बोलबाला हो गया। छोटी- छोटी राजनैतिक पार्टियाँ अस्तित्व में आईं और विकास की जगह जातिवाद का पत्ता खूब चला। आजादी के चालीस साल बाद जब शिक्षा का इतना विकास हो चुका था, जातिवाद केवल शीर्षक बन कर रह चुका था , तब इस प्रकार का जाति आधारित ध्रुवीकरण एक आश्चर्य जनक घटना थी। आखिर वह कैसी शिक्षा थी जो हमें पुनः उसी जातिवादी खोह की ओर वापस लेकर चल पड़ी ?जिनकी न कोई राजनीतिक पृष्ठ भूमि थी और न आदर्श सोच और न एक बेहतर भविष्य का सपना , ऐसे लोग सत्ता में आ गए और आते गए। जब बिना किसी विकास के ही जबानी खर्च पर वोट मिलता रहे तो नाहक परेच्चान होने की क्या जरूरत ? अब अगर आपने जाति पर खुच्च होकर सरकारें बनाईं हैं तो इसी पर खुश रहिए, बिजली का क्या करेंगे ? अन्ततः खुश ही तो होना था!
खैर, कैण्ट आया और खाना खाकर आराम करने लग गए। इस बीच मैंने प्रो० बंशी धर त्रिपाठी जी को फोन कर लिया। प्रो० त्रिपाठी जी कशी विद्यापीठ मे समाज शास्त्र के प्राध्यापक थे और अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
कई वर्ष पहले समकालीन अभिव्यक्ति में प्रकाशनार्थ उनके कई लेख प्राप्त हुए थे। व्यक्तिगत रूप से मुझे उनक ेलेख बहुत पसन्द आए थे और हमने उन्हें यथासमय प्रकाशित भी किया था। इसके बाद गोस्वामी तुलसी दास की जन्मभूमि से संबंधित उनका एक शोध परक लेख साहित्य अमृत में प्रकाशित हुआ था और उस पर मैंने कुछ और तर्क देते हुए समर्थन किया था तो उन्होंने स्वयं फोन करके लम्बी बातचीत की थी। तबसे देर सबेर बातों का सिलसिला जारी था। उन्हें फोन करके जब मैंने ये बताया कि मैं वाराणसी में ही हूँ तो वे बड े प्रसन्न हुए। बोले- अवस्था मेरी ऐसी नहीं है कि मैं मिलने आ सकूँ, यदि आप आ जाएं तो बड ा ही अच्छा हो। मैंने भी हाँ भर दी । विद्वानों का आशीर्वाद मिले कहाँ ?

प्रो० त्रिपाठी जी करौंदी में रहते हैं। यह तो मुझे मालूम था पर वाराणसी के भूगोल से मैं इतना वाकिफ भी नहीं हूँ। शाम का समय तय था । परिवार को छोड़कर मैं उनसे मिलने चल पड़ा । कैण्ट से लंका और वहां से करौंदी। घर आसानी से मिल गया । बड़ा सा गेट सामान्यतया भिड़ाया हुआ था। वे बरामदे में ही बैठे थे, मैंने उन्हें पहचान लिया । फोटो कई जगह देखा था और खुद अपनी पत्रिका में भी छापा था। पर त्रिपाठी जी मुझे नहीं पहचान सके । जब मैंने परिचय दिया तो वे बड़े अचम्भित हुए और प्रसन्न भी । उनकी कल्पना थी कि मैं कोई उम्रदराज साठ से ऊपर का व्यक्ति होऊँगा क्योंकि समकालीन अभिव्यक्ति का सह संपादक हूँ और काफी दिनों से उनके सम्पर्क में हूँ।
