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युधिष्ठिर का कुत्ता

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 24, 2010

(यह व्यंग्य ‘समकालीन अभिव्यक्ति’ के ‘वक्रोक्ति’ स्तम्भ में प्रकाशित हुआ था। यहां इसे दो किश्तों में दिया जा रहा है।)
मैं धर्मराज युधिष्ठिर का कुत्ता बोल रहा हूँ। पूरी सृष्टि और पूरे इतिहास का वही एक्सक्ल्यूसिव कुत्ता जो उनके साथ स्वर्ग गया था। अब मैं स्वर्ग में नहीं हूँ। किसी धरती जैसे ग्रह पर मैं वापस आ गया हूँ और समझने का प्रयास कर रहा हूँ कि कहीं उसी भारतवर्ष में तो नहीं हूँ जहां से युगों पहले स्वर्ग गया था। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि यहाँ के बारे मे यह प्रचार है कि धरती का स्वर्ग भारतवर्ष ही है, देवभूमि है।जब बिना सत्कर्म के ही मैं धरती से स्वर्ग ले जाया जा सकता हूँ तो वहां से अकारण तो मैं नर्क में फेंका नहीं जा सकता । जो भी हो ,जब मैं अपने महाभारत काल की पारिवारिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों का मिलान यहां की आज की परिस्थितियों से करता हूँ तो लगता है कि मैं उस देश ही नहीं अपितु उसी काल में वापस लौट आया हूँ। कभी – कभी तो भ्रम होने लगता है कि मैं धर्मराज के साथ स्वर्ग गया भी था या नहीं! कहीं गहरी नींद में सो तो नहीं रहा था ?
मैं धरती का सबसे सफल कुत्ता हूँ । ऐसा कुत्ता जिसके भाग्य से बडे- बड़े लोग ईर्ष्या रखते हैं। वैसे भी ईर्ष्या रखना बड़े लोगों का प्रमुख कार्य है। यहां तक कि धर्मराज के भाई भी मुझसे जलते हैं क्योंकि वे भी वह पद न पा सके जो मुझे मिला है। अब यह बात अलग है कि यहाँ तक पहुँचने में मुझे कितना कुत्तापना करना पड़ा , यह मैं ही जानता हूँ। इतने युगों बाद मैं जाकर समझ पाया हूँ कि स्वर्ग का सुख पाने के लिए कितना झुकना पड ता है और आत्मा को कितना मारना पडता है। मुझसे तो अच्छे वे हैं जो सशरीर आने के विषय में नहीं सोचते । दरअसल बात यह है कि स्वर्ग में आने के लिए जीव को या तो अपना शारीर त्यागना पड ता है या फिर आत्मा । मेरे बारे में आपको जानकारी है ही कि मैं कैसे आया , इसलिए आप मेरे त्याग का अंदाजा लगा सकते हैं ।
मेरे प्रसंग से आप इतना तो अवश्य जान गए होंगे कि बड़े आदमी का कुत्ता होना एक आम आदमी होने से बेहतर है । पूर्व जन्म के पुण्य और बड़े सौभाग्य से कोई आत्मा किसी रईस के कुत्ते के रूप में अवतरित होती है। जिस वैभव और सुविधा में बड़े -बड़े ज्ञानी, विद्वान और महात्मा नहीं पहुँच पाते , वहां रईस का कुत्ता पहुँच जाता है। उसे अधिकार मिल जाता है कि वह किसी पर भौंक सके किसी को भी देखकर गुर्रा सके और किसी को भी काट सके। वह ऐसा कुछ भी कर सकता है जिससे कि उसका स्वामी खुश हो जाए और स्वामी का खुश होना अपने आप में एक उपलब्धि है। व्यवस्था चाहे राजतंत्र की हो या लोकतंत्र की, सुखी वही होता है जो स्वामी को खुश कर ले।
हो सकता है कि मेरे स्वर्ग जाने की उपलब्धि से मेरी जाति वाले गौरवान्वित हों। ऐसा आजकल हो रहा है। आप कितने भी पतित और शोषित समाज से हों , आपकी पूरी बिरादरी दाने -दाने को तरस रही हो, किन्तु अपनी बिरादरी का कोई इकलौता प्राणी भी सिंहासनारूढ हो जाए तो आप स्वयं को सिंहासनारूढ समझने लग जाते हैं। आपको अपनी भुखमरी भूल जाती है। किन्तु मेरी बिरादरी में भी ऐसा ही हो, जरूरी नहीं। हम लोग तो अपना सारा जीवन अपनी बिरादरी पर भौंक कर ही निकाल देते हैं।मैं अभी भी गलियों में निकलूँ तो मेरे भाई मुझपर तुरन्त ही झपट्‌टा मारेंगे।उन्हें सामाजिक चेतना से कुछ भी लेना – देना नहीं है।
हाँ, हमारे और आदमियों के बीच एक समानता जरूर है। हम दोनों ही अपने अधिकार क्षेत्र में किसी की दखलन्दाजी पसन्द नहीं करते । यदि हम एक बार किसी उच्च पद पर पहुँच जाएं तो वहाँ किसी और को पहुँचने नहीं देना चाहते । मैं स्वयं किसी कुत्ते को स्वर्ग आते देखना पसन्द नहीं करूँगा । उच्च पद की तो बात छोड़िए, हमें यह भी नहीं पसन्द कि कोई हमारी गली में आए , भले ही उसकी नीयत हमारा नुकसान करने की न हो। हम यह भी नहीं पसन्द करते कि कोई हमारे शहर में आए । हमें डर है वह हमारी राजनीति और वोट बैंक पर असर डालेगा। वैसे हम प्रचारित यही करते हैं कि वह हमारी रोटी खा जाएगा। इससे हमें पूरे शहर के कुत्तों का समर्थन मिलता है और मरियल से मरियल कुत्ता भी भौंकने के लिए आगे आ जाता है। हमारे दक्षिण के कुछ भाइयों ने ऐसा काम अभी बड़े पैमाने पर किया है जब उन्होंने उत्तर के कुत्तों को भौंक – भौंककर अपने शहर से भगा दिया । ऐसा काम आदमी भी करते हैं।
अपनी जाति पर भौंकने में हमें बड़ा मजा आता है। कोई भी अपरिचित मिल जाए, हम अपने मुँह का निवाला छोड कर उस पर भौंकने निकल पडते हैं ।मुझे लगता है कि अपनी बिरादरी पर भौंकने से हमारी अच्छी छवि बनती है। हम लोग जातिवादियों की श्रेणी में नहीं आते और धर्मनिरपेक्ष होने का लाभ सहज ही प्राप्त कर लेते हैं।लडते दूसरी बिरादरी के लोग भी हैं परन्तु अकारण ही नहीं। कोई ना कोई स्वार्थ होने पर ही सींग भिड़ाते हैं। निःस्वार्थ लड़ाई तो केवल हम लोग यानी कुत्ते ही लडते हैं। यह बात अलग है कि हमारी इस अनावश्यक लड़ाई का खामियाजा हमारे हर भाई को भुगतना पडता है। लोग कहते हैं कि अगर हम एक दूसरे पर न भौंकें तो एक दिन में हम चालीस मील तक जा सकते हैं परन्तु जा पाते हैं केवल चार मील ही! बाकी का समय कभी भौंकने , कभी दुम दबाने और कभी दाँत निपोरने में चला जाता है। सच तो यह है कि अपनी गली में आए अपरिचित कुत्ते पर भौंकने से अजीब संतोष की अनुभूति होती है और आत्मविश्वास पैदा होता है।

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उत्तर आधुनिक शिक्षा में मटुकवाद

