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रामेश्वरम में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 17, 2011

हरिशंकर राढ़ी
दोपहर बाद का समय हमने घूमने के लिए सुरक्षित रखा था और समयानुसार ऑटोरिक्शा  से भ्रमण शुरू  भी कर दिया। पिछले वृत्तांत में गंधमादन तक का वर्णन मैंने कर भी दिया था। गंधमादन के बाद रामेश्वरम द्वीप पर जो कुछ खास दर्शनीय  है उसमें लक्ष्मण तीर्थ और सीताकुंड प्रमुख हैं। सौन्दर्य या भव्यता की दृष्टि  से इसमें कुछ खास नहीं है। इनका पौराणिक महत्त्व अवश्य  है । कहा जाता है कि रावण का वध करने के पश्चात्  जब श्रीराम अयोध्या वापस लौट रहे थे तो उन्होंने सीता जी को रामेश्वर  ज्योतिर्लिंग के दर्शन  के लिए, सेतु को दिखाने के लिए और अपने आराध्य भगवान शिव  के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पुष्पक  विमान को इस द्वीप पर उतारा था और भगवान शिव की पूजा की थी। यहाँ पर श्रीराम,सीताजी और लक्ष्मणजी ने पूजा के लिए विशेष  कुंड बनाए और उसके जल से अभिषेक  किया । इन्हीं कुंडों का नाम रामतीर्थ, सीताकुंड और लक्ष्मण तीर्थ है । हाँ,  यहाँ सफाई  और व्यवस्था नहीं मिलती और यह देखकर दुख अवश्य  होता है।
स्थानीय दर्शनों  में हनुमान मंदिर में (जो कि बहुत प्रसिद्ध और विशाल  नहीं है) तैरते पत्थरों के दर्शन करना जरूर अच्छा लगता है। पत्थर का पानी पर तैरना एक लगभग असंभव सी घटना मानी जाती है और इसे कुछ लोग ईश्वरीय  चमत्कार मानते हैं तो कुछ गल्प के अलावा कुछ नहीं। इसे सामान्यतः वैज्ञानिक तौर पर भी नकार दिया जाता है किन्तु यह सच है कि पत्थर पानी में तैरते हैं। इसे आप अपनी आँखों से देख सकते हैं, छू सकते हैं और दिल करे तो खरीदकार ला भी सकते हैं। यह वास्तव में पत्थर ही होते हैं जो दुर्लभ श्रेणी के होते हैं।
वस्तुतः तैरते हुए पत्थर भी प्रकृति के चमत्कारों में एक हैं। इनका पानी पर तैरना पता नहीं श्रीराम के स्पर्श  की कृपा पर आधारित था या नहीं किन्तु इसे प्रकृति का स्पर्श  जरूर मिला है। भूविज्ञान के अनुसार पत्थर का तैरना कोई चमत्कार या  ईश्वरीय शक्ति  नहीं है। हर प्रकार का पत्थर तैर नहीं सकता है। दक्षिण भारत पृथ्वी के सबसे पुराने भागों में है। वर्तमान हिमालय के अस्तित्व में आने से पूर्व एशिया , योरोप और आस्ट्रेलिया तक का अंश  एक ही खंड था। जहाँ आज हिमालय है वहाँ पहले टेथीस नामक एक छिछला सागर था। इस सागर के उत्तर में अंगारा लैण्ड नामक भूखंड था और दक्षिण में गोंडवाना लैण्ड। टेक्टॉनिक प्लेटों के खिसकने से कालान्तर में टेथीस सागर की जगह हिमालय का निर्माण हो गया। भारत का दक्षिणी भाग गोंडवाना लैण्ड का प्रमुख हिस्सा है जो मुख्यतः ज्वालामुखी से निर्मित आग्नेय शैलों  से निर्मित है। चूंकि आग्नेय शैलें  प्रायः ज्वालामुखी से निकले लावा के ठण्डे हो जाने से बनती हैं, इनमें कहीं -कहीं छिद्र रह जाते हैं जिनमें हवा भर जाती है। यही हवा जब अधिक हो जाती है तो पत्थर पानी में तैरने लग जाता है और आर्किमिडीज का सिद्धान्त यहाँ पूर्णतया लागू होता है। यह बात अलग है कि आग्नेय शैलों के अन्तर्गत आने वाला पूरा पत्थर परिवार तैर नहीं सकता, इसमें भी एक विशेष कोटि होती है जिसे हम झाँवाँ पत्थर कह सकते हैं।
हमारा रामेश्वरम भ्रमण लगभग तीन घंटे में पूरा हो गया था। उसी होटल पर हम आ चुके थे। शाम  के पांच बज रहे होंगे। अब आगे क्या किया जाए? अभी कुछ और महत्त्वपूर्ण स्थल रह गए थे । उनमें से एक था –  धनुषकोडि या धनुषकोटि। इस स्थल के विशय में हमने सुन रखा था और जाने की प्रबल इच्छा भी थी। ऑटो वाले से बात की गई तो पता लगा कि इस समय जाना असंभव था। यह वहाँ से लौटने का समय है और रात्रि में वहाँ जाना न तो लाभकर है और न ही अनुमोदित ही। यहाँ भी हमें अभी कुछ खरीदारी करनी थी, शंकराचार्य  मठ में जाना था और थोड़ा समन्दर किनारे घूमना भी था। वस्तुतः अब जो सबसे ज्यादा उत्कंठा हमारे मन में शेष  थी वह थी सेतु के दर्शन करना जो किधनुषकोडि में ही मिल सकता था। सच तो यह है कि सेतु का अब कोई अस्तित्व बचा ही नहीं है और धनुषकोडि में भी इसके दर्शन नहीं हो सकते। यह तो अब सागर में समाहित हो चुका है, धनुषकोडि तो वह स्थान है जहाँ से इस सेतु का प्रारम्भ होता था।



गंध मादन पर्वत पर 



धनुषकोडि ; धनुषकोडि या धनुषकोटि पम्बन से दक्षिण-पूर्व में लगभग 8 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ पर विभीषण  का मंदिर हुआ करता था। कहा जाता है कि रावण दमन के बाद वापसी में विभीषण के कहने से श्रीराम ने इस पुल का सिरा अपनी धनुष से तोड़ दिया था। ‘कोडि’ का अर्थ तमिल भाषा  में अन्त या सिरा होता है। यह भी विश्वास है कि रामेश्वरम और काशी की यात्रा सेतु में स्नान किए बिना पूरी नहीं होती। धनुषकोडि को महोदधि (बंगाल की खाड़ी ) और रत्नाकर (हिन्द महासागर ) का मिलन स्थल भी कहा जाता है, हालाँकि आज का भूगोल इस बात को प्रमाणित नहीं करता । धनुषकोडि श्रीलंका के बीच में विश्व  की  सबसे छोटी सीमा का निर्माण भी करता है जो मात्र पचास गज की लंबाई की है। स्वामी विवेकानन्द ने भी 1893 के विश्व  धर्मसम्मेलन मे विजय पताका फहराने के बाद श्रीलंका के रास्ते इसी भूखंड पर भारत की धरती पर अपना पैर रखा था। 
धनुषकोडि अब एक ध्वन्शावशेष  बनकर रह गया है। 22 दिसम्बर 1964 की मध्यरात्रि में एक भयंकर समुद्री तूफान ने धनुषकोडि का गौरवशाली  अतीत और वैभवशाली वर्तमान को पूरी तरह निगल लिया था। इस भीषण  तूफान में लगभग 1800 जानें गईं थी और पूरा द्वीप शमशान  बनकर रह गया। यहाँ क्या कुछ नहीं था। इसका अपना एक रेलवे स्टेशन  था और एक पैसेन्जर ट्रेन (पम्बन-धनुषकोडि पैसेन्जर, ट्रेन नम्बर – 653/654) चक्कर लगाया करती थी। दैवी आपदा की उस रात भी वह पम्बन से 110 यात्रियों और 5 कर्मचारियों को लेकर चली थी। अपने लक्ष्य अर्थात धनुषकोडि रेलवे स्टेशन से कुछ कदम पहले ही तूफान ने उसे धर दबोचा और सभी 115 प्राणी आपदा की भेंट चढ़ गए। अब यह एक खंडहर मात्र रह गया है और सरकार ने इसे प्रेतनगर ( Ghost  Town ) घोषित  कर रखा है। यहाँ एक शहीद  स्मारक भी बनाया गया है। यहाँ छोटी नाव या पैदल भी पहुँचा जा सकता है । रेत पर चलने वाली जीपें और लारियाँ भी उपलब्ध हैं।

शंकराचार्य मठ :

रामनाथ मंदिर के मुख्य अर्थात पूर्वी गोपुरम के सामने जहाँ सागर में स्नान की रस्म शुरू करते हैं, वहीं शंकराचार्य का मठ भी स्थापित है। एक बार मुझे यह भ्रम हुआ कि यह आदि शंकराचार्य  द्वारा स्थापित चारो मठों में से एक होगा क्योंकि उन्होंने चार मठ चारो धाम में स्थापित किए थे और रामेश्वरम चार धामों में एक है। बाद में ध्यान आया कि उनके द्वारा स्थापित मठ चार धामों में नहीं अपितु चार दिशाओं  में थे। जहाँ उत्तर, पूरब और पश्चिम  के मठ धामों में स्थित हैं वहीं दक्षिण में स्थित शृंगेरी मठ तो कांची में है। अतः रामेश्वर  में स्थित शंकराचार्य  मठ महत्त्वपूर्ण तो है किन्तु प्रमुख चार मठों  में नहीं है। फिर भी मठ को देखने की इच्छा कम नहीं हुई थी। वहाँ पहुँचे तो अच्छी खासी भीड़ दिखी। कोई विशेष प्रयोजन मालूम हो रहा था। भाषा की समस्या तो थी ही । चाहा कि कुछ जानकारी लूँ, पर किससे लूँ? प्रश्न  का कोई समाधान नहीं दिख रहा था। सामान्य बातें या पता तक तो कोई विशेष परेशानी  नहीं थी। परन्तु यहाँ प्रश्न लेखकीय कीडे़ का था। जिज्ञासा का समाधान तो चाहिए ही था, यात्रा की समाप्ति के बाद वृत्तान्त भी तो लिखना था! ना हिन्दी ना अंगरेजी। संस्कृत में अपना  बहुत प्रवाह तो नहीं है किन्तु कामचलाऊ शक्ति जरूर है। पंडित जी से बात करूँ पर वहाँ भी असमर्थता ही थी। सोच -विचार कर ही रहा था कि एक सज्जन शारीरिक  भाषा से मुझे पढ़े – लिखे या अफसर से दिख गए। उनसे बात की तो बोले कि हिन्दी तो नहीं, अंगरेजी में वे बात कर सकते हैं। बातचीत में पता चला कि वे मदुराई के रहने वाले हैं और वहीं किसी सरकारी सेवा में हैं। नाम तो मैं उनका भूल गया, पर उनकी बातें, उनका ज्ञान और सज्जनता मुझे याद है। लम्बी बातचीत में उन्होंने जो कुछ बताया, उसमें मुझे एक बात बड़ी आश्चर्यजनक  लगी। वहाँ अश्विन  मास में एक विशिष्ट  उत्सव होता है जिसमें लोग अंगारों पर नाचते हैं और किसी का पैर नहीं जलता। उनका दावा था कि आप यह उत्सव स्वयं देख सकते हैं। हम भी वहाँआश्विन  मास में( नौरात्रों में) गए थे। परन्तु यह उत्सव पूर्णिमा के आस- पास  होता है। मुझे इस बात की सत्यता पर अभी भी पूरा विश्वास नहीं होता कि जुलूस बनाकर लोग आग पर नाचेंगे और पैर नहीं जलेंगे परन्तु किसी की धार्मिक आस्था को चुनौती देना भी कोई आसान कार्य नहीं है।

दिन डूबने को आ रहा था। मठ से निकलकर हम सागर किनारे की ओर चल पडे़। हवा की शीतलता  का कोई जवाब नहीं था। सागर किनारे जो दृश्य  सामान्यतः मिलता है – लोगों की भीड़, खोमचे वालों का जमावड़ा और बेतरतीब आते-जाते लोग, यहाँ भी था। यहाँ एक बार पुनः जिस चीज ने भगाने की ठानी वह थी यहाँ की गंदगी और बदबू!  रामेश्वरम  के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है मछली पकड़ना और बेचना। अब मछलियों के पकड़ने के बाद उनकी प्रॉसेसिंग और भंडारण के कारण बदबू निकलना तो सामान्य बात है (बेट द्वारिका यात्रा में मैंने यही पाया था), किन्तु तट पर फैली गंदगी, गोबर और मल से भी कम वितृष्णा  नहीं पैदा हो रही थी। आवारा पशुओं  के झुंड के झुंड अपनी गतिविधियों में व्यस्त और मस्त थे। कुल मिलाकर सागर किनारे दिल ये पुकारे वाली बात बनी नहीं। हाँ, थोड़ा बहुत इलाका जरूर ऐसा था जहाँ बैठा जा सकता था। अंधेरा घिरने लगा था। कुछ स्थानीय लोगों ने बताया कि इस दिशा  में लंका है और थोड़ी देर बाद श्रीलंका की बिजुलबत्तियाँ दिखाई देंगी। आखिर कुल दूरी यहाँ से तीस किमी ही तो है। 