प्रो० त्रिपाठी की विद्वता से प्रभावित हुए बिना शायद ही कोई रह पाए। वे समाज शास्त्र के प्रोफेसर रहे किन्तु मुझे कई बार भ्रम सा हुआ कि ये संस्कृत के प्रोफेसर होंगे । आपने हिन्दी, अंगरेजी और संस्कृत तीनों ही भाषाओँ में उच्च कोटि का लेखन किया है। भारत में साधुओं के जीवन पर उन्होंने गहन शोध किया है और उनकी पुस्तक साधूज ऑफ़ इंडिया पूरे विश्व में काफी सराही गई है। इसके अलावा उन्होंने अत्यन्त स्तरीय और उपयोगी ग्रन्थों का सृजन किया है। चारो धाम यात्रा का बड ा ही सजीव वर्णन उन्होंने किया हैं। गीता के पूरे सात सौ श्लोक उन्हें कण्ठस्थ हैं। सरलता तो उनकी श्लाघनीय है। विद्वता और सरलता का ऐसा संयोग विरले ही मिलता है। मुझे क्षण भर बाद ही ऐसा लगने लगा जैसे मैं इनसे कई बार मिल चुका हूँ और जैसे अपने घर में हूँ। स्वागत और स्नेह की तो बात ही मत पूछिए ! अपनी कई पुस्तकें उन्होंने मुझे उपहार स्वरूप दीं और विभिन्न विषयों पर काफी ज्ञानवर्धक बहस भी की। मुझे लगा कि जितना सम्मान इस मनीषी को मिलना चाहिए , उससे बहुत कम मिला । वस्तुतः साहित्य लेखन में आजकल इतनी भीड हो गई है और उत्पाद इतना बढ गया है कि उसमें स्तरीय साहित्य और साहित्यकार डूब सा गया है।

बड़े गुणग्राही और विनम्र। गोस्वामी तुलसी दास की भाषा में कहें तो उनका हृदय उस सागर के समान है जो चन्द्रमा को पूर्ण देखकर अपनी गरिमा छोड कर उसकी तरफ मिलने चल देता है।
घंटे भर बाद किसी तरह विदा लेकर कैण्ट की तरफ भागा और जाम से जूझते हुए किसी तरह पहुंच भी गया। वहाँ पत्नी और बच्चे संकटमोचन और मानस मंदिर के लिए तैयार बैठे थे। इसमें ऐसा कुछ नहीं जिसका वर्णन करना आवश्यक हो सिवा इसके कि यह वही संकटमोचन मंदिर है जहां भयंकर विस्फोट हुआ था और अब वहां सुरक्षा के नाम पर खानापूर्ति के सिवा कुछ नहीं बचा है।
अगली सुबह जल्दी ही तैयार होकर बस अड्‌डे पहुँच गए और थोड ी जद्दोजहद के बाद बस मिल भी गई और फिर चल भी पड़ी । शहर से बाहर निकलते और टिकट की औपचारिकता पूरी होते ही ड्राइवर महोदय ने भोजपुरी गानों की कैसेट ठोंक दी । आप बड े ही शौक़ीन मिजाज शख्स थे क्योंकि यह बस पूर्णतया सरकारी यानी यूपी रोडवेज की थी और ऐसी बसों में गाने की व्यवस्था आश्चर्य ही होती है।
भोजपुरी गानों का अपना अलग ही रस होता है । धीरे- धीरे माहौल बनने लगा और फिर साहब ने भरत शर्मा व्यास का कैसेट लगा दिया । भोजपुरी में गायकों की एक लम्बी परम्परा रही है। आकाश वाणी के जमाने में मोहम्मद खलील का – कवने खोंतवा में लुकइलू अहि रे बालम चिरई ( गीत शायद भोलानाथ गहमरी का है),चांद वारसी का – नरई ताल कै चीकन मटिया जहां बसै …… और बुल्लू यादव का – नैनों में पृथ्वीराज बस गए ॥ आदि गीत दिलो दिमाग पर छाए रहते। पॉप संगीत की ऐसी गंदी सेना भोजपुरी गीतों पर आक्रमण कर चुकी है कि अब भोजपुरी सुनने लायक ही नहीं बच पा रही। पूरी की पूरी सेना निरहुआ ब्रांड बनती जा रही है और एक वर्ग विशेष इसके पीछे दीवाना बनता जा रहा है।