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 23, 2010

हरिशंकर राढ़ी
(यह व्यंग्य समकालीन अभिव्यक्ति के जनवरी -मार्च २०१० अंक में प्रकाशित हुआ था । यहाँ सुविधा की दृष्टि दो किश्तों में दिया जायेगा । )
वाद किसी भी सभ्य एवं विकसित समाज की पहचान होता है, प्रथम अनिवार्यता है। वाद से ही विवाद होता है और विवाद से ऊर्जा मिलती है। विवाद काल में मनुष्य की सुसुप्त शक्तियां एवं ओज जागृत हो जाते हैं। विवाद से सामाजिक चेतना उत्पन्न होती है। लोग चर्चा में आते हैं। जो जितना बड़ा विवादक होता है, वह उतना ही सफल होता है।
आदमी जितना ही बौद्धिक होगा, उतना ही वाद होगा। जिस समाज में जितने ही वाद होंगे , वह उतना ही विकसित एवं सुशिक्षित माना जाएगा। वस्तुतः वाद का क्षेत्र अनन्त है, स्थाई है किन्तु साथ-साथ परिवर्तनशील भी है। इसका व्याप्ति क्षेत्र एवं कार्यक्षेत्र दोनों ही असीमित है। अब तो यह पूर्णतया भौमण्डलिक भी होने लगा है। इस पर तो एक सम्पूर्ण शोध की आवश्यकता है। कमी है तो बस केवल शुरुआत की। एक बार शुरुआत हो जाए तो देखा-देखी शोध ही शोध ! बुद्धि के क्षेत्र में अपने देश का शानी वैसे भी सदियों से कोई नहीं रहा है। अब जहां इतनी बुद्धि है वहाँ वाद तो होंगे ही। सच तो यह है कि यह देश ही वाद की वजह से जीवित है। जैसे-जैसे देश की आबादी बढ़ी , वाद का परिवार भी बढ ता गया और वाद-विवाद, प्रतिवाद,संवाद एवं परिवाद भी संतान रूप में इसके परिवार में सम्मिलित होते गए।
मुझे लगता है कि वादों की श्रृंखला मनुवाद से हुई होगी और जाकर मक्खनवाद पर समाप्त मान ली गई होगी। मनु की व्यवस्था के गतिशील होने का बाद तमाम तरह के वाद आते गए। द्वैतवाद-अद्वैतवाद, शैववाद -अशैव वाद के नाम पर सिरफुटौव्वल पहले के मनीषियों का मनपसन्द टाइमपास था। मध्यकाल तक आते-आते कर्मवाद और भाग्यवाद जोर पकड ने लगे। भाग्यवाद ने जोर मारा तो विदेशियों का आक्रमण एवं शासन हुआ। हमें शासन करने से भी छुटकारा मिला।होइ कोई नृप हमहिं का हानी! जैसे तैसे उनके शासन के बाद आजाद हुए तो पुनः भाग्यवाद का ही सम्बल मिला और आज भी उसी के सहारे अपना देश चल रहा है।
हम एक तरह के स्वाद के आदती नहीं हैं, अतः हमारा इससे भी ऊबना स्वाभाविक था। विकर्षण हो गया इससे।भाग्यवाद में एकता और समरसता होती है, अत्याचार सहने की क्षमता होती है। प्रतिक्रिया का कोई स्कोप ही नहीं होता। अतः देश के नेतृत्व को बेचैनी हुई। सोई जनता को जगाना परम आवश्यक हो गया। इतना बड़ा भाग्यवाद भी क्या कि आप मतदान के लिए न निकलें! चूँकि वाद के बिना समाज का कोई अस्तित्व ही नहीं होता इसलिए पहले भाग्यवाद का स्थानापन्न लाना जरूरी था। काफी सोचविचार के बाद सम्प्रदायवाद,जातिवाद, क्षेत्रवाद एवं भाषावाद के चार विकल्प उपलब्ध कराए गए। परिणाम सामने है- आज लोकतंत्र अपने चरम उत्कर्ष पर है।
अपने यहां की वाद की विविधता का कोई जवाब तो है ही नहीं! कौन सा वाद है जो अपने यहाँ न हो! समाज के हर वर्ग के लिए यहाँ वाद की व्यवस्था की गई है क्योंकि वाद के बगैर मनुष्य मनुष्य की श्रेणी में आता ही नहीं। विविधता को एकता की कड़ी में पिरोया गया है।एक मनीषी द्वैतवाद-अद्वैतवाद के विकास में लगे तो दूसरे संभोगवाद में।पुरानी हर चीज क्लॉसिकल होती है, आप इस तथ्य को नकार नहीं सकते। अपना देश तो हर मामले में क्लॉसिकल रहा ही है, अगर आप जरा सा भी देशभक्त होंगे तो इस बात का विराध करेंगे ही नहीं।पाश्चात्य देश अब जाकर इक्कीसवीं शताब्दी में भोगवाद का नारा दे पा रहे हैं। आज वे ब्ल्यू फिल्मों एवं पोर्न साइटों के सहारे आदमी को थोडा सा शारीरिक सुख प्रदान करने का दावा कर रहे हैं। स्त्री शरीर के कुछ उल्टे-पुल्टे तरीके दिखाकर आप एडवांस बन रहे हैं।इन्हें कौन समझाए कि भोगवाद में हमारे जैसा क्लॉसिकल होना आपके बूते का नहीं ! फिल्मों की बात छोडि ए, जब आपको अ अनार भी नहीं आता था तो हमारे यहां आचार्य जी ने चौरासी आसनों का शास्त्रीय अविष्कार कर दिया था। ऐसे-ऐसे आसन कि भोग करो तो योग अपने आप ही हो जाए! कुछ में तो सर्कस की सी स्थिति बन जाए या फिर हड्डियां चटक जाएं। फिर भी आप हमें पिछड़ा समझते हैं? लानत है आप पर!

वाद परम्परा मनुवाद से शुरू होकर मक्खनवाद पर ठहर सी गई थी। निराशावादियों को लगा कि देश सो गया है, देश की नाक की किसी को चिन्ता ही नहीं। शिक्षा का पतन हो गया होगा और शोध बन्द हो गए होंगे। अध्ययन के नए तरीके और अध्ययन में नए वाद कि लिए बुद्धिजीवी आगे आ ही नहीं रहा होगा। इससे पहले कि लोग अन्तिम रूप से निराश हों, देश की शिक्षा पद्धति में एक अभूतपूर्व वाद पैदा ही हो गया और वह था मटुकवाद।
परम्परा यह है कि किसी भी वाद का नामकरण उसके प्रवर्तक के नाम पर ही आधारित होता है जैसे कि मार्क्सवाद, माओवाद , नक्सलवाद या फिर मनुवाद।इस हिसाब से नव आविष्कृत वाद का नाम भी इसके आविष्कारक प्रो० मटुकनाथ के नाम पर न होना उस महात्मा के साथ घोर अन्याय होगा।
इन प्रोफेसर साहब का आविर्भाव देश की एक अनन्य उपजाऊ धरती पर हुआ। वह हिस्सा ज्ञान के क्षेत्र में तबसे अग्रगण्य था जब शताब्दियाँ भी शुरू नहीं हुई थीं।जब दुनिया का नक्शा भी नहीं बना था तो वहां विश्व विद्यालय था।कई यात्री तो ज्ञान की लालच में उत्तर से पैदल-पैदल ही पहाड़ पार करके आ गए थे और हैरत की बात यह कि बिना लुटे-पिटे ही वापस भी चले गए थे। अब, जब शिक्षा बिलकुल नीरस और उद्देश्यहीन हो गई तो एक बार फिर वही धरती आगे आई और एक रोचक एवं अत्यन्त उपयोगी वाद का प्रादुर्भाव हुआ।
मटुकवाद शिक्षा के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व क्रान्ति है। पहली बार ऐसा कुछ हुआ कि किसी प्राध्यापक ने अपने बलबूते कुछ कर दिखाया और एक अत्यन्त व्यावहारिक ज्ञान को पाठ्‌यक्रम की विषय वस्तु बनाया । हकीकत तो यह है कि इसके पहले महाविद्यालय और विश्व विद्यालय स्तर तक अनुपयोगी और अव्यावहारिक सिद्धान्त पढाये जाते रहे हैं। अरस्तु -आइंस्टाइन से लेकर लेनिन- लोहिया के सिद्धान्तों का इन्ट्रावेनस इंजेक्शन ही ठोंका जाता रहा है अब तक जवानी से पीडि त बेचारे छात्र-छात्राओं को! किसी ने इनकी प्राकृतिक आवश्यकताओं को समझने की कोशिश ही नहीं की, जैसे कि खाने-पीने और पढ ने-लिखने के अलावा इनकी और कोई काम ही नहीं हो!

