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Archive for the ‘story’ Category

सीन बाई सीन देखिये फिल्म राब्स ..बिना पर्दे का

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 13, 2009

(आलोक नंदन)
एक फिल्म स्क्रीप्ट डिस्पले कर रहा हूं…फिल्म का नाम है
राब्स, इसके साथ नीचे में इनवर्टेड कौमा में लिखा हुआ है, अपराध जगत में एक प्रयोगवादी जज…अब खुद देख लिजीये यह जज कितना प्रयोगवादी है….यह जैसा है वैसे ही रखने जा रहा हूं….एक एक सीन रखता जाऊंगा… वर्तमान सीन से आगे बढ़ कर सीन बताने वालो का स्वागत है, वैसे इसको पढ़ने का मजा तो हर कोई उठा ही सकता है। स्क्रीप्ट लेखन टेक्निक के लिहाज से यह मुझे कुछ उम्दा लगा और स्क्रीप्ट लेखन में कैरियर बनाने की इच्छा रखने वालों के लिए यह निसंदेह सहायक हो सकता है। स्क्रीप्ट लेखन से संबंधित किसी भी स्तर के कोई भी प्रश्न आप यहां दाग सकते हैं….आपके सवालों और सुझावों का स्वागत है।

Robes
“ An experimental judge in a crime world.”
Laugh with unbroken breaking news
Comedy of cruelty
“ Wanted for his own murder charge”

तो शुरु हो रहा है राब्स…बिना टिकट के ही इसका मजा लिजीये….।
(इसे एक फिल्म का विशुद्ध रूप से प्रचार स्टाइल माना जाये, (फिल्मों के प्रचार स्टाईल का अपना एक तरीका है, ) हालांकि कि यह फिल्म बनी ही नहीं है, और फिलहाल बनने की भी कोई गुंजाईश नहीं है, (इससे स्क्रीप्ट पर कोई फर्क नहीं पड़ता है) …….तो देखना न भूलिये राब्स… इयता पर आ रहा है…..हर शुक्रवार सुबह, नौ बजे…..रहस्य, रोमांच और बेवकूफी पूर्ण हरकतों से भरपूर….राब्स…….
( नोट – लिखने के दौरान स्क्रीप्ट ग्रामर व्यवहारिकतौर पर का कठोरता से पालन किया गया है)
Scene1
Characters—Justice Ramesh Pant and Bhandari.
Ent/night/ Study room
( A table is full of Law books, there are four almiras full of different books. Nearly 34 years old Judge Pant is sitting in an arm chair and writing his diary under a burning lamp. Bhandari, 40 years, sitting on a chair out side room and dozing)
Pant
(His pen is running very fast and his mind is full of thoughts, dialogues without lips movement, better to say VO—Voice Over)

Pichale 9 sal se main chor-badmashon ko gawahon aur sabuton ke adhar per saja suna raha hun. Kaya naya ki yeh prakriya kargar hai? Yadi hai to abatak samaj se aparadh ko samapat ho jana chahiye tha…akasar yehi dekha jata hai ki chota aparadhi jail jane ke bad ek bara aparadhi ban jata hai. Hum aparadhi ko saja dete hai. Un paristhition ki partal nahi karate jo logo ka aparadhi banata hai. Aisa lagata hai jaise naya ki prakriya me shamil sabhi log nind me unghate huye safar kar rahe hai.

(Bhandari during dozing fells down from the chair and having managed himself he sits on the chair and again starts dozing. Meanwhile Pant’s pen is running with its own speed )

in unghate logon me main bhi to shamil hun. Aparadh ko samjhane ke liye yeh jaruri hai ki hum aparadh ki taftish karane ke bajaye insani jindagi ki tafatish kare.