इस पूरे संक्रमण में अभी दो कलाकार बचे हुए हैं जो भोजपुरी का सोंधापन और मर्यादा लिए हुए चल रहे हैं । इनमें एक तो हैं भोजपुरी की स्वरकोकिला शारदा सिन्हा और दूसरे हैं भरत शर्मा व्यास। तुलनात्मक रूप से इनका उत्पादन कम है , जैसा कि हर अच्छी चीज में होता है । भरत शर्मा के गीत में भोजपुरी का ठसका , लय ताल और पूरी सम्प्रेश्नियता है। ऐसी खाँटी भोजपुरी गाते हैं जो तीन चार दशक पहले की शुद्ध गंवईं होती थी। अब एक गीत आता है जिसे समझने में तो शुरुआत में मुझे भी दिक्कत होती है। गीत का मुखड़ा है- जे हमरे लागत अटैं जरी , ओकरे किरुआ परी। मेरे दोनों बच्चे इतनी खाँटी भोजपुरी नहीं समझते। एक तो वैसे भी बनारस और आजमगढ की भोजपुरी इस भोजपुरी से भिन्न है और उस पर इतनी शुद्ध ! किरुआ परी का अर्थ पत्नी जैसे तैसे बच्चों को समझाती है और सभी खूब हंसते हैं । थोड ी हँसी तो मुझे भी आती है पर मैं स्वर और बोल के दर्द में डूब जाता हूँ। जिनके समझ में भोजपुरी नहीं आती उनके लिए बोल के अर्थ बताता चलूँ। शायद कोई विरहिणी है जो दर्द से टूट चुकी है और अपना बुरा करने वालों को हृदय से श्राप देती है कि जो मेरी जड खोद रहा है उसे कीड े पडें गे। मुझे लगा कि यह दर्द की इन्तहा है और क्षरण के इस युग में इतना शुद्ध दर्द भी नहीं मिलता । कहाँ गए वे विरह के दिन और वे विरहिणियां या विरही जिनके दम पर पद्मावत या फिर मेघदूत जैसी रचनाएं हमें मिलीं। एक युग था जब पूरे भोजपुरी भाषा क्षेत्र के नायक बंगाल और आसाम में नौकरी के लिए जाया करते और नायिकाएं पूरी की पूरी रात विरह में तड पते हुए निका ल दिया करती । कहां बंगाल और कमरू कमच्छा ( कामरूप और कामाखया , असम ) का काला जादू उनके पतियों को भरमा लिया करता था। पूरा जीवन विरह शैया पर ही कट जाता था और भोजपुरी कवियों को विप्रलंभ श्रृंगार से सजाने का मौका मिला करता था। सच तो यह था कि इस क्षे त्र की नायिकाओं का जीवन प्यार की अनुभूति में ही व्यतीत हो जाता था और शायद यही प्यार आजीवन ईंधन का काम करता था । मुझे वे पंक्तियां बहुत ही सटीक लगती हैं-
विरह प्रेम की जागृति गति है और सुसुप्ति मिलन है,
मिलन प्रेम की अन्तिम गति है और विरह जीवन है।

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काशी में एक दिन

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 1, 2010

—हरिशंकर राढ़ी
गेस्ट हाउस में नहा – धोकर लगभग ११ बजे हम काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए चल पड़े। काशी में रिक्शे अभी बहुत चलते हैं, भले ही स्वचालित वाहनों की संखया असीमित होती जा रही हो। रिक्शे की सवारी का अपना अलग आनन्द और महत्त्व है। इधर रिक्शा चला और उधर विचारों की श्रृंखला शुरू हो गई।
काशी यानी वाराणसी अर्थात बाबा विश्वनाथ की नगरी। उत्तर भारत की सांस्कृतिक राजधानी। एक ऐसा विलक्षण शहर जहाँ लोग जीने ही नहीं मरने भी आते हैं। मेरी दृष्टि में यह विश्व का ऐसा इकलौता शहर होगा जहाँ पर मरने का इतना महत्त्व है। इस शहर का इतिहास उतना ही पुराना है जितनी कि भारतीय संस्कृति। कितना पीछे जाएं ? सतयुग तक का प्रमाण तो हरिश्चंद की कथाओं में ही मिल जाता है। पौराणिक मान्यताओं पर विश्वास करें तो भोले नाथ की नगरी स्वयं भोलेनाथ ने ही बसाई थी। या तो वे कैलाश पर रहते या फिर काशी में । एक मित्र के मजाक को लें तो यह बाबा भोलेनाथ की शीतकालीन राजधानी थी क्योंकि शीतकाल में तो कैलाश पर रहने लायक ही नहीं होता।