पम्बन रेलवे पुल
– यह रेलवे पुल रामेश्वरम द्वीप को भारत के मुख्य भाग से जोड़ता है . यह इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है और इसकी विशेषता यह है कि जब बड़ी जहाजों को निकलना होता है तो रेल की पटरियों को उठा दिया जाता है और निकल जाता है. पुनः पटरी को नीचे कर दिया जाता है रेलगाड़ियाँ गुजरने लगती हैं .
क्या खरीदें –  रामेश्वरम  जाएं तो सामुद्रिक जीवों से निर्मित सामान अवश्य खरीदें। शंख , घोंघे और सीप के कवच  ( sea shell )  के सामान बहुत ही सुन्दर और सस्ते मिलते हैं। इनसे आप घर को सजा सकते हैं और  रामेश्वरम  यात्रा की स्मृति के तौर पर संजो भी सकते हैं। उपहार के लिए भी ये बहुत ही उत्तम होते हैं। साथ में परिवार था, अतः सामान खरीदने का चांस बनता ही था। एकाध अपने लिए और कुछ फरमाइशकर्ताओं के लिए खरीदा। वामावर्ती शंख तो मिलती ही है, दक्षिणावर्ती शंख के तमाम रूप उपलब्ध हैं। मैं तो उनकी उत्पत्ति और प्रकृति और कारीगरों की कारीगरी पर मुग्ध होता रहा जबकि पत्नी और बेटी गृहसज्जा के सामानों की खरीदारी में व्यस्त रहीं। बेटे को गाड़ी टाइप का कोई खिलौना मिल गया था। कभी उसमें व्यस्त हो जाता तो कभी जाँच आयोग के सक्रिय सदस्य की तरह अनेक प्रश्न लेकर आ जाता और मेरी सोच का दम तब तक घोंटता रहता जबतक उसे अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिल जाता। 
 रामेश्वरम  में हमारा ठहराव एक दिन का ही था। रात हो चली थी। दोपहर वाले ढाबे पर ही हमने उत्तर भारतीय भोजन किया  और इस निर्णय के साथ सो गए कि प्रातः जल्दी उठकर कन्याकुमारी वाली बस पकड़नी है। काश  ! एक दिन और होता हमारे पास  रामेश्वरम  में ठहरने के लिए! बस मन ही मन यह प्रार्थना गूंजती रही –
                              श्रीताम्रपर्णी जलराशियोगे 
                                       निबद्ध्यम सेतुम निशि विल्व्पत्रै .
                             श्रीरामचन्द्रेण समर्चितमतम
                                        रामेश्वराख्यं सततं नमामि . 
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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-3 (ओरछा)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 16, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन
रानी महल के झरोखे से चतुर्भुज मंदिर का दर्शन
व्यवस्था और अव्यवस्था

कालिदास का मेघदूत हम पर मेहरबान था। पूरे रास्ते मूसलाधार बारिश का मज़ा लेते दिन के साढ़े दस बजे हम ओरछा पहुंच गए थे। पर्यटन स्थल होने के नाते यह एक व्यवस्थित कस्बा है। टैक्सी स्टैंड के पास ही बाहर से आने वाले निजी वाहनों के लिए भी अलग से व्यवस्थित पार्किंग है। सड़क के दाईं ओर मंदिरों का समूह है और बाईं ओर महलों व अन्य पुरातात्विक भवनों का। मध्यकालीन स्थापत्य कला के जैसे नमूने यहां चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं, कहीं और मिलना मुश्किल है। सबसे पहले हम रामराजा मंदिर के दर्शन के लिए ही गए। एक बड़े परिसर में मौजूद यह मंदिर का$फी बड़ा और अत्यंत व्यवस्थित है। अनुशासन इस मंदिर का भी प्रशंसनीय है। कैमरा और मोबाइल लेकर जाना यहां भी मना है। दर्शन के बाद हम बाहर निकले और बगल में ही मौजूद एक और स्थापत्य के बारे में मालूम किया तो पता चला कि यह चतुर्भुज मंदिर है। तय हुआ कि इसका भी दर्शन करते ही चलें। यह वास्तव में पुरातत्व महत्व का भव्य मंदिर है। मंदिर के चारों तर$फ सुंदर झरोखे बने हैं और दीवारों पर आले व दीपदान। छत में जैसी नक्काशी की हुई है, वह आज के हिसाब से भी बेजोड़ है। यह अलग बात है कि रखरखाव इसका बेहद कमज़ोर है। इन दोनों मंदिरों के पीछे थोड़ी दूरी पर लक्ष्मीनारायण मंदिर दिखाई देता है। आसपास कुछ और मंदिर भी हैं। हमने यहां भी दर्शन किया।

चतुर्भुज मंदिर के बाईं तरफ़ है श्री रामराजा मंदिर

नीचे उतरे तो रामराजा मंदिर के दूसरे बाजू में हरदौल जी का बैठका दिखा। वर्गाकार घेरे में बना यह बैठका इस रियासत की समृद्धि की कहानी कहता सा लगता है। आंगन के बीच में एक शिवालय भी है। सावन का महीना होने के कारण यहां स्थानीय लोगों की का$फी भीड़ थी। इस पूरे क्षेत्र में अच्छा-ख़ासा बाज़ार भी है। यह सब देखते-सुनते हमें का$फी देर बीत गई। बाहर निकले तो 12 बज चुके थे। भोजन अनिवार्य हो गया था, लिहाजा रामराजा मंदिर के सामने ही एक ढाबे में भोजन किया।

जहांगीर महल
स्थापत्य के अनूठे नमूने

मंदिरों के ठीक सामने ही सड़क पार कर राजमहल थे। भोजन के बाद हम उधर निकल पड़े। मालूम हुआ कि यहां प्रति व्यक्ति दस रुपये का टिकट लगता है। कई विदेशी सैलानी भी वहां घूम रहे थे। इस किले के भीतर दो मंदिर हैं, एक संग्रहालय और एक तोपखाना भी। पीछे कई और छोटे-बड़े निर्माण हैं। अनुमान है कि ये बैरक, अधिकारियों के आवास या कार्यालय रहे होंगे। मुख्य महलों को छोड़कर बा$की सब ढह से गए हैं। सबसे पहले हम रानी महल देखने गए। मुख्यत: मध्यकालीन स्थापत्य वाले इस महल की सज्जा में प्राचीन कलाओं का प्रभाव भी सा$फ देखा जा सकता है।

जहांगीर महल के आंगन में बना हम्माम
इस महल में वैसे तो कई जगहों से चतुर्भुज मंदिर की स्पष्टï झलक मिल सकती है, पर एक ख़्ाास झरोखा ऐसा भी है जहां से चतुर्भुज मंदिर और रामराजा मंदिर दोनों के दर्शन किए जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी जगह से रानी स्वयं दोनों मंदिरों के दर्शन करती थीं। यह अलग बात है कि अब उस झरोखे वाली जगह पर भी कूड़े का ढेर लगा हुआ है। यह राजा मधुकर शाह की महारानी का आवास था, जो भगवान राम की अनन्य भक्त थीं और यहां स्थापित भगवान राम का मंदिर उनका ही बनवाया हुआ है। महल का आंगन भी बहुत बड़ा और भव्य है। बीचोबीच एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां रानी का दरबार लगता रहा होगा। जबकि राजमंदिर का निर्माण स्वयं राजा मधुकर शाह ने अपने शासनकाल 1554 से 1591 के बीच करवाया था।

इसके पीछे जहांगीर महल है। इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में मु$गल सम्राट जहांगीर के सम्मान में राजा बीर सिंह देव ने करवाया था। वर्गाकार विन्यास में बने इस महल के चारों कोनों पर बुर्ज बने हैं। जालियों के नीचे हाथियों और पक्षियों के अलंकरण बने हैं। ऊपर छोटे-छोटे कई गुंबदों की शृंखला बनी है और बीच में कुछ बड़े गुंबद भी हैं। हिंदू और मु$गल दोनों स्थापत्य कलाओं का असर इस पर सा$फ देखा जा सकता है और यही इसकी विशिष्टïता है। भीतर के कुछ कमरों में अभी भी सुंदर चित्रकारी देखी जा सकती है। कुल 136 कक्षों वाले इस महल के बीचोबीच एक बड़े से हौजनुमा निर्माण है। इसके चारों कोनों पर चार छोटे-छोटे कुएं जैसी अष्टकोणीय आकृतियां हैं। हालांकि इनकी गहराई बहुत मामूली है। अंदाजा है कि इसका निर्माण हम्माम के तौर पर कराया गया होगा।

जहांगीर महल से पीछे दिख रही बेतवा की ख़ूबसूरत घाटी

महल की छत से पीछे देखने पर पीछे मीलों तक फैली बेतवा नदी की घाटी दिखाई देती है। दूर तक फैली इस नीरव हरियाली के बीच कई छोटे-बड़े निर्माण और कुछ निर्माणों के ध्वंसावशेष भी थे। ध्यान से देखने पर बेतवा की निर्मल जलधारा भी क्षीण सी दिखाई दे रही थी। भीतर गाइड किसी विदेशी पर्यटक जोड़े को टूटी-फूटी अंग्रेजी में बता रहा था, ‘पुराने ज़माने महल के नीचे से एक सुरंग बनी थी, जो बेतवा के पार जाकर निकलती थी।’ आगे उसने बताया कि इस महल का निर्माण 22 साल में हुआ था और जहांगीर इसमें टिके सि$र्फ एक रात थे। राढ़ी जी गाइड के ज्ञान से ज्य़ादा उसके आत्मविश्वास पर दंग हो रहे थे।

ख़ैर, सच जो हो, पर ‘ओरछा’ का शाब्दिक अर्थ तो छिपी हुई जगह ही है। इसका इतिहास भी अद्भुत है। इसकी स्थापना टीकमगढ़ के बुंदेल राजा रुद्र प्रताप सिंह ने 1501 में की थी, पर असमय कालकवलित हो जाने के कारण वे निर्माण पूरा होते नहीं देख सके। एक गाय को बचाने के प्रयास में वे शेर के पंजों के शिकार हो गए थे। बाद में राजा बीर सिंह देव ने अपने 22 वर्षों के शासन काल में यहां के अधिकतर मनोरम निर्माण कराए। उन्होंने पूरे बुंदेल क्षेत्र में 52 किले बनवाए थे। दतिया का किला भी उनका ही बनवाया हुआ है। बाद में 17वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ही ओरछा के राजा मु$गल साम्राज्य से विद्रोह किया। फिर शाहजहां ने आक्रमण करके इस पर $कब्ज़ा कर लिया, जो 1635 से 1641 तक बना रहा। बाद में ओरछा राज्य को अपनी राजधानी टीकमगढ़ में करनी पड़ी।

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो…

महलों के बहाने कुछ देर तक अतीत में जीकर हम उबरे तो सीधे बेतवा की ओर चल पड़े। मुश्किल से 10 मिनट की पैदल यात्रा के बाद हम नदी के तट पर थे। महल की छत से दिखने वाली घाटी से भी कहीं ज्य़ादा सुंदर यह नदी है। नदी की अभी शांत दिख रही जलधारा के बीच-बीच में खड़े लाल पत्थर के टीलेनुमा द्वीप अपने शौर्य की कथा कह रहे थे या बेतवा के वेग से पराजय की दास्तान सुना रहे थे, यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था। यूं मुझे नाव चलाने का कोई अनुभव नहीं है, लेकिन इस पर नाव चलाना आसान काम नहीं होगा। पानी के तल के नीचे कहां पत्थर के टीलों में फंस जाए, कहा नहीं जा सकता। मैंने मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास ‘बेतवा बहती रहीÓ का जिक्र किया तो राढ़ी जी कालिदास के मेघदूत को याद करने लगे-

तेषां दिक्षु प्रथित विदिशा लक्षणां राजधानीं


गत्वा सद्य: फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा।


तीरोपांत स्तनित सुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात्

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि।।

कालिदास का प्रवासी यक्ष अपने संदेशवाहक मित्र मेघ को रास्ते की जानकारी देते हुए कहता है- हे मित्र! जब तू इस दशार्ण देश की राजधानी विदिशा में पहुंचेगा, तो तुझे वहां विलास की सब सामग्री मिल जाएगी। जब तू वहां सुहानी और मनभावनी नाचती हुई लहरों वाली वेत्रवती के तट पर गर्जन करके उसका मीठा जल पीएगा, तब तुझे ऐसा लगेगा कि मानो तू किसी कटीली भौहों वाली कामिनी के ओठों का रस पी रहा है।

बेतवा के घाट पर

बेतवा का ही पुराना नाम है ‘वेत्रवतीÓ और संस्कृत में ‘वेत्रÓ का अर्थ बेंत है। कालिदास का यह वर्णन किसी हद तक आज भी सही लगता है। प्रदूषण का दानव अभी बेतवा पर वैसा $कब्ज़ा नहीं जमा सका है, जैसा उसने अपने किनारे महानगर बसा चुकी नदियों पर जमा लिया है। इसके सौंदर्य की प्रशंसा बाणभट्टï ने भी कादंबरी में की है। वैसे वराह पुराण में इसी वेत्रवती को वरुण की पत्नी और राक्षस वेत्रासुर की मां बताया गया है। शायद इसीलिए इसमें दैवी और दानवीय दोनों शक्तियां समाहित हैं। गंगा, यमुना, मंदाकिनी आदि पवित्र नदियों की तरह बेतवा के तट पर भी रोज़ शाम को आरती होती है। लेकिन बेतवा की आरती में हिस्सेदारी हमारी नियति में नहीं था। क्योंकि हमें झांसी से ताज एक्सप्रेस पकडऩी थी, जो तीन बजे छूट जाती थी। मौसम पहले ही ख़्ाराब था। बूंदाबांदी अभी भी जारी थी। समय ज्य़ादा लग सकता था। लिहाजा डेढ़ बजते हमने ओरछा और बेतवा के सौंदर्य के प्रति अपना मोह बटोरा और चल पड़े वापसी के लिए टैक्सी की तलाश में।