(An old watch hanging over the wall starts ringing. Pant stops writing and looks at the watch The watch shows that it 12 o’ clock. Pant is in night gown. He makes his body eaisy and looks at the door.Bhandari runs fast to the kitchen and inters into the room with a glass of milk.Pant looks at his face with some uneasy feeling )

Pant
Ghari ki oor dekho.
(Bhandari looks at the watch with his sleepy eyes)
Bhandari

Ji sahab dekh raha hun.
Pant
Kitane baje hai?

Bhandari
Barah.

Pant
Barah nahi, Barah bajkar tin minutes…Aaj tumane phir tin minutes ki der kar di..Tumhe pata hai main thik barah baje dudh pita hun…subah ki shurat ka pahala pal.

Bhandari

Ji sahab.

Pant
Prakriti ka pana ek niyam hai …aur insan ko prakriti se tal-mel banane ke liye niyam se chalana chahiye.

Bhandari
Ji sahab (still dozing)…Sahib ( with some hesitation)
(Gilas khali karane ke bad Pant wapas use Bhandari ko deta hai)
Pant
Kuch kahana chahate ho? …Beshak kaho…bolane ki swatantrata! …Puri duniya ki pragati isi per to tiki hui hai.
Bhandari
Sabab, ab aapako shadi kar leni chahiye.
Pant
Shadi ! u mean marriage ! …tumane ki hai?
Bhandari
Tabhi to kah raha hun sahab…mem sahab aa jayegi to aapaki jindi badal jayegi…bibi bahut achi chij hai.
(Pant ki aankho ke samane court ka scene ghumane lagata hai)

Cut to

Scene 2

2A
Characters—Pant, Raja, Rani, Gupata, Two advocates and five other people.
Int/ day/ Court room.
(Raja with his folded hands is standing in the witness box. An advocate is beside him. Gupta is just sitting under the desk. He is very much busy with some files. Rani and others five people are sitting in the row. The second advocate is sitting besides Rani)
Raja
(With his folded hands) Hujur aap mujhe gaur se dhekhiye …Aap ko lagata hai ki main ise pit sakata hun? ( Denoting to Rani) Hujur mera kasur sirf itana hai ki main anpar hun aur mere gharwalon ne meri shadi is pari-likhi aurat se kara di….isase puchiye sahab …yeh mujhe angregi me gali deti hai.
(All the people present in the court laugh. Pant, too, smiles)
Sahab aap mujhe phansi per chara dijiye..Jail bhej dijiye…main sari umra jail me gujarane ke liye tayar hun..lekin is aurat ke sath main nahi rah sakata.

Inter cut

2B
The same characters and set-up of the scene 2A. Now Rani is standing in the witness box in stead of Raja)

Rani
My lord, is adami ne meri puri jindagi narak kar di hai…naye gahane dena to dur is adami ne mere sare gahane bech diye…main kosati hun us pal ko jab isase meri shadi huai thi..Ab is adami ke sath main jindagi ka ek pal bhi nahi kat sakati….muje isake sath nahi rahana hai…isake sath rahane se acha hai ki main bina pati ke rahun…pichle tin sal se main ise jhel rahi hun.

Cut to—–

Scene 1 continue
All the previous scenes are moving before the Pant’s eyes. Having seen the gesture of Pant, Bhandari thinks that Pant is dreaming about his would be wife and he is very happy to think so)
Bhandari
Sahab bibi ke bina jindagi bhi koi jindagi hai.
(Listing Bhandari’s words, Pant realizes his condition. He looks at the face of Bhandari in order to understand his mental condition if he is really happy after marriage)
Pant
Kitane din huye tumahari shadi ke?

Bhandari

(with hesitation) sahab… do sal.
Pant
Kaya usane tumhe kabhi aisa kaha hai ki woh pichale do sal se tumhe jhel rahi hai?
Bhandari
(in a state of confusion) main samajha nahi sahab.
Pant
Tumahari bibi tumase kabhi jhagra karati hai ?
Bhandari
Shabib ab miya-bibi me to thori –bahut nok-jhonk hote hi rahati hai.
Pant
Abhi tin sal nahi huye hai.
Bhandari
Kaya matlab?
Pant

Kuch nahi…. tum jao, mera bed per jane ka samay ho gaya hai.

