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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

जनतवा का जिउ सांसत में है!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 16, 2011

अ से अन्ना हज़ारे क से काला धन ग से गंगा

द से दिग्गी राजा

न से निगमानंद

ब से बयानबाजी

भ से भ्रष्टाचार र से रामदेव

भौत रट लिए यार ये सब. इन सबके बीच में

ख से खाना भ से भूख म से महंगाई ब से बढ़ते ब्याज दर

ई सब भी होते हैं. कौनो नामे नईं ले रहा है इनका……………. बताओ न, का किया जाए???????????????????????????????????????????????????????????????????????
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चतुष्पदी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 5, 2011

हो गए बस में अगर एक पागल चाह के
फूल बन जाएंगे खुद सारे कांटे राह के
इक ज़रा सी जिंदगी की फिक्र इतनी किसलिए
चल रहा ब्रह्माण्ड जब बिन किसी परवाह के

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मेरी पहली सरस्वती वंदना …..

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 7, 2011


मेरी पहली सरस्वती वंदना
———————
वर दे, वीणावादिनि वर दे।
प्रिय घोटालेबाजी नव, झूठ फरेब मंत्र हर मन में भर दे।

काट अंध सच के बंधन स्तर
बहा धन के नित नव निर्झर
ईमानदारी हर बस घोटाले भर
घोटाले ही घोटाले कर दे।
चहुँदिश होंवें कलमाडी सर,
कंठ कंठ हों घोटाले स्वर
राजा हों या प्रजा जी हों
सबको घोटालेबाज कर दे।

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आओ बदलें शहरों की आत्मा…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 6, 2011

गांवों का शहरीकरण हुआ इसमें बुराई भी क्या है..सुख-सुविधा संपन्न हों हमारे गाँव अच्छा ही तो है, लेकिन क्यूँ न हम गाँव वाले जो गाँवबदर हो शहर आ बसे,कुछ ऐसा करें कि शहरों की काया तो शहरी ही हो पर आत्मा का जरुर ग्रामीनिकरण हो जाये….सुख-सुविधा तो शहर की हों पर अपनापन,संबंधों की मिठास, छोटे-बड़े का सम्मान, रिश्तों की गरिमा, खानपान,मस्ती,आबोहवा और अनेकता में एकता से जीने का अहसास गाँव का हो..आप क्या कहते हैं.. ..?

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matri smriti

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 5, 2011

                                                             मातृ स्मृति
और अब पहली पुण्यतिथि भी आ गई…..। जैसे विश्वास  करना मुश्किल  हो। पूरे वर्श में शायद  कोई ही दिन रहा हो जब उनकी याद दस्तक देकर, कुरेद कर और निर्बल महसूस कराकर न गई हो। सच तो यह है कि मैं उनकी यादों से भागना भी नहीं चाहता। मुझे भी एक सुकून सा मिलता है यादों में डूबकर। कभी- कभी तो लगता है कि उन यादों के अलावा कोई अन्य शरण  स्थल ही नहीं है। जैसे दर्द ही अब दवा हो। मैं नहीं जानता कि उम्र के पाँचवें दशक  में भी माँ के बिना अनाथ की स्थिति में आ जाना, बेहद अकेला महसूस करना मुझे अच्छा क्यों लगता है ?

जैसे – जैसे फरवरी माह की ४/५   की वह रात नजदीक आती जा रही है, माँ का देहत्याग और तीव्रता से याद आने लगा है। सब कुछ किसी फिल्म की रील की तरह आँखों के सामने घूमता जा रहा है। मुझे यह भी नहीं लगता कि यह कोई सांसारिक मोहपाश  है क्योंकि इस पूरे वर्ष  में मैंने यह महसूस किया कि माँ का अस्तित्व और सम्बन्ध सांसारिकता से ऊपर है। मैं तो इस सम्बन्ध को आध्यात्मिक मानने लगा हूँ। ना जाने वह कौन सा बन्धन है जो बरबस अपनी ओर खींच लेता है।

माँ हृदय रोग से पीड़ित थीं। दूसरा दौरा दिसम्बर 2009 में पड़ा  था। प्रबल आघात था। वे गाँव में थीं। इलाज बड़े कुशल  डॉक्टर के यहां चल रहा था। डॉक्टर ने दिलासा दिया कि बिलकुल ठीक हो जाएंगी, और ठीक भी होने लगीं। मैंने गाँव जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया, सोचा आराम से छुट्टियों में जाऊँगा । अब तो ठीक हो ही रही हैं। उनके पास जाकर लम्बे समय तक रहूँ तो अच्छा होगा क्योंकि वे खुद यही चाहती हैं। फोन पर लम्बी-लम्बी बातें हो ही जाती थीं। हाँ, मैंने पत्नी और बेटे को दस-बारह दिन के लिए उनके पास भेज दिया था। यह सोचकर कि उनकी  अतिरिक्त सेवा भी इस समय हो जाएगी  और वे अपने पोते को देखकर खुश  भी जाएंगी।