इससे पहले कि मटुकवाद की महत्ता पर कुछ प्रकाश डाला जाए,इसकी परिभाषा समझ लेना जरूरी है।जब कोई अध्यापक या प्राध्यापक किशोरावस्था पार करती अपनी ही किसी लावण्यमयी शिष्या को प्यार का ऐसा पाठ पढ़ा दे कि वह उस अध्यापक या प्राध्यापक पर ही मर मिटे या विवाह बंधन में बंधने को अड जाए तो इसे मटुकवाद कहते हैं।स्मरण रहे कि यहां छात्रा एवं प्राध्यापक की उम्र में कम से कम बीस वर्ष का अन्तर होना आवश्यक है।यदि किसी छात्रा का आकर्षण – समर्पण किसी युवा या अविवाहित प्राध्यापक के प्रति है तो इसे मटुकवाद नहीं माना जाएगा। इसे चिरातनकाल से ही स्वाभाविकवाद माना जाता रहा है।पूर्ण मटुकवाद तभी होता है जब प्राध्यापक विवाहित हो और उसके अपनी संतान छात्रा के समवयस्क हों।
इस परिभाषा पर विद्वान एकमत नहीं होंगे, यह मैं समझता हूँ । जो एकमत हो जाए वह विद्वान हो ही नहीं सकता। इस परिभाषा में बहुत सारी खोट ढूंढी जांएगी और अपवादों का हवाला दिया जाएगा। इसीलिए यहाँ परिभाषा को उद्धरण चिह्‌न के अन्दर नहीं रखा गया है। केवल लक्षण ही बताया गया है।ऐसा नहीं है कि मटुकवाद सर्वथा नई धारणा या घटना है। ऐसा भी नहीं है कि प्राध्यापकगण इससे पूर्व अपनी शिष्या के नागपाश में नहीं बंधे या शारीरिक संवाद से अनभिज्ञ रहे,परन्तु वे वाद का पेटेन्ट अपने नाम से नहीं करा सके।ठीक उसी प्रकार जैसे कि हल्दी,चंदन एवं नीम का ओषधीय प्रयोग अपने देश में सदियों से होता रहा किन्तु पेटेन्ट तो अमेरिका ने ले लिया!
(शेष अगली किश्त में )

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मेरा चैन -वैन सब

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 11, 2009

(दूसरी और अन्तिम किश्त )

दसवीं जमात में नम्बरों के चक्कर में एक निबन्ध याद किया था– “साहित्य समाज का दर्पण होता है।परीक्षा में साहित्य समाज….. धोखा दे गया नम्बर नहीं आए पर यह रट्टा अब काम आया है। बरात में खाना ज्यादा खाया था , सो नींद नहीं आई।अन्ततः सीरियस होना पड़ा और देश की दशा पर चिन्ता होने लगी। साहित्य समाज का दर्पण होता है इसलिए चैनवैन असलियत में उजड़ा होगा! आगे का वर्णन सच्चाई से बिलकुल मेल खाता हैबरबाद हो रहे हैं जी ये तेरे हर वाले …… अभी पूरी तरह बरबाद नहीं हुए हैं। हाँ, कुछ दिन में हो जाएंगे। अभी मकान के पहले माले ही तोड़े गए हैं, ताले उन्हीं दुकानों में जड़े गए हैं जिनका राष्ट्रीय विकास में कोई विशिष्ट योगदान नहीं है। और तो और , हेराफेरी और जमाखोरी में भी निकम्मे साबित हुए हैं।

गर्मी ठीक से नहीं पड़ रही है इसलिए पानी कभी-कभी आ ही जाता है। वर्मा जी मूली खरीदने गए थे; अत्याधुनिक आविष्कारों का लाभ प्राप्त हो गया-आर डी एक्स की भेंट चढ़ गए। शहर के लोग बहुत जिन्दादिल होते हैं, साहसी होते हैं। मूली की विक्री पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कोई भी मर जाए, शहर वाले विचलित नहीं होते। यह सत्य टी वी वालों ने सिद्ध कर दिया है।वे बताते हैं कि मूली खरीदने वाले उसी अदम्य उत्साह से आ रहे हैं। कई चैनलों पर ग्राहकों का साक्षात्कार भी तत्काल दिखाया गया है।

पर, शहर वाले बरबाद हो रहे हैं। इस तथ्य की संगीतमय अभिव्यक्ति के बाद संदेह की गुंजाईश नहीं रह जाती ।गांववालों का क्या हाल है , इसका विवरण यहां सुलभ नही है।वैसे बरबाद होने और चैनवैन उजड़ने का जश्न वहां भी मनाया जा रहा है। कइयों को इस पर आपत्ति है किबरबाद सूचीमें गांववालों का जिक्र क्यों नहीं ? गांव और शहर में इतना भेदभाव क्यों ? और सुविधाओं की बात तो छोड़िए, क्या गांव वालों को अब बरबाद होने का भी हक नहीं ?

इन सभी प्रश्नों ने मुझे निष्प्राण ही कर दिया होता , परन्तु शर्मा जी ने एक लम्बा भाषण ठोंका -“यह जानते हुए भी कि साहित्य समाज का दर्पण होता है और संगीत ईश्वर की भक्ति, आप ऐसी शंका कर रहे हैं ?गांववाले क्या खाकर शहर वालों का मुकाबला करेंगे ? वे तो इस बरबाद प्रतियागिता में शामिल होने की भी अर्हता नहीं रखते !यहां एक ऐसी अंगड़ाई का वर्णन है जो टूटने न पाए…… यानी लम्बी खिंचे। ऐसी अंगड़ाई उसे ही आ सकती है जो देर तक सोने का माद्दा रखता हो। चार बजे सुबह ही उठ जाने वाला क्या खाक बरबाद होगा ? पूरे के पूरे कपड़े पहन लिए , अब किसी का चैन उजाड़ना तुम्हारे वश का होगा ? कर भला तो हो भला !एक दो मुकदमे खड़े कर देने से अब किसी का चैन- वैन नहीं उजड़ता ! नाखून कटा के शहीद बनने चले।

ये ऊँची चीजें हैं , बड़े लोगों पर फबती हैं! उसी का जश्न है। शहरी समाज सभ्य होता है संगीत से इसका पुराना रिश्ता है जो समयसमय पर प्रकट होता रहा है।गीतकारों ने उच्च समाज की नब्ज पकड़ लिया है और उन्होंने सबको स्वर दे दिया है। कभी पूरे देश के अरमां आंसुओं में बहे थे, कभी दीदी का देवर दीवाना हो गया था, थोड़े दिनों पहले होठ भीग गए थे और बहुत से लोगों कोकांटाचुभ गया था……तब भी खुशी का माहौल था।

मुझे भी अपना चैन-वैन उजड़ा-उजड़ा सा लग रहा था। शर्मा जी अभी कुछ और बोलते पर उनके मोबाइल का चैन- वैन उजड़ने लग गया था। पता नहीं कब सेटल होगा चैन और कब टूटेगी अंगड़ाई…..? आओ , तब तक बरबाद हो लें।

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मेरा चैन -वैन सब

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 6, 2009

( थोड़ा सा भूतकाल में चलें ,चार – पाँच साल पहले जब इस मुखडे की धूम थी .तब यह व्यंग्य लिखा गया था और प्रकाशित हुआ था .)
मैं पिछले कई महीने से असमंजस की स्थिति में हूँ। मैं ही क्या , पूरा देश ही ऐसी स्थिति में है। अन्तर सिर्फ इतना है कि देश को ऐसी स्थिति में रहने का लम्बा अनुभव है , जबकि मेरे लिए यह नया अवसर है।इसीलिए कुछ बेचैनी हो रही है मुझे।वस्तुतः इस बेचैनी के पीछे मेरे अज्ञान का ही हाथ है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इस समय अपना देश, अपना समाज खुश है या दुखी ?

भ्रम की स्थिति बनी हुई है। जिधर देखिए, एक ही स्वर गूंज रहा है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा…….। इस स्वर के गूंजते ही चेहरे पर रौनक आ जाती है- गोया बहुत बड़ी खुषखबरी मिल गई हो! क्षण भर को भागम-भाग,रेलम-पेल ठहर जाती है।सारी ताकत बटोरकर बन्दा अपने आप को नियन्त्रित करता है,अर्थात फिर भीड़ में घुसता है तो उसकी भी रागिनी फूट पड़ती है- मेरा चैन वैन सब उजड़ा।

चैन उजड़ने जश्न पूरे जुनून पर है। यह सिद्ध करना है कि मेरा चैन सबसे ज्यादा उजड़ा है। आप इस बात को सिद्ध भी कर सकते हैं ,बशर्ते आप गर्दभ राग के विशेषज्ञ हों। सभी का चैन उजड़ा है, शिकायत सबको है किन्तु प्रश्न यह है कि किसका चैन उजड़ना प्रकाश में आ सकता है ?