Cut to ……

जारी रहेगा……….

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रावण के चेहरों पर उड़ता हुआ गुलाल

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 27, 2009

आलोक नंदन

पुश्त दर पुश्त सेवा करने वाले कहारों से बीर बाबू कुछ इसी तरह पेश आते थे, “अरे मल्हरवा, सुनली हे कि तू अपन बेटी के नाम डौली रखले हे ?”
“जी मलिकार”,  हाथ जोड़े मल्हरवा का जवाब होता था। “अरे बहिन….!!! अभी उ समय न अलई हे कि अपन बेटी के नाम बिलाइती रखबे…, कुछ और रख ले …. भुखरिया, हुलकनी ……  लेकिन इ नमवा हटा दे, ज्यादा माथा पर चढ़के मूते के कोशिश मत कर”, अपने  ख़ास अंदाज़ में बीर बाबू अपने पूर्वजों के तौर-तरीक़ों को हांकते थे. उनके मुंह पर यह जुमला हमेशा होता था, “छोट जात  लतिअइले बड़ जाते बतिअइले”.
इलाके में कई तरह की हवाएं आपस में टकरा रही थीं और जहां तहां लोगों के मुंह से भभकते हुए शोले निकल रहे थे.
“अंग्रेजवन बहिन…सब चल गेलक बाकि इ सब अभी हइये हथन .”
“एक सरकार आविते थे, दूसर सरकार जाइत हे, बाकि हमनी अभी तक इनकर इहां चूत्तर घसित ही.. ”
“अभी तक जवार में चारो तरफ ललटेने जलित थे, इ लोग बिजली के तार गिरही न देलन…अब मोबाइल कनेक्शन लेके घूमित हथन…सीधे सरकार से बात करित हथन ”
“एक बार में चढ़ जायके काम हे… ”
“बाकि अपनो अदमियन सब भी तो बहिनचोदवे हे…कई बार तो समझा चुकली हे कि अब इ लोग के चूत्तर सूंघे के जरूरत न हे.”
कहरटोला के कई-कई बूढे़ मर चुके थे, जो इन भड़कते शोलों  को दबाते थे. कुछ जवान लोगों के बालों में सफ़ेदी तो आई थी, लेकिन कुछ नई हवाओं ने भी उनके दिमागों में सूराग किया था और ये नई हवा लाने वाले कहारों के नए लौंडे थे, जो कमाने-खाने के लिए पर फरफड़ाते हुए बाहर निकले थे. बाहर निकलने के बाद उन्हें तमाम तरह के कपड़े, जूते, कोट, चप्पल, बेल्ट आदि बनाने वाले कारखानों ने चूसा तो था, लेकिन नई हवाओं ने इनके दिमाग़ को फेरा भी था. इलाके में बुदबुदाहट  इन्होंने ही शुरु की थी. इनकी यही बुदबुदाहट  हवाओं में घुलती चली गई.
ये लोग ज़मीन और ज़मीन की परतों की बात करते थे. आसमान की बात करते थे. ग्रहों और नक्षत्रों की बात करते थे. पेड़ पौधों और खेत-खलिहानों की बात करते थे. बहुत सारे लोगों की लड़ाइयों की भी बात करते थे और उन लड़ाइयों से सीखने की बात करते थे. ऐसी कोई भी ग़लती नहीं करने की बात करते थे, जिसका जवाब उन्हें ख़ुद देना पड़े.