                                                                      — इति–

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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-2 (सोनागिरि)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 14, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन



सोनागिरि पहाड़ी पर मंदिरों का विहंगम दृश्य



चल पड़े सोनागिरि

मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद यह तय नहीं हो पा रहा था कि आगे क्या किया जाए। तेज सिंह इसके निकट के ही कसबे टीकमगढ़ के रहने वाले हैं। उनकी इच्छा थी कि सभी मित्र यहां से दर्शनोपरांत झांसी चलें और ओरछा होते हुए एक रात उनके घर ठहरें। जबकि राढ़ी जी एक बार और मां पीतांबरा का दर्शन करना चाहते थे। मेरा मन था कि आसपास की और जगहें भी घूमी जाएं। क्योंकि मुझे विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार दतिया कसबे में ही दो किले हैं और संग्रहालय है। इसके अलावा यहां से 15 किमी दूर जैन धर्मस्थल सोनागिरि है। 17 किमी दूर उनाव में बालाजी नाम से प्रागैतिहासिक काल का सूर्य मंदिर, करीब इतनी ही दूर गुजर्रा में अशोक का शिलालेख, 10 किमी दूर बडोनी में गुप्तकालीन स्थापत्य के कई अवशेषों के अलावा बौद्ध एवं जैन मंदिर, भंडेर मार्ग पर 5 किमी दूर बॉटैनिकल गार्डन, 4 किमी दूर पंचम कवि की तोरिया में प्राचीन भैरव मंदिर और 8 किमी दूर उडनू की तोरिया में प्राचीन हनुमान मंदिर भी हैं। दतिया कसबे में ही दो मध्यकालीन महल हैं। एक सतखंडा और दूसरा राजगढ़। इनमें राजगढ़ पैलेस में एक संग्रहालय भी है। दतिया से 70 किमी दूर स्यौंधा है। सिंध नदी पर मौजूद वाटरफॉल के अलावा यह कन्हरगढ़ फोर्ट और नंदनंदन मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। 30 किमी दूर स्थित भंडेर में सोन तलैया, लक्ष्मण मंदिर और पुराना किला दर्शनीय हैं। महाभारत में इस जगह का वर्णन भांडकपुर के नाम से है। मैं दतिया के आसपास की ये सारी जगहें देखना चाहता था। समय कम था तो भी कुछ जगहें तो देखी ही जा सकती थीं। मंदिर में ही खड़े-खड़े देर तक विचार विमर्श होता रहा और आख़्िारकार यह तय पाया गया कि आज की रात दतिया में गुजारी जाए। हम सब तुरंत मंदिर के पीछे मेन रोड पर आ गए। वहीं एक होटल में कमरे बुक कराए और फ्रेश होने चल पड़े। फ्रेश होकर निकले तो मालूम हुआ कि तेज और तोमर जी अपने किसी रिश्तेदार से मिलने कस्बे में चले गए हैं। वे लोग आ जाएं तो हम घूमने निकलें। पर वे लोग आए $करीब दो घंटे इंतज़ार के बाद। फिर का$फी देर विचार विमर्श के बाद तय हुआ कि अब हमें सोनागिरि चलना चाहिए। आख़्िारकार दो सौ रुपये में एक टैंपो तय हुआ और हम सब सोनागिरि निकल पड़े।

दतिया से सोनागिरि के बीच एक नयनिभिराम दृश्य
अलौकिक अनुभूति
क़रीब 5 किमी ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने के बाद ग्वालियर हाइवे मिल गया। हालांकि यह मार्ग भी अभी बन ही रहा था, पर फिर भी शानदार था। दृश्य पूरे रास्ते ऐसे ख़ूबसूरत कि जिधर देखने लगें उधर से आंखें किसी और तर$फ घुमाते न बनें। दूर तक पठार की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर फैली हरियाली और ऊपर धरती की ओर झुकते बादलों से भरे आसमान में अस्ताचल की ओर बढ़ते सूरज की लालिमा। किसी को भी अभिभूत कर देने के लिए यह सौंदर्य काफ़ी था। थोड़ी देर बाद सड़क छोड़कर हम फिर लिंक रोड पर आ गए थे। हरे-भरे खेतों के बीच कहीं-कहीं बड़े टीलेनुमा ऊंचे पहाड़ दिख जाते थे और वे भी हरियाली से भरे हुए। हर तरफ़ फैला हरियाली का यह साम्राज्य शायद सावन का कुसूर था।

दूर से ही सोनागिरि पहाड़ी पर मंदिरों का समूह दिखा तो हमारे सुखद आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। पहाड़ी पर रंग-बिरंगी हरियाली के बीच श्वेत मंदिरों का समूह देख ऐसा लगा, गोया हम किसी दूसरी ही दुनिया में आ गए हों। साथ के सभी लोग कह उठे कि आज यहां ठहरना वसूल हो गया। मालूम हुआ कि इस पहाड़ी पर कुल 82 मंदिर हैं और नीचे गांव में 26। इस तरह कुल मिलाकर यहां 108 मंदिरों का पूरा समूह है।


सोनागिरि में श्री नंदीश्वर द्वीप के समक्ष एन प्रकाश, तेज सिंह और अजय तोमर. पीछे खड़े हैं हरिशंकर राढ़ी

 यह जैन धर्म की दिगम्बर शाखा के लोगों के बीच अत्यंत पवित्र धर्मस्थल के रूप में मान्य है। यहां मुख्य मंदिर में भगवान चंद्रप्रभु की 11 फुट ऊंची प्रतिमा प्रतिष्ठित है। भगवान शीतलनाथ और पाश्र्वनाथ की प्रतिमाएं भी यहां प्रतिष्ठित हैं। श्रमणाचल पर्वत पर स्थित इस स्थान से ही राजा नंगानंग कुमार ने मोक्ष प्राप्त किया था। इनके अलावा नंग, अनंग, चिंतागति, पूरनचंद, अशोकसेन, श्रीदत्त तथा कई अन्य संतों को यहीं से मोक्ष की उपलब्धि हुई। $करीब 132 एकड़ क्षेत्रफल में फैली दो पहाडिय़ों वाले इस क्षेत्र को लघु सम्मेद शिखर भी कहते हैं। यहीं बीच में एक नंदीश्वर द्वीप नामक मंदिर भी है, इसमें कई जैन मुनियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इन पहाडिय़ों पर हम $करीब दो घंटे तक घूमते रहे। आते-जाते श्रद्धालुओं के बीच नीरवता तोडऩे के लिए यहां सि$र्फ मयूरों तथा कुछ अन्य पक्षियों का कलरव था। इन पहाडिय़ों पर मोर जिस स्वच्छंदता के साथ विचरण कर रहे थे, वह उनकी निर्भयता की कहानी कह रहा था। सुंदरता के साथ शांति का जैसा मेल यहां है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इहलोक में ही अलौकिक अनुभूति देते इस दिव्य वातावरण को छोड़ कर आने का मन तो नहीं था, पर हमें वापस होटल पहुंचना भी था। क्योंकि अगले दिन बिलकुल सुबह ही ओरछा के लिए निकलना था।

आप चाहें तो इसे दतिया की नाइटलाइफ कह सकते हैं

एक बार फिर दर्शन

रात में क़रीब साढ़े सात बजे हम दतिया पहुंच गए थे। लौटते समय जिस रास्ते से टैक्सी वाले हमें ले आए, वह रास्ता शहर के भीतर से होते हुए आता था। गलियों में व्यस्त यहां के जनजीवन का नज़ारा लेते हम होटल पहुंचे। कई जगह निर्माण चल रहे थे और शायद इसीलिए जि़ंदगी का$फी अस्त-व्यस्त दिखाई दे रही थी। होटल से तुरंत हम फिर पीतांबरा मंदिर निकल गए। रात की मुख्य आरती 8 बजे शुरू होती है। उसमें शामिल होने के बाद काफी देर तक मंदिर परिसर में ही घूमते रहे। इस समय भीड़ बहुत बढ़ गई थी। मंदिर से लौटते समय तय किया गया कि खाना बाहर ही खाएंगे। हालांकि बाहर भोजन बढिय़ा मिला नहीं। बहरहाल, रात दस बजे तक होटल लौट कर हम सो गए।

सुबह उठते ही मैं सबसे पहले कैमरा होटल की छत पर गया। पीछे राजगढ़ किले का दृश्य था और आगे दूर तक फैला पूरे शहर का विहंगम नज़ारा। इसे कैमरे में $कैद कर मैं नीचे उतरा और तैयारी में जुट गया। साढ़े सात बजे तक दतिया शहर छोड़ कर झांसी के रास्ते पर थे। झांसी पहुंच कर तेज सिंह ने न तो ख़ुद कुछ खाया और न हमें खाने दिया। उनका इरादा यह था कि सबसे पहले ओरछा में रामराजा के दर्शन करेंगे। इसके बाद ही कुछ खाएंगे। ख़्ौर, ओरछा के लिए झांसी बस स्टैंड से ही टैक्सी मिल गई।
जारी……….

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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 12, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन
हम दतिया पहुंचे तो दिन के करीब सवा बज चुके थे। ट्रेन बिलकुल सही समय से थी, लेकिन भूख से हालत खराब होने लगी थी। चूंकि सुबह पांच बजे ही घर से निकले थे। चाय के अलावा और कुछ भी नहीं ले सके थे। ट्रेन में भी सिर्फ एक कप चाय ही पी। उतर कर चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो लंबे प्लैटफॉर्म वाले इस छोटे स्टेशन पर सिर्फ़ ताज एक्सप्रेस से उतरा समूह ही दिख रहा था। जहां हम उतरे उस प्लैटफॉर्म के बिलकुल बगल में ही टैंपुओं का झुंड खड़ा था। इनमें प्राय: सभी पीतांबरा पीठ की ओर ही जा रहे थे। तेज सिंह ने एक टैंपू ख़ाली देखकर उससे पूछा तो मालूम हुआ कि सि$र्फ पांच सवारियां लेकर नहीं जाएगा। पूरे 11 होंगे तब चलेगा। तय हुआ कि कोई दूसरी देखेंगे। पर जब तक दूसरी देखते वह भर कर चल चुका था। अब उस पर भी हमें इधर-उधर लटक कर ही जाना पड़ता। बाद में जितने टैंपुओं की ओर हम लपके सब फटाफट भरते और निकलते गए। क़रीब बीस मिनट इंतज़ार के बाद आख़िर एक टैंपू मिला और लगभग आधे घंटे में हम पीतांबरा पीठ पहुंच गए।
दतिया का महल
वैसे स्टेशन से पीठ की दूरी कोई ज्य़ादा नहीं, केवल तीन किलोमीटर है। यह रास्ते की हालत और कस्बे में ट्रैफिक की तरतीब का कमाल था जो आधे घंटे में यह दूरी तय करके भी हम टैंपू वाले को धन्यवाद दे रहे थे। टैंपू ने हमें मंदिर के प्रवेशद्वार पर ही छोड़ा था, लिहाजा तय पाया गया कि दर्शन कर लें, इसके बाद ही कुछ और किया जाएगा। फटाफट प्रसाद लिए, स्टैंड पर जूते जमा कराए और अंदर चल पड़े। दोपहर का वक्त होने के कारण भीड़ नहीं थी। मां का दरबार खुला था और हमें दिव्य दर्शन भी बड़ी आसानी तथा पूरे इत्मीनान के साथ हो गया। अद्भुत अनुभूति हो रही थी।
वल्गा से बगला

इस पीठ की चर्चा पहली बार मैंने $करीब डेढ़ दशक पहले सुनी थी। गोरखपुर में उन दिनों आकाशवाणी के अधीक्षण अभियंता थे डॉ. शिवमंदिर प्रधान। उनके ससुर इस मंदिर के संस्थापक स्वामी जी के शिष्य थे। डॉ. उदयभानु मिश्र और अशोक पाण्डेय ने मुझे इस पीठ और बगलामुखी माता के बारे में का$फी कुछ बताया था। हालांकि जो कुछ मैंने समझा था उससे मेरे मन में माता के प्रति आस्था कम और भय ज्य़ादा उत्पन्न हुआ था। इसकी वजह मेरी अपनी अपरिपक्वता थी। बाद में मालूम हुआ कि ‘बगला’ का अर्थ ‘बगुला’ नहीं, बल्कि यह संस्कृत शब्द ‘वल्गा’ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ ‘दुलहन’ होता है। उन्हें यह नाम उनके अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण दिया गया। पीतवसना होने के कारण इन्हें पीतांबरा भी कहा जाता है।

स्थानीय लोकविश्वास है कि दस महाविद्याओं में आठवीं मां बगलामुखी की यहां स्थापित प्रतिमा स्वयंभू है। पौराणिक कथा है कि सतयुग में आए एक भीषण तू$फान से जब समस्त जगत का विनाश होने लगा तो भगवान विष्णु ने तप करके महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया। तब सौराष्टï्र क्षेत्र (गुजरात का एक क्षेत्र) की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीत देवी के हृदय से दिव्य तेज निकला। उस तेज के चारों दिशाओं में फैलने से तू$फान का अंत हो गया। इस तरह तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं और गृहस्थों के लिए यह समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं। मंदिर में स्थापित प्रतिमा का ही सौंदर्य ऐसा अनन्य है कि जो देखे, बस देखता रह जाए।