बनारस एक स्थान नहीं, एक संस्कृति का नाम है- ज्ञान की संस्कृति, अध्यात्म की संस्कृति, सभ्यता की संस्कृति, संगीत की संस्कृति, मस्त मौलेपन की संस्कृति और भांग की संस्कृति। सब कुछ एक साथ। आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ करना है तो काशी आते हैं, मंडन मिश्र की काशी और उनकी पत्नी से विवश होते हैं कि परकाया प्रवेश से काम शास्त्र तक की शिक्षा लेनी पड ती है। तथागत को भी काशी आना पड ता है और अशोक महान को बौद्ध धर्म का प्रचार यहीं से शुरू करना पड ता है। सारनाथ यहीं बनता है। गोस्वामी जी अपना अजर- अमर रामचरित मानस यहीं पूरा करते हैं ।कबीर का लहरतारा, रामानन्द का योग, उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की लमही और जय शंकर प्रसाद की कामायनी, सब कुछ तो यहीं काशी में ही है।
अभी प्रसिद्ध अंगरेजी कवि वाल्काट को पढ़ रहा था , उसमें भी बनारस का संदर्भ है। बनारस तो हिन्दू परिवारों की नाम सूची में सम्मिलित रहा है। कितने लोग बनारसी दास की संज्ञा से विभूषित हुए और बनारसी दास चतुर्वेदी को तो हिन्दी साहित्य में कौन नहीं जानता ?बनारस में रहने वाले कई लोगों का तो उपनाम ही बनारसी बाबू हुआ करता था।
यही वह काशी है। साधु- सन्यासी यहां- वहां घूम रहे हैं। राँड -साँड – सन्यासी , इनसे बचे तो सेवै काशी । हमारा रिक्शा इस बीच जाम-जूम से निकलता हुआ विश्वनाथ जी पहुँच जाता है। अभी रिक्शे से ठीक से उतर भी नहीं पाया हूँ और एक एजेण्ट साथ लग जाता है। अपने आप बोले जा रहा है- बाबूजी, साढ़े ११ बज गए हैं और बारह बजे मंदिर बन्द हो जाएगा। लाइन बहुत लम्बी है। आपको बिना लाइन के दर्शन करा दूँगा। जो मर्जी दे दीजिएगा। मैं कुछ भी उत्तर नहीं देता हूँ। मुझे यह भी पता नहीं कि मंदिर कब बन्द होता है! पता नहीं यह पंडा जी सच बोल रहा है या नहीं! साथ में पत्नी और बच्चे हैं , उसे मालूम है कि ऐसी स्थिति में लोग कष्ट नहीं उठा सकते। धूप भी बहुत तेज है । मैं कुछ नहीं बोलता हूँ और वह जानता है कि मौनम स्वीकार लक्षणम्‌।अब वह आगे- आगे हो लेता है और मैं सपरिवार पीछे-पीछे। पतली गली का रास्ता लेता है और मैं समझ जाता हूँ कि यह पीछे की तरफ से ले जाएगा। इसी बीच उसका चेला आ जाता है और वह हमारी बागडोर उसके हाथ में सौंपकर शायद और किसी भक्त की तलाश में निकल जाता है और चेले से कह जाता है कि बाबूजी को ठीक से दर्शन करा देना और जो दें , ले लेना ठकठेना मत करना ।
प्रसाद की एक दूकान पर वह रुकता है । उसकी सेट दूकान होगी । वहां जूते – चप्पल उतारते हैं और हस्त प्रक्षालन करते हैं । दूकान पर मोबाइल वगैरह के लिए लॉकर भी है पर हमने अपना सारा मोबाइल कमरे पर ही छोड़ दिया था। दूकानदार प्रसाद की कई टोकरियाँ जल्दी- जल्दी बनाता है किन्तु मैं भी सतर्क हूँ। एक की कीमत सौ रुपए! मैं एक ही लेता हूँ , परिवार तो एक ही है। वे जिद करते हैं किन्तु मैं भी टस से मस नहीं होता हूँ।