दशहरे में कहार टोली की एक काली बुढ़िया झूम के नाचती थी. उस पर माई आती थी. पूरा कहरटोली उसके सामने हाथ जोड़े रहती थी. कोई फूल देता था, कोई नारियल, कोई लड्डू, तो कोई सिंदूर. वह माई सिर्फ़ मैतू दुसाध से ही मानती थी. वह उसके सामने खस्सी को लाता था और एक बार में ही उसका गला उतार देता था. इसकी तैयारी उसे सुबह से ही करनी होती थी .  दिन भर वह अपने हंसिये को पजाता रहता था.
पिछले कुछ वर्षों से वह दशहरा के दिन नए कहारों को देखकर बुदबुदाने लगी थी, “खून पीएगा, खून पीएगा. कितना खून पीएगा धरती तो पहले ही खून से लाल है. और मेरी प्यास अभी तक नहीं बुझी, तो तेरी कैसे बुझेगी.” उसकी इस बुदबुदाहट से वहां मौजूद सभी लोगों की हड्डियों तक से पसीने छूट जाते थे, लेकिन नए कहारों के साथ आने वाले बाहर के कुछ लोग इसे नौटंकी बताते थे. इसको लेकर भ्रम और विभ्रम के नियमों पर बहस करते थे, और फिर उन्हें सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखते थे. उनकी यह बहस दशहरे के पंद्रह दिन पहले से लेकर पंद्रह दिन बाद तक चलती थी. इस बार के दशहरा को ख़ून में डुबोने की बात वह महीनों पहले से करती आ रही थी. पूरे टोले में कंपकंपी छूटी हुई थी.
उसकी बुदबुदाहट हवाओं में तैरते हुए बभनटोले के आंगनों, कमरों और दलानों तक पहुंच गई  थी.  बीर बाबू के कान खड़े थे. बहुत दिनों से बाहरी हवाओं की चरमराहट उन्हें भी सुनाई दे रही थी. कुछ पैसे लेने के बाद अपनी ज़मीन उनको देकर बाहर जाके दो-दो हजार की नौकरी करने वाले बाभन के नए लौंडे भी दशहरा मनाने के लिए जुट रहे थे.
इधर विजयदशमी का नगाड़ा बजा, उधर बंदूकें कस गई. ऐलान हुआ, “हम अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे, यह ज़मीन हमारी है. हम अपनी ज़मीन लेंगे.”
उस दिन माई चिल्लाती रही,“ख़ून चाहिए, ख़ून चाहिए.” कल रात को ही कहारों की बस्ती में आने वाला एक बाहरी छोकरा उसकी ओर देखते हुए बोला, “तुम्हारी तरह हर किसी को ख़ून की प्यास हो जाएगी, तो फिर दुनिया किधर जाएगी? पकड़ो इसे और खाट में बांध दो.” कुछ नए कहारों ने उसे खाट में बांधने की कोशिश की तो कहारटोली में हो-हल्ला शुरू हो गया. बभनटोली से भी लोग दौड़ दौड़ कर आने लगे. तमाशा बढ़ता गया. माई ख़ून-ख़ून चिल्ला रही थी.
जिस समय बभनटोला से लोग भाग-भाग कर इधर आ रहे थे, उसी समय अगल-बगल से कई दस्ते गांव में घुसने के बाद घरों में घुस कर सभी महिलाओं और बच्चों को अपने क़ब्ज़े में ले रहे थे.