पिछले मौसम में टूटू की शादी थी- कुमार साहब की सौभाग्यकांक्षिणी कन्या सेक्सी के साथ। उसी अवसर पर यह मार्मिक प्रश्न मेरे मानस पटल पर उभरा था। टूटू के दोस्त- दोस्तनियां समूह में पधारे थे। ऊँचे समाज के लोग हैं। उचाई का अन्दाजा मुझे इस बात से लगा कि अधिकांश दोस्तनियां कच्छा-बनियान में थीं और “अरे यार!” को छोड़कर शेष वार्तालाप अंगरेजी में कर रही थीं। वहीं इनका चैन भी उजड़ने लगा।

धरातल पर चार बड़े-बड़े तख्त पड़े थे। रस्सी से जकड़ दिया गया था उन्हें।नीचे लाल-पीली बत्तियां जल रही थीं। शर्माजी ने बताया कि इस प्रकार की व्यवस्था को डी जे कहते हैं। वर-कन्या के बिना विवाह सम्पन्न हो सकता है,परन्तु डी जे के बिना कतई नहीं।तख्तों के पीछे आधा दर्जन ध्वनि विस्तारक यंत्र अपनी पूरी शक्ति से कर्मयोग का पालन कर रहे थे- गोया सभी अतिथि बहरे हों। क्या पता आज के झटके से उनके कान खुल जाएं !

अपने यहां की शादियों में अब दो खण्ड भारी भीड़ लेते हैं। यह विभाजन मुख्यतः आयुवर्ग के अनुसार हो रहा है।खींचते- खांचते आप पच्चीस तक के हैं तो आप इसी डी जे के पास होंगे- हाँ, शर्त यह है कि आस-पास कच्छा बनियानधारी कन्याएं भी हों। चुस्त जींस और लघु उत्तरीय भी थोड़ा बहुत स्वीकार्य है। यदि आप पच्चीस से ऊपर हैं तो भोजन पंडाल की तरफ प्राप्य हैं । कुछ वियाग्राभोगी वानप्रस्थी भी आपको प्रथम समूह में दृष्टिगोचर होंगे। अब डी जे स्थल पर तिल फेंकने की जगह नहीं है। सबका चैन उजड़ना शुरू हो गया है। अदम्यशक्ति और उत्साह के पुंज ब्रह्मचारीगण तख्त पर ऐंड़े-बैंड़े लात चला रहे हैं । गधा पास में खड़ा हो तो दुलत्ती मारने के नए-नए तरीके वह भी सीख ले।

कुछ ज्ञानी कलाकारों ने मूल गीत को कई बार ”देख“ रखा है। ऊपरी नशा कम है। ऐसे कलाकार मूल गीत में बाप-बेटे के पद संचालन का अनुसरण कर रहे हैं। कहीं एकाध पद संचालन भी मूल कलाकारों से अलग हुआ तो कला खतरे में पड़ सकती है या अमिताभ- अभिषेक की श्रेणी से नीचे की श्रेणी में परिगणित हो सकते हैं। कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक है।कइयों को लगता है कि मूलगीत में सुधार की काफी गुंजाइश है। ऐसे कलाकारों को प्रयोगधर्मी कहा जाता है।वे फिल्म निर्देशक को उसकी गलतियों का एहसास कराना चाहते हैं।मसलन, जब चैन-वैन का उच्चारण हो तो अपनी छाती पर घूंसा मारना है, ”उजड़ा” पर दोनों टांगों के बीच एक सौ अस्सी अंश का कोण बनाना है और फिर अचानक उठकर अभिनेत्री की चोली की रस्सियां खोलनी हैं।

रहने भी दो भाई साहब! एक तो नैतिक पतन के इस युग में बेचारी ने परम्परावादी रस्सीयुक्त चोली पहन रखा है। आधुनिकता की पोषक होती तो जींस-टॉप नहीं पहनती ? चलो, चोली ही पहनी तो हुक या बटन नहीं लगवा लेती ?

दस-बारह साल वालों ने मंच खाली कर दिया है। शायद उन्हें अनुमान हो गया है कि कुछ देर और टिके तो फ्रैक्चर हो सकता है। बालक का मन ब्रह्मा होता है। बच्चे मन के सच्चे! भैया पहले से नाच रहे थे।बड़ा होकर मैं भी ऐसा ही उच्च कोटि का नर्तक बनूंगा। अब दीदी की इच्छा रोके नहीं रुक रही है।दो -तीन कृशकाय हैं। उन्हें कुछ भय लग रहा है। मोटी वाली दीदी बोल्ड हैं। वे मंचस्थ हो गई हैं। उनके लिए स्थान रिक्त हो गया है। अब और नृत्यांगनाएं मंचस्थ हो रही हैं। तब तक आइसक्रीम खा आते हैं।

कुछ वानप्रस्थी भाई भी प्रयास में हैं। इस भीड़ में प्रवेश पा सकने में सफल हो गए तो स्पर्श सुख का सौभाग्य मिल ही जाएगा। किसी नौजवान ने जोर का धक्का मारने की कृपा कर दी तो ”किसी“ के ऊपर गिरने का सुख भी लूट सकते हैं। जिन्दादिली इसे ही कहते हैं। कुछ लोग गम्भीर किस्म के हैं। परिधि के बाहर से ही कला का सम्मान कर रहे हैं। बड़ी कृपा की ईश्वर ने जो दो आँखें दे दीं। गालिब का शेर इनकी समझ में कुछ ज्यादा ही आ गया है-

गो हाथ में जुम्बिश नहीं ,आँखों में तो दम है

रहने दे अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे ।

चैन-वैन जोर-शोर से उजड़ने लग गया है। अब मेरा आत्मविश्वास साझा सरकार की तरह हिल रहा है। यहां तो चैन उजड़ते ही लोग खुश हो रहे हैं। डी जे है न , कोई भी गीत पूरा नहीं हो सकता । बीच से कटता है। लोग चिल्लाते हैं, फरमाइश करते हैं। थोड़ा सा चैन फिर उजड़ता है। सरकारी परियोजना की तरह कार्यक्रम रुक-रुक कर चलता रहता है, खुशी बढ़ती रहती है।

कभी- कभी न जाने क्यों डी जे अचानक ही चुप हो जाता है। लगता है कि हम कुछ सुन भी सकते हैं; हमारे दो कान भी हैं। परन्तु यह सुविधा ज्यादा देर तक टिक नहीं सकती। रणभेरी सी बजने लग गई है। पद संचालन पुनः शुरू हो गया है । स्थिति और विषम हो गई है। शहर वाले बरबाद हो रहे हैं।

(अभी यहीं तक , अंत अगले किसी दिन )