अनुशासन हर तरफमुख्य मंदिर के भवन में ही एक लंबा बरामदा है, जहां कई साधक बैठे जप-अनुष्ठान में लगे हुए थे। सामने हरिद्रा सरोवर है। बगल में मौजूद एक और भवन के बाहरी हिस्से में ही भगवान परशुराम, हनुमान जी, कालभैरव तथा कुछ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। इस मंदिर के अंदर जाते ही सबसे पहले पुस्तकों की एक दुकान और फिर शिवालय है। यहां मैंने पहला ऐसा शिवालय देखा, जहां शिव पंचायतन में स्थापित श्रीगणेश, मां पार्वती, भगवान कार्तिकेय एवं नंदीश्वर सभी छोटे-छोटे मंदिरनुमा खांचों में प्रतिष्ठित हैं। अकेले शिवलिंग ही हैं, जो यहां भी हमेशा की तरह अनिकेत हैं। वस्तुत: यह तंत्र मार्ग का षडाम्नाय शिवालय है, जो बहुत कम ही जगहों पर है। इस भवन के पीछे एक छोटे भवन में सातवीं महाविद्या मां धूमावती का मंदिर है। यहां इनका दर्शन सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए निषिद्ध है। महाविद्या धूमावती की प्रतिमा की प्रतिष्ठा महाराज जी ने यहां भारत-चीन युद्ध के बाद कराई थी। असल में उस समय स्वामी जी के नेतृत्व में यहां राष्ट्ररक्षा अनुष्ठान यज्ञ किया गया था।



दतिया कसबे का एक विगंगम दृश्य



बाईं तरफ एक अन्य भवन में प्रतिष्ठित हनुमान जी की प्रतिमा का दर्शन दूर से तो सभी लोग कर सकते हैं, लेकिन निकट केवल वही जा सकते हैं जिन्होंने धोती धारण की हुई हो। यह नियम बगलामुखी माता के मंदिर भवन में प्रवेश के लिए भी है। पैंट, पजामा या सलवार-कुर्ता आदि पहने होने पर सि$र्फ बाहर से ही दर्शन किया जा सकता है। भवन के अंदर सि$र्फ वही लोग प्रवेश कर सकते हैं, जिन्होंने धोती या साड़ी पहनी हो। कैमरा आदि लेकर अंदर जाना सख्त मना है। मंदिर में अनुशासन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि न तो यहां कहीं गंदगी दिखती है और न हर जगह चढ़ावा चढ़ाया जा सकता है। तंत्रपीठ होने के कारण अनुशासन बहुत कड़ा है। पूजा-पाठ के नाम पर ठगी करने वालों का यहां कोई नामो-निशान भी नहीं है।
संस्कृत और संगीत की परंपरा

मुख्य मंदिर के सामने हरिद्रा सरोवर है और पीछे मंदिर कार्यालय एवं कुछ अन्य भवन। इन भवनों में ही संस्कृत ग्रंथालय है और पाठशाला भी। मालूम हुआ कि पीठ संस्थापक स्वामी जी महाराज संस्कृत भाषा-साहित्य तथा शास्त्रीय संगीत के अनन्य प्रेमी थे। हालांकि स्वामी जी की पृष्ठभूमि के बारे में यहां किसी को कोई जानकारी नहीं है। लोग केवल इतना जानते हैं कि सन 1920 में उन्होंने देवी की प्रेरणा से ही यहां इस आश्रम की स्थापना की थी। फिर उनकी देखरेख में ही यहां सारा विकास हुआ। शास्त्रीय संगीत की कई बड़ी हस्तियां स्वामी जी के ही कारण यहां आ चुकी हैं और इनमें कई उनके शिष्य भी हैं।

मां बगलामुखी के दर्शन की वर्षों से लंबित मेरी अभिलाषा आनन-फानन ही पूरी हुई। हुआ कि मंगल की शाम हरिशंकर राढ़ी से फोन पर बात हुई। उन्होंने कहा, ‘हम लोग दतिया और ओरछा जा रहे हैं। अगर आप भी चलते तो मज़ा आ जाता।’ पहले तो मुझे संशय हुआ, पर जब पता चला कि केवल दो दिन में सारी जगहें घूम कर लौटा जा सकता है और ख़र्च भी कुछ ख़ास नहीं है तो अगले दिन सबका रिज़र्वेशन मैंने ख़ुद ही करवा दिया। राढ़ी के साथ मैं, तेज सिंह, अजय तोमर और एन. प्रकाश भी।  

ज़ारी……..

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रामेश्वरम : जहाँ राम ने की शक्तिपूजा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 5, 2011

हरिशंकर राढ़ी
(रामेश्वरम और दक्षिण भारत की यात्रा के लगभग दो साल पूरे होने वाले हैं . तबसे कई  यात्राएं और हुई  पर यह यात्रा विवरण अधूरा ही रह गया . इसे पूरा करने का एक और प्रयास …)
बाईस कुंडों का स्नान पूरा हुआ तो लगा कि एक बड़ा कार्य हो गया है। परेशानी जितनी भी हो घूम-घूम कर नहाने में, परन्तु कुल मिलाकर यहाँ अच्छा लगता है। परेशानी तो क्या , सच पूछा जाए तो इसमें भी एक आनन्द है। अन्तर केवल दृष्टिकोण  का है। आप वहाँ घूमने गए हैं तो वहाँ की परम्पराओं का पालन कीजिए और इस प्रकार उसे समझने का प्रयास भी।

स्नानोपरांत हम वापस अपने होटल आए और वस्त्र बदले । गीले वस्त्रों में दर्शन  निषिद्ध  है। अब हम मुख्य गोपुरम से दर्शनार्थ  मंदिर में प्रवेश  कर गए। एक जगह लिखा था- स्पेशल दर्शन । हमें  लगा कि यह कोई वीआईपी व्यवस्था या लाइन होगी । ज्यादा पूछताछ नहीं क्योंकि भाषा  की समस्या तो थी ही। न तो ठीक से हिन्दी जानने वाले और न अंगरेजी ही। तमिल से हमारा कोई दूर-दूर का रिश्ता नहीं ! वैसे भी मेरा मत यह रहता है कि मंदिर में दर्शन  लाइन में लगकर ही करना चाहिए।

खैर , लाइन में लगे- लगे बिल्कुल  आगे पहूँचे तो पता चला कि हमारा प्रसाद, फूल और हरिद्वार से लाया गया गंगाजल तो यहाँ से चढ़ेगा ही नहीं।  यह सामान्य लाइन है और यहाँ से आप केवल शिवलिंग के दर्शन कर सकते हैं। दर्शन तो हमने खूब किया था क्योंकि गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग पंक्ति में दूर से ही होने लग जाता है। अब प्रश्न  यह था कि हम अपना अर्घ्य, नैवेद्य आदि किस प्रकार अर्पित करें ? इस लाइन में तो अनावष्यक ही हमारा समय खराब हो गया । फिर भी राम द्वारा स्थापित शिव  की इस नगरी में आना एक लम्बी प्रतीक्षा के बाद हुआ था और सारे कार्य पूर्ण करके ही जाना था। अतः मैंने मित्र महोदय से आग्रह किया कि हम स्पेशल दर्शन की पंक्ति में पुनः लगें , गंगाजल अर्पित करें और पूजा करवा के ही चलें । अब दुबारा आना फिर न जाने कब हो। गोस्वामी तुलसी दास जी ने रामचरित मानस में इस ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में श्रीराम के मुख से कहलाया है-
रामनाथ मंदिर गोपुरम ( चित्र गूगल से साभार )
       जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं । ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ।।

       जो  गंगाजल आनि चढ़ाइहि । सो साजुज्य  मुक्ति  नर  पाइहि ।।

मैं यहाँ इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि इस कथन में कितना सत्य है और कितना नहीं। मैं इस पर भी कोई निर्णय नहीं देना चाहता कि मैं धार्मिक हूँ,इश्वरवादी  हूँ या अनीश्वरवादी । पर हाँ , इतना तो तय है कि मैं अन्ध विश्वासी  या पोंगापंथी नहीं हूँ। यह भी सत्य है कि आस्था और विश्वाश  विज्ञान की कसौटी पर कसा नहीं जा सकता। कुछ भी न हो , आत्मिक शान्ति  के लिए कुछ चीजों को बिना तर्क ही मान लेना बुरा नहीं होता , विषेशतः जब कोई हानि न हो रही हो। अंततः हम इस बार पूरी जानकारी लेकर स्पेशलदर्शन की लाइन में लगे। वस्तुतः इस लाइन में लगने के लिए प्रति व्यक्ति पचास रुपये का टिकट लेना पड़ता है। हमलोग कुल आठ प्राणी थे और इस प्रकार चार सौ रुपये का टिकट लेकर आगे बढ़े। यहाँ कोई भीड़ नहीं थी और दर्शनार्थियों  को समूह में अन्दर लिया जाता है। उनसे सामान्य पूजा करवाई जाती है और प्रसाद वगैरह चढ़वाया जाता है।

हमारा भी क्रम आया । रामेश्वरम  ज्योतिर्लिंग मेंदर्शनार्थियों को गर्भगृह में जाने की अनुमति नहीं है। ऐसी अनुमति दक्षिण भारत के किसी भी मंदिर में नहीं है। अब पूजा तो हो गई और पुजारियों ने हमारी गंगाजल की बोतल भी ले ली,किन्तु इसके पहले यह छानबीन जरूर की कि हमने कुल कितने टिकट लिए हैं। मेरे परिवार की चार टिकटें देखकर उन्होंने हमारा गंगाजल स्वीकार कर लिया और उसे अपने पात्र में डालकर शिवलिंग पर समर्पित भी कर दिया ( यह या तो उनकी भूल थी या फिर सदाशयता ) किन्तु मेरे मित्र का गंगाजल उन्होंने स्वीकार नहीं किया । दरअसल वहाँ गंगाजल के लिए पचास रुपये का टिकट अलग से लेना पड़ता है और इस सम्बन्ध में भी जानकारी के अभाव में हमसे भूल हो गई थी । अगर आपका कोई कार्यक्रम रामेश्वर  दर्शन का बनता है तो कृपया विशेष   दर्शन  और चढ़ावे का शुल्क  अलग से जमा कराकर रसीद ले लें।
दर्शनोपरांत हमारा ध्यान मंदिर की भव्यता पर गया और हम अवलोकन करने लगे । इसके वास्तु का जितना भी वैज्ञानिक विश्लेषण कर दिया जाए, इसकी शैली एवं विशालता की जितनी भी प्रशंसा कर दी जाए, पर इसको निहारने के अलौकिक आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता है। इसके विशाल गलियारे, मजबूत स्तंभ और किसी किले जैसी दीवारें भारतीय संस्कृति के गौरव की गाथा स्वयं कहती हैं।मंदिर लगभग पंद्रह एकड़ क्षेत्र में फैला है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता  इसके गलियारे हैं जो लगभग चार हजार फीट लंबे हैं और चार हजार खंभों पर खड़े हैं । मंदिर का पूरबी गोपुरम 126फीट ऊँचा है और कुल नौ माले का बना है। पश्चिमी  गोपुरम भी अत्यन्त शानदार  है किन्तु इसकी ऊँचाई पूरबी गोपुरम से कम है।

मुझे लगा कि इस मंदिर का भव्य होना तो नितान्त आवश्यक ही है। यह वो जगह है जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने आवश्यकता पड़ने पर शक्तिपूजा की थी । अपने समय के महाशक्तिशाली राजा रावण को परास्त करने के लिए उन्हें भी अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता थी । शिव तो कल्याणकारी, अपराजेय और औघड़ हैं ही, किन्तु मुझे लगता है कि राम की शिवपूजा राजनैतिक महत्त्व भी रखती है। आखिर राक्षसराज रावण किसकी शक्ति से इतना प्रभावशाली बन पाया? किस शक्ति ने उसे अजेय बना दिया और वह लगभग विश्वविजयी बन पाया! वह शक्ति तो शिव की ही थी! अतः इसमें राम की श्रद्धा के साथ एक कुशल राजनीति भी थी कि रावण को उसी के अस्त्र, उसी की शक्ति से मारा जाए। उसके ऊपर से शिव का वरदहस्त हटाया जाए और जब शिव ही साथ नहीं तो शिव होगा कैसे? अतः राम ने अपने सद्गुणों से, अपनी श्रद्धा से और अपनी विनम्रता से सर्वप्रथम शिव की पूजा की और अपना मार्ग प्रशस्त कर विजय अभियान पर चल दिए।

यह वही स्थल है जहाँ राम ने शक्तिपूजा की ।

ऐसा कहा जाता है कि बारहवीं षताब्दी तक शिवलिंग एक झोंपड़ी में स्थापित था। पहली बार इसके लिए पक्की इमारत श्रीलंका के पराक्रम बाहु द्वारा बनवाई गई। तदनन्तर इसे रामनाथपुरम के सेतुपर्थी राजाओं ने पूरा किया। मंदिर के कुछ विमान पल्लव राजाओं के काल में निर्मित विमान से साम्य रखते हैं। गलियारों का निर्माण कार्य अट्ठारहवीं शताब्दी  तक चलता रहा है। त्रावणकोर और मैसूर के राजाओं से मंदिर को प्रभूत आर्थिक सहायता मिलती रही है।