जनवरी में वे स्वस्थ हो गई थीं। प्रसन्न रहना उनका स्वभाव था। खतरा पूरी तरह टल गया था। डॉक्टर ने दवाइयाँ भी कम कर दी थीं। पहली फरवरी की सुबह अचानक कुछ तकलीफ हुई। बडे़ भाई साहब ने डॉक्टर को दिखाया तो सबसे बड़ी निराशा  हाथ लगी । उनके हृदय के एक धमनी अवरुद्ध हो चुकी थी और आगे (यदि शरीर  साथ दे, उम्र शेष  हो तो) एंजोग्राफी का सहारा था। मुझे रात में फोन मिला। अगले दिन कुछ आवश्यक  व्यवस्था किया, आरक्षण लिया और तीन को ट्रेन पकड़ ली। यहां पत्नी को ताकीद कर गया कि मुझे समय ज्यादा लग सकता है। मुझे अघटित का आभास हो गया था, पर मैं ऊपर से मजबूत दिखने की कोशिश  कर रहा था।

लेट-लतीफ घर पहुँचा तो देखा कि वे उसी खाट पर पड़ी हुई थीं; मुझे देखकर चेहरे पर प्रसन्नता आई किन्तु आज वह ओज और तेज चेहरे पर नहीं था जो प्रायः हुआ करता था। उन्हें यह बताया नहीं गया था कि उनकी बीमारी अब खतरनाक हो चुकी है, हालाँकि उन्हें अपनी स्थिति का आभास हो गया था और कुछ शंका  भी होने लगी थी कुछ छिपाया जा रहा है। संभवतः अपनी दुर्बलता से ज्यादा वे इस बात से भी परेशां  थीं कि अब हम लोग उनके लिए परेशान  हो रहे थे। डॉक्टर ने ज्यादा बोलने से मना किया था अतः मैं चाहकर भी ज्यादा बात नहीं कर पा रहा था। बहुत कुछ कहने को शेष  था और बहुत कुछ सुनने को, पर कहूँ कैसे ? ऐसा लगता था कि जो भी समय बचा था उसे मैं जी भरकर महसूस कर लेना चाहता था। इस भावना को मन में बार-बार भर रहा था कि माँ अभी जिन्दा हैं और मैं भी अभी माँ वाला हूँ। न जाने यह साथ कब तक पा सकूँगा !
पर ये साथ ज्यादा देर शायद  मिलना ही नहीं था। कुछ ही देर बाद बेचैनी बढ़ी तो पड़ोस के डॉक्टर को बुलाकर इमरजेंसी का इंजेकशन लगवाया गया, परन्तु कोई फायदा नहीं। उन्होंने कहा कि अब मुझे ले चलो कहीं। गाड़ी बुलाई गई और घंटे भर में पुनः उसी डॉक्टर के पास। मामला गंभीर हो चुका था। ऑक्सीजन लगा दिया गयी  । ब्लडप्रेशर  कम होने लगा। डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिए -आपका भाग्य जाने, कहीं और ले जा सकते हैं। हमें मालूम था कि रात हो गई है और यहां इससे अच्छा डॉक्टर तो है नहीं। बीएचयू या पीजीआई ले जाने के लिए भी समय षायद ही रहा हो। पौने बारह बजे उनकी आँखें खुली थीं । अपना परिवार छोड़ने का गहरा मलाल आँखों से बाहर आ रहा था। 
और वे छोड़ गईं। ऐसा ही प्रायः होता है- सबके साथ होता है। माँ को लोग बाद में समझ पाते हैं। पूरी तरह तो नहीं, पर मैंने समझा था। लगभग बीस वर्ष  की उम्र के बाद मैं अक्सर बाहर ही रहा। कभी पढ़ाई के लिए तो कभी नौकरी के लिए। जब भी घर से जाता, उनका अस्तित्व सामने होता। आँसू, आशीर्वाद , सीख, चिन्ता, वात्सल्य, हिम्मत और न जाने क्या-क्या लिए ! उस वियोग ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया था। जब भी समय का तमाचा मुँह पर पड़ता, उनके हाथ सहलाने के लिए आगे आ जाते। जब भी किसी छोटे बच्चे को माँ की गोद में छिपते देखता तो  मन ललचा जाता। जाते – जाते भी, अस्सी पार की उमर में भी वे एक मजबूत सहारा थीं -बिलकुल एक अडिग चट्टान की तरह।
सन तीस के आसपास का जन्म था उनका। जब पुरुषों  में साक्षरता का ग्राफ कहीं दिखता नहीं था, उस जमाने में वे स्कूल जाती थीं और हिन्दी गणित का अच्छा ज्ञान रखती थीं। अपने संघर्षमय  जीवन को उन्होंने क्या- क्या दिशा  दी, कम से कम गाँव और आस पास तो एक मिसाल ही दी जाती है। साहस , सोच और सत्य का अद्भुत समन्वय था उनमें।
मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि उनका अभाव इतना खलेगा। असलियत तो यह थी कि बीस वर्षों  से अलग रहकर मुझे यह लगने लगा था कि उनका गोलोगवासी होना मुझे ज्यादा नहीं खलेगा ! मैं साथ रहता ही कहाँ हूँ ? गर्मियों में एक डेढ़ माह जाकर रह आता था। जब अकेला रहता था और भी कई चक्कर लग जाया करते थे। इधर वे कई साल से सर्दियों में दिल्ली आ जाया करती थीं – बस एक दो माह के लिए क्योंकि गाँव में रहना उनके लिए आवश्यक  सा हो गया था। फोन पर लम्बी बातें हो जाया करती थीं। नब्बे के दशक  के अन्त तक उनके भरे पूरे पत्र बिना अन्तराल के आया करते थे और मैं खूब पढ़ा करता था। हर विषय  की विस्तृत जानकारी हुआ करती थी। भौतिक दूरी फिर भी बनी ही रहती थी। अतः यह सोचकर शायद  एक संतोष  सा होता था कि उनके स्थायी विछोह का दर्द मुझे नहीं उठाना पड़ेगा क्योंकि मुझे आदत पड़ गई है। पर, यह एक कोरा भ्रम निकला। उनके होने का एहसास ही बहुत था और शायद  कोई काल्पनिक दुख भी उनके रहते नहीं फटक सकता था। यही कारण रहा होगा कि मुझे लगा कि यह सम्बन्ध ज्ञानक्षेत्र से बाहर का होता है। 
माँ किसी एक की नहीं होती। वह तो सार्वभौमिक और सार्वदेशिक  होती है। सार्वकालिक तो होती ही है। जब जाती है तो एक बड़ा शून्य  छोड़कर जाती है। ऐसा नहीं कि मैंने गीता नहीं पढ़ा  है और आत्मा की अजरता – अमरता का उपदेश  नहीं सुना है। पर मां इन सबसे ऊपर होती है। उसके सामने गीता का ज्ञान कहीं नहीं ठहरता। आत्मा की अमरता का ज्ञान तो शरीरी  सम्बन्धों के लिए होता है – आत्मा के सम्बन्धों के लिए नहीं। कर्तव्य तो चलते रहते हैं, चलते रहेंगे पर उनमें रस की अनुभूति आत्मीयता से ही होती है। भोजन और पथ्य में अन्तर होता है और भोजन में प्यार के स्वाद की बात मां के बिना कहाँ ? कभी एक गजल लिखी थी जो अधूरी ही रह गई, उसका एक शे’र था –
माँ ने कुछ प्यार से बनाया है
बुलाने देखो हिचकियाँ  आईं।
उस आत्मा को देहतत्व छोड़े पूरे एक साल कुछ ही मिनटों में होने वाले हैं। मैं चाहता हूँ कि समय का चक्र एक बार उलटा घूम जाए। एक साल के लिए ही। पर मेरे चाहने से क्या होता है ? मेरी पूँजी तो स्मृतियाँ ही हैं। हाँ, मेरी वय के जिन मित्रों के भाग्य में अभी मातृसुख है, उन्हें मेरी शुभ कामनाएं। एक सीख भरी चाह भी कि वे ऐसे क्षणों को ठीक से जी लें, फिर ऐसी माँ कहाँ मिलेगी………. 

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चन्दन चन्दन रूप तुम्हारा केसर केसर सांसे…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 3, 2011


चन्दन चन्दन रूप तुम्हारा केसर केसर सांसे,
इन आँखों में बसी हुई हैं कुछ सपनीली आशें…
मुझमें तुम हो तुम में मैं हूँ तन मन रमे हुए हैं,
प्रेम सुधा बरसाती रहती अपनी दिन और रातें…
जब से दूर गई हो प्रिय सुध बुध बिसर गई,
याद तुम्हारी साँझ सवेरे आँखों में बरसातें…
दर्पण मेरा रूप तुम्हारा यह कैसा जादू है,
जब भी सोचूँ तुमको सोचूँ हर पल तेरी यादें…

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हमाम में सब नंगे- दोषी कौन ?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 1, 2011


कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया यानि कि लोकतंत्र के चार खम्बे… और आज ये चारों खम्बे धराशायी होने को हैं…संसद हो या विधानसभा या फिर नगर-ग्राम की चुनी हुई प्रतिनिधि सभाएं…आलम हर ओर एक जैसा ही है…भ्रष्टाचार आम है…सरकारें नकारा और निकम्मी सी हो गई हैं…नेताओं की दशा और दिशा देख सर धुनने का मन करता है…देर से मिलने वाला न्याय भी कई बार भ्रष्टाचार के दरवाजे से ही होकर गुजरता है…इन सब पर लगाम रखने और लोकतंत्र की चौकीदारी की जिम्मेदारी मीडिया की मानी जाती रही है, पर आज वहां भी आलम वही है…सब एक दूसरे के गलबहियां हो रहे हैं यानि कि हमाम में सब नंगे हैं…आखिर इस सबका दोषी कौन….?

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मत समझो आजादी गांधी ही लाया था….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 30, 2011


मत समझो आजादी गांधी ही लाया था….

बिस्मिल ने भी इसकी खातिर रक्त दिया था…
बंगाली बाबू का भी बलिदान ना कम है…
कितने अश्फाकों ने इसमें वक़्त दिया था…
कली- कली निर्दय माली पर गुस्साई थी,
सच कहता हूँ तब ही आजादी आई थी…
लाखों दीवानों ने गर्दन कटवाई थी
सच कहता हूँ तब ही आजादी आई थी..
(डॉ सारस्वत मोहन मनीषी की कविता का एक अंश )

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इस अर्पण में कुछ और नहीं केवल उत्सर्ग छलकता है….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 27, 2011

ठण्ड गुजरने को है पर इस साल अभी तक बाजरे की रोटी नहीं खाई.गाँव में थे तो सर्दी शुरू होते ही रोजाना बाजरे की रोटी खाने को मिलती थी, गरमागरम. संग में कभी सरसों का साग, कभी चने का साग तो कभी उड़द की दाल.रोटी के ऊपर देशी घी की मोटी सी डली और गुड.बाजरे की खिचडी और बाजरे की रोटी का गुड मिला चूरमा भी कितना लजीज होता था…!!! गाँवबदर हो शहर आए तो मक्के की रोटी भी खाने को मिली, पर वो मजा कभी नहीं आया जो गाँव में आता था…जब तक घर में गैस का चूल्हा नहीं आया था तो मिट्टी के चूल्हे पर सिकी करारी रोटी मिलती थी.चौके में चूल्हे के सामने जमीन पर बैठकर तवे से उतरती गरमागरम रोटी खाने का मजा ही अलग था. माँ बनाती जाती और हम दोनों भाई खाते जाते, कभी छोटी बहन के साथ तो कभी पिताजी के साथ. कलई से चमके हुए पीतल के थाल में, जो हमारे होश सँभालते सँभालते स्टील की थाली बन गया और जब गैस का चूल्हा आ गया तो बाकी सब तो वही रहा पर रोटी की मिठास बदल गई. जो मीठापन लकड़ी की आग में चूल्हे पर सिकी रोटी में था वो गैस में कहाँ… मुझे याद नहीं कि माँ ने भी कभी अपने चौके में तवे से उतरती गरमागरम करारी बाजरे की रोटी खाई हो…! बाजरे की क्या गेहूं की रोटी भी नहीं खाई होगी…! उन्हें अपनी सुध कहाँ… घर की साज सँभाल और पिताजी व हम भाई बहनों को तवे से उतरती रोटी खिलाने में ही शायद उनका मन तृप्त हो जाता होगा…! और अब पत्नी भी तो कमोबेश उसी रूप में है…सबको गरम रोटी खिलाने के उल्लास में खुद कहाँ गरम खा पाती है…!!! और शायद इसीलिए जयशंकर प्रसाद जी ने कामायनी में लिखा है….
“इस अर्पण में कुछ और नहीं केवल उत्सर्ग छलकता है,
मैं दे दूँ और न फिर कुछ लूँ, इतना ही सरल झलकता है।
“क्या कहती हो ठहरो नारी! संकल्प-अश्रु जल से अपने –
तुम दान कर चुकी पहले ही जीवन के सोने-से सपने।
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में,
पीयूष-स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।”

अनिल आर्य

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आजादी को भीख ना समझो कीमत दी है..

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 25, 2011

आजादी को भीख ना समझो कीमत दी है..
देकर अपना लाल लहू यह रंगत दी है..
आज तिरंगा गीले नयन निहार रहा है..
देशभक्त वीरों को पुनः पुकार रहा है…
(डाक्टर सारस्वत मोहन मनीषी की कविता से)
अनिल आर्य

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