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जिन्न-आ मुझे मार

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 25, 2009

अब तो आपको विश्वास हो ही गया होगा कि जिन्न होते ही हैं और उनमें दम भी होता है। अब केवल दिखाने के लिए बहादुर मत बनिए, वैसे भी इस जिन्न का असर आप पर नहीं होने वाला। ये जिन्न बड़ा जबरदस्त है। जिन्न क्या है, समझिए जिन्ना है। ढूंढ़- ढूंढ़कर बड़े-बड़े नेताओं को मार रहा है , बिलकुल राष्ट्रीय स्तर और राष्ट्रवादी नेताओं को !मार भी क्या रहा है, न मरने दे रहा है न जीने। इस बार भी उसने बड़ा शिकार चुना है। मजे की बात तो यह है कि इस शिकार से किसी को सहानुभूति नहीं है, यहां तक कि ओझाओं और सोखाओं तक को नहीं जो कि इस के घर के ही हैं ! घर- परिवार वाले तो इसे देखना भी नहीं चाहते। इस शिकार से तो वे पहले से ही चिढ़े थे ,अब इसने एक जिन्न और लगा लिया अपने पीछे । दरअसल उन्हें शिकार से ज्यादा चिढ़ इस जिन्न से है । जिन्न इसने लगाया,चलो ठीक है, पर इस वाले जिन्न को क्यों लगाया ? और इस शिकार को क्या कहें ? इसे मालूम था कि इस जिन्न के प्रति माहौल खराब है,फिर भी इसे छेड़ा। पहले तो इसे कहते थे कि आ बैल मुझे मार , पर इसने तो कहा- आ जिन्न-आ मुझे मार !
ये जिन्न बड़ा राजनीतिज्ञ है, केवल चले बले राजनेताओं को मारता है। और मारता भी उसे है जो इसकी बड़ाई करने की कोशिश करता है।इसे धर्म निरपेक्षता से बड़ी चिढ़ है । कुछ भी कह लो पर यही मत कहो। पूरे जीवन धर्मनिरपेक्षता से ही लड़ने की कोशिश की और अब मरहूम होने पर भी उसकी रूह को दुखी कर रहे हो।इतनी मेहनत करके देश का बंटवारा करवाया और इसका श्रेय अभी तक अकेले एन्ज्वाय किया । अब तुम इसमें भी नेहरू-पटेल को शामिल करने लगे ?
साठ साल तो उस घटना के हुए होंगे , पर सठियाने आप लगे। क्या विडम्बना है आपकी भी। अभी चार पांच साल ही हुए होंगे, आपके दल के बहुत बड़े सदस्य के खिलाफ वह जिन्न उभरा था। पब्लिक को पता है, याद भी है। तब भी कुछ ऐसा ही हुआ था।उन्हें अपना सिर देकर जान बचानी पड़ी थी। अब भला जिन्न का मारा कहां तक संभले ? फिर भी आप जिन्न को छेड़ गए! वैसे वह जिन्न है तो शरीफ। यहां उसकी बुराई करो तो आपको पूछेगा भी नहीं, और बड़ाई की और गए। महोदय, आपने तो हद ही कर दी। बड़ाई को कौन कहे आप तो पूरी किताब लिख गए। छपवा भी ली और भाइयों को पढ़वा भी दी । अब होना तो यही था। घर तो आपका पहले से ही भुरभुरा हो रहा था। खंडहर जैसी दशा में आने वाला था, जिन्न और आपने छोड़ दिया- वह भी पड़ोसी का । पड़ोसी वैसे भी किसी जिन्न से कम नहीं होता, यह तो पूरा जिन्ना ही था।
खैर, इस उमर में जिन्न आपका बिगाड़ ही क्या लेगा ? किताब तो आपकी आ ही गई । हंस बिरादरी में आप शामिल हो ही गए हैं । इस उम्र में ही लेखकों को साहित्य के बडे-बड़े पुरस्कार मिलते हैं। लह- बन जाए तो साहित्य का नोबल पुरस्कार भी मिल सकता है। एक पुरस्कार ऐसा आया नहीं कि आप को फिर यही घरवाले सिर पर बिठाकर घूमेंगे। पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति की जैसी कद्र अपने देश में होती है वैसी और कहीं नहीं।
मुझे तो खुशी इस बात की हो रही है कि अभी भी इस देश में लोग किताबें पढ़ते है। अगर पढ़ते नही तो इतना बवाल कहां से होता ।परिचर्चा भी करते हैं लोग और एक्शन भी लिया जाता है। राजनैतिक दल इतने दृढ़ और नैतिक हैं कि अपनी विचारधारा के उलट जाने वाले को फौरन दंड भी देते हैं। यह बात अलग है कि यह सब पड़ोसी देश के बड़े जिन्न यानी जिन्ना की रूह के प्रभाव में होता है।

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क्यों न रोएँ ?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 13, 2009

शीर्षक पढ़ते ही आपने मुझे निराशावादी मान लिया होगा। किसी तरह कलेजा मजबूत करके मैं कह सकता हूँ कि मैं निराशावादी नहीं ,आशावादी हूँ। पर मेरे या आपके ऐसा कह देने से इस प्रश्न का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। सच तो यह है कि आशावाद के झूठे सहारे हम अपने जीवन का एक बडा हिस्सा निकाल लेते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पर आंसू भी कम बलवान नहीं होते और कई बार हम अपने आंसुओं को दबाने के असफल प्रयास में भी रो पड़ते हैं। चलिए, माना हमें रोना नहीं चाहिए, लेकिन क्या इतना कह देने से रोने की स्थितियां उलट जाएंगी ?क्या हर भोले-भाले और निर्दोष चेहरे पर असली हँसी आ जाएगी ?
कहाँ से शुरू करें ?अभी कल की बात है, बाजार गया था। किराने की एक बड़ी सी दूकान पर एक मजदूर ने दाल का भाव पूछा। चैरासी रुपये किलो! बेचारे का चेहरा उतर गया। “पाव कितने की हुई ?”इक्कीस रुपये। डरता हुआ सा वह धीरे से वापस चला गया। मैं सोचने को विवश हो गया कि आज वह परिवार क्या खाएगा? कई दिनों बाद सौ रुपये की दिहाड़ी लगाने वाला मजदूरकिस कलेजे से अपनी ”आय” का एक चैथाई एक वक्त की दाल पर खर्च कर देगा ? अब दाल रोटी से नीचे क्या है! शायद नमक रोटी ! धीरे-धीरे नमक पर भी गाज गिरने लगी है । खुला नमक प्रतिबन्धित हो गया है। हानिकारक होता है ! घेंघा की बीमारी हो जाती है। हमें आपके स्वास्थ्य की चिन्ता है। आपको आयोडीन नमक खाना ही होगा, वरना आपके बच्चे मन्दबुद्धि पैदा होंगे। आयोडीन नमक पैकेट बन्द मिलता है । यह बात अलग है कि इस नमक पर बेचारे को दिहाड़ी का दस प्रतिशत खर्च करना पड़ता है। अब बेचारा नमक भी कहां से लाए? प्रेम चोपड़ा का एक डायलाग याद आता है- नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या ?
विडम्बना तो यह है कि हमें उसके इस जीवन से भी जलन है। लाखों का टैक्स चोरी करने वाला “सभ्य ” नागरिक भी परेशान है, उसे मजदूर का “सुख चैन” देखा नहीं जाता- हमसे तो अच्छा मजदूर ही है,कल की चिन्ता नहीं। दाल रोटी खाकर चैन से सोता तो है! चलो भाई , नहीं खाएगा दाल रोटी।
सरकार बहुत सक्रिय है। उसने नरेगा( रोजगार गारंटी अधिनियम) बना दिया है। अब सारा हिन्दुस्तान सुखी होगा, सबको रोजगार जो मिल गया! फिर भी लोगों को लग रहा है कि महंगाई बढ़ रही है जबकि इसका कोई प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है।सारे सूचकांक नीचे गिरे पड़े हैं। रेपो रेट भी घट गया है। मुद्रास्फीति गिरकर कहां गई, पता ही नहीं लग रहा! अभी जून के आखिरी सप्ताह में महंगाई दर शून्य से भी नीचे चली गई थी और आप कह रहे हैं कि महंगाई बढ़ रही है ?पब्लिक झूठ बोलती है। उसे सब कुछ फ्री चाहिए। हमारा थर्मामीटर नहीं बता रहा कि आपको बुखार है तो कैसे मान लें ? आपका शरीर तप रहा हो तो आप जानें। आप रो नहीं रहे, आप नखरे कर रहे हैं। आप निराशावादी लगते हैं।
बड़े लोग हमेशा से कल्याण में लगे हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा, आयोडीन से आप की सेहत सुधारी ,आपके लिए इन्होंने और भी कल्याणकारी काम किया। आपको याद न हो,ये बात अलग है । आपको भूलता भी तो बहुत जल्दी है! जहां आयोडीन खिलाकर आपको घेंघा से मुक्ति दिलाई और आपका बुद्धिवर्धन किया, वहीं कॅन्डोम की बिक्री बढ़ाकर आपको एड्स से बचाकर नया जीवन दिया। एड्स अच्छा आया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कॅन्डोम अपने देश में आया ।बच्चा बच्चा एड्स के बारे में जान गया है।खुल के जियो, खुल के बात करो , खुल के यूज करो।रब जाने कब जरूरत पड़ जाए। उपलब्धता की गारंटी बढ़ा दी गई है। हर सार्वजनिक शौचालय पर जोश स्पॉट है। हमेशा जोश में रहो!
ददुआ को मारने में भले ही बावन घंटे लग जाएं, रणवीर सिंह (देहरादून इंकाउंटर मामले का शिकार ) को मार गिराने में बावन मिनट भी नहीं लगते!इसमें हमारा प्रषासन बड़ा तेज है।अब गाजियाबाद के उस परिवार के आँसू देखकर भी हमें नहीं रोना चाहिए।ऐसी छोटी मोटी घटनाएं तो होती ही रहती हैं। ये मैं नहीं कह रहा हूं ,एक बड़े नेता ने कहा था।
इसी से एक बात और याद आई। हमारे राज्य हमारी निजी सम्पत्ति हैं।बिना हमारे वीजा के आप यहां कैसे आ गए ? वह भी घूमने फिरने नहीं, नौकरी करने ?
जैसे तैसे जी भी रहे थे,पर ये टीवी न्यूज चैनल वाले जीने नहीं देते । डराते रहते हैं। पता नहीं कहां कहां से खबर जुटाते रहते हैं। जिसे घी समझ के खा लेते थे और बलवान होने का भ्रम पालकर खुश हो लेते थे, उसे इन्होंने यूरिया और सर्फ का अवलेह सिद्ध कर दिया, दूध को पेण्ट का उत्पाद साबित कर दिया। हमने भी अच्छा धंधा अपना लिया है। मैं आपको नकली घी दूध बेच दूं , आप मुझे नकली दवाई बेच देना। हिसाब बराबर! पर वो बेचारा गरीब क्या बेचेगा ? हाँ, याद आया, उसके पास गुरदा है। वो अपना गुरदा बेच देगा। दो चार दिन के लिए ये वाली दाल और पैकेट वाला नमक तो मिल ही जाएगा !रोएगा तो कौन सी नई बात ? और वह है किस लिए ?
अभी तो और भी समस्याएं हैं।हमें यौन शिक्षा लागू करनी है। बिजली पानी मिले न मिले , गे कल्चर वालों को सुविधाएं उपलब्ध करवानी है। अमेरिका की बराबरी करनी है हमें। एम जे की मौत पर मरने वालों को ढांढस बधाना है। वे भी तो बेचारे रो रो के लार बार हुए जा रहे हैं। आपको तो बस महंगाई और व्यवस्था की पड़ी है!
मैंने बहुत सोचा कि न रोऊँ इन हालात पर। पर मन यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि हालात रोने के नहीं हैं ।सोचता हूँ काश! हम इन मुद्दों पर एक बूंद आंसू बहा सकते!