जैसा कि हमारे यहाँ प्रायः होता है,रामेश्वरम  या रामनाथ लिंगम से सम्बन्धित कुछ अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार जब रावण का वध करके सीता सहित श्रीराम अयोध्या वापस आ रहे थे तो उन्होंने यहाँ शिव पूजा का मन बनया और उनका आभार प्रकट करना चाहा। वैसे भी वे सीताजी को अयोध्या वापसी तक अनेक महत्त्वपूर्ण स्थानों को दिखाते आए थे। गंधमादन पर्वत के पास उतरकर उन्होंने शिवपूजा की इच्छा प्रकट तो  शिव की प्रिय नगरी वाराणसी से शिवलिंग लाने का कार्य पवनपुत्र हनुमान को सौंपा गया।( एक कथा के अनुसार हनुमान जी को शिवलिंग कैलास पर्वत से लाना था।) जब तक हनुमान जी वाराणसी से शिवलिंग लेकर आते , पूजा का मुहूर्त निकला जा रहा था। अस्तु सीता जी ने रेत का शिवलिंग बना दिया और उसी की पूजा की गई। कुछ समय पश्चात  जब हनुमान जी वाराणसी से दूसरा शिवलिंग लेकर वापस आए तो समस्या हुई कि इसका क्या किया जाए। अन्ततः उस शिवलिंग की भी स्थापना कर दी गई और वह आज भी विश्वेश्वर , विश्वनाथ  , काशीलिंगम या हनुमान लिंगम के नाम से सुपूजित है और नियमानुसार इस लिंग की पूजा सर्वप्रथम होती है।
गंध मादन पर लेखक सपरिवार  (छाया : लेखक )

मंदिर के तीर्थ-  मंदिर के अन्दर स्थित बाइस कुंड अपने आप में तीर्थ हैं। इनका प्रभाव अलौकिक माना जाता है । समासतः इनके प्रभाव एवं नाम का उल्लेख इस प्रकार है-
1 -महालक्ष्मी तीर्थ( यहाँ कुबेर ने स्नान करके नवनिधियाँ प्राप्त कीं ),2- सावित्री तीर्थ,  3-गायत्री तीर्थ, 4- सरस्वती तीर्थ, 5- माधवतीर्थ,6- गंधमादन 7-कलाक्ष, 8-कलाय,9-नलतीर्थ, 10-नीलतीर्थ,11 – चक्रतीर्थ,12-शंखतीर्थ, 13-ब्रह्महत्या विमोचन तीर्थ ,14-सूर्यतीर्थ, 15- चन्द्रतीर्थ,16- गंग तीर्थ ,17-जमुना तीर्थ, 18- गयातीर्थ (त्चचा रोगों से मुक्ति का विश्वास ),19-साध्यामृत तीर्थ, 20- सर्वतीर्थ (इसे शंकराचार्य ने बनवाया है और इसमें स्नान से समस्त नदियों में स्नान का पुण्य मिलता है।), 21- शिवतीर्थ , 22- कोटि तीर्थ (इसे श्रीराम ने शिवाभिशेक के लिए अपने धनुष  से खोदकर बनाया था।)
यहाँ भी अन्य पर्यटन स्थलों की भांति अनेक छोटे-बड़े दर्शनीय  स्थान हैं जिनमें कुछ ऐतिहासिक और पौराणिक  महत्त्व के हैं। पूजा अर्चना और भोजन के उपरान्त हम लोगों ने इन स्थलों के भ्रमण का कार्यक्रम रखा। सहायता के लिए थ्रीव्हीलर वाले मिल गए। रामेष्वरम की सीमा में स्थित सात-आठ स्थलों को घुमालाने के लिए एक ऑटो ने डेढ़ सौ रुपये लिया। दो परिवार , दो ऑटो । इसी में गाइड की भूमिका निःशुल्क  शामिल  थी। ( मेरे मित्र ने यात्रा व्यय का पूरा लेखा-जोखा बड़ी कुषलता से बना रखा था। इस मामले में उनका कोई जवाब नहीं। सारे खर्चे एक साथ, एक परिवार सा और बाद में हिसाब का आधा-आधा। यह वृतान्त लिखने से पूर्व रामेष्वरम दर्षन की पुस्तक में वह व्यय विवरणी मिल गयी, इसलिए किराए की जानकारी पक्की समझें। मैंने सूची को अभी संभाल रखा है – यादें ताजी हो जाती हैं।) यात्रा क्रमशः  जारी ……

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रामेश्वरम : बेहद अपने लगने लगे राम

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 31, 2010

हरिशंकर राढ़ी
कोडाईकैनाल से अपराह्नन चली हुई हमारी बस करीब साढ़े सात बजे मदुराई बस स्टैण्ड पर पहुँची तो झमाझम बारिश हो रही थी। बस से उतरे तो पता चला कि मित्र की जेब से बटुआ किसी ने मार लिया था। यह घटना हमारे लिए अप्रत्याशित थी। क्योंकि हमें विश्वास था कि दक्षिण भारत में ऐसा नहीं होता होगा। वैसे मुझे यह भी मालूम था कि मित्र महोदय बड़े लापरवाह हैं और उनकी अपनी गलती से भी बटुआ गिर सकता है। ऐसा एक बार पहले भी हुआ था, जब हम त्रिवेन्द्रम से मदुराई जा रहे थे। उस समय उनका बटुआ, जो पैंट की पिछली जेब में था और अधिकांश लोग ऐसे ही रखते हैं, गिरतेगिरते बचा था। मेरी पत्नी ने देख कर आगाह कर दिया था। बटुए में पैसा तो अधिक नहीं था किन्तु उनका परिचय पत्र, ड्राइविंग लाइसेन्स और एटीएम कार्ड था। हम सभी का परेशान होना तो स्वाभाविक था ही। तलाश प्रारम्भ हुई और अन्ततः निराशा पर समाप्त हुई। किन्तु पता नहीं क्यों मुझे बारबार ऐसा लग रहा था कि जेब किसी ने मारी नहीं है, अपितु पर्स लापरवाही से ही कहीं गिर गया होगा और मैं अकेले ही सोचता और गुनता रहा। अचानक मुझे लगा कि क्यों बस के नीचे देखा जाए। बस अभी भी वहीं खड़ी थी। उतरते समय उसमें गजब की भीड़ थी। जब मैंने बैठकर बस के नीचे देखा तो लगा कि कोई पर्स जैसी चीज है। एक दो मिनट बाद ही बस वहां से चल दी। मैंने लपक कर बटुआ उठा लिया और विजयी भाव से उनके पास आया। बटुआ तो उन्हीं का था। देखा गया तो पैसे निकाल लिए गए थे, किन्तु बाकी जरूरी कागजात उसमें मौजूद थे। सबने राहत की साँस ली, जैसे खोई हुई खुशी लौट आई।
बस स्टैण्ड से ऑटो कर के हम रेलवे स्टेशन पहुँचे और मालूम किया तो साढ़े ग्यारह बजे रात्रि की पैसेन्जर उपलब्ध थी। अभी लगभग आठ ही बज रहे थे। आराम से टिकट वगैरह लेकर आईआरसीटीसी के रेस्तरां में भोजन लिया और कुछ देर आराम करके गाडी की ओर गए। पूरी की पूरी ट्रेन जनरल ही है। ऊपर की बर्थ पर हम लोग आराम से फैल लिए हमारा अन्दाजा था कि सुबह चारपाँच बजे तक पहुँचेंगे गाडी कब चली, हमें पता ही नहीं चला। हाँ, दक्षिण की पैसेन्जर गाडियों में भी टिकट की जाँच बडी ईमानदारी से होती है, ये हमें जरूर पता लग गया। हम गहरी नींद में ही थे कि शोर हुआ, जागे तो पता चला कि हम पुण्यधाम रामेश्वरम पहुंच चुके हैं। अभी रात के ढाई ही बज रहे थे।
प्लेटफॉर्म पर स्थिर होते तीन बज चुके थे इतनी रात में वहाँ से जाना या होटल तलाशने के विषय में सोचना भी उचित नहीं था। अतः सुबह होने तक वहीं रुके रहना ही ठीक लगा। उत्तर भारत की तरह वहाँ भीडभाड का साम्राज्य तो था नहीं, अतः वहीं प्लेटफॉर्म पर ही आसन लग गया। चादरें निकाली गईं और लोग फैल गए। मुझे ऐसे मामलों में दिक्कत महसूस होती है। अनजान सी जगह पर घोडे बेच कर सोना मुझे सुहाता। इसलिए पास ही पडी कुर्सी पर बैठ गया और बोला कि आप लोग सोइए, मैं तो जागता ही रहूंगा।
कुर्सी पर बैठाबैठा मैं खयालों में डूब गया। यही रामेश्वरम है, जहाँ आने की जाने कब की इच्छा फलीभूत हुई है। शायद प्रागैतिहासिक काल की बात होगी जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम हजारों मील की यात्रा करके यहाँ पहुँचे होंगे। कहाँ अयोध्या और कहाँ रामेश्वरम! अयोध्या का अस्तित्व तो तब बहुत ठोस था, किन्तु रामेश्वरम का तो अतापता भी नहीं रहा होगा! राम आते और रामेश्वरम बनता। सागर का एक अज्ञात किनारा ही रह जाता! अयोध्या से चलकर भटकतेभटकते, पैदल ही यहाँ पहुँचे होंगे। आज मैं भी उन्हीं की अयोध्या से ही आया हूँ। और लगा कि राम कितने अपने हैं। क्षेत्रीयता का पुट या अभिमान, जो भी कहें, मुझे महसूस होने लगा। आज कितनी सुविधाएँ हो गई हैं ! एक कदम भी पैदल नहीं चलना है और मैं राम की अयोध्या से उन्हीं के इष्ट देव भगवान शिव और उनकी स्वयं की कर्मभूमि रामेश्वरम में बैठा उन्हीं के विषय में सोच रहा हूँ। सचमुच उन्होंने उत्तर को दक्षिण से जोड़ दिया। संस्कृति को एकाकार कर दिया। उस राम की असीम कृपा ही होगी कि उनके पौरुष, आस्था और सम्मान की भूमि का स्पर्श करने उसे प्रणाम करने का अवसर प्राप्त हो पाया है। धन और सामर्थ्य में तो मैं लोगों से बहुत ही पीछे हूँ।
बैठेबैठे ही मेरा मन बहुत पीछे चला गया। कैसा समय रहा होगा राम का जब वे यहाँ आए होंगे? क्या मानसिकता रही होगी उनकी? अपने राज्य से परित्यक्त, पत्नी के वियोग में व्याकुल और स्वजनों से कितनी दूर? अपनी जाति और सामाजिक व्यवस्था से बिलकुल अलग, सर्वथा भिन्न बानरों की सेना लिए और मित्रता की डोर पकड़े उस महाशक्तिशाली मायावी दशानन रावण से टक्कर लेने यहाँ तक पहुँचे! यहाँ आकर उसी शिव का सम्बल लिया जिसका वरदहस्त पाकर ही रावण अजेय बना हुआ था। किन्तु शिव तो सदैव सत्य के साथ होता है, चाटुकारिता और उत्कोच के साथ नहीं। कितना सुन्दर संगम हुआ सत्य और शिव का यहाँ ! यही है वह रामेश्वरम और धन्य है मेरे जीवन का यह क्षण जब मैं (एक अयोध्यावासी) अपने राम के पद चिह्नों की रज लेने का अवसर प्राप्त कर पाया हूँ।
भोर की पहली किरण के साथ मैंने सबको जगाया और सामान समेट कर स्टेशन से बाहर गए। दो ऑटो किए गए और मंदिर की ओर प्रस्थान किया। यहाँ भी हमारी प्राथमिकता थी कि कोई होटल लेकर सामान पटकें, नहाएं धोएं और तब मंदिर की ओर चलें। ऑटो वाले ने खूब घुमाया और अपने स्तर पर होटल दिलाने का पूरा प्रयास किया। अब उसने इतना प्रयास क्यों किया, ये तो सभी ही जानते हैं। या तो कमरा सही नहीं, या फिर किराया बहुत ज्यादा! इधरउधर घूमने के बाद मैंने उसे नमस्ते किया और अपने तईं ही कमरे का इंतजाम करने की ठानी। बहुत जल्दी ही हमें एक होटल मंदिर के पीछे मुख्य सड़क पर ही मिल गया। हमने तुरन्त ही दो कमरे बुक कर लिए। रामेश्वरम में, मुझे ऐसा बाद में लगा, तीनचार सौ में डबल बेड के कमरे बडे आराम से मिल जाते हैं। वैसे वहाँ ठहरने के लिए सर्वोत्तम स्थान गुजरात भवन है जो मंदिर के मुख्य द्वार के बिलकुल पास है। यहाँ व्यवस्था अच्छी है और किराया मात्र दो सौ पचास रुपये।

सागर के खारे जल की बात तो और होती ही है, किन्तु यहां के जल में जो सबसे बडी समस्या हमें दिख रही थी वह थी गन्दगी। पानी बिलकुल डबरीला और अनेक प्रकार के प्रवहमान एवं स्थिर पदार्थों से युक्त था।