हमें पिछले दरवाजे से प्रवेश मिलता है । पुलिस है सुरक्षा जांच भी है पर शायद दिखावा ही है। अन्दर वह हमें एक अन्य पंडितजी को सुपुर्द कर देता है । वे हमें मुख्य गर्भगृह के सामने बिना रोक-टोक ले जाता है। मेरा गोत्र पूछता है और पूजा करवाता है। मंत्र बुलवाता है और मेरा शुद्ध उच्चारण सुनकर कुछ सहम सा जाता है। खैर पूजा के बाद वह हमें मंदिर में प्रवेश करा देता है बिना पंक्ति के ही । पुलिस का एक सिपाही द्वार पर खड़ा है जो हमें रोकता ही नहीं । प्रवेश करने में मुझे संकोच होता है क्योंकि मैं पंक्ति में नहीं था। मैं पंडित जी की तरफ मुड कर देखता हूँ तो वह कहता है जाइए जाइए, दर्शन करिए। सिपाही हमें अन्दर की तरफ धक्का देता है और हम लोग ज्योतिर्लिग के सामने । दर्शन , प्रसाद और फिर बाहर। किसका कितना हिस्सा है यह मुझे नहीं मालूम।
फिर पंडा मंदिर का इतिहास बताता है। सवा मन सोने का कलश , मंदिर ध्वंश और ज्ञानवापी मस्जिद का वृत्तांत। मुझे मालूम है किन्तु बच्चों को नहीं । ज्यादा बोलता देखकर मैं उसे बताता हूँ कि मै रामेश्वरम तक सात ज्योतिर्लिंगों की और अन्य बहुत से तीर्थस्थलों की यात्रा कर चुका हूँ तो उसका स्वर बदल जाता है । यहां वहां पूजा करवा कर वह हमें मुक्त करता है किन्तु समुचित दक्षिणा के बाद । चलिए दर्शन तो यथासमय हो गया । शुल्क के बिना तो शायद कुछ भी संभव नहीं । बाहर निकलते ही दर्शन एजेण्ट साथ लग लेता है और पचपन रुपये देकर उससे पिंड छुड़ाता हूँ।
मैं बच्चों को बताता हूँ मंदिर के पास ही गंगा जी भी हैं और बच्चे कैसे कि जिद न पकड़ें ? रास्ता मुझे भी भूल रहा है। पिछली बार विश्वनाथ जी का दर्शन लगभग बीस साल पहले किया था। तबसे बनारस आना जाना कई बार हुआ पर दर्शन नहीं। अभी पिछले साल ही तीन बार गया। एक पुलिस वाले से गंगा का रास्ता हिन्दी में पूछता हूँ और वह बड़ी प्रसन्नतापूर्वक भोजपुरी में रास्ता बताता है। मैं उसे धन्यवाद देता हूँ तो वह मेरा मुँह ताकता है। अभी शायद यहां इतनी औपचारिकता नहीं पहुँची है हालांकि काशी तो सभ्यता की नगरी है।
यहां दशाश्वमेध घाट है । यह समय अच्छा नहीं है, दोपहर है । काशी की तो सुबह मशहूर है । पर गंगा की दुर्दशा देखी नहीं जा रही है । सिकुड कर पतली सी , गरीबी की मार झेलती या किसी असाध्य रोग से पीडि त । विश्वास नहीं हो रहा कि यह वही पतित पावनी गंगा है जो स्वर्ग से उतरी थी। जो पानी अमृत था वह अब प्रदूषण से काला हो गया है। कुछ नावें है जो यात्रियों को उसपार ले जाने का आमंत्रण दे रही हैं। इसी गंगा ने काशी को तीन तरफ वेष्टित किया हुआ है और यहां की गंगा को ही देखकर भगवान भोलेनाथ काशी में डेरा डाला था। यही वह दशाश्वमेध घाट है जहाँ ब्रह्मा ने दस अश्वमेध यज्ञ किया था और जिस घाट पर नहा लेने मात्र अश्वमेध यज्ञ का पुण्य मिलता है। पर हमारा विकास हो गया है और हम गंगा को इस लायक छोड़ें कि वह नहाने तो क्या देखने योग्य तो बचे ! मैं लौट तो रहा था पर पैर नहीं उठ रहे थे।

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