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एक श्रद्धांजलि उन्हें भी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 8, 2009

कल उनका अन्तिम संस्कार हो गया। माफी चाहूंगा ,वहां इसे संस्कार नहीं बोलते। संस्कार वहां होते ही नहीं। यूँ समझिए कि क्रिया-कर्म हो गए। दफना दिए गए।लगभग दो सप्ताह तक यूँ ही पड़े रहे। मृत शरीर को देखकर कोई पुत्र, कोई पत्नी तो कोई वास्तविक उत्तराधिकारी होने का दावा कर रहा था।गनीमत थी कि क्रिया कर्म हो गया। ऐसा विवाद अपने देश में होता और कोर्टकेस हो जाता तो मिट्टी भी नहीं मिलती बेचारी काया को!
खैर, क्रिया कर्म बड़ा शानदार हुआ।उनका जीवन भी तो बड़ा शानदार था।कई लोग उन्हें जिन्दा देखकर मरे, कई मरने के बाद मर गए।मुझे समझ नहीं आया।मानसिक मृत्यु के बाद ऐसे 12 लोगों को शारीरिक आत्महत्या की क्या आवश्यकता थी?परन्तु वे उनके फैन थे और फैन को कुछ भी करने का अधिकार होता है ।बहरहाल , उनके क्रियाकर्म पर विशाल जलसा हुआ- रंगारंग कार्यक्रम पेश किए गए।गाने गाए गए, डांस हुआ। शमशान भी गूंज उठा।उस मस्ती में कहां की वसीयत और कहां की आत्महत्या! सारे विवाद संगीत में डूब गए।
जिस ताबूत में वे दफनाए गए,सुना कि बेशकीमती था। कीमती चीजों से उन्हें गहरा लगाव था।उसी के लिए जिए वे!जो भी किया ,बहुत बड़ा किया। सुना कि उनका घर बहुत बड़ा था-नेवरलैण्ड।ऐसी लैण्ड आगे कभी नहीं- नेवर! झील से लेकर चिड़ियाघर तक अन्दर ही। क्या पता कब किस जानवर की जरूरत पड़ जाए!मन कब बच्चा-बच्चा खेलने लग जाए या किस जानवर से प्रेमप्रसंग का शौक चढ़ बैठे!क्या चमत्कारी काया थी ? नाचीज के समझ में कुछ आया ही नहीं।चेहरा-मोहरा देखकर लिंगभेद होता ही नहीं था। पता नहीं लोग होमोसेक्सुअल होने का आरोप कैसे लगा देते थे? लोगों का क्या, अनाप सनाप बकते ही रहते हैं।
अब समस्या तो इस नाचीज के दिमाग की है। कुछ समझ ही नहीं आता ।अब अपने समझ में यही नहीं आया कि क्या उस महंगे ताबूत में पंचभूत काया का जैविक क्षरण सामान्य विधि से अलग होगा? होगा तो समय कम लगेगा या ज्यादा?
उनके वस्त्रालंकार की तो बात करना ही बेमानी है।पता नहीं क्या-क्या पहने, क्या-क्या खाए! आवष्यकतानुसार चेहरा-मोहरा भी बदला।प्लास्टिक सर्जरी भी कराई, कभी मम्मी बने तो कभी पापा! ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। पैसे को उन्होंने पैसा समझा ही नहीं। इतने फकीर थे कि करोड़ों डालर के कर्ज में डूब गए। यह सब देखकर विदर्भ के किसानों की सोच पर मुझे बड़ी चिढ़ आई। छोटे से कर्जे पर नासमझ आत्महत्या कर लेते हैं। उन्हें भी पोजिटिव होने का गुण उनसे सीखना चाहिए। पर वे ऊँची बातें सोचते ही नहीं!
वे बड़े फनकार थे।संगीत को उन्होंने बड़ी इज्जत दिलाई। शास्त्रीय संगीत से पॉप संगीत में शिफ्ट करने में उनकी उच्चतम भूमिका है। वस्तुतः युवा पीढ़ी को संगीत से जोड़ने का पूरा श्रेय उन्हें ही दिया जाना चाहिए। आप से ही प्रभावित होकर अपने आर्यावर्त में अंगरेजी गाने का वर्चस्व बढ़ा और हमारा समाज ऊँचा हुआ। वैसे नाचीज ने भी अंगरेजी में एम .ए। किया था और अपने जमाने में अँखफोड़ पढ़ाकू था। इतना अँखफोड़ कि यूनिवर्सिटी में भी गर्लफ्रेण्ड बनाने का टाइम नहीं मिला परन्तु अंगरेजी गाने आज तक पूरी तरह समझ में नहीं आए।
उनके नृत्यकौशल की तो बात ही निराली थी।जब वे स्टार्ट हो जाएं तो जेनेरेटर भी मात खा जाए,करेंट लग जाए या फिर मिर्गी का रोगी भी शरमा जाए। क्या पद संचालन था!भाव भंगिमा की तो जनाब बात ही मत करिए। शरीर का हर जोड़ अलग -अलग दिखने लग जाए और पता लग जाए कि किस अंग का वाइब्रेशन अधिकतम कितना हो सकता है। उनके कंपन के अंकन के लिए कोई यन्त्र बना ही नहीं। सारे सीज्मोग्राफ और ई.सी.जी. फेल!
अब वे नहीं रहे। पता नहीं क्या होगा उस फन का, उस विरासत का? पर , एक भरोसा है उनके पीछे चलने वाली पीढ़ी पर। जिसके इतने फैन,इतने फोलोवर है कि आत्महत्या तक कर लें, उनके कुछ योग्य चेले तो होंगे ही! संभालेंगे उनकी विरासत। हमें क्या ? हमारी तरफ से भी एक विनम्र श्रद्धांजलि!