होटल में सामान जमाने के बाद हम सागर में स्नान के लिए निकल पडे। यहाँ आने की योजना बनाते समय ही मैंने ये मालूम कर लिया था कि सर्वप्रथम यहाँ मंदिर के मुख्य गोपुरम के सम्मुख बंगाल की खाडी में और तदुपरान्त उन्हीं गीले कपडों में मंदिर में स्थित बाईस कुंडों में स्नान करने की परम्परा और प्रावधान है। सागर के खारे जल की बात तो और होती ही है, किन्तु यहां के जल में जो सबसे बडी समस्या हमें दिख रही थी वह थी गन्दगी। पानी बिलकुल डबरीला और अनेक प्रकार के प्रवहमान एवं स्थिर पदार्थों से युक्त था। हाँ, पर इतना गंदा भी नहीं था कि घिन हो जाए या इतनी दूर से चलकर आने वाले की आस्था धरी की धरी ही रह जाए और वह तथाकथित कर्मकांड से सहज ही विमुख हो जाए। अंततः हम सबने भी हिम्मत बटोरी और बचतेबचाते उस डबरीले सागर में घुस गए।
अरब सागर के उस खारे पानी में नहा कर निकले तो अगला क्रम मंदिर के अन्दर बाईस कुण्डों में नहाने का था। वहाँ से गीले कपड़े में हम मंदिर की ओर चले ही थे कि कई पंडे हाथों में बाल्टी और रस्सी पकडे हमारी तरफ लपके और हमें नहला देने का प्रस्ताव करने लगे। इतने में हम मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार पर पहुँचे। यहाँ कुछ और सेवकों ने घेरा डाला। उनका कहना था कि वे हर सदस्य को पूरी बाल्टी भर कर हर कुंड पर नहलाएंगे और सौ रुपये प्रति सदस्य लेंगे। पचास रुपये तो प्रवेश शुल्क और सरकारी फीस ही है। यह बात सच थी कि प्रवेश शुल्क पचीस रुपये प्रति व्यक्ति था और नहलाने का भी उतना ही। सत्तर रुपये में बात लगभग तय ही होने वाली थी कि मेरे मित्र महोदय को चिढ गई और वे सरकारी नियम के अन्तर्गत प्रवेश लेने चल पडे। उन्हें नियम विरुद्ध कोई भी बात जल्दी अच्छी नहीं लगती और अपने देश की व्यवस्था में वे अकसर फेल हो जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ। साथ निभाने के लिए मुझे भी पीछेपीछे चलना पड़ा, हालाँकि मैं जानता था कि हमें अन्दर जाकर दिक्कत होगी।
टिकट लेकर प्रवेश किया तो पहले कुंड पर एक सेवक खडा मिल गया। कुंड का मतलब यहाँ कुएँ से है। ऐसे ही गहरेगहरे बाईस कुएँ यहाँ हैं जिनके जल से नहाने की यहाँ परम्परा है। कुल मिलाकर हम आठ सदस्य थे और आगे परेशानी शुरू होनी थी, हुई। सभी कुएँ एक जगह नहीं बल्कि दूरदूर हैं। दो चार कुंडों के बाद नहलाने वाले सेवक भारतीय व्यवस्था के अनुसार नदारद! अधिकांश बाहर से ही यजमान पटा कर ले आते हैं और उन्हें ही नहलाने में व्यस्त रहते हैं। हम तो जैसे जनरल वार्ड के मरीज हो रहे थे। मुझे मित्र पर मन ही मन गुस्सा भी रहा था। अंततः एक ग्रुप के साथ ही हम भी लग गए। उससे हमारी सुविधा शुल्क की शर्त पर सेटिंग हो गई। अगर आपको कभी जाना हो और इस धार्मिक कर्मकांड का भागी बनना हो तो आप भी किसी पंडे से मोलभाव कर ठेका छोड दें। सुखी रहेंगे।
वैसे यहाँ कुंडों में स्नान करना अच्छा लगता है।

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कोडाईकैनाल में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 11, 2010

–हरिशंकर राढ़ी
हमारी बस अपनी तीव्र गति से प्रकृति का स्पर्श करती हुई कोडाईकैनाल की तरफ बढ़ी जा रही थी।पर्वतमाला हमारे साथ-साथ चल रही थी और हम उत्सुक थे कि हम इनके अन्दर प्रवेश करें। इसी पर्वतपाद प्रदेश में बस चालक ने एक रेस्तरां पर बस रोकी और उस खुले से रेस्तरां में हम भूख या स्वाद से ज्यादा उस उन्मुक्त से वातावरण का स्वाद लेने के लिए कुछ खाया पीया। यहाँ से हम पहाडियों की गोद में समाने लगे। बलखाती सर्पाकार सडक पर बस हिचकोले लेने लगी और फिर पूरी बस बच्चों की मौजमस्ती से गूँजने लगी। उनके लिए यह प्रायः नया अनुभव था, ऊपर से वे एक समूह में थे । सडक का रोमांच मेरे लिए तो कुछ खास नहीं था क्योंकि मैं जम्मू , समूचे गढवाल क्षेत्र से लेकर काठमांडू तक हिमालय की यात्रा कर चुका हूँ। हिमालय की उच्चता के सम्मुख यह यात्रा कुछ भी नहीं थी परन्तु आकर्द्गाण यहां भी कम नहीं था । सितम्बर का अन्त था, दक्षिण भारत में गर्मी यूँही कम नहीं थी पर यहां की बात ही कुछ और थी । ठण्डी-ठण्डी हवा ने जैसे द्रारीर के साथ मन आत्मा को भी शीतल कर दिया हो!
यह पर्वतीय यात्रा लगभग दो घण्टे की होती है। बस टूअरिस्ट थी, अतः तेज चलना स्वाभाविक ही था। रास्ते में मनमोहक हरियाली का साम्राज्य चहुंओर। इतने में हम एक अत्यन्त विशाल निर्झर के सामने खड़ी थी । सिल्वर कास्केड नामक इस जलप्रपात को देखते ही बनता था और यह विचार मन में बार- बार आता था कि निश्चित ही प्रकृति से बड़ा कलाकार और वास्तुकार कोई भी नहीं है। यहाँ फोटो- सोटो की रस्म निभाकर हम आगे के लिए रवाना हुए और कुछ अनावच्च्यक सी भी चीजों ( जो हमारे बस पैकेज में शामिल थीं, टूअर ऑपरेटर ऐसे कई मामूली स्थलों को जो रास्ते में पड ते हैं और जिनपर उनका कोई विशेष खर्च नहीं आता और दर्शनीय स्थलों की सूची लम्बी हो जाती है,बस ) को देखते हुए हम कोडाईकैनाल पहुँच गए।
वाकई कोडाईकैनाल एक अत्यन्त खूबसूरत जगह है और इसकी पृद्गठभूमि उस लहरदार पर्वतीय संकरे राजमार्ग ने ही तैयार कर दी थी। हम वहां की प्राकृतिक सुन्दरता बस निहारे जा रहे थे। अन्य पर्वतीय शहरों की भांति यह शहर भी कहीं सघन तो कहीं विरल बसा हुआ है। सबसे पहले हमें बस वाला रॉक पिलर ले गया। यहां दो ऊँची चट्टानें खम्भों की भांति एक साथ खड़ी हैं, ऐसा लगता है कि किसी अच्छे कारीगर ने बिल्कुल साहुल की सीध लेकर बनाया हो। अभी हम पहुंचे ही थे और एक झलक मिली ही थी कि अचानक घना कोहरा छा गया और रॉक पिलर कोहरे की चादर ओढ कर छिप से गए।एकाएक इतना घना कोहरा देखने का अपना ही रोमांच था। हमें ख़ुशी इस बात की भी थी कि हम इतने भाग्यशाली अवश्य थे कि थोडा पहले पहुंच गए अन्यथा मन में एक कसक रह ही जाती! हालांकि, रॉक पिलर में इतना कुछ दर्शनीय नहीं है, बस एक उत्कंठा वाली बात है।
यहाँ-वहाँ घूम-फिरकर हमारी बस कोडाई झील के पास एक भोजनालय के सामने आकर खड ी हो गई।उस बस का यह सेट भोजनालय रहा होगा, इनको यहां से ग्राहक लाने के नाम पर अच्छा कमीच्चन मिल जाता है। खैर , यहां हमने भोजन किया और बस वाले के अनुसार हमारे लिए उसकी सेवा समाप्त थी क्योंकि हमारी बुकिंग केवल एक साइड की थी। वैसे ये टूअर ऑपरेटर बिलकुल एक जैसे होते हैं,चाहे उत्तर भारत हो या दक्षिण! पैसे के चक्कर में किसी को भी बेवकूफ बनाने में इन्हें कोई परहेज नहीं! हमारे ऑपरेटर ने मदुराई से चलते समय ही कह दिया था कि कोडाईकैनाल में मौसम खराब है और किसी भी होटल में कमरा खाली नहीं है (जिससे कि घबराकर ये वापसी की भी बुकिंग करा लें और उसकी आठ सीटें जो खाली जाने वाली हैं , भर जाएँ। यात्री का अपना टूर भले ही सत्यानाश हो जाए, उनका क्या? और यह बात हम समझ चुके थे।)। यही नाटक यहां बस के ड्राइवर और कन्डक्टर ने किया । उनका कहना था कि यहां कोई कमरा खाली नहीं है। किसी बड़े अर्थात महंगे होटल में शायद मिल जाए तो मिल जाए! बहरहाल, हजार पन्द्रह सौ के नीचे तो कोई मतलब नहीं ! मेरे मित्र को गुस्सा कुछ ज्यादा ही आ जाता है क्योंकि गलत बात बर्दाश्त कर पाना उनके वश का नहीं ।। बड़ी जोर की फटकार उन्होंने लगाई। वे कहां गए, ये तो हम नहीं जानते परन्तु इसके बाद हम अपने दम पर होटल ढूंढने निकल दिए और जल्दी ही पास में एक होटल मिल भी गया जो हमारी व्यय सीमा के अन्दर था। हमने सामान रखा और कोडाईकैनाल झील देखने निकल पड़े ।
कोडाईकैनाल का मुखय आकर्षण यहाँ की कोडाई झील है। द्राहर के लगभग बीच में स्थित यह झील किसी सितारे के आकार की है और अत्यन्त विशाल है। इसी झील के नाम पर ही इस पर्वतीय स्थल का नाम कोडाईकैनाल पड़ा हुआ है। वैसे इस द्राहर के नामकरण के बारे में और भी बातें है।तमिल भाषा में को- डाई का अर्थ होता है ग्रीष्म और कैनाल का अर्थ होता है देखना । एक अन्य उच्चारण अन्तर के अनुसार कोडाई कैनाल का अर्थ होता है जंगल का उपहार। कोडाईकैनाल झील के विषय में बड़ी ईमानदारी से कुछ कहा जाए तो वह यह होगा कि यह झील वाकई में बहुत सुन्दर है। इसके आगे बस कविताएं ही लिखी जा सकती हैं।
इस झील में नौका विहार करने का अपना एक अलग आनन्द है । पदचालित से लेकर नाविक चालित छोटी नौकाएं किराए पर उपलब्ध हैं और इसका संचालन तमिलनाडु पर्यटन विभाग करता है। हमने मशविरा किया और नाविक चालित नौका किराए पर ली, इसलिए कि साथ में बच्चे थे । स्वयंचालित नौका में क्या शैतानी कर दें कौन जानता है? यह नौकाविहार अपने आप में एक सुखद एहसास था। लम्बी-चौड़ी झील में रंग-विरंगी नौकाएं तैर रही थीं । झील लगभग अस्सी फीट गहरी है (यह नौका चालक की सूचना के अनुसार है) और कहीं ना कहीं इससे थोडा डर भी लग रहा था।
झील के आसपास छोटी -छोटी दूकानें बहुत सुन्दर लगती हैं। तरह – तरह के अल्पाहार यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते रहते हैं ।यहां घुड़सवारी का शौक भी फरमाया जा सकता है। यहाँ घूमते-घामते शाम हो गई थी और हम अब वापस आ गए। कुछ देर शहर घूमकर , आवश्यक और अनावश्यक जानकारी लेकर अपने होटल आ गए। सितम्बर के महीने में सर्दी का एहसास बहुत ही सुहावना लग रहा था और हम इसका आनन्द किसी भी कीमत पर छोडना नहीं चाहते थे।
अगली सुबह हमारा कार्यक्रम कोकर्स वाक घूमने का था । कोकर्स वाक कोई एक किलोमीटर लम्बा एक पथ है जो कोडाईकैनाल के दक्षिणी छोर पर स्थित है और बस स्टैंड से लगभग आधा किमी की दूरी पर है।इस पथ का निर्माण ले० कोकर्स ने सन्‌१८७२ में किया था। यह भ्रमण पथ सेंट पीटर्स चर्च से वैन एलन हॉस्पीटल तक फैला है। यहां से पामबन नदी की घाटी से लेकर मदुराई तक का दृश्य देखा जा सकता है बच्चर्ते दिन साफ हो! इस मामले में हम लगभग भाग्यशाली थे। लगभग आधा कोकर्स वाक घूम लेने तक मौसम साफ था, घाटियों का सौन्दर्य हमने खूब देखा और फिर देखते ही देखते कोहरे की चादर ने फिर पूरे कोडाईकैनाल को अपने अन्दर समा लिया।
कोडाईकैनाल में घूमने के लिए बहुत कुछ है, मसलन- ब्रायण्ट वानस्पतिक उद्यान, बीअर शोला फॉल्स, ग्रीन व्यू वैली,डॉल्फिन्स नोज। यहां कुरिन्जी मुरुगन मंदिर अत्यन्त प्रसिद्ध है किन्तु समयाभाव में हम वहां नहीं पहुँच पाए। इसकी दूरी मंदिर से लगभग चार किमी है । यहां का मुखय आकर्षण हर बारह साल बाद खिलने वाला कुरिन्जी का फूल है। हर बारहवें वर्ष जब यह फूल खिलता है तो यहां का पर्यटन भी खिल उठता है।
कोडाईकैनाल प्राकृतिक रूप से समृद्ध है और प्राकृतिक उत्पाद भी यहां खूब बिकते है। शुद्ध शहद , मेवे, जड़ी-बूटियां, फल (जिसमें से कई उत्तर भारत में नहीं मिलते )और शक्तिवर्धक औषधियां प्रचुरता में उपलब्ध हैं। मेरा विश्वास है कि अभी भी यहां के उत्पादों में शुद्धता का प्रतिशत अधिक है। सबसे अधिक मशहूर यहां के हस्त निर्मित चॉकलेट हैं जो लगभग दो सौ से दो सौ पचास रुपये प्रति किलो की दर से मिलतें हैं। इनकी पैकिंग ये इस प्रकार कर देते हैं कि ये कई दिन तक खराब नहीं होते। ऐसे कई सामान हमने भी पैक कराया और यहां दिल्ली में काफी दिनों तक उसका प्रयोग किया।
दोपहर से हमें मदुराई के लिए निकलना था। अगली सुबह तक रामेश्वरम पहुँच जाना हमारा लक्ष्य था। एक ख़ुशी और एक दर्द लिए हम कोडाईकैनाल बस स्टैण्ड के लिए पैदल ही चल पड़े । बस पकड़ी और वापसी की राह पर! अभी कोडाईकैनाल छूटा ही था कि झमाझम बारिश होने लगी। अब यह सफर और भी सुन्दर एवं सुखद हो गया, शायद वर्णनातीत भी।
मैंने महसूस किया कि यहाँ की सुन्दरता में एक अध्यात्म है- एक प्राकृतिक अध्यात्म। आत्मा को , मन को और शारीर को एक दुर्लभ शांति मिलती है। बारिश होती रही , यात्रा चलती रही। इस बार मेरा मन छोटी- छोटी बातों का उल्लेख करने का नहीं हुआ। ऐसी बातें तो होती ही रहती हैं। अभी तो यहां से वापसी भी ठीक से नहीं हुई थी और मन दुबारा आने के विषय में सोचने लगा था। प्रकृति का ऐसा रूप देखकर प्रसिद्ध अंगरेजी कवि विलियम वर्ड्‌सवर्थ की पंक्तियां याद आने लगी थीं-
One impulse from a vernal wood
Can teach you more of man
Of moral evil and of good
Than all the sages can.