बभनटोले के सारे मर्द कहारटोली में फंस गए. माई को एक शिमर के पेड़ के नीचे बिठा दिया गया और पूरे टोले को लिबरेट घोषित कर दिया गया. बाभनों के बीच में बीर बाबू भी फंसे हुए थे. उनको भी पकड़कर माई के सामने खड़ा किया गया.
एक बाहरी नौजवान सामने आया और बीर बाबू से बोला, “हम ख़ून नहीं चाहते हैं, हम बस ज़मीन चाहते हैं. फ़िलहाल जिनके पास घर है, वो उनके पास ही रहेगा, बाक़ी ज़मीन स्वतंत्र हुई.  हर परिवार के पीछे तीन एकड़ मिलेगा. हमें ख़ून नहीं चाहिए.”
बीर बाबू चौंधियाए हुए थे, गुर्राते हुए बोले, “लेकिन हम अपनी ज़मीन नहीं छोड़ेंगे.”
“ज़मीन तो छोड़नी ही होगी”, उस नौजवान की गुर्राहट कुछ अधिक थी.
माई फिर चिल्लाई, “मुझे ख़ून चाहिए… मुझे ख़ून चाहिए.”
मैतू भीड़ को चीरता हुआ सामने आया. उसके हाथ में हंसुआ चमक रहा था. कोई दौड़कर एक खस्सी को सामने ले आया. वह तेज़ी से खस्सी की ओर लपका, लेकिन दो हथियारबंद लोगों ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया और खस्सी को उसके हाथ से छुड़ा लिया. वह ज़ोर-ज़ोर से मेमिया रहा था.
नौजवान बाबू सिंह की आंखों में झांकते हुए बोला, “हमें ख़ून नहीं चाहिए. हम पर विश्वास करो. हम वही कर रहे हैं, जो सभी लोगों के हित में है.” दो लोगों की ओर देखते हुए बोला, “इस माई को कमरे में बंद कर दो और तब तक पीटो नगाड़ा जब तक सब साथ मिल कर मदहोश न हो जाएं. ”
किसी ने जोर से नगाड़ा पीटा, फिर देखते ही देखते एक ही लय ताल में चारों ओर से नगाड़ों की आवाज़ आने लगी.  दूर-दूर से लोग नगाड़ा पीटते आ रहे थे.
सभी मैदान की ओर चलो. मैदान में रावण का दसमुंहा सिर और धड़ रखा हुआ था. कई टोलों की भीड़ दसों दिशाओं से वहां जुट रही थी. कौन बाभन था, कौन भुईयां, कौन चमार, कौन डोम, कौन कुर्मी, कौन कोयरी, कौन लाला, कौन अहिर, कौन राजपूत, कौन मिया….सब के सब एक भीड़ में दूर तक फैले हुए अजगर की तरह नज़र आ रहे थे.
नौजवान ने इशारा किया और नगाड़ों की आवाज शांत हो गई. वह एक ऊंचे टीले पर चढ़ा और अजगरी भीड़ की तरफ़ देखकर जोर से चिघाड़ा, “आज के बाद हम रावण नहीं जलाएंगे. रावण को जलाने के लिए इसे ज़िंदा करना पड़ता है. बुराई को एक बार में मार डालो, बार-बार नहीं. झूमो,  नाचो और गाओ…..”
नगाड़ों, तुतही, सारंगी, ढोल-छाल की आवाज़ों के साथ उड़ते हुए गुलाल से आसमान लाल हो गया.  ज़िंदा होने के लिए कसमसा रहे रावण के चेहरों पर भी उड़ता हुआ लाल गुलाल पड़ रहा था.
समाप्त