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nijikaran

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 1, 2009

——— गतांक से जारी —- समापन किश्त

एक अन्य महत्त्वपूर्ण विभाग जिसका निजीकरण किया गया , वह था पुलिस विभाग। सरकार ने देखा कि तनख्वाह बढ़ाने के बाद भी अपराधों में कमी नहीं आई है तो निजीकरण का मन बन ही गया। पुलिस की कमाई बढ़ाने के लिए न जाने कितने नियम बनाए गए, कितन प्रशिक्षण दिया गया, परन्तु परिणाम ढाक के वही तीन पात! अन्ततः निजीकरण हो ही गया। एक झटका तो लगा पुलिस को, लेकिन संभल गई। सरकार तनख्वाह ही तो नहीं देगी! पहले ही कौन सा खर्च चल जाता था? हाँ,यही न कि आयकर रिटर्न भरना आसान हो जाता था। असली साधन तो कानून था, वह तो अभी भी हाथ में दे ही रखा है। निजीकरण के बाद विभाग में व्यापक परिवर्तन हुए। चहुँओर शान्ति छा गई ।अब उपभोक्ता वाद के मज़े आने लगे! police ने अनेक प्रकार के शुल्क निर्धारित कर दिए, यथा-सुरक्षा शुल्क, पिटाई शुल्क , षिष्टाचार शुल्क आदि। सुरक्षा शुल्क वह शुल्क था जो सम्मानित नागरिक चोर-डाकुओं से सुरक्षित रहने के लिए जमा कराते। यह अनिवार्य शुल्क था। सम्मान शुल्क जमा कराने वाला नागरिक पुलिस की गाली अकारण प्राप्त करने से बच सकता था। विशेष सम्मान शुल्क दाता नागरिक पुलिस वालो से सम्मान भी पाता और पुलिस उत्सवों में भी बुलाया जाता। अनादर शुल्क ,पिटाई शुल्क ,गाली शुल्क , जमा कराके कोई नागरिक अपने इच्छित व्यक्ति का अनादर या पिटाई इत्यादि करा सकता था। इसके अलग- अलग ग्रेड थे।ये शुल्क सुरक्षा एवं सम्मान शुल्क से अधिक थे। यदि कोई सम्मान या षिष्टाचार शुल्क दाता का अपमान कराना चाहता तो उसे ऊँची धन rashi जमा करानी पड़ती। ऐसी स्थिति में वांछित व्यक्ति को सूचित किया जाता। सूचना में पुलिस इस बात का उल्लेख करती कि उक्त व्यक्ति पर कितनी धनराषि लगाई गई है। सम्मानित व्यक्ति उससे अधिक शुल्क जमा कराकर इस प्रकार के दंड से बच सकता था। प्रयोग सफल रहा।न कहीं चोर ,न कहीं डाकू।न दंगे न फसाद!एक – एक कर हर विभाग का निजीकरण कर दिया गया।आमदनी कम हो गई तो विष्वबैंक से कर्ज लेकर सांसदों- विधायकों का खर्च चलाया गया। pradesh सरकारों का निजीकरण किया गया।आज वह ऐतिहासिक दिन भी आ गया कि केन्द्रीय सरकार का भी निजीकरण विज्ञापित हो गया है। निविदाएँ भरी जाएंगी, बोली लगेगी, निजीकरण होगा पर घसीटा दास ,कुछ अन्य लोगों सहित मेरी भी ishwar से यही प्रार्थना है कि बोली किसी नेता के नाम न छूटे!

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nijikaran

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 29, 2009

…….गतांक से आगे
दूसरा महत्त्वपूर्ण निजीकरण शिक्षा का हुआ। सरकारी स्कूलों में कथित रूप से घोर भ्रष्टाचार फैला हुआ था। यद्यपि परिणाम प्रतिशत फेल विद्यार्थियों का ही अधिक होता ,फिर भी कुछ तो उत्तीर्ण हो ही जाते।यही उत्तीर्ण छात्र आगे चलकर बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि करते और देश की प्रतिष्ठा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गिरती। न ढंग के कपड़े,न कापी न किताब,न तरीका। आखिर कब तक ढोए सरकार! सारे स्कूल ’पब्लिक स्कूल ’ हो गए।शिक्षा का स्तरोन्नयन हो गया।हाँ,अपवाद स्वरूप् कुछ राजकीय विद्यालय बचे रह गए थे। वस्तुतः इन स्कूलों का परीक्षा परिणाम अन्य विद्यालयों की तुलना में बहुत ऊँचा रह गया था। फलतः शिक्षकों एवं अभिभावकों ने आंदोलन कर दिया। बापू की समाधि पर धरना दे दिया। सरकार को झुकना पड़ा। समझदारी से काम लेना पड़ेगा। उन विद्यालयों के निजीकरण का मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया। उन दिनों सरकार के पास ठंडा बस्ता नामक एक अज्ञात एवं अतिगोपनीय उपकरण हुआ करता था। यह ठंडा बस्ता अलादीन के जादुई चिराग से भी चमत्कारी था। जब भी कोई राष्ट्रीय महत्त्व का मामला होता और सरकार उसे लटकाना चाहती तो उसे ठंडे बस्ते में डाल देती। वह उसी में पड़ा रहता। जब पुनः आवश्यकता होती या आम चुनाव आते, सरकार ठंडे बस्ते का मुँह खोलती और उस मामले को बाहर निकाल लेती। आवश्यकता पूर्ति होने पर मामला पुनः ठंडे बस्ते में। आवश्यक यह था कि किसी प्रकार ऐसे विद्यालयों का परिणाम भी शून्य के स्तर तक लाया जाए।अस्तु, तमाम योग्य एवं अनुभवी अध्यापकों को वर्ष पर्यन्त दूसरे विभागों मे उपनियुक्त का दिया गया।अधिकाँश को मच्छरों की विभिन्न प्रजातियों की गणना में लगा दिया जिससे मच्छरजन्य बीमारियों से मुक्ति मिल सके। कुछ को टाइम- बेटाइम होने वाले चुनावों में लगा दिया गया। अब विद्यालय में वही अध्यापक बचे जो अध्यापक बने नहीं ,बनाए गए थे। यद्यपि इस प्रक्रिया में तीन वर्ष लगे ,परन्तु ऐसी स्थिति अवश्य आ गई कि इन विद्यालयों का निजीकरण निर्विरोध किया जा सके। निजी उर्फ पब्लिक स्कूलों ने शिक्षा को पहली बार आर्थिक आयाम प्रदान किया। राष्ट्रीय शिक्षा अधिनियम 1660 के नियमों ,उपनियमों एवं विनियमों में संशोधन किया । नई धाराएं ,उपधाराएं जोड़ी गई। प्रवेश नियम तार्किक एवं संगत बनाए गए।कुछ उल्लेखनीय नियम निम्नवत हैं-
प्रवेश 1- प्रवेश उसी छात्र या छात्रा को दिया जाएगा जिनके अभिभावकों के पास वैध पासपोर्ट एवं वीजा होगा। यह नितान्त आवश्यक है कि छात्र- छात्रा अपने अभिभावकों के साथ प्रत्येक महाद्वीप के कम से कम एक देश की यात्रा कर चुके हों।
2- छात्र-छात्रा के माता-पिता आयकर जमा करते हों और उसका विवरण देने को तैयार हों।
3-छात्र-छात्रा माता पिता की इकलौती संतान हो।यदि किसी अभिभावक के एक से अधिक सन्तान हो तो उसे दोगुना शुल्क जमा कराना होगा।
4- छात्र/छात्रा के दादा-दादी अनिवार्य रूप से छात्र/छात्रा के साथ न रहते हों ।
5-छात्र/छात्रा को अनिवार्य रूप से अंगरेजी में पेशाब करना आता हो। हिन्दी माध्यम में पेशाब करना अयोग्यता होगी।
परीक्षा – 1-प्रत्येक विद्यार्थी की प्रतिदिन परीक्षा ली जाएगी।
2- हर परिस्थिति में परीक्षा में सम्मिलित होना अनिवार्य होगा।दैनिक परीक्षा में पूर्णतः या आंशिक रूप से अनुपस्थित होने वाले छात्र/ छात्रा वर्तमान कक्षा से तीन कक्षा पीछे कर दिए जाएंगे।
3- परीक्षा शुल्क प्रश्न पत्र में मुद्रित प्रश्नों की संख्या के अनुसार अग्रिम लिया जाएगा।ऐसे विद्यार्थी जिनका शुल्क जमा नहीं होगा,उनके प्रश्नोत्तर अवैध माने जाएंगे और अंक निर्धारण परीक्षक के विवेकानुसार किया जाएगा। ऐसी दशा में एक गणित अध्यापक दो दूनी चार मानने को बाध्य नहीं होगा। सम्पूर्ण जिम्मेवारी अभिभावक की होगी।
ऐसे न जाने कितने नियम थे। अनुशासन एवं कार्यव्यवहार के नियम तो सर्वथा आदर्श थे। प्रवेश के समय ही अभिभावक से हजारों रुपये के स्टाम्प पेपर पर अनुबन्ध एवं घोषणापत्र भरवाए जाते थे। कोई भी अभिभावक अपनी संतान से विद्यालय कार्यावधि मे किसी भी परिस्थिति में मिल नही सकता था। माह में एक बार वह विद्यालय में आ सकता था। विद्यालय के प्रवेश द्वार पर दरवाजे में छोटे-छोटे छेद बनाए गए थे जिसमें से वह पांच सेकेण्ड तक अपने पुत्र या पुत्री को झांक सकता था।विद्यालय में दूरबीन सुविधा भी थी जिसका उपयोग एक हजार रुपये जमा कर एक मिनट तक संतान दर्शनाथ किया जा सकता था। एक बार प्रवेश मिल जाने पर छात्र/छात्रा को बारहवीं तक उसी स्कूल में पढ़ना पड़ता था। किसी भी परिस्थिति में उसे निकाल कर दूसरे स्कूल में नहीं पढ़ाया जा सकता था।यदि शिक्षा के दौरान ही छात्र की मृत्यु हो जाए तो उसे विद्यालय के श्मशान में सम्मान के साथ दफना दिया जाता।वहाँ हर प्रकार की सुविधाएँ उपलब्ध थीं-चिकित्सालय,बुक शॉप ,पेन्सिल शॉप , यूनिफार्म शॉप , कैफे, रेस्टोरेण्ट आदि -आदि।
………. आगे जारी …….