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मीनाक्षी के बाद

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 8, 2010

मीनाक्षी के बाद
मंदिर से निकलते-निकलते अंधेरा हो चुका था । विद्युत प्रकाश में नहाया हुआ मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर प्रांगण के बाहर से और भी मनमोहक लग रहा था। फिर भी हम अब बाहर की दुनिया में वापस आ चुके थे। अर्थ-व्यवहार एवं दुकानदारी के चिर परिचित क्रियाकलाप ज्यों के त्यों चल रहे थे। एक बात बताना तब मैं भूल गया था और शायद अच्छा ही हुआ था। मंदिर के प्रवेशद्वार पर ही मदुराई की मशहूर सिल्क साड़ियों की अनेक दूकानें है। ये दूकानदार मंदिर में प्रवेश से पूर्व जूता-चप्पल रखने की सुविधा मुफ्त उपलब्ध कराते हैं। मुझे उनकी इस सहृदयता पर संदेह हुआ था और मैंने इसका कारण जानना चाहा तो बड़ी मुश्किल से बताया गया कि आप वापसी में उनकी दूकान पर साड़ियाँ देख सकते है। अब जाकर इस सुविधा का अर्थ समझ में आया और तसल्ली हुई। लौटे तो साड़ियाँ देखनी ही पड़ीं।
पर मैं यह जरूर कहना चाहूँगा कि मदुराई की सिल्क साड़ियाँ वास्तव में बहुत अच्छी होती हैं। इनमें श्रम, कलाकारी एवं गुणवत्ता का अद्भुत समन्वय होता है और दिल्ली की तुलना में इनकी कीमत भी काफी तार्किक होती है। मदुराई की याद के रूप में मैंने भी धर्मपत्नी के लिए उनकी पसन्द की साड़ी खरीदी और फिर से मदुराई की गलियों का आनन्द लेने लगे।
दक्षिण भारत , खासकर मदुराई और आसपास के इलाकों में चाय बनाने का एक अलग अंदाज है। उनके इस खास अंदाज की वजह से हमारी चाय पीने की आदत कुछ और ही बढ़ गई थी। वहां के चाय बनाने वाले दूध में चाय के सत्त को इतना ऊपर से डालते और फेंटते हैं कि देखते ही बनता है। बिल्कुल कड़क चाय बनती है और गजब का ही स्वाद आता है। ऐसी बहुत सी चाय हमने पी और चाय बनते देखने का आनन्द लिया।
रात का भोजन हमने एक दक्षिण भारतीय रेस्तराँ में लेने का निर्णय किया। तमाम दक्षिण भारतीय व्यंजनों का बड़े प्लेट में केले के गोल-गोल कटे पत्तों पर परोसा जा रहा था। वहां केले के पत्ते पर भोजन परोसने का तात्पर्य शुद्धता ही नहीं अपितु सम्मान देना भी होता है। हमारे समूह में अधिकांशतः बच्चों ने दक्षिण भारतीय व्यंजनो का जमकर आनन्द लिया।
अगले दिन हमें कोडाईकैनाल जाना था। इण्टरनेट एवं कुछ अन्य माध्यमों से मैंने कामचलाऊ जानकारी इकठ्ठा कर ली थी। दूरी ज्यादा नहीं है। लगभग एक सौ बीस किलोमीटर है और मदुराई के बस स्टैंड से तमिलनाडु राज्य परिवहन की बसें जाती रहती हैं । मित्र ने कहा कि कुछ और जानकारी ले लेते हैं और परिवार हम निकट स्थित होटल में छोड़कर जानकारी लेने निकल पड़े। इधर-उधर घूमते-घामते एक ट्रवेल एजेण्ट से हम टकरा ही गए। बड़े सम्मान से वह हमें अपने आफिस ले गया और बताया कि उसकी पर्यटक बसें सुबह आठ बजे तक कोडाईकैनाल के लिए निकलती हैं और सभी दर्शनीय स्थलों का भ्रमण कराकर सायं आठ बजे तक वापस मदुराई छोड़ देती हैं। मैं कभी भी इन व्यवसाइयों की मंशा पर भरोसा नहीं कर सका हूँ। ये कौन सी गोली दे रहे हैं और कितना झूठ बोल रहे हैं ये भगवान भी नहीं जान सकता ! खैर , हमें तुरन्त वापस नहीं लौटना था। कम से कम एक रात वहां रहना था। ये क्या कि पैसे भी खर्च करिए, भागकर जाइए भी और कुछ ठीक से देख भी न पाइए। गोया कबड्डी पढ़ाने गए हों! उसके नियमानुसार आने जाने और साइट सीइंग का किराया २५०/- प्रति सीट था और केवल जाने एवं कुछ स्थलों को देखकर उतर जाने का किराया १५०/-। मैंने अंदाज लगाया था कि मदुराई से कोडाईकैनाल का राज्य परिवहन की बस का किराया दूरी के हिसाब से लगभग 70रु तो होगा ही । एजेण्ट ने 80रु बताया था। इस प्रकार इसकी बस में जाने से कोई विशेष नुकसान नहीं और वह भी हमें होटल से उठाएगा। पर ये तो बाद में पता चला कि तमिलनाडु परिवहन की सामान्य बसों का किराया बेहद कम है- केवल 28 पैसे प्रति किलोमीटर और इस प्रकार मदुराई से कोडाईकैनाल का किराया 40रु प्रति व्यक्ति है।
अगली सुबह थोड़ी बहुत किचकिच के बाद बस वाले ने हमारी यात्रा शुरू करवा दी । मदुराई एक बड़ा शहर है, इसका बोध हमें बस वाले ने जगह- जगह से सवारियां उठाने के क्रम में करा दिया । मदुराई से बाहर निकलते ही राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 7 (वाराणसी से कन्याकुमारी, जो भारत का सबसे लम्बा राजमार्ग है ) पर प्रकृति की हरीतिमा ने हमारा मन मोहना शुरू कर दिया । कुछ दूर और चलकर जब बस ने मुख्य मार्ग को छोड़ कोडाईकैनाल की तरफ पतली सड़क पर मोड़ लिया तो मानो प्रकृति अपने सुन्दरतम रूप में आ गई!नारियल के हरे-भरे बाग, सरसराती हवा और हल्की- हल्की फुहार ने जैसे जीवन का वास्तविक सन्देश दे दिया । एक से एक रूप, अनूठा सौन्दर्य और खो जाने की ललक ने जैसे किसी स्वाप्न लोक में पहँुचा दिया। मन संगीतमय होने लगा और बरबस ही कुछ पंक्तियाँ उभरने लगीं । मैंने डायरी ली और उस यथार्थ सौन्दर्य को शब्द बद्ध करने लगा । आज वह पृष्ठ मेरे सामने है-
लम्बी चिकनी
सलोनी
सड़क पर भागते हम ,
दोनों तरफ फैले
नारियल के ये हरे-हरे पेड़
दोनों तरफ उठी हुई पहाड़ियाँ
आकार में जैसे
किसी सलोनी नवयुवती के
उन्नत उरोज,
बस देखते ही रह जाते हैं
हम ही नहीं
जैसे ये नारियल के पेड़ भी
निहार रहे हों
उसका यौवन
आँखें फाड़
और उस सौन्दर्य के आगे
महसूस कर रहे हों छोटा
अपने आप को।
फिर मैं तो सामान्य सा मानव
और क्या करता
महसूस करने के सिवा ?
आखिर मुझे भी तो मानव बने रहना है
और सौन्दर्य को महसूस करना
मनुष्य के अस्तित्व के लिए
आवश्यक है ,
चाहे वह सौन्दर्य प्रकृति का हो
या किसी युवती का!
खिड़की की साइड में बैठी हुई पत्नी
बहुत सुन्दर लग रही है
आज,
और मैं सोच रहा हूँ
कि काश
ये मेरी प्रेमिका होती!
कितना साम्य होता
इस प्रकृति से
क्योंकि दोनों ही
समर्पित हैं
पूरी तरह मेरे लिए
पर मैं
उनमें न जाने क्या और खोजता हूँ
और कुछ चोरी करना चाहता हूँ
केवल अपने लिए
इस प्रकृति से !

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मीनाक्षी सुन्दरेश्वर मंदिर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 2, 2010

-हरिशंकर राढ़ी

(लेखमाला की पिछली कड़ी में मदुराई और मीनाक्षी मंदिर का जो वर्णन मैंने किया था , उसे राष्ट्रीय सहारा दैनिक ने अपने 23 जनवरी के अंक में ज्यों का त्यों सम्पादकीय पृष्ठ पर अपने कॉलमब्लॉग बोलामें ‘देवदर्शन और विशेष शुल्क‘ शीर्षक से छापा है।)

मदुरै का मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर वास्तव में हिन्दू धर्म ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति का एक गौरव है। अंदर जाने पर जो अनुभूति होती है, उसकी तो बात ही अलग है; इसका बाहर का रूप ही अत्यन्त चित्ताकर्षक है और अपनी विशालता की गाथा स्वयं ही बयान कर देता है। वहीं से यह उत्कंठा जागृत हो जाती है कि कितनी जल्दी अंदर प्रवेश कर लें। यह मंदिर जितना भव्य बाहर से है , कहीं उससे ज्यादा अंदर से है।

सामान्यतया मीनाक्षी मंदिर के नाम से विख्यात इस मंदिर का पूरा नाम मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर या मीनाक्षी अम्माँ मंदिर है।यह मंदिर भगवान शिव और देवी पार्वती जो मीनाक्षी के नाम से जानी जाती हैं, को समर्पित है। हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव अत्यन्त सुन्दर रूप में देवी मीनाक्षी से विवाह की इच्छा से पृथ्वीलोक पधारे। देवी मीनाक्षी पहले ही मदुराई के राजा मलयध्वज पांड्य की तपस्या से प्रसन्न हो मदुराई में अवतार ले चुकीं थीं। कुछ बड़ी होने पर वे वहां शासन संभालने लगीं। भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने देवी मीनाक्षी से विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे वे सहर्ष मान गईं। अब इस विवाह की तैयारियाँ होने लगीं। निश्चित रूप से यह पृथ्वीलोक का सबसे महत्त्वपूर्ण और गरिमामय विवाह होने वाला था जिसमें सम्मिलित होने के लिए भगवान विष्णु भी अपने लोक से चल दिए। उन्हें देवी मीनाक्षी के भाई की भूमिका निभानी थी।किन्तु, मार्ग में आशंकित इन्द्र देव ने विघ्न उपस्थित कर दिया और भगवान विष्णु यथासमय वहाँ पहुंच न सके। अंततः स्थानीय देवता (तिरुपरंकुन्द्रम से) ने विवाह में मुख्याधिपति की भूमिका निभाई और कार्यक्रम सम्पन्न हो गया। इससे सम्बन्धित वार्षिक उत्सव भी यहाँ मनाया जाता है।

मंदिर मुख्यतया भगवान शिव और देवी मीनाक्षी को समर्पित है किन्तु इसके विशाल अन्तर्गृह में अनेक देवी देवताओं की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर के केन्द्र में मीनाक्षी की मूर्ति है और उससे थोड़ी ही दूर भगवान गणेश जी की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है जिसे एक ही पत्थर को काट कर बनाया गया है।आखिर गणेशजी विघ्नहत्र्ता ही नहीं देवी पार्वती के पुत्र भी तो हैं जिन्हें यहां मुकुरनी विनायकर के नाम से पूजा जाता है।