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थ्री फिफ्टीन (कहानी)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 24, 2009

आलोक नंदन
बाहर के लौंडे कैंपस के अंदर रंगदारी करने आ ही जाते थे। सभी झूंड में होते थे, इसलिए उनसे कोई उलझता -नहीं था। किसी की भी साइकिल को छिन लेना और लप्पड़ थप्पड़ कर देना उनके लिए मामूली बात thi, सिगरेट के छल्ले उड़ाने जैसा।
श्रेया पूरे कालेज की माल थी, चुपके-चुपके हर कोई उसको अपने सपनों की हीरोईन समझता था। कुछ ज्यादा बोलने वाले लौंडे ग्रुपबाजी में बैठकर आपस में ही श्रेया की खूब ऐसी तैसी करते थे, उसके नाकों में पड़ी नथ से लेकर उसके रूमाल तक की चर्चा होती थी। अब ये लौंडों की औकात पर निर्भर करता था कि कौन क्या बोलता है। उनकी बातों को सुनकर एसा लगता था कि कोका पंडित से लेकर कालीदास तक श्रेया के मामले में फेल हो जाते।
प्रैक्टिकल रूम में हाथों में दस्तानों के साथ जार लिये लौंडों की बातें श्रेया की रेटिना से शुरू होकर कहां-कहां घूमती थी कोई नहीं जानता था।
भोलुआ बाहरी था, लेकिन छूरा और गोली चलाने का उसका हिस्ट्री रिपोर्ट अंदर के प्रैक्टिकल से लेकर स्पोर्ट्स तक के लौंडों पर भारी पड़ता था। यदि गलती से वह किसी क्लास में घुस जाता था तो प्रोफेसर और लड़के यही सोचते थे कि कैसे जल्दी क्लास खत्म हो। और गलती से भोलुआ को प्रोफेसर की कोई बात समझ में नई आती थी तो वो सकता था कि क्लास अगले तीन चार घंटे तक चलता रहे। उसके कमर में हमेशा दो थ्री फिफ्टीन की देसी पिस्तौल होती थी, जिसमें एक बार में सिर्फ एक ही गोली लोड की जा सकती थी। पूरे इलाके को पता होता था कि उसके कमर में समान (देसी पिस्तौल) लगा रहता है।
राशि को भी बकबक करने की आदत थी, एक बार शुरु हो जाता था तो पता नहीं कहां से कहां पहुंच जाता था। उसके दोस्तों ने कहा, साला तूम इतना बकर बकर करता है, कोई बैनर बनाके बक बक कर…नहीं तो कोई बैनर के नीचे बक बक कर…..। एक बार वह एक बैनर के नीचे बक बक करने गया था और रौ में बोलता चला गया, बैनर बना के समाज का ठेका उठाने वाले जितने भी लोग वही सारी समस्याओं की जड़ है। बैनरों को हटा दो और समाज को स्वतंत्ररूप से शिक्षित करो और होने दो…फिर सबकुछ ठीक हो जाएगा। मिर्ची तो बहुत लोगों को लगी थी लेकिन ऊपर से सब ने उसकी तारीफ की थी। और बाद में कई बैनर वाले कह रहे थे कि हमारी बैनर में आ जाओ, मिलकर काम करेंगे। लेकिन वह अपनी धुन पर अपनी ही चाल में चलता था।
उस सुबह बलुअरिया मार लिया था, वो भी आधा लबनी….टेनिस कोर्ट में चौकड़ी लगी हुई थी। सभी लौंडे इधर उधर लेटें हुये थे, कोर्ट से दूर। बलुअरिया के नशे में वो पिंगल मार गया था, कि आज श्रेया को प्रोपेज करने जा रहा है। पूरा कालेज इंतजार कर रहा था कि अब आगे क्या होने वाला है। सामने से श्रेया आती हुई दिखाई दी, और वो आगे बढ़ गया, प्रपोज करने के मूड में हालांकि उसकी हवा खराब थी।
श्रेया के सामने आते ही उसके मूंह से निकला, हमलोग एक बोलने वाला प्रोग्राम रख रहे हैं उसमें आपको इनवाइट कर रहे हैं, अभी कार्ड नहीं है लेकिन जल्द ही कार्ड भी दे देंगे… …थैंक्यू….। श्रेया को समझने का मौका दिये बिना वह उसका हाथ लपक लिया और मिलाकर चलता बना। सबकुछ पलक झपकते हुआ। सभी लौंडे देख रहे थे। उसके जाते ही सभी लौंडो के बीच में दिन भर उड़ाता रहा कि उसने कैसे प्रोपोज किया, और उड़ते हुये यह खबर भोलुओ के कानों में पड़ गई। और कुछ देर के बाद इसके कानों में भी कि भोलुओ उसे पिस्तौल के खोज रहा है।