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तो क्या कहेंगे?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 18, 2009

सलाहू आज बोल ही नहीं रहा है. हमेशा बिन बुलाए बोलने वाला आदमी और बिना मांगे ही बार-बार सलाह देने वाला शख्स अगर अचानक चुप हो जाए तो शुबहा तो होगा ही. यूं तो वह बिना किसी बात के बहस पर अकसर उतारू रहा करता है. कोई मामला-फ़साद हुए बग़ैर ही आईपीसी-सीआरपीसी से लेकर भारतीय संविधान के तमाम अनुच्छेदों तक का बात-बात में हवाला देने वाला आदमी आज कुछ भी कह देने पर भी कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं हो रहा है. मुझे लगा कि आख़िर मामला क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं कि माया मेमसाहब द्वारा बापू को नाटकबाज कह देने से उसे सदमा लग गया हो! पर नहीं, इस बारे में पूछे जाने पर उसने मुझे सिर्फ़ देखा भर. ऐसे जैसे कभी-कभी कोई बड़ी शरारत कर के आने पर मेरे

पिताजी देखा करते थे. चुपचाप.

पर मैंने ऐसी कोई शरारत तो की नहीं थी. ज़ाहिर है, इसका मतलब साफ़ तौर पर सिर्फ़ यही था कि ऐसी कोई बात नहीं थी. फिर क्या वजह है? बार-बार पूछने पर भी सलाहू चुप रहा तो बस चुप ही रहा. जब भी मैंने उससे जो भी आशंका जताई हर बात पर वह सिर्फ़ चुप ही रहा. आंखों से या चेहरे से, अपनी विभिन्न भाव-भंगिमाओं के ज़रिये उसने हर बात पर यही जताया कि ऐसी कोई बात नहीं है.

अंततः यह आशंका हुई कि कहीं ऐसा तो नहीं कि वह गूंगा हो गया हो. वैसे भी हमारे समाज में जिह्वा को सरस्वती का वासस्थल माना जाता है और उसने जिह्वा का दुरुपयोग बेहिसाब किया है. मुवक्किलों से लेकर मुंसिफों तक. सरकार से लेकर ग़ैर सरकारी लोगों तक किसी को नहीं छोड़ा था. मुझे लगा क्या पता शब्द जिसे ब्रह्म का रूप कहा जाता है उसने इसका साथ छोड़ दिया हो, नाराज़गी के नाते. पर आत्मा से तुरंत दूसरी बात आई. अगर ऐसा होता तब तो यह बात पहले अपने साथ होनी चाहिए थी. आख़िर शब्दों का व्यापार करते हुए ऐसा कौन सा अपराध है जो शब्दों के ज़रिये अपन ने न किया हो! पर नहीं साहब अपन के साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. ऐसा मास्टर के साथ भी नहीं हुआ, जो केवल हिन्दी ही नहीं, संस्कृत और अंग्रेज़ी भाषाओं के साथ भी शब्दों से हेराफेरी करता आ रहा है, पिछले कई वर्षों से. पर ना, उसके साथ भी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.

हुआ तो बेचारे सलाहू के साथ. मुझे लगा कि हो न हो, यह किसी रोग वग़ैरह का ही मामला हो. मैं बेवजह पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में फंसा हुआ हूं और हर पढ़े-लिखे आदमी की तरह बेचारे अपने सबसे भरोसेमन्द मित्र के वैज्ञानिक इलाज के बजाय उसके और अपने पाप-पुण्य के लेखे-जोखे में लग गया हूं. आख़िरकार उसके बार-बार इशारों से मना करने के बावजूद मैं उसे जैसे-तैसे पकड़-धकड़ कर डॉक्टर के पास ले ही गया. लेकिन यह क्या डॉक्टर तो उससे पूछने पर तुला है और है कि बोल ही नहीं पा रहा है. आख़िरकार डॉक्टर ने आजिज आकर पता नहीं कौन सा डर्कोमर्कोग्राम एपीएमवीएनेन कराने के लिए कह दिया. तमाम और डॉक्टरी क्रियाओं की तरह मैने इसका भी नाम तो सुना नहीं था, लिहाजा डॉक्टर से पूछ लेना ही बेहतर समझा कि भाई इसका कितना पैसा लगेगा. लेकिन यह क्या, जैसे ही डॉक्टर ने बताया, ‘कुछ ख़ास नहीं, बस बीस हज़ार रुपये लगेंगे और इस टेस्ट से पता न चला तो फिर अमेरिका जाना पड़ेगा. वैसे यह भी हो सकता है कि स्वाइन फ्लू हुआ हो….’

सलाहू चुप नहीं रह सका. एकाएक चिल्ला कर बोला, ‘अरे मेरी जान के दुश्मनों मुझे कुछ नहीं हुआ है. मैं बिलकुल ठीक हूं.”

’अबे तो अब तक बोल क्यों नहीं रहा था.’

’बस ऐसे ही.’

’क्या भौजाई ने कुछ कह दिया’

’उंहूं”

’फिर’

उसने फिर सिर हिलाया. न बोलने का नाटक करते हुए.

‘तो क्या कचहरी में कोई बात हो गई’

उसने फिर न में सिर हिलाया.

’तो फिर क्या बात हुई?’

अब वह एकदम चुप था. पुनर्मूषकोभव वाली स्थिति में आ गया था. न बोलने की कसम उसने लगता है फिर खा ली थी.

‘भाई क्या वजह है? बोल और बिलकुल सही-सही बता वरना ये जान लो कि अभी तुम्हारी डर्कोमर्कोग्रामी शुरू.’

डर्कोमर्कोग्रामी का नाम सुनते ही उसके होश फिर ठिकाने आ गए. आख़िरकार बेचारा बोल ही पड़ा, ‘देख भाई, ये न तो घर का मामला है और न कचहरी का. ये मामला असल में है पार्टी का. आज नहीं तो कल पार्टी में मुझे गूंगे होना ही पड़ेगा. लिहाजा उसकी प्रैक्टिस अभी से शुरू कर दी है.’

’वो क्यों भाई? भला तुझे पार्टी में गूंगा कौन बना सकता है?’ मैने पूछा, ‘मैडम का तू ख़ास भरोसेमन्द है?’

’सो तो हूं’, उसने बताया, ‘लेकिन आज ही से एक नया संकट आ गया है.’

’वह क्या’, मैंने फिर पूछा, ‘क्या तेरे बराबर भरोसा किसी और ने भी जीत लिया है?’

’नहीं भाई, ऐसी भी कोई बात नहीं है.’

‘फिर?’

’असल में आज ही एक नया फ़रमान जारी हुआ है.’

’वह क्या गूंगे होने का फ़रमान है.’

‘ना गूंगे होने का नहीं, वह गूंगे बनाने का फ़रमान है.’

’फ़रमान तो बताओ.’

‘बस यह कि अबसे कोई पार्टी और ख़ास तौर से पार्टी मालिकों के परिवार के सदस्यों के लिए सामंतवादी या कहें राजशाही सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा. अब कोई किसी को युवराज, राजा, राजमाता, महाराज … आदि-आदि नहीं कहेगा.’

’तो?’

’तुम्ही बताओ, तब अब हम क्या कहेंगे? इस तरह तो हमारी पार्टी के 99 फ़ीसदी कार्यकर्ताओं का सोचना तक बन्द हो जाएगा. बोलने की तो बात ही छोड़ मेरे यार.’

इतना कह कर वह फिर से गहन मौन में चला गया. ऋषि-मुनियों की तरह.

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