गणेश जी के दर्शन के लिए हम गए तो वहां पर दो पंक्तियां थीं। मुझे लगा कि उनमें से एक पंक्ति पुरुषों के लिए थी और दूसरी महिलाओं के लिए। वस्तुतः एक पंक्ति में महिलाएँ अधिक थीं और पुरुष एकाध ही। चूँकि दक्षिण भारत में अभी भी तुलनात्मक रूप से नियम – कानून का पालन अधिक होता है , यह सोचकर मैं अलग लाइन में लग गया और पत्नी अलग लाइन में।हालाँकि मेरे मित्र सपत्नीक एक ही (महिलाओं वाली) लाइन में लगे । लाइन लंबी थी, आगे जाकर कुछ इस प्रकार अलग हुई कि दर्शनापरान्त हम लोगों को दो अलग- अलग और विपरीत दिशा में जाना ही पड़ा। ऐसा नहीं था कि हम दर्शन करके एक दरवाजे से बाहर निकल जाएं! मंदिर की विशालता इतनी कि कुछ कहा नहीं जा सकता। वापस भी लौटने की स्थिति नहीं थी। मंदिर में ही तैनात एक पुलिस अधिकारी से मैंने बहस की तो (ईश्वर की कृपा से उसे अंगरेजी आती थी) उसने मार्ग निर्देशन किया । वहां से मैं बाहर तो निकल गया किन्तु फिर उस विशालता में खो गया। गनीमत यह हुई कि हमारे मोबाइल जमा नहीं कराए गए थे। संपर्क हो गया और किसी प्रकार एक प्रमुख स्थल के सहारे करीब दस मिनट बाद हम मिल गए। यह भी खूब रही और हम बहुत देर तक इस गुमशुदगी के चटखारे लेते रहे।

मंदिर का वास्तु एवं विशालतासौन्दर्य ही नहीं, गणितीय आंकड़ों की दृष्टि से भी मीनाक्षी मंदिर विशाल है। मंदिर कुल 45 एकड़ क्षेत्र में फैला है और निर्मित क्षेत्रफल का आयाम 254 मी। लंबाई और 237 मी. चैड़ाई में है। मंदिर में 12 उच्च शिखर हैं और सर्वोच्च शिखर जो दक्षिण की ओर स्थित है, की उँचाई 170 फीट है। मंदिर के अन्दर अइयरम मंडपम नामक एक विशाल मंडप (Hall) है जिसे सामान्यतः सहस्र खंभा (Thousand Pillar Hall )के नाम से जाना जाता है। वास्तविकता यह है कि इस हॉल में कुल 985 खंभे है।इस हॉल का निर्माण 1569 ई0 में अरियनाथ मुदलियर ने कराया था ।इसकी विशालता देखते ही बनती है। कई बार ऐसा लगता है कि धर्म एवं संस्कृति को लेकर कुछ लोग कितना सोचते रहे होंगे और कितना कुछ करते भी रहे होंगे, अन्यथा आज इतनी विशाल संरचना, इतना विशाल सृजन नहीं होता। यह क्रम संभवतः युगों से चला आ रहा है और चलता ही रहेगा । आज की सृजनशीलता भी कहीं से रुकी हुई प्रतीत नहीं होती, हालांकि विध्वंसक शक्तियां मार्ग में कम बाधाएं नहीं डाल रही हैं। आतंक का साया हर जगह मंडरा रहा हैफिर भी सर्जक लगे हुए हैं संस्कृति एवं सभ्यता की वृद्धि करने में । दिल्ली के नवनिर्मित अक्षरधाम जैसे भव्य मंदिर ऐसी ही जिजीविषा के प्रतीक हैं। यहाँ मैं किसी साम्यवाद या आर्थिक विषमता ओर मुड़ने के मूड में नहीं हूँ , बस जो सुन्दर लगा , उसका वर्णन भर करना चाहता हूँ।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस मंडप में खम्भे ही खम्भे दृष्टिगोचर होते हैं। सभी खंभे पत्थरों को काट कर बनाए गए हैं और इनपर उत्कृष्ट नक्काशी की गई है जो मंडप की सुन्दरता में चार चाँद लगाती है।मुख्य हॉल से लगभग हर गोपुरम की ओर रास्ता जाता है। मंदिर के विशाल गलियारे में असंख्य दूकानें भी हैं जिनपर हस्तकला से लेकर अन्य सजावटी सामानों की बिक्री होती रहती है।

मंदिर का वर्तमान स्वरूप1623से 1659 के बीच आया। तमिल साहित्य के अनुसार मंदिर का अस्तित्व गत सहस्राब्दि में होना चाहिए किन्तु इसका कोई बड़ा प्रमाण नहीं मिलता। शैव दर्शन के अनुसार मंदिर सातवीं शताब्दी में अवश्य था जिसे कट्टरपंथी मुस्लिम आक्रान्ता मलिक कफूर ने सन्1310में पूर्णतः ध्वंश कर दिया ।

मंदिर के प्रांगण में एक अत्यन्त सुन्दर तालाब है जिसे स्वर्णकमल पुष्कर के नाम से जाता है। वैसे इसका वास्तविक नाम पोर्थमराईकुलम है। भक्तगण दर्शनोपरान्त प्रायः यहाँ बैठकर आत्मिक शांति का आनन्द लेते हुए हैं। मंदिर में कैमरा ले जाने पर रोक नहीं है अतः अधिकांश लोग फोटो खींचते हुए भी देखे जा सकते हैं। यद्यपि फोटोग्राफी के लिए शुल्क 25 रु निर्धारित है किन्तु इस नियम का परिपालन शायद ही होता हो। कम से कम मैंने तो ऐसा नहीं देखा। हाँ, एक बार एक कर्मचारी ने हमें जरूर मना किया था ।

तालाब के पास घंटों बैठे रहने के बाद एक गरिमामय अनुभूति के साथ बाहर निकलने का मन बनाया ।ऐसा जरूर लग रहा था कि यह दर्शन और यह यात्रा जीवन की एक उपलब्धि है। दुख इस बात का हो रहा था कि हमारे पास इतना समय नहीं था कि मदुराई में एक दो दिन और रुकें और इस दिव्य और भव्य मंदिर के सौन्दर्य का और अवलोकर एवं विश्लेषण करें । अगले दिन हमें कोडाइकैनाल जाना था । बस आज की ही रात शेष थी यहाँ रुकने एवं समझने के लिए।निकलते वक्त भी मैं बार -बार पीछे मुड़कर उस महत्ता को देख लेता और महसूस कर लेता था । मदुराई शायद ही यादों से बाहर निकले!

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पोंगापंथ अपटु कन्याकुमारी -5

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 14, 2010

( मेरी यात्रा मदुराई तक पहंची थी, उसका वर्णन मैंने किया था। उसके बाद वास्तविक यात्रा तो नहीं रुकी किन्तु उसका वर्णन रुक गया।इस बीच में कुछ तो इधर – उधर आना जाना रहा और कुछ कम्प्यूटर महोदय का साथ न देना। पहले विण्डोज उड़ीं और फिर लम्बे समय तक इण्टरनेट नहीं चला! अब लगता है कि सब कुछ ठीक है और मैं फिर यात्रा पर निकल चुका हूँ , इस बार आपके साथ और यात्रा पूरी करने का पूरा इरादा है।)

मदुराई पहुंचे तो दोपहर के करीब बारह बज रहे थे। लगभग तीन सौ किमी की दूरी तय करने में करीब साढ़े सात घंटे लग गए जबकि ट्रेन एक्सप्रेस थी, खैर मुझे भारतीय रेल का चरित्र ठीक से मालूम है इसलिए हैरानी की कोई बात नहीं लगी। वहां पहुचे तो हम सभी थके थे , रात के जागरण का असर साफ दिख रहा था। अब हमारी प्राथमिकता थी कि कोई होटल लें और कुछ देर विश्राम करें । बाहर ऑटो वालों से बात हुई। मित्र ने कहा कि पहले चल के होटल देख आएं और फिर परिवार को ले जाएं। रात की घटना से सीख लेकर मैं उबर चुका था और अब गलती दुहराने की मूर्खता नहीं कर सकता था। अतः इस प्रस्ताव को मैंने सिरे से नकार दिया।ऑटो वाले से बात की और मीनाक्षी मंदिर के पास ही जाकर एक होटल में ठहर गए। नहा-धोकर ताजा होने के बाद ही हमारा अगला कार्यक्रम हो सकता था।मदुराई के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था और आज यह सोचकर मैं बहुत खुश था कि भारत के एक अत्यन्त प्राचीन नगर पहुँच पाने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका था । थोड़ी देर के आराम के बाद हम मीनाक्षी मंदिर के दर्शन के लिए चल दिए।

मदुराई भारतवर्ष के प्राचीनतम नगरों में एक है। दक्षिण भारत का यह सबसे पुराना नगर है और विशेष बात तो यह है कि अभी भी इसकी प्राचीनता बरकरार है। वैगाई नदी के किनारे बसे इस नगर की ऐतिहासिकता और सौन्दर्य अक्षुण्ण और अनुपम है। इस नगर की संस्कृति और सभ्यता सदियों पुरानी है । प्राचीन विश्व के अतिविकसित यूनान और रोम से इसके व्यापारिक संबंध थे, मेगास्थनीज भी तीसरी सदी (ई0पू0) में मदुराई की यात्रा पर आया था।मदुराई संगम काल के समय से एक स्थापित नगर है , पहले पांड्य वंश की राजधानी रहा और चोल शासकों ने दसवीं सदी में इस पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था।मदुराई मूलतः मीनाक्षी मंदिर के कारण टेम्पल टाउन के नाम से जाना जाता है। यह शहर मंदिर के चारो ओर बसा हुआ है।मंदिर के चारो ओर आयताकार रूप में सड़के बनी हुई हैं। इन गलियों के नाम तमिल महीनों के नाम पर रखे गए हैं।मीनाक्षी मंदिरजहाँ हम रुके थे , उस होटल से मीनाक्षी मंदिर पैदल पाँच मिनट का रास्ता था। हमें यह पता चला कि मंदिर सायं पांच बजे दर्शनार्थ खुलता है। अस्तु हम यथासमय मंदिर के लिए निकल पड़े।मंदिर का गोपुरम मदुराई के किसी भी कोने से दिख जाए, इतना विशाल है। इस पर दृष्टि पड़ते ही मन मुग्ध हो गया । मंदिर में चारों दिशाओं से प्रवेश के लिए चार गोपुरम (प्रवेश द्वार) है। हम पूर्वी गोपुरम से प्रवेश कर रहे थे और यह गोपुरम सबसे शानदार है। मंदिर में प्रवेश से पूर्व सामान्य सुरक्षा जांच होती है किन्तु कोई खास प्रतिबंध मुझे नहीं दिखा। हमें मोबाइल फोन अंदर ले जाने से भी नहीं रोका गया। मंदिर की विशालता में एक बार अलग हो जाने पर यही मोबाइल काम आया।

मंदिर में एक सामान्य सी लाइन दिख रही थी, कुछ खास समझ में न आने कारण हम आगे बढ़ गए, इस विचार से कि अन्दर जाकर व्यवस्था के अनुरूप हम भी दर्शनार्थ पंक्तिबद्ध हों। कुछ अपने स्तर पर करें , इससे पूर्व ही कोई मंदिर कर्मचारी ( जो हमारे रंगरूप और शारीरिक भाषा से समझ गया था कि हम उत्तर भारतीय हैं ) भागा हुआ आया और निर्देश दिया कि अगर हमें दर्शन करना है तो निकट ही बने बूथ से प्रति व्यक्ति पंद्रह रुपये की दर से टिकट लेना होगा। जहां हम खड़े थे , वहां से प्रवेश के लिए कोई मार्ग नहीं था। लाइन हमारे सामने थी, पर उसकी उत्पत्ति कहाँ से थी इसका हमें पता नहीं चल पा रहा था। भाषा की समस्या तो थी ही, तथाकथित गाइड न तो ठीक से हिन्दी बोल पा रहा था और न ढंग की अंगरेजी ! अंततः हमने टिकट ले ही लिया। अब हमें एक बैरीकेड खोलकर एक अन्य लाइन का सीधा रास्ता दे दिया गया। दर असल यह विशेष लाइन थी जो या तो पेड थी या फिर वीआइपी॰। अब तो हम क्षण भर के अंदर मीनाक्षी देवी की प्रतिमा के सामने थे।

सामान्यतः कोई भी पंद्रह रुपये की व्यवस्था पर प्रायः खुश होता। दर्शन कितनी जल्दी मिल गए! पर मेरी भी कुछ मानसिक समस्याएं हैं। पता नहीं आज तक ईश्वर के दरबार में यह वीआइपीपना मुझे रास नहीं आया। मैं सोचता ही रह गया कि इस तरह की विशेष सुविधा का लाभ हम कितनी जगहों पर लेते रहेंगे ? पैसे के बल पर और पैसे के लोभ में इस तरह का व्यापार हम कहाँ- कहाँ करते रहेंगे ? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जहां हम आस्था , विश्वास और श्रद्धा का भाव लेकर जाएं , वहाँ तो कम से कम अपने को एक सामान्य मनुष्य मान लें ! क्या ऐसी व्यवस्थाएं नितान्त जरूरी हैं ?क्या मंदिर प्रबन्धन एक समानता का नियम नहीं बना सकता ? क्या आर्थिक एवं सामाजिक महत्त्व का बिगुल हम यहाँ भी बजाते रहेंगे ? दर्शनोपरान्त मुझे मालूम हुआ था कि मेरे सामने जो लाइन थी वह सामान्य अर्थात निश्शुल्क लाइन थी और वह पीछे से आ रही थी। बस, जरा देर लगती है, और मैं विशेष लाइन में लगने के अपराधबोध से जल्दी मुक्त नहीं हो पाया!

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