पंद्रह दिन तक डर से घर में पड़ा रहा। जिस दिन पहुंचा उसी दिन सभागार में कोई बोलने का कार्यक्रम चल रहा था। हौल में घूसते ही उसको बोलने के लिए वाली सूची में सभी लौंडो ने डलवा दिया। मंच पर चढ़ने के कुछ देर बाद उसकी नजर तीसरे रो में बैठी श्रेया और पांचवे रो में बैठे भोलुओ पर पड़ी….उसके मुंह से निकला….ले लोटा…यह समान लगाये हुये होगा…..अब उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, उसने मन ही मन कहा, हे भगवान कृष्ण बचा ले….और फिर माइक के सामने शुरु हो गया, दुनिया में एसा कौन भाई है जो अपनी बहन से कहेगा तू किसी के साथ भाग जा….लेकिन कृष्ण ने कहा था। क्या आज के समय कृष्ण जैसा कोई कर सकता है। क्या मैं अपनी बहन को कह सकता हूं कि वह किसी के साथ भाग जाये, क्या आप यह अपनी बहन से कह सकते हैं। बोलने के दौरान उसकी नजर भोलुआ पर ही थी, और भोलुआ की उस पर। आज कृष्ण जैसे भाइयों की जरूरत है जो अपनी बहन को समझे और उनके जीवन को खुशहाल बनाये।
सभा खत्म हुई तो वह बाहर निकला। एक लौंडा उसके पास आया और बोला, भोलुआ बुलइतै हथुन, चलअ।
उसके मूंह से निकला, लेकिन उनका पास त समान रहता है, हम न जायब…….कहीं उड़ा देलन त….आज पंद्रह दिन बाद तो कालेज अइली हे, ईहां से सीधे ऊपरे चल जाई का ? हम न जायब….
लौंडा बोला, भोलुआ भईया खुश हथुन, चलआ. बड़ी मुश्किल से वह समझा पाया कि जब तक वह भोलुआ के थ्री नटा को देख नहीं लेता तब तक उनका दर्शन कैसे कर सकता है। थोड़ी देर बाद भोलुआ का थ्रीनटा लेके वही लौंडा वहां खड़ा था। राशि ने उसके हाथ से पिस्तौल लेकर उसे खोला और नली से गोली बाहर निकालकर पाकेट में रख लिया। थोड़ी देर के बाद कैंपस के एक कोने में वह भोलुआ के सामने खड़ा था। उसकी ऊपर की सांसे ऊपर और नीचे की सांसे नीचे लटकी हुई थी। उसको देखते ही भोलुआ ने कहा, अरे राशि भाई तु तो बहुत ही बढ़िया बोल ह…आज तो एकदम हिला देलअ…कोई दिक्कत न न हव….कुछ होतव त बतइह….मन गद गद कर देल…भोलुआ को वाकई में खुश पाकर उसकी हवा ठीक हुई।
उसने पिस्तौल निकाल कर भोलुआ को देते हुये कहा, इ ल….ई तोरे पास ठीक रह तव……
अरे आज यही खुशी में तोरा सलामी देवे के मन करी थे…इतना कहने के साथ भोलुआ ने पिस्तौल में गोली भरा और नली को आसमान की ओर करके घोड़ा दबा दिया। धमाके की आवाज से कैंपस में हड़कंप मच गया। सभी लौंडो के बीच हल्ला हो गया कि भोलुआ ने राशि का पोस्टमार्टम कर दिया।
यह खबर कैंटिन में बैठी श्रेया के कानों भी पड़ी और वह भी भागती हुई उस स्थान पर पहुंची जहां पर भोलुआ ने हवा में गोली चलाई थी। भोलुआ श्रेया को देखकर भौचक था। और राशि के समझ में भी नहीं आ रहा था कि अभी-अभी क्या हुआ है, और क्या होने वाला है। इसके पहले कि श्रेया कुछ कह पाती भोलुआ के मुंह से निकला, तू राशि भाई से आई लव कह हहू ??? कोई बात न हई खूब कर….राशि भाई के बात हम समझ गईली हे….कौन भाई अपन बहिन से कहत कि ऊ भाग जाये…तू हमर बहिन रहतल हल त हम यही कहती हल…
थ्री नटा को अपनी कमर में खोसकर वह राशि के कंधे पर हाथ रखकर मुस्कराते हुये आगे बढ़ गया।
(समाप्त)

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